मृच्छकटिकम् नाट्यरचना – चोरी के पक्ष में चोर का तर्क

मृच्छकटिकम् संस्कृत साहित्य की एक चर्चित नाट्यरचना है जिसकी चर्चा मैं पहले कभी कर चुका हूं (देखें ‘संस्कृत नाट्यकृति …’) । इस रचना में चोरी का एक प्रकरण है, जिसमें चोरी के धंधे से जीवनयापन करने वाले चोर के मन में घुप अंधेरी रात में सेंध लगाते समय क्या-क्या विचार उपजते हैं इसका वर्णन किया गया है । शर्विलक नामक वह चोर स्वयं से कहता है कि समाज में चोरी की निःसंदेह निंदा की जाती है, लेकिन वह इस मत को अस्वीकार करता है, क्योंकि याचक की भांति किसी की चाकरी करने से भला तो स्वतंत्र होकर चोरी करना है । लोग कुछ भी मानें, मैं तो इसी कार्य में लगना ठीक मानता हूं । देखिए उसके उद्गार:

कामं नीचमिदं वदन्तु पुरुषाः स्वप्ने तु यद्वर्द्धते

विश्वस्तेसु च वञ्चनापरिभवश्चौर्यं न शौर्यं हि तत् ।

स्वाधीना वचनीयतापि हि वरं वद्धो न सेवाञ्जलिः

मार्गो ह्येष नरेन्द्रसौप्तिकवधे पूर्वं कृतो द्रोणिना ॥

(मृच्छकटिकम्, तृतीय अंक, 11)

(यत् तु स्वप्ने वर्द्धते, विश्वस्तेसु च वञ्चना-परिभवः तत् चौर्यम् शौर्यम् न हि, पुरुषाः इदम् कामम् नीचम् वदन्तु, स्वाधीना वचनीयता अपि हि वरम्, वद्धः सेवा-अञ्जलिः न, पूर्वम् एषः मार्गः हि द्रोणिना नरेन्द्र-सौप्तिक-वधे कृतः ।)

अर्थ – जो लोगों की निद्रावस्था में किया जाता है, अनिष्ट के प्रति अशंकित लोगों का जिस चोरी से तिरस्कार हो जाता है, उसे किसी शूरवीर का कार्य तो नहीं माना जा सकता है । लोग इस कार्य की निंदा करते रहें, परंतु मैं तो निंद्य होने के बावजूद स्वतंत्र वृत्ति होने के कारण इसे श्रेष्ठ मानता हूं; यह किसी के समक्ष सेवक की भांति बद्धहस्त होने से तो बेहतर है । इतना ही नहीं, पहले भी इस मार्ग को द्रोणाचार्य-पु़त्र ने महाराज के पुत्रों के बध हेतु अपनाया था ।

चोर शर्विलक के मतानुसार किसी के आगे हाथ जोड़ने से अच्छा तो स्वतंत्र रूप से संपन्न किया जाने वाला चौर्यकार्य बेहतर है । लोग इसकी निंदा करते हैं, किंतु चर्चित लोगों ने तक चोरी का रास्ता अपनाया  है । इस प्रकरण में महाभारत की उस घटना का उल्लेख चोर करता है जिसमें द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने रात में पांडवों के शिबिर में चोरी से घुसकर द्रौपदी-पुत्रों का बध किया थाजयद्रथ का वध भी श्रीकृष्ण ने धोखे से ही करवाया था । असल में देखा जाए तो चोरी से अपना मकसद सिद्ध करने की तमाम घटनाओं का जिक्र पौराणिक कथाओं में मिलता है । चोरी का मतलब है किसी को धोखा देकर कुछ भी हासिल करना । रामायण में सीताहरण एवं बालीबध ऐसे ही कृत्य थे । इंद्र ने चोरी से ही गौतम-पत्नी अहिल्या का सतीत्व लूटा था ।

आजकल तो ‘चोरी’ आम बात हो गई है । अपने महान् देश में जिधर देखो उधर संभ्रांत कहे जाने वाले अनेकों राजनेता और शासकीय कर्मचारी चोरी में लिप्त पाए जा रहे हैं ।

नाटक में अन्यत्र स्थल पर चोर शर्विलक अपनी प्रेमिका को समझाता है कि चोरी की भी उसकी कुछ मर्यादाएं हैं । वह कहता है:

नो मुष्णाम्यबलां विभूषणवतीं फुल्लामिवाहं लतां

विप्रस्वं न हरामि काञ्चनमथो यज्ञार्थमभ्युद्धृतम् ।

धात्र्युत्सङ्गगतं हरामि न तथा बालं धनार्थी क्वचित्

कार्य्याकार्य्यविचारिणी मम मतिश्चौर्ये९पि नित्यं स्थिता ॥

(मृच्छकटिकम्, चतुर्थ अंक, 6)

(फुल्लाम् लताम् इव विभूषण-वतीम् अबलाम् धनार्थी अहम् नो मुष्णामि, विप्रस्वम् अथो यज्ञार्थम् अभि-उुद्-धृतम् काञ्चनम् न हरामि, तथा धात्रि-उत्सङ्ग-गतम् बालम् न क्वचित् हरामि, चौर्ये अपि कार्य्य-अकार्य्य-विचारिणी मम मतिः नित्यम् स्थिता ।)

अर्थ – सुपुष्पित लता की भांति आभूषणों से लदी स्त्री के आभूषण मैं नहीं छीनता, ब्राह्मण की संपदा और यज्ञकर्म के लिए सुरक्षित सोने पर हाथ साफ नहीं करता, धाय या उपमाता की गोद में स्थित बच्चे की चोरी नहीं करता; दरअसल चोरी के काम में भी मेरी मति करणीय एवं अकरणीय के विवेक पर टिकी रहती है ।

चोर का मंतव्य है कि वह हर प्रकार की, हर किसी की चोरी नहीं करता है । कदाचित् वह कमजोर से छीनाछपटी नहीं करता, गरीब की चोरी नही करता, धर्मकर्म से जुड़ी चीजों की चोरी नहीं करता । चोरी के भी उसके कुछ उसूल हैं ।

आज की सामाजिक स्थिति देखिए । सर्वत्र चोरी और लूटपाट चल रही है । न किसी की उम्र का लिहाज है, न किसी की आर्थिक स्थिति का विचार है, न किसी प्रकार को शर्मोहया है । वस्तुतः चौर्य में संलिप्त मृच्छकटिकम् के पात्र शर्विलक का चरित्र आज के सफेदपोश चोरों से कहीं ऊपर है । – योगेन्द्र जोशी

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दरिद्रता के (कु)परिणाम – संस्कृत नाट्य ‘मृच्छकटिकम्’ में चारुदत्त के नैराश्य की अभिव्यक्ति

‘मृच्छकटिकम्’ संस्कृत साहित्य की एक चर्चित नाट्य-रचना है, जिसके बारे में मैं पहले अन्यत्र लिख चुका हूं (देखें दिनांक 26-9-2010 एवं 11-2-2009 की प्रविष्ठियां) ।

उसका नायक अभिजात वर्ग का एक उदार एवं सरलहृदय ब्राह्मण है, जो अति दानशीलता के कारण अपनी संपन्नता खो बैठता है । नाटक में एक प्रसंग है जिसके अंतर्गत चारुदत्त को गरीबी पर अपने मित्र के साथ निराशाप्रद टिप्पणी करते हुए दिखाया गया है । अपने उद्गार को वह इस प्रकार प्रस्तुत करता हैः-

दारिद्र्यात् पुरुषस्य बान्धवजनो वाक्ये न सन्तिष्ठते ।
सुस्निग्धा विमुखीभवन्ति सुहदः स्फारीभवन्त्यापदः ।
सत्त्वं ह्रासमुपैति शीलशालिनः कान्तिः परिम्लायते ।
पापं कर्म च यत्परैरपि कृतं तत्तस्य संभाव्यते ॥36॥
(मृच्छकटिकम्, प्रथम अंक)
(दारिद्र्यात् पुरुषस्य बान्धव-जनः वाक्ये न सम्-तिष्ठते; सु-स्निग्धा विमुखी-भवन्ति सुहदः स्फारी-भवन्ति आपदः; सत्त्वं ह्रासम् उप-एति; शील-शालिनः कान्तिः परि-म्लायते; पापं कर्म च यत् परैः अपि कृतं तत् तस्य संभाव्यते ।)

अर्थ – आर्थिक हीनावस्था में पहुंचने पर उस गरीब की बात निकट संबंधी नहीं सुनता; जो हितैषी पहले सौहार्द भाव से पेश आते थे वे भी मुख मोड़ लेते हैं; विपत्तियां बढ़ जाती हैं; व्यक्ति की सामर्थ्य चुक जाती है; चरित्र एवं शालीनता की चमक फीकी पड़ जाती है; और दूसरों के हाथों घटित पापकर्म भी अब उसके द्वारा किये गये समझे जाने लगते हैं (उस पर संदेह किया जाता है) ।

सङ्गं नैव हि कश्चिदस्य कुरुते सम्भाषते नादरात् ।
सम्प्राप्तो गृहमुत्सवेषु धनिनां सावज्ञमालोक्यते ।
दूरादेव महाजनस्य विहरत्यल्पच्छदो लज्जया ।
मन्ये निर्धनता प्रकाममपरं षष्ठं महापातकम् ॥37॥
(यथा उपर्युक्त)
(सङ्गं न एव हि कश्चित् अस्य कुरुते सम्-भाषते न आदरात्; सम्-प्राप्तः गृहम् उत्सवेषु धनिनां स-अवज्ञम् आलोक्यते; दूरात् एव महाजनस्य विहरति अल्प-च्छदः लज्जया; मन्ये निर्धनता प्रकामम् अपरं षष्ठं महा-पातकम् ।)

अर्थ – आर्थिक विपन्नता झेल रहे व्यक्ति के सान्निध्य से लोग बचते हैं; कोई भी आदर के साथ बात नहीं करता है; उत्सव के अवसर पर किसी धनी के घर पहुंचा ऐसा व्यक्ति संपन्न जनों द्वारा तिरस्कार भाव से देखा जाता है; प्रतिष्ठासूचक परिधान के अभाव में लज्जा या संकोच से ग्रस्त ऐसा व्यक्ति श्रेष्ठ माने जाने वाले के पास से बचकर निकलता है । मैं मानता हूं कि निर्धनता गंभीर छठा महापातक है ।

मनुस्मृति में पांच महापातकों अर्थात् गंभीरतम पापों का उल्लेख किया गया है, जिनमें प्रथम चार हैं: 1. ब्रह्महत्या (ब्राह्ण की हत्या), 2. सुरापान (शराब पीना), 3. चोरी, एवं 4. गुरुपत्नी के साथ संबंध, और 5वां है इन चार प्रकार के पापकर्मों में लिप्त व्यक्ति के साथ अंतरंगता । मृच्छकटिकम् का नायक कहता है कि निर्धनता स्वयं में एक महापाप है जिसे छठा महापाप कहना चाहिए । (आजकल इन पापकर्मों को गंभीरता से नहीं लिया जाता है, खास तौर पर पांचवे को । किसी अपराधी के साथ संबंधों की व्यक्ति-स्वातंत्र्य के नाम पर छूट आम बात है ।)

धन की महत्ता मानव समाज में सर्वत्र एवं सदैव ही रही है । रामायण-महाभारत ग्रंथों में भी धन की महत्ता की चर्चा पढ़ने को मिल जाती है । मृच्छकटिकम्, जिसका रचनाकाल अनुमानतः 5-6 ईसवी  समझा जाता है, तब की सामाजिक दिशा-दशा का प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करता है । ऐसा प्रतीत होता है कि उस काल में मनुष्य की आर्थिक संपन्नता उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा निर्धारित करती थी । मेरा मत है कि प्राचीन काल में व्यक्ति के गुणों की अनदेखी नहीं होती थी, और उसका सम्मान उसकी विद्वता, चरित्र एवं परोपकारशीलता पर अधिक निर्भर करता था । किंतु आज के युग में ये बातें गौण होती जा रही हैं । आज धनसंपदा महत्ता में सर्वोपरि है, भले ही हम अन्य बातों के महत्त्व को औपचारिकतावश स्वीकारने का ढोंग करते हों । आजकल ‘हाय पैसा, हाय पैसा’ की भावना के साथ अधिकाधिक पैसा कमाने की होड़ हमारी धनलिप्सा को ही प्रतिबिंबित करता है । जो अपेक्षया निर्धन हो उसको हम बराबरी का दर्जा नहीं देते; उससे दूरी बनाने की कोशिश करते हैं; अपने संबंध बराबर अथवा अपने से ऊपर के व्यक्ति से साथ स्थापित करने का प्रयास करते हैं । उपरिलिखित छंदों में चारुदत्त की तत्संबंधित पीड़ा ही झलकती है । – योगेन्द्र जोशी