‘दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति …’ – महाभारत, शांतिपर्व, में शासकीय दण्ड की नीति

महाभारत महाकाव्य के आरंभिक पर्व – आदिपर्व – में अपराधी को देय दण्ड की महत्ता का उल्लेख है । उसका जिक्र मैंने पहले की एक पोस्ट में किया था । मुझे महाभारत युद्ध के बाद की स्थिति से संबंधित पर्व – शान्तिपर्व – में भी दण्ड की बातें पढ़ने को मिली हैं । मैं कुछ चुने हुए श्लोकों का उल्लेख आगे कर रहा हूं । (संदर्भः महाभारत, शान्तिपर्व, अध्याय 15)

दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति ।

दण्डः सुप्तेषु जागर्र्ति दण्डं धर्म विदुर्बुधाः ॥2॥

(दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वाः दण्ड एव अभिरक्षति दण्डः सुप्तेषु जागर्र्ति दण्डं धर्मः विदुः बुधाः ।)

भावार्थः (अपराधियों को नियंत्रण में रखने के लिए दण्ड की व्यवस्था हर प्रभावी एवं सफल शासकीय तंत्र का आवश्यक अंग होती है ।) यही दण्ड है जो प्रजा को शासित-अनुशासित रखता है और यही उन सबकी रक्षा करता है । यही दण्ड रात्रिकाल में जगा रहता है और इसी को विद्वज्जन धर्म के तौर पर देखते हैं ।

शासन का कर्तव्य है कि वह हर क्षण अपराधों को रोकने के लिए सजग रहे। रात हो या दिन, उसके राजकर्मी घटित हो रहे अपराधों पर नजर रखें और अपराधी को दंडित करें । यदि ऐसा न हो तो लोग सुरक्षित नहीं रहेंगे । दण्ड ही शासकीय तंत्र का प्रमुख धर्म है ।

दण्डश्चेन्न भवेल्लोके विनश्येयुरिमाः प्रजाः ।

जले मत्स्यानिवाभक्षन् दुर्बलान् बलवत्तराः ॥30॥

(दण्डः चेत् न भवेत् लोके विनश्येयुः इमाः प्रजाः जले मत्स्यान् इव अभक्षन् दुर्बलान् बलवत्-तराः ।)

भावार्थः यदि दण्ड न रहे, अर्थात् दण्ड की प्रभावी व्यवस्था न हो, तो प्रजा का विनाश निश्चित है । जिस प्रकार पानी में पलने वाली छोटी मछली का भक्षण बड़ी मछली कर डालती है उसी प्रकार अपेक्षया अधिक बलवान् व्यक्ति दुर्बलों का ‘भक्षण’ कर डालेंगे ।

प्रभावी दण्ड के अभाव का अर्थ है अराजकता । अधिकांश जन दण्ड के भय से अपराधों से बचे रहते हैं । अगर दण्ड न रहे तो लूटपाट-छीनाझपटी आम बात हो जाएंगी । ताकतवर लोग अपनी दबंगई के बल पर कमजोरों को नचाना आरंभ कर देंगे, उन्हें भांति-भांति प्रकार से प्रताड़ित करने लगेंगे । मनुस्मृति में भी यह बात कही गयी है, जिसकी चर्चा मैंने अन्यत्र कही है । वहां दिये गये श्लोक के शब्द थोड़े भिन्न हैं:

यदि न प्रणयेद्राजा दण्डं दण्ड्येष्वतन्द्रितः । शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन्दुर्बलान्बलवत्तराः ॥

सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्जनः ।

दण्डस्य हि भयात् भीतो भोगायैव प्रवर्तते ॥34॥

(सर्वः दण्डजितः लोकः दुर्लभः हि शुचिः जनः दण्डस्य हि भयात् भीतः भोगाय एव प्रवर्तते ।)

भावार्थः यह संसार दण्ड से ही जीता जा सकता है, अर्थात् यहां पर लोग दण्ड के प्रयोग से ही नियंत्रित रहते हैं । अन्यथा स्वभाव से सच्चरित्र लोग यहां विरले ही होते हैं । यह दण्ड का ही भय है कि लोग भोगादि की मर्यायाओं का उल्लंघन नहीं करते हैं ।

मनुस्मृति में यह श्लोक दो-चार शब्दों के अंतर के साथ यों दिया गया हैः

सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्नरः । दण्डस्य हि भयात्सर्वं जगद्भोगाय कल्पते ॥

दण्डे स्थिताः प्रजाः सर्वा भयं दण्डे विदुर्बुधाः ।

दण्डे स्वर्गो मनुष्याणां लोको९यं सुप्रतिष्ठितः ॥43॥

(दण्डे स्थिताः प्रजाः सर्वाः भयं दण्डे विदुः बुधाः दण्डे स्वर्गः मनुष्याणां लोकः अयं सुप्रतिष्ठितः ।)

भावार्थः संपूर्ण प्रजा दण्ड में स्थित रहती है । अर्थात् दण्ड की व्यवस्था के अंतर्गत लोग अनुशासित रहते हैं और अपने कर्तव्यों की अवहेलना नहीं करते हैं । मनुष्य के परलोक एवं इहलोक, दोनों ही, दण्ड पर टिके हैं ।

दण्ड का भय उसे पापकर्मों से बचाता है, अतः उसके कृत्य उसके अपने लिए एवं समाज के लिए अहितकर नहीं होते हैं । उस स्थिति में परलोक भी – यदि इसके अस्तित्व में आस्था रखी जाए तो – दुःखमुक्त होगा ऐसी अपेक्षा की जाती है ।

न तत्र कूटं पापं वा वञ्चना वापि दृष्यते ।

यत्र दण्डः सुविहितश्चरत्यरिविनाशनः ॥44॥

(न तत्र कूटं पापं वा वञ्चना वा अपि दृष्यते यत्र दण्डः सुविहितः चरति अरि-विनाशनः ।)

भावार्थः जहां शत्रुनाशक दण्ड का संचालन सुचारु तौर पर चल रहा हो वहां छल-कपट, पाप या ठगी जैसी बातें देखने को नहीं मिलती हैं ।

शत्रु से मतलब है वह जो अपने भ्रष्ट आचरण से समाज का अहित करने पर तुला हो । दण्ड उनको नियंत्रण में रखता है, अतः उसे शत्रुनाशक कहा गया है । उसी के समुचित प्रयोग किए जाने पर समाज में लोगों का व्यवहार असामाजिक नहीं हो पाता है । मैंने मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, एवं महाभारत आदि जैसे प्राचीन ग्रंथों में दण्ड की बात पढ़ी है । न्याय की बात उनमें कम ही की गयी है । उनमें अपराधियों को दण्डित करने की बातों पर बल दिया गया है । मुझे लगता है कि तत्कालीन नीतिकार भली भांति समझते थे कि अपराधी को दण्डित तो कर सकते हैं, किंतु भुक्तभोगी को न्याय दे सकें यह शायद नहीं हो सकता है । जो हो चुका उसको उलटा ही नहीं जा सकता है । जो मर चुका उसे वापस नहीं ला सकते । दूसरे के कुकृत्य का दंश झेलने वाले की पीड़ा समाप्त नहीं हो सकती । जिसका मूल्यवान् समय छीना जा चुका हो उसे वापस नहीं पाया जा सकता है । इसलिए न्याय की अवधारणा भ्रामक है । केवल दण्ड की ही बात सार्थक है और उसके कार्यान्वयन में न्याय भी निहित हो यह मानना मूर्खता है ।

यह अपने देश का दुर्भाग्य है कि यहां दण्ड व्यवस्था निष्प्रभावी-सी हो चुकी है, खासकर रसूखदार लोगों के मामले में । योगेन्द्र जोशी

3 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. प्रवीण पाण्डेय
    जुलाई 23, 2011 @ 21:22:43

    अराजक को भय हो, सज्जन को सुरक्षा।

    प्रतिक्रिया

  2. Swami Anandadevananda Saraswati
    अगस्त 30, 2012 @ 20:15:58

    महा भारत के अनुसार अपराध की क्या व्याख्या है?
    और कौन सा श्लोक है, बताये?
    मैंने एक बार पढ़ा था की “जो अपराध करता है, जो अपराध को देखता है और जो अपराध को सहता है, वे तीनो अपराधी है”, यह श्लोक फिर मे नहीं खोज पाया . आपको मेले तो बताये .

    स्वामी अनंदादेवानंद सरस्वती
    स्वर्गाश्रम

    प्रतिक्रिया

  3. जीवनलाल पटेल
    फरवरी 17, 2014 @ 11:37:25

    मै दण्ड के बारेमे (महाभारत शान्तिपर्व अध्याय १५) इसी श्लोक को काफ़ि दिनो तक तलाश करता रहा . आपके द्वारा मुज़े मिल. धन्यवाद . आगे और भी खजाना मिला. और भी आगे आगे ज्ञान मिलत थ. आपके बहुत धन्यवाद. इश्वर् आपकी सदबुद्धि कायं रखे.

    प्रतिक्रिया

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