“न स सखा यो न ददाति सख्ये… ” – ऋग्वेद में दानशीलता की नीतिगत बातें

हिंदुओं के लिए वेदों का सैद्धांतिक महत्त्व आज भी है । सैद्धांतिक शब्द का प्रयोग मैं इसलिए कर रहा हूं कि व्यवहार में अब वेदों का अध्ययन करने वाले प्रायः नहीं के बराबर रह गये हैं, और उनके अनुसार जीवन यापन करने वाला तो शायद ही कोई रह गया होगा । वेद कितने स्वीकार्य हैं, इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता, लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि उनकी कई बातें प्रासंगिक और व्यावहारिक उपयोगिता की हैं । 

पुरातन ऋग्वेद ग्रंथ में मुझे तीन प्रकार की बातें पढ़ने को मिली हैं । एक ओर तो इसमें कर्मकांड और यज्ञयाज्ञादि के अनुष्ठान की वातें हैं, तो दूसरी ओर अध्यात्म और दर्शन के विचार हैं । इनके अतिरिक्त व्यावहारिक जीवन के कर्तव्यों और नीतियों का भी उल्लेख इसमें है । गंथ के मंडल 10 में मुझे दान देने और जरूरतमंदों की मदद करने संबंधी उपदेश पढ़ने को मिले हैं । मैं यहां पर चुनी हुई तीन ऋचाएं (मंत्र) प्रस्तुत कर रहा हूं ।

(ऋग्वेद, मंडल 10, सूक्त 117, ऋचाएं क्रमशः 2, 4, एवं 5)

य आध्राय चकमानाय पित्वो९न्नवान्सन्रफितायोपजग्मुषे । स्थिरं मनः कृणुते सेवते पुरोतो चित्स मर्डितारं न विन्दते ॥ 
(य आध्राय चकमानाय पित्वः अन्नवान् सन् रफिताय उपजग्मुषे स्थिरं मनः कृणुते सेवते पुरा उतो चित् सः मर्डितारं न विन्दते ।) 
जो व्यक्ति अन्नवान् होते हुए निर्धनता से दुर्बल हुए पास आए याचक को अन्नदान नहीं करता, बल्कि मन कठोर रखते हुए उसके समक्ष अन्न का उपभोग अकेले करता है वह स्वयं भी कहीं सुख नहीं पा सकता । 

मेरे मतानुसार इस मंत्र में अन्न का अर्थ जीवनाधार अन्न-संपदाएं यानी भोग्य वस्तुएं होना चाहिए । संपन्न व्यक्ति के मन में भूखे-प्यासे के प्रति कुछ करुणा भाव तो जगना ही चाहिए । ‘कहीं सुख नहीं पा सकता’ के अर्थ पारलौकिक सुख से तो नहीं है ? वैदिक चिंतक इहलोक-परलोक के सतत चलने वाले चक्र में विश्वास करते थे, और मानते थे कि इहलोक के कर्मों पर परलोक निर्भर करता है । 

न स सखा यो न ददाति सख्ये सचाभुवे सचमानाय पित्वः । अपास्मात्प्रेयान्न तदोको अस्ति पृणन्तमन्यमरणं चिदिच्छेत् ॥ 
(न स सखा यः न ददाति सख्ये सचाभुवे सचमानाय पित्वः अप अस्मात् प्रेयात् न तत् ओको अस्ति पृणन्तम् अन्यं अरणं चित् इच्छेत् ।) 
जो व्यक्ति अपने साथ रहने वाले सहायक सहचर सखा को अन्नादि नहीं देता वह सुहृद् कहलाने के योग्य नहीं है । इस व्यक्ति का घर अपने योग्य नहीं है इस विचार के साथ सखा को उस व्यक्ति साथ छोड़कर अन्नादि की याचना करते हुए अन्यत्र अपना आश्रय तलाशना चाहिए ।  

सखा और मित्र शब्दों में भेद है । मोटे तौर पर दोनों समानार्थी मान लिए जाते हैं । मित्र व्यक्ति सदैव पास रहता हो आवश्यक नहीं; यह भावनात्मक अधिक है । इसके विपरीत सखा साथ में रहकर सहचर/परिचर की भूमिका में रहता है; अर्थात् साथ में रहने वाला सखा होता है । 

पृणीयादिन्नाधमानाय तव्यान्द्राघीयांसमनु पश्येत पन्थाम् । ओ हि वर्तन्ते रथ्येव चक्रान्यमन्यमुपतिष्ठन्त रायः ॥ 
(पृणीयात् इत् न अधमानाय तव्यान् द्राघीयांसम् अनुपश्येत पन्थाम् ओ हि वर्तन्ते रथ्या इव चक्रा अन्यम् अन्यम् उपतिष्ठन्त रायः ।) 
धनसंपदाओं से सुसमृद्ध व्यक्ति को चाहिए कि वह याचक की मांग को पूरी करते हुए पुण्यमार्ग का अनुसरण करे । संपदाओं का क्या है, वे तो कहीं भी सदैव के लिए नहीं टिकतीं । जैसे रथ के पहिए के अर (आरा) एक-दूसरे का स्थान लेती हुई अपना स्थान बदलती हैं वैसे ही संपदा भी अपना स्थान बदलती रहती हैं । 

यह मंत्र मनुष्य को धनसंपदा की नश्वरता का ध्यान दिलाती है । मंत्र कहता है कि कल तुम भी निर्धन हो सकते हो या कालांतर में तुम्हारी संपदा का नाश हो सकता है । निश्चय की धन की अनश्वरता संदेहास्पद है । यदि आप इतिहास पर दृष्टि डालें तो पाएंगे कि आज के सुसंपन्न लोगों की पूर्ववर्ती चौथी-पांचवीं पीढ़ियां सामान्य ही रही हैं, और जो लोग तीन-चार पीढ़ी पहले तक संपन्न रहे हैं उनके वंशजों की सुसंपन्नता की बातें नहीं होती हैं । असल में धन की तीन नियतियों का उल्लेख नीतिशास्त्रों में मिलता हैः भोग, दान एवं नाश । मनुष्य एक सीमा से अधिक भोग कर ही नहीं सकता है । ऐसे में उसे धन का एक अंश दान में खर्च करना ही चाहिए । यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो उस धन का अन्य तरीके से नाश ही अंतिम परिणति रह जाती है । अयोग्य उत्तराधिकारियों के हाथ में पहुंचकर उस धन की बरबादी अवश्यंभावी है । 

यह दुर्भाग्य की बात है कि स्वयं को धर्मनिष्ठ कहने वाले भारतीय समाज के लोगों के मन में जरूरतमंदों की आर्थिक मदद का विचार आता ही नहीं है । सीमित भोग के पश्चात् अपने धन को वे ‘और अधिक धन’ बटोरने में निवेश करते हैं । धन बढ़ता जाता है, लेकिन निरंतर बढ़ते हुए उस धन का उपभोग होगा कैसे यह प्रश्न उनके लिए महत्त्व नहीं रखता है । - योगेन्द्र जोशी

5 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. प्रवीण पाण्डेय
    जुलाई 06, 2011 @ 10:06:33

    दार्शनिक तथ्यों का व्यवहारिक जीवन में अनुप्रयोग सदियों से मनुष्य करता आया है।

    प्रतिक्रिया

  2. aniruddha Pande
    जुलाई 06, 2011 @ 18:55:10

    nice quote sir

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  3. हमारीवाणी एग्रीगेटर
    जुलाई 11, 2011 @ 14:26:00

    आपके ब्लॉग पर लगे हमारीवाणी कोड में त्रुटियाँ हैं, कृपया हमारीवाणी पर लोगिन करके सही कोड प्राप्त करें और उसे इस कोड की जगह लगा लें. आपसे यह भी अनुरोध है कि जब भी आप नई पोस्ट लिखे तब तुरंत ही हमारीवाणी क्लिक कोड से उत्पन्न लोगो पर क्लिक करें. इससे आपकी पोस्ट हमारीवाणी पर प्रकाशित हो जाएगी.

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  4. कुणाल वर्मा
    जुलाई 15, 2011 @ 13:52:33

    बढिया प्रस्तुति

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  5. Jeevanlal Patel
    मार्च 24, 2014 @ 17:54:59

    महाराज जी, प्रणाम
    आपकी सारी रोचक तथा ज्ञानपूर्ण बातें इस ब्लॉग पर पढ़ी. महात्मा बुद्ध ने हमारे प्राचीन महान ग्रन्थस्थित बातों का कई बार शुद्धिकरण किया, आशा है की अगर आपके संग्रह में तो सब को बताए. धन्यवाद

    प्रतिक्रिया

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