दरिद्रता के (कु)परिणाम – संस्कृत नाट्य ‘मृच्छकटिकम्’ में चारुदत्त के नैराश्य की अभिव्यक्ति

‘मृच्छकटिकम्’ संस्कृत साहित्य की एक चर्चित नाट्य-रचना है, जिसके बारे में मैं पहले अन्यत्र लिख चुका हूं (देखें दिनांक 26-9-2010 एवं 11-2-2009 की प्रविष्ठियां) ।

उसका नायक अभिजात वर्ग का एक उदार एवं सरलहृदय ब्राह्मण है, जो अति दानशीलता के कारण अपनी संपन्नता खो बैठता है । नाटक में एक प्रसंग है जिसके अंतर्गत चारुदत्त को गरीबी पर अपने मित्र के साथ निराशाप्रद टिप्पणी करते हुए दिखाया गया है । अपने उद्गार को वह इस प्रकार प्रस्तुत करता हैः-

दारिद्र्यात् पुरुषस्य बान्धवजनो वाक्ये न सन्तिष्ठते ।
सुस्निग्धा विमुखीभवन्ति सुहदः स्फारीभवन्त्यापदः ।
सत्त्वं ह्रासमुपैति शीलशालिनः कान्तिः परिम्लायते ।
पापं कर्म च यत्परैरपि कृतं तत्तस्य संभाव्यते ॥36॥
(मृच्छकटिकम्, प्रथम अंक)
(दारिद्र्यात् पुरुषस्य बान्धव-जनः वाक्ये न सम्-तिष्ठते; सु-स्निग्धा विमुखी-भवन्ति सुहदः स्फारी-भवन्ति आपदः; सत्त्वं ह्रासम् उप-एति; शील-शालिनः कान्तिः परि-म्लायते; पापं कर्म च यत् परैः अपि कृतं तत् तस्य संभाव्यते ।)

अर्थ – आर्थिक हीनावस्था में पहुंचने पर उस गरीब की बात निकट संबंधी नहीं सुनता; जो हितैषी पहले सौहार्द भाव से पेश आते थे वे भी मुख मोड़ लेते हैं; विपत्तियां बढ़ जाती हैं; व्यक्ति की सामर्थ्य चुक जाती है; चरित्र एवं शालीनता की चमक फीकी पड़ जाती है; और दूसरों के हाथों घटित पापकर्म भी अब उसके द्वारा किये गये समझे जाने लगते हैं (उस पर संदेह किया जाता है) ।

सङ्गं नैव हि कश्चिदस्य कुरुते सम्भाषते नादरात् ।
सम्प्राप्तो गृहमुत्सवेषु धनिनां सावज्ञमालोक्यते ।
दूरादेव महाजनस्य विहरत्यल्पच्छदो लज्जया ।
मन्ये निर्धनता प्रकाममपरं षष्ठं महापातकम् ॥37॥
(यथा उपर्युक्त)
(सङ्गं न एव हि कश्चित् अस्य कुरुते सम्-भाषते न आदरात्; सम्-प्राप्तः गृहम् उत्सवेषु धनिनां स-अवज्ञम् आलोक्यते; दूरात् एव महाजनस्य विहरति अल्प-च्छदः लज्जया; मन्ये निर्धनता प्रकामम् अपरं षष्ठं महा-पातकम् ।)

अर्थ – आर्थिक विपन्नता झेल रहे व्यक्ति के सान्निध्य से लोग बचते हैं; कोई भी आदर के साथ बात नहीं करता है; उत्सव के अवसर पर किसी धनी के घर पहुंचा ऐसा व्यक्ति संपन्न जनों द्वारा तिरस्कार भाव से देखा जाता है; प्रतिष्ठासूचक परिधान के अभाव में लज्जा या संकोच से ग्रस्त ऐसा व्यक्ति श्रेष्ठ माने जाने वाले के पास से बचकर निकलता है । मैं मानता हूं कि निर्धनता गंभीर छठा महापातक है ।

मनुस्मृति में पांच महापातकों अर्थात् गंभीरतम पापों का उल्लेख किया गया है, जिनमें प्रथम चार हैं: 1. ब्रह्महत्या (ब्राह्ण की हत्या), 2. सुरापान (शराब पीना), 3. चोरी, एवं 4. गुरुपत्नी के साथ संबंध, और 5वां है इन चार प्रकार के पापकर्मों में लिप्त व्यक्ति के साथ अंतरंगता । मृच्छकटिकम् का नायक कहता है कि निर्धनता स्वयं में एक महापाप है जिसे छठा महापाप कहना चाहिए । (आजकल इन पापकर्मों को गंभीरता से नहीं लिया जाता है, खास तौर पर पांचवे को । किसी अपराधी के साथ संबंधों की व्यक्ति-स्वातंत्र्य के नाम पर छूट आम बात है ।)

धन की महत्ता मानव समाज में सर्वत्र एवं सदैव ही रही है । रामायण-महाभारत ग्रंथों में भी धन की महत्ता की चर्चा पढ़ने को मिल जाती है । मृच्छकटिकम्, जिसका रचनाकाल अनुमानतः 5-6 ईसवी  समझा जाता है, तब की सामाजिक दिशा-दशा का प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करता है । ऐसा प्रतीत होता है कि उस काल में मनुष्य की आर्थिक संपन्नता उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा निर्धारित करती थी । मेरा मत है कि प्राचीन काल में व्यक्ति के गुणों की अनदेखी नहीं होती थी, और उसका सम्मान उसकी विद्वता, चरित्र एवं परोपकारशीलता पर अधिक निर्भर करता था । किंतु आज के युग में ये बातें गौण होती जा रही हैं । आज धनसंपदा महत्ता में सर्वोपरि है, भले ही हम अन्य बातों के महत्त्व को औपचारिकतावश स्वीकारने का ढोंग करते हों । आजकल ‘हाय पैसा, हाय पैसा’ की भावना के साथ अधिकाधिक पैसा कमाने की होड़ हमारी धनलिप्सा को ही प्रतिबिंबित करता है । जो अपेक्षया निर्धन हो उसको हम बराबरी का दर्जा नहीं देते; उससे दूरी बनाने की कोशिश करते हैं; अपने संबंध बराबर अथवा अपने से ऊपर के व्यक्ति से साथ स्थापित करने का प्रयास करते हैं । उपरिलिखित छंदों में चारुदत्त की तत्संबंधित पीड़ा ही झलकती है । – योगेन्द्र जोशी

3 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. प्रवीण पाण्डेय
    मई 05, 2012 @ 18:50:52

    यह बात तो सत्य है कि धन गुणों को सहारा देता है क्योंकि दरिद्रता में तो सबकुछ ही छिप जाता है।

    प्रतिक्रिया

  2. vivekshukla
    मई 08, 2012 @ 22:13:11

    adhanasya kuto mitram ,amitrasya kuto sukham/

    प्रतिक्रिया

  3. vivekshukla
    मई 08, 2012 @ 22:18:21

    pustakasthatu ya vidhya ,par hast gatam dhanam //kaaryakaale samutpanne naa ya vidhya na tad dhanam //is =to daridrata

    प्रतिक्रिया

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