मनुस्मृति के अनुसार विवाह के आठ प्रकार – ब्राह्म, दैव, आर्ष आदि (1)

‘मनुस्मृति’ हिंदुओं का एक चर्चित  धर्मग्रंथ है । किंतु यह पर्याप्त विवादास्पद भी है, क्योंकि कई हिंदू इसमें लिखी बातों से सहमत नहीं होते, अपितु उनकी आलोचना ही करते हैं । मेरे मत में उसकी सभी बातें अस्वीकार्य ही हों ऐसा नहीं है जैसा कि इस ब्लॉग की पूर्ववर्ती एक पोस्ट से स्पष्ट होता है । उस में बहुत-सी बातों को तत्कालीन सामाजिक मान्यताओं का प्रतिबिंबन कहा जा सकता है । ग्रंथ में मुझे उस समय प्रचलित विवाह विधियों के प्रकार – धर्मवेत्ता ऋषि मनु के अनुसार आठ प्रकार – का विवरण पढ़ने को मिला हैं । उन्हीं को मैं आगे प्रस्तुत कर रहा हूं ।

इस संदंर्भ में मनुस्मृति का पहला श्लोक अधोलिखित है:

ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथाऽऽसुरः ।

गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥21॥

(मनुस्मृति, अध्याय तीन)

(ब्राह्मः दैवः तथा एव आर्षः प्राजापत्यः तथा आसुरः गान्धर्वः राक्षसः च एव अष्टमः च अधमः पैशाचः ।)

अर्थ – विवाह आठ प्रकार के होते हैं जो क्रमशः ये हैं: ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस, और आठवां निकृष्टतम श्रेणी का पैशाच ।)

इनमें से पहला, ब्राह्म, इस तरह परिभाषित किया गया है:

आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतिशीलवते स्वयम् ।

आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्मः प्रकीर्तितः ॥27॥

(यथा पूर्वोक्त)

(स्वयम् आहूय आच्छाद्य च अर्चयित्वा च श्रुतिशीलवते कन्यायाः दानम् धर्मः ब्राह्मः प्रकीर्तितः ।)

अर्थ – वेदों-शास्त्रों का अध्ययन जिसने किया हो ऐसे वर को स्वयमेव आमंत्रित करके, उसे वस्त्र-आभूषण आदि अर्पित करके, और समुचित रूप से पूजते हुए कन्या का सोंपा जााना धर्मयुक्त  ‘ब्राह्म ’विवाह कहलाता है ।

आजकल वेदों-शास्त्रों के अध्येता तो न ढूढ़ा जाता है और न ही कोई मिलता है । कहीं यदि मिले तो अपवाद ही कहा जाएगा । इसलिए सही अर्थों में ब्राह्म विवाह अब कहीं देखने को नहीं मिलता है । अधिकांश मौकों पर आज भी सुशिक्षित वर खोजा जाता है जो बारात लेकर कन्यापक्ष के पास पहुंचता है । वेदमंत्रों के उच्चारण के साथ कन्यादान किया जाता है । उसे वस्त्रादि भी भेंट किये जाते हैं । उक्त विवरण में पूजने का अर्थ उसके स्थानीय परंपराओं के अनुरूप स्वागत-सत्कार से लिया जाना चाहिए । इस प्रकार संपन्न विवाह को ब्राह्म विवाह के निकट माना जा सकता है ।

यज्ञे तु वितते सम्यगृत्विजे कर्म कुर्वते ।

अलङ्कृत्य सुतादानं दैवं धर्मं प्रचक्षते ॥28॥

(यथा पूर्वोक्त)

(यज्ञे तु सम्यक् वितते कर्म कुर्वते ऋत्विजे अलङ्कृत्य सुता-दानम् धर्मं दैवम् प्रचक्षते ।)

अर्थ – यज्ञ-कर्म चल रहा हो तो उसमें वेदमंत्रों के उच्चारण का कार्य कर रहे ऋत्विज को वर रूप में चुनते हुए और उसे आभूषण आदि से सुसज्जित करते हुए कन्या समर्पित करना  ‘दैव’ विवाह कहलाता है ।

प्राचीन काल में यज्ञकर्म आम प्रचलन में थे, जिसमें वेदज्ञ पंडितवृंद भाग लेते थे । यज्ञ करना-करवाना ब्राह्मणों के कर्म होते थे । वैदिक मंत्रों के साथ उसे संपादित करने वाले ऋत्विज कहलाते थे । उस काल में वर के तौर पर वे सुयोग्य समझे जाते होंगे । कन्या की अपेक्षा रखने वाला व्यक्ति ऐसे अवसरों पर वर के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करते होंगे । वर की खोज कर रहे माता-पिता ऐसे वरों को कन्यादान करके अपनी पुत्रियों का विवाह संपन्न करते होंगे । दैव विवाह ब्राह्म विवाह से मिलता-जुलता माना जा सकता है, क्योंकि इसमें भी वेदों-शास्त्रों के अध्येता वर को चुना जाता है । शेष कार्य वैसा ही रहता होगा ।

आर्ष आदि अन्य प्रकार के विवाहों की चर्चा अगली पोस्ट में । – योगेन्द्र जोशी