चाणक्य नीति – राजकर्मचारी राजा से कैसा व्यवहार करे (भाग १)

अपने समय (लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व) के कुशल एवं अप्रतिम राजनीतिज्ञ चाणक्य के नाम से शायद ही कोई अपरिचित होगा। राजनीति के क्षेत्र में चाणक्य इतने चर्चित रहे हैं कि आधुनिक काल में राजनीतिक सूझबूझ में माहिर नेता को चाणक्य कहा जाता है। चाणक्य का असल नाम विष्णुशर्मा था, लेकिन चणक पुत्र होने के नाते उन्हें चाणक्य के नाम से ही जाना जाता है। कदाचित् अपने को चणक-पुत्र के तौर पर ही संबोधित किया जाना उन्हें पसंद रहा होगा। राजनीति के खेल में निपुण होने और वस्तुस्थिति के अनुकूल निर्णय लेने और आवश्यकतानुसार कुटिलता के प्रयोग के कारण उन्हें कौटिल्य़ भी कहा जाता है। (ध्यान रहे कि राजनीति में साम, दाम, दंड एवं भेद ये चारों तौर-तरीके अपनाए जाते हैं।)

     चाणक्य की एक रचना “कौटिलीय” या “कौटिल्य” अर्थशास्त्र है जिसमें शासकीय व्यवस्था के सभी पहलुओं की चर्चा की गई है। इस ग्रंथ में राजा के और उसके प्रशासनिक तंत्र के अधिकारों एवं कर्तव्यों की विस्तृत चर्चा है। राजकीय शासन के सभी पक्षों जैसे अर्थतंत्र, न्यायिक व्यवस्था, जनहित के कार्य, जनता के अधिकारों एवं दायित्वों, आदि के विषय में ग्रंथकार ने अपना मत व्यक्त किया है।

इस ग्रंथ के विषयानुसार लिखित अधिकरणों में से एक में राजकर्मचारी के दायित्वों, राजा के प्रति शालीन व्यवहार, और राजा के रोष से बचने की सावधानी आदि की बातें बताई गई हैं(कौटिलीय अर्थशास्त्र, पंचम अधिकरण, अध्याय ४)। उक्त ग्रंथ में उपलब्ध छंदों (श्लोकों) के माध्यम से व्यक्त की गई नीतियों का उल्लेख मैं इस ब्लॉग के दो लेखों में कर रहा हूं। मेरे उद्धरण ग्रंथ की चौखंबा विद्याभवन द्वारा प्रकाशित प्रति पर आधारित हैं जिसमें छंदों के अर्थ हिन्दी में दिए गये हैं (कौटिलीय अर्थशास्त्र, संपादक: वाचस्पति गैरोला, प्रकाशक: चौखंबा विद्याभवन, वाराणसी, २००६)

(1)

अहीनकालं राजार्थं स्वार्थं प्रियहितैः सह ।

परार्थं देशकाले च ब्रूयाद्‍ धर्मार्थसंहितम् ॥

(राज-अर्थम् अहीन-कालम् प्रिय-हितैः सह स्व-अर्थम् देश-काले च पर-अर्थम् धर्म-अर्थ-संहितम् ब्रूयात्।)

राजा के महत्व की बात उसे अबिलंब बतानी चाहिए, अपने हित की बात राजा के प्रिय हितैषियों के माध्यम से कहनी चाहिए, दूसरों के मतलब की बात समुचित समय एवं स्थान (अवसर) देख के करनी चाहिए, ये सब करते समय धर्म एवं औचित्य को ध्यान में रखना चाहिए।

     इस श्लोक में सीधा संदेश दिया गया है कि राजकर्मचारी राजा के हित-अहित के प्रति सचेत रहे और तदनुसार व्यवहार करे। राजा को खुश करके अपने स्वार्थ-सिद्धि का प्रयास न करे। चाणक्य के अर्थशास्त्र में आरंभ से ही इस बात पर जोर डाला गया कि राजा कर्तव्यनिष्ठ हो और अपनी प्रजा के हितों के प्रति समर्पित हो। जो ऐसा न हो वह राजा बनने/रहने योग्य नहीं है। आज के युग में शासकीय तंत्र में जिस शीर्षस्थ व्यक्ति के अधीन कर्मचारी को कार्य करे वही राजा के तुल्य माना जा सकता है। जनता के हितों के प्रति उनका समर्पण कितना रहता है यह कहना कठिन है।

(2)

पृष्टः प्रियहितं ब्रूयान्न ब्रूयादहितं प्रियम् ।

अप्रियं वा हितं ब्रूयाच्छृण्वतोऽनुमतो मिथः ॥

(पृष्टः प्रिय-हितम् ब्रूयात्, अहितम् प्रियम् न ब्रूयात्, अप्रियम् हितम् वा ब्रूयात्, मिथः शृण्वतः अनुमत: ।)

पूछे जाने और अनुमति मिलने पर प्रिय एवं हितकर बातें राजा से कहनी चाहिए, जो राजा को प्रिय लगे किंतु अहितकर हो वैसी बात नहीं कहनी चाहिए। इसके विपरीत अप्रिय हो किंतु हितकर हो तो वह बात कह देनी चाहिए।

     संस्कृत ग्रंथों में अधोलिखित नीतिवचन पड़ने को मिलता है:

“सत्यं ब्रुयात् प्रियं ब्रुयाद्‍ न ब्रुयात् सत्यमप्रियम्। प्रियं च नानृतं ब्रुयाद्‍ एष धर्मः सनातनः॥”

     यह श्लोक व्यापक सामाजिक संदर्भ में सभ्य-सुसंस्कृत नागरिकों के कर्तव्य का निर्धारण करता है, जब कि कमोबेश इसी अर्थ में उपर्युक्त श्लोक राजा के प्रति कर्मचारी के संयत व्यवहार के सीमित संदर्भ में ग्रंथकार चाणक्य ने कही है।

यहां प्रस्तुत श्लोकों के अर्थ कौटिलीय अर्थशास्त्र की उपर्युल्लिखित प्रति पर आधारित है। लिखने की शैली मेरी है। मेरा संस्कृत ज्ञान सामान्य एवं अपने स्वाध्याय पर आधारित है, इसलिए मैं कहीं-कहीं त्रुटि कर जाऊं तो आश्चर्य नहीं। ऊपर लिखित २रे श्लोक के चतुर्थ चरण “शृण्वतोऽनुमतो मिथः” का अर्थ मैं यह लगाना चाहूंगा: “राजा सुनने को उद्यत हो तथा कहने की अनुमति देता हो तो मिथ्या समाचार (अफवाह) का जिक्र कर सकता है।”

(3)

तूष्णीं वा प्रतिवाक्ये स्याद्‍ द्वेष्यादींश्च न वर्णयेत् ।

अप्रिया अपि दक्षाः स्युस्तद्भावाद्‍ ये बहिष्कृताः ॥

(प्रति-वाक्ये तूष्णीम् वा स्यात्, द्वेष्य-आदींन् च न वर्णयेत्, दक्षाः अपि अप्रिया: स्युः ये तत् भावाद्‍ बहिः-कृताः।)

राजा से बात करते समय (असहमति का) प्रत्युत्तर सुनना पड़े तो चुप रहना चाहिए, राजा से द्वेष रखने वालों से संबंध न रखे, राजा के मनोभावों के अनुसार न चलने वाले कार्यकुशल लोग भी बाहर कर दिए जाते हैं।

     राजनीति के अद्वितीय खिलाड़ी चाण्क्य इस बात को गंभीरता से लेने की सलाह देते हैं कि राजा क्या पसंद करेगा क्या नहीं की समझ राज्यकर्मी को होनी चाहिए दायित्व-निर्वाह में कुशल व्यक्ति से भी राजा नाखुश हो सकता है इस बात को उसे ध्यान में रखना चाहिए। इस श्लोक में “द्वेष्यादींन् च न वर्णयेत्” का अर्थ मैं इस प्रकार लगाना चाहूंगा:, “राजा से द्वेष रखने वालों का जिक्र राजा से नहीं करना चाहिए”। अथवा द्वेष्यादि संकेत राजा के दोषों से तो नहीं यह प्रश्न मेरे मन में है !

अगली ब्लॉग-प्रविष्टि में इस विषय के शेष चार छंदों और उन पर टिप्पणी का उल्लेख किया जाएगा। – योगेन्द्र जोशी