मनुस्मृति में वर्णित पंचपाप एवं पंचमहायज्ञ (१)

प्रचीन भारतीय दर्शन में पाप एवं पुण्य को बहुत महत्त्व दिया गया है । इन्हें क्रमशः नर्क तथा स्वर्ग लोकों का मार्ग बताया गया है । सत्कमों को पुण्यदायक एवं कदाचारण-दुराचरण को पापों का जनक माना जाता रहा है । भारतभूमि में प्रचलित सभी धर्म पापकर्मों से बचने की शिक्षा देते हैं ताकि मनुष्य को मरणोपरांत नर्कलोक की यातना न भुगतना पड़े । भारतीय दार्शनिक चिंतन में मनुष्य मात्र देही नहीं होता है । देह तो उसके भीतर निवासस्थ आत्मा द्वारा धारण किया हुआ भौतिक कलेवर होता है । मान्यतानुसार आत्मा कभी मरती नहीं बल्कि इस भूलोक के अलावा स्वर्ग-नर्क आदि लोकों का अपने कर्मों के अनुसार भोग करती है । यद्यपि बौद्ध तथा जैन धर्म में आत्मा संबंधी मान्यताएं किंचित भिन्न हैं, तथापि पाप-पुण्य की महत्ता वहां कम नहीं है ।

कहने का तात्पर्य है कि अपने देश में पाप से बचने की बातें आम जीवन में प्रायः होती रहती हैं । किंतु यह भी सच है कि जीवन-यापन हेतु किए जाने वाले दैनिक कर्मों के दौरान जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे, मनुष्य पाप कर बैठता है, या उससे पापकर्म होते रहते हैं । मनुस्मृति में उन कर्मों का जिक्र मिलता है जिन्हें जीवन-धारण हेतु प्रायः प्रतिदिन किया जाता है और जो मनुष्य को पाप का भागी बनाते हैं । आज के प्रौद्योगिकी आधारित जीवन में वे कर्म बेमानी कहे जा सकते हैं, फिर भी कुछ लोगों के दैनिक जीवन का वे आज भी हिस्सा होते हैं । अस्तु्, उक्त स्मृति में पंचपाप संबंधी ये श्लोक देखने को मिलता है:

पञ्च सूना गृहस्थस्य चुल्ली पेषण्युपस्करः ।

कण्डनी चोदकुम्भश्च बध्यते यास्तु वाहयन् ।।

(मनुस्मृति 3, 68)

(चुल्ली पेषणी उपस्करः कण्डनी च उदकुम्भः च गृहस्थस्य पञ्च सूनाः याः तु वाहयन् बध्यते ।)

          अर्थ –  चुल्ली (चूल्हा), चक्की, झाड़ू-पोछे के साधन, सिलबट्टा तथा पानी का घड़ा, ये पांच पाप के कारण हैं जिनका व्यवहार करते हुए मनुष्य पापों से बधता है ।

अर्थात् चूल्हा-चक्की, झाड़ू-पोंछा आदि का प्रयोग करते समय कुछ न कुछ पापकर्म हो ही जाता है, जैसे घुन-कीड़े जैसे जीवों की हत्या हो ही जाती है । भारतीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार किसी भी प्राणी की हिंसा नहीं करनी चाहिए । लेकिन जीवन-धारण के कार्य में ऐसे पापों से बचना संभव नहीं है । मनुस्मृति में इनके दोषों के निवारण का भी मार्ग बतलाया हैः

 

तासां क्रमेण सर्वासां निष्कृत्यर्थं महर्षिभिः ।

पञ्च क्लृप्ता महायज्ञाः प्रत्यहं गृहमेधिनाम् ।।

(मनुस्मृति 3, 69)

(तासां सर्वासां क्रमेण निष्कृति-अर्थं महर्षिभिः गृह-मेधिनाम् प्रति अहं पञ्च महा-यज्ञाः क्लृप्ता ।)

          अर्थ – इन सबसे क्रमानुसार निवृत्ति हेतु महर्षियों ने गृहस्थाश्रमियों के लिए प्रतिदिन पांच महायज्ञों का विधान सुझाया है ।

मनुस्मृति के अनुसार किसी पापकर्म के दोष से मुक्त होने के लिए हमें उसके बदले समुचित सत्कर्म करने चाहिए । अर्थात पुण्यकार्य करके हम पापकर्मजनित हानि की भरपाई कर सकते हैं । दानपुण्य, देवोपासना, सदुपदेश, मनुष्यों तथा अन्य प्राणियों का हितसाधन आदि कर्म इस श्रेणी में आते हैं । ऐसा करना एक प्रकार का प्रायश्चित्त करना है । प्रायः सभी धर्मों में प्रायश्चित्त की बातें कही जाती हैं । जिन महायज्ञों का उल्लेख मनुस्मृति में मिलता है वे हैं ब्रह्मयज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ एवं नृयज्ञ । इनकी चर्चा किंचित विस्तार से अगली बलॉग-प्रविष्टि में की जाएगी ।

चुल्हा-चौकी जैसे कार्य आज के मशीनी युग में कुछ हद तक बेमानी हो चुके हैं । मैं इन्हें प्रतीकात्मक मानता हूं । तदनुसार रोजमर्रा के जीवन में उठने-बैठने, खाने-पीने, चलने-फिरने आदि जैसे कार्य करते समय जाने-अनजाने व्यक्ति को पाप का दोष लगता रहता है । भले ही मशीनों का प्रयोग हो रहा हो, वे व्यक्ति पाप के परोक्षतः भागी होंगे ही जिनके हेतु मशीनें कार्यरत हों । उन दोषों के निवारण के लिए सत्कर्मों को दरशाने वाले कर्म उसे करना चाहिए यही मंतव्य उक्त कथनों का निहितार्थ होना चाहिए ऐसा मेरा मानना है । – योगेन्द्र जोशी

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