“अहिंसा परमो धर्मः …” – महाभारत में अहिंसा संबंधी नीति वचन (1)

“अहिंसा परमो धर्मः” यह नीति-वचन लोगों के मुख से अक्सर सुनने को मिलता है। प्राचीन काल में अपने भारतवर्ष में जैन तीर्थंकरों ने अहिंसा को केंद्र में रखकर अपने कर्तव्यों का निर्धारण एवं निर्वाह किया। अंतिम तीर्थंकर भगवान् महावीर के लगभग समकालीन (कुछ बाद के) महात्मा बुद्ध ने भी करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व तमाम कर्तव्यों के साथ अहिंसा का उपदेश तत्कालीन समाज को दिया था। अरब भूमि में ईशू मसीह ने भी कुछ उसी प्रकार की बातें कहीं। आधुनिक काल में महात्मा गांधी को भी अहिंसा के महान् पुजारी/उपदेष्टा के रूप में देखा जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने तो उनके सम्मान में 2 अक्टूबर को अहिंसा दिवस घोषित कर दिया।

अहिंसा की बातें घूमफिर कर सभी समाजों में की जाती रही हैं, लेकिन उसकी परिभाषा सर्वत्र एक जैसी नहीं है। उदाहरणार्थ जैन धर्म में अहिंसा की परिभाषा अति व्यापक है, किसी भी जीवधारी को किसी भी प्रकार से कष्ट में डालना वहां वर्जित है। इस धारणा के साथ जीवन धारण करना लगभग नामुमकिन है। अरब मूल के धर्मो के अनुसार मनुष्य को छोड़कर अन्य जीवों में रूह नहीं होती, तदनुसार उनके साथ अहिंसा बेमानी है। कुर’आन से मैंने यही निष्कर्ष निकाला। वास्तव में सभी समाज अपने भौतिक हितों को ध्यान में रखते हुए अहिंसा की परिभाषा अपनाते हैं। विडंबना देखिए कि महावीर, बुद्ध एवं गांधी के इस भारत में अहिंसा की कोई अहमियत नहीं। पग-पग पर हिंसा के दर्शन होते है। अहिंसा वस्तुतः एक आदर्श है जिससे आम तौर पर सभी परहेज करते हैं। लेकिन “अहिंसा परमो धर्मः” की बात मंच पर सभी कहते हैं।

अस्तु, अहिंसा या हिंसा की वकालत करना इस आलेख में मेरा उद्देश्य नहीं है। “अहिंसा परमो धर्मः” की नीति की मानव जीवन में सार्थकता है या नहीं इसकी समीक्षा मैं नहीं कर रहा हूं। मैं केवल यह बताना चाहता हूं कि इस नीति का उल्लेख महाभारत महाकाव्य में कई स्थालों पर देखने को मिलता है। उन्हीं की चर्चा करना मेरा प्रयोजन है। जो यहां उल्लिखित हो उसके अतिरिक्त भी अन्य स्थलों पर बातें कही गयी होंगी जिनका ध्यान या जानकारी मुझे नहीं है।

अहिंसा परमो धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः ।

सत्ये कृत्वा प्रतिष्ठां तु प्रवर्तन्ते प्रवृत्तयः ॥74

(महाभारत, वन पर्व, अध्याय 207 – मारकण्डेयसमास्यापर्व)

(अहिंसा परमः धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः सत्ये तु प्रतिष्ठाम् कृत्वा प्रवृत्तयः प्रवर्तन्ते ।)

अर्थ – अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है, और वह सत्य पर ही टिका होता है। सत्य में निष्ठा रखते हुए ही कार्य संपन्न होते हैं।

यहां कार्य से तात्पर्य सत्कर्मों से होना चाहिए। सत्कर्म सत्य के मार्ग पर चलने से ही संभव होते हैं। धर्म बहुआयामी अवधरणा है। मनुष्य के करने और न करने योग्य अनेकानेक कर्मों का समुच्चय धर्म को परिभाषित करता है। करने योग्य कर्मों में अहिंसा सबसे ऊपर या सबसे पहले है यह उपदेष्टा का मत है।

महाभारत ग्रंथ के वन पर्व में पांडवों के 12 वर्षों के वनवास (उसके पश्चात् एक वर्ष का नगरीय अज्ञातवास भी पूरा करना था) का वर्णन है। वे वन में तमाम ऋषि-मुनियों के संपर्क में आते हैं जिनसे उन्हें भांति-भांति का ज्ञान मिलता है। उसी वन पर्व में पांडवों का साक्षात्कार ऋषि मारकंडेय से भी होता है। ऋषि के मुख से उन्हें कौशिक नाम के ब्राह्मण और धर्मनिष्ठ व्याध के बीच के वार्तालाप की बात सुनने को मिलती है। उक्त श्लोक उसी के अंतर्गत उपलब्ध है।

अगले दो श्लोक अनुशासन पर्व से लिए गए हैं। महाभारत युद्ध के बाद सब शांत हो जाता है और युधिष्ठिर राजा का दायित्व संभाल लेते हैं। भीष्म पितामह सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में मृत्यु-शैया पर लेटे होते हैं। वे युधिष्ठिर को राजधर्म एवं नीति आदि का उपदेश देते हैं। ये श्लोक उसी प्रकरण के हैं।

अहिंसा सर्वभूतेभ्यः संविभागश्च भागशः ।

दमस्त्यागो धृतिः सत्यं भवत्यवभृताय ते ॥18

(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 60 – दानधर्मपर्व)

(अहिंसा सर्व-भूतेभ्यः संविभागः च भागशः दमः त्यागः धृतिः सत्यम् भवति अवभृताय ते ।)

अर्थ – सभी प्राणियों के प्रति अहिंसा बरतना, सभी को यथोचित भाग सोंपना, इंद्रिय-संयम, त्याग, धैर्य एवं सत्य पर टिकना अवभृत स्नान के तुल्य (पुण्यदायी) होता है।

वैदिक परंपरा में यज्ञ-यागादि का विशेष महत्व है और उन्हें पुण्य-प्राप्ति का महान् मार्ग माना जाता है। ऐसे आयोजन के समापन के पश्चात विधि-विधान के साथ किए गये स्नान को अवभृत स्नान कहा गया है। यहां बताये गये अहिंसा आदि उस स्नान के समान फलदातक होते हैं यह श्लोक का भाव है।

उक्त श्लोक में “अहिंसा परमो धर्मः” कथन विद्यमान नहीं है, किंतु अहिंसा के महत्व को अवश्य रेखांकित किया गया है। वनपर्व का अगला श्लोक ये है:

अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तपः ।

अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते ॥23

(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 115 – दानधर्मपर्व)

(अहिंसा परमो धर्मः तथा अहिंसा परम्‍ तपः अहिंसा परमम्‍ सत्यम्‍ यतः धर्मः प्रवर्तते ।)

अर्थ – अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा परम तप है, और अहिंसा ही परम सत्य और जिससे धर्म की प्रवृत्ति आगे बढ़ती है।

इस वचन के अनुसार अहिंसा, तप और सत्य आपस में जुड़े हैं। वस्तुतः अहिंसा स्वयं में तप है, तप का अर्थ है अपने को हर विपरीत परिस्थिति में संयत और शांत रखना। जिसे तप की सामर्थ्य नहीं वह अहिंसा पर टिक नहीं सकता। इसी प्रकार सत्यवादी ही अहिंसा पर टिक सकता है यह उपदेष्टा का मत है।

अहिंसा की जितनी भी प्रशंसा हम कर लें, तथ्य यह है कि मानव समाज अहिंसा से नहीं हिंसा से चलता है। मैं अगले चिट्ठा-प्रवृष्टि में “अहिंसा …” पर अनुशासन पर्व के अन्य श्लोकों के साथ अपने इस मत की भी चर्चा करूंगा। – योगेन्द्र जोशी

न शूद्र-राज्ये निवसेत् … – मनुस्मृति में शूद्र-“अस्पृश्यता”

मनुस्मृति धर्मकर्म या रिति-रिवाजों से संबंधित एक विवादास्पद ग्रन्थ है। इस ग्रंथ में बहुत-सी बातें हैं जिन पर आपत्ति नहीं की जा सकती है, बल्कि उन्हें स्वस्थ-सभ्य समाज के अनुरूप माना जायेगा। मनुस्मृति का “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते … “ कथन लोगों के मुख से अक्सर सुन्ने को मिलते हैं। निःसंदेह इस कथन में अनुकरणीय सलाह निहित है। किंतु इसी ग्रंथ में स्त्रियों के लिए कर्तव्याकर्तव्य की ऐसी अनेक बातें भी कही गई हैं जिसे महिला संगठन अमान्य कहेंगे। मैंने अपने वर्तमान ब्लॉग में मनुस्मृति पर आधारित तीन आलेख पहले कभी लिखे थे। देखें नारी संबंधी (2009-09-11), शुचिता संबंधी (2011-01-18), एवं शासकीय दंड संबंधी (2011-05-14) ब्लॉग प्रविष्टियां ।

https://vichaarsankalan.wordpress.com/2009/09/11/

https://vichaarsankalan.wordpress.com/2011/01/18/

https://vichaarsankalan.wordpress.com/2011/05/14/

मैं मौजूदा इस आलेख में हिन्दुओं में प्रचलित वर्ण-व्यवस्था के चतुर्थ वर्ण – “शूद्र” नाम से संबोधित – के बारे में मनुस्मृति के दो-चार श्लोकों का उद्धरण प्रस्तुत कर रहा हूं जिनमें नकारात्मक और “कदाचित्” आपत्तिजनक विचार व्यक्त किए गए हैं:

न शूद्रराज्ये निवसेन्नाधार्मिकजनावृते ।

न पाषण्डिगणाक्रान्ते नोपसृष्टेऽन्त्यजैर्नृभिः ॥

(मनुस्मृति, अध्याय 4, श्लोक 61)

(न शूद्र-राज्ये, न अधार्मिक-जन-आवृते, न पाषण्डि-गण-आक्रान्ते, न अन्त्यजैः नृभिः उपसृष्टे निवसेत्।)

अर्थ – (व्यक्ति को) शूद्र से शासित राज्य में, धर्मकर्म से विरत जनसमूह के मध्य, पाखंडी लोगों से व्याप्त स्थान में, और अन्त्यजों के निवासस्थल में नहीं वास नहीं करना चाहिए।

यहां व्यक्ति से तात्पर्य होना चाहिए उस व्यक्ति से जो वर्ण के अनुसार शूद्र से भिन्न हो, अर्थात वह जिसे आम तौर पर सवर्ण कहा जाता है (ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य)। धर्मकर्म से विरत उनको कहा जायेगा जो सवर्ण होते हुए धर्मानुकूल आचरण नहीं करते हैं। पाखंडी और धर्म-विमुख जनों में मुझे कोई अंतर नहीं दिखता। अंत्यज के अर्थ बहुत स्पष्ट नहीं हैं। मेरी समझ के अनुसार इस वर्ग में विधर्मी जनों को गिना जायेगा और उन्हें भी जो वर्णव्यवस्था को नकार कर अपनी स्वतंत्र व्यवस्था के अनुसार रहते हों। “चांडाल” को भी इसमें गिना जाता है, किंतु मैं चांडाल किसे कहा जाता है यह आज तक नहीं जान पाया! अस्तु।

आज के विशुद्ध भौतिकवादी युग में हर व्यक्ति का जीवनोद्येश्य एक ही है: किसी भी व्यवसाय से धनोपार्जन करना। कर्म के अनुसार देखा जाये तो किसी भी व्यक्ति का कोई वर्ण नहीं रह गया। वर्ण का अर्थ जातिसूचक शब्द रह गया है और धर्म स्वयं में दिखावा मात्र।

न शूद्राय मतिं दद्यान्नोच्छिष्टं न हविष्कृतम्।

न चास्योपदिशेद्धर्मं न चास्य व्रतमादिशेत्॥

(मनुस्मृति, अध्याय 4, श्लोक 80)

(शूद्राय मतिम् न दद्यात्, न उच्छिष्टम्, न हविष्कृतम्, न च अस्य धर्मम् उपदिशेत्, न च अस्य व्रतम् आदिशेत्।)

अर्थ – किसी प्रयोजन की सिद्धि को ध्यान में रखते हुए दिया जाने वाला उपदेश शूद्र को न दिया जाये। उसे जूठा यानी बचा हुआ भोजन न दे और न यज्ञकर्म से बचा हविष्य प्रदान करे। उसे न तो धार्मिक उपदेश दिया जाये और न ही उससे व्रत रखने की बात की जाये।

जूठा का मतलब उस खाने से है जो किसी के लिए परोसा गया हो और छोड़ दिया गया हो। जूठे से तात्पर्य उस भोजन से नहीं लिया जाना चाहिए जो खाते-खाते थाली में बच जाये। यज्ञकर्म हेतु अग्निकुंड में जिस पदार्थ की आहुति दी जाती है उसे  हविष्य कहा जाता है। यह घी या मक्खन हो सकता है, पर्वों पर बने पकवान हो सकते हैं, अथवा तिल, घी, चंदन-चूर्ण आदि का मिश्रण हो सकता है। व्रत से तात्पर्य है पापकर्मों से मुक्ति के निमित्त उपवास, दान, आदि के रूप में किए जाने वाला प्रायश्चित्त।

नाद्याच्छूद्रस्य पक्वान्नं विद्वानश्राद्धिनो द्विजः ।

आददीताममेवास्मादवृत्तावेकरात्रिकम्॥

(मनुस्मृति, अध्याय 4, श्लोक 223)

(विद्वान् द्विजः अश्राद्धिनः अस्य पक्व-अन्नम् न अद्यात्, अवृत्तौ अस्मात् एक-रात्रिकम्  अमम्  एव आददीत ।)

अर्थ – विद्वान्‍ द्विज अश्राद्धिन्‍ शूद्र द्वारा पकाया हुआ भोजन न खावे। परंतु तात्कालिक आर्थिक व्यवस्था न कर पाने की स्थिति में उससे एक रात्रि भर का कच्चा भोजन ग्रहण कर ले।

द्विज शब्द शूद्रेतर तीनों वर्णों के संस्कारित जन के लिए प्रयुक्त होता है। संस्कारित वह है जिसका उपनयन संस्कार हुआ हो। इस संस्कार के अंतर्गत व्यक्ति गुरु से शिक्षित होता है और ऐसा होना द्वितीय जन्म के तुल्य होता है। संस्कार के अभाव में व्यक्ति को पूर्व काल में शूद्र के तुल्य समझा जाता था। आज के युग में उपनयन की प्रथा बहुत कम प्रचलन में रह गयी है। ब्राह्मण जाति में भी यह परंपरा टूट रही है। इस दृष्टि से प्रायः सभी शूद्र हैं। अश्राद्धिन वह व्यक्ति है जो श्राद्ध आदि कर्म न करता हो; शूद्रों के लिए ये कार्य वर्जित कहे गये हैं। कच्चा भोजन वह है जिसे आग से न पकाया गया हो। आटा-दाल-चावल पकाये जाने से पहले कच्चे कहे जायेंगे।

न विप्रं स्वेषु तिष्ठत्सु मृतं शूद्रेण नाययेत्।

अस्वर्ग्या ह्याहुतिः सा स्याच्छूद्रसंस्पर्शदूषिता ॥

(मनुस्मृति, अध्याय 5, श्लोक 104)

(मृतम् विप्रंम्  स्वेषु तिष्ठत्सु शूद्रेण न नाययेत्, सा शूद्र-संस्पर्श-दूषिता आहुतिः अस्वर्ग्या हि स्यात्।)

अर्थ – बंधु-बांधओं के उपलब्ध रहते हुए मृत ब्राह्मण का शरीर शूद्र के द्वारा बाहर न निकलवाए। शरीर के शूद्र के स्पर्श से दूषित होना ब्राह्मण के स्वर्गप्राप्ति में बाधक होती है।

यहां आहुति का क्या अर्थ है मैं समझ नहीं पाया। इन श्लोकों में शूद्र को खुलकर अस्पृश्य नहीं कहा गया है, किंतु जो कुछ कहा गया वह स्पष्ट करता है कि शूद्र कहे जाने वाले को शेष समाज हेय दृष्टि से देखता आ रहा है। सवर्णों का यह व्यवहार परंपरा के रूप में कब स्थापित हुआ होगा कहना मुश्किल है। कई “पंडित” जन ऋग्वेद के “ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू …” (ऋग्वेद संहिता, मण्डल 10, सूक्त 90, ऋचा 12) एवं मनुस्मृति के “लोकानां तु विवृद्ध्यर्थं …” (मनुस्मृति, अध्याय 1, श्लोक 31) का उल्लेख करते हुए शूद्रों की हीनता को सिद्ध करते हैं। मैंने एक आलेख में ऋग्वेद के उक्त श्लोक की व्याख्या अपने प्रकार से की है (देखें ब्लॉग-प्रविष्टि 2013-9-26)

जो प्रचलित व्याख्या से पूर्णतः भिन्न है। मनुस्मृति के उपर्युक्त एवं अन्य कुछ कथन प्रचलित व्याख्या के पक्ष में जाते हैं। किंतु मेरा मत है कि वैदिक काल में स्थिति एकदम भिन्न रही होगी और पौराणिक काल से वर्ण-व्यवस्था में शनैःशनिः विकार आना शुरू हुआ होगा।

अस्तु, पाठक स्वविवेक से अपना मत नियत कर सकते हैं। -योगेन्द्र जोशी

संन्यास.धर्म के बारे में महाभारत में व्यक्त विचार – अहिंसकः समः … (3)

महाकाव्य महाभारत में महर्षि व्यास द्वारा अपने पुत्र शुकदेव को दिए गए धर्मोपदेश के अंतर्गत संन्यास धर्म की बातें भी कही गई हैं । पिछले दो ब्लॉग-प्रविष्टियों (दिनांक 11 मई 2016 एवं 7 मई 2016) में मैंने उस लंबे संवाद से संबंधित कुछ चुने हुए श्लोकों को उद्धृत किया था । अधोलिखित विवेचना में मैं चुने हुए अन्य तीन श्लोकों को प्रस्तुत कर रहा हूं ।

अहिंसकः समः सत्यो धृतिमान्नियतेन्द्रियः ।

शरण्यः सर्वभूतानां गतिमाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥20

(महाभारत, शान्तिपर्व, मोक्षधर्मपर्व, अध्याय 245)

(अहिंसकः समः सत्यः धृतिमान् नियत-इन्द्रियः शरण्यः सर्व-भूतानाम् गतिम् आप्नोति अन्-उत्तमाम् ।)

हिंसा की भावना से मुक्त, सबके प्रति समान भाव वाला, सत्यनिष्ठ, धैर्यवान, संयमित इंद्रियों वाला, सभी प्राणियों के शरण के योग्य मनुष्य उत्तमतम गति प्राप्त करता है । (अनुत्तमाम्  के स्थान पर अत्युत्तमाम्  भी हो सकता है।)

          इस श्लोक में अनुत्तमाम् शब्द का अर्थ है वह जिससे उत्तमतर कुछ न हो यानी सर्वोत्तम (न+उत्तम) । सामान्यतः इसका अर्थ लिया जाएगा जो अच्छा नहीं हो  । ग्रंथ का कहना है कि उक्त गुणों से संपन्न संन्यासी परलोक में उत्तमतर दशा प्राप्त करता है, अपने सत्कर्मों का फल भोगता है ।

विमुक्तं सर्वसङ्गेभ्यः मुनिमाकाशवत् स्थितम् ।

अस्वमेकचरं शान्तं तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥22

(यथोपर्युक्त)

(विमुक्तम् सर्व-सङ्गेभ्यः मुनिम् आकाशवत् स्थितम् अस्वम् एकचरं शान्तम् तम् देवाः ब्राह्मणम् विदुः ।)

जो पुरुष सभी के साथ की इच्छा से मुक्त हो, मौनव्रती तपस्वी हो, आकाश की तरह स्थिर हो, ‘मेरा है’की भावना से ग्रस्त न हो, अकेला विचरण करने वाला हो, शांतचित्त हो, उसे देवतागण ब्राह्मण कहते हैं ।

          ध्यान रहे कि इस स्थल पर ब्राह्मण शब्द का अर्थ प्राचीन सामाजिक वर्ण-व्यवस्था के चार वर्णो में से एक ‘ब्राह्मण’नहीं है । यहां इसका अर्थ ब्रह्मवेत्ता अर्थात् ज्ञानी लिया जाना चाहिए । वर्णाश्रम व्यवस्था में भी ब्राह्मण वह होता था जिसे आध्यात्मिक ज्ञान हो और जो लोगों को शिक्षित करता हो । संन्यासी के लिए समूह में रहना वर्जित रहा है, क्योंकि उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह सबसे संबंध तोड़कर मेरे-तेरे की भावना से मुक्त हो चुका हो ।

निराशिषमनारम्भं निर्नमस्कारमस्तुतिम् ।

निर्मुक्तं बन्धनैः सर्वैस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥24

(यथोपर्युक्त)

(निर्-आशिषम् अन्-आरम्भं निर्-नमस्कारम् अस्तुतिम् निर्-मुक्तम् बन्धनैः सर्वैः तम् देवाः ब्राह्मणम् विदुः ।)

जिसे कामनाएं न हों, जो कुछ अर्जित करने का प्रयास न करे, जिसे दूसरों से नमस्कार या सम्मान की अपेक्षा न हो, जो प्रशंसा की इच्छा न रखता हो, सभी बंधनों से मुक्त हो, उसे देवतागण ब्राह्मण अथवा संन्यासी कहते हैं ।

          उपर्युक्त श्लोक में संन्यासी के अतिरिक्त गुणों का उल्लेख किया गया है । सार-संक्षेप यह है कि संन्यासी सभी इच्छाओं-आकांक्षाओं-अपेक्षाओं के परे होता है । हर व्यक्ति का सबसे बड़ा बंधन उसका स्वयं का परिवार होता है, उसके बाद संबंधियों-मित्रों से वह बंधा रहता है । संन्यासधर्म में प्रवेश करने के लिए सर्वप्रथम इन रिश्तों को तोड़ना होता है । तत्पश्चात् अपनी सभी सांसारिक कमजोरियों से अपने को अलग करना होता है । यह प्रक्रिया प्रबल संकल्प-शक्ति की मांग करता है ।

क्या आज के युग में इस संन्यासधर्म के अनुसार चलने वाला कोई है ? महाभारत ग्रंथ में यह भी स्पष्ट किया गया है कि गेरुआ वस्त्र धारण करने से कोई संन्यासी नहीं होता । इस बात की चर्चा अगले चिट्ठा-लेख में की जाएगी । – योगेन्द्र जोशी

 

 

संन्यास-धर्म के बारे में महाभारत में व्यक्त विचार – (1) एकश्चरति यः …

महाकाव्य महाभारत में संन्यासधर्म के बारे बहुत कुछ कहा गया है और यह स्पष्ट किया गया है कि गेरुआ वस्त्र धारण करना संन्यासी की पहचान नहीं है । मनुस्मृति जैसे अन्य ग्रंथों में भी कमोबेश वही बातें कही गयी हैं । संन्यासी के लक्षणों वाले व्यक्ति आजकल कहीं नहीं दिखते हैं । संन्यासी होने का दावा करने वाले सभी आम जनों को मूर्ख बनाते हैं यह मेरा मत है । मैं महाभारत में वर्णित चुने हुए कुछ श्लोकों का उल्लेख अपने तीन-चार लेखों की शृंखला में कर रहा हूं । महर्षि व्यास द्वारा अपने पुत्र शुकदेव को दिये गये धर्मविषयक उपदेश में संन्यास की चर्चा की गयी है । उसी वार्तालाप से उद्धृत तीन श्लोकों के साथ प्रस्तुत है पहला आलेख:

एकश्चरति यः पश्यन् न जहाति न हीयते ।

अनग्निरनिकेतश्च ग्राममन्नार्थमाश्रयेत् ॥5

(महाभारत, शान्तिपर्व, मोक्षधर्मपर्व, अध्याय 245)

(पश्यन् यः एकः चरति, न जहाति न हीयते, अन्-अग्निः च अनिकेतः च ग्रामम् अन्न-अर्थम् आश्रयेत् ।)

अर्थः – (संन्यासी की विशिष्टता यह है कि वह) अकेला विचरण करता है, सत्य के ज्ञान के फलस्वरूप न किसी को त्यागता है और न ही किसी के द्वारा त्यागा जाता है । अग्नि की स्थापना न करे और उसका कोई आवास (घर) भी न होवे । उसे चाहिए कि वह केवल अन्नप्राप्ति के लिए ग्राम में प्रवेश करे ।

          संन्यासी का कोई संगीसाथी नहीं होता है । उसका किसी के साथ अपना-पराया का भाव नहीं रहता है और इसी भाव के साथ लोग भी उसे देखते हैं । वैदिक सभ्यता में सभी कर्मकाण्डों के केन्द्र में अग्नि होती है । संन्यासी सभी कर्मकाण्डों को छोड़ चुका होता है इसलिए वह अग्नि भी प्रज्वलित नहीं करता है । संन्यासी को किसी पक्के आवास में नहीं रहना चाहिए और उसे चाहिए कि ग्रामक्षेत्र में केवल भोजनार्थ भिक्षा के लिए प्रवेश करे । ग्राम वह स्थान होता है जहां लोग समूह में रहते हैं । संन्यासी एकाकी रहता है इसलिए ऐसे स्थान में रहना उसके लिए वर्जित है ।

अश्वस्तनविधाता स्यान्मुनिर्भावसमाहितः ।

लघ्वाशी नियताहारः सकृदन्ननिषेविता ॥6

(यथा पूर्वोक्त)

(अश्वस्तन-विधाता, मुनिः, भाव-समाहितः, लघु-आशी, नियत-आहारः, सकृत्-अन्न-निषेविता स्यात् ।)

अर्थः – संन्यासी आने वाले कल के लिए भोजनादि का संग्रह करने वाला न बने, चिंतनशील (एकाग्रचित्त) रहे और मनोभावों को अपने भीतर ही सीमित रखे, अर्थात् संयम बरते । वह अल्पाहारी एवं नियमानुकूल भोजन करने वाला बने तथा दिन भर में एक बार ही अन्न ग्रहण करे ।

          संन्यास का अर्थ है त्याग करना । संन्यासी शनैःशनैः सभी भौतिक वस्तुओं को त्यागता है और जीवन-धारण हेतु जितना आवश्यक हो उतने तक अपने को सीमित रखता है । इसलिए भविष्य की चिंता करते हुए भोजन आदि का संचय करना उसके लिए धर्मविरुद्ध हो जाता है । ऐसा संचय वैदिक आश्रम व्यवस्था के आरंभिक तीन आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ, वानप्रस्थ) में ही अनुमत है । उसका समय ब्रह्मज्ञान अर्जित करने और भौतिक संसार से जुड़े मनोभावों से स्वयं को मुक्त करने में बीतना चाहिए ।

कपालं वृक्षमूलानि कुचैलमसहायता ।

उपेक्षा सर्वभूतानामेतावद् भिक्षुलक्षणम् ॥7

(यथा पूर्वोक्त)

(कपालं वृक्ष-मूलानि कुचैलम् असहायता सर्वभूतानाम् उपेक्षा एतावत् भिक्षु-लक्षणम् ।)

अर्थः – संन्यासी के लक्षण ये होने चाहिएः वह भिक्षा के लिए कपाल को पात्र के तौर पर प्रयोग करे, रात्रि विश्राम पेड़-पौधों के साये में करे, सादे असुन्दर वस्त्र धारण करे, किसी को साथ न रखे, सभी प्राणियों के प्रति उपेक्षाभाव रखे ।

          कपाल का सामान्य अर्थ है मनुष्य का माथा । कुछ अघोरपंथी हठयोगी कापालिक नरमुंड-माला पहनते हैं और मनुष्य की खोपड़ी बर्तन के तौर पर प्रयोग में लेते हैं । लेकिन यहां कपाल का अर्थ है टूटा मिट्टी का बर्तन, जैसे घड़े का टुकड़ा । मैंने अपनी बाल्यावस्था (उत्तराखंड में व्यतीत समय) में योगी-योगिनियों को पुष्ट गोल लौकी (तुम्बा) के बाहरी सख्त खोल से बना बर्तन भिक्षा हेतु प्रयोग में लेते देखा है जिसे कपाल कहा जाता है । संन्यासधर्म में पक्के मकान के भीतर निवास करना वर्जित है । संन्यासी पेड़ की छाया में निवास करे और वर्षा आदि से बचने के लिए घास-फूस से बनी कुटिया में रह सकता है । कुचैल का अर्थ सामान्यतः फटा-पुराना मैला होता है । मन की शुचिता के साथ देह की शुचिता की अपेक्षा संन्यासी से भी रहती है । मैं समझता हूं कि कुचैल से यहां मतलब है केवल पानी से साफ किया हुआ न कि साबुन जैसे चीज का प्रयोग करते हुए । उक्त कथन में उपेक्षा का अर्थ तिरस्कार से नहीं है, बल्कि उदासीनता से है । अर्थात् संन्यासी न तो किसी से लगाव रखे न किसी से द्वेष ।

अगले आलेखों में भी उक्त ग्रंथ से एतद्विषयक अतिरिक्त सामग्री । – योगेन्द्र जोशी

कौटिलीय वचन: “अर्थैः अर्थाः प्रबध्यन्ते …” अर्थात धन से ही अधिक धन अर्जित होता है

कौटिलीय अर्थशास्त्र”  महान राजनीतिवेत्ता कौटिल्य द्वारा राज्य का शासन कारगर तरीके से चलाने की प्रणाली पर रचित ग्रंथ है । कौटिल्य चाणक्य (चणक-पुत्र, असल नाम विष्णुगुप्त) का वैकल्पिक नाम है, जिन्होंने करीब ढाई हजार साल पहले चंद्रगुप्त को राजगदी पर बिठाकर मौर्य राज्य की स्थापना की थी । उनके बारे में कुछ जानकारी मैंने अपने 23 सितंबर, 2009, की ब्लॉग-प्रविष्टि में दी है ।

उक्त ग्रंथ में शासकीय व्यवस्था की तमाम बातों के साथ पुरुषार्थ की महत्ता की भी बात की गई है । चाणक्य के अनुसार भाग्य के भरोसे बैठना नासमझों का काम है । ग्रंथकार ने यह भी कहा है कि धन से ही और अधिक धन का उपार्जन होता है । तत्संबंधित दो श्लोक मुझे ग्रंथ में पढ़ने को मिले हैं जिनका उल्लेख मैं इस स्थल पर कर रहा हूं ।

(स्रोत संदर्भ – कौटिलीय अर्थशास्त्र, अधिकरण 9, प्रकरण 142)

नक्षत्रमतिपृच्छन्तं बालमर्थोऽतिवर्तते ।

अर्थो ह्यर्थस्य नक्षत्रं किं करिस्यन्ति तारकाः ॥

( नक्षत्रम् अति-पृच्छन्तम् बालम् अर्थः अति-वर्तते, अर्थः हि अर्थस्य नक्षत्रम् तारकाः किम् करिस्यन्ति ।)

अर्थ – नक्षत्रों की गणना करने वाले नासमझ से धन दूर ही रहता है । दरअसल धन के लिए धन ही नक्षत्र होता है, उसके लिए तारागण की क्या भूमिका ?

धनोपार्जन के कार्य में ग्रह-नक्षत्रों की गणना, ज्योतिषीय सलाह-मशविरा, शुभ मुहूर्त का विचार, आदि का कोई महत्व नहीं होता । जो इन पचड़ों में रहता है वह व्यावहारिक जीवन में एक नादान बच्चे की-सी नासमझी करता है । असल तथ्य तो यह है कि धनोपार्जन के लिए आपके पास की धन-संपदा ही ग्रह-नक्षत्र की भूमिका निभाती हैं । तात्पर्य यह है कि आकाशीय पिंड धनोपार्जन को प्रभावित करने की क्षमता नहीं रख्रते, बल्कि आपकी पहले से ही अर्जित धनसंपदा उनकी जगह प्रभावी होती हैं, जैसा कि अगले श्लोक से स्पष्ट है ।

नाधनाः प्राप्नुवन्त्यर्थान्नरा यत्नशतैरपि ।

अर्थैरर्थाः प्रबध्यन्ते गजाः प्रतिगजैरिव ॥

(अधनाः नराः यत्न-शतैः अपि अर्थान् न प्राप्नुवन्ति, प्रति-गजैः गजाः इव अर्थाः अर्थैः प्रबध्यन्ते ।)

अर्थ – निर्धन जन सौ प्रयत्न कर लें तो भी धन नहीं कमा सकते हैं । जैसे हाथियों के माध्यम से हाथी वश में किए जाते हैं वैसे ही धन से धन को कब्जे में लिया जाता है ।

यह सुविख्यात है कि वनक्षेत्र में रह रहे हाथी को पालतू हाथियों की मदद से वश में किया जाता है और कालांतर में उसे पालतू बनाने में सफलता मिल जाती है । कुछ ऐसा ही धन के साथ होता है । एक कहावत हैः “पैसा पैसे को खींचता है ।” जिसके निहितार्थ यही हैं । दरअसल जब मनुष्य के पास धन होता है तभी वह उसका समुचित निवेश कर सकता है जिससे उसे अतिरिक्त धन की प्राप्ति होती है । जो निवेश करने में जितना अधिक समर्थ होगा उसे उसी अनुपात में लाभ भी मिलेगा । जिसके पास धन ही न हो वह निवेश कहां से कर पाएगा ?

व्यवहारिक जीवन में उपर्युक्त बात कमोवेश सही ठहरती है बशर्ते कि हम धनसंपदा के अर्थ अधिक व्यापक लेते हुए उसमें बौद्धिक संपदा को भी जोड़ लें । आजकल बौद्धिक कौशल का जमाना है । आप अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हुए भी धनोपार्जन कर सकते हैं । ऐसा व्यक्ति पहले उसी का निवेश करता है, फिर उससे पाप्त धन का निवेश करता है । अंततः सभी को निवेश का ही रास्ता अपनाता होता है ।

मेरी समझ में चाणक्य का संदेश यही है कि भविष्यवाणी की ज्योतिष् या तत्सदृश कलाओं पर निर्भर न होकर व्यक्ति को अपने धन या हुनर से ही संपदा अर्जित करने की सोचनी चाहिए । – योगेन्द्र जोशी

“चरैवेति चरैवेति” (ऐतरेय ब्राह्मण) – (3) “चरैवेति” का उपदेश एवं ब्राह्मण बालक शुनःशेप की कथा

पिछली दो ब्लॉग-प्रविष्टियों (अक्टूबर 3 तथा अक्टूबर 5, 2015) में मैंने राजा हरिश्चंद्र और उनके पुत्र रोहित की कथा का वर्णन करते हुए इस बात का उल्लेख किया था कि कैसे ब्राह्मण भेषधारी इंद्र द्वारा “चरैवेति” के उपदेश से प्रेरित होकर रोहित करीब पांच वर्ष तक देश-प्रदेश में विचरण करता रहा । पांचवें वर्ष के अंत पर जब वह घर लौटने को उद्यत हुआ तो मार्ग में उसे ब्राह्मण भेष में पुनः इंन्द्र देवता मिल गए । उन्होंने पिछली बारों की तरह “चरैवेति” का उपदेश दिया और कहा –

चरन् वै मधु विन्दति चरन् स्वादुमुदुम्बरम् ।

सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरंश्चरैवेति ॥

(चरन् वै मधु विन्दति, चरन् स्वादुम् उदुम्बरम्, सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यः चरन् न तन्द्रयते, चर एव इति ।)

अर्थ – इतस्ततः भ्रमण करते हुए मनुष्य को मधु (शहद) प्राप्त होता है, उसे उदुम्बर (गूलर?) सरीखे सुस्वादु फल मिलते हैं । सूर्य की श्रेष्ठता को तो देखो जो विचरणरत रहते हुए आलस्य नहीं करता है । उसी प्रकार तुम भी चलते रहो (चर एव) ।

मधु और उदुम्बर प्रतीक हैं मार्ग में उपलब्ध खाद्य पदाथों के । (शब्दकोश में उदुम्बर का अर्थ गूलर का फल दिया गया है ।) प्राचीन काल में विचरण करता हुआ व्यक्ति कभी वनों से गुजरता होगा तो कभी ऋषि-मुनियों के आश्रम में और कभी गांवों में पहुंचता होगा । उसे वन्य कंद-फल आदि के अतिरिक्त वन तथा ग्रामवासियों से आतिथ्य में विविध भोज्य पदार्थ प्राप्त होते होंगे । उक्त श्लोक उन्हीं की ओर संकेत करता है ।

ब्राह्मण की सलाह के अनुरूप कुमार रोहित छठे वर्ष भी पर्यटन पर चला गया । इस बार वनक्षेत्र में विचरण करते हुए उसकी भेंट सुयवस के पुत्र निर्धन अजीगर्त नामक ऋषि से हुई ।

अजीगर्त के तीन बालक-पुत्र थे जिनके नाम क्रमशः शुनःपुच्छ, शुनःशेप और शुनोलांगूल थे । (तीनों शब्दों, पुच्छ, शेप तथा लांगूल, का एक ही अर्थ पूंछ होता है । श्वन् = कुत्ता; शुनः = कुत्ते की; शुनःपुच्छ = कुत्ते की पूंछ । ऐसे नाम क्यों चुने गये होंगे ? मैं कह नहीं सक्ता ।) रोहित ने अजीगर्त के सम्मुख प्रस्ताव रखा कि वह किसी एक पुत्र को उसे (रोहित को) बेच दे । मूल्य रूप में उनको सौ गायें दी जाएंगी । अजीगर्त को ज्येष्ठ और उसकी पत्नी को कनिष्ठ पुत्र प्यारे थे, उन्होंने मंझले शुनःशेप को बेच दिया । रोहित उसको लेकर घर लौट आया । इसके साथ ही “चरैवेति” उपदेशों की शृखला समाप्त हो गई ।

रोहित ने शुनःशेप को पिता हरिश्चन्द्र, जो जलोदर  रोग (Hydropsy या Oedema, जिसमें शरीर के कुछ अंगों में जल भरने से सूजन पैदा हो जाती है ।)से पीड़ित थे, को सोंप दिया, ताकि उसके बदले उस बालक से वरुणदेव का यजन किया जा सके और वह स्वयं मुक्त हो जावे । कथा के अनुसार वरुणदेव को क्षत्रिय बालक के बदले ब्राह्मण बालक अधिक स्वीकार्य था ।

तत्पश्चात यज्ञ की व्यवस्था की गई, जिसमें स्वयं अजीगर्त भी सम्मिलित हुए । सभी तैयारियों के अंतर्गत जब शुनःशेप को पशु की भांति यूप पर बांधने की बारी आई तो कोई भी व्यक्ति इस पापकर्म को करने को तैयार नहीं हुआ । (यज्ञमंडप में याज्ञिक कर्मों के लिए खंभा यूप कहलाता है ।) तब अजीगर्त ने सौ गायें लेकर स्वयं ही इस कार्य को संपन्न कर दिया । यूप पर पशुवत बंधे उस बालक का बध करके बलि देने के लिए कोई तैयार न हुआ । तब अजीगर्त ने अतिरिक्त सौ गायें मांगकर उस कार्य को भी पूरा करना स्वीकार कर लिया ।

शुनःशेप को यह आभास हो गया कि एक पशु की तरह यज्ञ में उसका बध किया जाना है । यज्ञ संबंधी उसके ज्ञान के अनुसार यज्ञ की “पर्यग्नि” नामक प्रक्रिया के बाद उसे बन में छोड़ा जाना चाहिए था । किंतु वहां तो उसका बध वास्तव में किया जाने वाला है । वह आत्मरक्षा हेतु ऋग्वैदिक मंत्रों से देवताओं की अर्चना करने लगा । उसने सर्वप्रथम प्रजापति (ब्रह्मा?) की प्रार्थना की जिन्होने उसे अग्नि की स्तुति करने को कहा क्योंकि वे सभी देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं ।

अग्नि की अर्चना करने पर उस ब्राह्मण बालक को सविता (सूर्य?) की प्रार्थना करने को कहा, जो सभी जीवों के जन्मदाता-पालनकर्ता हैं । सविता ने बालक से कहा कि चूंकि उसे वरुणदेव के लिए यूप पर बांधा गया है अतः वह उन्हीं की शरण में जावे । स्तुति करने पर वरुण ने कहा कि अग्नि सभी देवताओं के मुखस्वरूप हैं, क्योंकि यज्ञ की आहुतियां उन्हीं के माध्यम से देवताओं को प्राप्त होती हैं, अतः उन्हीं की शरण में वे जावें ।

बालक ने फिर से अग्नि की स्तुति की तो अग्निदेव बोले कि तुम समस्त देवों की सामूहिक स्तुति करो । उसने वही किया । तब देवगण बोले कि वह इंद्र की प्रार्थना करे जो उन सभी में श्रेष्ठतम हैं । उसने वही किया । इंद्र ने उसके लिए एक दिव्यरथ भेज दिया और कहा कि वह अश्विनी कुमारों की स्तुति करे वही उसे छोड़ देंगे । अश्विनियों की प्रार्थना करने पर उन्होंने बालक से कहा कि वह उषा (?) की स्तुति करे ताकि सभी देवता उसे मुक्त कर दें ।

शुनःशेप ने वेद की ऋचाओं के साथ स्तुति आंरभ की । जैसे-जैसे उसने एक-एककर ऋचाओं से देवताओं की स्तुति की वैसे-वैसे उसके बंधन खुलते गए, और जलोदर से स्थूल हो चुके राजा का पेट भी सामान्य होता गया । मुक्त हो चुका बालक शुनःशेप ऋषि विश्वामित्र की गोद में स्वयं को उनका पुत्र मानते हुए बैठ गया ।

शुनःशेप के विश्वामित्र का पुत्र घोषित होने पर अजीगर्त का पुत्रमोह जाग गया । उन्होंने उसे ऐसा करने से मना किया और उनके पास वापस आ जाने का आग्रह किया । इस प्रयोजन के लिए उन्होंने पूर्व में पाये गये तीन सौ गायें राजा को लौटाने की बात भी रखी । किंतु बालक शुनःशेप ने यह कहते हुए प्रस्ताव अस्वीकृत कर दिया कि जो पिता यज्ञ में अपने पुत्र का पशुवत वध करने के कुत्सित कृत्य के लिए तैयार हो उसके पितृत्व को वह अस्वीकार करता है । देवताओं की कृपा से ऋषि विश्वामित्र उसके पिता बन गयेे ।

अंततः कतिपय टिप्पणियां

“चरैवेति चरैवेति” के नाम से तीन भागों में जिस कथा का विवरण मैंने प्रस्तुत किया है उसमें निहित संदेश वस्तुतः क्या हैं यह मैं ठीक से नहीं बता सकता । मुझे ये बातें समझ में आती हैंः

(1) पु़त्र पाने की इच्छा मनुष्य में प्राचीन काल से ही रही हैं और उसके लिए वह दैवी शक्तियों के समक्ष अव्यावहारिक संकल्प भी कर बैठता है ।

(2) प्रिय व्यक्ति/वस्तु के मोह में मनुष्य अपने वादे से मुकरने हेतु बहाने भी तलाशता है ।

(3) अपने त्याग से बचने के लिये मनुष्य दूसरे को धन-संपदा देकर त्याग के लिए प्रेरित करने से नहीं हिचकता है ।

(4) अपनी प्रिय वस्तु/व्यक्ति की रक्षा के लिए मनुष्य का दैवी शक्तियों की शरण में जाना सामान्यतः सदैव होता रहा है ।

(5) इन्द्र द्वारा दिए गए “चरैवेति” के उपदेश में उद्यमशीलता का संदेश स्पष्ट है ।

(6) शुनःशेप (शुनःशेफ)  की कथा से यह भी ज्ञात होता है कि यज्ञ में नरबलि वास्तविक न होकर मात्र प्रतीकात्मक होती थी । अर्थात याज्ञिक प्रक्रिया “पर्यग्नि”(अग्निज्वालाओं से घिरा हुआ) के पश्चात बलि-पुरुष को वन में छोड़ दिया जाता था । – योगेन्द्र जोशी

 

“चरैवेति चरैवेति” (ऐतरेय ब्राह्मण) – (2) राजा हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहित को इंद्रदेवता का “चरैवेति” का उपदेश

पिछली पोस्ट में मैंने राजा हरिश्चंद्र और वरुण देवता से वरदान में मिले उनके पुत्र रोहित की कथा का आरंभिक अंश प्रस्तुत किया था । कथा के अनुसार राजा ने रोहित को लेकर वरुण देवता का यज्ञ करना था, जिसको जानने पर रोहित वन को चला गया । वर्षोपरांत उसने घर लौटना चाहा तो मार्ग में ब्राह्ण भेषधारी इंद्र उसे मिल गये । ब्राह्मण के विचारों से प्रेरित होकर वापस पर्यटन पर चला गया । दूसरे वर्ष के समाप्त होते-होते जब वह घर लौटने लगा तो ब्राह्मण रूप में इंद्र उसे फिर मिल गए । ब्राह्मण ने उसे पुनः “चरैवेति” का उपदेश देते हुए पर्यटन करते रहने की सलाह दी –

पुष्पिण्यौ चरतो जङ्घे भूष्णुरात्मा फलग्रहिः ।

शेरेऽस्य सर्वे पाप्मानः श्रमेण प्रपथे हतश्चरैवेति ॥

(ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय 3, खण्ड 3)

(चरतः जङ्घे पुष्पिण्यौ, भूष्णुः आत्मा फलग्रहिः, अस्य श्रमेण प्रपथे हतः सर्वे पाप्मानः शेरे, चर एव इति ॥)

अर्थ – निरंतर चलने वाले की जंघाएं पुष्पित होती हैं, अर्थात उस वृक्ष की शाखाओं-उपशाखाओं की भांति होती है जिन पर सुगंधित एवं फलीभूत होने वाले फूल लगते हैं, और जिसका शरीर बढ़ते हुए वृक्ष की भांति फलों से पूरित होता है, अर्थात वह भी फलग्रहण करता है । प्रकृष्ट मार्गों पर श्रम के साथ चलते हुए उसके समस्त पाप नष्ट होकर सो जाते हैं, अर्थात निष्प्रभावी हो जाते हैं । अतः तुम चलते ही रहो (विचरण ही करते रहो, चर एव) ।

इस श्लोक की व्याख्या मुझे सरल नहीं लगी । सायण भाष्य के अनुसार विचरणशील व्यक्ति की जांघों के श्रम के फलस्वरूप मनुष्य को विभिन्न स्थानों पर भांति-भाति के भोज्य पदार्थ प्राप्त होते हैं जिनसे उसका शरीर वृद्धि एवं आरोग्य पाता है । प्रकृष्ट मार्ग के अर्थ श्रेष्ठ स्थानों यथा तीर्थस्भल, मंदिर, महात्माओं-ज्ञानियों के आश्रम-आवास से लिया गया है । इन स्थानों पर प्रवास या उनके दर्शन से उसे पुण्यलाभ होता है अर्थात उसके पाप क्षीण होकर पिष्प्रभावी हो जाते हैं ।

राजपुत्र रोहित ने ब्राह्मण की बातों को मान लिया और वह घर लौटने का विचार त्यागकर पुनः देशाटन पर निकल गया । घूमते-फिरते तीसरा वर्ष बीतने को हुआ तो उसने वापस घर लौटने का मन बनाया । इस बार भी इन्द्र देव ब्राह्मण भेष में उसे मार्ग में दर्शन देते है । वे उसे पुनः “चरैवेति” का उपदेश देते हैं । वे कहते हैं –

आस्ते भग आसीनस्योर्ध्वस्तिष्ठति तिष्ठतः ।

शेते निपद्यमानस्य चराति चरतो भगश्चरैवेति ॥

(ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय 3, खण्ड 3)

(आसीनस्य भग आस्ते, तिष्ठतः ऊर्ध्वः तिष्ठति, निपद्यमानस्य शेते, चरतः भगः चराति, चर एव इति ॥)

अर्थ – जो मनुष्य बैठा रहता है, उसका सौभाग्य (भग) भी रुका रहता है । जो उठ खड़ा होता है उसका सौभाग्य भी उसी प्रकार उठता है । जो पड़ा या लेटा रहता है उसका सौभाग्य भी सो जाता है । और जो विचरण में लगता है उसका सौभाग्य भी चलने लगता है । इसलिए तुम विचरण ही करते रहो (चर एव) ।

सौभाग्य से तात्पर्य धन-संपदा, सुख-समृद्धि से है । जो व्यक्ति निक्रिय बैठा रहता है, जो उद्यमशील नहीं होता, उसका ऐश्वर्य बढ़ नहीं पाता है । जो उद्यम हेतु उठ खड़ा होता है उसका सौभाग्य भी आगे बढ़ने के लिए उद्यत होता है । जो आलसी होता है, सोया रहता है, निश्चिंत पड़ा रहता है, उसका ऐश्वर्य नष्ट होने लगता है, उसकी समुचित देखभाल नहीं हो पाती । उसके विपरीत जो कर्मठ होता है, उद्यम में लगा रहता है, जो ऐश्वर्य-वृद्धि हेतु विभिन्न कार्यों को संपन्न करने के लिए भ्रमण करता है, यहां-वहां जाता है उसके सौभाग्य की भी वृद्धि होती है, धन-धान्य, संपदा, आगे बढ़ते हैं ।

पर्यटन में लगे रोहित का एक और वर्ष बीत गया और वह घर लौटने लगा । पिछली बारों की तरह इस बार भी उसे मार्ग में ब्राह्मण-रूपी इंद्र मिल गए, जिन्होंने उसे “चरैवेति” कहते हुए पुनः भ्रमण करते रहने की सनाह दी । रोहित उनके बचनों का सम्मान करते हुए फिर से पर्यटन में निकल गया ।

इस प्रकार रोहित चार वर्षों तक यत्रतत्र भ्रमण करता रहा । चौथे वर्ष के अंत पर जब वह घर लौटने को उद्यत हुआ तो मार्ग में उसे ब्राह्मण भेष में इंन्द्रदेव पुनः मिल गए । उन्होंने हर बार की तरह “चरैवेति” का उपदेश दिया और कहा –

कलिः शयानो भवति संजिहानस्तु द्वापरः ।

उत्तिष्ठस्त्रेता भवति कृतं संपाद्यते चरंश्चरैवेति ॥

(ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय 3, खण्ड 3)

 (शयानः कलिः भवति, संजिहानः तु द्वापरः, उत्तिष्ठः त्रेता भवति, चरन् कृतं संपाद्यते, चर एव इति ।)

अर्थ – शयन की अवस्था कलियुग के समान है, जगकर सचेत होना द्वापर के समान है, उठ खड़ा होना त्रेता सदृश है और उद्यम में संलग्न एवं चलनशील होना कृतयुग (सत्ययुग) के समान है । अतः तुम चलते ही रहो (चर एव) ।

इस श्लोक में मनुष्य की चार अवस्थाओं की तुलना चार युगों से क्रमशः की गई है । ये अवस्थाएं हैं (1) मनुष्य के निद्रामग्न एवं निष्क्रिय होने की अवस्था, (2) जागृति किंतु  आलस्य में पड़े रहने की अवस्था, (3) आलस्य त्याग उठ खड़ा होकर कार्य के लिए उद्यत होने की अवस्था, और (4) कार्य-संपादन में लगते हुए चलायमान होना । ब्राह्मण रूपी इन्द्र रोहित को समझाते हैं कि जैसे युगों में सत्ययुग उच्चतम कोटि का कहा जाता है वैसे ही उक्त चौथी अवस्था श्रेष्ठतम स्तर की कही जाएगी । उस युग में समाज सुव्यस्थित होता था और सामाजिक मूल्यों का सर्वत्र सम्मान था । उसके विपरीत कलियुग सबसे घटिया युग कहा गया है क्योंकि इस युग में समाज में स्वार्थपरता सर्वाधिक रहती है और परंपराओं का ह्रास देखने में आता है । उपर्युक्त पहली अवस्था इसी कलियुग के समान निम्न कोटि की होती है ।

उक्त प्रकार से संचरण में लगे रोहित के पांच वर्ष व्यतीत हो गये । कथा के अनुसार ब्राह्मण भेषधारी इन्द्र ने अंतिम (पांचवीं) बार फिर से रोहित को संबोधित करते हुए “चरैवेति” के महत्व का बखान किया । तदनुसार पुनः भ्रमण पर निकले रोहित को अजीगर्त नामक एक निर्धन ब्राह्मण के दर्शन हुए । उक्त वाह्मण से उसने उनके पुत्र, शुनःशेप, को खरीद लिया ताकि वह बालक वरुणदेव के लिए संपन्न किए जाने वाले यज्ञ में स्वयं के बदले इस्तेमाल कर सके ।

शुनःशेप (विकल्पतः शुनःशेफ) से संबंधित कथा का शेष और अंतिम भाग अगली पोस्ट में । – योगेन्द्र जोशी

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