भर्तृहरि-नीतिशतकम् के वचन – असंभव है मूर्ख जन को संतुष्ट कर पाना

भर्तृहरि राजा द्वारा विरचित शतकत्रयम् संस्कृत साहित्य की छोटी किंतु गंभीर अर्थ रखने वाली चर्चित रचना है । कहा जाता है कि उन्हें प्रौढ़ावस्था पार करते-करते वैराग्य हो गया था और तदनुसार उन्होंने राजकार्य से संन्यास ग्रहण कर लिया था । उनके बारे में संक्षेप में मैंने किसी अन्य ब्लॉग-प्रविष्टि में दो-चार शब्द लिखे हैं । अपनी उक्त रचना के प्रथम खंड, ‘नीतिशतकम्‌’, के आरंभ में उन्होंने यह कहा है कि मूर्ख व्यक्ति को समझाना असंभव-सा कार्य है । इस संदर्भ में उनके तीन छंद मुझे रोचक लगे, जिनका उल्लेख मैं आगे कर रहा हूं ।

अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः ।
ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि तं नरं न रञ्जयति ॥
(भर्तृहरि विरचित नीतिशतकम्, श्लोक 3)
अज्ञः सुखम् आराध्यः, सुखतरम् आराध्यते विशेषज्ञः, ज्ञान-लव-दुः-विदग्धं ब्रह्मा अपि तं नरं न रञ्जयति ।

अर्थः गैरजानकार मनुष्य को समझाना सामान्यतः सरल होता है । उससे भी आसान होता है जानकार या विशेषज्ञ अर्थात् चर्चा में निहित विषय को जानने वाले को समझाना । किंतु जो व्यक्ति अल्पज्ञ होता है, जिसकी जानकारी आधी-अधूरी होती है, उसे समझाना तो स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के भी वश से बाहर होता है ।

“अधजल गगरी छलकत जात” की उक्ति अल्पज्ञ जनों के लिए ही प्रयोग में ली जाती है । ऐसे लोगों को अक्सर अपने ज्ञान के बारे में भ्रम रहता है । गैरजानकार या अज्ञ व्यक्ति मुझे नहीं मालूम कहने में नहीं हिचकता है और जानकार की बात स्वीकारने में नहीं हिचकता है । विशेषज्ञ भी आपने ज्ञान की सीमाओं को समझता है, अतः उनके साथ तार्किक विमर्ष संभव हो पाता है, परंतु अल्पज्ञ अपनी जिद पर अड़ा रहता है

अगले छंद में कवि भर्तृहरि मूर्ख को समझाने के प्रयास की तुलना कठिनाई से साध्य कार्यों से करते हैं, और इस प्रयास को सर्वाधिक दुरूह कार्य बताते हैं ।

प्रसह्य मणिमुद्धरेन्मकरदंष्ट्रान्तरात्
समुद्रमपि सन्तरेत् प्रचलदुर्मिमालाकुलाम् ।
भुजङ्गमपि कोपितं शिरसि पुष्पवद्धारयेत्
न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ॥
(पूर्वोक्त, श्लोक 4)
प्रसह्य मणिम् उद्धरेत् मकर-दंष्ट्र-अन्तरात्, समुद्रम् अपि सन्तरेत् प्रचलत्-उर्मि-माला-आकुलाम्, भुजङ्गम् अपि कोपितं शिरसि पुष्पवत् धारयेत्, न तु प्रति-निविष्ट-मूर्ख-जन-चित्तम् आराधयेत् ।

अर्थः मनुष्य कठिन प्रयास करते हुए मगरमच्छ की दंतपंक्ति के बीच से मणि बाहर ला सकता है, वह उठती-गिरती लहरों से व्याप्त समुद्र को तैरकर पार कर सकता है, क्रुद्ध सर्प को फूलों की भांति सिर पर धारण कर सकता है, किंतु दुराग्रह से ग्रस्त मूर्ख व्यक्ति को अपनी बातों से संतुष्ट नहीं कर सकता है ।

जिन कार्यों की बात की गयी है उन्हें सामान्यतः कोई नहीं कर सकता है; कोई भी उन्हें करने का दुस्साहस नहीं करना चाहेगा । फिर भी उन्हें करने में सफलता की आशा की जा सकती है, परंतु तुलनया देखें तो मूर्ख का पक्ष जीतना उनसे भी कठिनतर होता है ।

इसके आगे राजा भर्तृहरि यह कहने में भी नहीं चूकते हैं कि असंभव माना जाने वाला कार्य कदाचित् संभव हो जाए, लेकिन मूर्ख को संतुष्ट कर पाना फिर भी संभव नहीं है ।

लभेत् सिकतासु तैलमपि यत्नतः पीडयन्
पिबेच्च मृगतृष्णिकासु सलिलं पिपासार्दितः ।
कदाचिदपि पर्यटञ्छशविषाणमासादयेत्
न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ॥
(पूर्वोक्त, श्लोक 5)
लभेत् सिकतासु तैलम् अपि यत्नतः पीडयन्, पिबेत् च मृग-तृष्णिकासु सलिलं पिपासा-आर्दितः, कदाचित् अपि पर्यटन् शश-विषाणम् आसादयेत्, न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ॥

अर्थः कठिन प्रयास करने से संभव है कि कोई बालू से भी तेल निकाल सके, पूर्णतः जलहीन मरुस्थलीय क्षेत्र में दृश्यमान मृगमरीचिका में भी उसके लिए जल पाकर प्यास बुझाना मुमकिन हो जावे, और घूमते-खोजने अंततः उसे खरगोश के सिर पर सींग भी मिल जावे, परंतु दुराग्रह-ग्रस्त मूर्ख को संतुष्ट कर पाना उसके लिए संभव नहीं ।

उक्त छंद में अतिरंजना का अंलकार प्रयुक्त है । यह सभी जानते हैं कि बालू से तेल लिकालना, जल का भ्रम पैदा करने वाली मृगतृष्णा में वास्तविक जल पाकर प्यास बुझाना, और खरगोश के सिर पर सींग खोज लेना जैसी बातें वस्तुतः असंभव हैं । कवि का मत है कि मूर्ख को सहमत कर पाना इन सभी असंभव कार्यों से भी अधिक कठिन है ।

एक प्रश्न है जिसका उत्तर देना मुझे कठिन लगता है । मूर्ख किसे कहा जाए इसका निर्धारण कौन करे, किसे निर्णय लेने का अधिकार मिले ? स्वयं को मूर्ख कौन कहेगा ? मेरे मत में वह व्यक्ति जो अपने विचारों एवं कर्मों को संभव विकल्पों के सापेक्ष तौलने को तैयार नहीं होता, खुले दिमाग से अन्य संभावनाओं पर ध्यान नहीं देता, आवश्यकतानुसार अपने विचार नहीं बदलता, अपने आचरण का मूल्यांकन करते हुए उसे नहीं सुधारता और सर्वज्ञ होने या दूसरों से अधिक जानकार होने के भ्रम में जीता है वही मूर्ख है । आप इस पर विचार करें । – योगेन्द्र जोशी

8 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. प्रवीण पाण्डेय
    सितम्बर 13, 2011 @ 21:27:11

    मूर्ख को असंतुष्ट ही रहने दिया जाये।

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    • योगेन्द्र जोशी
      सितम्बर 13, 2011 @ 22:03:30

      भई प्रवीण जी, इतना आसान नहीं मूर्ख को अपने हाल पर छोड़ देना। ऐसे अनेकों अवसर आते हैं जब उनसे वास्ता पड़ता है। कुछ मौकों पर उनकी अनदेखी की जा सकती है। लेकिन कभी-कभी ऐसा करने पर भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। इस प्रश्न का उत्तर अवश्य कठिन है कि किसे मूर्ख कहा जाए। – योगेन्द्र जोशी

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  2. upendradubey
    सितम्बर 13, 2011 @ 23:26:22

    कितनी भी कोशिश की जाये समाज का यह वर्ग संतुष्ट नहीं हो पता उसको यथास्थिति में ही रहने देने में सबकी भलाई है ….

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  3. sonibharat
    अक्टूबर 09, 2011 @ 10:09:19

    respected yogendra g thanks a lot for article

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  4. mukeshnagar
    नवम्बर 24, 2011 @ 22:14:04

    उपदेशो हि मूर्खाणाम् प्रकोपायो न शांतये |

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  5. Nivedita Jain
    अक्टूबर 07, 2012 @ 20:15:49

    सर क्या आप मुझे भर्तृहरि- रचित नीति शतक और वैराग्य शतक मेल कर सकते हैं??
    धन्यवाद |

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  6. Om Prakash Vyas
    नवम्बर 05, 2016 @ 00:39:17

    आज नीति को सभी भूल गये हैं याद दिलाना आवश्यक है ….डॉ.ओ.पी.व्यास गुना म.प्र.भारत

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    • योगेन्द्र जोशी
      नवम्बर 05, 2016 @ 15:28:55

      एक वयस्क नागरिक के नाते मैंने जीवन में जो अनुभव किया है उसके मद्देनजर यही कहूंगा कि मानव समाज को सुधारना संभव नहीं है। इतिहास गवाह है कि अनेक महापुरुष इस धरा पर अवतरित हुए हैं जिन्होंने सुधारने का प्रयास किया है, लेकिन कोई स्थायी अंतर लाने में वे सफल नहीं हुए हैं। जहां बेहतरी की दिशा में कुछ ने प्रयास किया वहीं ऐसे भी लोग हुए हैं जो समाज को विपरित दिशा में ले जाने में सफल हुए हैं। सत् एवं असत् के बीच द्वंद सदा से चलता आ रहा है। जहां तक नीति का सवाल है पहले पापफल के नाम पर मनुष्य डरता था। आज के युग में वह भी नहीं रहा, फिर अनीति से डर किसे?

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