संन्यास-धर्म के बारे में महाभारत में व्यक्त विचार – (1) एकश्चरति यः …

महाकाव्य महाभारत में संन्यासधर्म के बारे बहुत कुछ कहा गया है और यह स्पष्ट किया गया है कि गेरुआ वस्त्र धारण करना संन्यासी की पहचान नहीं है । मनुस्मृति जैसे अन्य ग्रंथों में भी कमोबेश वही बातें कही गयी हैं । संन्यासी के लक्षणों वाले व्यक्ति आजकल कहीं नहीं दिखते हैं । संन्यासी होने का दावा करने वाले सभी आम जनों को मूर्ख बनाते हैं यह मेरा मत है । मैं महाभारत में वर्णित चुने हुए कुछ श्लोकों का उल्लेख अपने तीन-चार लेखों की शृंखला में कर रहा हूं । महर्षि व्यास द्वारा अपने पुत्र शुकदेव को दिये गये धर्मविषयक उपदेश में संन्यास की चर्चा की गयी है । उसी वार्तालाप से उद्धृत तीन श्लोकों के साथ प्रस्तुत है पहला आलेख:

एकश्चरति यः पश्यन् न जहाति न हीयते ।

अनग्निरनिकेतश्च ग्राममन्नार्थमाश्रयेत् ॥5

(महाभारत, शान्तिपर्व, मोक्षधर्मपर्व, अध्याय 245)

(पश्यन् यः एकः चरति, न जहाति न हीयते, अन्-अग्निः च अनिकेतः च ग्रामम् अन्न-अर्थम् आश्रयेत् ।)

अर्थः – (संन्यासी की विशिष्टता यह है कि वह) अकेला विचरण करता है, सत्य के ज्ञान के फलस्वरूप न किसी को त्यागता है और न ही किसी के द्वारा त्यागा जाता है । अग्नि की स्थापना न करे और उसका कोई आवास (घर) भी न होवे । उसे चाहिए कि वह केवल अन्नप्राप्ति के लिए ग्राम में प्रवेश करे ।

          संन्यासी का कोई संगीसाथी नहीं होता है । उसका किसी के साथ अपना-पराया का भाव नहीं रहता है और इसी भाव के साथ लोग भी उसे देखते हैं । वैदिक सभ्यता में सभी कर्मकाण्डों के केन्द्र में अग्नि होती है । संन्यासी सभी कर्मकाण्डों को छोड़ चुका होता है इसलिए वह अग्नि भी प्रज्वलित नहीं करता है । संन्यासी को किसी पक्के आवास में नहीं रहना चाहिए और उसे चाहिए कि ग्रामक्षेत्र में केवल भोजनार्थ भिक्षा के लिए प्रवेश करे । ग्राम वह स्थान होता है जहां लोग समूह में रहते हैं । संन्यासी एकाकी रहता है इसलिए ऐसे स्थान में रहना उसके लिए वर्जित है ।

अश्वस्तनविधाता स्यान्मुनिर्भावसमाहितः ।

लघ्वाशी नियताहारः सकृदन्ननिषेविता ॥6

(यथा पूर्वोक्त)

(अश्वस्तन-विधाता, मुनिः, भाव-समाहितः, लघु-आशी, नियत-आहारः, सकृत्-अन्न-निषेविता स्यात् ।)

अर्थः – संन्यासी आने वाले कल के लिए भोजनादि का संग्रह करने वाला न बने, चिंतनशील (एकाग्रचित्त) रहे और मनोभावों को अपने भीतर ही सीमित रखे, अर्थात् संयम बरते । वह अल्पाहारी एवं नियमानुकूल भोजन करने वाला बने तथा दिन भर में एक बार ही अन्न ग्रहण करे ।

          संन्यास का अर्थ है त्याग करना । संन्यासी शनैःशनैः सभी भौतिक वस्तुओं को त्यागता है और जीवन-धारण हेतु जितना आवश्यक हो उतने तक अपने को सीमित रखता है । इसलिए भविष्य की चिंता करते हुए भोजन आदि का संचय करना उसके लिए धर्मविरुद्ध हो जाता है । ऐसा संचय वैदिक आश्रम व्यवस्था के आरंभिक तीन आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ, वानप्रस्थ) में ही अनुमत है । उसका समय ब्रह्मज्ञान अर्जित करने और भौतिक संसार से जुड़े मनोभावों से स्वयं को मुक्त करने में बीतना चाहिए ।

कपालं वृक्षमूलानि कुचैलमसहायता ।

उपेक्षा सर्वभूतानामेतावद् भिक्षुलक्षणम् ॥7

(यथा पूर्वोक्त)

(कपालं वृक्ष-मूलानि कुचैलम् असहायता सर्वभूतानाम् उपेक्षा एतावत् भिक्षु-लक्षणम् ।)

अर्थः – संन्यासी के लक्षण ये होने चाहिएः वह भिक्षा के लिए कपाल को पात्र के तौर पर प्रयोग करे, रात्रि विश्राम पेड़-पौधों के साये में करे, सादे असुन्दर वस्त्र धारण करे, किसी को साथ न रखे, सभी प्राणियों के प्रति उपेक्षाभाव रखे ।

          कपाल का सामान्य अर्थ है मनुष्य का माथा । कुछ अघोरपंथी हठयोगी कापालिक नरमुंड-माला पहनते हैं और मनुष्य की खोपड़ी बर्तन के तौर पर प्रयोग में लेते हैं । लेकिन यहां कपाल का अर्थ है टूटा मिट्टी का बर्तन, जैसे घड़े का टुकड़ा । मैंने अपनी बाल्यावस्था (उत्तराखंड में व्यतीत समय) में योगी-योगिनियों को पुष्ट गोल लौकी (तुम्बा) के बाहरी सख्त खोल से बना बर्तन भिक्षा हेतु प्रयोग में लेते देखा है जिसे कपाल कहा जाता है । संन्यासधर्म में पक्के मकान के भीतर निवास करना वर्जित है । संन्यासी पेड़ की छाया में निवास करे और वर्षा आदि से बचने के लिए घास-फूस से बनी कुटिया में रह सकता है । कुचैल का अर्थ सामान्यतः फटा-पुराना मैला होता है । मन की शुचिता के साथ देह की शुचिता की अपेक्षा संन्यासी से भी रहती है । मैं समझता हूं कि कुचैल से यहां मतलब है केवल पानी से साफ किया हुआ न कि साबुन जैसे चीज का प्रयोग करते हुए । उक्त कथन में उपेक्षा का अर्थ तिरस्कार से नहीं है, बल्कि उदासीनता से है । अर्थात् संन्यासी न तो किसी से लगाव रखे न किसी से द्वेष ।

अगले आलेखों में भी उक्त ग्रंथ से एतद्विषयक अतिरिक्त सामग्री । – योगेन्द्र जोशी

2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. Pratibha
    मई 12, 2016 @ 09:43:23

    Nice article.

    प्रतिक्रिया

  2. Jeevanlal Patel
    मई 27, 2016 @ 13:15:17

    बढ़िया हेयर सर जी…. खजाने से और कोई विशेष ज्ञान – रत्न ढूंढ़कर आपने समे रखा है… बहुत धन्यवाद…स्वस्थता के लिए प्रार्थना..

    प्रतिक्रिया

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