संन्यास.धर्म के बारे में महाभारत में व्यक्त विचार – अहिंसकः समः … (3)

महाकाव्य महाभारत में महर्षि व्यास द्वारा अपने पुत्र शुकदेव को दिए गए धर्मोपदेश के अंतर्गत संन्यास धर्म की बातें भी कही गई हैं । पिछले दो ब्लॉग-प्रविष्टियों (दिनांक 11 मई 2016 एवं 7 मई 2016) में मैंने उस लंबे संवाद से संबंधित कुछ चुने हुए श्लोकों को उद्धृत किया था । अधोलिखित विवेचना में मैं चुने हुए अन्य तीन श्लोकों को प्रस्तुत कर रहा हूं ।

अहिंसकः समः सत्यो धृतिमान्नियतेन्द्रियः ।

शरण्यः सर्वभूतानां गतिमाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥20

(महाभारत, शान्तिपर्व, मोक्षधर्मपर्व, अध्याय 245)

(अहिंसकः समः सत्यः धृतिमान् नियत-इन्द्रियः शरण्यः सर्व-भूतानाम् गतिम् आप्नोति अन्-उत्तमाम् ।)

हिंसा की भावना से मुक्त, सबके प्रति समान भाव वाला, सत्यनिष्ठ, धैर्यवान, संयमित इंद्रियों वाला, सभी प्राणियों के शरण के योग्य मनुष्य उत्तमतम गति प्राप्त करता है । (अनुत्तमाम्  के स्थान पर अत्युत्तमाम्  भी हो सकता है।)

          इस श्लोक में अनुत्तमाम् शब्द का अर्थ है वह जिससे उत्तमतर कुछ न हो यानी सर्वोत्तम (न+उत्तम) । सामान्यतः इसका अर्थ लिया जाएगा जो अच्छा नहीं हो  । ग्रंथ का कहना है कि उक्त गुणों से संपन्न संन्यासी परलोक में उत्तमतर दशा प्राप्त करता है, अपने सत्कर्मों का फल भोगता है ।

विमुक्तं सर्वसङ्गेभ्यः मुनिमाकाशवत् स्थितम् ।

अस्वमेकचरं शान्तं तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥22

(यथोपर्युक्त)

(विमुक्तम् सर्व-सङ्गेभ्यः मुनिम् आकाशवत् स्थितम् अस्वम् एकचरं शान्तम् तम् देवाः ब्राह्मणम् विदुः ।)

जो पुरुष सभी के साथ की इच्छा से मुक्त हो, मौनव्रती तपस्वी हो, आकाश की तरह स्थिर हो, ‘मेरा है’की भावना से ग्रस्त न हो, अकेला विचरण करने वाला हो, शांतचित्त हो, उसे देवतागण ब्राह्मण कहते हैं ।

          ध्यान रहे कि इस स्थल पर ब्राह्मण शब्द का अर्थ प्राचीन सामाजिक वर्ण-व्यवस्था के चार वर्णो में से एक ‘ब्राह्मण’नहीं है । यहां इसका अर्थ ब्रह्मवेत्ता अर्थात् ज्ञानी लिया जाना चाहिए । वर्णाश्रम व्यवस्था में भी ब्राह्मण वह होता था जिसे आध्यात्मिक ज्ञान हो और जो लोगों को शिक्षित करता हो । संन्यासी के लिए समूह में रहना वर्जित रहा है, क्योंकि उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह सबसे संबंध तोड़कर मेरे-तेरे की भावना से मुक्त हो चुका हो ।

निराशिषमनारम्भं निर्नमस्कारमस्तुतिम् ।

निर्मुक्तं बन्धनैः सर्वैस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥24

(यथोपर्युक्त)

(निर्-आशिषम् अन्-आरम्भं निर्-नमस्कारम् अस्तुतिम् निर्-मुक्तम् बन्धनैः सर्वैः तम् देवाः ब्राह्मणम् विदुः ।)

जिसे कामनाएं न हों, जो कुछ अर्जित करने का प्रयास न करे, जिसे दूसरों से नमस्कार या सम्मान की अपेक्षा न हो, जो प्रशंसा की इच्छा न रखता हो, सभी बंधनों से मुक्त हो, उसे देवतागण ब्राह्मण अथवा संन्यासी कहते हैं ।

          उपर्युक्त श्लोक में संन्यासी के अतिरिक्त गुणों का उल्लेख किया गया है । सार-संक्षेप यह है कि संन्यासी सभी इच्छाओं-आकांक्षाओं-अपेक्षाओं के परे होता है । हर व्यक्ति का सबसे बड़ा बंधन उसका स्वयं का परिवार होता है, उसके बाद संबंधियों-मित्रों से वह बंधा रहता है । संन्यासधर्म में प्रवेश करने के लिए सर्वप्रथम इन रिश्तों को तोड़ना होता है । तत्पश्चात् अपनी सभी सांसारिक कमजोरियों से अपने को अलग करना होता है । यह प्रक्रिया प्रबल संकल्प-शक्ति की मांग करता है ।

क्या आज के युग में इस संन्यासधर्म के अनुसार चलने वाला कोई है ? महाभारत ग्रंथ में यह भी स्पष्ट किया गया है कि गेरुआ वस्त्र धारण करने से कोई संन्यासी नहीं होता । इस बात की चर्चा अगले चिट्ठा-लेख में की जाएगी । – योगेन्द्र जोशी

 

 

2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. Jeevanlal Patel
    अगस्त 09, 2016 @ 09:49:27

    इस बार भी बहुत अच्छा विवेचन. जोशी साहब, ( वैसे आपको मैंने सर बोलना चाहिए) एक बात कहूँ . आपके शोध बडेही प्रभावित करते है, विशेषत: आपकी टिपण्णी. मैंने आजकल यह मेल मेरे दो मित्रोंको फॉरवर्ड करना शुरू किया है. उनमेसे एक मुझे ( और लोगों के साथ) भगवद्गीता पढ़ाते है. ये विदुषी शायद संस्कृत की विशारद है, क्यों की जो गीता को कहना है वो इनके द्वारा सही माने में हम लोगोंके लिए भाषांतरित होता रहता है. वैसे गीता अपने आपमें एक ऊँचा तत्वज्ञान है इस बात को मानते हुए भी आप शायद ( इसी कारण) सहमत होंगे की भाषांतरकर्ता का महत्व कितना अधिक है. उच्चारण में भी उन्हें प्रवीणता प्राप्त है, सभी वर्णों और व्यंजनों के उच्चार सराहनीय है . और सब को मुक्त (नि:शुल्क) ज्ञान दिया जा रहा है. यह मुझे भी प्राप्त हो रहा है इसलिए मै स्वयं को भाग्यशाली समझता हूँ…
    आपको अगली पोस्ट/शोध केलिए शुभेच्छाए…… जीवनलाल पटेल

    प्रतिक्रिया

  2. Jeevanlal Patel
    अगस्त 09, 2016 @ 10:08:51

    जो भजे हरि को सदा सोही परम पद पावेगा
    यह महान शास्त्रीय संगीत गायक भीमसेन जोशी जी ने गाया हुवा भजन मुजे इस समय याद आ रहा है , आपने जो बात कही उसके कुछ अंश इस भजन है , एह भैरवी है .. बहुत प्रभावी और श्रवणीय है आपभी अवश्य सुने… ( शायद नेट पर उपलब्ध है)
    …………………………………………………………………………………………

    जो भजे हरि को सदा, सोही परम पद पावेगा |

    देह के माला, तिलक और छाप, नहीं किस काम के,
    प्रेम भक्ति बिना नहीं नाथ के मन भावे |

    दिल के दर्पण को सफा कर, दूर कर अभिमान को,
    ख़ाक को गुरु के कदम की, तो प्रभु मिल जायेगा |

    छोड़ दुनिए के मज़े सब, बैठ कर एकांत में,
    ध्यान धर हरि का, चरण का, फिर जनम नही आयेगा |

    द्रिड भरोसा मन मे करके, जो जपे हरि नाम को,
    कहता है ब्रह्मानंद, बीच समाएगा |

    प्रतिक्रिया

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