कौटिलीय अर्थशास्त्र का मत (1) – शासकीय धन का अपहरण राजकर्मियों का स्वभाव है

कौटिल्य सुविख्यात ऐतिहासिक पुरुष चाणक्य का वैकल्पिक नाम हैचाणक्य के बारे में दो-चार परिचयात्मक शब्द पहले कभी मैंने इसी ब्लॉग में लिखे हैं । उनका परिवार-प्रदत्त असली नाम विष्णुदत्त था किंतु चणक के पुत्र होने के नाते वे चाणक्य नाम से ही विख्यात हुए । कुटिल राजनीति में पारंगत होने के कारण उन्हें कौटिल्य नाम से भी संबोधित किया जाता है । एक बात पर विशेष ध्यान देना चाहिए कि चाणक्य की राजनीति उस अर्थ में कुटिल नहीं थी जिस रूप में हमें आजकल देखने को मिल रही है । अपने वैयक्तिक हित साधने में उन्होंने कुटिल मार्ग अपनाया हो ऐसा मैं नहीं मानता । चातुर्यपूर्ण राजनीति का समाज एवं राष्ट्रहित में उन्होंने भरपूर प्रयोग किया और यही औसत आदमी की दृष्टि में कुटिलता थी ।

कौटिलीय अर्थशास्त्र चाणक्य की एक कृति है जिसमें उन्होंने राजकाज की कारगर व्यवस्था कैसी होनी चाहिए इसका वर्णन किया है । राजा ने जनहित में क्या करना चाहिए एवं क्या नहीं इसका उल्लेख किया है । चाणक्य ने ईसा से करीब 320 वर्ष पूर्व चंद्रगुप्त मौर्य का शासन स्थापित किया था । यूनानी शासक सिकंदर उनका समकालीन था । बाद में उसी मौर्य कुल में अशोक महान सम्राट हुए थे । उस काल की व्यवस्था राजा-केंद्रित थी और परिस्थितियां आज से सर्वथा भिन्न थीं । अतः कौटिलीय अर्थशास्त्र की समस्त बातें आज के युग के लिए बहुत अर्थ नहीं रखती हैं । फिर भी उसमें ऐसी बहुत-सी बातें पढ़ने को मिल जाती हैं जो काफी महत्व की हैं । अधोलिखित पाठ में मैंने कौटिल्य के उन वचनों का उल्लेख किया है जो यह स्पष्ट करते हैं कि कैसे शासकीय कार्य के लिए नियत धन राजकर्मियों द्वारा ‘लूटी’ जाती है और उसका पता तक नहीं चल पाता है । तत्संबंधित दो श्लोक आगे दिए गए हैं:

यथा ह्यनास्वादयितुं न शक्यं जिह्वातलस्थं मधु वा विषं वा ।
अर्थस्तथा ह्यर्थचरेण राज्ञः स्वल्पोऽप्यनास्वादयितुं न शक्यः ॥
(कौटिलीय अर्थशास्त्र, प्रकरण 25 – उपयुक्तपरीक्षा)
(यथा हि जिह्वा-तल-स्थं मधु वा विषं वा अन्-आ-स्वादयितुं न शक्यं, तथा हि राज्ञः अर्थ-चरेण स्वल्पः अर्थः अपि अन्-आ-स्वादयितुं न शक्यः ।) (अन्-आ-स्वादयितुं = न आस्वादयितुं)

अर्थः जिस प्रकार जीभ पर पड़ा मधु (शहद या मधुर खाद्य पदार्थ) अथवा विष (घातक या कष्टप्रद अखाद्य) पदार्थ का स्वाद लिये बिना रहना असंभव है, उसी प्रकार का कल्याण-कार्य में नियुक्त कर्मी के लिए योजना हेतु प्रदत्त धन के एक अंश का स्वाद लिए बिना रह पाना मुश्किल है ।

तात्पर्य यह है कि जब किसी अधिकारी को योजना के लिए धन मिलता है तो उसकी लार टपकने लगती है, और वह उसमें से चुंगी निकालकर अपनी जेब में डालने की कोशिश करता है । यह प्रवृत्ति मनुष्य में सदा से ही रही है । खर्च को थोड़ा बढ़ाचढ़ाकर दिखाने और वास्तविक खर्च कुछ कम करके पैसा बटोरने का रास्ता सदा से अपनाया जाता रहा है । दुर्भाग्य से आजकल हालत यह हो चुकी है कि कागज पर कार्य दिखाकर पूरा पैसा हजम करने में भी अब लोगों को लज्जा नहीं आती । देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के हाल सभी के समक्ष है ।

मत्स्या यथान्तःसलिले चरन्तो ज्ञातुं न शक्याः सलिलं पिबन्तः ।
युक्तास्तथा कार्यविधौ नियुक्ता ज्ञातुं न शक्या धनमाददानाः ॥
(यथा पूर्वोक्त)
(यथा अन्तः-सलिले चरन्तः मत्स्याः सलिलं पिबन्तः ज्ञातुं न शक्याः, तथा कार्य-विधौ युक्ताः नियुक्ताः धनम् आददानाः ज्ञातुं न शक्याः ।)

अर्थः जिस प्रकार यह जान पाना संभव नहीं हो पाता है कि कब तालाब के चल में तैरती मछलियां पानी पा रही हैं और बक नहीं, उसी प्रकार राजकीय कार्य में लगाये गए कर्मचारी के बारे में यह पता लगा पाना मुश्किल होता है कि वह कब धन हड़प रहा है ।

शासकीय कार्य का धन शासन द्वारा नियुक्त कर्मचारियों के हाथों में होता है । वे कब किस प्रकार उसे खर्च कर रहे हैं इसका पता सरलता से नहीं लगता है । उनकी हरकतों पर नजर रखने के लिए जांच-पड़ताल वाली संस्थाएं जरूर होती हैं । किंतु वे हर क्षण नजर नहीं रखती हैं । अधिकांशतः सब कुछ कर्मचारियों के विवेक एवं निष्ठा पर टिका रहता है । इसी का लाभ उठाकर वे स्वयं को सोंपे गये धन का अपव्यय कर डालते हैं । इस अपव्यय का पता चलाना और उसे सिद्ध कर पाना कितना पेचीदा होता है यह हम देख ही रहे हैं । – योगेन्द्र जोशी

2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. प्रवीण पाण्डेय
    जुलाई 21, 2012 @ 12:03:31

    निष्ठा तब तो और ज़रूरी

    प्रतिक्रिया

  2. अजय यादव
    अगस्त 09, 2012 @ 08:13:32

    चाणक्य या भगवान श्री कृष्ण की बात कब तक लिखेंगे कुछ अपनी लिखिए ना ….आपने क्या पाया इस जीवन में ….उनकी बातों से तो किताबे भरी पड़ी है ….आप के पास नया क्या है उसे लिखिए .

    प्रतिक्रिया

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