“… ज्ञाते तत्वे कः संसारः ” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् – ४

… तत्व अर्थात् सृष्टि के अंतिम सत्य (परमात्मा) का ज्ञान प्राप्त हो जाने पर यह संसार अर्थहीन लगने लगता है।

इस चिट्ठे के छ: आलेखों की शृंखला की यह मेरी चौथी प्रविष्टि है। याद दिला दूं कि इन आलेखों में आदिशंकराचार्य द्वारा विरचित “चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्” के १८ छंदों की चर्चा की जा रही है। (देखें इसका पूर्ववर्ती आलेख, दिनांक ११ फरवरी, २०१७)

पहले आलेख में इस बात का उल्लेख किया था कि इस रचना में कुल सत्रह छंद हैं और उनके अतिरिक्त एक स्थायी छंद (भज गोविन्दं भज गोविन्दं …) भी है जो इनमें से प्रत्येक छंद के बाद प्रयुक्त हुआ है। यदि उक्त स्तोत्र को भजन के तौर पर गाया जाये तो यह छंद प्रत्येक के बाद गाया जायेगा। इसकी भूमिका गायन के स्थायी के समान है। इसे आगे उद्धृत किया जा रहा है:

[

भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ्‍ करणे ॥

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब तुम्हारा मरणकाल पास आ जायेगा तब यह “डुकृञ्  करणे” की रट तुम्हें नहीं बचाएगी। “डुकृञ्‍” संस्कृत व्याकरण की एक क्रियाधातु है जिसका अर्थ “(कर्वव्य) करना” है। इस क्रियाधातु का व्यवहार में प्रयोग सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। अर्थात्‍ इस पर बहुत दिमाग खपाना कुछ हद तक निरर्थक है। व्याकरण के अध्येता उक्त क्रियाधातु के अर्थ एवं प्रयोजन को याद रखने के लिए “डुकृञ्  करणे” रटते होंगे जिसका तात्पर्य है “डुकृञ्” क्रिया “करण” (कार्य करना) के प्रयोजन में लिया जाता है । स्तोत्र के रचनाकार की दृष्टि में जीवन के अंतकाल तक सांसारिक कार्यों में ही निरंतर लिप्त रहना फलदायक नहीं है यह भाव “डुकृञ्  करणे” के रटने में प्रतिबिंबित होता है।  “अब तो इस रट को छोड़ो और ईश्वर-प्रार्थना में संलग्न होओ।”

]

चिट्ठे की मौजूदा प्रविष्टि में चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् के तीन छंद (क्रमिकता में ९, १०, एवं ११) प्रस्तुत किये जा रहे हैं । इनमें पहला छंद है:

पुनरपि रजनी पुनरपि दिवसः पुनरपि पक्षः पुनरपि मासः ।

पुनरप्ययनं पुनरपि वर्षं तदपि न मुञ्चत्याशामर्षम् ॥९॥ भज …

(पुनः अपि रजनी पुनः अपि दिवसः पुनःअपि पक्षः पुनःअपि मासः पुनः अपि अयनंम् पुनः अपि वर्षं तत् अपि न मुञ्चति आशा-अमर्षम् ।)

अर्थ – रात्रि पुनः-पुनः आती है, दिन भी फिर-फिर आता है। महीने के पक्ष और स्वयं महीने बारबार आते-जाते रहते हैं। वर्ष के दोनों अयन (अर्धवार्षिक) एवं स्वयं वर्ष भी आते हैं, जाते हैं। किंतु मनुष्य की आशा और असहनशीलता यथावत बनी रहती हैं, छोड़ के जाती नहीं।

रात्रि, दिवस, पक्ष, माह, अयन और वर्ष ये सभी निरंतर प्रवाहित हो रहे समय के अलग-अलग माप के कालखंड हैं। मनुष्य के जीवन में ये कालखंड बारंबार आते-जाते रहते हैं। श्रीशंकराचार्य का कथन है कि एक नहीं दो नहीं, अनेक कालखंड व्यतीत हो जाते हैं पंरतु उसके जीवन की आशा और असहनशीलता में अंतर नहीं आता है। मेरी समझ में मौजूदा प्रसंग में असहनशीलता के अर्थ “विपरीत परिस्थितियों में विचलित हो जाना” से लिया जाना चाहिए। मतलब यह है कि वृद्धावस्था में मनुष्य मनोनुकूल घटित न होने पर बेचैन हो जाता था। वह वस्तुस्थिति को सह नहीं पाता है।

ध्यान दें कि काल-मापन की भारतीय पद्धति में महीने के दो पक्ष होते हैं: कृष्ण एवं शुक्ल। इसी प्रकार वर्ष के भी अयन नाम से दो भाग होते हैं: दक्षिणायण एवं उत्तरायण। दक्षिणायण में सूर्य का झुकाव दक्षिण की ओर होता जाता है और फलतः दिन छोटे तथा रात्रि बड़ी होने लगते है। उत्तरायण में सूर्य उत्तर की ओर लौटने लगता है और फलतः दिन बड़े होने लगते हैं तथा रातें छोटी। संस्कृत के संधि एवं ध्वनि संबंधी नियमों के अनुसार अयन के न का ण हो जाता है यदि उसके पहले टवर्ग का कोई वर्ण, या ष अथवा र आते हों। अर्थात् उत्तर+अयन = उत्तर+अयण = उत्तरायण और दक्षिण+अयन = दक्षिण+अयण = दक्षिणायण।

अगला छंद है:

वयसि गते कः कामविकारः शुष्के नीरे कः कासारः ।

नष्टे द्रव्ये कः परिवारो ज्ञाते तत्वे कः संसारः ॥१०॥ भज …

(वयसि गते कः काम-विकारः शुष्के नीरे कः कासारः नष्टे द्रव्ये कः परिवारः ज्ञाते तत्वे कः संसारः।)

अर्थ – अवस्था ढलने पर काम-विकार कैसा, पानी सूखने पर जलाशय कहां रह जाता है, धन-संपदा की समाप्ति पर परिवार कैसा, और इसी प्रकार तत्वज्ञान की प्राप्ति पर संसार कहां रह जाता है?

इस कथन के अनुसार कुछ बातें स्वाभाविक तौर पर घटित होती हैं। जीवन के अंतिम पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते काम-भावना समाप्त होने लगती है। काम शब्द के अर्थ सामन्यतः इच्छा या लालसा से लिया जाता है। इसे विशेष तौर पर यौनेच्छा से भी जोड़ा जाता है। (रतिशास्त्र में कामदेव इसी इच्छा के प्रतीक हैं।) इच्छाएं तो मनुष्य की मरते दम तक बनी रहती हैं। यह भी हो जाये, वह भी हो जाए जैसी लालसाएं तो बनी ही रहती हैं। यौनेच्छा कदाचित् समाप्त होने लगती है, शारीरिक सामर्थ्य के घटने से। इसलिए मेरा सोचना है कि इस कथन में काम-विकार उसी को इंगित करता है। जलाशय तभी तक अर्थ रखता है जब तक उसमें जल रहे। परिवार भी आपको तभी तक महत्व देता है जब तक कि संपदा हो। उल्लिखित सभी चीजें स्वाभाविक रूप से समाप्त होने लगती हैं । उनके विपरीत किंतु ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रयास करने होते हैं। और वह जब प्राप्त होता है तब यह संसार सारहीन लगने लगता है।

तृतीय छंद:

नारीस्तनभरनाभिनिवेशं मिथ्यामायामोहावेशम् ।

एतन्मांसवसादिविकारं मनसि विचारय बारम्बारम् ॥११॥ भज …

(नारी-स्तन-भर-नाभि-निवेशं मिथ्या-माया-मोह-आवेशम् एतत् मांस-वसा-आदि विकारम् मनसि विचारय बारम्बारम्)

अर्थ – नारी के स्तनों एवं नाभि (यौनांग) में निवेश माया एवं मोह जनित मिथ्या (निरर्थक) रुचि है। ये शरीर के मांस एवं वसा के विकार मात्र हैं यह बात निरंतर अपने विचार में रखो।

निवेश शब्द के अर्थ संबधित अंगों में रुचि लेना अर्थात्‍ उनको लेकर रतिक्रीड़ा करना लिया जा सकता है। मांस/वसा के विकार का अर्थ है कि मांस एवं वसा से बने इस शरीर के किसी अंग ने कुछ ऐसा स्वरूप ले लिया कि वे आकर्षक लगने लगे। “अरे पुरुष, यह मत भूलो कि ये वस्तुतः मांस-वसा से ही बने हैं जैसे शरीर के अन्य अंग, फिर उनमें विशेष रुचि क्यों?”

काम-भावना से मुक्त, विरक्त, व्यक्ति के लिए ये विचार सहज रूप से स्वीकार्य होंगे, किंतु सामान्य व्यक्ति को दिक्कत होगी।

     इस स्थल पर मुझे एक गंभीर टिप्पणी की आवश्यकता महसूस होती है। इस श्लोक में मुझे लगता है स्त्री को अस्पष्ट शब्दों में भोग्या वस्तु के तौर पर दर्शाया गया है। मैंने जितने भी धर्मों और धार्मिक परंपराओं की जानकारी अर्जित की है उन सभी में पुरुष को ही केंद्र में रखकर बातें कही गयी हैं। इस बात पर गौर करें कि सभी धर्मों के प्रणेता या उनकी मान्यताओं में योगदान करने तथा उन्हें आगे बढ़ाने वाले पुरुष ही रहे हैं। सभी धर्मों में पुरुषों के कर्तव्यों तथा हितों की बातें कही गयी हैं और स्त्री को उनके अधीनस्थ दोयम दर्जे के व्यक्ति के तौर पर देखा गया है। कुर’आन में साफ तौर पर कहा गया है कि अल्लाह ने पुरुष को श्रेष्ठतर बनाया है और स्त्री को उसके कहे अनुसार चलने को कहा गया है (कुर’आन, सुरा ४, आयत ३४)। कहा जाता है कि बौद्ध धर्म के आरंमिक काल में स्त्रियों को धर्म-संघों में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। अरबी मूल के धर्मों मे सभी पैगंबर पुरुष ही रहे हैं। भारत में भी ऋषि-मुनि पुरुष ही हुए हैं (शायद कुछ अपवाद हों)। मनुस्मृति (अध्याय ५, श्लोक १४७, १४८) में कहा गया है कि स्त्री बचपन में पिता के, दाम्पत्य जीवन में पति के, और उसके बाद पुत्रों के अधीन होती है; वह स्वतंत्र रहने की अधिकारिणी नहीं होती है। कट्टर धार्मिक मान्यताओं वाले कुछ लोग स्त्री को नर्क का द्वार बताते हैं। इस प्रकार की तमाम बातें सभी समाजों, धर्मों में देखने को मिलती हैं। उक्त छंद में स्त्री को इन्हीं विचारों के अनुरूप प्रस्तुत किया गया है ऐसा मेरा मत है। इस छंद से यही प्रतीत होता है कि पुरुष के लिए स्त्री मांस का लोथड़ा भर है; स्त्री के लिए पुरुष क्या है? मेरे पास उत्तर नहीं है! – योगेन्द्र जोशी

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