ईशवास्योपनिषद्‍ का दर्शन – परमात्मा विविध प्राणियों के रूप में स्वयं को प्रकट करता है

ईशावास्योपनिषद्‍ ग्यारह प्रमुख उपनिषदों में से एक है। यह बहुत ही छोटा ग्रंथ है, मात्र १८ मंत्रों का संकलन। दरअसल यह शुक्लयजुर्वेद का ४०वां एवं अंतिम अध्याय है और उस वेद का दार्शनिक पक्ष सार रूप में प्रस्तुत करता है।

मैं यहां पर उक्त उपनिषद्‍ के ६ठे एवं ७वें मंत्र का उल्लेख कर रहा हूं जिनमें परमात्मा की व्यापकता की बात की गयी है और यह बताया गया है वही परमात्मा स्वयं को समस्त प्राणियों के रूप में प्रकट करता है। जो मोक्षार्थी इस सत्य को आत्मसात् कर लेता है वह सभी प्रणियों में स्वयं की आत्मा को देखता है। उक्त मंत्र ये हैं –

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।

सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥६॥

(यः तु सर्वाणि भूतानि आत्मनि एव अनुपश्यति सर्व-भूतेषु च आत्मानम् ततः न वि-जुगुप्सते ।)

यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः ।

तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥७॥

(यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मा एव अभूत् वि-जानतः तत्र कः मोहः कः शोक: एकत्वम् अनुपश्यतः ।)

इन मंत्रों में जो “आत्मन्” शब्द विद्यमान है उसकी व्याख्या कुछ विद्वानों ने परमात्मन् के पर्याय के तौर पर की है तो कुछ अन्य ने प्राणियों की, विशेषतः मनुष्य की, आत्मा के तौर पर। संयोग से मेरे पास पांच व्यख्याएं उपलब्ध हैं, जिनमें ऊपरी तौर पर न्यूनाधिक शाब्दिक अंतर दिखता है किन्तु जिनका सार एक ही है। ये व्याख्याएं यों हैं –

(१) शुक्लयजुर्वेद (प्रकाशक पांडुरंग जावजी, बंबई, १९२९) में वर्णित श्रीमद्‍ उवटाचार्य के एवं श्रीमन्महीधर के भाष्य;

(२) आदिशंकराचार्यकृत भाष्य (गीताप्रेस, गोरखपुर, संवत् २०२४);

(३) भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद की टीका (भक्तिवेदांत बुक ट्रस्ट, मुंबई, २००६) एवं

(४) कल्याण उपनिषद्‍ अंक (गीताप्रेस, गोरखपुर, संवत्, २०५२)।

उक्त मंत्रों का शब्दार्थ क्रमशः कुछ यों दिया जा सकता है:

जो निःसंदेह सभी प्राणियों को अपनी आत्मा (या परमात्मा) में देखता है, और सभी प्राणियों में स्वयं की आत्मा (या परमात्मा) का दर्शन पाता है, वह किसी से घृणा नहीं करता ॥६॥

जिस अवस्था में आत्मा (या परमात्मा) ही सभी प्राणियों के रूप में प्रकटित हुआ है ऐसा ज्ञान किसी व्यक्ति को प्राप्त हो जाता है, सर्वत्र एकत्व देख रहे उस व्यक्ति के लिए न कोई मोह और न ही शोक रह जाता है॥७॥

प्राचीन काल के वैदिक दार्शनिकों की मान्यता थी कि समस्त चराचर जगत उसी एक परब्रह्म अथवा परमात्मा के स्वयं को बहु-रूपों में प्रकट करने का परिणाम है। दूसरे शब्दों में सभी प्राणी उसी के अंश हैं जो उसी के बनाये (?) मायाजाल में अपने मूल स्वरूप को भूले रहते हैं। मानव जीवन सृष्टि के इस सत्य के साक्षात्कार का एक साधन है। (जीवों की) आत्मा एवं परमात्मा के बीच कुछ वैसा ही संबंध जैसे जलभंडार समुद्र और उससे अलग हुई जल की बूंद के बीच।

उक्त मंत्रद्वय के अनुसार ज्ञानी पुरुष अपनी आत्मा का परमात्मा के साथ एकत्वभाव अनुभव करने में सफल रहता है। अर्थात् उसे यह ज्ञान हो जाता है कि समस्त प्राणी परमात्मा के अंश हैं: “मैं ही वह परमात्मा हूं और फंला प्राणी भी वही परमात्मा है। तब फंला प्राणी से घृणा, परहेज या विद्वेष कैसा? घृणा करना अपने आप से घृणा करना नहीं हो जाएगा?” इस प्रकार का चिंतन मोक्ष की दिशा में बढ़ रहे व्यक्ति के आचरण का हिस्सा बन जाता है। ऐसी अवस्था में लगाव और विलगाव की कोई सार्थकता नहीं रह जाती है। उक्त दूसरे मंत्र में एकत्व भाव के कारण किसी के प्रति मोह अथवा शोक मोक्षार्थी को नहीं हो सकता है।

ऊपर मैंने मोक्षार्थी शब्द का प्रयोग किया है क्योंकि आम जन सांसारिक क्रियाकलापों में उलझे रहते हैं। अध्यात्म की दिशा में आगे बढ़ने और ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने का विचार उनके मन में उठता ही नहीं। उस स्थिति में उनके लिए उपर्युक्त दार्शनिक बातें कितनी सार्थक अथवा निरर्थक रहती हैं यह प्रश्न भी बेमानी हो जाता है। इसलिए अध्यात्म की दिशा में अग्रसर मोक्षार्थी के लिए ही इन बातों का  महत्व है। (मोक्ष = जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर अपने मूल स्वरूप सत्-चित्-आनंद परब्रह्म को प्राप्त करना।) – योगेन्द्र जोशी

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अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्ठो … – आत्मा की व्यापकता पर कठोपनिषद्‍ के वचन

वेदों का आरंभिक एवं अधिकांश भाग देवी-देवताओं की प्रार्थनाओं और कर्मकांडों के लिए प्रयुक्त मंत्रों से संबंधित मिलता है। इसके अतिरिक्त उनमें मनुष्य के ऐहिक (लौकिक) जीवन के कर्तव्याकर्तव्यों का भी उल्लेख देखने को मिलता है। उनका दार्शनिक पक्ष भी है। तत्संबंधित अध्यात्मिक ज्ञान जिन ग्रंथों के रूप में संकलित हैं उन्हें उपनिषदों के नाम से जाना जाता है।

उपनिषदों की कुल संख्या कितनी है यह मैं ठीक-से नहीं जान पाया हूं। मेरे पास गीताप्रेस, गोरखपुर, का एक विशेषांक – उपनिषद्‍ अंक – है जिसमें ५४ उपनिषदों की विस्तृत अथवा संक्षिप्त चर्चा की गई है। मेरी जानकारी के अनुसार इनमें से ११ उपनिषद्‍ मुख्य माने जाते है और उन्हीं की चर्चा अक्सर होती है। ये है (अकारादि क्रम से):

(१) ईशावास्योपनिषद्‍ (या ईशोपनिषद्‍)

(२) ऐतरेयोपनिषद्‍

(३) कठोपनिषद्‍

(४) केनोपनिषद्‍

(५) छान्दोग्योपनिषद्‍

(६) तैत्तरीयोपनिषद्‍

(७) प्रश्नोपनिषद्‍

(८) माण्डूक्योपनिषद्‍

(९) मुण्डकोपनिषद्‍

(१०) वृहदारण्यकोपनिषद्‍

(११) श्वेताश्वरोपनिषद्‍

इनमें वृहदारण्यक एवं छान्दोग्य उपनिषद्‍ सबसे बड़े हैं। उपर्युक्त उपनिषदों में परब्रह्म अथवा परमात्मा एवं सृष्टि की रचना की व्याख्या अपने-अपने तरीके से की गयी है।

कठोपनिषद्‍ के अध्याय २, वल्ली २, मैं मुझे ३ मंत्र पढ़ने को मिले जो परमात्मा की व्यापकता को अग्नि, वायु एवं सूर्य की उपमा के माध्यम से स्पष्ट करते हैं। ये मंत्र हैं:

अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्ठो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥९॥

(अग्निः यथा एकः भुवनम् प्रविष्ठः रूपम् रूपम् प्रतिरूपः बभूव तथा एकः सर्व-भूत-अन्तः-आत्मा रूपम् रूपम् प्रतिरूपः बहिः च।)

जिस प्रकार एक ही अग्नि इस संसार में अदृश्य रूप से प्रवेश करते हुए जिस किसी वस्तु में प्रज्वलित होती है और उसी के अनुरूप दृश्यमान्‍ होती है, उसी प्रकार सभी प्राणियों में विद्यमान्‍ परमात्मा (अदृश्य) एक ही होते हुए जिसमें प्रविष्ट होता है उसी के अनुसार रूप धारण कर लेता है और उनसे बाहर भी रहता है ।

वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्ठो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥१०॥

(वायुः यथा एकः भुवनम् प्रविष्ठः रूपम् रूपम् प्रतिरूपः बभूव तथा एकः सर्व-भूत-अन्तःर्‍-आत्मा रूपम् रूपम् प्रतिरूपः बहि: च।

जिस प्रकार एक ही वायु संसार में प्रवेश करते हुए जिस किसी वस्तु में समाहित होती है उसी के अनुरूप रूप धारण कर लेती है, उसी प्रकार सभी प्राणियों में विद्यमान् परमात्मा (अदृश्य) एक ही होते हुए जिस वस्तु में प्रविष्ट होता है उसी के अनुसार रूप धारण कर लेता है और उनसे बाहर भी रहता है।

सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोक-दुःखेन बाह्यः ॥११॥

(सूर्यः यथा सर्व-लोकस्य चक्षुः न लिप्यते चाक्षुषैः बाह्य-दोषैः तथा एकः सर्व-भूत-अन्तःर्‍-आत्मा न लिप्यते लोक-दुःखेन बाह्य: ।)

जिस प्रकार एक ही सूर्य संसार का चक्षु (प्रकाशक) बनते हुए प्राणियों के चक्षु-संबंधी बाह्य-दोषों से मुक्त रहता है, उसी प्रकार सभी प्राणियों में विद्यमान्‍ एक ही परमात्मा संसार के दुःखों से निर्लिप्त रहता है और उनसे बाहर भी रहता है।

ऊपर के प्रथम दो श्लोकों में वस्तुतः एक ही बात दो प्रकार से कही गई है। इन उपमाओं की व्याख्या शब्दशः करना कोई माने नहीं रखता। यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि आध्यात्मिक दर्शन की प्रस्तुति सृष्टि के अमूर्त पक्ष के स्वरूप को समझने/समझाने का एक अपूर्ण प्रयास भर होता है। इस संदर्भ में यह स्वीकारा जाना चाहिए कि वैदान्तिक दर्शन विश्व में प्रचलित अन्य दर्शनों से अधिक पेचीदा है। परमात्मा और जीवात्मा के संबंध को दर्शाने के लिए भौतिक संसार के ही दृश्य दृष्टान्तों का सहारा लिया जाता है, जो स्वयं में नाकाफी प्रयास है।

यहां पर यह बताना समीचीन होगा कि इस प्रकार की मिलती-जुलती बात “माण्डूक्य उपनिषद्” में भी कही गई है [आत्मा ह्याकाशवज्जीवैर्घटाकाशैरिवोदितः … (अद्वैतप्रकरण, ३, ४)], जिसकी चर्चा मैंने अपनी एक पोस्ट में कुछ वर्ष पहले की थी (देखें 2009/04/25 की पोस्ट)।

तीसरा श्लोक वस्तुस्थिति के एक अलग पक्ष का स्पष्टीकरण प्रस्तुत करता है। यह बताता है कि परमात्मा उस सूर्य के समान है जो संसार को प्रकाशित करता है और प्राणियों को वस्तुओं के दर्शन कराता है। प्राणियों की अनुभूतियों में विविधता रहती है। उन्हें भांति-भांति के गुण-दोष अपने परिवेश में दिखते हैं। लेकिन स्वयं सूर्य उन गुण-दोषों से परे रहता है। ये गुण-दोष हमारे सुख-दुःखों के कारण होते हैं जो सबके लिए अलग-अलग रहते हैं, किंतु वह सूर्य सभी से मुक्त रहता है। अर्थात्‍ जीवात्माओं की अनुभूतियों से परमात्मा पूर्णतः निर्लिप्त रहता है।

वैदिक चिंतक यह मानते हैं कि आत्मा परमात्मा का ही अंश है लेकिन वह अपने परमात्मात्मक स्वरूप को भूल चुकती है। कुछ दार्शनिक इसको माया मानते हैं जो कदाचित् परमात्मा का ही खेल है।

मैं वैदिक दर्शन को ठीक-से नहीं समझ पाता। जो कुछ कहा जाता है वह शब्दमात्र होते हैं। वे जिस गूढ़ रहस्य की ओर संकेत करते हैं उसे समझने के प्रयास सबके भिन्न-भिन्न होते हैं। बहुतों के लिए वह बेमानी होते हैं क्योंकि उनकी सांसारिक कार्यों के संपादन में कोई महत्ता नहीं होती। – योगेन्द्र जोशी

“क: त्वम् कः अहम् कुतः आयातः …” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् – ५

इस चिट्ठे के छ: आलेखों की शृंखला की यह मेरी पांचवी प्रविष्टि है। ध्यान रहे कि इन आलेखों में आदिशंकराचार्य द्वारा विरचित “चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्” के १८ छंदों की चर्चा की जा रही है। (देखें इसका पूर्ववर्ती आलेख, दिनांक ७ मार्च, २०१७)

पहले आलेख में इस बात का उल्लेख किया था कि इस रचना में कुल सत्रह छंद हैं और उनके अतिरिक्त एक स्थायी छंद (भज गोविन्दं भज गोविन्दं …) भी है जो इनमें से प्रत्येक छंद के बाद प्रयुक्त हुआ है। यदि उक्त स्तोत्र को भजन के तौर पर गाया जाये तो यह छंद प्रत्येक के बाद गाया जायेगा। इसकी भूमिका गायन के स्थायी के समान है। इसे आगे उद्धृत किया जा रहा है:

[

भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ् करणे ॥

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब तुम्हारा मरणकाल पास आ जायेगा तब यह “डुकृञ् करणे” की रट तुम्हें नहीं बचाएगी। “डुकृञ्” संस्कृत व्याकरण की एक क्रियाधातु है जिसका अर्थ “(कर्वव्य) करना” है। इस क्रियाधातु का व्यवहार में प्रयोग सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। अर्थात्‍ इस पर बहुत दिमाग खपाना कुछ हद तक निरर्थक है। व्याकरण के अध्येता उक्त क्रियाधातु के अर्थ एवं प्रयोजन को याद रखने के लिए “डुकृञ् करणे” रटते होंगे जिसका तात्पर्य है “डुकृञ्” क्रिया “करण” (कार्य करना) के प्रयोजन में लिया जाता है । स्तोत्र के रचनाकार की दृष्टि में जीवन के अंतकाल तक सांसारिक कार्यों में ही निरंतर लिप्त रहना फलदायक नहीं है यह भाव “डुकृञ् करणे” के रटने में प्रतिबिंबित होता है।  “अब तो इस रट को छोड़ो और ईश्वर-प्रार्थना में संलग्न होओ।”

]

चिट्ठे की मौजूदा प्रविष्टि में चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् के तीन छंद क्रमशः १२, १३, एवं १४ प्रस्तुत किये जा रहे हैं । इनमें पहला छंद है:

कस्त्वं कोऽहं कुतः आयातः का मे जननी को मे तातः ।

इति परिभावय सर्वमसारं विश्वं त्यक्त्वा स्वप्नविचारम् ॥१२॥ भज …

(सर्वम् असारम् स्वप्न-विचारम् विश्वंम् त्यक्त्वा त्वम् कः, अहम्  कः कुतः आयातः, मे जननी का, मे तातः कः इति परि-भावय ।)

अर्थ – इस सारहीन स्वप्नसदृश संसार में रुचि त्यागते हुए तुम कौन हो, मैं कौन हूं, कहां से आया, कौन मेरी जन्मदात्री, कौन मेरे पिता, इन बातों पर चिंतन करो।

वैदिक दर्शन के अनुसार यह संसार एक दीर्घकालिक स्वप्न से अधिक कुछ नहीं। जब मनुष्य को परमात्म तत्व का ज्ञान हो जाता है तो संसार के सारहीन, मिथ्या अर्थात्‍ अंततः सत्य से परे होने की अनुभूति हो जाती है। तब सभी रिश्ते-नाते अर्थहीन हो जाते हैं।

गेयं गीतानामसहस्रं ध्येयं श्रीपतिरूपमजस्रम् ।

नेयं सज्जनसङ्गे चित्तं देयं दीनजनाय च वित्तम् ॥१३॥ भज …

(गीता-नाम-सहस्रम् गेयम् , अजस्रम् श्री-पति-रूपम् ध्येयंम्, सज्जन-सङ्गे चित्तम्  नेयम् दीन-जनाय च वित्तम् देयम्‍ ।)

अर्थ – भगवद्गीता और विष्णुसहस्रनाम का पाठ करना चाहिए, भगवान्‍ विष्णु के रूप का निरंतर ध्यान करना चाहिए, अपना चित्त सज्जनों की संगत में लगाना चाहिए, और दीनहीन जनों को धन-दान करना चाहिए।

इस छंद में ईश्वरभक्ति और सत्कार्यों में मन लगाने का उपदेश दिया गया है।

यावज्जीवो निवसति देहे कुशलं तावत्पृच्छति गेहे ।

गतवति वायौ देहापाये भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये ॥१४॥ भज …

(जीवः यावत् देहे निवसति तावत् गेहे कुशलम्  पृच्छति, देह-अपाये वायौ गतवति तस्मिन्  काये भार्या बिभ्यति ।)

अर्थ – जब तक जीवधारी (संदर्भ में मनुष्य) शरीर में रहता है तब तक हर कोई घर में कुशलक्षेम पूछता है। शरीर के गिरने और प्राणवायु के निकलने पर उस शरीर से पत्नी तक डर जाती है।

     मनुष्य से किसी का भी लगाव तभी तक रहता है जब तक उसके शरीर में प्राण रहते है। जैसे ही काल-कलवित होकर वह निष्प्राण हो जाता है उससे सभी विरत होने लगते है। जिस पत्नी से आजीवन उसके अंतरंग संबंध रहे हों वह तक उस शरीर से दूर हो जाती है। यही इस जीवन का सच है। इन छंदों से यह संदेश मिलता है कि जब संसार को त्यागना ही होता है, तब क्यों न जीवितावस्था में ही उससे मोह त्यागते हुए ईश्वरप्राप्ति के प्रयास किए जाएं। – योगेन्द्र जोशी

“अङ्गम् गलितम् पलितम् मुण्डम् …” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् – ३

इस चिट्ठे के छ: आलेखों की शृंखला की यह मेरी तीसरी प्रविष्टि है। याद दिला दूं कि इन आलेखों में आदिशंकराचार्य द्वारा विरचित “चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्” के १८ छंदों की चर्चा की जा रही है। (देखें दिनांक ६ जनवरी, २०१७, का आलेख)

पहले आलेख में इस बात का उल्लेख किया था कि इस रचना में कुल सत्रह छंद हैं और उनके अतिरिक्त एक स्थायी छंद (भज गोविन्दं भज गोविन्दं …) भी है जो इनमें से प्रत्येक छंद के बाद प्रयुक्त हुआ है। यदि उक्त स्तोत्र को भजन के तौर पर गाया जाये तो यह छंद प्रत्येक के बाद गाया जायेगा। इसकी भूमिका गायन के स्थायी के समान है।

[

भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ्करणे ॥

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब तुम्हारा मरणकाल पास आ जायेगा तब यह “डुकृञ्  करणे” की रट तुम्हें नहीं बचाएगी। “डुकृञ्” संस्कृत व्याकरण की एक क्रियाधातु है जिसका अर्थ “(कर्वव्य) करना” है। इस क्रियाधातु का व्यवहार में प्रयोग सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। अर्थात् इस पर बहुत दिमाग खपाना कुछ हद तक निरर्थक है। व्याकरण के अध्येता उक्त क्रियाधातु के अर्थ एवं प्रयोजन को याद रखने के लिए “डुकृञ्‍करणे” रटते होंगे जिसका तात्पर्य है “डुकृञ्” क्रिया “करण” (कार्य करना) के प्रयोजन में लिया जाता है । स्तोत्र के रचनाकार की दृष्टि में जीवन के अंतकाल तक सांसारिक कार्यों में ही निरंतर लिप्त रहना फलदायक नहीं है यह भाव “डुकृञ्‍करणे” के रटने में प्रतिबिंबित होता है।  “अब तो इस रट को छोड़ो और ईश्वर-प्रार्थना में संलग्न होओ।”

]

चिट्ठे की इस प्रविष्टि में चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् के तीन छंद (क्रमिकता में ६, ७, एवं ८) प्रस्तुत किये जा रहे हैं । इनमें पहला छंद है:

अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम् ।

वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशा पिण्डम्॥६॥ [भज …]

(अङ्गम् गलितम् पलितम् मुण्डम् दशन-विहीनम् जातम् तुण्डम् वृद्ध: याति गृहीत्वा दण्डम् तत्+अपि न मुञ्चति आशा-पिण्डम्।)

अर्थ –  (वृद्धावस्था में) अंग गलित (या ढीले, निष्क्रिय) हो चुकते हैं, शिर के बाल पक जाते हैं, मुख दंतविहीन हो जाता है। इस अवस्था को प्राप्त बूढ़ा व्यक्ति लाठी ले के चलता है। इतने सब के बावजूद जीवन की आशा पिंड नहीं छोड़ती।

बालस्तावत्क्रीडासक्तस्तरुणस्तावत्तरुणीरक्तः ।

वृद्धस्तावच्चिन्तामग्नः पारे ब्रह्मणि कोऽपि न लग्नः ॥७॥ [भज …]

(बाल: तावत् क्रीडा-आसक्तः तरुण: तावत् तरुणी-रक्तः वृद्ध: तावत् चिन्ता-मग्नः पारे ब्रह्मणि कः अपि न लग्नः।)

अर्थ –  (मनुष्य) बाल्यावस्था में खेलकूद में लगा रहता है, वयस्क होने पर तरुणी (स्त्री अथवा पत्नी) में आसक्त रहता है, और वृद्ध हो जाने पर तमाम चिंताओं से ग्रस्त रहता है। (विडंबना है) कि परब्रह्म (के चिंतन) में कभी संलिप्त नहीं होता है।

पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् ।

इह संसारे खलु दुस्तारे कृपयापारे पाहि मुरारे ॥८॥ [भज …]

(पुनः अपि जननम् पुनः अपि मरणम् पुनः अपि जननी-जठरे शयनम् इह संसारे खलु दुः-तारे कृपया अपारे पाहि मुरारे।)

अर्थ –  (इस संसार में मनुष्य का) पुनःपुनः जन्म होता और वह फिर-फिर मृत्यु को प्राप्त होता है। बारबार जन्मदात्री मां के गर्भ में पड़े रहने  का कष्ट भोगता है। हे भगवान मुरारे, इस दुस्तरणीय (जिसके पार जाया न जा सके) संसार से कृपा करके मुझे पार कर दो।

इन तीनों छंदों के पहले में वृद्धवस्था का वर्णन किया गया। मनुष्य की स्थिति कारुणिक हो जाती है। तिस पर भी उसकी जीने की लालसा और कष्टों से मुक्ति की आशा समाप्त नहीं होती। दूसरे छंद में ग्रंथरचयिता कहता है कि जीवन के अलग-अलग कालखंडों में मनुष्य की गतिविधियां शारीरिक सामर्थ्य और भावनात्मक परिवर्तनों के अनुसार बदलती रहती हैं, किंतु भगवद्भक्ति में लगने का विचार उसमें मन में नहीं उठता जो उसे जन्ममृत्यु के कष्टमय चक्र से मुक्ति दिलाए। तीसरे छंद में जीवन-मरण के कष्टकर चक्र के वर्णन के साथ भगवान – यहां पर उसे मुरारि के रूप में संबोधित किया गया है – से इस भवसागर से मुक्त करने की प्रार्थना की गयी है। – योगेन्द्र जोशी

 

“न मुञ्चति आशावायुः” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् – १

आदिशंकराचार्य ने वैदिक उपनिषदों के भाष्यों के साथ-साथ अनेक छोटी-बड़ी रचनाएं लिखी हैं। उनमें से एक है चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्। मैंने इसे गीताप्रेस, गोरखपुर, द्वारा प्रकाशित “स्तोत्ररत्नावली” नामक पुस्तक से लिया है। चर्पट का शाब्दिक तात्पर्य है चपत अर्थात् चांटा, पञ्जरिका का पिंजड़ा और स्तोत्र का स्तुति हेतु उच्चारित शब्द। रचना के उक्त नाम का क्या अर्थ निकलता है यह मैं नहीं समझ पाया। मुझे लगता है कि “चर्पट” के स्थान पर “कर्पट” होना चाहिए जिसका अर्थ होता है “चिथड़ा”। तब “चर्पटपञ्जरिका” का अर्थ चिथड़ों से बना पिंजड़ा लिया जा सकता है।

उक्त रचना में कुल सत्रह छंद हैं। उनके अतिरिक्त अधोलिखित एक स्थायी छंद और है जो अन्य छंदों में से हरएक के बाद प्रयुक्त हुआ है:

भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ्‍करणे ॥

(मूढमते, गोविन्दम् भज, गोविन्दम् भज, गोविन्दम् भज। सन्निहिते प्राप्ते मरणे “डुकृञ् करणे” नहि नहि रक्षति।)

स्तोत्र के हरएक अन्य छंद के बाद उपर्युक्त छंद के प्रयोग का क्रम गायन में प्रयुक्त अंतरा एवं स्थायी के क्रम के अनुरूप है। इन सभी छंदों में श्री शंकराचार्य ने जीवन की नश्वरता को समझने और ईश्वरभक्ति में रुचि लेने का संदेश दिया है। वे यह बताते हैं किस प्रकार वृद्धावस्था आते-आते मनुष्य शरीर से अशक्त हो जाता है, परिवार एवं समाज में उसकी अह्मियत समाप्त हो जाती है, लोग पर्याप्त सम्मान देना बंद कर देते हैं, इत्यादि। मैं इस एवं आगामी आलेखों की शृंखला में इन छंदों को तीन-तीन की संख्या में उद्धृत कर रहा हूं:

पहले उपर्युक्त छंद का

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब तुम्हारा मरणकाल पास आ जायेगा तब यह “डुकृञ् करणे” की रट तुम्हें नहीं बचाएगी।
मेरी समझ में यह “डुकृञ्‍करणे” प्रतीक है उन ऐहिक काम-धंधों का जिनमें मनुष्य उलझा रहता है। असल में “डुकृञ्” संस्कृत व्याकरण की एक क्रियाधातु है जिसका अर्थ “(कर्वव्य) करना” है। इसका तथा इसके “डु” हटाकर प्राप्त तुल्य क्रियाधातु “कृञ्” का प्रयोग संस्कृत-व्यवहार में सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। अर्थात् इस कृयाधातु पर बहुत दिमाग खपाना एक प्रकार से निरर्थक है। व्याकरण के अध्येता उक्त क्रियाधातु के अर्थ याद करने के लिए कदाचित “डुकृञ् करणे” (तात्पर्य – कर्म करने के प्रयोजन हेतु डुकृञ्) रटते होंगे। मेरी समझ में स्तोत्र के रचनाकार की दृष्टि के अनुसार जीवन के अंतकाल तक सांसारिक कार्यों में ही लिप्त रहना निरर्थक है यह भाव “डुकृञ् करणे” याद रखने में प्रतिबिंबित होता है। रचना के अगले दो छंद आगे उद्धृत हैं:

दिनमपि रजनी सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायाताः ।

कालः क्रीडति गच्छत्यायुस्तदपि न मुञ्चत्याशावायुः ॥१॥ भज …

(दिनम् रजनी अपि सायम् प्रातः शिशिर-वसन्तौ पुनः आयाताः कालः क्रीडति आयुः गच्छति तद्‍-अपि आशा-वायुः न मुञ्चति ।)

अर्थ – दिन तथा रात, प्रातः, सायं शिशिर एवं वसंत ऋतु फ़िर-फ़िर आते हैं। समय खेलता है, आयु व्यतीत होती है, फ़िर भी आशा रूपी प्राणवायु छूटती नहीं।

यहां शिशिर एवं वसंत सभी छ: ऋतुओं (क्रमशः वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, पावस, शरद्‍, हेमंत तथा शिशिर) के सामूहिक प्रतीक हैं। छंद का भाव है कि काल अर्थात् समय प्राणियों के साथ खिलवाड़ करता है, समय का बीतना तमाम घटनाओं के रूप में दिखता है, और् मनुष्य की शेष आयु घटती जाती है। इतना सब होने पर भी मनुष्य भविष्य की आशा पाले रह्ता है।

अग्रे वह्निः पृष्ठे भानू रात्रौ चिबुकसमर्पितजानुः ।

करतलभिक्षा तरुतलवासस्तदपि न मुञ्चत्याशापाशः ॥२॥ भज …

(वह्निः अग्रे भानू पृष्ठे रात्रौ चिबुक-समर्पित-जानुः करतल-भिक्षा तरु-तल-वासः तद्‍-अपि आशा-पाशः न मुञ्चति ।)

अर्थ – सामने अग्नि और पीछे सूर्य रहते हैं; ठुड्डी घुटनों के बीच समाई रहती है; हथेली में भिक्षा मांगना और वृक्ष के नीचे रहना पड़ता है। फिर भी आशा के बंधन से मनुष्य मुक्त नहीं होता है।

यह छंद मनुष्य की वृद्धावस्था का वर्णन करता है कि ठंड से बचने के लिए उसे पीठ की तरफ़ सूर्य के घाम अथवा पेट की ओर अग्नि के ताप का सहारा लेना होता है। अन्यथा घुटनों के बीच सर रखकर गरमाहट लेनी होती है। स्थिति दयनीय हो चुकती है, लेकिन आशा का बंधन उसे संसार से जोड़े रखता है। – योगेन्द्र जोशी

ऋग्वेद में औषधीय वनस्पतियों की प्रार्थना (1)

          मैंने अपने चिट्ठे की एक प्रविष्टि (31 जनवरी 2010) में औषधीय वनस्पतियों की प्रार्थना संबंधी यजुर्वेद में उपलब्ध मंत्रों का उल्लेख किया था । भावात्मक तौर पर उनसे साम्य रखने वाली ऋचाएं मुझे ऋग्वेद में भी देखने को मिली हैं । मैं उन्हीं में से चुनी हुई कुछएक की चर्चा यहां पर कर रहा हूं:

          याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्चपुष्पिणीः ।

          बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः ॥15

           (ऋग्वेद, मण्डल 10, सूक्त 97)

          (याः फलिनीः याः अफलाः याः अपुष्पाः पुष्पिणीः च बृहस्पति-प्रसूताः ता अंहसः नः मुञ्चन्तु ।)

अर्थ – फलने वाली जो वनस्पतियां हैं या जिन पर फल नहीं लगते हैं, जो पुष्पित नहीं होती अथवा जिन पर फूल खिलते हैं, देव बृहस्पति-जनित ऐसी सभी वनस्पतियां हमें रोगों से मुक्त रखें ।

सभी वनस्पतियां फूलती नहीं हैं, और जो फूलती हैं उन पर फल लगें ही यह भी आवश्यक नहीं हैं । इस मंत्र में औषधीय गुणों वाली ऐसी समस्त वनस्पतियों से प्रार्थना की गई है कि वे उनके समुदाय को रोगों से मुक्त रखें । वैदिक चिंतकों की मान्यतानुसार सृष्टि के सभी तंत्र अपने-अपने अधिष्ठाता देवता से संबद्ध रहते हैं, और वनस्पतियों को उनके औषधीय गुण बृहस्पति देवता से प्राप्त रहते हैं ।

          मुञ्चन्तु मा शपथ्यादथो वरुण्यादुत ।

          अथो यमस्य षड्बीशात् सर्वस्माद्देवकिल्बिषात् ॥16

           (यथा उपर्युक्त)

           (मा शपथ्यात् मुञ्चन्तु अथो वरुण्यात् उत अथो यमस्य षड्बीशात् सर्वस्मात् देवकिल्बिषात् ।)

अर्थ – औषधियां मुझे शापजनित रोग से मुक्त करें, बल्कि वरुण देवता के शाप से भी दूर रखें, यम देवता की बेड़ियों से मुक्त रखें, इतना ही नहीं समस्त दैवप्रदत्त पापों को मुझसे दूर रखें ।

मनुष्य के कष्ट तीन प्रकार के गिनाए गए हैं: आधिभौतिक, आधिदैविक, एवं आघ्यात्मिक । दूसरे मनुष्यों अथवा संसार के अन्य प्राणियों के कारण जो भौतिक कष्ट भोगना पड़ता है उसे आधिभौतिक कहा जाता है । देवताओं के रोष से जो कष्ट भोगना पड़ता है उसे आधिदैविक की संज्ञा दी गई है । अधिकांश कष्टों की अनुभूति इंद्रियों के माध्यम से अनुभव में आती है । इनके अतिरिक्त कभी-कभी विशुद्ध मानसिक कष्ट भी भोगने पड़ते हैं; इन्हीं को आघ्यात्मिक कहा जाता है । ये कष्ट वस्तुतः मन के विकारों के कारण पैदा होते हैं, और उनका कोई स्पष्ट बाह्य कारण नहीं रहता है । उक्त मंत्र में इन सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति की प्रार्थना की गई है । शापजनित कष्ट उसे समझा जा सकता है जो दूसरों के द्वारा कर्मणा अथवा वाचा किसी को पहुंचाया जाता है । दूसरे के अहित की भावना भी कदाचित कष्ट का कारण बन सकता है । इन सभी को शापमूलक मान सकते हैं । वरुण को हाथ में बंधन (फंदा) लिए हुए पश्चिम दिशा का (समुद्र का भी) अधिष्ठाता देवता माना गया है । वरुण देवता के शाप का ठीक-ठीक अर्थ क्या है मैं समझ नहीं पाया । कदाचित जलजनित रोगों से तात्पर्य हो । यम देवता का शाप का अर्थ यही होगा कि उनके रूप में मुत्यु हर क्षण मनुष्य का पीछा करती है । औषधियां कष्टों अथवा मृत्यु के निमित्त बने रोगों से हमें दूर रखती हैं । मनुष्य के अनुचित कर्मों के फल को देवताओं द्वारा दंड-स्वरूप प्रदत्त पाप कहा गया होगा ऐसा मेरा सोचना है ।

           अवपतन्तीरवदन् दिव ओषधयस्परि ।

           यं जीवमश्नवामहै न स रिष्याति पूरुषः ॥17

           (यथा उपर्युक्त)

           (दिव अवपतन्तीः ओषधयः परि अवदन् यं जीवम् अश्नवामहै स पूरुषः न रिष्याति ।)

अर्थ – द्युलोक से धरती पर उतरती औषधियां वचन बोलती हैं कि जिस जीव को हम व्याप्त या आच्छादित कर लें उस पुरुष का विनाश नहीं होता ।

व्याप्त (वि+आप्त) का अर्थ यहां प्राप्त होना लिया जा सकता है । मेरा सोचना है कि प्राचीन मनीषी वनस्पतियों के औषधीय गुण स्वर्ग की देन मानते होंगे । धरती पर होने वाली घटनाएं देवताओं के नियंत्रण में होती हैं, अतः ये औषधियां भी देवों की प्राणियों पर अनुकंपा के परिणाम प्राणियों को प्राप्त होती हैं । स्वर्ग से धरती पर उतरने वाली औषधियां जो कहती हैं उसे वस्तुतः उनके अधिष्ठाता देवता का कथन माना जाना चाहिए । इस कथन में ये उद्गार प्रतिबिंबित होते हैं कि मनुष्य के नाश का कारण अंततः रोग हैं जिन्हें औषधियां दूर कर देती हैं । नीरोग व्यक्ति ही दीर्घजीवी हो सकता है और वही अपने एवं समाज के लिए फलदायी कार्य संपन्न करने में समर्थ होता है । – योगेन्द्र जोशी

“ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् …” – समाज में वर्ण-व्यवस्था संबंधी ऋग्वैदिक वचन

वर्णाश्रम हिन्दुओं में प्रचलित एक ऐसी प्राचीन समाजिक व्यवस्था है जिसे आज की सामाजिक वास्तविकता के परिप्रेक्ष में समझ पाना कठिन है । इस व्यवस्था के दो पक्ष रहे हैं, पहला है श्रम अथवा कार्य विभाजन के आधार पर सामुदायिक स्तर के दायित्वों की 4 श्रेणियों का निर्धारण करना । इसे वर्ण व्यवस्था के नाम से जाना जाता है । दूसरा है वह पहलू जिसका संबंध इन बातों से रहता है कि मनुष्य अपनी उम्र के अलग-अलग पड़ावों पर किन दायित्वों को निभाए, कैसी दिनचर्या अपनाए, और कैसे जीवन के अपरिहार्य अवसान के लिए स्वयं को तैयार करे । ये बातें 4 कालखंडों की आश्रम व्यवस्था से संबंधित रहती हैं । मैं इस स्थल पर ऋग्वेद की उस ऋचा का उल्लेख कर रहा हूं जिसमें चारों वर्णों की बात की गई है:

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः ।

ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रोऽजायतः ॥

(ऋग्वेद संहिता, मण्डल 10, सूक्त 90, ऋचा 12)

(ब्राह्मणः अस्य मुखम् आसीत् बाहू राजन्यः कृतः ऊरू तत्-अस्य यत्-वैश्यः पद्भ्याम् शूद्रः अजायतः ।)

यदि शब्दों के अनुसार देखें तो इस ऋचा का अर्थ यों समझा जा सकता है:

सृष्टि के मूल उस परम ब्रह्म का मुख ब्राह्ण था, बाहु क्षत्रिय के कारण बने, उसकी जंघाएं वैश्य बने और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुआ ।

क्या उक्त ऋचा की व्याख्या इतने सरल एवं नितांत शाब्दिक तरीके से किया जाना चाहिए ? या यह बौद्धिक तथा दैहिक श्रम-विभाजन पर आधारित एक अधिक सार्थक सामाजिक व्यवस्था की ओर इशारा करती है ? मैं आगे अपना मत व्यक्त करूं उससे पहले यह बताना चाहता हूं कि किंचित् अंतर के साथ इस ऋचा से साम्य रखने वाला श्लोक मनुस्मृति में भी उपलब्ध है:

लोकानां तु विवृद्ध्यर्थं मुखबाहूरूपादतः ।

ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं च निरवर्तयत् ॥

(मनुस्मृति, अध्याय 1, श्लोक 31)

(लोकानां तु विवृद्धि-अर्थम् मुख-बाहू-ऊरू-पादतः ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं च निर्-अवर्तयत् ।)

शाब्दिक अर्थ: समाज की वृद्धि के उद्येश्य से उसने (ब्रह्म ने) मुख, बाहुओं, जंघाओं एवं पैरों से क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र का निर्माण किया ।

मेरी अपनी धारणा है कि उक्त चार वर्णों के पुरूषों का शरीरतः जन्म ब्रह्मा के चार कथित अंगों से हुआ है ऐसा मंतव्य उल्लिखित ऋग्वैदिक ऋचा में निहित नहीं होना चाहिए । मैं समझता हूं कि ये चार अंग श्रम विभाजन के चार श्रेणियों को व्यक्त करते हैं । ध्यान दें कि मनुष्य का मुख लोगों को शिक्षित करने, उन्हें उचितानुचित की बातें बताने, उन्हें अध्यात्म एवं दर्शन का जानकारी देने जैसे कार्य की भूमिका निभाता है । तदनुसार मुख  ब्राह्मणोचित बौद्धिक कार्यों में संलग्नता का द्योतक है, जिसमें शारीरिक श्रम गौण होता है । इसी प्रकार भुजाओं को राज्य की बाह्य आक्रांताओं से रक्षा करने, नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करने, समाज-विरोधी तत्वों पर नियंत्रण रखने जैसी भूमिका का द्योतक समझा जाना चाहिए । ये ऐसे कार्य हैं जिनमें अच्छी शारीरिक सामर्थ्य के साथ प्रत्युत्पन्नमतिता की बाद्धिक क्षमता की आवश्यकता अनुभव की जाती है । प्राचीन ग्रंथों में इनको क्षत्रियोचित कार्य कहा गया है ।

ऋचा में उल्लिखित शब्द जंघाओं (जांघों) को मैं तीसरी श्रेणी के कार्यों से जोड़ता हूं । ये कार्य हैं नागरिकों के भोजन हेतु कृषि कार्य में लगना, उनकी रोजमर्रा की जरूरतों की पूर्ति करना, वाणिज्यिक कार्यों को संपन्न करना आदि । इन कार्यों में व्यापार विशेष के योग्य सामान्य बुद्धि की भूमिका प्रमुख रहती है और शारीरिक श्रम की विशेष आवश्यकता नहीं होती । इन्हें वैश्यों के कार्य कहा गया है । इन सब के विपरीत वे कार्य भी समाज में आवश्यक रहे हैं, जिनमें अतिसामान्य प्रकार की बौद्धिक क्षमता पर्याप्त रहती है और जिनमें शारीरिक श्रम ही प्रायः आवश्यक होता है । मनुष्य के पांव श्रमिकोचित कार्य के द्योतक के तौर पर देखे जा सकते हैं । हाथों का कार्य प्रायः हस्तकौशल के साथ संपादित किए जाते हैं, किंतु पांव से कार्य लेना सामान्यतः मात्र श्रमसाध्य होते हैं । दूसरों को विविध सेवाएं देने वाले इस वर्ग के लोगों को शूद्र कहा गया ।

समाज में बौद्धिक एवं दैहिक श्रम के उपयोग को मोटे तौर पर उपर्युक्त प्रकार से विभाजित किया जा सकता है । हम कह सकते हैं कि ब्रह्म अर्थात् परमात्मा ने इस विभाजन के साथ ही मानव समाज की रचना की है ।

इस तथ्य को भी ध्यान में रखना चाहिए कि आज हिन्दू समाज में सैकड़ों प्रकार की जातियां देखने को मिलती हैं । ऐसे जातीय विभाजन का जिक्र प्राचीन साहित्य में नहीं मिलता । कदाचित् इस विभाजन को समय के साथ समाज में घर कर गई विकृति के तौर पर देखा जाना चाहिए । प्राचीन भारत में समाज चार वर्णों में विभक्त था और उसी का उल्लेख प्राचीन साहित्य में मिलता है ।

जिस प्रकार के कार्य में किसी परिवार के सदस्य संलग्न हों कदाचित् वही आगे की पीढ़ियां भी सीखती होंगी । ऐसा समाज में आज भी कुछ हद तक देखने को मिलता है । कुछ समय पहले तक कई व्यवसाय पीढ़ी दर पीढ़ी चलते रहे हैं । अब स्थितियां कुछ बदल गई हैं । शायद समय के साथ वर्ण विशेष परिवारों की विशिष्टता बन गया हो और ब्राह्मण के बेटा ब्राह्मण आदि की परंपरा ने जन्म लिया हो । – योगेन्द्र जोशी

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