संन्यास धर्म के बारे में महाभारत में व्यक्त विचार – न क्रुद्ध्येत् न प्रहृष्येत् … (2)

अपने पिछले ब्लॉग-लेख में मैंने संन्यासी एवं संन्यासधर्म के बारे में महाकाव्य महाभारत में क्या कहा गया है इसकी चर्चा की थी (देखें पोस्ट दिनांक 11 मई 2016) । वे बातें उक्त ग्रंथ में वर्णित महर्षि व्यास का अपने पुत्र शुकदेव को दिए गए धर्मोपदेश पर आधारित थीं । संबंधित वार्ता पर्याप्त लंबी है । मैं उसी प्रकरण से चुने हुए तीन अन्य श्लोकों को उद्धृत कर रहा हूं:

न क्रुद्ध्येन्न प्रहृष्येच्च मानितोऽमानितश्च यः ।

सर्वभूतेष्वभयदस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥14

(महाभारत, शान्तिपर्व, मोक्षधर्मपर्व, अध्याय 245)

(न क्रुद्ध्येत् न प्रहृष्येत् च मानितः अमानितः च यः सर्वभूतेषु अभयदः तम् देवा ब्राह्मणम् विदुः ।)

अर्थ – जो व्यक्ति सम्मान दिए जाने अथवा अपमान किये जाने पर न तो प्रसन्न होता है और न ही नाखुश, और जो सभी प्राणियों अभय देता है उसी को देवतागण ब्राह्मण कहते है ।

यहां पर ब्राह्मण का तात्पर्य वर्णव्यवस्था के ब्राह्मण से नहीं है, बल्कि ब्रह्ज्ञानी से है । संन्यासी ही वह व्यक्ति होता है जो ब्रह्मज्ञान की दिशा में आगे बढ़ रहा होता है । ऐसे व्यक्ति के लिए मान-अपमान की कोई सार्थकता नहीं रह जाती है । वह इनके प्रति उदासीन भाव रखता है यानी मान-अपमान के प्रति वह कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करता है । अभयद का अर्थ है अभयदान देने वाला यानी जिससे किसी को भय नहीं होता । संन्यासी जब किसी से नाखुश नहीं होता है और तदनुसार किसी का अहित नहीं करता है तो उससे किसी को भय नहीं हो सकता है ।

नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देत जीवितम् ।

कालमेव प्रतीक्षेत निदेशं भृतको यथा ॥15

(यथोपर्युक्त)

(न अभि-नन्देत मरणम् न अभि-नन्देत जीवितम् कालम् एव प्रतीक्षेत निदेशम् भृतकः यथा ।)

अर्थ – संन्यासी न तो मृत्यु की इच्छा करता है और न ही जीवित रहने की कामना । वह बस काल (समय) की प्रतीक्षा करता है जैसे कि सेवक अपने स्वामी के निदेशों का ।

संन्यासी जीवन तथा मृत्युु के प्रति उदासीन भाव प्राप्त कर चुका होता है । तब उसे इन दो में से किसी के भी प्रति आकर्षण अथवा विलगाव नहीं रह जाता है । उसे न तो सुख-सुविधाओं के साथ जीते रहने की कामना रहती है और न ही मृत्यु का भय सताता है । अतः वह न तो येनकेन प्रकारेण जीवित रहने के प्रयास (यथा अस्पताल में भरती होना) करता है और न ही अस्वाभाविक मृत्यु (यथा आत्महत्या) का विकल्प चुनता है ।

अनभ्याहतचित्तः स्यादनभ्याहतवाग् भवेत् ।

निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यो निरमित्रस्य किं भयम् ॥16॥

(यथोपर्युक्त)

(अन्-अभि-आहत-चित्तः स्यात् अन्-अभि-आहत-वाग् भवेत् निर्-मुक्तः सर्व-पापेभ्यः निर्-अमित्रस्य किम् भयम् ।)

अर्थ – संन्यासी के चित्त में अहितकारी विचार न हों, उसके वचन कष्ट पहुंचाने वाले न हों । जो सभी पापकर्मों से मुक्त हो उसका क्या भय हो सकता है ?

तात्पर्य यह है कि संन्यासी को मन, वचन, कर्म – सभी प्रकार से – स्वच्छ एवं अकलुषित होना चाहिए । वह किसी के अहित की नहीं सोचे तो भला उससे किसी को क्या भय हो सकता है ।

हमारे समाज में गेरुआ वस्त्रधारियों की कोई कमी नहीं है, पर क्या वे वस्तुतः संन्यासी हैं यह विचारणीय प्रश्न है । अगली पोस्ट में कुछ और बातों का उल्लेख किया जाना है । – योगेन्द्र जोशी

1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. Jeevanlal Patel
    जुलाई 04, 2016 @ 13:12:08

    बहुत अच्छा शोध्:- इस बार भी : एक गाना ( सन्यासी क गीत) इस विषय पर मेरे पस संकलित है .. कृपय गौर फरमाए :

    सन्यासी का गीत:

    दिव्य ध्येय की ओर तपस्वी जीवन भर अविचल चलता है ॥

    सज धज कर आए आकर्षण पग पग पर झूमते प्रलोभन
    हो कर सब से विमुख बटोही पथ पर संभल संभल बढता है ॥

    अमर तत्व की अमिट साधना प्राणो मे उत्सर्ग कामना
    जीवन का शाश्वत व्रत ले कर साधक हँस कण कण गलता है ॥

    सफल विफल और आस निराशा इस की ओर कहाँ जिज्ञासा
    बीहडता मे राह बनाता राही मचल मचल चलता है ॥

    पतझड के झंझावातों मे जग के घातों प्रतिघातों मे
    सुरभि लुटाता सुमन सिहरता निर्जनता मे भी खिलता है ॥

    प्रतिक्रिया

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: