अहिंसा परमो धर्मः …” – महाभारत में अहिंसा संबंधी नीति वचन (2)

“अहिंसा परमो धर्मः” प्राचीन संस्कृत साहित्य में उपलब्ध नीति-वचनों में से एक है जिसका उल्लेख अहिंसा के पक्षधर लोग अक्सर करते हैं। इस विषय में महाकाव्य महाभारत के तीन श्लोकों का उल्लेख मैंने अपने पिछली चिट्ठा-प्रविष्टि (ब्लॉग-पोस्ट) में किया था। मौजूदा आलेख में उसी महाभारत ग्रंथ के अन्य तीन श्लोकों को उद्धृत कर रहा हूं जो मुझे ग्रंथ में पढ़ने को मिले। इनकी चर्चा के बाद अहिंसा कितना अव्यावहारिक विचार है इस पर मैं अपने विचार प्रस्तुत करूंगा। पहले श्लोक:

अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परो दमः ।

अहिंसा परमं दानमहिंसा परमं तपः ॥28

(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 116, दानधर्मपर्व)

(अहिंसा परमः धर्मः तथा अहिंसा परः दमः अहिंसा परमम दानम् अहिंसा परमम् तपः ।)

शब्दार्थ – अहिंसा परम धर्म है, वही परम आत्मसंयम है, वही परम दान है, और वही परम तप है।

अहिंसा परमो यज्ञस्तथाहिंसा परं फलम् ।

अहिंसा परमं मित्रमहिंसा परमं सुखम् ॥29

(यथा पूर्वोक्त)

(अहिंसा परमः यज्ञः तथा अहिंसा परम् फलम् अहिंसा परमम् मित्रम् अहिंसा परमम् सुखम् ।)

शब्दार्थ – अहिंसा परम यज्ञ है, अहिंसा ही परम फल है, वह परम मित्र है, और वही परम सुख है।

सर्वयज्ञेषु वा दानं सर्वतीर्थेषु वाऽऽप्लुतम् ।

सर्वदानफलं वापि नैतत्तुल्यमहिंसया ॥30

(यथा पूर्वोक्त)

(सर्व-यज्ञेषु वा दानम् सर्व-तीर्थेषु वा आप्लुतम् सर्व-दान-फलम् वा अपि न एतत् अहिंसया तुल्यम् ।)

शब्दार्थ – सभी यज्ञों में भरपूर दान-दक्षिणा देना, या सभी तीर्थों में पुण्यार्थ स्नान करना, या सर्वस्व दान का फल बटोरना, यह सब अहिंसा के तुल्य (समान फलदाई) नहीं हैं।

ऊपरी तौर पर देखें तो इन श्लोकों में कोई प्रभावी बात नहीं दृष्टिगत होती है। अहिंसा परम धर्म, परम आत्मसंयम, परम दान एवं  परम तप है (उपर्युक्त प्रथम श्लोक) कहने का तात्पर्य यही लिया जा सकता है कि धर्म के अंतर्गत आने वाले सभी सत्कर्मों में अहिंसा प्रथम यानी सर्वोपरि है। अहिंसा का व्रत सरल नहीं हो सकता। अहिंसा में संलग्न व्यक्ति धर्म-कर्म की अन्य बातों पर भी टिका ही रहेगा। शायद यही इस श्लोक का संदेश है।

आम तौर पर हवनकुंड की प्रज्वलित अग्नि में हविष्य (हवन-सामग्री) की आहुति देकर देवताओं की प्रार्थना को यज्ञ कहा जाता है। लेकिन यज्ञ के इससे अधिक व्यापक अर्थ भी हैं। वस्तुतः पूजा-अर्चना से परे अन्य पुण्यकर्म करना भी यज्ञ कहलाता है। मनुस्मृति में पांच महायज्ञों का जिक्र पढ़ने को मिलता है: ये हैं:

ब्रह्मयज्ञ अध्यापन-कार्य अर्थात्‍ लोगों का ज्ञानवर्धन करना।

पितृयज्ञ पितृ-तर्पण अर्थात्‍ पितरों का स्मरण एवं श्रद्धा अभिव्यक्ति।

होमकार्य दैवयज्ञ यानी देवताओं की पूजा अर्चना, यज्ञ-यागादि। (दैवयज्ञ)

भूतयज्ञ  बलिप्रदान अर्थात्‍ अन्य प्राणियों को अपने भोजन का एक अंश, जिसे बलि कहते हैं, अर्पित करना।

नृयज्ञ – विविध प्रकार से अतिथियों का सत्कार, जिसमें भोजन प्रमुख है।

इन महायज्ञों के विषय पर मैंने इसी ब्लॉग पर दो आलेख (31 मार्च, 2015 एवं 16 मार्च, 2015) विगत काल में पोस्ट की थीं।

इस स्थल पर आम आदमी के मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या अहिंसा वाकई में धर्म का श्रेष्ठतम कर्म है। उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि धर्म का क्या अर्थ है और उसके पालन का क्या उद्देश्य है। प्राचीन भारतीय चिंतकों का मत रहा है कि मनुष्य के जीवन का अंतिम उद्देश्य मुक्ति प्राप्त करना है। अर्थात् जीवन-मरण के निरंतर चलने वाले चक्र से स्वयं को मुक्त करना। इसके लिए स्वयं का आध्यात्मिक उत्थान और इस संसार के मोह से अपने को बचाना है। इसके लिए आत्मिक परिष्करण और शेष संसार के प्रति सत्कर्म करना ही मार्ग है यह उनका मत रहा है। लोकायत परंपरा (चार्वाक सिद्धांत) को छोड़कर अन्य सभी धार्मिक मत एक ही प्रकार से सोचते हैं, अंतर है तो आध्यात्मिक दर्शन में और सत्कर्मों की परिभाषा तथा उनकी परस्पर सापेक्ष वरीयता में। लोकायत में तो इस भौतिक शरीर से परे कुछ नहीं है और तदनुसार कर्मों का महत्व व्यक्ति एवं समाज के परस्पर रिश्तों के संदर्भ में होता है। इसके विपरीत जैन मत में जीवधारी सत्कर्मों के फलस्वरूप उत्तरोत्तर श्रेष्ठतर अवस्था प्राप्त करते हुए अंत में मुक्तजीव हो जाता है; बौद्ध मत में जीवधारी का कर्मशरीर शून्य में विलीन हो जाता है, कुछ भी शेष नहीं रहता; और वैदिक दर्शन में जीवधारी की आत्मा परमात्मा में मिल जाती है, इत्यादि।

आध्यात्मिक उत्थान के लिए मनुष्य के लिए सत्कर्मों का संपादन आवश्यक है और उपर्युक्त श्लोकों में वही संदेश मुझे दिखता है।

मेरा मानना है कि दुनियाबी जिंदगी में अहिंसा स्वीकार्य नहीं हो सकती है। हिंसा मनुष्य के स्वभाव का अपरिहार्य अंग है और आत्मसंयम द्वारा विरले जन ही उसे नियंत्रित कर पाते हैं। व्यवहार में अहिंसा पर टिके रहना आम जन के लिए असंभव है। यह निर्विवाद तथ्य है कि सामाजिक व्यवस्था सुचारु बनाए रखना हिंसा को नकारने पर असंभव है। हिंसा का प्रयोग यथासंभव कम एवं विवेकपूर्ण तरीके से करना सामाजिक व्यवस्था के लिए आवश्यक है। यह हिंसा ही है जिससे मनुष्य डरता है और सन्मार्ग पर टिकने के लिए विवश होता है।

उपर्युक्त श्लोक जिस महाभारत ग्रंथ में मिलते हैं उसी में सर्वत्र हिंसा के तमाम दृष्टांतों का उल्लेख है। इतना ही नहीं, इसी ग्रंथ में हिंसा की अपरिहार्यता की बातें भी कही गयी हैं। इसी प्रकार वाल्मिकीय रामायण भी हिंसात्मक घटनाओं का लेखाजोखा है। रामायण काल में हो महाभारत काल, हिंसा का बोलबाला सदा से ही रहा। हिंसा के बल पर ही समाज में अनुशासन स्थापित हो पाता है।

तो फिर अहिंसा के पक्ष में इतना कुछ क्यों कहा गया है? मेरी धारणा है कि जो व्यक्ति आध्यात्मिक दिशा में अग्रसर होता है वह अहिंसा का मार्ग अपनाता है, भौतिक सुख छोड़ देता है, अधिकाधिक संपदा अर्जित करने से बचता है, इत्यादि। प्राचीन काल में आध्यात्मिक उत्थान को अधिक महत्व दिया जाता था र्भौतिक उन्नति की तुलना में। “अहिंसा परमो धर्मः” धर्म के उसी आध्यात्मिक पक्ष के संदर्भ में कहा गया होगा यह मेरा मत है। धर्म के इस पक्ष को आम जन व्यवहार में न तब अपना सकते थे और न अब।

हिंसा पूर्णतः त्याज्य कभी नहीं रही है। इस विषय पर किंचित् चर्चा मेरे आगामी लेख में। – योगेन्द्र जोशी

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“अहिंसा परमो धर्मः …” – महाभारत में अहिंसा संबंधी नीति वचन (1)

“अहिंसा परमो धर्मः” यह नीति-वचन लोगों के मुख से अक्सर सुनने को मिलता है। प्राचीन काल में अपने भारतवर्ष में जैन तीर्थंकरों ने अहिंसा को केंद्र में रखकर अपने कर्तव्यों का निर्धारण एवं निर्वाह किया। अंतिम तीर्थंकर भगवान् महावीर के लगभग समकालीन (कुछ बाद के) महात्मा बुद्ध ने भी करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व तमाम कर्तव्यों के साथ अहिंसा का उपदेश तत्कालीन समाज को दिया था। अरब भूमि में ईशू मसीह ने भी कुछ उसी प्रकार की बातें कहीं। आधुनिक काल में महात्मा गांधी को भी अहिंसा के महान् पुजारी/उपदेष्टा के रूप में देखा जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने तो उनके सम्मान में 2 अक्टूबर को अहिंसा दिवस घोषित कर दिया।

अहिंसा की बातें घूमफिर कर सभी समाजों में की जाती रही हैं, लेकिन उसकी परिभाषा सर्वत्र एक जैसी नहीं है। उदाहरणार्थ जैन धर्म में अहिंसा की परिभाषा अति व्यापक है, किसी भी जीवधारी को किसी भी प्रकार से कष्ट में डालना वहां वर्जित है। इस धारणा के साथ जीवन धारण करना लगभग नामुमकिन है। अरब मूल के धर्मो के अनुसार मनुष्य को छोड़कर अन्य जीवों में रूह नहीं होती, तदनुसार उनके साथ अहिंसा बेमानी है। कुर’आन से मैंने यही निष्कर्ष निकाला। वास्तव में सभी समाज अपने भौतिक हितों को ध्यान में रखते हुए अहिंसा की परिभाषा अपनाते हैं। विडंबना देखिए कि महावीर, बुद्ध एवं गांधी के इस भारत में अहिंसा की कोई अहमियत नहीं। पग-पग पर हिंसा के दर्शन होते है। अहिंसा वस्तुतः एक आदर्श है जिससे आम तौर पर सभी परहेज करते हैं। लेकिन “अहिंसा परमो धर्मः” की बात मंच पर सभी कहते हैं।

अस्तु, अहिंसा या हिंसा की वकालत करना इस आलेख में मेरा उद्देश्य नहीं है। “अहिंसा परमो धर्मः” की नीति की मानव जीवन में सार्थकता है या नहीं इसकी समीक्षा मैं नहीं कर रहा हूं। मैं केवल यह बताना चाहता हूं कि इस नीति का उल्लेख महाभारत महाकाव्य में कई स्थालों पर देखने को मिलता है। उन्हीं की चर्चा करना मेरा प्रयोजन है। जो यहां उल्लिखित हो उसके अतिरिक्त भी अन्य स्थलों पर बातें कही गयी होंगी जिनका ध्यान या जानकारी मुझे नहीं है।

अहिंसा परमो धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः ।

सत्ये कृत्वा प्रतिष्ठां तु प्रवर्तन्ते प्रवृत्तयः ॥74

(महाभारत, वन पर्व, अध्याय 207 – मारकण्डेयसमास्यापर्व)

(अहिंसा परमः धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः सत्ये तु प्रतिष्ठाम् कृत्वा प्रवृत्तयः प्रवर्तन्ते ।)

अर्थ – अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है, और वह सत्य पर ही टिका होता है। सत्य में निष्ठा रखते हुए ही कार्य संपन्न होते हैं।

यहां कार्य से तात्पर्य सत्कर्मों से होना चाहिए। सत्कर्म सत्य के मार्ग पर चलने से ही संभव होते हैं। धर्म बहुआयामी अवधरणा है। मनुष्य के करने और न करने योग्य अनेकानेक कर्मों का समुच्चय धर्म को परिभाषित करता है। करने योग्य कर्मों में अहिंसा सबसे ऊपर या सबसे पहले है यह उपदेष्टा का मत है।

महाभारत ग्रंथ के वन पर्व में पांडवों के 12 वर्षों के वनवास (उसके पश्चात् एक वर्ष का नगरीय अज्ञातवास भी पूरा करना था) का वर्णन है। वे वन में तमाम ऋषि-मुनियों के संपर्क में आते हैं जिनसे उन्हें भांति-भांति का ज्ञान मिलता है। उसी वन पर्व में पांडवों का साक्षात्कार ऋषि मारकंडेय से भी होता है। ऋषि के मुख से उन्हें कौशिक नाम के ब्राह्मण और धर्मनिष्ठ व्याध के बीच के वार्तालाप की बात सुनने को मिलती है। उक्त श्लोक उसी के अंतर्गत उपलब्ध है।

अगले दो श्लोक अनुशासन पर्व से लिए गए हैं। महाभारत युद्ध के बाद सब शांत हो जाता है और युधिष्ठिर राजा का दायित्व संभाल लेते हैं। भीष्म पितामह सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में मृत्यु-शैया पर लेटे होते हैं। वे युधिष्ठिर को राजधर्म एवं नीति आदि का उपदेश देते हैं। ये श्लोक उसी प्रकरण के हैं।

अहिंसा सर्वभूतेभ्यः संविभागश्च भागशः ।

दमस्त्यागो धृतिः सत्यं भवत्यवभृताय ते ॥18

(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 60 – दानधर्मपर्व)

(अहिंसा सर्व-भूतेभ्यः संविभागः च भागशः दमः त्यागः धृतिः सत्यम् भवति अवभृताय ते ।)

अर्थ – सभी प्राणियों के प्रति अहिंसा बरतना, सभी को यथोचित भाग सोंपना, इंद्रिय-संयम, त्याग, धैर्य एवं सत्य पर टिकना अवभृत स्नान के तुल्य (पुण्यदायी) होता है।

वैदिक परंपरा में यज्ञ-यागादि का विशेष महत्व है और उन्हें पुण्य-प्राप्ति का महान् मार्ग माना जाता है। ऐसे आयोजन के समापन के पश्चात विधि-विधान के साथ किए गये स्नान को अवभृत स्नान कहा गया है। यहां बताये गये अहिंसा आदि उस स्नान के समान फलदातक होते हैं यह श्लोक का भाव है।

उक्त श्लोक में “अहिंसा परमो धर्मः” कथन विद्यमान नहीं है, किंतु अहिंसा के महत्व को अवश्य रेखांकित किया गया है। वनपर्व का अगला श्लोक ये है:

अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तपः ।

अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते ॥23

(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 115 – दानधर्मपर्व)

(अहिंसा परमो धर्मः तथा अहिंसा परम्‍ तपः अहिंसा परमम्‍ सत्यम्‍ यतः धर्मः प्रवर्तते ।)

अर्थ – अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा परम तप है, और अहिंसा ही परम सत्य और जिससे धर्म की प्रवृत्ति आगे बढ़ती है।

इस वचन के अनुसार अहिंसा, तप और सत्य आपस में जुड़े हैं। वस्तुतः अहिंसा स्वयं में तप है, तप का अर्थ है अपने को हर विपरीत परिस्थिति में संयत और शांत रखना। जिसे तप की सामर्थ्य नहीं वह अहिंसा पर टिक नहीं सकता। इसी प्रकार सत्यवादी ही अहिंसा पर टिक सकता है यह उपदेष्टा का मत है।

अहिंसा की जितनी भी प्रशंसा हम कर लें, तथ्य यह है कि मानव समाज अहिंसा से नहीं हिंसा से चलता है। मैं अगले चिट्ठा-प्रवृष्टि में “अहिंसा …” पर अनुशासन पर्व के अन्य श्लोकों के साथ अपने इस मत की भी चर्चा करूंगा। – योगेन्द्र जोशी

संन्यास-धर्म के बारे में महाभारत में व्यक्त विचार – परिव्रजन्ति दानार्थं मुण्डाः काषायवाससः (4)

संन्यास धर्म के बारे महाभारत ग्रंथ में बहुत-सी बातें कही गई हैं । उनमें से कुछ चुनी हुई बातों का उल्लेख मैंने पिछले तीन आलेखों में किया है

(दिनांक ११ मई, ७ जून, एवं २७ जुलाई) । चार आलेखों की इस शृंखला का चतुर्थ एवं अंतिम आलेख यहां पर प्रस्तुत है ।

महाभारत ग्रंथ के शान्तिपर्व में कौरव-पांडव युद्ध की समाप्ति के बाद की स्थितियों का वर्णन है । उसी के अंतर्गत एक प्रकरण है जिसके अनुसार युद्ध के दुःखद परिणामों से विचलित होकर राजा युधिष्ठिर राजकाज छोड़कर संन्यास ग्रहण करने का विचार अपने भाइयों के समक्ष रखते हैं । द्रौपदी समेत सभी भाई उनके विचार को नकारते हुए सलाह देते हैं कि उन्हें जनता का हित साधने के लिए राजकाज चलाना चाहिए । वार्तालाप के उस सिलसिले में अर्जुन गेरुआवस्त्रधारी तथाकथित साधु-महात्माओं की कटु आलोचना भी कर डालते हैं । वे कहते हैं कि ऐसे कई लोग ढोंगी होते हैं और आम जन को मूर्ख बनाकर अपनी जीविका चलाते हैं । तत्संबंधित दो कथन आगे प्रस्तुत हैं:

परिव्रजन्ति दानार्थं मुण्डाः काषायवाससः ।

सिता बहुविधैः पाशैः सञ्चिन्वन्तो वृथामिषम् ॥32॥

(महाभारत, शान्तिपर्व, राजधर्मानुशासनपर्व, अध्याय 18)

(परि-व्रजन्ति दान-अर्थम् मुण्डाः काषाय-वाससः सिता बहु-विधैः पाशैः सञ्चिन्वन्तः वृथा आमिषम् ।)

अर्थ – मानव समाज में गेरुआ वस्त्र धारण किए हुए, विविध प्रकार के बंधनों से बंंधे हुए, भोग-लालसा की खोज में लगे हुए, कुछ लोग दान पाने की इच्छा से विचरण करते हैं ।

‘दान पाने की इच्छा’ का यहां पर तात्पर्य है बिना परिश्रम किए हुए दूसरों से धन-संपदा पाने का रास्ता अपनाना । संन्यासी सरीखे दिखने वाले वे सम्मोहक बातों से लोगों में यह भ्रम पैदा करते हैं कि वे धर्म एवं अध्यात्म परम ज्ञाता हैं और सांसारिक मोहमाया से मुक्त हैं । गंभीरता से ध्यान देने पर पता चलता है कि वे अपनी भोगेच्छाओं की पूर्ति के लिए भ्रमजाल फैलाने में दक्ष होते हैं । आम जनों में अनेक उनके शब्दजाल में ऐसे फंसते हैं कि उनके असली इरादों को भांप ही नहीं पाते । हिंदू जनमानस चूंकि गेरुआ वस्त्र को संन्यासधर्मी की पहचान मानते हैं इसलिए जो भी ये स्वांग रचता है उसके चंगुल में लोग फंस जाते हैं । वे मोहमाया में फंसे हैं इस बात को लोग सोच भी नहीं पाते । इस प्रकार गेरुआवस्त्रधारी वे लोगों की निरीहता का लाभ उठाते हैं ।

अनिष्कषाये काषायमीहार्थमिति विद्धि तम् ।

धर्मध्वजानां मुण्डानां वृत्त्यर्थमिति मे मतम् ॥34॥

(यथोपर्युक्त)

(अ-निस्-कषाये काषायम् इह अर्थम् इति विद्धि तम् धर्म-ध्वजानां मुण्डानां वृत्ति-अर्थम् इति मे मतम् ।)

अर्थ – दूषित मन के साथ गेरुआ (या केसरिया) चोला पहनने को स्वार्थ-साधन समझा जाना चाहिए । ऐसे नरों का (मिथ्या) धर्म के नाम का झंडा उठाकर चलना वस्तुतः जीविका चलाने का धंधा है ऐसा मेरा (प्रसंगानुसार अर्जुन का) मत है । (निष्कषाय = स्वच्छ, मैलरहित, निष्कपट)

गेरुआवस्त्रधारी व्यक्ति का मन क्या अनिवार्यतः निष्कपट होता है यह प्रश्न हर व्यक्ति के मन में उठना चाहिए । ऐसे वस्त्र छलकपट करके स्वार्थसिद्धि के साधन भी हो सकते हैं, क्योंकि सामान्य जनों को इन्हें देखकर यह भ्रम होता है कि वस्त्रधारी मोहमाया और भौतिक लालसाओं से विरक्त योगी होता है । वास्तविकता बहुधा इसके विपरीत होती है । गंभीरता से परीक्षण करने पर देखने को मिलता है कि वे भौतिक सुखों में लिप्त रहते हैं । जब महाभारत काल में ऐसे ढोंगी हो सकते थे तो आज भौतिकवादी युग में उनका होना आश्चर्य की बात नहीं है । यहां गेरुआ वस्त्र मात्र प्रतीक है । ढोंगी श्वेतवस्त्रधारी भी हो सकता है । अनेकों ऐसे रूप यह धर सकता है जिससे लोग उसे सिद्ध महात्मा समझ बैठे एवं उसके प्रति खिंचे चले आवें और वह उनकी सिधाई का लाभ उठाये । आजकल हमारे समाज में पग-पग पर ऐसे धोखेबाज मिल रहे हैं ।

धर्म के नाम पर आम जनों को धोखा देने में दक्ष तथाकथित धर्मरक्षकों के बारे में उक्त ग्रंथ के शान्तिपर्व के अन्य अध्याय में अधोलिखित बात कही गयी है । प्रसंग है पांडव-पितामह भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को नीति संबंधी उपदेश दिया जाना ।

अन्तःक्रूरा वाङ्मधुराः कूपाश्छन्नास्त्रिणैरिव ।

धर्मवैतं सिकाःक्षुद्रा मुष्णन्ति ध्वजिनो जगत् ॥18॥

(महाभारत, शान्तिपर्व, राजधर्मानुशासनपर्व, अध्याय 158)

(अन्तः-क्रूराः वाक्-मधुराः कूपाः छन्नाः त्रिणैः इव धर्मौ एतम् सिकाः क्षुद्राः मुष्णन्ति ध्वजिनः जगत् ।)

अर्थ – जो भीतर से क्रूर होते हैं किंतु मधुर वाणी बोलते हैं वे घासफूस से ढके कुंए के समान होते है । इसी प्रकार धर्म के नाम पर धोखा देने वाले क्षुद्र स्तर के लोग धर्म का झंडा लिए हुए संसार को लूटते हैं ।

कहा जाता है कि जंगली जानवरों को पकड़ने के लिए धोखा देकर गड्ढे में फंसाया जाता है । गड्ढे को घासफूस से ऐसे ढक दिया जाता है कि जानवर को उसका तनिक भी एहसास न हो । उस छिपे गड्ढे को पार करने पर वह जानवर उसमें गिर पड़ता है। प्रस्तुत नीतिवचन के अनुसार गेरुआवस्त्रधारियों के इरादा भी उक्त तरीके का ही होता है ।

इस कथन का तात्पर्य है कि धर्म के नाम पर धोखाधड़ी कोई नयी बात नहीं है । धर्म के ठेकेदार भी एक प्रकार के लुटेरे होते हैं । कुछ की हरकतें तो खुल्लमखुल्ला गुंडागर्दी की होती हैं जैसा कि आजकल देखने को मिल रहा है । कई ऐसे होते है जिनके मन में छल-कपट होता है परंतु व्यवहार में वे मोहक वाणी बोलते हैं जिससे उनके असली इरादे छिप जाते हैं । जैसा पहले कहा जा चुका है वे आम जनों से किसी न किसी रूप में धन एवं सुखसाधन पा जाते हैं । वे बहुत बारीकी से हमें लूट रहे हैं इस बात का एहसास आम जनों को नहीं हो पाता है ।

इस स्थल पर मैं मनुस्मृति से भी एक उद्धरण प्रस्तुत कर रहा हूं जो कहता है कि बाह्य प्रतीक धर्म के लक्षण नहीं होतेः

दूषितोऽपि चरेद्धर्मं यत्र तत्राश्रमे रतः ।

समः सर्वेषु भूतेषु न लिङ्गं धर्मकारणम् ॥

(मनुस्मृति 6, 66)

(दूषितः अपि चरेद् धर्मम् यत्र तत्र आश्रमे रतः समः सर्वेषु भूतेषु न लिङ्गं धर्म-कारणम् ।)

अर्थ – यहां-वहां जिस किसी आश्रम में रहते हुए दूषित होने पर भी धर्मानुसार आचरण करे । सभी प्राणियों को समान दृष्टि से देखे । प्रतीकों का धारण करना धर्म के कारण नहीं होता  ।

दूषित का अर्थ में कि स्थान-विशेष के नियमों का ठीक से पालन न कर पाना । ऐसे दोष के बावजूद उसे धर्माचरण यथावत करते रहना चाहिए ।प्रतीकों से अर्थ है गेरुआ या श्वेत प्रकार के वस्त्र धारण करना, माथे पर चंदन-तिलक लगा के रहना, शरीर पर राख चुपड़ना इत्यादि । इन सबको धर्म के कारण नहीं किया जाता । अर्थात् इनका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है । धर्म तो व्यक्ति के आचरण में परिलक्षित होता है । मन का निष्कपट होना, सत्य, निष्ठा, अहिंसा, परोपकार आदि में स्वयं को लगाना, अर्थात् सन्मार्ग पर चलना ही धर्म है ।

भोग-विलास में लिप्त व्यक्ति भला संन्यासी कैसे हो सकता है । सुखसाधनों से दूर रहना तो संन्यासी के आचरण का अभिन्न अंग है । आपने किसी कथित संत महात्मा को देखा है जो जमीन में साधारण से आसन पर बैठकर बातें करता हो ? वातानुकूूलित यान से यात्रा न करता हो ? मुझे तो अपने शंकराचार्यों पर भी तरस आता है कि वे स्वयं को संन्यासी कहते हैं और उच्च सिंहासन पर विराजमान रहते हैं । क्या आदि शंकराचार्य ऐसा ही करते थे ?

मेरे मन में आजकल के इन संतों-महात्माओं के प्रति कोई सम्मान जागृत नहीं होता । – योगेन्द्र जोशी

 

संन्यास.धर्म के बारे में महाभारत में व्यक्त विचार – अहिंसकः समः … (3)

महाकाव्य महाभारत में महर्षि व्यास द्वारा अपने पुत्र शुकदेव को दिए गए धर्मोपदेश के अंतर्गत संन्यास धर्म की बातें भी कही गई हैं । पिछले दो ब्लॉग-प्रविष्टियों (दिनांक 11 मई 2016 एवं 7 मई 2016) में मैंने उस लंबे संवाद से संबंधित कुछ चुने हुए श्लोकों को उद्धृत किया था । अधोलिखित विवेचना में मैं चुने हुए अन्य तीन श्लोकों को प्रस्तुत कर रहा हूं ।

अहिंसकः समः सत्यो धृतिमान्नियतेन्द्रियः ।

शरण्यः सर्वभूतानां गतिमाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥20

(महाभारत, शान्तिपर्व, मोक्षधर्मपर्व, अध्याय 245)

(अहिंसकः समः सत्यः धृतिमान् नियत-इन्द्रियः शरण्यः सर्व-भूतानाम् गतिम् आप्नोति अन्-उत्तमाम् ।)

हिंसा की भावना से मुक्त, सबके प्रति समान भाव वाला, सत्यनिष्ठ, धैर्यवान, संयमित इंद्रियों वाला, सभी प्राणियों के शरण के योग्य मनुष्य उत्तमतम गति प्राप्त करता है । (अनुत्तमाम्  के स्थान पर अत्युत्तमाम्  भी हो सकता है।)

          इस श्लोक में अनुत्तमाम् शब्द का अर्थ है वह जिससे उत्तमतर कुछ न हो यानी सर्वोत्तम (न+उत्तम) । सामान्यतः इसका अर्थ लिया जाएगा जो अच्छा नहीं हो  । ग्रंथ का कहना है कि उक्त गुणों से संपन्न संन्यासी परलोक में उत्तमतर दशा प्राप्त करता है, अपने सत्कर्मों का फल भोगता है ।

विमुक्तं सर्वसङ्गेभ्यः मुनिमाकाशवत् स्थितम् ।

अस्वमेकचरं शान्तं तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥22

(यथोपर्युक्त)

(विमुक्तम् सर्व-सङ्गेभ्यः मुनिम् आकाशवत् स्थितम् अस्वम् एकचरं शान्तम् तम् देवाः ब्राह्मणम् विदुः ।)

जो पुरुष सभी के साथ की इच्छा से मुक्त हो, मौनव्रती तपस्वी हो, आकाश की तरह स्थिर हो, ‘मेरा है’की भावना से ग्रस्त न हो, अकेला विचरण करने वाला हो, शांतचित्त हो, उसे देवतागण ब्राह्मण कहते हैं ।

          ध्यान रहे कि इस स्थल पर ब्राह्मण शब्द का अर्थ प्राचीन सामाजिक वर्ण-व्यवस्था के चार वर्णो में से एक ‘ब्राह्मण’नहीं है । यहां इसका अर्थ ब्रह्मवेत्ता अर्थात् ज्ञानी लिया जाना चाहिए । वर्णाश्रम व्यवस्था में भी ब्राह्मण वह होता था जिसे आध्यात्मिक ज्ञान हो और जो लोगों को शिक्षित करता हो । संन्यासी के लिए समूह में रहना वर्जित रहा है, क्योंकि उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह सबसे संबंध तोड़कर मेरे-तेरे की भावना से मुक्त हो चुका हो ।

निराशिषमनारम्भं निर्नमस्कारमस्तुतिम् ।

निर्मुक्तं बन्धनैः सर्वैस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥24

(यथोपर्युक्त)

(निर्-आशिषम् अन्-आरम्भं निर्-नमस्कारम् अस्तुतिम् निर्-मुक्तम् बन्धनैः सर्वैः तम् देवाः ब्राह्मणम् विदुः ।)

जिसे कामनाएं न हों, जो कुछ अर्जित करने का प्रयास न करे, जिसे दूसरों से नमस्कार या सम्मान की अपेक्षा न हो, जो प्रशंसा की इच्छा न रखता हो, सभी बंधनों से मुक्त हो, उसे देवतागण ब्राह्मण अथवा संन्यासी कहते हैं ।

          उपर्युक्त श्लोक में संन्यासी के अतिरिक्त गुणों का उल्लेख किया गया है । सार-संक्षेप यह है कि संन्यासी सभी इच्छाओं-आकांक्षाओं-अपेक्षाओं के परे होता है । हर व्यक्ति का सबसे बड़ा बंधन उसका स्वयं का परिवार होता है, उसके बाद संबंधियों-मित्रों से वह बंधा रहता है । संन्यासधर्म में प्रवेश करने के लिए सर्वप्रथम इन रिश्तों को तोड़ना होता है । तत्पश्चात् अपनी सभी सांसारिक कमजोरियों से अपने को अलग करना होता है । यह प्रक्रिया प्रबल संकल्प-शक्ति की मांग करता है ।

क्या आज के युग में इस संन्यासधर्म के अनुसार चलने वाला कोई है ? महाभारत ग्रंथ में यह भी स्पष्ट किया गया है कि गेरुआ वस्त्र धारण करने से कोई संन्यासी नहीं होता । इस बात की चर्चा अगले चिट्ठा-लेख में की जाएगी । – योगेन्द्र जोशी

 

 

संन्यास धर्म के बारे में महाभारत में व्यक्त विचार – न क्रुद्ध्येत् न प्रहृष्येत् … (2)

अपने पिछले ब्लॉग-लेख में मैंने संन्यासी एवं संन्यासधर्म के बारे में महाकाव्य महाभारत में क्या कहा गया है इसकी चर्चा की थी (देखें पोस्ट दिनांक 11 मई 2016) । वे बातें उक्त ग्रंथ में वर्णित महर्षि व्यास का अपने पुत्र शुकदेव को दिए गए धर्मोपदेश पर आधारित थीं । संबंधित वार्ता पर्याप्त लंबी है । मैं उसी प्रकरण से चुने हुए तीन अन्य श्लोकों को उद्धृत कर रहा हूं:

न क्रुद्ध्येन्न प्रहृष्येच्च मानितोऽमानितश्च यः ।

सर्वभूतेष्वभयदस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥14

(महाभारत, शान्तिपर्व, मोक्षधर्मपर्व, अध्याय 245)

(न क्रुद्ध्येत् न प्रहृष्येत् च मानितः अमानितः च यः सर्वभूतेषु अभयदः तम् देवा ब्राह्मणम् विदुः ।)

अर्थ – जो व्यक्ति सम्मान दिए जाने अथवा अपमान किये जाने पर न तो प्रसन्न होता है और न ही नाखुश, और जो सभी प्राणियों अभय देता है उसी को देवतागण ब्राह्मण कहते है ।

यहां पर ब्राह्मण का तात्पर्य वर्णव्यवस्था के ब्राह्मण से नहीं है, बल्कि ब्रह्ज्ञानी से है । संन्यासी ही वह व्यक्ति होता है जो ब्रह्मज्ञान की दिशा में आगे बढ़ रहा होता है । ऐसे व्यक्ति के लिए मान-अपमान की कोई सार्थकता नहीं रह जाती है । वह इनके प्रति उदासीन भाव रखता है यानी मान-अपमान के प्रति वह कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करता है । अभयद का अर्थ है अभयदान देने वाला यानी जिससे किसी को भय नहीं होता । संन्यासी जब किसी से नाखुश नहीं होता है और तदनुसार किसी का अहित नहीं करता है तो उससे किसी को भय नहीं हो सकता है ।

नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देत जीवितम् ।

कालमेव प्रतीक्षेत निदेशं भृतको यथा ॥15

(यथोपर्युक्त)

(न अभि-नन्देत मरणम् न अभि-नन्देत जीवितम् कालम् एव प्रतीक्षेत निदेशम् भृतकः यथा ।)

अर्थ – संन्यासी न तो मृत्यु की इच्छा करता है और न ही जीवित रहने की कामना । वह बस काल (समय) की प्रतीक्षा करता है जैसे कि सेवक अपने स्वामी के निदेशों का ।

संन्यासी जीवन तथा मृत्युु के प्रति उदासीन भाव प्राप्त कर चुका होता है । तब उसे इन दो में से किसी के भी प्रति आकर्षण अथवा विलगाव नहीं रह जाता है । उसे न तो सुख-सुविधाओं के साथ जीते रहने की कामना रहती है और न ही मृत्यु का भय सताता है । अतः वह न तो येनकेन प्रकारेण जीवित रहने के प्रयास (यथा अस्पताल में भरती होना) करता है और न ही अस्वाभाविक मृत्यु (यथा आत्महत्या) का विकल्प चुनता है ।

अनभ्याहतचित्तः स्यादनभ्याहतवाग् भवेत् ।

निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यो निरमित्रस्य किं भयम् ॥16॥

(यथोपर्युक्त)

(अन्-अभि-आहत-चित्तः स्यात् अन्-अभि-आहत-वाग् भवेत् निर्-मुक्तः सर्व-पापेभ्यः निर्-अमित्रस्य किम् भयम् ।)

अर्थ – संन्यासी के चित्त में अहितकारी विचार न हों, उसके वचन कष्ट पहुंचाने वाले न हों । जो सभी पापकर्मों से मुक्त हो उसका क्या भय हो सकता है ?

तात्पर्य यह है कि संन्यासी को मन, वचन, कर्म – सभी प्रकार से – स्वच्छ एवं अकलुषित होना चाहिए । वह किसी के अहित की नहीं सोचे तो भला उससे किसी को क्या भय हो सकता है ।

हमारे समाज में गेरुआ वस्त्रधारियों की कोई कमी नहीं है, पर क्या वे वस्तुतः संन्यासी हैं यह विचारणीय प्रश्न है । अगली पोस्ट में कुछ और बातों का उल्लेख किया जाना है । – योगेन्द्र जोशी

संन्यास-धर्म के बारे में महाभारत में व्यक्त विचार – (1) एकश्चरति यः …

महाकाव्य महाभारत में संन्यासधर्म के बारे बहुत कुछ कहा गया है और यह स्पष्ट किया गया है कि गेरुआ वस्त्र धारण करना संन्यासी की पहचान नहीं है । मनुस्मृति जैसे अन्य ग्रंथों में भी कमोबेश वही बातें कही गयी हैं । संन्यासी के लक्षणों वाले व्यक्ति आजकल कहीं नहीं दिखते हैं । संन्यासी होने का दावा करने वाले सभी आम जनों को मूर्ख बनाते हैं यह मेरा मत है । मैं महाभारत में वर्णित चुने हुए कुछ श्लोकों का उल्लेख अपने तीन-चार लेखों की शृंखला में कर रहा हूं । महर्षि व्यास द्वारा अपने पुत्र शुकदेव को दिये गये धर्मविषयक उपदेश में संन्यास की चर्चा की गयी है । उसी वार्तालाप से उद्धृत तीन श्लोकों के साथ प्रस्तुत है पहला आलेख:

एकश्चरति यः पश्यन् न जहाति न हीयते ।

अनग्निरनिकेतश्च ग्राममन्नार्थमाश्रयेत् ॥5

(महाभारत, शान्तिपर्व, मोक्षधर्मपर्व, अध्याय 245)

(पश्यन् यः एकः चरति, न जहाति न हीयते, अन्-अग्निः च अनिकेतः च ग्रामम् अन्न-अर्थम् आश्रयेत् ।)

अर्थः – (संन्यासी की विशिष्टता यह है कि वह) अकेला विचरण करता है, सत्य के ज्ञान के फलस्वरूप न किसी को त्यागता है और न ही किसी के द्वारा त्यागा जाता है । अग्नि की स्थापना न करे और उसका कोई आवास (घर) भी न होवे । उसे चाहिए कि वह केवल अन्नप्राप्ति के लिए ग्राम में प्रवेश करे ।

          संन्यासी का कोई संगीसाथी नहीं होता है । उसका किसी के साथ अपना-पराया का भाव नहीं रहता है और इसी भाव के साथ लोग भी उसे देखते हैं । वैदिक सभ्यता में सभी कर्मकाण्डों के केन्द्र में अग्नि होती है । संन्यासी सभी कर्मकाण्डों को छोड़ चुका होता है इसलिए वह अग्नि भी प्रज्वलित नहीं करता है । संन्यासी को किसी पक्के आवास में नहीं रहना चाहिए और उसे चाहिए कि ग्रामक्षेत्र में केवल भोजनार्थ भिक्षा के लिए प्रवेश करे । ग्राम वह स्थान होता है जहां लोग समूह में रहते हैं । संन्यासी एकाकी रहता है इसलिए ऐसे स्थान में रहना उसके लिए वर्जित है ।

अश्वस्तनविधाता स्यान्मुनिर्भावसमाहितः ।

लघ्वाशी नियताहारः सकृदन्ननिषेविता ॥6

(यथा पूर्वोक्त)

(अश्वस्तन-विधाता, मुनिः, भाव-समाहितः, लघु-आशी, नियत-आहारः, सकृत्-अन्न-निषेविता स्यात् ।)

अर्थः – संन्यासी आने वाले कल के लिए भोजनादि का संग्रह करने वाला न बने, चिंतनशील (एकाग्रचित्त) रहे और मनोभावों को अपने भीतर ही सीमित रखे, अर्थात् संयम बरते । वह अल्पाहारी एवं नियमानुकूल भोजन करने वाला बने तथा दिन भर में एक बार ही अन्न ग्रहण करे ।

          संन्यास का अर्थ है त्याग करना । संन्यासी शनैःशनैः सभी भौतिक वस्तुओं को त्यागता है और जीवन-धारण हेतु जितना आवश्यक हो उतने तक अपने को सीमित रखता है । इसलिए भविष्य की चिंता करते हुए भोजन आदि का संचय करना उसके लिए धर्मविरुद्ध हो जाता है । ऐसा संचय वैदिक आश्रम व्यवस्था के आरंभिक तीन आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ, वानप्रस्थ) में ही अनुमत है । उसका समय ब्रह्मज्ञान अर्जित करने और भौतिक संसार से जुड़े मनोभावों से स्वयं को मुक्त करने में बीतना चाहिए ।

कपालं वृक्षमूलानि कुचैलमसहायता ।

उपेक्षा सर्वभूतानामेतावद् भिक्षुलक्षणम् ॥7

(यथा पूर्वोक्त)

(कपालं वृक्ष-मूलानि कुचैलम् असहायता सर्वभूतानाम् उपेक्षा एतावत् भिक्षु-लक्षणम् ।)

अर्थः – संन्यासी के लक्षण ये होने चाहिएः वह भिक्षा के लिए कपाल को पात्र के तौर पर प्रयोग करे, रात्रि विश्राम पेड़-पौधों के साये में करे, सादे असुन्दर वस्त्र धारण करे, किसी को साथ न रखे, सभी प्राणियों के प्रति उपेक्षाभाव रखे ।

          कपाल का सामान्य अर्थ है मनुष्य का माथा । कुछ अघोरपंथी हठयोगी कापालिक नरमुंड-माला पहनते हैं और मनुष्य की खोपड़ी बर्तन के तौर पर प्रयोग में लेते हैं । लेकिन यहां कपाल का अर्थ है टूटा मिट्टी का बर्तन, जैसे घड़े का टुकड़ा । मैंने अपनी बाल्यावस्था (उत्तराखंड में व्यतीत समय) में योगी-योगिनियों को पुष्ट गोल लौकी (तुम्बा) के बाहरी सख्त खोल से बना बर्तन भिक्षा हेतु प्रयोग में लेते देखा है जिसे कपाल कहा जाता है । संन्यासधर्म में पक्के मकान के भीतर निवास करना वर्जित है । संन्यासी पेड़ की छाया में निवास करे और वर्षा आदि से बचने के लिए घास-फूस से बनी कुटिया में रह सकता है । कुचैल का अर्थ सामान्यतः फटा-पुराना मैला होता है । मन की शुचिता के साथ देह की शुचिता की अपेक्षा संन्यासी से भी रहती है । मैं समझता हूं कि कुचैल से यहां मतलब है केवल पानी से साफ किया हुआ न कि साबुन जैसे चीज का प्रयोग करते हुए । उक्त कथन में उपेक्षा का अर्थ तिरस्कार से नहीं है, बल्कि उदासीनता से है । अर्थात् संन्यासी न तो किसी से लगाव रखे न किसी से द्वेष ।

अगले आलेखों में भी उक्त ग्रंथ से एतद्विषयक अतिरिक्त सामग्री । – योगेन्द्र जोशी

“राजकलिं हन्युः प्रजाः”(महाभारत के वचन) – प्रजा की सुरक्षा के प्रति बेपरवाह राजा मृत्युदंड के योग्य

भारतीयों के लिए वेदव्यासरचित महाकाव्य महाभारत एक सुपरिचित ग्रंथ है जिसकी कथाओं का जिक्र लोग यदाकदा करते रहते हैं । महाभारत में वर्णित पांडव-कौरवों के युद्ध की समाप्ति के बाद राजा युधिष्ठिर सरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह से राजकार्य संबंधी नीतिवचन प्राप्त करते हैं । राजा के लिए क्या कृत्य है क्या नहीं इस बाबत अनेकानेक बातें भीष्म बताते हैं । उसी प्रकरण में वे यह भी कहते हैं कि उस राजा को प्रजा ने मृत्युदंड दे देना चाहिए जो उनकी सुरक्षा को गंभीरता से नहीं लेता है । मैं तत्संबंधित तीन श्लोकों की चर्चा यहां पर कर रहा हूं । ये तीनों महाभारत के अनुशासनपर्व (अध्याय ६१) से उद्धृत किए जा रहे हैं ।

क्रोश्यन्त्यो यस्य वै राष्ट्राद्ध्रियन्ते तरसा स्त्रियः ।

क्रोशतां पतिपुत्राणां मृतोऽसौ न च जीवति ॥३१॥

(महाभारत, अनुशासनपर्व, अध्याय ६१)

(यस्य वै राष्ट्रात् क्रोशताम् पतिपुत्राणाम् क्रोश्यन्त्यः स्त्रियः तरसा ध्रियन्ते असौ मृतः न च जीवति ।)

अर्थ – जिस राजा के राज्य में चीखती-चिल्लाती स्त्रियों का बलपूर्वक अपहरण होता है और उनके पति-पुत्र रोते-चिल्लाते रहते हैं, वह राजा मरा हुआ है न कि जीवित ।

जो राजा अपहरण की जा रही स्त्रियों की सुरक्षा के लिए समुचित कदम नहीं उठाता और उनके दुःखित बंधु-बांधवों की विवशता से विचलित नहीं होता वह जीते-जी मरे हुए के समान है । उसके जीवित होने की कोई सार्थकता नहीं रह जाती ।

 

ध्यान रहे कि आज के लोकतांत्रिक शासकीय व्यवस्था में जो सत्ता के शीर्ष पर हो वही राजा की भूमिका निभाता है । इसलिए राजा के संदर्भ में जो बातें कही गई हैं वह आज के शासकों पर यथावत लागू होती हैं । अपने देश के कुछ राज्यों, जैसे उत्तर प्रदेश, में इस समय स्त्रियों के प्रति दुष्कर्म के मामले चरम पर हैं, किंतु शासकीय व्यवस्था इतनी गिरी हुई है कि किसी को दंडित नहीं किया जा रहा है । ऐसे शासकों को वस्तुतः डूब मरना चाहिए!

 

अरक्षितारं हर्तारं विलोप्तारमनायकम् ।

तं वै राजकलिं हन्युः प्रजाः सन्नहा निर्घृणम् ॥३२॥

(यथा पूर्वोक्त)

(अरक्षितारम् हर्तारम् विलोप्तारम् अनायकम् तम् निर्घृणम् राजकलिम् प्रजाः वै सन्नहा हन्युः ।)

अर्थ – जो राजा अपनी जनता की रक्षा नहीं करता, उनकी धनसंपदा छीनता या जब्त करता है, जो योग्य नेतृत्व से वंचित हो, उस निकृष्ट राजा को प्रजा ने बंधक बनाकर निर्दयतापूर्वक मार डालना चाहिए ।

 

राजा का कर्तव्य है अपनी प्रजा की रक्षा करना, उसको सुख-समृद्धि के अवसर प्रदान करना । तभी वह जनता से कर वसूलने का हकदार बन सकता है । अपने कर्तव्यों का निर्वाह न करने वाला राजा जब कर वसूले तो उसको लुटेरा ही कहा जाएगा । नीति कहती है कि ऐसे राजा को निकृष्ट कोटि का मानना चाहिए । उसके प्रति दयाभाव रखे बिना ही परलोक भेज देना चाहिए ।

 

आज की शासकीय स्थिति कुछ राज्यों में अति दयनीय है । परंतु दुर्भाग्य से सत्तासुख भोग रहे वहां के शासकों को दंडित करने वाला कोई नहीं । लोग कहते हैं कि पांच-पांच सालों में होने वाले चुनावों द्वारा जनता उन्हें सत्ता से बेदखल कर देती है । लेकिन ध्यान दें कि न चुना जाना कोई दंड नहीं होता है । किसी भी चुनाव में कई प्रत्याशी भाग लेते हैं जिनमें से एक चुना जाता है । “अन्य सभी को दंडित कर दिया” ऐसा क्या कहा जा सकता है ? सवाल असल में दंडित किये जाने का है जो वास्तव में होता नहीं ।

 

अहं वो रक्षितेत्युक्त्वा यो न रक्षति भूमिपः ।

स संहत्य निहंतव्यः श्वेव सोन्मादः आतुरः ॥३३॥

(यथा पूर्वोक्त)

(अहम् वः रक्षिता इति उक्त्वा यः भूमिपः न रक्षति सः स-उन्मादः आतुरः श्व-इव संहत्य निहंतव्यः ।)

अर्थ – मैं आप सबका रक्षक हूं यह वचन देकर जो राजा रक्षा नहीं करता, उसे रोग एवं पागलपन से ग्रस्त कुत्ते की भांति सबने मिलकर मार डालना चाहिए ।

 

इस श्लोक में कटु शब्दों का प्रयोग हुआ है । शासक का पहला कर्तव्य है कि वह भयमुक्त समाज की रचना करे –  भयमुक्त निरीह-निरपराध प्रजा के लिए, न कि अपराधियों के लिए । आज की स्थिति उल्टी है । अपराधी निरंकुश-स्वच्छंद विचरण करते हुए और सामान्य जन डरे-सहमे दिखते हैं । जिस शासक के राज्य में ऐसा हो उसे ग्रंथकार ने पागल कुत्ते की संज्ञा दी है । ऐसे कुत्ते का एक ही इलाज होता है, मौत । दुर्भाग्य से हमारे शासक सबसे पहले अपनी सुरक्षा का इंतजाम करते हैं । कोई सामान्य व्यक्ति उनके पास पहुंच तक नहीं सकता, आगे कुछ करने का तो सवाल ही नहीं ।

 

ये नीतिश्लोक दर्शाते हैं कि महाभारत ग्रंथ में कर्तव्यों में विफल शासक को पतित और निकृष्ट श्रेणी का कहा गया है । – योगेन्द्र जोशी

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