“क: त्वम् कः अहम् कुतः आयातः …” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् – ५

इस चिट्ठे के छ: आलेखों की शृंखला की यह मेरी पांचवी प्रविष्टि है। ध्यान रहे कि इन आलेखों में आदिशंकराचार्य द्वारा विरचित “चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्” के १८ छंदों की चर्चा की जा रही है। (देखें इसका पूर्ववर्ती आलेख, दिनांक ७ मार्च, २०१७)

पहले आलेख में इस बात का उल्लेख किया था कि इस रचना में कुल सत्रह छंद हैं और उनके अतिरिक्त एक स्थायी छंद (भज गोविन्दं भज गोविन्दं …) भी है जो इनमें से प्रत्येक छंद के बाद प्रयुक्त हुआ है। यदि उक्त स्तोत्र को भजन के तौर पर गाया जाये तो यह छंद प्रत्येक के बाद गाया जायेगा। इसकी भूमिका गायन के स्थायी के समान है। इसे आगे उद्धृत किया जा रहा है:

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भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ् करणे ॥

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब तुम्हारा मरणकाल पास आ जायेगा तब यह “डुकृञ् करणे” की रट तुम्हें नहीं बचाएगी। “डुकृञ्” संस्कृत व्याकरण की एक क्रियाधातु है जिसका अर्थ “(कर्वव्य) करना” है। इस क्रियाधातु का व्यवहार में प्रयोग सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। अर्थात्‍ इस पर बहुत दिमाग खपाना कुछ हद तक निरर्थक है। व्याकरण के अध्येता उक्त क्रियाधातु के अर्थ एवं प्रयोजन को याद रखने के लिए “डुकृञ् करणे” रटते होंगे जिसका तात्पर्य है “डुकृञ्” क्रिया “करण” (कार्य करना) के प्रयोजन में लिया जाता है । स्तोत्र के रचनाकार की दृष्टि में जीवन के अंतकाल तक सांसारिक कार्यों में ही निरंतर लिप्त रहना फलदायक नहीं है यह भाव “डुकृञ् करणे” के रटने में प्रतिबिंबित होता है।  “अब तो इस रट को छोड़ो और ईश्वर-प्रार्थना में संलग्न होओ।”

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चिट्ठे की मौजूदा प्रविष्टि में चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् के तीन छंद क्रमशः १२, १३, एवं १४ प्रस्तुत किये जा रहे हैं । इनमें पहला छंद है:

कस्त्वं कोऽहं कुतः आयातः का मे जननी को मे तातः ।

इति परिभावय सर्वमसारं विश्वं त्यक्त्वा स्वप्नविचारम् ॥१२॥ भज …

(सर्वम् असारम् स्वप्न-विचारम् विश्वंम् त्यक्त्वा त्वम् कः, अहम्  कः कुतः आयातः, मे जननी का, मे तातः कः इति परि-भावय ।)

अर्थ – इस सारहीन स्वप्नसदृश संसार में रुचि त्यागते हुए तुम कौन हो, मैं कौन हूं, कहां से आया, कौन मेरी जन्मदात्री, कौन मेरे पिता, इन बातों पर चिंतन करो।

वैदिक दर्शन के अनुसार यह संसार एक दीर्घकालिक स्वप्न से अधिक कुछ नहीं। जब मनुष्य को परमात्म तत्व का ज्ञान हो जाता है तो संसार के सारहीन, मिथ्या अर्थात्‍ अंततः सत्य से परे होने की अनुभूति हो जाती है। तब सभी रिश्ते-नाते अर्थहीन हो जाते हैं।

गेयं गीतानामसहस्रं ध्येयं श्रीपतिरूपमजस्रम् ।

नेयं सज्जनसङ्गे चित्तं देयं दीनजनाय च वित्तम् ॥१३॥ भज …

(गीता-नाम-सहस्रम् गेयम् , अजस्रम् श्री-पति-रूपम् ध्येयंम्, सज्जन-सङ्गे चित्तम्  नेयम् दीन-जनाय च वित्तम् देयम्‍ ।)

अर्थ – भगवद्गीता और विष्णुसहस्रनाम का पाठ करना चाहिए, भगवान्‍ विष्णु के रूप का निरंतर ध्यान करना चाहिए, अपना चित्त सज्जनों की संगत में लगाना चाहिए, और दीनहीन जनों को धन-दान करना चाहिए।

इस छंद में ईश्वरभक्ति और सत्कार्यों में मन लगाने का उपदेश दिया गया है।

यावज्जीवो निवसति देहे कुशलं तावत्पृच्छति गेहे ।

गतवति वायौ देहापाये भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये ॥१४॥ भज …

(जीवः यावत् देहे निवसति तावत् गेहे कुशलम्  पृच्छति, देह-अपाये वायौ गतवति तस्मिन्  काये भार्या बिभ्यति ।)

अर्थ – जब तक जीवधारी (संदर्भ में मनुष्य) शरीर में रहता है तब तक हर कोई घर में कुशलक्षेम पूछता है। शरीर के गिरने और प्राणवायु के निकलने पर उस शरीर से पत्नी तक डर जाती है।

     मनुष्य से किसी का भी लगाव तभी तक रहता है जब तक उसके शरीर में प्राण रहते है। जैसे ही काल-कलवित होकर वह निष्प्राण हो जाता है उससे सभी विरत होने लगते है। जिस पत्नी से आजीवन उसके अंतरंग संबंध रहे हों वह तक उस शरीर से दूर हो जाती है। यही इस जीवन का सच है। इन छंदों से यह संदेश मिलता है कि जब संसार को त्यागना ही होता है, तब क्यों न जीवितावस्था में ही उससे मोह त्यागते हुए ईश्वरप्राप्ति के प्रयास किए जाएं। – योगेन्द्र जोशी

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