महाभारत महाकाव्यः वृक्षरोपण एवं जलाशय विषयक नीतिवचन (2)

इस चिठ्ठे की पिछली प्रविष्टि (16 अक्टूबर) में मैंने इस बात की चर्चा की थी कि महाभारत महाकाव्य के एक प्रकरण में भीष्म पितामह द्वारा महाराज युधिष्ठिर को वृक्षों एवं जलाशयों की महत्ता के उपदेश का वर्णन किया गया है । उसी विषय पर उपलब्ध अगले दो श्लोकों को यहां उद्धृत किया जा रहा है:

पुष्पैः सुरगणान् वृक्षाः फलैश्चापि तथा पितॄन् ।
छायया चातिथिं तात पूजयन्ति महीरुहः ॥
(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 58, श्लोक 28)
(पुष्पैः सुर-गणान् वृक्षाः फलैः च अपि तथा पितॄन्, छायया च अतिथिं तात पूजयन्ति महीरुहः ।)

अर्थ – हे मेरे तात युधिष्ठिर, वृक्षवृंद अपने फूलों से देवताओं को और उसी प्रकार फलों से पितरों की पूजा करते हैं । इसके अलावा ये वृक्ष अपनी छाया द्वारा अतिथि जनों के प्रति सम्मान दर्शाते हैं ।

तात्पर्य यह है कि पेड़ों से प्राप्त फल-फूलों के माध्यम से ही देवों-पितरों की पूजा-अर्चना की जाती है । थके-मांदे अतिथि (पथिक) को इनसे विश्राम हेतु छाया प्राप्त होती है । इसलिए इनकी महत्ता सर्वस्वीकार्य है ।

किन्नरोरगरक्षांसि देवगन्दर्भमानवाः ।
तथा ऋषिगणाश्चैव संश्रयन्ति महीरुहान् ॥
(पूर्वोक्त, श्लोक 29)
(किन्नर-उरग-रक्षांसि देव-गन्दर्भ-मानवाः, तथा ऋषि-गणाः च एव महीरुहान् संश्रयन्ति ।)

अर्थ – किन्नर, उरग, राक्षस, देवता, मनुष्य और ऋषियों के समूह वृक्षों का आश्रय स्वीकारते है ।

मैं इस श्लोक का अर्थ ठीक से नहीं समझ सका हूं । यहां उल्लिखित किन्नर आदि के वास्तव में क्या तात्पर्य हैं ? उरग शब्द सामान्यतः सरीसृप प्रजाति के जीवधारियों के लिए प्रयुक्त होता है । यों किन्नर का शाब्दिक अर्थ है विकृत पुरुष – पुरुष जिसमें मानसिक अथवा शारीरिक तौर पर विकार हो । आजकल यौनांगों की विकृति वालों को किन्नर पुकारा जाता है । पौराणिक कथाओं से ऐसा प्रतीत होता है कि किन्नर मानवशरीरधारी जीव थे । मैं मानता हूं कि वे मानवों की एक जाति थी जो स्वयं को सभ्य कहने वाले आर्यों के क्षेत्र से दूर अलग प्रकार की जीवन शैली वाले लोग थे । कुछ ऐसी ही बात राक्षसों के लिए लागू होती है, जो मानवशरीरधारी उग्र स्वभाव वाले, उत्पाती, एवं आर्यों की नजर में ‘असभ्य’ रहे होंगे । देवताओं को उच्च क्षमताओं के पूज्य ‘प्राणी’ समझा जाता था । नृत्य गायन आदि में पारंगत जाति गंदर्भ कही जाती थी । मेरा मानना है कि ये सब वस्तुतः मनुष्यों की अलग-अलग जातियां रही होंगी । ऐसा इसलिए कि पुराणों में जैविक दृष्टि से सभी समान थे । उनके परस्पर दैहिक संसर्ग, वैवाहिक संबंधों की कथाएं पढ़ने को मिलती हैं । उरग भी एक जाति रही होगी । अगर उरग सामान्य अजगर-सांप आदि को इंगित करता होता, तो पशु शब्द का प्रयोग अधिक सार्थक होता । किन्नर, गंदर्भ आदि के साथ पशु अर्थ में उरग शामिल करना अटपटा लगता है । यों भी पुराणों में नागकन्याओं के साथ विवाह आदि की कथाएं प्रचलित हैं । इस प्रकार ये सभी शब्द मानवों की विविध जातियों को व्यक्त करते होंगे ऐसा मेरा सोचना है । श्लोक के अनुसार ये सभी पेड़.-पौधों पर अलग-अलग प्रकार से निर्भर करते हैं । – योगेन्द्र जोशी

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