ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः … – तैत्तिरीय उपनिषद् की प्रार्थना

तैत्तिरीय उपनिषद् 11 प्रमुख उपनिषदों (ईश, ऐतरेय, कठ, केन, छान्दोग्य, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक, माण्डूक्य, मुण्डक, प्रश्न, श्वेताश्वर) में से एक है । यों उपनिषदों की कुल संख्या इससे कहीं अधिक बताई जाती है । गीता प्रेस, गोरखपुर, के एक उपनिषद् विशेषांक में 54 उपनिषदों का उल्लेख है । किंतु पूर्वोक्त उपनिषदों को छोड़ अन्य चर्चा में कम ही सुनाई देते हैं । हर उपनिषद् का आरंभ ‘शान्तिपाठ’ से होता है, जो वस्तुतः एक प्रकार की प्रार्थना है । ये प्रार्थनाएं उन दैवी शक्तियों को संबोधित रहती हैं जिन्हें आस्थावान् लोग सृष्टि के विविध घटकों से जोड़कर देखते आए हैं । वैदिक मान्यता है कि निर्जीव-सी दिखने वाली हर वस्तु के पीछे एक अधिष्ठाता देवता रहता है । उस देवता से कल्याण की प्रार्थना शान्तिपाठ में निहित रहती है ।

तैत्तिरीय उपनिषद् तीन अध्यायों में बंटा है जिनको ‘वल्ली’नाम दिया गया है; ये हैं शिक्षावल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली, एवं भृगुवल्ली । प्रत्येक वल्ली में दिये गये वचन ‘अनुवाक’कहे जाते हैं । इस उपनिषद् का अध्ययन जिस शान्तिपाठ अथवा प्रार्थना से होता है वह अपेक्षया अचर्चित कौषितकीब्राह्मणोपनिषद् तथा मुद्गलोपनिषद् में भी शामिल है । यह प्रार्थना निम्नलिखित है:

ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं नो इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं बह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम । अवतु वक्तारम् ।

ॐ शान्तिः । शान्तिः । शान्तिः ।   

 (ॐ शं नः मित्रः शं वरुणः । शं नः भवतु अर्यमा । शं नः इन्द्रः बृहस्पतिः । शं नः विष्णुः उरुक्रमः । नमः ब्रह्मणे । नमः ते वायो । त्वम् एव प्रत्यक्षं बह्म असि । त्वाम् एव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तत् माम् अवतु । तत् वक्तारम् अवतु । अवतु माम । अवतु वक्तारम् । ॐ शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः ।)  

अर्थ – देवता ‘मित्र’ हमारे लिए कल्याणकारी हों, वरुण कल्याणकारी हों । ‘अर्यमा’हमारा कल्याण करें । हमारे लिए इन्द्र एवं बृहस्पति कल्याणप्रद हों । ‘उरुक्रम’ (विशाल डगों वाले) विष्णु हमारे प्रति कल्याणप्रद हों । ब्रह्म को नमन है । वायुदेव तुम्हें नमस्कार है । तुम ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हो । अतः तुम्हें ही प्रत्यक्ष तौर पर ब्रह्म कहूंगा । ऋत बोलूंगा । सत्य बोलूंगा । वह ब्रह्म मेरी रक्षा करें । वह वक्ता आचार्य की रक्षा करें । रक्षा करें मेरी । रक्षा करें वक्ता आचार्य की । त्रिविध ताप की शांति हो ।

मैं इस प्रार्थना में प्रयुक्त कई संबोधनों/शब्दों के अर्थ समझ नहीं पाया हूं । जैसा पहले कहा गया है, प्रकृति के विविध घटकों और प्राणियों की जैविक प्रक्रियाओं के साथ देवताओं को अधिष्ठाता के तौर पर जोड़ा गया है । ‘मित्र प्राणवायु एवं दिन का अधिष्ठाता देवता है, जब कि वरुण रात्रि एवं अपानवायु का अधिष्ठाता है । सामान्यतः मित्र  के अर्थ सूर्य से लिया जाता है और वरुण को समुद्र तथा जल से जोड़ा जाता है । अर्यमा सूर्यमंडल का देवता है । शब्दकोष में सूर्य को अर्यमा भी कहा गया है । इंद्र वर्षा एवं बृहस्पति बुद्धि के देवता माने गये हैं । (संस्कत में ‘मित्र’शब्द पृल्लिंग में सूर्य, और नपुंसकलिंग में यार-दोस्त-सुहृद् को व्यक्त करता है ।)

विष्णु को पैरों का देवता, अर्थतः गति का देवता, माना गया है । उरुक्रम का शाब्दिक अर्थ है विशाल डगों वाला । कदाचित् इसका संबंध पौराणिक कथाओं में वर्णित वामनावतार में विष्णु द्वारा तीन लोकों को तीन चरणों में नापे जाने से है ।

वैदिक चिंतक शरीर में उपस्थित पांच वायुओं की बात करते हैं । ये हैं: प्राण, अपान, समान, व्यान एवं उदान प्राणवायु का स्थान फेफड़े हैं । शरीर में इसका आवागमन मुख/नासिका के माध्यम से होता है तथा यह जीवन का आधार है । इसके विपरीत अपान मलद्वार से निष्कासित होने वाली वायु है । नाभिक्षेत्र में स्थित पाचन क्रिया में सम्मिलित प्राणशक्ति को समान कहा जाता है । व्यान वह प्राणशक्ति है जो समस्त शरीर में व्याप्त रहती है । इसे कदाचित् रक्त द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंचने वाले पोषक तत्वों के प्रवाह से जोड़ा जा सकता है । और अंत में उदान मस्तिष्क की क्रियाओं को संचालित करने वाली प्राणशक्ति है । वास्तव में ये प्राणशक्तियां क्या हैं मैं समझ नहीं सका हूं ।

इस प्रार्थना में यह तथ्य निहित है कि वह परम ब्रह्म स्वयं को अलग-अलग स्वरूपों में प्रस्तुत करता है । उस ब्रह्म को प्रणाम किया जा रहा है । वायु प्रत्यक्ष और सर्वप्रथम अनुभव की जाने वाली वस्तु है । अतः वायु को ब्रह्म का प्रत्यक्षतः अनुभव में आने वाला देवता कहकर उसी को ब्रह्म कहने की बात कही गयी है ।

ऋत सत्य का ही पर्याय है । यहां पर ऋत वचन उचित एवं निष्ठापरक कथन को व्यक्त करता है । वस्तुनिष्ठ स्तर पर कोई चीज जैसी हो वैसी कहना सत्य कहा गया है ।

इस शान्तिपाठ में शिष्य ब्रह्म से अपनी एवं अपने आचार्य यानी उपदेष्टा वक्ता की रक्षा की प्रार्थना करता है ।

और अंत में तीन बार ‘शान्तिः’ का उच्चारण त्रिविध तापों का कष्टों के शमन हेतु किया गया है । ये ताप हैं: आधिभौतिक, आधिदैविक, एवं आध्यात्मिक – (क्रमशः सांसारिक वस्तुओं/जीवों से प्राप्त कष्ट, दैवी शक्तियों द्वारा दिया गया या पूर्व में स्वयं के किए गये कर्मों से प्राप्त कष्ट, और अध्यात्मिक अज्ञानजनित कष्ट ।) – योगेन्द्र जोशी

1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. Sandeep Bhalla
    मार्च 28, 2013 @ 17:47:22

    Joshiji, it appears that by naming all the phenomena of nature as Gods, the Anticiant Hindu Scriptures were following what the west has started to call ‘Regious Naturalism’? With such deep study of Vedas, you are the most fit person to say so or to deny it. Please study and assimilate this idea in your writing, if possible.

    प्रतिक्रिया

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