“चरैवेति चरैवेति” (ऐतरेय ब्राह्मण) – (3) “चरैवेति” का उपदेश एवं ब्राह्मण बालक शुनःशेप की कथा

पिछली दो ब्लॉग-प्रविष्टियों (अक्टूबर 3 तथा अक्टूबर 5, 2015) में मैंने राजा हरिश्चंद्र और उनके पुत्र रोहित की कथा का वर्णन करते हुए इस बात का उल्लेख किया था कि कैसे ब्राह्मण भेषधारी इंद्र द्वारा “चरैवेति” के उपदेश से प्रेरित होकर रोहित करीब पांच वर्ष तक देश-प्रदेश में विचरण करता रहा । पांचवें वर्ष के अंत पर जब वह घर लौटने को उद्यत हुआ तो मार्ग में उसे ब्राह्मण भेष में पुनः इंन्द्र देवता मिल गए । उन्होंने पिछली बारों की तरह “चरैवेति” का उपदेश दिया और कहा –

चरन् वै मधु विन्दति चरन् स्वादुमुदुम्बरम् ।

सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरंश्चरैवेति ॥

(चरन् वै मधु विन्दति, चरन् स्वादुम् उदुम्बरम्, सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यः चरन् न तन्द्रयते, चर एव इति ।)

अर्थ – इतस्ततः भ्रमण करते हुए मनुष्य को मधु (शहद) प्राप्त होता है, उसे उदुम्बर (गूलर?) सरीखे सुस्वादु फल मिलते हैं । सूर्य की श्रेष्ठता को तो देखो जो विचरणरत रहते हुए आलस्य नहीं करता है । उसी प्रकार तुम भी चलते रहो (चर एव) ।

मधु और उदुम्बर प्रतीक हैं मार्ग में उपलब्ध खाद्य पदाथों के । (शब्दकोश में उदुम्बर का अर्थ गूलर का फल दिया गया है ।) प्राचीन काल में विचरण करता हुआ व्यक्ति कभी वनों से गुजरता होगा तो कभी ऋषि-मुनियों के आश्रम में और कभी गांवों में पहुंचता होगा । उसे वन्य कंद-फल आदि के अतिरिक्त वन तथा ग्रामवासियों से आतिथ्य में विविध भोज्य पदार्थ प्राप्त होते होंगे । उक्त श्लोक उन्हीं की ओर संकेत करता है ।

ब्राह्मण की सलाह के अनुरूप कुमार रोहित छठे वर्ष भी पर्यटन पर चला गया । इस बार वनक्षेत्र में विचरण करते हुए उसकी भेंट सुयवस के पुत्र निर्धन अजीगर्त नामक ऋषि से हुई ।

अजीगर्त के तीन बालक-पुत्र थे जिनके नाम क्रमशः शुनःपुच्छ, शुनःशेप और शुनोलांगूल थे । (तीनों शब्दों, पुच्छ, शेप तथा लांगूल, का एक ही अर्थ पूंछ होता है । श्वन् = कुत्ता; शुनः = कुत्ते की; शुनःपुच्छ = कुत्ते की पूंछ । ऐसे नाम क्यों चुने गये होंगे ? मैं कह नहीं सक्ता ।) रोहित ने अजीगर्त के सम्मुख प्रस्ताव रखा कि वह किसी एक पुत्र को उसे (रोहित को) बेच दे । मूल्य रूप में उनको सौ गायें दी जाएंगी । अजीगर्त को ज्येष्ठ और उसकी पत्नी को कनिष्ठ पुत्र प्यारे थे, उन्होंने मंझले शुनःशेप को बेच दिया । रोहित उसको लेकर घर लौट आया । इसके साथ ही “चरैवेति” उपदेशों की शृखला समाप्त हो गई ।

रोहित ने शुनःशेप को पिता हरिश्चन्द्र, जो जलोदर  रोग (Hydropsy या Oedema, जिसमें शरीर के कुछ अंगों में जल भरने से सूजन पैदा हो जाती है ।)से पीड़ित थे, को सोंप दिया, ताकि उसके बदले उस बालक से वरुणदेव का यजन किया जा सके और वह स्वयं मुक्त हो जावे । कथा के अनुसार वरुणदेव को क्षत्रिय बालक के बदले ब्राह्मण बालक अधिक स्वीकार्य था ।

तत्पश्चात यज्ञ की व्यवस्था की गई, जिसमें स्वयं अजीगर्त भी सम्मिलित हुए । सभी तैयारियों के अंतर्गत जब शुनःशेप को पशु की भांति यूप पर बांधने की बारी आई तो कोई भी व्यक्ति इस पापकर्म को करने को तैयार नहीं हुआ । (यज्ञमंडप में याज्ञिक कर्मों के लिए खंभा यूप कहलाता है ।) तब अजीगर्त ने सौ गायें लेकर स्वयं ही इस कार्य को संपन्न कर दिया । यूप पर पशुवत बंधे उस बालक का बध करके बलि देने के लिए कोई तैयार न हुआ । तब अजीगर्त ने अतिरिक्त सौ गायें मांगकर उस कार्य को भी पूरा करना स्वीकार कर लिया ।

शुनःशेप को यह आभास हो गया कि एक पशु की तरह यज्ञ में उसका बध किया जाना है । यज्ञ संबंधी उसके ज्ञान के अनुसार यज्ञ की “पर्यग्नि” नामक प्रक्रिया के बाद उसे बन में छोड़ा जाना चाहिए था । किंतु वहां तो उसका बध वास्तव में किया जाने वाला है । वह आत्मरक्षा हेतु ऋग्वैदिक मंत्रों से देवताओं की अर्चना करने लगा । उसने सर्वप्रथम प्रजापति (ब्रह्मा?) की प्रार्थना की जिन्होने उसे अग्नि की स्तुति करने को कहा क्योंकि वे सभी देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं ।

अग्नि की अर्चना करने पर उस ब्राह्मण बालक को सविता (सूर्य?) की प्रार्थना करने को कहा, जो सभी जीवों के जन्मदाता-पालनकर्ता हैं । सविता ने बालक से कहा कि चूंकि उसे वरुणदेव के लिए यूप पर बांधा गया है अतः वह उन्हीं की शरण में जावे । स्तुति करने पर वरुण ने कहा कि अग्नि सभी देवताओं के मुखस्वरूप हैं, क्योंकि यज्ञ की आहुतियां उन्हीं के माध्यम से देवताओं को प्राप्त होती हैं, अतः उन्हीं की शरण में वे जावें ।

बालक ने फिर से अग्नि की स्तुति की तो अग्निदेव बोले कि तुम समस्त देवों की सामूहिक स्तुति करो । उसने वही किया । तब देवगण बोले कि वह इंद्र की प्रार्थना करे जो उन सभी में श्रेष्ठतम हैं । उसने वही किया । इंद्र ने उसके लिए एक दिव्यरथ भेज दिया और कहा कि वह अश्विनी कुमारों की स्तुति करे वही उसे छोड़ देंगे । अश्विनियों की प्रार्थना करने पर उन्होंने बालक से कहा कि वह उषा (?) की स्तुति करे ताकि सभी देवता उसे मुक्त कर दें ।

शुनःशेप ने वेद की ऋचाओं के साथ स्तुति आंरभ की । जैसे-जैसे उसने एक-एककर ऋचाओं से देवताओं की स्तुति की वैसे-वैसे उसके बंधन खुलते गए, और जलोदर से स्थूल हो चुके राजा का पेट भी सामान्य होता गया । मुक्त हो चुका बालक शुनःशेप ऋषि विश्वामित्र की गोद में स्वयं को उनका पुत्र मानते हुए बैठ गया ।

शुनःशेप के विश्वामित्र का पुत्र घोषित होने पर अजीगर्त का पुत्रमोह जाग गया । उन्होंने उसे ऐसा करने से मना किया और उनके पास वापस आ जाने का आग्रह किया । इस प्रयोजन के लिए उन्होंने पूर्व में पाये गये तीन सौ गायें राजा को लौटाने की बात भी रखी । किंतु बालक शुनःशेप ने यह कहते हुए प्रस्ताव अस्वीकृत कर दिया कि जो पिता यज्ञ में अपने पुत्र का पशुवत वध करने के कुत्सित कृत्य के लिए तैयार हो उसके पितृत्व को वह अस्वीकार करता है । देवताओं की कृपा से ऋषि विश्वामित्र उसके पिता बन गयेे ।

अंततः कतिपय टिप्पणियां

“चरैवेति चरैवेति” के नाम से तीन भागों में जिस कथा का विवरण मैंने प्रस्तुत किया है उसमें निहित संदेश वस्तुतः क्या हैं यह मैं ठीक से नहीं बता सकता । मुझे ये बातें समझ में आती हैंः

(1) पु़त्र पाने की इच्छा मनुष्य में प्राचीन काल से ही रही हैं और उसके लिए वह दैवी शक्तियों के समक्ष अव्यावहारिक संकल्प भी कर बैठता है ।

(2) प्रिय व्यक्ति/वस्तु के मोह में मनुष्य अपने वादे से मुकरने हेतु बहाने भी तलाशता है ।

(3) अपने त्याग से बचने के लिये मनुष्य दूसरे को धन-संपदा देकर त्याग के लिए प्रेरित करने से नहीं हिचकता है ।

(4) अपनी प्रिय वस्तु/व्यक्ति की रक्षा के लिए मनुष्य का दैवी शक्तियों की शरण में जाना सामान्यतः सदैव होता रहा है ।

(5) इन्द्र द्वारा दिए गए “चरैवेति” के उपदेश में उद्यमशीलता का संदेश स्पष्ट है ।

(6) शुनःशेप (शुनःशेफ)  की कथा से यह भी ज्ञात होता है कि यज्ञ में नरबलि वास्तविक न होकर मात्र प्रतीकात्मक होती थी । अर्थात याज्ञिक प्रक्रिया “पर्यग्नि”(अग्निज्वालाओं से घिरा हुआ) के पश्चात बलि-पुरुष को वन में छोड़ दिया जाता था । – योगेन्द्र जोशी

 

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“चरैवेति चरैवेति” (ऐतरेय ब्राह्मण) – (2) राजा हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहित को इंद्रदेवता का “चरैवेति” का उपदेश

पिछली पोस्ट में मैंने राजा हरिश्चंद्र और वरुण देवता से वरदान में मिले उनके पुत्र रोहित की कथा का आरंभिक अंश प्रस्तुत किया था । कथा के अनुसार राजा ने रोहित को लेकर वरुण देवता का यज्ञ करना था, जिसको जानने पर रोहित वन को चला गया । वर्षोपरांत उसने घर लौटना चाहा तो मार्ग में ब्राह्ण भेषधारी इंद्र उसे मिल गये । ब्राह्मण के विचारों से प्रेरित होकर वापस पर्यटन पर चला गया । दूसरे वर्ष के समाप्त होते-होते जब वह घर लौटने लगा तो ब्राह्मण रूप में इंद्र उसे फिर मिल गए । ब्राह्मण ने उसे पुनः “चरैवेति” का उपदेश देते हुए पर्यटन करते रहने की सलाह दी –

पुष्पिण्यौ चरतो जङ्घे भूष्णुरात्मा फलग्रहिः ।

शेरेऽस्य सर्वे पाप्मानः श्रमेण प्रपथे हतश्चरैवेति ॥

(ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय 3, खण्ड 3)

(चरतः जङ्घे पुष्पिण्यौ, भूष्णुः आत्मा फलग्रहिः, अस्य श्रमेण प्रपथे हतः सर्वे पाप्मानः शेरे, चर एव इति ॥)

अर्थ – निरंतर चलने वाले की जंघाएं पुष्पित होती हैं, अर्थात उस वृक्ष की शाखाओं-उपशाखाओं की भांति होती है जिन पर सुगंधित एवं फलीभूत होने वाले फूल लगते हैं, और जिसका शरीर बढ़ते हुए वृक्ष की भांति फलों से पूरित होता है, अर्थात वह भी फलग्रहण करता है । प्रकृष्ट मार्गों पर श्रम के साथ चलते हुए उसके समस्त पाप नष्ट होकर सो जाते हैं, अर्थात निष्प्रभावी हो जाते हैं । अतः तुम चलते ही रहो (विचरण ही करते रहो, चर एव) ।

इस श्लोक की व्याख्या मुझे सरल नहीं लगी । सायण भाष्य के अनुसार विचरणशील व्यक्ति की जांघों के श्रम के फलस्वरूप मनुष्य को विभिन्न स्थानों पर भांति-भाति के भोज्य पदार्थ प्राप्त होते हैं जिनसे उसका शरीर वृद्धि एवं आरोग्य पाता है । प्रकृष्ट मार्ग के अर्थ श्रेष्ठ स्थानों यथा तीर्थस्भल, मंदिर, महात्माओं-ज्ञानियों के आश्रम-आवास से लिया गया है । इन स्थानों पर प्रवास या उनके दर्शन से उसे पुण्यलाभ होता है अर्थात उसके पाप क्षीण होकर पिष्प्रभावी हो जाते हैं ।

राजपुत्र रोहित ने ब्राह्मण की बातों को मान लिया और वह घर लौटने का विचार त्यागकर पुनः देशाटन पर निकल गया । घूमते-फिरते तीसरा वर्ष बीतने को हुआ तो उसने वापस घर लौटने का मन बनाया । इस बार भी इन्द्र देव ब्राह्मण भेष में उसे मार्ग में दर्शन देते है । वे उसे पुनः “चरैवेति” का उपदेश देते हैं । वे कहते हैं –

आस्ते भग आसीनस्योर्ध्वस्तिष्ठति तिष्ठतः ।

शेते निपद्यमानस्य चराति चरतो भगश्चरैवेति ॥

(ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय 3, खण्ड 3)

(आसीनस्य भग आस्ते, तिष्ठतः ऊर्ध्वः तिष्ठति, निपद्यमानस्य शेते, चरतः भगः चराति, चर एव इति ॥)

अर्थ – जो मनुष्य बैठा रहता है, उसका सौभाग्य (भग) भी रुका रहता है । जो उठ खड़ा होता है उसका सौभाग्य भी उसी प्रकार उठता है । जो पड़ा या लेटा रहता है उसका सौभाग्य भी सो जाता है । और जो विचरण में लगता है उसका सौभाग्य भी चलने लगता है । इसलिए तुम विचरण ही करते रहो (चर एव) ।

सौभाग्य से तात्पर्य धन-संपदा, सुख-समृद्धि से है । जो व्यक्ति निक्रिय बैठा रहता है, जो उद्यमशील नहीं होता, उसका ऐश्वर्य बढ़ नहीं पाता है । जो उद्यम हेतु उठ खड़ा होता है उसका सौभाग्य भी आगे बढ़ने के लिए उद्यत होता है । जो आलसी होता है, सोया रहता है, निश्चिंत पड़ा रहता है, उसका ऐश्वर्य नष्ट होने लगता है, उसकी समुचित देखभाल नहीं हो पाती । उसके विपरीत जो कर्मठ होता है, उद्यम में लगा रहता है, जो ऐश्वर्य-वृद्धि हेतु विभिन्न कार्यों को संपन्न करने के लिए भ्रमण करता है, यहां-वहां जाता है उसके सौभाग्य की भी वृद्धि होती है, धन-धान्य, संपदा, आगे बढ़ते हैं ।

पर्यटन में लगे रोहित का एक और वर्ष बीत गया और वह घर लौटने लगा । पिछली बारों की तरह इस बार भी उसे मार्ग में ब्राह्मण-रूपी इंद्र मिल गए, जिन्होंने उसे “चरैवेति” कहते हुए पुनः भ्रमण करते रहने की सनाह दी । रोहित उनके बचनों का सम्मान करते हुए फिर से पर्यटन में निकल गया ।

इस प्रकार रोहित चार वर्षों तक यत्रतत्र भ्रमण करता रहा । चौथे वर्ष के अंत पर जब वह घर लौटने को उद्यत हुआ तो मार्ग में उसे ब्राह्मण भेष में इंन्द्रदेव पुनः मिल गए । उन्होंने हर बार की तरह “चरैवेति” का उपदेश दिया और कहा –

कलिः शयानो भवति संजिहानस्तु द्वापरः ।

उत्तिष्ठस्त्रेता भवति कृतं संपाद्यते चरंश्चरैवेति ॥

(ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय 3, खण्ड 3)

 (शयानः कलिः भवति, संजिहानः तु द्वापरः, उत्तिष्ठः त्रेता भवति, चरन् कृतं संपाद्यते, चर एव इति ।)

अर्थ – शयन की अवस्था कलियुग के समान है, जगकर सचेत होना द्वापर के समान है, उठ खड़ा होना त्रेता सदृश है और उद्यम में संलग्न एवं चलनशील होना कृतयुग (सत्ययुग) के समान है । अतः तुम चलते ही रहो (चर एव) ।

इस श्लोक में मनुष्य की चार अवस्थाओं की तुलना चार युगों से क्रमशः की गई है । ये अवस्थाएं हैं (1) मनुष्य के निद्रामग्न एवं निष्क्रिय होने की अवस्था, (2) जागृति किंतु  आलस्य में पड़े रहने की अवस्था, (3) आलस्य त्याग उठ खड़ा होकर कार्य के लिए उद्यत होने की अवस्था, और (4) कार्य-संपादन में लगते हुए चलायमान होना । ब्राह्मण रूपी इन्द्र रोहित को समझाते हैं कि जैसे युगों में सत्ययुग उच्चतम कोटि का कहा जाता है वैसे ही उक्त चौथी अवस्था श्रेष्ठतम स्तर की कही जाएगी । उस युग में समाज सुव्यस्थित होता था और सामाजिक मूल्यों का सर्वत्र सम्मान था । उसके विपरीत कलियुग सबसे घटिया युग कहा गया है क्योंकि इस युग में समाज में स्वार्थपरता सर्वाधिक रहती है और परंपराओं का ह्रास देखने में आता है । उपर्युक्त पहली अवस्था इसी कलियुग के समान निम्न कोटि की होती है ।

उक्त प्रकार से संचरण में लगे रोहित के पांच वर्ष व्यतीत हो गये । कथा के अनुसार ब्राह्मण भेषधारी इन्द्र ने अंतिम (पांचवीं) बार फिर से रोहित को संबोधित करते हुए “चरैवेति” के महत्व का बखान किया । तदनुसार पुनः भ्रमण पर निकले रोहित को अजीगर्त नामक एक निर्धन ब्राह्मण के दर्शन हुए । उक्त वाह्मण से उसने उनके पुत्र, शुनःशेप, को खरीद लिया ताकि वह बालक वरुणदेव के लिए संपन्न किए जाने वाले यज्ञ में स्वयं के बदले इस्तेमाल कर सके ।

शुनःशेप (विकल्पतः शुनःशेफ) से संबंधित कथा का शेष और अंतिम भाग अगली पोस्ट में । – योगेन्द्र जोशी

“चरैवेति चरैवेति” (ऐतरेय ब्राह्मण) – (1) इक्ष्वाकुवंशीय राजा हरिश्चन्द्र की पुत्र-कामना की कथा

 ऐतरेय ब्राह्मण ऋग्वेद की ऋचाओं पर आधारित वैदिक कर्मकांडों से संबंधित ग्रंथ है । उसमें एक कथा का उल्लेख है इक्ष्वाकुवंशीय राजा हरिश्चन्द्र और उनके पुत्र रोहित से संबंधित । उस कथा में पांच श्लोकों का उल्लेख है, जिनके अंतिम चरण का अंत “चरैवेति” से होता है ।

कथा के अनुसार राजा हरिश्चन्द्र की कई रानियां थीं, किंतु उनको किसी से भी पुत्र की प्राप्ति न हो सकी । शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार निष्पुत्र मनुष्य का मृत्योपरांत तारण या उद्धार बिना पुत्र के नहीं होता । राजा को यही चिंता सताती रहती थी ।

एक बार उनके राजमहल में पर्वत एवं नारद नाम के दो ऋषियों ने रात्रि-विश्राम किया । उस अवसर पर राजा ने अपनी चिंता व्यक्त की और ऋषि नारद से पुत्रप्राप्ति का उपाय पूछा । ऋषि ने उनसे कहा कि वे वरुण देवता की प्रार्थना-अर्चना करें जो प्रसन्न होकर उन्हें पुत्रोत्पत्ति का वरदान देंगे ।

राजा ने वही मार्ग अपनाया । कालांतर में वरुण देवता प्रकट हुए और राजा ने उनसे कहा कि वे उन्हें पुत्र का वरदान दें जिसको लेकर वे उनका यजन (यज्ञ) करेंगे ।

टिप्पणी – जहां तक मैं जानता हूं वैदिक काल में यज्ञ में किसी प्रकार के जीवधारी की बलि देना आवश्यक नहीं होता था । फिर भी पशुबलि का उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में मिलता है । लेकिन जिस कथा का मैं जिक्र कर रहा हूं उसमें वर्णित घटनाक्रम से प्रतीत होता है कि राजा का विचार अपने भावी पुत्र की ही बलि देने का था । कदाचित वे मतिभ्रम में एक अनुचित वचन वरुणदेव को दे बैठे । इसी कथा में यह उल्लेख भी पढ़ने में आता है कि निंद्य कहते हुए नरबलि को संपन्न करने को कोई तैयार नहीं था ।

कालांतर में राजा के यहां पुत्र जन्म हो गया । तब वरुण देवता प्रकट होकर राजा को उनके संकल्प की याद दिलाई और नवजात को लेकर यज्ञ संपन्न करने को कहा । राजा ने कहा, “अभी तो अशौच की स्थिति है अतः उससे यज्ञ अनुमत नहीं है ।”

देवता वरुण मान गये । 10-दिनी अशौच पूर्ण होने पर वे पुनः प्रकट हुए और उन्होंने राजा को यज्ञ की याद दिलाई । राजा ने इस बार कहा, “किसी पशु की बलि तब तक नहीं दी जाती जब तक उसके दांत न निकल आवें । अतः दांत तो निकलने दीजिए ।”

ठीक है कहते हुए देवता चले गये । जब उस बच्चे के दांत कुछ वर्षों में निकल गये वे पुनः आए और राजा को संकल्प की याद दिलाई । इस बार राजा ने फिर बहाना बनाया और कहा, “जब पशु के आरंभिक (दूध के) सभी दांत गिर जावें तभी उसे यज्ञ में दिया जा सकता है ।”

तथास्तु कहते हुए देवता लौट गये । जब उसके दांत गिर गए तो वरुणदेव ने पुनः राजा को वादे की याद दिलाई । राजा को पुत्रमोह हो चला था, अतः उन्होंने नया बहाना पेश किया । वे बोले, “जब बालक के स्थाई दांत निकल आवें तभी उसका यजन किया जाना चाहिए ।”

इस बार फिर वरुण देवता लौट गए । समयांतर पर बालक के स्थाई दांत आ गये । राजा को उसका संकल्प स्मरण कराने देवता प्रकट हुए । राजा बोले, “हे देव, जब बालक धनुर्विद्या, युद्धकला आदि क्षत्त्रियोचित संस्कार प्राप्त कर ले तो उसके बाद मैं उससे आपका यजन करूंगा ।”

बालक का नाम रोहित था और जब वह उक्त प्रकार से सुसंस्कृत हो गया तो वरुण ने अपनी मांग पुनः दोहराई । इस बार राजा कोई बहाना नहीं बना सके । उन्होंने पुत्र रोहित को पास बुलाकर कहा, “बेटा, मैंने वरुण देवता के वरदान से तुम्हें प्राप्त किया । तब मैंने उन्हें वचन दिया था कि मैं तुम्हें बलि के रूप उन्हें सोंप दूंगा । निःसंदेह यह मेरे पाप-वचन थे । अब मुझे यजन करना ही है ।”

कुमार रोहित को यह प्रस्ताव स्वीकार्य नहीं था । उसने अपना धनुषादि आयुध उठाए और चला गया वन की ओर । एक वर्ष तक वह देशाटन करता रहा । अलग-अलग स्थलों पर गया, विभिन्न घटनाओं का अनुभव किया । इसी दौरान वरुणदेव के रोष के फलस्वरूप राजा हरिश्चंद्र रोगग्रस्त हो गए । वर्ष बीतते-बीतते रोहित ने पिता के अस्वस्थ होने का समाचार लोगों के मुख से सुना । वह घर लौटने को उद्यत हुआ । वापसी के मार्ग में ब्राह्मण भेष धारण करके इंद्र देवता उससे मिले, जिन्होंने उसे घर जाने के बजाय पुनः पर्यटन-देशाटन करते रहो की सलाह दी । ब्राह्मण ने उसको ज्ञानोपदेश दिया –

नानाश्रान्ताय श्रीरस्तीति रोहित शुश्रुम ।

पापो नृषद्वरो जन इन्द्र इच्चरतः सखा चरैवेति ॥

(ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय 3, खण्ड 3)

(रोहित, श्रान्ताय नाना श्रीः अस्ति इति शुश्रुम, नृषद्वरः जनः पापः, इन्द्रः इत् चरतः सखा, चर एव इति ।)

अर्थ – हे रोहित, परिश्रम से थकने वाले व्यक्ति को भांति-भांति की श्री यानी वैभव/संपदा प्राप्त होती हैं ऐसा हमने ज्ञानी जनों से सुना है । एक ही स्थान पर निष्क्रिय बैठे रहने वाले विद्वान व्यक्ति तक को लोग तुच्छ मानते हैं । विचरण में लगे जन का इन्द्र यानी ईश्वर साथी होता है । अतः तुम चलते ही रहो (विचरण ही करते रहो, चर एव) ।

            मेरा सोचना है कि ‘श्री’ से यहां मतलब केवल भौतिक संपदा से नहीं है बल्कि स्थान-स्थान पर विचरण करने से प्राप्त ज्ञान, भांति-भांति के लोगों से प्राप्य अनुभव, उनसे सीखे गए कर्म-संपादन का कौशल, आदि से होगा । इंद्र रोहित को बताना चाहते हैं कि सम्मान उसी को मिलता है जो कर्मठ हो, अपने लिए संपदा स्वयं अर्जित करे, दूसरों पर आश्रित न हो । वह स्वयं को अकेला न समझे बल्कि दैव (ईश्वर) पर भरोसा करे ।

ब्राह्मण के उपदेशों से प्रभावित होकर रोहित पुनः देश-प्रदेश में विचरण करने लगा ।

विचरण का यह सिलसिला चार बार और चलता है । प्रत्येक वर्ष के बाद जब रोहित घर लौटने की सोचता है तो मार्ग में फिर ब्राह्ण रूपधारी इन्द्र मिलते हैं जो पुनः “चरैवेति” की सलाह देते हैं । कथा का शेष भाग देखें अगली ब्लॉग-प्रविष्टि में ।

यहां इतना और जोड़ दूं कि “चरैवेति” श्लोकों की व्याख्या ऐतरेय ब्राह्मण गंथ के सायण-भाष्य पर आधारित है । – योगेन्द्र जोशी

‘सहसा विदधीत न क्रियाम्’ – नीतिवचन संस्कृत काव्य किरातार्जुनीयम् से

किरातार्जुनीयम् प्रसिद्ध प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में से एक है । इसे एक उत्कृष्ट श्रेणी की काव्यरचना माना जाता है । इसकी रचना महाकवि भारवि द्वारा की गयी थी जिनका काल छःठी-सातवीं शताब्दि बताया जाता है । यह काव्य किरातरूपधारी शिव एवं पांडुपुत्र अर्जुन के बीच के धनुर्युद्ध तथा वाद-वार्तालाप पर केंद्रित है ।

उक्त महाकाव्य में वर्णित कथा कुछ यों हैः जब युधिष्ठिर कौरवों के साथ संपन्न द्यूतक्रीड़ा में सब कुछ हार गये तो उन्हें अपने भाइयों एवं द्रौपदी के साथ 13 वर्ष के वनवास पर जाना पड़ा । उनका अधिकांश समय द्वैतवन में बीता । वनवास के कष्टों से खिन्न होकर और कौरवों द्वारा की गयी साजिश को याद करके द्रौपदी युधिष्ठिर को अक्सर प्रेरित करती थीं कि वे युद्ध की तैयारी करें और युद्ध के माध्यम से कौरवों से अपना राजपाठ वापस लें । भीम भी द्रौपदी की बातों का पक्ष लेते हैं । भविष्य के संभावित युद्ध की तैयारी के लिए महर्षि व्यास उन्हें सलाह देते हैं कि अर्जुन तपस्या के बल पर शिव को संतुष्ट करें और उनसे अमोघ आयुध प्राप्त करें । महर्षि व्यास एक यक्ष को अर्जुन के साथ भेजते हैं जो उन्हें हिमालय के उस स्थल पर छोड़ आता है जहां अर्जुन को तप करना है । एक जंगली सुअर को तुमने नहीं मैंने मार गिराया इस दावे को लेकर अर्जुन का किरात (वनवासी एक जन जाति) रूपधारी शिव के साथ पहले विवाद फिर युद्ध होता है, और अंत में शिव अपने असली रूप में प्रकट होकर आयुधों से अर्जुन को उपकृत करते हैं ।

इस पूरे प्रकरण के आरंभ में द्रौपदी की बातों के समर्थन में भीम द्वारा युधिष्ठिर के प्रति कुछएक नीतिवचन कहे गये हैं । उन्हीं में से दो नीचे उद्धरित हैं:

सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् ।
वृणुते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः ॥३०॥

(महाकवि भारवि द्वारा रचित किरातार्जुनीयम्, द्वितीय सर्ग)
(क्रियां सहसा न विदधीत, अविवेकः आपदां परम् पदम्, विमृश्यकारिणं हि गुणलुब्धाः सम्पदः स्वयम् एव वृणुते ।)

किसी कार्य को बिना सोचे-विचारे अनायास नहीं करना चाहिए । विवेकहीनता आपदाओं का परम या आश्रय स्थान होती है । अच्छी प्रकार से गुणों की लोभी संपदाएं विचार करने वाले का स्वयमेव वरण करती हैं, उसके पास चली आती हैं ।

अभिवर्षति यो९नुपालयन्विधिबीजानि विवेकवारिणा ।
स सदा फलशालिनीं क्रियां शरदं लोक इव अधितिष्ठति ॥३१॥

(यथा पूर्वोक्त)
(यः विधिबीजानि विवेकवारिणा अनुपालयन् अभिवर्षति सः सदा फलशालिनीं क्रियां लोकः शरदम् इव अधितिष्ठति ।)

जो कृत्य या करने योग्य कार्य रूपी बीजों को विवेक रूपी जल से धैर्य के साथ सींचता है वह मनुष्य फलदायी शरद ऋतु की भांति कर्म-साफल्य को प्राप्त करता है ।

इन श्लोकों में जो भाव व्यक्त किए गये हैं वे कुछ हद तक इस दोहे में निहित हैं:
“बिना विचारे जो करे सो पाछे पछताय
काम बिगाड़े आपनो जग में होत हंसाय ।”

कोई भी कार्य उसके संभावित परिणामों पर सावधानी से विचार करने के बाद ही संपन्न करना चाहिए, न कि जल्दीबाजी में जैसा कि आदमी कभी-कभी कर बैठता है । हड़बड़ी में काम बिगड़ जाते हैं, यह सुविख्यात है । जल्दीबाजी के परिणाम यदि गंभीर रूप से हानिकर न हों तो कोई बात नहीं । लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है कि सुधार करने या परिणाम पलटने के उपाय बचते ही नहीं, और केवल पश्चाताप करने को रह जाता है । मुझे अपने अध्यापन-काल की एक घटना याद आती है । वर्षों पहले छात्रावास में रहने वाली एक छात्रा अन्य छात्रा के व्यवहार से क्षुब्ध हो गई और उसने सल्फास की गोली खाकर आत्महत्या का कदम उठाया था । आनन-फानन में उसे अस्पताल में भरती कराया गया । घोर पीड़ा से वह तड़प तो रही ही थी, उसे अपनी गलती का एहसास भी हो गया था । चिकित्सकों से उसने बचा लेने ही गुहार लगाई । किंतु तब तक काफी देर हो चुकी थी । कुछ घंटों के बाद उसने दम तोड़ किया । आत्महत्या के अधिकांश मामले आवेश में किए गये कृत्य होते हैं ।

प्रथम श्लोक में कहा गया है कि संपदाएं गुणी व्यक्ति का वरण करती हैं । मेरे विचार से यहां गुण शब्द एक विशेष अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । नीतिकार का इशारा उन गुणों से है जिनके माध्यम से व्यक्ति किसी कार्य के लिए समुचित अवसर तलाशता है, उसे कब और कैसे सिद्ध करें इसका निर्णय लेता है और तदर्थ संसाधन जुटाता है । यहां गुण शब्द का अर्थ सद्गुणों से नहीं है । परिणामों का सही आकलन करके कार्य करने का कौशल ही गुण है ।

दूसरे श्लोक में नीतिकार ने कार्य को फसली बीज की, बुद्धिमत्ता को पौधे को सींचने हेतु जल की, फलप्राप्ति को शरद-ऋतु में तैयार फसल की उपमा दी है । – योगेन्द्र जोशी

लक्ष्मण रेखा …, किंतु रामचरितमानस, महाभारत एवं रामायण में इसका उल्लेख ही नहीं! (तृतीय भाग – महाभारत)

पिछली दो पोस्टों (देखें 12 मई एवं 13 मई, 2010) में मैंने इस बात की चर्चा की थी कि रामकथा से संबंधित तीन महान् ग्रंथों, रामचरितमानस, महाभारत एवं रामायण, में ‘लक्ष्मण रेखा’ का कहीं उल्लेख नहीं मिलता । मैं आगे दी गयी पाठ्य सामग्री में किंचित् विस्तार से सीताहरण का वह वर्णन प्रस्तुत कर रहा हूं जो वेदव्यासरचित महाभारत में उपलब्ध है । उक्त ग्रंथ के वनपर्व में रामकथा का वर्णन है । संबंधित स्थल पर स्वर्णमृग मारीच के मारे जाने के पश्चात् की घटनाओं का वर्णन इस प्रकार किया है:
(संदर्भः व्यासरचितमहाभारत, वनपर्व, अध्याय २७८, श्लोक २४ एवं उसके आगे ।)

सा प्राद्रवत् यतः शब्दस्तामुवाच लक्ष्मणः ।
अलं ते शङ्कया भीरु को रामं प्रहरिस्यति ।।२४।।
मृहूर्ताद् द्रक्ष्यसे रामं भर्तारं त्वं शुचिस्मिते ।
इत्युक्ता सा प्ररुदती पर्यशङ्कत लक्ष्मणम् ।।२५।।
हता वै स्त्रीस्वभावेन शुक्लचारित्रभूषणा ।
सा तं परुषमारब्धा वक्तुं साध्वी पतिव्रता ।।२६।।

[ स्वर्णमृग बने मारीच ने श्रीराम के वाण से आहत होने पर ‘हे लक्ष्मण’ पुकारते हुए जब आर्तनाद किया और उसकी ध्वनि सीता ने सुनी तो वे विचलित हो बैठीं और …]
जिस ओर से शब्द सुनाई दिये उस ओर दौड़ पड़ीं । लक्ष्मण ने उन्हें समझाते हुए कहा “हे भीरु, किसी प्रकार की शंका मत करें, राम पर प्रहार कर सकने की सामर्थ्य भला किस में है । शुचिस्मिते, क्षण भर में ही आपको अपने पति श्रीराम के दर्शन मिल जाएंगे ।” ऐसा कहे जाने पर वे रोते हुए लक्ष्मण को शंका की दृष्टि से देखने लगीं । उज्ज्वल चरित्र वाली उन सीता की उस समय सहज स्त्री स्वभाव के कारण मति मारी गई । फलतः पतिव्रता साध्वी नारी सीता उन लक्ष्मण को कठोर, लांछनात्मक, वचन बोलने लगीं ।
[भीरु के शाब्दिक अर्थ है साहसहीन या संकोची । पौराणिक संस्कृत काव्यों में इसका प्रयोग स्त्रियों के प्रति संबोधन के रूप में देखने को मिलता है । शुचिस्मिते माने हे निष्कपट मुस्कान वाली ।]

अगले २७-२८ श्लोकों के बाद ऐसा उल्लिखित है:

निहीनमुपतिष्ठेयं शार्दूली क्रोष्टुकं यथा ।
एतादृशं वचः श्रुत्वा लक्ष्मणः प्रियराघवः ।।२९।।
पिधाय कर्णौ सद्वृत्तः प्रस्थितो येन राघवः ।
स रामस्य पदं गृह्य प्रससार धनुर्धरः ।।३०।।
अवीक्षमाणो बिम्बोष्ठीं प्रययौ लक्ष्मणस्तदा ।
एतस्मिन्नन्तरे रक्षो रावणो प्रत्यदृश्यत ।।३१।

जैसे सिंहनी सियार को स्वीकार नहीं कर सकती वैसे ही मैं तुम्हारी नहीं हो सकती । [कथन का अभिप्राय है कि सीता ने लक्ष्मण पर यह आक्षेप लगाना आंरभ किया वे चाहते हैं कि राम न रहें ताकि वे उन्हें अपनी भार्या बना सकें ।] राम के प्रिय तथा सदाचारी लक्ष्मण ने ऐसे कटु वचन सुनकर अपने दोनों कान ढक लिए और हाथ में धनुष लिए हुए उसी मार्ग पर चल दिए जिससे राम गये थे । बिम्बफल की भांति रक्तिम होंठों वाली सीता पर दृष्टि डाले बिना उन्होंने प्रस्थान किया । इसी बीच (अवसर पाकर) रावण वहां दिखाई दे पड़ा अर्थात् उपस्थित हो गया । [बिम्बफल – एक विशेष फल जो पकने पर सुर्ख लाल दिखता है ।]

अभव्यो भव्यरूपेण भस्मच्छन्न इवानल ।
यतिवेशप्रतिछन्नो जिहीर्षुस्तामनिन्दिताम् ।।३२।।
सा तमालक्ष्य सम्प्राप्तं धर्मज्ञा जनकात्मजा ।
निमन्त्रयामास तदा फलमूलाशनादिभिः ।।३३।।
अवमन्य ततः सर्वं स्वरूपं प्रत्यपद्यत ।
सान्त्वयामास वैदेहीमिति राक्षसपुङ्गवः ।।३४।।
सीते राक्षसराजो९हं रावणो नाम विश्रुतम् ।
मम लङ्कापुरी नाम्ना रम्या पारे महोदधेः ।।३५।।

सामान्यतः भयानक रूप वाले उस राक्षस रावण ने सुंदर छवि के साथ यति या संन्यासी के छद्म रूप से अपने को ढक रखा था, राख के भीतर छिपी सुलगती आग की भांति । संन्यासी रूपी रावण को पास आया देख धर्मकर्म में आस्था वाली सीता उसका कंद-मूल-फलों जैसे भोज्य पदार्थों से आदर-सत्कार करने लगीं । उस सब को नजरअंदाज करते हुए वह राक्षसराज अपने असल रूप में प्रकट हो गया और सीता को यों समझाने लगाः हे सीते, मैं राक्षसों का राजा हूं और रावण के नाम से जाना जाता हूं । महासागर के पार लंका नाम से मेरी रमणीय नगरी वसी है ।

इतना बताने के बाद रावण सीता के समक्ष उसकी महारानी बनने का प्रलोभन प्रस्तुत करता है:

तत्र त्वं नरनारीषु शोभिष्यसि मया सह ।
भार्या भव मम सुश्रोणि तापसं त्यज राघवम् ।।३६।।
एवमादीनि वाक्यानि श्रुत्वा तस्याथ जानकी ।
पिधाय कर्णौ सुश्रोणी मैवममित्यब्रवीत् वचः ।।३७।।

वहां लंका में तुम मेरे संग नर-नारियों के मध्य शोभायमान होगी, अतः मेरी भार्या बन जाओ और बेचारे तपस्वी राम को छोड़ दो । रावण के मुख से इसी प्रकार की और भी बातें सुनने पर सीता ने अपने कान बंद करते हुए उससे वैसे निन्द्य वचन न बोलने का आग्रह किया ।

सीता रावण को और भी खरीखोटी सुनाती है जिसका वर्णन अगले ३८-४० श्लोकों में मिलता है । अंत में वह कुपित हो अपनी पर्णकुटी के भीतर जाने लगती है । देखे:

इति सा तं समाभाष्य प्रविवेशाश्रमं ततः ।
क्रोधात् प्रस्फुरमाणौष्ठी विधुन्वाना करौ मुहुः ।।४१।।
तामभिद्रुत्य सुश्रोणीं रावणः प्रत्यषेधयत् ।
भर्त्सयित्वा तु रुक्षेण स्वरेण गतचेतसाम् ।।४२।।

इतना सब कहने के बाद क्रोध के कारण फड़फड़ाते होठों के साथ और अपने हाथ मसलती हुई सीता अपने आश्रम (कुटी) के अंदर प्रवेश करने लगती है । तुरंत लपकते हुए और रूखे शब्दों से डराते-धमकाते हुए रावण बदहवास-सी सीता का रास्ता रोक देता है ।

इसके बाद की कहानी सीता का रावण द्वारा जबरन उठाये जाने की है । ऐसा विवरण कहीं नहीं है कि उसने सीता से किसी सुरक्षा घेरे से बाहर निकलकर भिक्षा देने की मांग की हो । कुल मिलाकर न तो लक्ष्मण द्वारा खींचे गये सुरक्षा घेरे का उल्लेख है और न ही सीता द्वारा उस घेरे के उल्लंघन का ।

तब ‘लक्ष्मण रेखा’ की कथा कहां से प्रचलन में आई होगी ? सीताहरण का उपर्युक्त जैसा ही वर्णन कमोबेश वाल्मीकीय रामायण में भी मिलता है । अगले आलेख में उसकी चर्चा । – योगेन्द्र जोशी

लक्ष्मण रेखा …, किंतु रामचरितमानस, महाभारत एवं रामायण में इसका उल्लेख ही नहीं! (द्वितीय भाग – रामचरितमानस)

पिछली पोस्ट (12 मई 2010) में मैंने अपने मन में उठे इस प्रश्न का जिक्र किया था कि ‘लक्ष्मण रेखा’ का रामकथा के अंतर्गत घटित किसी घटना से क्या वाकई कोई संबंध है । जिन तीन ग्रंथों में मैंने उत्तर खोजने की चेष्टा की उनमें ऐसा कुछ भी नहीं मिला । उनमें से एक गोस्वामी तुलसीदासकृत रामचरितमानस में सीताहरण का जो वर्णन मुझे पढ़ने को मिला उसका सार्थक अंश मैं यहां प्रस्तुत कर रहा हूं । यह पाठ मेरे पास उपलब्ध उक्त ग्रंथ की गीताप्रेस, गोरखपुर, द्वारा प्रकाशित प्रति पर आधारित है ।
(संदर्भः रामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, दोहा सं. 27 के बाद के दोहे-चौपाइयां)

प्रसंग के अनुसार जब श्रीराम द्वारा स्वर्णमृग बने मारीच का वन में वध होता है तब उसके मुख से निकले‘हा लक्ष्मण’ का आर्तनाद सुनकर सीता विचलित हो उठती हैं और श्रीराम की सहायता करने लक्ष्मण से वन में जाने का आग्रह करती हैं । संबंधित वर्णन यों हैः

जाहु बेगि संकट अति भ्राता । लछिमन बिहसि कहा सुनु माता ।।

भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई । सपनेहु संकट परइ कि सोई ।।

मरम बचन जब सीता बोला । हरि प्रेरित लछिमन मन डोला ।।

बन दिसि सौंपि सब काहू । चले जहां रावन ससि राहू ।।

सून बीच दसकंधर देखा । आवा निकट जती कें बेषा ।।

(हे लक्ष्मण, जल्दी से जाओ, तुम्हारे भाई पर संकट आ पड़ा है । उत्तरस्वरूप लक्ष्मण ने हंसते हुए कहा, “हे माता, जिसके भौं के इशारे भर से सृष्टि का ही विलय हो जाए, ऐसे राम पर सपने में भी संकट आ सकता है भला?” तत्पश्चात् जब सीता के मुख से मर्मस्पर्शी या दिल को चुभने वाले लांछनात्मक शब्द निकले तो भगवत्प्रेरणा से लक्ष्मण का मन विचलित हो गया । फलतः वे सीता को वन-देवता तथा दिक्पालों को सौंपकर वहां चल दिए, जहां रावण रूपी चंद्र के लिए राहु रूपी राम गये हुए थे । तब पर्णकुटी के स्थल को सूना पाने पर रावण यती/सन्यासी के वेष में सीता के निकट आ पहुंचा ।)

दो-चार चौपाइयों के बाद आगे तुलसी का वर्णन यों हैः

नाना बिधि करि कथा सुहाई । राजनीति भय प्रीति दिखाई ।।

कह सीता सुनु जती गोसाईं । बोलेहु बचन दुष्ट की नाईं ।।

तब रावन निज रूप दिखावा । भई सभय जब नाम सुनावा ।।

(रावण ने विविध प्रकार की लुभावनी बातें सुनाकर उन्हें प्रभावित करने की चेष्टा की और राजनीति, भय तथा प्रेम के मिश्रित दांव उन पर चलाए । उसकी बातें सुनकर सीता ने कहा, “अरे यति गोसाईं, आप तो दुष्टों की तरह बात कर रहे हैं, उनके जैसा बरताव कर रहे हैं ।” तब रावण ने अपना असली रूप दिखाया, अपना परिचय उनके सामने रखा । उसका नाम सुनने पर वे भयभीत हो गईं ।)

फिर आगे की घटना यों दर्शाई हैः

कह सीता धरि धीरजु गाढ़ा । आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाड़ा ।।

जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा । भएसि कालबस निसिचर नाहा ।।

सुनत बचन दससीस रिसाना । मन महुं चरन बंदि सुख माना ।।

क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाई ।

चला गगनपथ आतुर भयं रथ हांकि न जाई ।।

(भयाकुल होने के बावजूद सीता ने धैर्य से काम लिया और बोलीं, “अरे दुष्ट, जरा ठहर तो, अभी प्रभु राम लौटने ही वाले हैं । जैसे हरिबधू अर्थात् सिंहनी, (हरि माने सिंह) की कामना कोई खरगोश करे, वैसे ही, अरे निशाचर, तुम मुझे चाहकर ख्वाहमख्वाह काल के वश में हो रहे हो ।” यानी मर्यादा भूलकर अपनी मृत्यु बुला रहे हो । इन वचनों को सुनकर रावण कुपित तो हो गया, लेकिन मन ही मन सीता के चरणों की वंदना में वह सुख का भी अनुभव करने लगा । क्रोध के वशीभूत होकर उसने सीता को बलात् रथ पर बिठाया और आकाश मार्ग से उतावली के साथ चल दिया, किंतु भय के मारे उससे रथ हांका नहीं जा रहा था ।)

गोस्वामी तुलसीदास के वर्णन के अनुसार सीता द्वारा लांछन लगाए जाने पर लक्ष्मण ने उनकी सुरक्षा के बाबत वनदेवताओं से प्रार्थना की, और राम की सहायता के लिए चल पड़े । यह उल्लेख कहीं नहीं है कि वे कुटिया के बाहर किसी प्रकार का घेरा खींचकर गये, जिसका अतिक्रमण करने पर रावण भस्म हो जाता । कथा के अनुसार तो आरंभ में सीता ने रावण का आतिथ्य-सत्कार ही किया । दोनों के बीच बातें भी हुई, और जब साथ चलने के रावण के आग्रह को सीता ने ठुकराया, तब रावण ने कुपित हो उनका अपहरण किया ।

कुल मिलाकर ‘लक्ष्मण रेखा’ की बात कहीं पर नहीं कही गई है । महाभारत में भी मिलता-जुलता वर्णन पढ़ने को मिलता है, और लक्ष्मण रेखा की बात वहां भी नहीं कही गयी है । इस प्रकरण की महाभारत पर आधारित चर्चा आगामी आलेख का विषय रहेगा । – योगेन्द्र जोशी

 

इस पोस्ट में कालांतर में यह जोड़ा गया:

रामचरितमानस के लंकाकांड में चौपाइयों की ये दो पंक्तियां पढ़ने को मिलती हैं:

कंत समुझि मन तजहु कुमतिही । सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही ॥

रामानुज लघु रेख खचाई । सोउ  नहिं नाघेहु असि मनुसाई ॥

(श्रीरामचरितमानस सटीक, मझला साइज़, गीताप्रेस, गोरखपुर, १९वां पुनर्मुद्रण, सं. २०६३, लंकाकांड, पृष्ठ ७३९)

अर्थ: (प्रसंग के अनुसार महारानी मंदोदरी लंकानरेश रावण को समझाती हैं कि) हे कांत, अपने मन में किंचित विचार करो, श्रीराम और तुम्हारे मध्य यह युद्ध शोभा नहीं देता । राम के छोटे भाई (लक्ष्मण) ने छोटी-सी रेखा खींची थी, उसी को तुम लांघ नहीं पाये ऐसा तो तुम्हारा पुरुषार्थ है।

मंदोदरी के कथन के अनुसार रावण में इतना पुरुषार्थ नहीं था कि वह सीता की सुरक्षा के लिए लक्ष्मण द्वारा खींचा गया घेरा लांघ सकता । यहां यह सवाल उठता है कि मंदोदरी को कैसे पता चला कि सीता की सुरक्षा के लिए लक्ष्मण ने क्या प्रबंध किया था । वह स्वयं चस्मदीद गवाह तो हो नहीं सकती थी, क्योंकि वह सीताहरण के लिए रावण के साथ गई नही थी । ऐसे अवसर पर तो एक ही व्याख्या समीचीन हो सकती है कि उसे ऐसा किसी न किसी से सुनने को मिला होगा । मंदोदरी के सुने वचन – आंखों देखी घटना नहीं – को अधिक विश्वसनीय माना जाना चाहिए या ग्रंथकार ने रावण-सीता की भेंट, वार्तालाप, आदि का जो वर्णन किया है उस पर भरोसा किया जाए ? उस प्रकरण के अनुसार तो आरंभ में सभी कुछ सामान्य एवं सौहार्दपूर्ण था । मैं उसी वर्णन को मान्य समझता हूं और मंदोदरी के वक्तव्य को सुनी-सुनाई बात कहूंगा । इसलिए मेरे मत में लक्ष्मण रेखा की बात कथा के अनुसार काल्पनिक ही कही जायेगी । – योगेन्द्र जोशी