“न मुञ्चति आशावायुः” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् – १

आदिशंकराचार्य ने वैदिक उपनिषदों के भाष्यों के साथ-साथ अनेक छोटी-बड़ी रचनाएं लिखी हैं। उनमें से एक है चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्। मैंने इसे गीताप्रेस, गोरखपुर, द्वारा प्रकाशित “स्तोत्ररत्नावली” नामक पुस्तक से लिया है। चर्पट का शाब्दिक तात्पर्य है चपत अर्थात् चांटा, पञ्जरिका का पिंजड़ा और स्तोत्र का स्तुति हेतु उच्चारित शब्द। रचना के उक्त नाम का क्या अर्थ निकलता है यह मैं नहीं समझ पाया। मुझे लगता है कि “चर्पट” के स्थान पर “कर्पट” होना चाहिए जिसका अर्थ होता है “चिथड़ा”। तब “चर्पटपञ्जरिका” का अर्थ चिथड़ों से बना पिंजड़ा लिया जा सकता है।

उक्त रचना में कुल सत्रह छंद हैं। उनके अतिरिक्त अधोलिखित एक स्थायी छंद और है जो अन्य छंदों में से हरएक के बाद प्रयुक्त हुआ है:

भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ्‍करणे ॥

(मूढमते, गोविन्दम् भज, गोविन्दम् भज, गोविन्दम् भज। सन्निहिते प्राप्ते मरणे “डुकृञ् करणे” नहि नहि रक्षति।)

स्तोत्र के हरएक अन्य छंद के बाद उपर्युक्त छंद के प्रयोग का क्रम गायन में प्रयुक्त अंतरा एवं स्थायी के क्रम के अनुरूप है। इन सभी छंदों में श्री शंकराचार्य ने जीवन की नश्वरता को समझने और ईश्वरभक्ति में रुचि लेने का संदेश दिया है। वे यह बताते हैं किस प्रकार वृद्धावस्था आते-आते मनुष्य शरीर से अशक्त हो जाता है, परिवार एवं समाज में उसकी अह्मियत समाप्त हो जाती है, लोग पर्याप्त सम्मान देना बंद कर देते हैं, इत्यादि। मैं इस एवं आगामी आलेखों की शृंखला में इन छंदों को तीन-तीन की संख्या में उद्धृत कर रहा हूं:

पहले उपर्युक्त छंद का

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब तुम्हारा मरणकाल पास आ जायेगा तब यह “डुकृञ् करणे” की रट तुम्हें नहीं बचाएगी।
मेरी समझ में यह “डुकृञ्‍करणे” प्रतीक है उन ऐहिक काम-धंधों का जिनमें मनुष्य उलझा रहता है। असल में “डुकृञ्” संस्कृत व्याकरण की एक क्रियाधातु है जिसका अर्थ “(कर्वव्य) करना” है। इसका तथा इसके “डु” हटाकर प्राप्त तुल्य क्रियाधातु “कृञ्” का प्रयोग संस्कृत-व्यवहार में सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। अर्थात् इस कृयाधातु पर बहुत दिमाग खपाना एक प्रकार से निरर्थक है। व्याकरण के अध्येता उक्त क्रियाधातु के अर्थ याद करने के लिए कदाचित “डुकृञ् करणे” (तात्पर्य – कर्म करने के प्रयोजन हेतु डुकृञ्) रटते होंगे। मेरी समझ में स्तोत्र के रचनाकार की दृष्टि के अनुसार जीवन के अंतकाल तक सांसारिक कार्यों में ही लिप्त रहना निरर्थक है यह भाव “डुकृञ् करणे” याद रखने में प्रतिबिंबित होता है। रचना के अगले दो छंद आगे उद्धृत हैं:

दिनमपि रजनी सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायाताः ।

कालः क्रीडति गच्छत्यायुस्तदपि न मुञ्चत्याशावायुः ॥१॥ भज …

(दिनम् रजनी अपि सायम् प्रातः शिशिर-वसन्तौ पुनः आयाताः कालः क्रीडति आयुः गच्छति तद्‍-अपि आशा-वायुः न मुञ्चति ।)

अर्थ – दिन तथा रात, प्रातः, सायं शिशिर एवं वसंत ऋतु फ़िर-फ़िर आते हैं। समय खेलता है, आयु व्यतीत होती है, फ़िर भी आशा रूपी प्राणवायु छूटती नहीं।

यहां शिशिर एवं वसंत सभी छ: ऋतुओं (क्रमशः वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, पावस, शरद्‍, हेमंत तथा शिशिर) के सामूहिक प्रतीक हैं। छंद का भाव है कि काल अर्थात् समय प्राणियों के साथ खिलवाड़ करता है, समय का बीतना तमाम घटनाओं के रूप में दिखता है, और् मनुष्य की शेष आयु घटती जाती है। इतना सब होने पर भी मनुष्य भविष्य की आशा पाले रह्ता है।

अग्रे वह्निः पृष्ठे भानू रात्रौ चिबुकसमर्पितजानुः ।

करतलभिक्षा तरुतलवासस्तदपि न मुञ्चत्याशापाशः ॥२॥ भज …

(वह्निः अग्रे भानू पृष्ठे रात्रौ चिबुक-समर्पित-जानुः करतल-भिक्षा तरु-तल-वासः तद्‍-अपि आशा-पाशः न मुञ्चति ।)

अर्थ – सामने अग्नि और पीछे सूर्य रहते हैं; ठुड्डी घुटनों के बीच समाई रहती है; हथेली में भिक्षा मांगना और वृक्ष के नीचे रहना पड़ता है। फिर भी आशा के बंधन से मनुष्य मुक्त नहीं होता है।

यह छंद मनुष्य की वृद्धावस्था का वर्णन करता है कि ठंड से बचने के लिए उसे पीठ की तरफ़ सूर्य के घाम अथवा पेट की ओर अग्नि के ताप का सहारा लेना होता है। अन्यथा घुटनों के बीच सर रखकर गरमाहट लेनी होती है। स्थिति दयनीय हो चुकती है, लेकिन आशा का बंधन उसे संसार से जोड़े रखता है। – योगेन्द्र जोशी

Advertisements

2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. ymmaharaj
    जुलाई 20, 2017 @ 14:24:37

    यह स्तोत्र का वैयाकरणीय वृत्त कौनसा है?
    यदि ये छंद वृत्त है तो उस छंद नाम क्या हो सकता है?

    जैसे की संस्कृत में ज्यादातर रचनाएँ अनुष्ठप छंद में होती है.

    ये छंद उस से अलग लगता है.

    कृपया अभिप्राय दे.

    प्रतिक्रिया

    • योगेन्द्र जोशी
      अगस्त 12, 2017 @ 21:46:31

      मैंने छंदों का वृत्त क्या हो सकता है यह समझने की कोशिश की, लेकिन छंदों में समानता नहीं पाई। अतः किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया। क्षमा करें।

      प्रतिक्रिया

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: