दया मैत्री च भूतेषु … – ययाति का पुत्र पुरु को उपदेश (3)

महाकाव्य महाभारत के एक प्रकरण का उल्लेख करते हुए मैंने विगत दो ब्लॉग प्रविष्टियों, क्रमशः दिनांक ९ जुलाई एवं ५ अगस्त,  तथा में महाराज ययाति का अपने ज्येष्ठ पुत्र पुरु को दिए गए उपदेशों की चर्चा की थी । उन्हीं उपदेशों की शृंखला के तीन अतिरिक्त श्लोक मैं यहां पर प्रस्तुत कर रहा हूं:

वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति यैराहतः शोचन्ति रात्र्यहानि ।

परस्य नामर्मसु ते पतन्ति तान् पण्डितो नावसृजेत परेषु ॥

(महाभारत, आदिपर्व, अध्याय , श्लोक 11)

(वदनात् वाक्-सायकाः निष्पतन्ति यैः आहतः रात्रि-अहानि शोचन्ति, ते परस्य अमर्मसु न पतन्ति, पण्डितः तान् परेषु न अवसृजेत ।)

अर्थ – कठोर वचन रूपी बाण (दुर्जन) लोगों के मुख से निकलते ही हैं, और उनसे आहत होकर अन्य जन रातदिन शोक एवं चिंता  के घिर जाते हैं । स्मरण रहे कि ये वाग्वाण दूसरे के अमर्म यानी संवेदनाशून्य अंग पर नहीं गिरते, अतः समझदार व्यक्ति ऐसे वचन दूसरों के प्रति न बोले ।

दूसरे के अमर्म पर नहीं गिरते कहना आलंकारिक कथन है; तात्पर्य है कि मर्म अथवा हृदय पर ही वे आघात करते न कि अन्यत्र । दूसरों के कटु वचन किसी को कितना आहत करेंगे यह उस व्यक्ति की संवेदनशीलता पर निर्भर करता है । बहुत से लोग सब कुछ पचा जाते हैं । लेकिन संसार में भावुक प्रकृति के ऐसे लोग भी होते हैं जो दूसरे के कटु वचन से परेशान हो जाते हैं और अपनी रातों की नींद भी खो बैठते हैं । ऐसे ही लोगों के प्रति सतर्क रहने की सलाह इस श्लोक में दी गई है ।

न हीदृशं संवननं त्रिषु लोकेषु वर्तते ।

दया मैत्री च भूतेषु दानं च मधुरा च वाक ॥

(पूर्वोक्त, श्लोक 12)

(त्रिषु लोकेषु ईदृशं संवननम् न हि वर्तते, भूतेषु दया मैत्री च दानम् च मधुरा च वाक ।)

अर्थ – प्राणियों के प्रति दया, सौहार्द्र, दानकर्म, एवं मधुर वाणी के व्यवहार के जैसा कोई वशीकरण का साधन तीनों लोकों में नहीं है ।

मेरी समझ में इस स्थल पर वशीकरण का तात्पर्य कदाचित् दूसरे को अपने पक्ष में करना है किसी प्रकार के दबाव बिना, महज अपने सद्व्यवहार से । ऐसा बरताव दूसरे के प्रति करना चाहिए कि वे स्वयं ही आपके प्रति सम्मानभाव रखने लगें । तीन लोक होते हैं अथवा नहीं इसका भी महत्व नहीं है । संकेत इस बात के प्रति है कि सर्वत्र ही व्यक्ति का व्यवहार दूसरों को प्रभावित करता है ।

आज के युग में ये बातें किस हद तक मान्य हो सकती हैं इस पर मुझे शंका है । मुझे तो यह अनुभव होने लगा है कि समाज में अयोग्य व्यक्ति पूजे जा रहे है और योग्य व्यक्ति तिरस्कृत हो रहे हैं । कदाचारियों की संख्या दिनबदिन बढ़ रही है ।

तस्मात्सान्त्वं सदा वाच्यं न वाच्यं परुषं क्वचित् ।

पूज्यान् सम्पूजयेद्दद्यान्न च याचेत् कदाचन ॥

(पूर्वोक्त, श्लोक 13)

(तस्मात् सदा सान्त्वम् वाच्यं परुषम् न क्वचित् वाच्यम्, पूज्यान् सम्पूजयेद् दद्यात् कदाचन न च याचेत् ।)

अर्थ – अतः सदा ही दूसरों से सान्त्वनाप्रद शब्द बोले, कभी भी कठोर वचन न कहे । पूजनीय व्यक्तियों के सम्मान व्यक्त करे । दूसरों यथासंभव दे और स्वयं किसी से मांगे नहीं ।

ये पुरु को संबोधित ययाति के उपदेशों के अंतिम शब्द हैं, जिनमें सबके प्रति सद्व्यवहार की, अपनी तुलना में पूज्य जनों का समादर करने की, दूसरों को दान देने की, और उनसे कुछ पाने की लालसा न रखने की सलाह अभिव्यक्त है । – योगेन्द्र जोशी

1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. प्रवीण पाण्डेय
    अगस्त 14, 2013 @ 21:48:34

    सुन्दर वचन..प्रेरक।

    प्रतिक्रिया

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: