मनुस्मृति में वर्णित पंचपाप एवं पंचमहायज्ञ (भाग – 2)

अपनी पिछली ब्लाग-प्रविष्टि में मैंने पंचपापों की चर्चा की थी । मेरी उस चर्चा का आधार मनुस्मृति था । उक्त स्मृति के अनुसार मनुष्य अपने दैनिक जीवन में तरह-तरह के छोटे-मोटे पापकर्म करता रहता है । मनुस्मृति का मत है कि जीवनधारण के लिए चूल्हा-चक्की जैसे आवश्यक कार्यों को संपन्न करते समय मनुष्य प्राणिहिंसा या तद्सदृश अन्य कर्मों से नहीं बच पाता है । इन सबमें लगा व्यक्ति पापों का भागीदार बन जाता है । प्रौद्योगिकी-प्रधान आधुनिक युग में लोगों की दैनिक चर्या प्राचीन काल की जैसी नहीं रही । फिर भी चलते-फिरते या मशीनों के प्रयोग में वह कुछ न कुछ अनिष्टप्रद कर ही बैठता है । मनुस्मृति कहती है कि उनसे जुड़े पापों के दोषों की भरपाई वह सत्कर्मों के संपादन से कर सकता है । स्मृतिकार ने इन सत्कर्मों को पंच महायज्ञ कहा है । उक्त स्मृति के अधोलिखित श्लोकों में इनका विवरण यों उपलब्ध है:

अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम् ।

होमो दैवो बलिर्भौतो नृयज्ञो‍ऽतिथिपूजनम् ।।

(मनुस्मृति, 3, 70)

(अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः, तर्पणम् तु पितृयज्ञः, होमः दैवः, बलिः भौतः, अतिथि-पूजनम् नृयज्ञः ।)

अर्थ – अध्यापन-कार्य ब्रह्मयज्ञ, पितरों का तर्पण पितृयज्ञ, होमकार्य दैवयज्ञ, बलिप्रदान भूतयज्ञ, एवं अतिथि-सत्कार नृयज्ञ हैं ।    

यज्ञ का अर्थ सामान्यतः देवताओं की वैदिक मंत्रों के साथ की जाने वाली स्तुति से लिया जाता है, जिसे हवनकुण्ड में प्रज्वलित अग्नि में हव्य (घी, तिल आदि) की आहुति देकर मंत्रोच्चार से साथ संपन्न किया जाता है । यज्ञ का यह अर्थ रूढ़ि एवं आम प्रचलन में है, परंतु कई अवसरों पर यज्ञ इससे अधिक व्यापक अर्थ रखता है । यज्ञ शब्द उक्त श्लोक में मनुष्य से अपेक्षित अन्य कर्मों को इंगित करता है ।

यहां पांच यज्ञों का उल्लेख किया गया है जिनमें प्रथम  (ब्रह्मयज्ञहै अध्यापन जिसका तात्पर्य है अन्य लोगों को ज्ञान बांटना, उनमें उचितानुचित का विवेक जगाना, उन्हें आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करना आदि । प्राचीन वैदिक काल की वर्ण-व्यवस्था में यह कार्य औपचारिक तौर पर ब्राह्मणों के जिम्मे हुआ करता था । पर मैं समझता हूं कि तब भी किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा रहती होगी कि वह अनौपचारिक रूप से अपनी संतान एवं अन्य जनों को अपने सीमित ज्ञान से संस्कारित करे ।

अगला यज्ञ है पितृयज्ञ जिसे उक्त ग्रंथ में तर्पण द्वारा संपन्न करने की बात कही है । तर्पण का अर्थ है तृप्त करना । धर्मशास्त्रों के अनुसार स्नानादि के समय पितरों के नाम पर जल चढ़ाकर तर्पण किया जाता है । मैं तर्पण को अधिक व्यापक अर्थ देता हूं । वे सभी कार्य – जैसे दान – जो पितरों के नाम पर किए जाएं तर्पण माने जा सकते हैं । रोजमर्रा के जीवन में उनका स्मरण करना, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना, आदि तर्पण समझे जा सकते हैं ।

प्रज्वलित अग्नि में मंत्रोच्चार के साथ हव्यसामग्री सोंपना देवयज्ञ कहा जाता है । वैदिक मान्यता के अनुसार प्रकृति के विविध निष्प्राण भौतिक घटकों पर किसी एक या दूसरे देवता का नियंत्रण या स्वामित्व रहता है किसे अधिष्ठाता देवता कहा जाता है । मान्यता रही है कि हवन की अग्नि को समर्पित हव्य सामग्री उसके माध्यम से उन देवताओं को प्राप्त होती है । यज्ञ सामान्यतः इस विधि से देवताओं के प्रति की गई स्तुति है ।

वैदिक लोकव्यवहार मनुष्य से यह अपेक्षा करता है कि वह भोजन की व्यवस्था केवल अपने लिए ही न करे बल्कि अन्य जीवधारियों के नाम पर भी उसका एक अंश छोड़ दे जिसे बलि कहा गया है । मुझे याद है जब मेरे ग्राम्य समाज में भोजन-काल में उसका एक अंश अलग करने के बाद खाना आरंभ करते थे । उस बलि को भोजनांतर बाहर खुले में डाल देते थे जिसे कुत्ते-बिल्ली, कौवे या चिड़िया खा लेते थे । किसी न किसी बहाने पशुपक्षियों को भोजन खिलाने-पिलाने का व्रत कई लोग लिए रहते हैं । यह सब करना भूतयज्ञ के नाम से जाना गया है । भूत का अर्थ है भौतिक देहधारी प्राणी ।

अंत में नृयज्ञ, जिसका तात्पर्य अतिथि-सत्कार से है । समाज में किसी भी अन्य व्यक्ति, चाहे वह अनजान ही क्यों न हो, की सहायता करना, उसके प्रति सदाशयता दिखाना, सद्व्यवहार करना अतिथि सत्कार है । भूखे या रोगग्रस्त व्यक्ति के घर के प्रवेशद्वार पर आकर भोजन अथवा औषधि की याचना करने पर उसकी यथासंभव मदद करना अतिथि सत्कार कहा जाएगा । इसी प्रकार रात्रिविश्राम की मांग करने वाले के लिए समुचित व्यवथा करना अतिथि सत्कार के अंतर्गत माना जाएगा । अतिथि का मतलब है ऐसा व्यक्ति जिसका साक्षात्कार अप्रत्याशित रूप से हो जाए । दशकों पहले तक अपने समाज में अतिथि-सत्कार की प्रथा रही है (अतिथिदेवो भव) । लेकिन आज के ‘सभ्य’ समाज में लोग सामाजिक संवेदनाओं से दूर एवं परस्पर शंकालु होते जा रहे हैं और तदनुसार एक-दूसरे से बचते हैं ।

उक्त प्रकार के यज्ञसंज्ञात्मक कर्मों के निष्पादन के विषय में आगे यह कहा गया है:

पञ्चैतान्यो महायज्ञान्न हापयति शक्तितः ।

स गृहे‍ऽपि वसन्नित्यं सूनादोषैर्न लिप्यते ।।

(मनुस्मृति, 3, 71)

(एतान्यः पञ्च महायज्ञान् शक्तितः न हापयति सः नित्यं गृहे वसन् अपि सूना-दोषैः न लिप्यते ।)

अर्थ – यहां कथित इन पांच महायज्ञों को जो यथासामर्थ्य नहीं छोड़ता वह घर में रहते हुए भी पूर्वचर्चित पापकमों के दोषों से नहीं लिप्त होता है ।

घर में रहते हुए का तात्पर्य है गृहस्थ जीवन निभाते हुए । गृहस्थाश्रम मानवसमाज का सबसे अहम आश्रम है क्योंकि इसी पर अन्य आश्रमों का अस्तित्व टिका रहता है । इसी आश्रम के लोग दूसरों की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं । लेकिन गृहस्थाश्रम के तमाम दैनिक कार्यों को संपन्न करते हुए मनुष्य जाने-अनजाने पापकर्म कर बैठता है जिनके दोषों से वह मुक्त हो जाता है अन्य परोपकर्मों को करने पर । पापों की भरपाई पुण्यकर्मों से संभव है यही संदेश मनुस्मृति के इन वचनों में निहित है ।

पंचपापों एवं पंचमहायज्ञों को मैं शाब्दिक अर्थ में नहीं लेता, प्रत्युत इनको मैं प्रतीकात्मक समझता हूं । छोटे-मोटे सभी कर्म पाप के स्रोत हो सकते हैं और देवताओं-पितरों के प्रति श्रद्धाभिव्यक्ति एवं समाज तथा अन्य प्राणियों के प्रति उपकार-भावना उन पापों का प्रतिकार है । – योगेन्द्र जोशी

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