‘लोकः अहितम् आचरति इति चित्रम्’ – मानवजीवन की विडंबनाओं पर भर्तृहरि के वचन

राजा भर्तृहरि एक कवि के रूप में भी विख्यात रहे हैं । उनके विषय में मैंने संक्षेपतः अन्यत्र लिखा है । उनके द्वारा विरचित तीन रचनाएं चर्र्चित रही हैं । वे हैं: नीतिशतक, शृंगारशतक, एवं वैराग्यशतक । ये तीनों मिलकर शतकत्रय के नाम से भी जाने जाते हैं । इनकी विषयवस्तु नाम के अनुरूप ही है । कहते हैं कुछएक अप्रिय अनुभवों के फलस्वरूप वे जीवन से विरक्त हो गये थे । वैराग्यशतक कदाचित् उन्हीं अनुभवों से प्रेरित कृति है । इसमें उन्होंने जीवन की नश्वरता का वर्णन किया है । मैं उनकी रचना के दो श्लोकों का यहां पर उल्लेख कर रहा हूं:

व्याघ्रीव तिष्टति जरा परितर्जयन्ती रोगाश्च शत्रव इव प्रहरन्ति देहम् ।
आयुः परिस्रवति भिन्नघटादिवाम्भो लोकस्तथाप्यहितमाचरतीति चित्रम् ॥
(भर्तहरिविरचित वैराग्यशतक, श्लोक 109)
(व्याघ्री इव तिष्टति जरा परि-तर्जयन्ती, रोगाः च शत्रवः इव प्रहरन्ति देहम्, आयुः परि-स्रवति भिन्न-घटात् इव अम्भः, लोकः तथा-अपि अहितम् आचरति इति चित्रम् ।)

अर्थः मानव जीवन में बुढ़ापा दहाड़ती हुई बाघिन की तरह सामने आ धमकती है । विविध रोग शत्रुओं की भांति शरीर पर प्रहार करते हैं । जैसे दरार पड़े घड़े से पानी रिसता है वैसे ही आयु हाथ से खिसकती रहती है । आश्चर्य होता है इतना सब होते हुए भी लोग अहितकर कर्मों में लिप्त रहते हैं ।

कवि इस बात पर आश्चर्य करता है कि मानव-जीवन वस्तुतः क्षणभंगुर है और मानव देह का क्षरण शनैः-शनैः होता रहता है । हमारे वास कुछ भी सार्थक करने के लिए बहुत समय नहीं होता है । जो सीमित समय मिलता है उसे स्वार्थलिप्सा में बिता देता है, मानो कि वह अजर-अमर हो और संचित धनसंपदा का भोग करता ही रह सकता है । क्यों नहीं कुछ परोपकार या अन्यथा कुछ और समाजहित में करता है ? मनुष्य अपने हितों में ही प्रायः संलग्न रहता है यह बात आज के समय में तो हम देख हर रहे हैं । लगता है कि ऐसा अनादि काल से चला आ रहा है । महाकाव्य महाभारत में वर्णित ‘यक्ष प्रश्न’ इसी तथ्य की ओर संकेत करता है (इसे यहां पढ़ें) ।

सृजति तावदशेषगुणाकरं पुरुषरत्नमलङ्करणं भुवः ।
तदपि तत्क्षणभङ्गि करोति चेदहह कष्टमपण्डितता विधेः ॥
(वैराग्यशतक, श्लोक 110)
(सृजति तावत् अशेष-गुण-आकरम् पुरुष-रत्नम् अलङ्करणं भुवः, तत् अपि तत्-क्षण-भङ्गिः करोति चेत् अहह कष्टम् अपण्डितता विधेः ॥)

अर्थः विधाता प्रथमतः मनुष्य को सभी गुणों की खान एवं धरती के आभूषण रत्न-स्वरूप रचता है, और फिर उसे भी क्षणभंगुर बना देता है । विधाता की इस विस्मयकारी मूर्खता को कष्ट से ही देखना होता है ।

ऐसी मान्यता है कि मानव की रचना ही विधाता की सर्वश्रेष्ठ कृति है । उसे बुद्धि और विवेक प्राप्त है, भले ही वह बुद्धि के प्रयोग तक सीमित रहकर स्वार्थसिद्धि में लगा रहता है और विवेक से उचितानुचित का निर्णय नहीं करता है । ऐसे मनुष्य को तरह-तरह के विकारों से ग्रस्त करते हुए विधाता अंत में काल के गाल में भेज देता है । ऐसा क्रूर मजाक अपनी ही उत्कृष्ट कृति के साथ क्यों करता है वह इस बात पर कवि आश्चर्य व्यक्त करता है ।

जो ईश्वर में विश्वास करते हैं उनके लिए यह गंभीर प्रश्न है । उन्हें समय निकाल कर कभी इस पर मनन करना चाहिए कि उनके क्रियाकलाप क्या उनके विश्वास के अनुरूप रहते हैं । (हर कोई ईश्वर में विश्वास नहीं करता है !) – योगेन्द्र जोशी

1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. प्रवीण पाण्डेय
    सितम्बर 24, 2012 @ 19:10:09

    सच है, सबसे बड़ा अचम्भा है यह..

    प्रतिक्रिया

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