‘भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम …’ – ऋग्वेद में स्वस्थ इंद्रियों के साथ शतायु जीवन की प्रार्थना

कई वेदमंत्रों में सूर्य, अग्नि, इंद्र, वरुण इत्यादि देवों के प्रति प्रार्थना का उल्लेख देखने को मिलता है । कुछ मंत्रों में देव शब्द के प्रयोग द्वारा उनकी सामूहिक स्तुति भी व्यक्त की गई । ये देव वस्तुतः क्या हैं मैं कभी समझ नहीं पाया । ऐसा प्रतीत होता है कि वैदिक चिंतकों का प्रकृति को नियंत्रित करने वाली अमूर्त दैवी शक्तियों में अटूट विश्वास था । उनकी मान्यता रही होगी कि ये शक्तियां चेतन हैं और उनकी स्तुति से स्वस्थ तथा सफल जीवन की प्राप्ति संभव है । रोगमुक्त शतायु जीवन की कामना के साथ इनकी प्रार्थना संबंधी मंत्र अथर्ववेद एवं यजुर्वेद में मैं पढ़ चुका हूं । दोनों ही वेदों में तत्संबंधी मंत्र ‘पश्येम शरदः शतम्’ से आरंभ होते हैं । इनका जिक्र मैं पहले कभी कर चुका हूं । (देखें क्रमशः 2 मार्च 2010 एवं 19 जून 2010 की ब्लाग-प्रविष्टियां ।)

ऋग्वेद में भी उपर्युक्त आाशय वाली दो ऋचाओं से मेरा साक्षात्कार हाल में हुआ । इस स्थल पर मैं उन्हीं का उल्लेख कर रहा हूं । पहली ऋचा है

भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥

(ऋग्वेद मंडल 1, सूक्त 89, मंत्र 8)

(भद्रम् कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रम् पश्येम अक्षभिः यजत्राः स्थिरैः अङ्गैः तुष्टुवांसः तनूभिः वि-अशेम देव-हितम् यत् आयुः ।)

भावार्थ: हे देववृंद, हम अपने कानों से कल्याणमय वचन सुनें । जो याज्ञिक अनुष्ठानों के योग्य हैं (यजत्राः) ऐसे हे देवो, हम अपनी आंखों से मंगलमय घटित होते देखें । नीरोग इंद्रियों एवं स्वस्थ देह के माध्यम से आपकी स्तुति करते हुए (तुष्टुवांसः) हम प्रजापति ब्रह्मा द्वारा हमारे हितार्थ (देवहितं) सौ वर्ष अथवा उससे भी अधिक जो आयु नियत कर रखी है उसे प्राप्त करें (व्यशेम) । तात्पर्य है कि हमारे शरीर के सभी अंग और इंद्रियां स्वस्थ एवं क्रियाशील बने रहें और हम सौ या उससे अधिक लंबी आयु पावें ।

और अनुक्रम में दूसरी ऋचा है

शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्र नश्चक्र जरसं तनूनाम् ।
पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ॥

(यथा उपर्युल्लिखित, मंत्र 9)

(शतम् इत् नु शरदः अन्ति देवाः यत्र नः चक्र जरसम् तनूनाम् पुत्रासः यत्र पितरः भवन्ति मा नः मध्या रीरिषत आयुः गन्तोः ।)

भावार्थ: हे देवो, मनुष्य की आयु की सम्यक् समाप्ति सौ वर्ष (शरदः) की नियत की गयी है, जिसमें वृद्धावस्था (जरसं) की व्यवस्था की है (चक्र) और जिसमें हमारे पुत्र (पुत्रासः) स्वयं पिता बन सकें, अर्थात् हम पौत्रवान् बन जावें । ऐसे उस पूर्ण आयु की अंतकाल (अन्ति) से पहले बीच के काल में ही हमारी हिंसा न करें, यानी हमें क्षति न पहुंचाएं (रीरिषत), हमें क्षीणकाय न बनावें ।

उपर्युक्त भावार्थ मैंने ऋग्वेद के सायणभाष्य के आधार पर प्रस्तुत किया है, जैसा मैं उसे समझ पाया, ग्रहण कर सका । शब्दों का चयन और भावाभिव्यक्ति कदाचित् स्तरीय न हो, किंतु उसे सामान्य भाषा में लिखने का मैंने प्रयास किया है । दूसरी ऋचा के ‘पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति’ का अर्थ विकल्पतः ऐसा भी दिया गया हैः ‘जिस अवस्था में हमारे पुत्र पितर बन जावें’ । पितर (संस्कृत में पिता = पितृ का बहुवचन) का अर्थ होता है पालन करने वाला । चूंकि संतान का पालन सामान्यतः जन्मदाता ही करता है, अतः रुढ़ि अर्थ में उसी को पिता कहा है । प्रचलित सामाजिक व्यवस्था में पुत्र ही वृद्ध जन्मदाताओं का पालन करते हैं, अतः उस अर्थ में वे अपने पिताओं के पितर हो जाते हैं । – योगेन्द्र जोशी

3 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. प्रवीण पाण्डेय
    अप्रैल 16, 2011 @ 22:29:00

    जीवेत वर्षम् शतम्

    प्रतिक्रिया

  2. kanishkakashyap
    जुलाई 15, 2011 @ 18:47:45

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  3. hareram tiwari
    मार्च 05, 2014 @ 15:10:31

    very nic

    प्रतिक्रिया

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