ईशवास्योपनिषद्‍ का दर्शन – परमात्मा विविध प्राणियों के रूप में स्वयं को प्रकट करता है

ईशावास्योपनिषद्‍ ग्यारह प्रमुख उपनिषदों में से एक है। यह बहुत ही छोटा ग्रंथ है, मात्र १८ मंत्रों का संकलन। दरअसल यह शुक्लयजुर्वेद का ४०वां एवं अंतिम अध्याय है और उस वेद का दार्शनिक पक्ष सार रूप में प्रस्तुत करता है।

मैं यहां पर उक्त उपनिषद्‍ के ६ठे एवं ७वें मंत्र का उल्लेख कर रहा हूं जिनमें परमात्मा की व्यापकता की बात की गयी है और यह बताया गया है वही परमात्मा स्वयं को समस्त प्राणियों के रूप में प्रकट करता है। जो मोक्षार्थी इस सत्य को आत्मसात् कर लेता है वह सभी प्रणियों में स्वयं की आत्मा को देखता है। उक्त मंत्र ये हैं –

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।

सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥६॥

(यः तु सर्वाणि भूतानि आत्मनि एव अनुपश्यति सर्व-भूतेषु च आत्मानम् ततः न वि-जुगुप्सते ।)

यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः ।

तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥७॥

(यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मा एव अभूत् वि-जानतः तत्र कः मोहः कः शोक: एकत्वम् अनुपश्यतः ।)

इन मंत्रों में जो “आत्मन्” शब्द विद्यमान है उसकी व्याख्या कुछ विद्वानों ने परमात्मन् के पर्याय के तौर पर की है तो कुछ अन्य ने प्राणियों की, विशेषतः मनुष्य की, आत्मा के तौर पर। संयोग से मेरे पास पांच व्यख्याएं उपलब्ध हैं, जिनमें ऊपरी तौर पर न्यूनाधिक शाब्दिक अंतर दिखता है किन्तु जिनका सार एक ही है। ये व्याख्याएं यों हैं –

(१) शुक्लयजुर्वेद (प्रकाशक पांडुरंग जावजी, बंबई, १९२९) में वर्णित श्रीमद्‍ उवटाचार्य के एवं श्रीमन्महीधर के भाष्य;

(२) आदिशंकराचार्यकृत भाष्य (गीताप्रेस, गोरखपुर, संवत् २०२४);

(३) भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद की टीका (भक्तिवेदांत बुक ट्रस्ट, मुंबई, २००६) एवं

(४) कल्याण उपनिषद्‍ अंक (गीताप्रेस, गोरखपुर, संवत्, २०५२)।

उक्त मंत्रों का शब्दार्थ क्रमशः कुछ यों दिया जा सकता है:

जो निःसंदेह सभी प्राणियों को अपनी आत्मा (या परमात्मा) में देखता है, और सभी प्राणियों में स्वयं की आत्मा (या परमात्मा) का दर्शन पाता है, वह किसी से घृणा नहीं करता ॥६॥

जिस अवस्था में आत्मा (या परमात्मा) ही सभी प्राणियों के रूप में प्रकटित हुआ है ऐसा ज्ञान किसी व्यक्ति को प्राप्त हो जाता है, सर्वत्र एकत्व देख रहे उस व्यक्ति के लिए न कोई मोह और न ही शोक रह जाता है॥७॥

प्राचीन काल के वैदिक दार्शनिकों की मान्यता थी कि समस्त चराचर जगत उसी एक परब्रह्म अथवा परमात्मा के स्वयं को बहु-रूपों में प्रकट करने का परिणाम है। दूसरे शब्दों में सभी प्राणी उसी के अंश हैं जो उसी के बनाये (?) मायाजाल में अपने मूल स्वरूप को भूले रहते हैं। मानव जीवन सृष्टि के इस सत्य के साक्षात्कार का एक साधन है। (जीवों की) आत्मा एवं परमात्मा के बीच कुछ वैसा ही संबंध जैसे जलभंडार समुद्र और उससे अलग हुई जल की बूंद के बीच।

उक्त मंत्रद्वय के अनुसार ज्ञानी पुरुष अपनी आत्मा का परमात्मा के साथ एकत्वभाव अनुभव करने में सफल रहता है। अर्थात् उसे यह ज्ञान हो जाता है कि समस्त प्राणी परमात्मा के अंश हैं: “मैं ही वह परमात्मा हूं और फंला प्राणी भी वही परमात्मा है। तब फंला प्राणी से घृणा, परहेज या विद्वेष कैसा? घृणा करना अपने आप से घृणा करना नहीं हो जाएगा?” इस प्रकार का चिंतन मोक्ष की दिशा में बढ़ रहे व्यक्ति के आचरण का हिस्सा बन जाता है। ऐसी अवस्था में लगाव और विलगाव की कोई सार्थकता नहीं रह जाती है। उक्त दूसरे मंत्र में एकत्व भाव के कारण किसी के प्रति मोह अथवा शोक मोक्षार्थी को नहीं हो सकता है।

ऊपर मैंने मोक्षार्थी शब्द का प्रयोग किया है क्योंकि आम जन सांसारिक क्रियाकलापों में उलझे रहते हैं। अध्यात्म की दिशा में आगे बढ़ने और ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने का विचार उनके मन में उठता ही नहीं। उस स्थिति में उनके लिए उपर्युक्त दार्शनिक बातें कितनी सार्थक अथवा निरर्थक रहती हैं यह प्रश्न भी बेमानी हो जाता है। इसलिए अध्यात्म की दिशा में अग्रसर मोक्षार्थी के लिए ही इन बातों का  महत्व है। (मोक्ष = जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर अपने मूल स्वरूप सत्-चित्-आनंद परब्रह्म को प्राप्त करना।) – योगेन्द्र जोशी

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छान्दोग्य उपनिषद्‍ में परमात्मा की व्यापकता पर उद्दालक-श्वेतकेतु संवाद

वैदिक चिंतकों के अनुसार यह सृष्टि परब्रह्म या परमात्मा से उत्पन्न हुई है और अंत में उसी में इसका विलय हो जाना है। उत्पत्ति और विलय का यह चक्र चलता रहता है। यद्यपि वैदिक चिंतकों के मतों में भी परस्पर न्यूनाधिक भेद देखने को मिलता है फिर भी परब्रह्म की व्यापकता को सभी स्वीकारते हैं और मानते हैं वही परब्रह्म स्वयं को इस संसार के रूप में प्रकट करता है।

छान्दोग्य उपनिषद्‍ (अध्याय ६, खंड १३) में परमात्मा या परब्रह्म की व्यापकता को लेकर ऋषि उद्दालक (अरुणपुत्र आरुणि) एवं उनके पुत्र श्वेतकेतु के बीच एक संवाद का उल्लेख मिलता है। उसी की चर्चा मैं यहां पर कर रहा हूं। उपनिषद्‍ में श्वेतकेतु की आयु का जिक्र तो नहीं है, किंतु ऐसा लगता है कि वह परमात्मा के व्यापकता का अर्थ समझना चाहता है और इस प्रकार आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित करना चाह्ता है।

उक्त उपनिषद्‍ में उल्लेख है:

“लवणमेतदुदकेऽवधायाथ मा प्रातरुपसीदथा इति सह तथा चकार तंहोवाच यद्दोषा लवणमुदकेऽवाधा अङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य न विवेद॥१॥”

(लवणम् तत् उदके अवधाय अथ मा प्रातः उपसीदथा इति । सह (सः?) तथा चकार । तम् ह उवाच यत् दोषा लवणम् उदके अवाधा अङ्ग तत् आहर इति । तत् ह अवमृश्य न विवेद ।)

(ऋषि उद्दालक पुत्र से कहते हैं) उस लवण को जल में डालकर प्रातःकाल मेरे समीप आना। उसने वैसा ही किया। उसने (उद्दालक) ने उससे कहा अच्छा रात्रि में जो लवण जल में डाला था उसे ले आओ। देखने/ढूढ़ने पर वह जान नहीं पाया।

ऋषि उद्दालक ने श्वेतकेतु को नमक की डली को पानी में डालकर रात भर छोड़ देने को कहा। प्रातःकाल उससे कहा गया कि वह नमक की डली पानी से निकालकर ले आए। रात भर में नमक पानी में घुल चुका था, अतः वह अपने पूर्व रूप डली के तौर पर नहीं मिल सका। नमक की डली वापस कैसे मिले यह उसे समझ में नहीं आया। तब उद्दालक उसे समझाते हैं कि वह तो पानी के साथ एकाकार हो चुका है। वह पानी में है तो किंतु वह दिख नहीं सकता। वस्तुस्थिति स्पष्ट करने के लिए वे श्वेतकेतु से कहते हैं:

“यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्तादाचामेति कथमिति लवणमिति मध्यादाचामेति कथमिति लवणमित्यन्तादाचामेति लवणमित्यभिप्रास्यैतदथ मोपसीदथा इति तद्ध तथा चकार तच्छश्वत्संवर्तते तंहोवाचात्र वाव किल सत्सोम्य न  निभालयसेऽत्रैव किलेति॥२॥

(यथा विलीनम् एव अङ्ग अस्य अन्तात् आचाम इति । कथम् इति । लवणम् इति । मध्यात् आचाम् इति । कथम् इति । लवणम् इति । अन्तात् आचाम इति । लवणम् इति । अभिप्रास्य एतत् अथ मा उपसीदथा इति । तत् ह तथा चकार । तत् शश्वत् संवर्तते तम् ह उवाच अत्र वाव किल सत् सोम्य न निभालयसे अत्र एव किल इति ।)

हे वत्स, विलीन (लवण) वाले जल से कुछ मात्रा लेकर आचमन करो। कैसा लगा? नमकीन। उस जल के मध्य भाग से लो। कैसा लगा? नमकीन। उसके अंत (तले) से लेकर आचमन करो। कैसा लगा? नमकीन। उसे छोड़कर/ फैंककर मेरे पास आओ। उसने वैसा ही किया। (ऋषि ने) उसको बताया वह (लवण) सदा ही उसमें विद्यमान है। हे सोम्य, उसी भांति वह “सत्” भी निश्चय ही यहीं विद्यमान है। तुम उसे देख नहीं पाते, किंतु वह अवश्य ही यहीं है। (सत् अर्थात्  अंतिम सत्य, सृष्टि का सार तत्व, परमात्मा)

उद्दालक पानी में नमक के घोल को उदाहरण के तौर अपने जिज्ञासु पुत्र के सामने रखते हैं। पानी में उस नमक की विद्यमानता दिखती नहीं परंतु पानी चखने पर उसके होने का ज्ञान श्वेतकेतु को मिल जाता है। यहां पर एक सफल इंद्रिय के तौर पर मनुष्य की जिह्वा सहायक सिद्ध होती है। परब्रह्म की व्यापकता भी कुछ इसी प्रकार समझी जा सकती है। परंतु उसके मामले में कोई भी ज्ञानेन्द्रिय सहायक नहीं होती है। वैदिक दार्शनिकों के अनुसार ज्ञानमार्ग उसकी व्यापकता का अनुभव कराती है। भक्तिमार्ग के अनुयायियों के अनुसार भगवद्भक्ति परब्रह्म को पाने का साधन है। परमात्मा तक पहुंचने के मार्गों के बारे में मतमतांतर देखने को मिलते हैं। – योगेन्द्र जोशी

“… सनिं मेधामयासिषं …” – यजुर्वेद में अग्नि देवता से बुद्धि एवं धन की प्रार्थना

वेदों में देवताओं की प्रार्थना से संबंधित अनेक मंत्र पढ़ने को मिलते हैं। ये देवता कौन हैं, क्या हैं, यह मैं नहीं समझ पाया हूं। प्रकृति की विभिन्न शक्तियों के अमूर्त नियंता ही ये देवता हैं ऐसा मेरी समझ में आता है। प्राचीन पौराणिक साहित्य में भी देवताओं से जुड़ी कथाओं का वर्णन मिलता है। लेकिन उन कथाओं से यह नहीं लगता कि देवतागण प्रकृति की शक्तियों के प्रतीक हैं। बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि वे पुण्यकर्मों के फलस्वरूप देवत्व-प्राप्त एवं विशिष्ट सामर्थ्य से संपन्न स्वर्गस्थ आत्माएं होती हैं जो पुण्यकर्मों के भोग के बाद पुनः धरती पर जन्म लेती हैं जैसा कि विष्णुपुराण में पढ़ने को मिलता है (गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे। स्वर्गापवर्गास्पदहेतुभूते भवन्ति भूयः मनुजाः सुरत्वात् ॥)। बहरहाल मैं वेदों एवं पुराणों में चर्चित देवताओं में क्या अंतर है – यदि है तो – इसकी विवेचना नहीं कर रहा हूं, बल्कि अग्नि देवता से जुड़े चार मंत्रों का जिक्र कर रहा हूं।

वेदों में देवताओं की स्तुतिपरक मंत्र ही अधिकांशतः देखने को मिलते हैं। इन देवताओं में इन्द्र एवं अग्नि की स्तुतियां बहुतायत में प्राप्य हैं। अग्नि देवता को अन्य सभी देवताओं के प्रतिनिधि के तौर पर देखा गया है, क्योंकि यज्ञ-संपादन में दी जाने वाली आहुतियों का वाहक अग्नि ही है। यज्ञकुंड की प्रज्वलित अग्नि में गोघृत, तिल, जौ आदि से बने सुगंधित हवन सामग्री की जब आहुति दी जाती है तो “स्वाहा” का उच्चारण किया जाता है; उसका अर्थ है कि अग्नि देवता के माध्यम से सभी देवताओं को वह आहुति प्राप्त हो। इसलिए वैदिक अनुष्ठानों में अग्नि देवता और उसके भौतिक प्रतीक प्रज्वलित अग्नि का विशेष महत्व है।

शुक्लयजुर्वेद संहिता में अग्नि देवता को संबोधित चार ऐसे मंत्र मुझे पढ़ने को मिले जिनमें मेधा (उत्कृष्ट श्रेणी की बौद्धिक क्षमता) और धनधान्य की याचना की गई है। उन्ही का उल्लेख मैं यहां पर कर रहा हूं, जिनके अर्थ के लिए मैंने श्रीमद्‍-उवटाचार्य एवं श्रीमद्‍महीधर के भाष्यों का सहारा लिया है। (शुक्लयजुर्वेदसंहिता, अध्याय ३२, कंडिका/मंत्र १३-१६)

सदसस्पतिमद्भुतं प्रियमिन्द्रस्य काम्यम् । सनिं मेधामयासिषं स्वाहा ॥१३॥

(सदसः पतिम् अद्भुतंम् प्रियम् इन्द्रस्य काम्यम् सनिम् मेधाम् अयासिषम् स्वाहा।)

यज्ञशाला के पति/स्वामी, इन्द्र के प्रिय, कामना के योग्य, (अग्नि से) धन (सनि) एवं मेधा की याचना करते हैं; स्वाहा अर्थात्‍ सभी देवताओं के प्रति आहुति।

यां मेधां देवगणाः पितरश्चोपासते । तया मामद्य मेधयाग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा ॥१४॥

(याम् मेधाम् देवगणाः पितरः च उपासते तया माम् अद्य मेधया अग्ने मेधाविनम् कुरु स्वाहा।)

जिस मेधा की उपसना देवगण और पितृवृन्द करते हैं, हे अग्नि आज मुझे उस मेधा से मेधावी (मेधावान्‍) बनावें; स्वाहा।

मेधां मे वरुणो ददातु मेधामग्निः प्रजापतिः । मेधामिन्द्रश्च वायुश्च मेधां धाता ददातु मे स्वाहा ॥१५॥

(मेधाम् मे वरुणः ददातु मेधाम् अग्निः प्रजापतिः मेधाम् इन्द्रः च वायुः च मेधाम् धाता ददातु मे स्वाहा।)

वरुण देवता मुझे मेधा प्रदान करें, अग्नि मेधा दें, प्रजापति (ब्रह्मा), इन्द्र एवं वायु मेधा दें, विधाता मुझे मेधा प्रदान करें; स्वाहा।

इदं मे ब्रह्म क्षत्रं चोभे श्रियमस्नुताम् मयि देवा दधतु श्रियमुत्तरां तस्यै ते स्वाहा ॥१६॥

(इदम् मे ब्रह्म क्षत्रम् च उभे श्रियम् अस्नुताम्मयि देवा दधतु श्रियम् उत्तराम् तस्यै ते स्वाहा।)

मेरी श्री (धन-संपदा) का भोग ब्राह्मण और क्षत्रिय, दोनों, करें। देवगण मुझे धन-ऐश्वर्य प्रदान करें; उसके लिए (अग्नि!) आपके प्रति आहुति; स्वाहा।

मेरी जानकारी के अनुसार वैदिक काल में यज्ञ-संपादन दैनिक जीवन का अंग हुआ करता था, और उसके लिए यज्ञशाला (सदस्) में अग्नि प्रज्वलित रहती थी। अग्नि को इस यज्ञगृह का स्वामी या पालनकर्ता कहा गया है। प्रथम मंत्र में अग्नि को इन्द्र के प्रिय साथी के तौर पर प्रस्तुत किया गया है। मेधा बुद्धि का पर्याय है; किंतु मेरी समझ में यह विवेक से परिपूर्ण बुद्धि है। आम तौर पर मनुष्य को बुद्धि सन्मार्ग पर ले चले यह आवश्यक नहीं। मेधा उत्कृष्ट स्तर की बुद्धि है जो उचितानुचित में भेद करने की प्रेरणा देती है।

पितरों से तात्पर्य पूर्वजों से होना चाहिए जो मेधा की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते रहे हों। देवगणों द्वारा उपासना का अर्थ कुछ भिन्न होना चाहिए, क्योंकि वे तो मेधा का वरदान स्वयं ही देते हैं। उनकी उपासना से अर्थ यही होगा की मेधा की श्रेष्ठता/महत्ता को वे भी स्वीकारते हैं और उसे उपास्य के तौर पर देखते हैं।

तीसरी कंडिका में वरुण (जल के देवता) आदि अन्य प्रमुख देवताओं का संबोधन स्पष्टतः करते हुए सभी से मेधा की याचना की गई है।

अंतिम मंत्र में यह यज्ञकर्ता कहता है उसका धन, जिसकी याचना प्रारंभ में की गई है, ब्राह्मणों और क्षत्रियों के भोग के लिए भी उपलब्ध होवे न कि अकेले उसके भोग के लिए। यहां पर केवल दो वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय) का नाम शामिल किया गया है। वैदिक काल में कार्य (पेशा) विभाजन के अनुरूप समाज चार वर्णों में विभक्त था: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। मेरा सोचना है कि इस कथन का आशय होना चाहिए कि मेरा धन समाज के उपयोग में आवे। तब केवल ब्राह्मण एवं क्षत्रिय का उल्लेख क्यों किया है? कदाचित् यह मंत्र के छंद-स्वरूप को सुसंगत बनाये रखने के लिए किया गया होगा। इसलिए केवल दो वर्णों का उल्लेख पूरे समाज को इंगित करने हेतु किया गया होगा ऐसा मेरा सोचना है। इस प्रकार इस मंत्र में ‘मेरा धन समाज-हित में प्रयुक्त होवे’ यह भावना निहित है। – योगेन्द्र जोशी

अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्ठो … – आत्मा की व्यापकता पर कठोपनिषद्‍ के वचन

वेदों का आरंभिक एवं अधिकांश भाग देवी-देवताओं की प्रार्थनाओं और कर्मकांडों के लिए प्रयुक्त मंत्रों से संबंधित मिलता है। इसके अतिरिक्त उनमें मनुष्य के ऐहिक (लौकिक) जीवन के कर्तव्याकर्तव्यों का भी उल्लेख देखने को मिलता है। उनका दार्शनिक पक्ष भी है। तत्संबंधित अध्यात्मिक ज्ञान जिन ग्रंथों के रूप में संकलित हैं उन्हें उपनिषदों के नाम से जाना जाता है।

उपनिषदों की कुल संख्या कितनी है यह मैं ठीक-से नहीं जान पाया हूं। मेरे पास गीताप्रेस, गोरखपुर, का एक विशेषांक – उपनिषद्‍ अंक – है जिसमें ५४ उपनिषदों की विस्तृत अथवा संक्षिप्त चर्चा की गई है। मेरी जानकारी के अनुसार इनमें से ११ उपनिषद्‍ मुख्य माने जाते है और उन्हीं की चर्चा अक्सर होती है। ये है (अकारादि क्रम से):

(१) ईशावास्योपनिषद्‍ (या ईशोपनिषद्‍)

(२) ऐतरेयोपनिषद्‍

(३) कठोपनिषद्‍

(४) केनोपनिषद्‍

(५) छान्दोग्योपनिषद्‍

(६) तैत्तरीयोपनिषद्‍

(७) प्रश्नोपनिषद्‍

(८) माण्डूक्योपनिषद्‍

(९) मुण्डकोपनिषद्‍

(१०) वृहदारण्यकोपनिषद्‍

(११) श्वेताश्वरोपनिषद्‍

इनमें वृहदारण्यक एवं छान्दोग्य उपनिषद्‍ सबसे बड़े हैं। उपर्युक्त उपनिषदों में परब्रह्म अथवा परमात्मा एवं सृष्टि की रचना की व्याख्या अपने-अपने तरीके से की गयी है।

कठोपनिषद्‍ के अध्याय २, वल्ली २, मैं मुझे ३ मंत्र पढ़ने को मिले जो परमात्मा की व्यापकता को अग्नि, वायु एवं सूर्य की उपमा के माध्यम से स्पष्ट करते हैं। ये मंत्र हैं:

अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्ठो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥९॥

(अग्निः यथा एकः भुवनम् प्रविष्ठः रूपम् रूपम् प्रतिरूपः बभूव तथा एकः सर्व-भूत-अन्तः-आत्मा रूपम् रूपम् प्रतिरूपः बहिः च।)

जिस प्रकार एक ही अग्नि इस संसार में अदृश्य रूप से प्रवेश करते हुए जिस किसी वस्तु में प्रज्वलित होती है और उसी के अनुरूप दृश्यमान्‍ होती है, उसी प्रकार सभी प्राणियों में विद्यमान्‍ परमात्मा (अदृश्य) एक ही होते हुए जिसमें प्रविष्ट होता है उसी के अनुसार रूप धारण कर लेता है और उनसे बाहर भी रहता है ।

वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्ठो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥१०॥

(वायुः यथा एकः भुवनम् प्रविष्ठः रूपम् रूपम् प्रतिरूपः बभूव तथा एकः सर्व-भूत-अन्तःर्‍-आत्मा रूपम् रूपम् प्रतिरूपः बहि: च।

जिस प्रकार एक ही वायु संसार में प्रवेश करते हुए जिस किसी वस्तु में समाहित होती है उसी के अनुरूप रूप धारण कर लेती है, उसी प्रकार सभी प्राणियों में विद्यमान् परमात्मा (अदृश्य) एक ही होते हुए जिस वस्तु में प्रविष्ट होता है उसी के अनुसार रूप धारण कर लेता है और उनसे बाहर भी रहता है।

सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोक-दुःखेन बाह्यः ॥११॥

(सूर्यः यथा सर्व-लोकस्य चक्षुः न लिप्यते चाक्षुषैः बाह्य-दोषैः तथा एकः सर्व-भूत-अन्तःर्‍-आत्मा न लिप्यते लोक-दुःखेन बाह्य: ।)

जिस प्रकार एक ही सूर्य संसार का चक्षु (प्रकाशक) बनते हुए प्राणियों के चक्षु-संबंधी बाह्य-दोषों से मुक्त रहता है, उसी प्रकार सभी प्राणियों में विद्यमान्‍ एक ही परमात्मा संसार के दुःखों से निर्लिप्त रहता है और उनसे बाहर भी रहता है।

ऊपर के प्रथम दो श्लोकों में वस्तुतः एक ही बात दो प्रकार से कही गई है। इन उपमाओं की व्याख्या शब्दशः करना कोई माने नहीं रखता। यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि आध्यात्मिक दर्शन की प्रस्तुति सृष्टि के अमूर्त पक्ष के स्वरूप को समझने/समझाने का एक अपूर्ण प्रयास भर होता है। इस संदर्भ में यह स्वीकारा जाना चाहिए कि वैदान्तिक दर्शन विश्व में प्रचलित अन्य दर्शनों से अधिक पेचीदा है। परमात्मा और जीवात्मा के संबंध को दर्शाने के लिए भौतिक संसार के ही दृश्य दृष्टान्तों का सहारा लिया जाता है, जो स्वयं में नाकाफी प्रयास है।

यहां पर यह बताना समीचीन होगा कि इस प्रकार की मिलती-जुलती बात “माण्डूक्य उपनिषद्” में भी कही गई है [आत्मा ह्याकाशवज्जीवैर्घटाकाशैरिवोदितः … (अद्वैतप्रकरण, ३, ४)], जिसकी चर्चा मैंने अपनी एक पोस्ट में कुछ वर्ष पहले की थी (देखें 2009/04/25 की पोस्ट)।

तीसरा श्लोक वस्तुस्थिति के एक अलग पक्ष का स्पष्टीकरण प्रस्तुत करता है। यह बताता है कि परमात्मा उस सूर्य के समान है जो संसार को प्रकाशित करता है और प्राणियों को वस्तुओं के दर्शन कराता है। प्राणियों की अनुभूतियों में विविधता रहती है। उन्हें भांति-भांति के गुण-दोष अपने परिवेश में दिखते हैं। लेकिन स्वयं सूर्य उन गुण-दोषों से परे रहता है। ये गुण-दोष हमारे सुख-दुःखों के कारण होते हैं जो सबके लिए अलग-अलग रहते हैं, किंतु वह सूर्य सभी से मुक्त रहता है। अर्थात्‍ जीवात्माओं की अनुभूतियों से परमात्मा पूर्णतः निर्लिप्त रहता है।

वैदिक चिंतक यह मानते हैं कि आत्मा परमात्मा का ही अंश है लेकिन वह अपने परमात्मात्मक स्वरूप को भूल चुकती है। कुछ दार्शनिक इसको माया मानते हैं जो कदाचित् परमात्मा का ही खेल है।

मैं वैदिक दर्शन को ठीक-से नहीं समझ पाता। जो कुछ कहा जाता है वह शब्दमात्र होते हैं। वे जिस गूढ़ रहस्य की ओर संकेत करते हैं उसे समझने के प्रयास सबके भिन्न-भिन्न होते हैं। बहुतों के लिए वह बेमानी होते हैं क्योंकि उनकी सांसारिक कार्यों के संपादन में कोई महत्ता नहीं होती। – योगेन्द्र जोशी

अहिंसा परमो धर्मः …” – महाभारत में अहिंसा संबंधी नीति वचन (2)

“अहिंसा परमो धर्मः” प्राचीन संस्कृत साहित्य में उपलब्ध नीति-वचनों में से एक है जिसका उल्लेख अहिंसा के पक्षधर लोग अक्सर करते हैं। इस विषय में महाकाव्य महाभारत के तीन श्लोकों का उल्लेख मैंने अपने पिछली चिट्ठा-प्रविष्टि (ब्लॉग-पोस्ट) में किया था। मौजूदा आलेख में उसी महाभारत ग्रंथ के अन्य तीन श्लोकों को उद्धृत कर रहा हूं जो मुझे ग्रंथ में पढ़ने को मिले। इनकी चर्चा के बाद अहिंसा कितना अव्यावहारिक विचार है इस पर मैं अपने विचार प्रस्तुत करूंगा। पहले श्लोक:

अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परो दमः ।

अहिंसा परमं दानमहिंसा परमं तपः ॥28

(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 116, दानधर्मपर्व)

(अहिंसा परमः धर्मः तथा अहिंसा परः दमः अहिंसा परमम दानम् अहिंसा परमम् तपः ।)

शब्दार्थ – अहिंसा परम धर्म है, वही परम आत्मसंयम है, वही परम दान है, और वही परम तप है।

अहिंसा परमो यज्ञस्तथाहिंसा परं फलम् ।

अहिंसा परमं मित्रमहिंसा परमं सुखम् ॥29

(यथा पूर्वोक्त)

(अहिंसा परमः यज्ञः तथा अहिंसा परम् फलम् अहिंसा परमम् मित्रम् अहिंसा परमम् सुखम् ।)

शब्दार्थ – अहिंसा परम यज्ञ है, अहिंसा ही परम फल है, वह परम मित्र है, और वही परम सुख है।

सर्वयज्ञेषु वा दानं सर्वतीर्थेषु वाऽऽप्लुतम् ।

सर्वदानफलं वापि नैतत्तुल्यमहिंसया ॥30

(यथा पूर्वोक्त)

(सर्व-यज्ञेषु वा दानम् सर्व-तीर्थेषु वा आप्लुतम् सर्व-दान-फलम् वा अपि न एतत् अहिंसया तुल्यम् ।)

शब्दार्थ – सभी यज्ञों में भरपूर दान-दक्षिणा देना, या सभी तीर्थों में पुण्यार्थ स्नान करना, या सर्वस्व दान का फल बटोरना, यह सब अहिंसा के तुल्य (समान फलदाई) नहीं हैं।

ऊपरी तौर पर देखें तो इन श्लोकों में कोई प्रभावी बात नहीं दृष्टिगत होती है। अहिंसा परम धर्म, परम आत्मसंयम, परम दान एवं  परम तप है (उपर्युक्त प्रथम श्लोक) कहने का तात्पर्य यही लिया जा सकता है कि धर्म के अंतर्गत आने वाले सभी सत्कर्मों में अहिंसा प्रथम यानी सर्वोपरि है। अहिंसा का व्रत सरल नहीं हो सकता। अहिंसा में संलग्न व्यक्ति धर्म-कर्म की अन्य बातों पर भी टिका ही रहेगा। शायद यही इस श्लोक का संदेश है।

आम तौर पर हवनकुंड की प्रज्वलित अग्नि में हविष्य (हवन-सामग्री) की आहुति देकर देवताओं की प्रार्थना को यज्ञ कहा जाता है। लेकिन यज्ञ के इससे अधिक व्यापक अर्थ भी हैं। वस्तुतः पूजा-अर्चना से परे अन्य पुण्यकर्म करना भी यज्ञ कहलाता है। मनुस्मृति में पांच महायज्ञों का जिक्र पढ़ने को मिलता है: ये हैं:

ब्रह्मयज्ञ अध्यापन-कार्य अर्थात्‍ लोगों का ज्ञानवर्धन करना।

पितृयज्ञ पितृ-तर्पण अर्थात्‍ पितरों का स्मरण एवं श्रद्धा अभिव्यक्ति।

होमकार्य दैवयज्ञ यानी देवताओं की पूजा अर्चना, यज्ञ-यागादि। (दैवयज्ञ)

भूतयज्ञ  बलिप्रदान अर्थात्‍ अन्य प्राणियों को अपने भोजन का एक अंश, जिसे बलि कहते हैं, अर्पित करना।

नृयज्ञ – विविध प्रकार से अतिथियों का सत्कार, जिसमें भोजन प्रमुख है।

इन महायज्ञों के विषय पर मैंने इसी ब्लॉग पर दो आलेख (31 मार्च, 2015 एवं 16 मार्च, 2015) विगत काल में पोस्ट की थीं।

इस स्थल पर आम आदमी के मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या अहिंसा वाकई में धर्म का श्रेष्ठतम कर्म है। उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि धर्म का क्या अर्थ है और उसके पालन का क्या उद्देश्य है। प्राचीन भारतीय चिंतकों का मत रहा है कि मनुष्य के जीवन का अंतिम उद्देश्य मुक्ति प्राप्त करना है। अर्थात् जीवन-मरण के निरंतर चलने वाले चक्र से स्वयं को मुक्त करना। इसके लिए स्वयं का आध्यात्मिक उत्थान और इस संसार के मोह से अपने को बचाना है। इसके लिए आत्मिक परिष्करण और शेष संसार के प्रति सत्कर्म करना ही मार्ग है यह उनका मत रहा है। लोकायत परंपरा (चार्वाक सिद्धांत) को छोड़कर अन्य सभी धार्मिक मत एक ही प्रकार से सोचते हैं, अंतर है तो आध्यात्मिक दर्शन में और सत्कर्मों की परिभाषा तथा उनकी परस्पर सापेक्ष वरीयता में। लोकायत में तो इस भौतिक शरीर से परे कुछ नहीं है और तदनुसार कर्मों का महत्व व्यक्ति एवं समाज के परस्पर रिश्तों के संदर्भ में होता है। इसके विपरीत जैन मत में जीवधारी सत्कर्मों के फलस्वरूप उत्तरोत्तर श्रेष्ठतर अवस्था प्राप्त करते हुए अंत में मुक्तजीव हो जाता है; बौद्ध मत में जीवधारी का कर्मशरीर शून्य में विलीन हो जाता है, कुछ भी शेष नहीं रहता; और वैदिक दर्शन में जीवधारी की आत्मा परमात्मा में मिल जाती है, इत्यादि।

आध्यात्मिक उत्थान के लिए मनुष्य के लिए सत्कर्मों का संपादन आवश्यक है और उपर्युक्त श्लोकों में वही संदेश मुझे दिखता है।

मेरा मानना है कि दुनियाबी जिंदगी में अहिंसा स्वीकार्य नहीं हो सकती है। हिंसा मनुष्य के स्वभाव का अपरिहार्य अंग है और आत्मसंयम द्वारा विरले जन ही उसे नियंत्रित कर पाते हैं। व्यवहार में अहिंसा पर टिके रहना आम जन के लिए असंभव है। यह निर्विवाद तथ्य है कि सामाजिक व्यवस्था सुचारु बनाए रखना हिंसा को नकारने पर असंभव है। हिंसा का प्रयोग यथासंभव कम एवं विवेकपूर्ण तरीके से करना सामाजिक व्यवस्था के लिए आवश्यक है। यह हिंसा ही है जिससे मनुष्य डरता है और सन्मार्ग पर टिकने के लिए विवश होता है।

उपर्युक्त श्लोक जिस महाभारत ग्रंथ में मिलते हैं उसी में सर्वत्र हिंसा के तमाम दृष्टांतों का उल्लेख है। इतना ही नहीं, इसी ग्रंथ में हिंसा की अपरिहार्यता की बातें भी कही गयी हैं। इसी प्रकार वाल्मिकीय रामायण भी हिंसात्मक घटनाओं का लेखाजोखा है। रामायण काल में हो महाभारत काल, हिंसा का बोलबाला सदा से ही रहा। हिंसा के बल पर ही समाज में अनुशासन स्थापित हो पाता है।

तो फिर अहिंसा के पक्ष में इतना कुछ क्यों कहा गया है? मेरी धारणा है कि जो व्यक्ति आध्यात्मिक दिशा में अग्रसर होता है वह अहिंसा का मार्ग अपनाता है, भौतिक सुख छोड़ देता है, अधिकाधिक संपदा अर्जित करने से बचता है, इत्यादि। प्राचीन काल में आध्यात्मिक उत्थान को अधिक महत्व दिया जाता था र्भौतिक उन्नति की तुलना में। “अहिंसा परमो धर्मः” धर्म के उसी आध्यात्मिक पक्ष के संदर्भ में कहा गया होगा यह मेरा मत है। धर्म के इस पक्ष को आम जन व्यवहार में न तब अपना सकते थे और न अब।

हिंसा पूर्णतः त्याज्य कभी नहीं रही है। इस विषय पर किंचित् चर्चा मेरे आगामी लेख में। – योगेन्द्र जोशी

“क: त्वम् कः अहम् कुतः आयातः …” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् – ५

इस चिट्ठे के छ: आलेखों की शृंखला की यह मेरी पांचवी प्रविष्टि है। ध्यान रहे कि इन आलेखों में आदिशंकराचार्य द्वारा विरचित “चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्” के १८ छंदों की चर्चा की जा रही है। (देखें इसका पूर्ववर्ती आलेख, दिनांक ७ मार्च, २०१७)

पहले आलेख में इस बात का उल्लेख किया था कि इस रचना में कुल सत्रह छंद हैं और उनके अतिरिक्त एक स्थायी छंद (भज गोविन्दं भज गोविन्दं …) भी है जो इनमें से प्रत्येक छंद के बाद प्रयुक्त हुआ है। यदि उक्त स्तोत्र को भजन के तौर पर गाया जाये तो यह छंद प्रत्येक के बाद गाया जायेगा। इसकी भूमिका गायन के स्थायी के समान है। इसे आगे उद्धृत किया जा रहा है:

[

भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ् करणे ॥

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब तुम्हारा मरणकाल पास आ जायेगा तब यह “डुकृञ् करणे” की रट तुम्हें नहीं बचाएगी। “डुकृञ्” संस्कृत व्याकरण की एक क्रियाधातु है जिसका अर्थ “(कर्वव्य) करना” है। इस क्रियाधातु का व्यवहार में प्रयोग सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। अर्थात्‍ इस पर बहुत दिमाग खपाना कुछ हद तक निरर्थक है। व्याकरण के अध्येता उक्त क्रियाधातु के अर्थ एवं प्रयोजन को याद रखने के लिए “डुकृञ् करणे” रटते होंगे जिसका तात्पर्य है “डुकृञ्” क्रिया “करण” (कार्य करना) के प्रयोजन में लिया जाता है । स्तोत्र के रचनाकार की दृष्टि में जीवन के अंतकाल तक सांसारिक कार्यों में ही निरंतर लिप्त रहना फलदायक नहीं है यह भाव “डुकृञ् करणे” के रटने में प्रतिबिंबित होता है।  “अब तो इस रट को छोड़ो और ईश्वर-प्रार्थना में संलग्न होओ।”

]

चिट्ठे की मौजूदा प्रविष्टि में चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् के तीन छंद क्रमशः १२, १३, एवं १४ प्रस्तुत किये जा रहे हैं । इनमें पहला छंद है:

कस्त्वं कोऽहं कुतः आयातः का मे जननी को मे तातः ।

इति परिभावय सर्वमसारं विश्वं त्यक्त्वा स्वप्नविचारम् ॥१२॥ भज …

(सर्वम् असारम् स्वप्न-विचारम् विश्वंम् त्यक्त्वा त्वम् कः, अहम्  कः कुतः आयातः, मे जननी का, मे तातः कः इति परि-भावय ।)

अर्थ – इस सारहीन स्वप्नसदृश संसार में रुचि त्यागते हुए तुम कौन हो, मैं कौन हूं, कहां से आया, कौन मेरी जन्मदात्री, कौन मेरे पिता, इन बातों पर चिंतन करो।

वैदिक दर्शन के अनुसार यह संसार एक दीर्घकालिक स्वप्न से अधिक कुछ नहीं। जब मनुष्य को परमात्म तत्व का ज्ञान हो जाता है तो संसार के सारहीन, मिथ्या अर्थात्‍ अंततः सत्य से परे होने की अनुभूति हो जाती है। तब सभी रिश्ते-नाते अर्थहीन हो जाते हैं।

गेयं गीतानामसहस्रं ध्येयं श्रीपतिरूपमजस्रम् ।

नेयं सज्जनसङ्गे चित्तं देयं दीनजनाय च वित्तम् ॥१३॥ भज …

(गीता-नाम-सहस्रम् गेयम् , अजस्रम् श्री-पति-रूपम् ध्येयंम्, सज्जन-सङ्गे चित्तम्  नेयम् दीन-जनाय च वित्तम् देयम्‍ ।)

अर्थ – भगवद्गीता और विष्णुसहस्रनाम का पाठ करना चाहिए, भगवान्‍ विष्णु के रूप का निरंतर ध्यान करना चाहिए, अपना चित्त सज्जनों की संगत में लगाना चाहिए, और दीनहीन जनों को धन-दान करना चाहिए।

इस छंद में ईश्वरभक्ति और सत्कार्यों में मन लगाने का उपदेश दिया गया है।

यावज्जीवो निवसति देहे कुशलं तावत्पृच्छति गेहे ।

गतवति वायौ देहापाये भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये ॥१४॥ भज …

(जीवः यावत् देहे निवसति तावत् गेहे कुशलम्  पृच्छति, देह-अपाये वायौ गतवति तस्मिन्  काये भार्या बिभ्यति ।)

अर्थ – जब तक जीवधारी (संदर्भ में मनुष्य) शरीर में रहता है तब तक हर कोई घर में कुशलक्षेम पूछता है। शरीर के गिरने और प्राणवायु के निकलने पर उस शरीर से पत्नी तक डर जाती है।

     मनुष्य से किसी का भी लगाव तभी तक रहता है जब तक उसके शरीर में प्राण रहते है। जैसे ही काल-कलवित होकर वह निष्प्राण हो जाता है उससे सभी विरत होने लगते है। जिस पत्नी से आजीवन उसके अंतरंग संबंध रहे हों वह तक उस शरीर से दूर हो जाती है। यही इस जीवन का सच है। इन छंदों से यह संदेश मिलता है कि जब संसार को त्यागना ही होता है, तब क्यों न जीवितावस्था में ही उससे मोह त्यागते हुए ईश्वरप्राप्ति के प्रयास किए जाएं। – योगेन्द्र जोशी

“… ज्ञाते तत्वे कः संसारः ” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् – ४

… तत्व अर्थात् सृष्टि के अंतिम सत्य (परमात्मा) का ज्ञान प्राप्त हो जाने पर यह संसार अर्थहीन लगने लगता है।

इस चिट्ठे के छ: आलेखों की शृंखला की यह मेरी चौथी प्रविष्टि है। याद दिला दूं कि इन आलेखों में आदिशंकराचार्य द्वारा विरचित “चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्” के १८ छंदों की चर्चा की जा रही है। (देखें इसका पूर्ववर्ती आलेख, दिनांक ११ फरवरी, २०१७)

पहले आलेख में इस बात का उल्लेख किया था कि इस रचना में कुल सत्रह छंद हैं और उनके अतिरिक्त एक स्थायी छंद (भज गोविन्दं भज गोविन्दं …) भी है जो इनमें से प्रत्येक छंद के बाद प्रयुक्त हुआ है। यदि उक्त स्तोत्र को भजन के तौर पर गाया जाये तो यह छंद प्रत्येक के बाद गाया जायेगा। इसकी भूमिका गायन के स्थायी के समान है। इसे आगे उद्धृत किया जा रहा है:

[

भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ्‍ करणे ॥

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब तुम्हारा मरणकाल पास आ जायेगा तब यह “डुकृञ्  करणे” की रट तुम्हें नहीं बचाएगी। “डुकृञ्‍” संस्कृत व्याकरण की एक क्रियाधातु है जिसका अर्थ “(कर्वव्य) करना” है। इस क्रियाधातु का व्यवहार में प्रयोग सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। अर्थात्‍ इस पर बहुत दिमाग खपाना कुछ हद तक निरर्थक है। व्याकरण के अध्येता उक्त क्रियाधातु के अर्थ एवं प्रयोजन को याद रखने के लिए “डुकृञ्  करणे” रटते होंगे जिसका तात्पर्य है “डुकृञ्” क्रिया “करण” (कार्य करना) के प्रयोजन में लिया जाता है । स्तोत्र के रचनाकार की दृष्टि में जीवन के अंतकाल तक सांसारिक कार्यों में ही निरंतर लिप्त रहना फलदायक नहीं है यह भाव “डुकृञ्  करणे” के रटने में प्रतिबिंबित होता है।  “अब तो इस रट को छोड़ो और ईश्वर-प्रार्थना में संलग्न होओ।”

]

चिट्ठे की मौजूदा प्रविष्टि में चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् के तीन छंद (क्रमिकता में ९, १०, एवं ११) प्रस्तुत किये जा रहे हैं । इनमें पहला छंद है:

पुनरपि रजनी पुनरपि दिवसः पुनरपि पक्षः पुनरपि मासः ।

पुनरप्ययनं पुनरपि वर्षं तदपि न मुञ्चत्याशामर्षम् ॥९॥ भज …

(पुनः अपि रजनी पुनः अपि दिवसः पुनःअपि पक्षः पुनःअपि मासः पुनः अपि अयनंम् पुनः अपि वर्षं तत् अपि न मुञ्चति आशा-अमर्षम् ।)

अर्थ – रात्रि पुनः-पुनः आती है, दिन भी फिर-फिर आता है। महीने के पक्ष और स्वयं महीने बारबार आते-जाते रहते हैं। वर्ष के दोनों अयन (अर्धवार्षिक) एवं स्वयं वर्ष भी आते हैं, जाते हैं। किंतु मनुष्य की आशा और असहनशीलता यथावत बनी रहती हैं, छोड़ के जाती नहीं।

रात्रि, दिवस, पक्ष, माह, अयन और वर्ष ये सभी निरंतर प्रवाहित हो रहे समय के अलग-अलग माप के कालखंड हैं। मनुष्य के जीवन में ये कालखंड बारंबार आते-जाते रहते हैं। श्रीशंकराचार्य का कथन है कि एक नहीं दो नहीं, अनेक कालखंड व्यतीत हो जाते हैं पंरतु उसके जीवन की आशा और असहनशीलता में अंतर नहीं आता है। मेरी समझ में मौजूदा प्रसंग में असहनशीलता के अर्थ “विपरीत परिस्थितियों में विचलित हो जाना” से लिया जाना चाहिए। मतलब यह है कि वृद्धावस्था में मनुष्य मनोनुकूल घटित न होने पर बेचैन हो जाता था। वह वस्तुस्थिति को सह नहीं पाता है।

ध्यान दें कि काल-मापन की भारतीय पद्धति में महीने के दो पक्ष होते हैं: कृष्ण एवं शुक्ल। इसी प्रकार वर्ष के भी अयन नाम से दो भाग होते हैं: दक्षिणायण एवं उत्तरायण। दक्षिणायण में सूर्य का झुकाव दक्षिण की ओर होता जाता है और फलतः दिन छोटे तथा रात्रि बड़ी होने लगते है। उत्तरायण में सूर्य उत्तर की ओर लौटने लगता है और फलतः दिन बड़े होने लगते हैं तथा रातें छोटी। संस्कृत के संधि एवं ध्वनि संबंधी नियमों के अनुसार अयन के न का ण हो जाता है यदि उसके पहले टवर्ग का कोई वर्ण, या ष अथवा र आते हों। अर्थात् उत्तर+अयन = उत्तर+अयण = उत्तरायण और दक्षिण+अयन = दक्षिण+अयण = दक्षिणायण।

अगला छंद है:

वयसि गते कः कामविकारः शुष्के नीरे कः कासारः ।

नष्टे द्रव्ये कः परिवारो ज्ञाते तत्वे कः संसारः ॥१०॥ भज …

(वयसि गते कः काम-विकारः शुष्के नीरे कः कासारः नष्टे द्रव्ये कः परिवारः ज्ञाते तत्वे कः संसारः।)

अर्थ – अवस्था ढलने पर काम-विकार कैसा, पानी सूखने पर जलाशय कहां रह जाता है, धन-संपदा की समाप्ति पर परिवार कैसा, और इसी प्रकार तत्वज्ञान की प्राप्ति पर संसार कहां रह जाता है?

इस कथन के अनुसार कुछ बातें स्वाभाविक तौर पर घटित होती हैं। जीवन के अंतिम पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते काम-भावना समाप्त होने लगती है। काम शब्द के अर्थ सामन्यतः इच्छा या लालसा से लिया जाता है। इसे विशेष तौर पर यौनेच्छा से भी जोड़ा जाता है। (रतिशास्त्र में कामदेव इसी इच्छा के प्रतीक हैं।) इच्छाएं तो मनुष्य की मरते दम तक बनी रहती हैं। यह भी हो जाये, वह भी हो जाए जैसी लालसाएं तो बनी ही रहती हैं। यौनेच्छा कदाचित् समाप्त होने लगती है, शारीरिक सामर्थ्य के घटने से। इसलिए मेरा सोचना है कि इस कथन में काम-विकार उसी को इंगित करता है। जलाशय तभी तक अर्थ रखता है जब तक उसमें जल रहे। परिवार भी आपको तभी तक महत्व देता है जब तक कि संपदा हो। उल्लिखित सभी चीजें स्वाभाविक रूप से समाप्त होने लगती हैं । उनके विपरीत किंतु ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रयास करने होते हैं। और वह जब प्राप्त होता है तब यह संसार सारहीन लगने लगता है।

तृतीय छंद:

नारीस्तनभरनाभिनिवेशं मिथ्यामायामोहावेशम् ।

एतन्मांसवसादिविकारं मनसि विचारय बारम्बारम् ॥११॥ भज …

(नारी-स्तन-भर-नाभि-निवेशं मिथ्या-माया-मोह-आवेशम् एतत् मांस-वसा-आदि विकारम् मनसि विचारय बारम्बारम्)

अर्थ – नारी के स्तनों एवं नाभि (यौनांग) में निवेश माया एवं मोह जनित मिथ्या (निरर्थक) रुचि है। ये शरीर के मांस एवं वसा के विकार मात्र हैं यह बात निरंतर अपने विचार में रखो।

निवेश शब्द के अर्थ संबधित अंगों में रुचि लेना अर्थात्‍ उनको लेकर रतिक्रीड़ा करना लिया जा सकता है। मांस/वसा के विकार का अर्थ है कि मांस एवं वसा से बने इस शरीर के किसी अंग ने कुछ ऐसा स्वरूप ले लिया कि वे आकर्षक लगने लगे। “अरे पुरुष, यह मत भूलो कि ये वस्तुतः मांस-वसा से ही बने हैं जैसे शरीर के अन्य अंग, फिर उनमें विशेष रुचि क्यों?”

काम-भावना से मुक्त, विरक्त, व्यक्ति के लिए ये विचार सहज रूप से स्वीकार्य होंगे, किंतु सामान्य व्यक्ति को दिक्कत होगी।

     इस स्थल पर मुझे एक गंभीर टिप्पणी की आवश्यकता महसूस होती है। इस श्लोक में मुझे लगता है स्त्री को अस्पष्ट शब्दों में भोग्या वस्तु के तौर पर दर्शाया गया है। मैंने जितने भी धर्मों और धार्मिक परंपराओं की जानकारी अर्जित की है उन सभी में पुरुष को ही केंद्र में रखकर बातें कही गयी हैं। इस बात पर गौर करें कि सभी धर्मों के प्रणेता या उनकी मान्यताओं में योगदान करने तथा उन्हें आगे बढ़ाने वाले पुरुष ही रहे हैं। सभी धर्मों में पुरुषों के कर्तव्यों तथा हितों की बातें कही गयी हैं और स्त्री को उनके अधीनस्थ दोयम दर्जे के व्यक्ति के तौर पर देखा गया है। कुर’आन में साफ तौर पर कहा गया है कि अल्लाह ने पुरुष को श्रेष्ठतर बनाया है और स्त्री को उसके कहे अनुसार चलने को कहा गया है (कुर’आन, सुरा ४, आयत ३४)। कहा जाता है कि बौद्ध धर्म के आरंमिक काल में स्त्रियों को धर्म-संघों में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। अरबी मूल के धर्मों मे सभी पैगंबर पुरुष ही रहे हैं। भारत में भी ऋषि-मुनि पुरुष ही हुए हैं (शायद कुछ अपवाद हों)। मनुस्मृति (अध्याय ५, श्लोक १४७, १४८) में कहा गया है कि स्त्री बचपन में पिता के, दाम्पत्य जीवन में पति के, और उसके बाद पुत्रों के अधीन होती है; वह स्वतंत्र रहने की अधिकारिणी नहीं होती है। कट्टर धार्मिक मान्यताओं वाले कुछ लोग स्त्री को नर्क का द्वार बताते हैं। इस प्रकार की तमाम बातें सभी समाजों, धर्मों में देखने को मिलती हैं। उक्त छंद में स्त्री को इन्हीं विचारों के अनुरूप प्रस्तुत किया गया है ऐसा मेरा मत है। इस छंद से यही प्रतीत होता है कि पुरुष के लिए स्त्री मांस का लोथड़ा भर है; स्त्री के लिए पुरुष क्या है? मेरे पास उत्तर नहीं है! – योगेन्द्र जोशी

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