‘मधु वाता ऋतायते …’ – ऋग्वेद में मधुमय जीवन की प्रार्थना

ऋग्वेद के प्रथम मंडल में कुछ ऋचाएं हैं जिनमें मधु शब्द का वारंवार प्रयोग हुआ है । आम जन मधु शब्द को सामान्यतः शहद के लिए प्रयोग में लेते हैं । किंतु इन ऋचाओं में उसे व्यापक अर्थ में लिया गया है । मधु का अर्थ है जो मिठास लिए हो, जिससे सुखानुभूति हो, जो आनंदप्रद हो, अथवा जो श्रेयस्कर हो । मैं आगे के अनुच्छेदों में ऐसी तीन ऋचाओं का उल्लेख कर रहा हूं । यहां पर व्यक्त मेरे विचार सायणाचार्यकृत भाष्य पर आधारित हैं ।

ये ऋचाएं ऋग्वेद, मंडल 1, सूक्त 91 से क्रमशः ली गयीं हैं ।

मधु वाता ऋतायते मधुं क्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥6॥
(मधु वाताः ऋत-अयते, मधुं क्षरन्ति सिन्धवः, माध्वीः नः सन्तु ओषधीः ।)
भावार्थ – यज्ञकर्म में लगे हुए, अर्थात् यजमान, को वायुदेव मधु प्रदान करते हैं; तरंगमय जलप्रवाह जिनमें होता है उन नदियों से मधु चूता है; संसार में उपलब्ध विविध ओषधियां हमारे लिए मधुमय हों ।

प्रसंग के अनुसार, तथा जैसा आगे की ऋचाओं से स्पष्ट है, यहां कहे गये ‘प्रदान करते हैं’, ‘चूता है’, का अर्थ प्रदान करें की प्रार्थना से लिया जाना चाहिए । यों तो रूढ़ि अर्थ में यज्ञ का अर्थ है प्रज्वलित अग्नि में हविः की आहुति देना, किंतु अधिक व्यापक अर्थ में यज्ञ का अर्थ है सार्थक कर्म से अपने को जोड़ना, उस कर्म में लगना । जैसा ऊपर कहा गया है, मधु के उपयुक्त अर्थ लिए जाने चाहिए ।

मधु नक्तुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः । मधु द्यौरस्तु नः पिता ॥7॥
(मधु नक्तम् उत उषसः, मधु-मत् पार्थिवम् रजः, मधु द्यौः अस्तु नः पिता ।)
भावार्थ – रात्रि हमारे लिए मधुप्रदाता होवे; और उसी प्रकार उषाकाल, अर्थात् सूर्योदय के पहले का दिवसारंभ का समय, भी मधुप्रद हो; पृथ्वी धारण किया गया यह लोक मधुमय हो; जलवृष्टि द्वारा हमारा पालन करने वाला (पिता) द्युलोक (आकाश) माधुर्य लिए होवे ।

मंतव्य कदाचित् यह है कि रात्रि शांतिप्रदा होवे, हमारे दिन का आरंभ प्रसन्नता के साथ होवे, संसार हमारे लिए आनंदप्रद हो, आकाश जल वर्षा द्वारा सुखद भविष्य की आशा जगाए ।

मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमान् अस्तु सूर्यः । माध्वीर्गावो भवन्तु नः ॥8॥
(मधुमान् नः वनस्पतिः, मधुमान् अस्तु सूर्यः, माध्वीः गावः भवन्तु नः ।)
भावार्थ – वनों के स्वामी (अधिष्ठाता देवता) मधुर फल देने वाले हों; आकाश में विचरण करने वाले सूर्य मधुरता प्रदान करें; हमारी गौवें मधुमय दूध देने वाली हों । (वनस्पति माने वनों का पति या पालनकर्ता; सामान्य बोलचाल में वनस्पति पेड़-पौधों आदि के लिए प्रयोग में लिया जाता है ।)

वनों के स्वामी फल दें अर्थात् वनस्पतियां ऐसी हों कि उन पर मीठे फल लगें । सूर्य आकाश में सरण (सरकना) करता है जिससे उसे यह नाम मिला है । वह अपने द्वारा नियंत्रित ऋतुओं के माध्यम से हमें समुचित फल प्रदान करे यह भाव व्यक्त है । गायें सुस्वादु एवं प्रचुर मात्रा में दूध प्रदान करें ।

दैवी शक्तियों को संबोधित ऐसे वैदिक मंत्र क्या वास्तव में प्रभावी हो सकते हैं । मेरे पास कोई उत्तर नहीं है । इतना अवश्य है जैसे हम परस्पर शुभकामनाएं व्यक्त करते हैं उसी प्रकार इन ऋचाओं में सुखद एवं सफल जीवन की कामना या कल्पना का भाव निहित है । इसके अतिरिक्त प्रकृति के विभिन्न घटकों अथवा अंगों के प्रति सम्मान भाव भी इनमें दिखाई देता है । यह भावना आधुनिक समय में अधिक प्रासंगिक हो चला है । – योगेन्द्र जोशी

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