चाणक्य नीति – राजकर्मचारी राजा से कैसा व्यवहार करे (भाग २)

     दो लेखों की शृंखला का यह मेरा दूसरा लेख है। मैंने पिछले एवं शृंखला के पहले लेख में चाणक्य, जिन्हें कौटिल्य के नाम से भी जाना है, के ग्रंथ “कौटिलीय अर्थशास्त्र” का जिक्र किया था जिसमें राजा के और उसके प्रशासनिक तंत्र की कार्य-प्रणाली की विस्तृत चर्चा की गयी है। शासन के विभिन्न पहलुओं जैसे आर्थिक तंत्र, न्यायिक व्यवस्था, लोक-कल्याण, प्रजा के अधिकार एवं दायित्व, आदि के विषय पर ग्रंथकार ने एक निष्ठावान राजनीतिज्ञ के तौर पर अपना मत व्यक्त किया है।

     इस ग्रंथ के विषयानुसार लिखित अधिकरणों में से एक में राजकर्मचारी के दायित्वों, राजा के प्रति शालीन व्यवहार, और राजा के रोष से बचने की सावधानी आदि की बातें बताई गई हैं (कौटिलीय अर्थशास्त्र, अधिकरण ५, अध्याय ४)। उक्त ग्रंथ के संबंधित ३ छंदों (श्लोकों) का उल्लेख मैं पिछले ब्लॉग-लेख (१९ अक्टूबर) में कर चुका हूं। शेष ४ चार श्लोक यहां पर प्रस्तुत किये जा रहे हैं। मेरे उद्धरण उक्त ग्रंथ की चौखंबा विद्याभवन द्वारा प्रकाशित प्रति पर आधारित हैं जिसमें छंदों के अर्थ हिन्दी में दिए गये हैं (कौटिलीय अर्थशास्त्र, संपादक: वाचस्पति गैरोला, प्रकाशक: चौखंबा विद्याभवन, वाराणसी, २००६) ।

(४)

अनर्थ्याश्च प्रिया दृष्टाश्चित्तज्ञानानुवर्तिनः ।

अभिहास्येष्वभिहसेद्‍ घोरहासांश्च वर्जयेत्‍ ॥

(चित्त-ज्ञान-अनुवर्तिनः अन्-अर्थ्याः च प्रियाः दृष्टाः, अभिहास्येषु अभिहसेत्, घोर-हासान् च वर्जयेत्।)

यह देखने में आता है कि राजा क्या चाहता है इस बात की समझ रखने वाले अनर्थकारी जन भी राजा के प्रिय बन बैठते हैं। राज्यकर्मी को चाहिए कि राजा की हास्य की बातों पर स्वयं भी हंस देना चाहिए, किंतु जोर-जोर से (ठहाका मारते हुए) हंसने से बचना चाहिए।

     यह श्लोक वस्तुतः बताता है कि चाटुकारिता उस व्यक्ति को भी राजा का प्रिय बना देता जो उसका वास्तविक हितैषी न हो। चाटुकारिता एक कला है, जिसमें हर कोई निपुण नहीं हो सकता है। समाज में ऐसे लोग मिल जाते हैं जो मीठा बोलने में माहिर होते हैं, लेकिन मौका मिलने पर धोखा दे जाते हैं। ग्रंथकार की राज्यकर्मी को यह सलाह है कि इस संभावना को स्वीकारते हुए वह अपना व्यवहार निश्चित करे।

(५)

परात् संक्रामयेद्‍ घोरं न च घोरं स्वयं वदेत् ।

तितिक्षेतात्मनश्चैव क्षमावान् पृथ्वीसमः ॥

(घोरम् परात् संक्रामयेद्‍, घोरम् च न स्वयम् वदेत्, आत्मन: च एव पृथ्वी-समः क्षमावान् तितिक्षेत् )

राज्यकर्मी को चाहिए कि अनिष्ट-द्योतक भयप्रद बात को किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से (यानी परोक्ष रूप से) राजा तक पहुंचाए न कि उसे सीधे स्वयं ही कह डाले। राजा के ज्ञान में बात के आने पर यदि प्रतिकूल परिस्थिति उत्पन्न हो जाए तो स्वयं पृथ्वी की तरह क्षमाशील होकर परिणाम सह जावे।

     उपर्युक्त की मैं यों व्याख्या करता हूं: परोक्ष तौर पर अप्रिय समाचार पाने पर कोई व्यक्ति उस पर शंका करके वास्तविकता का सामना करने को मानसिक तौर पर तैयार हो जाता है। किंतु यदि वास्तविकता को प्रत्यक्षतः जानने वाला सीधे सामने पहुंचकर उसका बखान करे तो उससे उसे गंभीर धक्का लग सकता है।

(६)

आत्मरक्षा हि सततं पूर्वं कार्या विजानता ।

अग्नाविव हि सम्प्रोक्ता वृत्ती राजोपजीविनाम्‍ ॥

(अग्नौ इव हि सम्प्रोक्ता: वृत्तीः राज-उपजीविनाम्, विजानता पूर्वम् सततम् हि आत्म-रक्षा कार्या ।)

समझदार राज्यकर्मी को चाहिए कि वह राजा के रोष से अपने बचाव के लिए निरंतर तैयार रहे। राज्य पर आश्रित राज्यकर्मी की जीवनवृत्ति को अग्नि में पड़ने के समान कहा गया है, यानी राजा कब किस बात पर नाखुश हो जाए यह अनिश्चित रहता है।

     अगले श्लोक में उक्त बात को अधिक स्पष्ट किया गया है।

(७)

एकदेशं दहेदग्निः शरीरं वा परङ्गतः ।

सपुत्रदारं राजा तु घातयेद्‍ वर्धयेत वा ॥

(एक-देशम् दहेत् अग्निः, राजा तु शरीरम् स-पुत्र-दारम् घातयेद्‍ वर्धयेत वा ।)

अग्नि तो शरीर का कोई एक हिस्सा या पूरा शरीर ही जलाता है। किंतु राजा पत्नी एवं संतान समेत राज्यकर्मी को नष्ट कर सकता है या उसको आगे बढ़ा सकता है।

     यदि राजा क्रोधित हो जाए तो राज्य़कर्मी को ही नहीं उसके पूरे परिवार का अनिष्ट कर सकता है और यदि वह प्रसन्न  हो जाये तो पुरस्कृत कर सकता है या अन्य प्रकार से भला कर सकता है।

     इन श्लोकों का संदेश यही है कि राज्यकर्मी को राजा के मन में क्या है यह जानने-समझने का प्रयास करना चाहिए और उसी के अनुसार उसके प्रति व्यवहार करना चाहिए। उसे राजा की नाखुशी के प्रति सचेत रहना चाहिए। जहां तक चाटुकारिता का प्रश्न है लगता है यह सदा से ही मानव समाज में रहा है। प्राचीन काल में यह अपेक्षया कम रहा होगा ऐसा मेरा मानना है। आधुनिक जीवन में यह शायद अधिक ही है क्योंकि भौतिक उपलब्धियां ही आधुनिकता में महत्व रखती हैं। उसे पाने के लिए शक्तिसंपन्न लोगों को खुश करने की जरूरत होती है। धर्म-कर्म, पाप-पुण्य, स्वर्ग-नर्क आदि अहमियत खो चुके हैं। – योगेन्द्र जोशी

 

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  1. योगेन्द्र जोशी
    नवम्बर 02, 2019 @ 00:32:10

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