संन्यास-धर्म के बारे में महाभारत में व्यक्त विचार – परिव्रजन्ति दानार्थं मुण्डाः काषायवाससः (4)

संन्यास धर्म के बारे महाभारत ग्रंथ में बहुत-सी बातें कही गई हैं । उनमें से कुछ चुनी हुई बातों का उल्लेख मैंने पिछले तीन आलेखों में किया है

(दिनांक ११ मई, ७ जून, एवं २७ जुलाई) । चार आलेखों की इस शृंखला का चतुर्थ एवं अंतिम आलेख यहां पर प्रस्तुत है ।

महाभारत ग्रंथ के शान्तिपर्व में कौरव-पांडव युद्ध की समाप्ति के बाद की स्थितियों का वर्णन है । उसी के अंतर्गत एक प्रकरण है जिसके अनुसार युद्ध के दुःखद परिणामों से विचलित होकर राजा युधिष्ठिर राजकाज छोड़कर संन्यास ग्रहण करने का विचार अपने भाइयों के समक्ष रखते हैं । द्रौपदी समेत सभी भाई उनके विचार को नकारते हुए सलाह देते हैं कि उन्हें जनता का हित साधने के लिए राजकाज चलाना चाहिए । वार्तालाप के उस सिलसिले में अर्जुन गेरुआवस्त्रधारी तथाकथित साधु-महात्माओं की कटु आलोचना भी कर डालते हैं । वे कहते हैं कि ऐसे कई लोग ढोंगी होते हैं और आम जन को मूर्ख बनाकर अपनी जीविका चलाते हैं । तत्संबंधित दो कथन आगे प्रस्तुत हैं:

परिव्रजन्ति दानार्थं मुण्डाः काषायवाससः ।

सिता बहुविधैः पाशैः सञ्चिन्वन्तो वृथामिषम् ॥32॥

(महाभारत, शान्तिपर्व, राजधर्मानुशासनपर्व, अध्याय 18)

(परि-व्रजन्ति दान-अर्थम् मुण्डाः काषाय-वाससः सिता बहु-विधैः पाशैः सञ्चिन्वन्तः वृथा आमिषम् ।)

अर्थ – मानव समाज में गेरुआ वस्त्र धारण किए हुए, विविध प्रकार के बंधनों से बंंधे हुए, भोग-लालसा की खोज में लगे हुए, कुछ लोग दान पाने की इच्छा से विचरण करते हैं ।

‘दान पाने की इच्छा’ का यहां पर तात्पर्य है बिना परिश्रम किए हुए दूसरों से धन-संपदा पाने का रास्ता अपनाना । संन्यासी सरीखे दिखने वाले वे सम्मोहक बातों से लोगों में यह भ्रम पैदा करते हैं कि वे धर्म एवं अध्यात्म परम ज्ञाता हैं और सांसारिक मोहमाया से मुक्त हैं । गंभीरता से ध्यान देने पर पता चलता है कि वे अपनी भोगेच्छाओं की पूर्ति के लिए भ्रमजाल फैलाने में दक्ष होते हैं । आम जनों में अनेक उनके शब्दजाल में ऐसे फंसते हैं कि उनके असली इरादों को भांप ही नहीं पाते । हिंदू जनमानस चूंकि गेरुआ वस्त्र को संन्यासधर्मी की पहचान मानते हैं इसलिए जो भी ये स्वांग रचता है उसके चंगुल में लोग फंस जाते हैं । वे मोहमाया में फंसे हैं इस बात को लोग सोच भी नहीं पाते । इस प्रकार गेरुआवस्त्रधारी वे लोगों की निरीहता का लाभ उठाते हैं ।

अनिष्कषाये काषायमीहार्थमिति विद्धि तम् ।

धर्मध्वजानां मुण्डानां वृत्त्यर्थमिति मे मतम् ॥34॥

(यथोपर्युक्त)

(अ-निस्-कषाये काषायम् इह अर्थम् इति विद्धि तम् धर्म-ध्वजानां मुण्डानां वृत्ति-अर्थम् इति मे मतम् ।)

अर्थ – दूषित मन के साथ गेरुआ (या केसरिया) चोला पहनने को स्वार्थ-साधन समझा जाना चाहिए । ऐसे नरों का (मिथ्या) धर्म के नाम का झंडा उठाकर चलना वस्तुतः जीविका चलाने का धंधा है ऐसा मेरा (प्रसंगानुसार अर्जुन का) मत है । (निष्कषाय = स्वच्छ, मैलरहित, निष्कपट)

गेरुआवस्त्रधारी व्यक्ति का मन क्या अनिवार्यतः निष्कपट होता है यह प्रश्न हर व्यक्ति के मन में उठना चाहिए । ऐसे वस्त्र छलकपट करके स्वार्थसिद्धि के साधन भी हो सकते हैं, क्योंकि सामान्य जनों को इन्हें देखकर यह भ्रम होता है कि वस्त्रधारी मोहमाया और भौतिक लालसाओं से विरक्त योगी होता है । वास्तविकता बहुधा इसके विपरीत होती है । गंभीरता से परीक्षण करने पर देखने को मिलता है कि वे भौतिक सुखों में लिप्त रहते हैं । जब महाभारत काल में ऐसे ढोंगी हो सकते थे तो आज भौतिकवादी युग में उनका होना आश्चर्य की बात नहीं है । यहां गेरुआ वस्त्र मात्र प्रतीक है । ढोंगी श्वेतवस्त्रधारी भी हो सकता है । अनेकों ऐसे रूप यह धर सकता है जिससे लोग उसे सिद्ध महात्मा समझ बैठे एवं उसके प्रति खिंचे चले आवें और वह उनकी सिधाई का लाभ उठाये । आजकल हमारे समाज में पग-पग पर ऐसे धोखेबाज मिल रहे हैं ।

धर्म के नाम पर आम जनों को धोखा देने में दक्ष तथाकथित धर्मरक्षकों के बारे में उक्त ग्रंथ के शान्तिपर्व के अन्य अध्याय में अधोलिखित बात कही गयी है । प्रसंग है पांडव-पितामह भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को नीति संबंधी उपदेश दिया जाना ।

अन्तःक्रूरा वाङ्मधुराः कूपाश्छन्नास्त्रिणैरिव ।

धर्मवैतं सिकाःक्षुद्रा मुष्णन्ति ध्वजिनो जगत् ॥18॥

(महाभारत, शान्तिपर्व, राजधर्मानुशासनपर्व, अध्याय 158)

(अन्तः-क्रूराः वाक्-मधुराः कूपाः छन्नाः त्रिणैः इव धर्मौ एतम् सिकाः क्षुद्राः मुष्णन्ति ध्वजिनः जगत् ।)

अर्थ – जो भीतर से क्रूर होते हैं किंतु मधुर वाणी बोलते हैं वे घासफूस से ढके कुंए के समान होते है । इसी प्रकार धर्म के नाम पर धोखा देने वाले क्षुद्र स्तर के लोग धर्म का झंडा लिए हुए संसार को लूटते हैं ।

कहा जाता है कि जंगली जानवरों को पकड़ने के लिए धोखा देकर गड्ढे में फंसाया जाता है । गड्ढे को घासफूस से ऐसे ढक दिया जाता है कि जानवर को उसका तनिक भी एहसास न हो । उस छिपे गड्ढे को पार करने पर वह जानवर उसमें गिर पड़ता है। प्रस्तुत नीतिवचन के अनुसार गेरुआवस्त्रधारियों के इरादा भी उक्त तरीके का ही होता है ।

इस कथन का तात्पर्य है कि धर्म के नाम पर धोखाधड़ी कोई नयी बात नहीं है । धर्म के ठेकेदार भी एक प्रकार के लुटेरे होते हैं । कुछ की हरकतें तो खुल्लमखुल्ला गुंडागर्दी की होती हैं जैसा कि आजकल देखने को मिल रहा है । कई ऐसे होते है जिनके मन में छल-कपट होता है परंतु व्यवहार में वे मोहक वाणी बोलते हैं जिससे उनके असली इरादे छिप जाते हैं । जैसा पहले कहा जा चुका है वे आम जनों से किसी न किसी रूप में धन एवं सुखसाधन पा जाते हैं । वे बहुत बारीकी से हमें लूट रहे हैं इस बात का एहसास आम जनों को नहीं हो पाता है ।

इस स्थल पर मैं मनुस्मृति से भी एक उद्धरण प्रस्तुत कर रहा हूं जो कहता है कि बाह्य प्रतीक धर्म के लक्षण नहीं होतेः

दूषितोऽपि चरेद्धर्मं यत्र तत्राश्रमे रतः ।

समः सर्वेषु भूतेषु न लिङ्गं धर्मकारणम् ॥

(मनुस्मृति 6, 66)

(दूषितः अपि चरेद् धर्मम् यत्र तत्र आश्रमे रतः समः सर्वेषु भूतेषु न लिङ्गं धर्म-कारणम् ।)

अर्थ – यहां-वहां जिस किसी आश्रम में रहते हुए दूषित होने पर भी धर्मानुसार आचरण करे । सभी प्राणियों को समान दृष्टि से देखे । प्रतीकों का धारण करना धर्म के कारण नहीं होता  ।

दूषित का अर्थ में कि स्थान-विशेष के नियमों का ठीक से पालन न कर पाना । ऐसे दोष के बावजूद उसे धर्माचरण यथावत करते रहना चाहिए ।प्रतीकों से अर्थ है गेरुआ या श्वेत प्रकार के वस्त्र धारण करना, माथे पर चंदन-तिलक लगा के रहना, शरीर पर राख चुपड़ना इत्यादि । इन सबको धर्म के कारण नहीं किया जाता । अर्थात् इनका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है । धर्म तो व्यक्ति के आचरण में परिलक्षित होता है । मन का निष्कपट होना, सत्य, निष्ठा, अहिंसा, परोपकार आदि में स्वयं को लगाना, अर्थात् सन्मार्ग पर चलना ही धर्म है ।

भोग-विलास में लिप्त व्यक्ति भला संन्यासी कैसे हो सकता है । सुखसाधनों से दूर रहना तो संन्यासी के आचरण का अभिन्न अंग है । आपने किसी कथित संत महात्मा को देखा है जो जमीन में साधारण से आसन पर बैठकर बातें करता हो ? वातानुकूूलित यान से यात्रा न करता हो ? मुझे तो अपने शंकराचार्यों पर भी तरस आता है कि वे स्वयं को संन्यासी कहते हैं और उच्च सिंहासन पर विराजमान रहते हैं । क्या आदि शंकराचार्य ऐसा ही करते थे ?

मेरे मन में आजकल के इन संतों-महात्माओं के प्रति कोई सम्मान जागृत नहीं होता । – योगेन्द्र जोशी

 

1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. Jeevanlal Patel
    अगस्त 13, 2016 @ 21:17:54

    सर , आपके मनमे जो सवाल उठते है, वे स्वाभाविक हैं. अधर्माचरण पहले भी ऐसाही होता होगा. आजभी ऐसाही है. गीता में एक दो जगह मिथ्याचार ( hypocrisy) पर स्पष्टता से भाष्य है. (देह के माला, तिलक के बारेमे मैंने पिछली कमेन्ट में आपको लिखा था. ) वैसे भी धर्म नामका शब्द हम किन परिस्थितियोंमे कितना मर्यादित करते है उसपर ये बातें निर्भर है. मनुष्य को आध्यात्मिक रूप में ऊंचाई पाने के लिए भी गीतामे निर्देश है जिसमे इन सभी बातोंका विचार हुवा है. किसी मजहब /धर्म के धर्म मार्तंड की अगर बात हो रही है तो दुखसे कहना पड़ेगा की आपकी चिंता मननीय है, और आत्मचिंतन जो करते है ऐसे धर्मगुरु सन्यास का सही माने में पालन करते है.
    मै चाहूँगा की भविष्य में गीता जैसे महान ज्ञान के महान ग्रन्थ से भी कुछ मोती गोता लगाकर अगर आप हमें दिखाए तो हम उपकृत रहेंगे. – जीवनलाल पटेल.

    प्रतिक्रिया

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