मनुस्मृति के अनुसार विवाह के आठ प्रकार – ब्राह्म, दैव, आर्ष आदि (2)

अपनी पिछली पोस्ट (14 जनवरी) में मैंने इस बात का उल्लेख किया था कि धार्मिक कर्मकांडों एवं सामाजिक दायित्वों से संबंधित हिंदू ग्रंथ, मनुस्मृति, में आठ प्रकार के विवाहों का जिक्र है: ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस, और पैशाच । इनमें से ब्राह्म तथा दैव के बारे में उक्त पोस्ट में ही संक्षिप्त टिप्पणी की गई थी । यहां अगले तीन प्रकारों, आर्ष, प्राजापत्य एवं आसुर, को परिभाषित किया जा रहा है:

एकं गोमिथुनं द्वे वा वरादादाय धर्मतः ।

कन्याप्रदानं विधिवदार्षो धर्मः सः उच्यते ॥29॥

(मनुस्मृति, अध्याय तीन)

(एकम् गोमिथुनम् द्वे वा वरात् आदाय धर्मतः विधिवत् कन्या-प्रदानम् सः धर्मः आर्षः उच्यते ।)

अर्थ – गाय-बैल के एक जोड़े को अथवा दो गायों या बैलों को धार्मिक कृत्य के लिए वर से स्वीकारते हुए समुचित विधि से किए गए कन्यादान को धर्मयुक्त ‘आर्ष’ विवाह कहा जाता है ।

ब्राह्म तथा दैव विवाह में वर को पूजते हुए आभूषण आदि भेंट किये जाते हैं, किंतु उसके विपरीत आर्ष में कन्यापक्ष वर से भेंट-स्वरूप गाय-बैल ग्रहण करता है । हां, उसका पर्याप्त सम्मान करते हुए कन्या प्रदान की जाती है । यहां कहे गये ‘धार्मिक कृत्य के लिए’ शब्दों का अर्थ स्पष्ट नहीं है, अंदाजा ही लगाया जा सकता है । ‘समुचित विधि’ के अर्थ कदाचित यह होंगे कि परंपराओं के अनुरूप पूजा-पाठ संपन्न करते हुए वर को सम्मानित किया जाए । कदाचित उसे भेंट भी दी जाती हो । प्राचीन काल में भारतीय समाज कृषि पर आधारित था, जिसमें गाय-बैलों की निर्विवाद उपयोगिता होती थी । वर्तमान काल में गाय-बैलों की वैसी उपयोगिता रह नहीं गई है । अतः ठीक-ठीक इस रूप में आर्ष विवाह देखने को नहीं मिल सकता है । वर पक्ष से धन या अन्य वस्तुएं स्वीकारते हुए कन्या अर्पित करने की प्रथा कहीं-कहीं प्रचलित है । उसको आधुनिक आर्ष विवाह कहा जा सकता है ।

प्राजापत्य विवाह के बारे में मनुस्मृति में यह श्लोक उपलब्ध हैः

सहोभौ चरतां धर्ममिति वाचाऽनुभाष्य च ।

कन्याप्रदानमभ्यर्च्य प्राजापत्यो विधि स्मृतः ॥30॥

(यथा पूर्वोक्त)

(सह उभौ धर्मम् चरताम् इति वाचा अनुभाष्य अभि-अर्च्य च कन्या-प्रदानम् प्राजापत्यः विधिः स्मृतः ।)

अर्थ – विवाहोत्सुक स्त्री-पुरुष को वर-कन्या के रूप में स्वीकार कर “तुम दोनों मिलकर साथ-साथ धर्माचरण करो” यह कहते हुए और उनका समुचित रूप से स्वागत-सत्कार करते हुए वर को कन्या प्रदान करना ‘प्राजापत्य’ विवाह कहलाता है ।

आजकल कई युवक-युवतियां स्वयं ही वैवाहिक जीवन हेतु  एक-दूसरे का चुनाव कर लेते हैं, और उस निर्णय को अपने-अपने माता-पिता के समक्ष रखकर उनकी सहमति पाने की हर संभव कोशिश करते हैं । माता-पिता इच्छया अनिच्छया वा विवाह का शेष कार्य परंपरानुरूप संपन्न कर देते हैं, यथासंभव स्वागत-सत्कार एवं उपहार भेंट करते हुए । ऐसे विवाह को आधुनिक काल का  प्राजापत्य विवाह माना जा सकता है ।

ज्ञातिभ्यो द्रविणं दत्त्वा कन्यायै चैव शक्तितः ।

कन्याप्रदानं स्वाच्छन्द्यादासुरो धर्म उच्यते ॥31॥

(यथा पूर्वोक्त)

(ज्ञातिभ्यो कन्यायै च शक्तितः द्रविणम् दत्त्वा एव कन्याप्रदानं स्वाच्छन्द्यात् आसुरः धर्मः उच्यते ।)

अर्थ – कन्यापक्ष के बंधु-बांधवों और स्वयं कन्या को वरपक्ष द्वारा स्वेच्छया एवं अपनी सामर्थ्य के अनुसार धन दिए जाने के बाद किये जाने वाले कन्यादान को धर्मसम्मत ‘आसुर’ विवाह कहा जाता है ।

आसुर विवाह एक अर्थ में दैव विवाह का उल्टा माना जा सकता है । दैव विवाह में परपक्ष को धन-आभूषण दिये जाते हैं, उसके विपरीत आसुर विवाह में वरपक्ष कन्यापक्ष को धन आदि देता है । समाज के कुछ तबकों में कदाचित आज भी ऐसे अल्पप्रचलित विवाह देखने को मिलते हैं । इसे भी धर्मसम्मत विवाह ही समझा जाता है ।

विवाह-प्रकारों की इस चर्चा में अंतिम तीन – गान्धर्व, राक्षस, और पैशाच – की चर्चा आगामी पोस्ट में की जाएगी । – योगेन्द्र जोशी