कौटिलीय अर्थशास्त्र का मत (2) – धन के गबन का पता करना असंभव-सा

इस ब्लॉग की पिछली प्रविष्टि में मैंने सरकारी धन के दुरुपयोग के संदर्भ में कौटिल्य (चाणक्य) के विचारों का आंशिक उल्लेख किया था । इस आलेख में उसी सिलसिले में अन्य तीन श्लोकों की मैं चर्चा कर रहा हूं ।

अपि शक्या गतिर्ज्ञातुं पततां खे पतत्त्रिणाम् ।
न तु प्रच्छन्नभावानां युक्तानां चरतां गतिः ॥
(कौटिलीय अर्थशास्त्र, प्रकरण 25 – उपयुक्तपरीक्षा)
(खे पततां पतत्त्रिणाम् गतिः ज्ञातुं अपि शक्या, प्रच्छन्न-भावानां चरतां युक्तानां गतिः तु न ।)

अर्थः आकाश में उड़ते-विचरते पक्षियों की गति को समझना (कि वे किस दिशा में आगे बढ़ेंगे या चक्कर लगाने लगेंगे, आदि) संभव है, किंतु राजकाज में नियुक्त व्यक्ति के मन में (धन लूटने, उसके दुरुपयोग करने, आदि) छिपे भावों को जान पाना संभव नहीं ।

सरकारी धन के दुरुपयोग के बारे किसी शासकीय कर्मी की योजना का पता कोई नहीं कर सकता । दुरुपयोग हो चुकने पर ही पता चलता है कि उसने क्या-क्या हथकंडे अपनाए होंगे ।

आस्रावयेच्चोपचितान् विपर्यस्येच्च कर्मसु ।
यथा न भक्षयन्त्यर्थं भक्षितं निर्वमन्ति वा ॥
(यथा पूर्वोक्त)
(कर्मसु उपचितान् च आस्रावयेत्, विपर्यस्येत् च, यथा अर्थं न भक्षयन्ति, भक्षितं वा निर्वमन्ति ।)

अर्थः (राजा का कर्तव्य है कि गबन करने वाले) राजकार्य में नियुक्त व्यक्तियों की संपदा छीन ले और उन्हें निम्नतर पदों पर अवनत कर दे, ताकि वे राज्य-धन न डकार पावें तथा उदरस्थ किये गये को उगल दें ।

मंतव्य यह है कि भ्रष्ट राज्यकर्मी को दंडित किया जाए । सबसे सार्थक एवं भयोत्पादक दंड यही है उसकी संपदा छीन ली जाए, ताकि उसे लेने के देने पड जाएं । दुर्भाग्य से अपने मौजूदा शासकीय व्यवस्था में आर्थिक अपराधी मुश्किल से ही कभी दंडित होते हैं । दंड के अभाव में उनके हौसले बुलंद रहते हैं ।

न भक्षयन्ति ये त्वर्थान् न्यायतो वर्धयन्ति च ।
नित्याधिकाराः कार्यास्ते राज्ञः प्रियहिते रताः ॥
(यथा पूर्वोक्त)
(ये तु अर्थान् न भक्षयन्ति, न्यायतः वर्धयन्ति च, राज्ञः प्रिय-हिते रताः ते नित्य-अधिकाराः कार्याः ।)

अर्थः जो शासकीय धन नहीं हड़पते बल्कि उचित विधि से उसकी वृद्धि करते हैं, राजा के हित में लगे रहने वाले ऐसे राज्यकर्मियों को अधिकार-संपन्न पदों पर नियुक्त किया जाना चाहिए ।

राज्यकर्मी की नियुक्ति की योग्यता का एक आवश्यक पहलू है उसकी निष्ठा । महज शैक्षिक योग्यता राज्यहित नहीं साधती है । शासन को चाहिए कि वह व्यक्ति की नीयत एवं राज्य के प्रति कर्तव्यशीलता को ध्यान में रखते हुए उसे नियुक्त करे । हमारी व्यवस्था में कागजी योग्यता ही सर्वोपरि समझी जाती है । उसका चारित्रिक आकलन शायद ही कहीं किया जाता है । सर्वत्र व्याप्त आर्थिक भ्रष्टाचार इस बात का प्रमाण है । – योगेन्द्र जोशी

1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. प्रवीण पाण्डेय
    अगस्त 08, 2012 @ 19:37:33

    बहुत ही रोचक, मछली जल में कितना पानी पीती है, पता नहीं चल पाता है..

    प्रतिक्रिया

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