“अहिंसा परमो धर्मः …” – महाभारत में अहिंसा संबंधी नीति वचन (1)

“अहिंसा परमो धर्मः” यह नीति-वचन लोगों के मुख से अक्सर सुनने को मिलता है। प्राचीन काल में अपने भारतवर्ष में जैन तीर्थंकरों ने अहिंसा को केंद्र में रखकर अपने कर्तव्यों का निर्धारण एवं निर्वाह किया। अंतिम तीर्थंकर भगवान् महावीर के लगभग समकालीन (कुछ बाद के) महात्मा बुद्ध ने भी करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व तमाम कर्तव्यों के साथ अहिंसा का उपदेश तत्कालीन समाज को दिया था। अरब भूमि में ईशू मसीह ने भी कुछ उसी प्रकार की बातें कहीं। आधुनिक काल में महात्मा गांधी को भी अहिंसा के महान् पुजारी/उपदेष्टा के रूप में देखा जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने तो उनके सम्मान में 2 अक्टूबर को अहिंसा दिवस घोषित कर दिया।

अहिंसा की बातें घूमफिर कर सभी समाजों में की जाती रही हैं, लेकिन उसकी परिभाषा सर्वत्र एक जैसी नहीं है। उदाहरणार्थ जैन धर्म में अहिंसा की परिभाषा अति व्यापक है, किसी भी जीवधारी को किसी भी प्रकार से कष्ट में डालना वहां वर्जित है। इस धारणा के साथ जीवन धारण करना लगभग नामुमकिन है। अरब मूल के धर्मो के अनुसार मनुष्य को छोड़कर अन्य जीवों में रूह नहीं होती, तदनुसार उनके साथ अहिंसा बेमानी है। कुर’आन से मैंने यही निष्कर्ष निकाला। वास्तव में सभी समाज अपने भौतिक हितों को ध्यान में रखते हुए अहिंसा की परिभाषा अपनाते हैं। विडंबना देखिए कि महावीर, बुद्ध एवं गांधी के इस भारत में अहिंसा की कोई अहमियत नहीं। पग-पग पर हिंसा के दर्शन होते है। अहिंसा वस्तुतः एक आदर्श है जिससे आम तौर पर सभी परहेज करते हैं। लेकिन “अहिंसा परमो धर्मः” की बात मंच पर सभी कहते हैं।

अस्तु, अहिंसा या हिंसा की वकालत करना इस आलेख में मेरा उद्देश्य नहीं है। “अहिंसा परमो धर्मः” की नीति की मानव जीवन में सार्थकता है या नहीं इसकी समीक्षा मैं नहीं कर रहा हूं। मैं केवल यह बताना चाहता हूं कि इस नीति का उल्लेख महाभारत महाकाव्य में कई स्थालों पर देखने को मिलता है। उन्हीं की चर्चा करना मेरा प्रयोजन है। जो यहां उल्लिखित हो उसके अतिरिक्त भी अन्य स्थलों पर बातें कही गयी होंगी जिनका ध्यान या जानकारी मुझे नहीं है।

अहिंसा परमो धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः ।

सत्ये कृत्वा प्रतिष्ठां तु प्रवर्तन्ते प्रवृत्तयः ॥74

(महाभारत, वन पर्व, अध्याय 207 – मारकण्डेयसमास्यापर्व)

(अहिंसा परमः धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः सत्ये तु प्रतिष्ठाम् कृत्वा प्रवृत्तयः प्रवर्तन्ते ।)

अर्थ – अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है, और वह सत्य पर ही टिका होता है। सत्य में निष्ठा रखते हुए ही कार्य संपन्न होते हैं।

यहां कार्य से तात्पर्य सत्कर्मों से होना चाहिए। सत्कर्म सत्य के मार्ग पर चलने से ही संभव होते हैं। धर्म बहुआयामी अवधरणा है। मनुष्य के करने और न करने योग्य अनेकानेक कर्मों का समुच्चय धर्म को परिभाषित करता है। करने योग्य कर्मों में अहिंसा सबसे ऊपर या सबसे पहले है यह उपदेष्टा का मत है।

महाभारत ग्रंथ के वन पर्व में पांडवों के 12 वर्षों के वनवास (उसके पश्चात् एक वर्ष का नगरीय अज्ञातवास भी पूरा करना था) का वर्णन है। वे वन में तमाम ऋषि-मुनियों के संपर्क में आते हैं जिनसे उन्हें भांति-भांति का ज्ञान मिलता है। उसी वन पर्व में पांडवों का साक्षात्कार ऋषि मारकंडेय से भी होता है। ऋषि के मुख से उन्हें कौशिक नाम के ब्राह्मण और धर्मनिष्ठ व्याध के बीच के वार्तालाप की बात सुनने को मिलती है। उक्त श्लोक उसी के अंतर्गत उपलब्ध है।

अगले दो श्लोक अनुशासन पर्व से लिए गए हैं। महाभारत युद्ध के बाद सब शांत हो जाता है और युधिष्ठिर राजा का दायित्व संभाल लेते हैं। भीष्म पितामह सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में मृत्यु-शैया पर लेटे होते हैं। वे युधिष्ठिर को राजधर्म एवं नीति आदि का उपदेश देते हैं। ये श्लोक उसी प्रकरण के हैं।

अहिंसा सर्वभूतेभ्यः संविभागश्च भागशः ।

दमस्त्यागो धृतिः सत्यं भवत्यवभृताय ते ॥18

(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 60 – दानधर्मपर्व)

(अहिंसा सर्व-भूतेभ्यः संविभागः च भागशः दमः त्यागः धृतिः सत्यम् भवति अवभृताय ते ।)

अर्थ – सभी प्राणियों के प्रति अहिंसा बरतना, सभी को यथोचित भाग सोंपना, इंद्रिय-संयम, त्याग, धैर्य एवं सत्य पर टिकना अवभृत स्नान के तुल्य (पुण्यदायी) होता है।

वैदिक परंपरा में यज्ञ-यागादि का विशेष महत्व है और उन्हें पुण्य-प्राप्ति का महान् मार्ग माना जाता है। ऐसे आयोजन के समापन के पश्चात विधि-विधान के साथ किए गये स्नान को अवभृत स्नान कहा गया है। यहां बताये गये अहिंसा आदि उस स्नान के समान फलदातक होते हैं यह श्लोक का भाव है।

उक्त श्लोक में “अहिंसा परमो धर्मः” कथन विद्यमान नहीं है, किंतु अहिंसा के महत्व को अवश्य रेखांकित किया गया है। वनपर्व का अगला श्लोक ये है:

अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तपः ।

अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते ॥23

(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 115 – दानधर्मपर्व)

(अहिंसा परमो धर्मः तथा अहिंसा परम्‍ तपः अहिंसा परमम्‍ सत्यम्‍ यतः धर्मः प्रवर्तते ।)

अर्थ – अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा परम तप है, और अहिंसा ही परम सत्य और जिससे धर्म की प्रवृत्ति आगे बढ़ती है।

इस वचन के अनुसार अहिंसा, तप और सत्य आपस में जुड़े हैं। वस्तुतः अहिंसा स्वयं में तप है, तप का अर्थ है अपने को हर विपरीत परिस्थिति में संयत और शांत रखना। जिसे तप की सामर्थ्य नहीं वह अहिंसा पर टिक नहीं सकता। इसी प्रकार सत्यवादी ही अहिंसा पर टिक सकता है यह उपदेष्टा का मत है।

अहिंसा की जितनी भी प्रशंसा हम कर लें, तथ्य यह है कि मानव समाज अहिंसा से नहीं हिंसा से चलता है। मैं अगले चिट्ठा-प्रवृष्टि में “अहिंसा …” पर अनुशासन पर्व के अन्य श्लोकों के साथ अपने इस मत की भी चर्चा करूंगा। – योगेन्द्र जोशी

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5 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. योगेन्द्र जोशी
    जुलाई 07, 2017 @ 21:27:08

    प्रतिक्रिया

  2. जीवनलाल
    जुलाई 16, 2017 @ 15:23:00

    बिलकुल सही टिपण्णी की गयी है ..
    रामायण , महाभारत , भागवत आदि हमारे वैदिक ग्रंथों में जगह जगह अवसर मिलनेपर या उनमें आयी हुई कथाओं में ग्रंथकारों ने ज्ञान, तत्वज्ञान, विज्ञान, दर्शन, आदर्श आदि बातें बताई हैं. और ये सभी स्तिमित कर देनेवाला ज्ञान है. मेरे विचार में भारतीय दर्शन शास्त्र जगत में और दर्शन शास्त्रों ( ग्रीक दर्शन शास्त्र, चीनी तत्व ज्ञान दर्शन आदि सभी से भी) बढ़कर होना चाहिए, क्यों की इस में जो बाते दिखाई देती है वे मूल्यों की ऊंचाई में सबसे बढ़कर दिखाती है. मैंने खुद बाकि दर्शनशास्त्रों का अध्ययन कभी नहीं किया, परन्तु जो आजतक देखनेमे आया उस अनुभव के बलपर मै कह रहा हूँ. यह तो बात हुई हमारे संस्कृति के ऊंचाई की..

    जहा तक अहिंसा पर आपकी टिपण्णी का संबंध है. आपसे मै सहमत हूँ की हमारी ही भूमि में ( कुछ लोग तो कहतेही है की “गर्वसे कहो हम हिन्दू है “, और इसमें गर्व करनेका कारन वोही जाने) बड़े अभिमान के साथ अपने आप को सनातन धर्म के अनुयायी (मेरा मतलब संस्कृति से है न की आज जो पकडे जा रहे है उनसे) या हिन्दू हम बताते हैं, अहिंसा की बिलकुल पर्वा नहीं करते. हालाँकि महावीर और बुद्ध ( आपने बिलकुल सही महापुरुषों का उदहारण दिया है) इस भारतवर्ष शांति, अहिंसा प्रेम, करुणा आदि आदर्शों का प्रचार राजाश्रय के आधार पर किया. इस प्रश्न ने मुझे भी कई बार उलझन में डाला है. वैसे दो-ढाई हजार वर्ष का समय किसी ऊँचे संस्कृति को निचले स्तर पर ( अवनति)आने के लिये पर्याप्त हो सकता है, फिर भी हमारा धर्म और संस्कृति उसके अपने बल पर ही जीवित है, न की किसीने उसकी रक्षा की इसलिए. प्रकृति का नियम है की जिसमे जितना दम है वो चीज उतनी टिकती है. आजकल कुछ लोगों में धर्म की रक्षा करने की जाग्रति हुई है और अहिंसा को परम धर्म माननेवाला हमारा धर्म अभी कुछ रक्षकों के हाथों सुरक्षित रहेगा, जो इसकी सुरक्षा लिए दुसरे किसी धर्माचारी की हत्या करने को भी तैयार है. जिन लोगों की सरकार केंद्र में है, वे या तो हमारे धर्मं को सही समझते नहीं, या नहीं समझने का स्वांग करते है, या सत्ता टिकी रहनेके लिए कोकी भी क़ुरबानी देने की उनकी तयारी है. मेरे विचार से कलयुग के नाम पर इन बैटन को हमें स्वीकार करने के अलावा को पर्याय नहीं है.. धन्यवाद.
    (आप के .स्तर की हिंदी लिखने में मुझे कठिनाई होती हैं. मै कोशिश करता हूँ. लेकिन मुश्किल ही लगता है.. कृपया इसे सम्हाल लें, स्वीकार करें,और इसके आगे जो हिंदी मुझे आती है, मै लिख सकता हूँ, उसमें लिखने की अनुमति दें.)

    प्रतिक्रिया

    • योगेन्द्र जोशी
      जुलाई 16, 2017 @ 17:54:48

      अभिव्यक्ति प्रथम आवश्यकता होती है विचार-विनिमय में। अगर अपने मंतव्य की प्रस्तुति में तारतम्यता हो तो पाठक को विषय समझने में सुविधा होती है। मेरी दृष्टि में यह दूसरी आवश्यकता है। भाषा-शैली, आलंकारिकता, शब्दों का चयन तथा वर्तनी (स्पेलिंग) आदि उसके बाद आते हैं। अपनी भाषा में सुधार लाने हेतु जिस श्रम-समय की आवश्यकता होती है उसे खरचने की मंशा आज के युग में समाप्त-प्राय हो चली है। काम चलाने से मतलब।

      प्रतिक्रिया

  3. जीवनलाल
    जुलाई 16, 2017 @ 21:08:16

    मै आनंदित हूँ की इस विषय पर बादमें आपसे बात भी हुई. आखरी में कॉल में कुछ समस्या के कारण बात पूरी न हो सकी. आपसे बात होनेसे प्रसन्नता हुई. आमने सामने ( तांत्रिक प्रगति के बल पर) बात होने से भी काफी विचार सुनने को मिले. सेवा निवृत्ति के बाद की जिन्दगी जीने की राह पर जिस विश्वास / श्रद्धा से आपने बात की वो भी पसंद आई. ईश्वर की दुनिया बहुत ही सुन्दर है. इसमें बोअर होना कैसे? और ख़ुशी पाने के लिए और बातों को ढूँढने के चक्करमें हाथकी जिन्दगी खोने में भी क्या मतलब? ख़ुशी तो ढूँढनेसे नहीं मिलेगी, खुश होना होता है बस.. मै खुद भी इन विचारों को मानता हूँ. इस का श्रेय मै अपने SSY के गुरूजी को देना चाहूँगा. अपने आप में रहने की बड़ी बात आपने कही. आनंद हुवा. Intravert रहने से काफी सारा ज्ञान हमारे अंदर आते रहता है यह भी मै मानता हूँ. ( बाहरी दिखावे को महत्व देनेवाली इस दुनियामें बातूनी हिस्सा लेने में कोई मतलब भी नहीं है.) हमारे ज्ञानी पूर्वज जानते थे इसीलिए ऊन्होने मौन, ध्यान आदि बातों के बारेमे कह रखा है. लेकिन आज शो को महत्व देनेवाले इस पर कहाँ ध्यान देनेवाले है.? सभी के लिए मंगल की प्रार्थना… सर्वेत्र सुखिन: सन्तु..
    धन्यवाद एक बार फिर, आपने इस गरीब को याद करने के लिए.

    प्रतिक्रिया

  4. जीवनलाल
    जुलाई 17, 2017 @ 10:30:54

    नमस्कार,
    और कुछ ” अहिंसा” के बारे में नेट पर पढने आया है, उस की लिंक का नाम न भेजते हुए कॉपी निचे दे रहा हूँ ताकि आपको लिंक पर जाने का कष्ट न हो.: ( शायद रामायण में भी अहिंसा के बारेमे कुछ कहा गया है. भलेही हम अहिन्सा पर चलने में समर्थ हो न हो. लेकिन इस परम धर्म के बारे में खोज करने में कोई बात नहीं होनी चाहिए. ऐसेही ” श्रम प्रतिष्ठा ” ( जो लिओ टॉलस्टॉय ने अपने थी, बाद में गांधीजीने भी उसक अनुकरण किया ), के बारेमे भी आपके विचार / खोज का अभिलाषी हूँ,जानना चाहूँगा )
    ………………………………………………………………………………
    “अहिंसा परमो धर्मः”1

    अंतर्ध्यान – अंहिंसा क्या है ? अहिंसा का एक साधारण अर्थ जो हमें बताया जाता है – “हिंसा न करना” ही अहिंसा है | हिंसा नहीं करनी चाहिए क्योंकि हिंसा करना पाप है जबकि अहिंसा परम धर्म है | क्या सही में अहिंसा का वही अर्थ है जो हमें बताया जा रहा है, जो हमें सिखाया जा रहा है, जो हम सुनते आ रहे हैं | ये विचार मेरे दिमाग में इसलिए आया क्योंकि अगर अहिंसा ही परम धर्मं होता तो क्या कृष्ण जी ने पूरी गीता में अर्जुन को हथियार उठाने और युद्ध के लिए प्रेरित करके अधर्म किया था ? वो गलत था या हमारे समझने में कुछ फेर है ? क्योंकि अगर अहिंसा का अर्थ हिंसा न करना होता और अहिंसा ही परम धर्म होता तो क्या महाराणा प्रताप, महाराणा सांगा, शिवा जी, रानी लक्ष्मीबाई, ये सब अधर्मी थे क्या ? क्या अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए इन्होने जो युद्ध किये वो केवल अधर्म का ही अनुसरण था ?
    रामायण में कहा गया है –“जननी धर्म भूमिश्च, स्वर्गादपि गरीयसी”2, तो उस मातृभूमि की रक्षा के लिए जो हिंसा की जाए, वो अधर्म कैसे हो सकती है | जरूर कहीं कुछ गड़बड़ है, या तो गीता और रामायण गलत बता रहे हैं या फिर “अहिंसा परमो धर्मः” को समझने में कुछ भूल है | स्कन्द पुराण में लिखा है कि एक ब्राहमण भी यदि स्त्री रक्षा, गौ रक्षा और कुटुंब की रक्षा के लिए शस्त्र उठा ले और लड़ते लड़ते मारा जाए तो उसकी गति उन परम तपस्विओं के फल से भी कहीं अधिक होती हैं जो हजारों वर्षों से तपस्या कर रहे हैं |3
    मैंने जब और ढूँढा तो मैंने मनुस्मृति का वो श्लोक पढ़ा जिसमें धर्म के दस लक्षण बताये गए हैं –
    “धृति क्षमा दमोस्तेयं, शौचं इन्द्रियनिग्रहः । धीर्विद्या सत्यं अक्रोधो, दसकं धर्म लक्षणम “

    इसमें धर्म के दस लक्षण हैं पर कहीं भी अहिंसा नहीं है, हाँ, अक्रोध अवश्य है | पर अक्रोध और अहिंसा तो अलग अलग है |फिर अहिंसा परम धर्म कैसे हुआ ? क्या ये सारे शास्त्र, पुराण धर्म के बारे में कुछ गलत कह रहे हैं या हम अहिंसा को कुछ गलत समझ रहे हैं ? इन सारी बातों पर बहुत विचार करने पर एक निष्कर्ष निकला कि अहिंसा का अर्थ “हिंसा न करना” नहीं है अपितु अंहिंसा का जो संभव अर्थ हो सकता है – “अकारण हिंसा न करना” | किसी जीव को अकारण नुक्सान न पहुँचाना ही अहिंसा है, चाहे मानसिक हो या शारीरिक क्योंकि हिंसा मानसिक भी हो सकती है | हाँ, यदि आपके पास कारण है, यदि सामने कोई आताताई है, यदि कोई किसी स्त्री का शोषण कर रहा है, यदि कोई आपके कुटुंब पर आघात करता हो, यदि कोई आपकी मातृभूमि पर कब्ज़ा करने का प्रयास करता है तो हिंसा आवश्यक है और परम पुण्य की प्राप्ति कराने वाली है |
    समय के साथ बहुत सी बातें और बहुत सा ज्ञान विलुप्त हो रहा है, ऐसा इसलिए नहीं कि कलियुग है या फलाना है या ढिकाना है, वरन इसलिए क्योंकि हमने शब्दों के अर्थ बदल दिए हैं | हम शब्दों के अर्थों पर उतना मनन नहीं करते जितना आवश्यक है क्योंकि ये कार्य तो हमने विचारकों के लिए छोड़ दिया है | जो बाबा जी ने स्टेज पर से बता दिया वही सही है, क्यों सही है ? अरे देखो कितने लोग इनको follow करते है | ये क्या गलत कहेंगे ? इन्होने इतने शास्त्रों का अध्ययन किया है, ये क्या गलत बात बोलेंगे ? ये जो खुद की बुद्धि को प्रयोग न करने वाली जो प्रवुत्ति है, ये जो खुद को विचार न करने देने की प्रवृत्ति है, ये खतरनाक है | इसने ही धर्म का नाश किया है | आप केवल बाबाओं के lecture मत सुनिए, उनसे प्रश्न कीजिये | गुरु-शिष्य परम्परा कभी lecture वाली नहीं रही | उसमें शिष्य अपने अज्ञान को मिटाने के लिए अपने गुरु से विभिन्न प्रश्न करता है और गुरु उन प्रश्नों का समाधान करते हैं | आप भी प्रश्न कीजिये | पूछिए अपने गुरुओं से, बाबाओं से, डरिये मत कि लोग क्या कहेंगे ? कहने दीजिये लोग जो कहते हैं, यदि आप को सही में ज्ञान चाहिए तो आपको खड़े हो कर सवाल करने पड़ेंगे | चीजो को सही में समझना होगा | धर्म क्या है इसके अंत तक जाना पड़ेगा | यदि आप धर्म को सझते हैं तो आपका जीवन ऊर्ध्वगामी होगा अन्यथा जो बाबा जी कह रहे हैं उसे follow कीजिये और किसी भी बात को मान कर के उसे अपने जीवन में उतारिये | आप समझ रहे हैं कि आप धर्म कर रहे हैं, पुण्य कार्य कर रहे हैं किन्तु वास्तव में आपके जीवन में सिवाय कष्टों के कुछ नहीं है |
    इस बात को समझना होगा कि तिलक छापे लगाने वाला आवश्यक नहीं कि पंडित हो, पंडित का अर्थ तो है ग्यानी, जिसने वेद का, पुराणों का, शास्त्रों का अध्ययन किया हो और न केवल अध्ययन किया हो वरन अध्ययन के बाद चिंतन भी किया हो | हर कोई इतना अध्ययन नहीं कर सकता, इसलिए समाज में ब्राहमण की परिकल्पना की गयी जिसका कार्य केवल समाज में ज्ञान का प्रचार और प्रसार था (ब्राहमणों में कई टाइप होते थे, जिनमें सभी कार्य ज्ञान का प्रचार प्रसार नहीं होता था) | यदि आप को अपने जीवन में कोई कष्ट है, कोई समस्या है तो राह चलते किसी तिलक छापे वाले से मत पूछिए, किसी भी बाबा से मत पूछिए बल्कि अपने चारों ओर ऐसे व्यक्ति को ढूंढिए जो सही में ग्यानी हो | ऐसे व्यक्ति को, ऐसे गुरु को ढूंढना पड़ता है, वो आसानी से नहीं मिलते | वो तम्बू डेरा लगा कर भाषण देने नहीं आते | पहले खुद को शिष्य बनाना पड़ेगा, सौम्य बनाना पड़ेगा, ये मानना पड़ेगा कि जो मुझे जो आता है, जो मैंने सीखा है वो पूर्ण नहीं है क्योंकि जब तक आपका खुद का गिलास खाली नहीं होगा, तब तक उसमें और जल नहीं भरा जा सकता | जब आप ये मान लेंगे, गुरु आपको मिलेगा और जब तक आप ये नहीं मानेगे, यकीन मानिए वो आपके सामने आकर निकल जाएगा और आप अपने अहंकार में ही डूबे रहेंगे कि मैंने तो इतना अध्ययन किया है, मैंने तो गीता पढ़ी है, मैंने तो फलाने गुरु जी से ज्ञान प्राप्त किया है, मुझे तो सब पता है | जाने कितने पड़े हैं गीता पढने वाले, जाने कितने पड़े हैं पुराण पढने वाले जिन्हें पूरी पूरी गीता कंठस्थ है किन्तु वो रट्टू तोते से ज्यादा कुछ नहीं…. वो केवल शब्दों का अर्थ जानते हैं, बता सकते हैं कि कौन से पेज पर, कौन से श्लोक में, क्या लिखा है लेकिन ये ज्ञान नहीं है, ज्ञान तो बिना चिंतन के बिना मनन के आ ही नहीं सकता | आपको ऐसा चिंतन करना पड़ेगा | एक एक वाक्य पर, एक एक शब्द पर, आपके दिमाग में प्रश्न आयेंगे, आप उनका समाधान ढूंढिए, प्रश्न पूछिए अपने आप से, अपने गुरु से तभी आपको आगे का रास्ता साफ़ दिखाई देगा |
    आइये एक बार फिर से पढ़ते हैं –
    अहिंसा परमो धर्मः, अहिंसा परमो तपः।
    अहिंसा परमो सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते।
    अहिंसा परमो धर्मः, अहिंसा परमो दमः।
    अहिंसा परम दानं, अहिंसा परम तपः॥
    अहिंसा परम यज्ञः अहिंसा परमो फलम्‌।
    अहिंसा परमं मित्रः अहिंसा परमं सुखम्‌॥
    महाभारत/अनुशासन पर्व (११५-२३/११६-२८-२९)
    याद रखने वाली बात है अहिंसा का अर्थ है अकारण हिंसा न करना | जीव हत्या पाप है यदि अकारण हो किन्तु यदि वही जीव आप पर आक्रमण कर दे तो उसका वध करना ही उचित है | यदि कोई आपको या आपकी स्त्री को, कुटुंब को, गाय को और अन्यान्य प्राणियों को कष्ट पहुंचता है तो आपको भी हिंसा करनी पड़ेगी और उस समय वह धर्म होगा | बस आपकी ओर से हिंसा शुरू नहीं होनी चाहिए वो भी अकारण | तब ये अहिंसा ही धर्म बन जाती है |
    ॐ श्री गुरुवे नमः | ॐ श्री भैरवाय नमः | ॐ श्री पितृ चरण कमलेभ्यो नमः |

    Link: http://shastragyan.apsplacementpltd.in/?p=492

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