ऋग्वेद में औषधीय वनस्पतियों की प्रार्थना (2)

अपने चिट्ठे की पिछली प्रविष्टि (21 मार्च 2014) में मैंने चर्चा की थी कि ऋग्वेद में औषधीय वनस्पतियों की प्रार्थना से संबंधित कुछ ऋचाएं पढ़ने को मिलती हैं । उस आलेख में मैंने तीन ऋचाओं का उल्लेख किया था । इस स्थल पर मैं अतिरिक्त तीन ऋचाएं प्रस्तुत कर रहा हूं ।

आगे बढ़ने से पहले मैं यह स्पष्ट कर दूं कि वैदिक ऋषिगण प्रकृति के हर घटक में, जंगम (गतिशील) एवं स्थावर (स्थिर)  कृतियों में, अधिष्ठाता दैवी शक्तियों के अस्तित्व होने का विश्वास करते थे । उनके मत में दैवी शक्तियां वस्तुविशेष के गुणधर्मों पर नियंत्रण रखती हैं । वे मानते थे जिस किसी वस्तु का उपयोग किया जा रहा हो उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जानी चाहिए, उसके प्रति कल्याणप्रद बने रहने की प्रार्थना की जानी चाहिए । प्रकृति को मात्र भोग्य वस्तुओं के संग्रह के रूप में न देखकर उसको हमारे अस्तित्व के चेतन आधार के तौर देखा जाना चाहिए । औषधीय वनस्पतियों के प्रति प्रार्थनाभाव इसी मान्यता से प्रेरित रहा है । इस प्रसंग में प्रस्तुत है एक ऋचा:

          मा वो रिषत्खनिता यस्मै चाहं खनामि वः ।

          द्विपच्चतुष्पदस्माकं सर्वमस्त्वनातुरम् ॥20

          (ऋग्वेद, मण्डल 10, सूक्त 97)

          (अहं खनिता यस्मै च वः खनामि वः मा रिषत् द्विपद्- चतुः-पद् सर्वम् अस्माकं अनातुरम् अस्तु ।)

अर्थः (हे औषधीय वनस्पति) मैं भूमि का खनन करने वाला, और जिसके लिए यह कार्य करता हूं वह, तुम्हारी हिंसा न करें, तुम्हारा नाश न करें । हमसे संबंधित द्विपद (मनुष्यगण) एवं चतुष्पद (पशुगण) रोगमुक्त रहें ।

ओषधि प्राप्ति के लिए भूमि का खननकर्ता वनस्पतियों को हानि तो पहुंचाता ही है । कदाचित प्रार्थना के माध्यम से वह अपनी विवशता व्यक्त करता है । शायद वह यह कहना चाहता है कि अवांझित तौर पर वनस्पतियों को नुकसान पहुंचाना उसका उद्येश्य नहीं । वनस्पतियों को अनावश्यक रूप से नष्ट नहीं करना चाहता है, उनका समूल उच्छेदन नहीं करना चाहता । खननकर्ता के कार्य को हिंसा के तौर पर न देखा जाए । इसके आगे उसकी प्रार्थना है कि औषधियां उससे संबंधित सभी जनों (द्विपद) और पशुसंपदा (चतुष्पद, चौपाये) को रोगमुक्त रखें । अगली ऋचा है:

याश्चेदमुपशृण्वन्ति याश्च दूरं परागताः ।

सर्वाः संगत्य वीरुधोऽस्यै सं दत्त वीर्यम् ॥21

(यथा उपर्युक्त)

(याः च इदम् उपशृण्वन्ति याः च दूरं परागताः सर्वाः वीरुधः संगत्य अस्यै वीर्यम् सं-दत्त ।)

अर्थः इस स्तुति को जो औषधीय लताएं सुन रही हों अथवा जो दूरस्थ हों वे सभी मिलकर इस रोगी को बल प्रदान करें ।

उक्त ऋचा में खननकर्ता द्वारा निकटवर्ती और दूरस्थ औषधीय वनस्पतियों से प्रार्थना की गई है कि वे सभी मिलकर रोगी को रोगमुक्त करें । यहां लता नाम से उन्हें संबोधित किया गया है । लताओं को कदाचित औषधीय गुणों से युक्त सभी वनस्पतियों के प्रतिनिधि के तौर पर देखा गया है । अन्यथा ओषधियां लता से भिन्न रूपों में भी पाई जाती हैं । अंतिम तीसरी ऋचा यों हैः

ओषधयः सं वदन्ते सोमेन सह राज्ञा ।

यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्तं राजन् पारयामसि ॥22

(यथा उपर्युक्त)

(ओषधयः सं-वदन्ते सोमेन राज्ञा सह ब्राह्मणः यस्मै कृणोति तं राजन् पारयामसि ।)

अर्थः सभी ओषधियां राजा सोम के साथ संवाद करती हैं कि हे राजा विशेषज्ञ ब्राह्मण अर्थात वैद्य जिसकी चिकित्सा करें उसे हम रोगों के पार करते हैं ।

सोम चंद्रमा का पर्याय है और उसे औषधीय वनस्पतियों का राजा अथवा अधिष्ठाता देवता माना गया है । इस ऋचा में ओषधियों का अपने राजा चंद्र के साथ संवाद की कल्पना की गई । उनका कथन है कि वे रोग-निवारण में निपुण वैद्य के माध्यम से रोगी को रोगमुक्त करती हैं । प्राचीन काल में वैद्यकी सामान्यतः ब्राह्मणों के कार्यक्षेत्र में रहा होगा ।

वैदिक समाज में भोजन करते, ओषधि सेवन करते, अथवा अन्य कार्य संपन्न करते समय संबंधित वस्तुओं के प्रति कृतज्ञता या प्रार्थना व्यक्त करने की परंपरा रही है । – योगेन्द्र जोशी

 

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मनुस्मृति के अनुसार विवाह के आठ प्रकार – ब्राह्म, दैव, आर्ष आदि (3)

अपनी पिछली पोस्टों (14 जनवरी तथा 28 जनवरीधर्म एवं कर्मकांड संबंधी हिंदुओं के प्राचीन ग्रंथ मनुस्मृति में वर्णित विवाह के आठ प्रकारों – ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस, और पैशाच – का उल्लेख किया था । इनमें से प्रथम पांच की व्याख्या उपर्युक्त पोस्टों में की गई । अंतिम तीन (गान्धर्व, राक्षस, एवं पैशाच) के बारे में आगे अपना कथ्य प्रस्तुत कर रहा हूं । गांधर्व विवाह के बारे में मनुस्मृति का कथन यों है:

इच्छयाऽअन्योन्यसंयोगः कन्यायाश्च वरस्य च ।

गांधर्वः स तु विज्ञेयो मैथुन्यः कामसम्भवः ॥32॥

(मनुस्मृति, अध्याय तीन)

(कन्यायाः च वरस्य च इच्छया अन्योन्य-संयोगः काम-सम्भवः मैथुन्यः स तु गांधर्वः विज्ञेयः ।)

अर्थ – कन्या एवं वर की इच्छा और परस्पर सहमति से स्थापित संबंध, जो शारीरिक संसर्ग तक पहुंच सकते हैं, की परिणति के रूप में हुए विवाह को ‘गांधर्व’ विवाह की संज्ञा दी गई है ।

गांधर्व विवाह का एक उल्लेख्य उदाहरण मुझे शकुंतला-दुष्यंत की पौराणिक कथा में मिलता है । उस कथा में आखेट के लिए गए राजा दुष्यंत की दृष्टि वन में मेनका-विश्वामित्र की पुत्री और कण्व ऋषि के आश्रम में पल रही युवा शकुंतला पर पड़ती है । वे उसके प्रति आकर्षित होते हैं, दोनों के बीच वार्तालाप होता है, निकटता बढ़ती है, जिसकी परिणति शारीरिक संबंध स्थापना में होती है । वे दोनों परस्पर विवाह-संबध में बंध जाते हैं, जिसे कण्व ऋषि की स्वीकृति मिलती है । उसी संबंध से राजा भरत का जन्म होता है । मेरे मत में गांधर्व विवाह वस्तुतः प्रेम विवाह है, जो वर्तमान काल में युवक-युवतियों के बीच लोकप्रिय होता जा रहा है । दरअसल आज के युवाओं को पढ़ाई एवं तत्पश्चात नौकरी-पेशे के समय परस्पर मिलने-जुलने एवं घूमने-फिरने की अधिक स्वतंत्रता मिलने लगी है । माता-पिताओं ने भी वैचारिक खुलापन अपनाना आरंभ कर दिया है । अतः प्रेम-प्रसंग एवं तज्जन्य विवाह सामान्य होते जा रहे हैं ।

राक्षस विवाह को यों परिभाषित किया गया है:

हत्वा छित्वा च भित्वा च क्रोशन्तीं रुदन्तीं गृहात् ।

प्रसह्य कन्याहरणं राक्षसो विधिरुच्यते ॥33॥

(यथा पूर्वोक्त)

(हत्वा छित्वा च भित्वा च प्रसह्य गृहात् क्रोशन्तीम् रुदन्तीम् कन्या-हरणम् राक्षसः विधिः उच्यते ।)

अर्थ – कन्यापक्ष के निकट संबंधियों, मित्रों, सुहृदों आदि को डरा-धमका करके, आहत करके, अथवा उनकी हत्या करके रोती-चीखती-चिल्लाती कन्या घर से जबरन उठाकर ले जाना और विवाह करना राक्षस विधि का विवाह कहलाता है ।

पौराणिक कथाओं में ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे हैं । प्राचीन काल में राजा-महाराजा जब किसी युवती के प्रति आकर्षित होते थे तो उसे विवाह के लिए प्रेरित करते थे; न मानने पर जोर-जबरदस्ती उठा ले जाते थे । आज भी कई युवक एक-तरफा प्रेम में पड़कर इस विधि से युवतियों के साथ दांपत्य-संबंध बना लेते हैं ।

सुप्तां मत्तां प्रमत्तां वा रहो यत्रोपगच्छति ।

सः पापिष्ठो विवाहानां पैशाचश्चाष्टमो९धमः ॥34॥

(यथा पूर्वोक्त)

(यत्र सुप्ताम् मत्ताम् प्रमत्ताम् वा रहः उप-गच्छति सः विवाहानाम् अष्टमः पापिष्ठः अधमः पैशाचः च ।)

अर्थ – जब कोई कन्या सोई हो, भटकी हो, नशे की हालत में हो, अथवा सुरक्षा के प्रति असावधान हो, तब यदि कोई उसके साथ शारीरिक संबंध बनाकर अथवा अन्यथा विवाह कर ले तो उसे निकृष्टतम श्रेणी का ‘पैशाच’ विवाह कहा जाता है ।

पैशाच विवाह को निकृष्ट कोटि का कहा गया है । राक्षस विवाह में कन्यापक्ष के लोगों को डरा-धमकाकर या मार-पीटकर कन्या को विवाह के लिए विवश किया जाता है, किंतु उसके साथ दुष्कर्म से बचा जाता है । लेकिन पैशाच में कन्या के साथ धोखे से शारीरिक संबंध बनाकर उसे मजबूर किया जाता है । दूसरे शब्दों में यह वस्तुतः दुष्कर्म पर आधारित है । आजकल कभी-कभी ऐसे मामले प्रकाश आ जाते हैं, जिसमें दुष्कर्म कर चुका व्यक्ति भुक्तभोगी के साथ विवाह कर लेता है । वह कानून से बचने के लिए अथवा आत्मग्लानि के अधीन ऐसा कर सकता है । – योगेन्द्र जोशी

मनुस्मृति के अनुसार विवाह के आठ प्रकार – ब्राह्म, दैव, आर्ष आदि (2)

अपनी पिछली पोस्ट (14 जनवरी) में मैंने इस बात का उल्लेख किया था कि धार्मिक कर्मकांडों एवं सामाजिक दायित्वों से संबंधित हिंदू ग्रंथ, मनुस्मृति, में आठ प्रकार के विवाहों का जिक्र है: ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस, और पैशाच । इनमें से ब्राह्म तथा दैव के बारे में उक्त पोस्ट में ही संक्षिप्त टिप्पणी की गई थी । यहां अगले तीन प्रकारों, आर्ष, प्राजापत्य एवं आसुर, को परिभाषित किया जा रहा है:

एकं गोमिथुनं द्वे वा वरादादाय धर्मतः ।

कन्याप्रदानं विधिवदार्षो धर्मः सः उच्यते ॥29॥

(मनुस्मृति, अध्याय तीन)

(एकम् गोमिथुनम् द्वे वा वरात् आदाय धर्मतः विधिवत् कन्या-प्रदानम् सः धर्मः आर्षः उच्यते ।)

अर्थ – गाय-बैल के एक जोड़े को अथवा दो गायों या बैलों को धार्मिक कृत्य के लिए वर से स्वीकारते हुए समुचित विधि से किए गए कन्यादान को धर्मयुक्त ‘आर्ष’ विवाह कहा जाता है ।

ब्राह्म तथा दैव विवाह में वर को पूजते हुए आभूषण आदि भेंट किये जाते हैं, किंतु उसके विपरीत आर्ष में कन्यापक्ष वर से भेंट-स्वरूप गाय-बैल ग्रहण करता है । हां, उसका पर्याप्त सम्मान करते हुए कन्या प्रदान की जाती है । यहां कहे गये ‘धार्मिक कृत्य के लिए’ शब्दों का अर्थ स्पष्ट नहीं है, अंदाजा ही लगाया जा सकता है । ‘समुचित विधि’ के अर्थ कदाचित यह होंगे कि परंपराओं के अनुरूप पूजा-पाठ संपन्न करते हुए वर को सम्मानित किया जाए । कदाचित उसे भेंट भी दी जाती हो । प्राचीन काल में भारतीय समाज कृषि पर आधारित था, जिसमें गाय-बैलों की निर्विवाद उपयोगिता होती थी । वर्तमान काल में गाय-बैलों की वैसी उपयोगिता रह नहीं गई है । अतः ठीक-ठीक इस रूप में आर्ष विवाह देखने को नहीं मिल सकता है । वर पक्ष से धन या अन्य वस्तुएं स्वीकारते हुए कन्या अर्पित करने की प्रथा कहीं-कहीं प्रचलित है । उसको आधुनिक आर्ष विवाह कहा जा सकता है ।

प्राजापत्य विवाह के बारे में मनुस्मृति में यह श्लोक उपलब्ध हैः

सहोभौ चरतां धर्ममिति वाचाऽनुभाष्य च ।

कन्याप्रदानमभ्यर्च्य प्राजापत्यो विधि स्मृतः ॥30॥

(यथा पूर्वोक्त)

(सह उभौ धर्मम् चरताम् इति वाचा अनुभाष्य अभि-अर्च्य च कन्या-प्रदानम् प्राजापत्यः विधिः स्मृतः ।)

अर्थ – विवाहोत्सुक स्त्री-पुरुष को वर-कन्या के रूप में स्वीकार कर “तुम दोनों मिलकर साथ-साथ धर्माचरण करो” यह कहते हुए और उनका समुचित रूप से स्वागत-सत्कार करते हुए वर को कन्या प्रदान करना ‘प्राजापत्य’ विवाह कहलाता है ।

आजकल कई युवक-युवतियां स्वयं ही वैवाहिक जीवन हेतु  एक-दूसरे का चुनाव कर लेते हैं, और उस निर्णय को अपने-अपने माता-पिता के समक्ष रखकर उनकी सहमति पाने की हर संभव कोशिश करते हैं । माता-पिता इच्छया अनिच्छया वा विवाह का शेष कार्य परंपरानुरूप संपन्न कर देते हैं, यथासंभव स्वागत-सत्कार एवं उपहार भेंट करते हुए । ऐसे विवाह को आधुनिक काल का  प्राजापत्य विवाह माना जा सकता है ।

ज्ञातिभ्यो द्रविणं दत्त्वा कन्यायै चैव शक्तितः ।

कन्याप्रदानं स्वाच्छन्द्यादासुरो धर्म उच्यते ॥31॥

(यथा पूर्वोक्त)

(ज्ञातिभ्यो कन्यायै च शक्तितः द्रविणम् दत्त्वा एव कन्याप्रदानं स्वाच्छन्द्यात् आसुरः धर्मः उच्यते ।)

अर्थ – कन्यापक्ष के बंधु-बांधवों और स्वयं कन्या को वरपक्ष द्वारा स्वेच्छया एवं अपनी सामर्थ्य के अनुसार धन दिए जाने के बाद किये जाने वाले कन्यादान को धर्मसम्मत ‘आसुर’ विवाह कहा जाता है ।

आसुर विवाह एक अर्थ में दैव विवाह का उल्टा माना जा सकता है । दैव विवाह में परपक्ष को धन-आभूषण दिये जाते हैं, उसके विपरीत आसुर विवाह में वरपक्ष कन्यापक्ष को धन आदि देता है । समाज के कुछ तबकों में कदाचित आज भी ऐसे अल्पप्रचलित विवाह देखने को मिलते हैं । इसे भी धर्मसम्मत विवाह ही समझा जाता है ।

विवाह-प्रकारों की इस चर्चा में अंतिम तीन – गान्धर्व, राक्षस, और पैशाच – की चर्चा आगामी पोस्ट में की जाएगी । – योगेन्द्र जोशी

मनुस्मृति के अनुसार विवाह के आठ प्रकार – ब्राह्म, दैव, आर्ष आदि (1)

‘मनुस्मृति’ हिंदुओं का एक चर्चित  धर्मग्रंथ है । किंतु यह पर्याप्त विवादास्पद भी है, क्योंकि कई हिंदू इसमें लिखी बातों से सहमत नहीं होते, अपितु उनकी आलोचना ही करते हैं । मेरे मत में उसकी सभी बातें अस्वीकार्य ही हों ऐसा नहीं है जैसा कि इस ब्लॉग की पूर्ववर्ती एक पोस्ट से स्पष्ट होता है । उस में बहुत-सी बातों को तत्कालीन सामाजिक मान्यताओं का प्रतिबिंबन कहा जा सकता है । ग्रंथ में मुझे उस समय प्रचलित विवाह विधियों के प्रकार – धर्मवेत्ता ऋषि मनु के अनुसार आठ प्रकार – का विवरण पढ़ने को मिला हैं । उन्हीं को मैं आगे प्रस्तुत कर रहा हूं ।

इस संदंर्भ में मनुस्मृति का पहला श्लोक अधोलिखित है:

ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथाऽऽसुरः ।

गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥21॥

(मनुस्मृति, अध्याय तीन)

(ब्राह्मः दैवः तथा एव आर्षः प्राजापत्यः तथा आसुरः गान्धर्वः राक्षसः च एव अष्टमः च अधमः पैशाचः ।)

अर्थ – विवाह आठ प्रकार के होते हैं जो क्रमशः ये हैं: ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस, और आठवां निकृष्टतम श्रेणी का पैशाच ।)

इनमें से पहला, ब्राह्म, इस तरह परिभाषित किया गया है:

आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतिशीलवते स्वयम् ।

आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्मः प्रकीर्तितः ॥27॥

(यथा पूर्वोक्त)

(स्वयम् आहूय आच्छाद्य च अर्चयित्वा च श्रुतिशीलवते कन्यायाः दानम् धर्मः ब्राह्मः प्रकीर्तितः ।)

अर्थ – वेदों-शास्त्रों का अध्ययन जिसने किया हो ऐसे वर को स्वयमेव आमंत्रित करके, उसे वस्त्र-आभूषण आदि अर्पित करके, और समुचित रूप से पूजते हुए कन्या का सोंपा जााना धर्मयुक्त  ‘ब्राह्म ’विवाह कहलाता है ।

आजकल वेदों-शास्त्रों के अध्येता तो न ढूढ़ा जाता है और न ही कोई मिलता है । कहीं यदि मिले तो अपवाद ही कहा जाएगा । इसलिए सही अर्थों में ब्राह्म विवाह अब कहीं देखने को नहीं मिलता है । अधिकांश मौकों पर आज भी सुशिक्षित वर खोजा जाता है जो बारात लेकर कन्यापक्ष के पास पहुंचता है । वेदमंत्रों के उच्चारण के साथ कन्यादान किया जाता है । उसे वस्त्रादि भी भेंट किये जाते हैं । उक्त विवरण में पूजने का अर्थ उसके स्थानीय परंपराओं के अनुरूप स्वागत-सत्कार से लिया जाना चाहिए । इस प्रकार संपन्न विवाह को ब्राह्म विवाह के निकट माना जा सकता है ।

यज्ञे तु वितते सम्यगृत्विजे कर्म कुर्वते ।

अलङ्कृत्य सुतादानं दैवं धर्मं प्रचक्षते ॥28॥

(यथा पूर्वोक्त)

(यज्ञे तु सम्यक् वितते कर्म कुर्वते ऋत्विजे अलङ्कृत्य सुता-दानम् धर्मं दैवम् प्रचक्षते ।)

अर्थ – यज्ञ-कर्म चल रहा हो तो उसमें वेदमंत्रों के उच्चारण का कार्य कर रहे ऋत्विज को वर रूप में चुनते हुए और उसे आभूषण आदि से सुसज्जित करते हुए कन्या समर्पित करना  ‘दैव’ विवाह कहलाता है ।

प्राचीन काल में यज्ञकर्म आम प्रचलन में थे, जिसमें वेदज्ञ पंडितवृंद भाग लेते थे । यज्ञ करना-करवाना ब्राह्मणों के कर्म होते थे । वैदिक मंत्रों के साथ उसे संपादित करने वाले ऋत्विज कहलाते थे । उस काल में वर के तौर पर वे सुयोग्य समझे जाते होंगे । कन्या की अपेक्षा रखने वाला व्यक्ति ऐसे अवसरों पर वर के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करते होंगे । वर की खोज कर रहे माता-पिता ऐसे वरों को कन्यादान करके अपनी पुत्रियों का विवाह संपन्न करते होंगे । दैव विवाह ब्राह्म विवाह से मिलता-जुलता माना जा सकता है, क्योंकि इसमें भी वेदों-शास्त्रों के अध्येता वर को चुना जाता है । शेष कार्य वैसा ही रहता होगा ।

आर्ष आदि अन्य प्रकार के विवाहों की चर्चा अगली पोस्ट में । – योगेन्द्र जोशी

‘मधु वाता ऋतायते …’ – ऋग्वेद में मधुमय जीवन की प्रार्थना

ऋग्वेद के प्रथम मंडल में कुछ ऋचाएं हैं जिनमें मधु शब्द का वारंवार प्रयोग हुआ है । आम जन मधु शब्द को सामान्यतः शहद के लिए प्रयोग में लेते हैं । किंतु इन ऋचाओं में उसे व्यापक अर्थ में लिया गया है । मधु का अर्थ है जो मिठास लिए हो, जिससे सुखानुभूति हो, जो आनंदप्रद हो, अथवा जो श्रेयस्कर हो । मैं आगे के अनुच्छेदों में ऐसी तीन ऋचाओं का उल्लेख कर रहा हूं । यहां पर व्यक्त मेरे विचार सायणाचार्यकृत भाष्य पर आधारित हैं ।

ये ऋचाएं ऋग्वेद, मंडल 1, सूक्त 90 से क्रमशः ली गयीं हैं ।

मधु वाता ऋतायते मधुं क्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥6॥
(मधु वाताः ऋत-अयते, मधुं क्षरन्ति सिन्धवः, माध्वीः नः सन्तु ओषधीः ।)
भावार्थ – यज्ञकर्म में लगे हुए, अर्थात् यजमान, को वायुदेव मधु प्रदान करते हैं; तरंगमय जलप्रवाह जिनमें होता है उन नदियों से मधु चूता है; संसार में उपलब्ध विविध ओषधियां हमारे लिए मधुमय हों ।

प्रसंग के अनुसार, तथा जैसा आगे की ऋचाओं से स्पष्ट है, यहां कहे गये ‘प्रदान करते हैं’, ‘चूता है’, का अर्थ प्रदान करें की प्रार्थना से लिया जाना चाहिए । यों तो रूढ़ि अर्थ में यज्ञ का अर्थ है प्रज्वलित अग्नि में हविः की आहुति देना, किंतु अधिक व्यापक अर्थ में यज्ञ का अर्थ है सार्थक कर्म से अपने को जोड़ना, उस कर्म में लगना । जैसा ऊपर कहा गया है, मधु के उपयुक्त अर्थ लिए जाने चाहिए ।

मधु नक्तुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः । मधु द्यौरस्तु नः पिता ॥7॥
(मधु नक्तम् उत उषसः, मधु-मत् पार्थिवम् रजः, मधु द्यौः अस्तु नः पिता ।)
भावार्थ – रात्रि हमारे लिए मधुप्रदाता होवे; और उसी प्रकार उषाकाल, अर्थात् सूर्योदय के पहले का दिवसारंभ का समय, भी मधुप्रद हो; पृथ्वी धारण किया गया यह लोक मधुमय हो; जलवृष्टि द्वारा हमारा पालन करने वाला (पिता) द्युलोक (आकाश) माधुर्य लिए होवे ।

मंतव्य कदाचित् यह है कि रात्रि शांतिप्रदा होवे, हमारे दिन का आरंभ प्रसन्नता के साथ होवे, संसार हमारे लिए आनंदप्रद हो, आकाश जल वर्षा द्वारा सुखद भविष्य की आशा जगाए ।

मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमान् अस्तु सूर्यः । माध्वीर्गावो भवन्तु नः ॥8॥
(मधुमान् नः वनस्पतिः, मधुमान् अस्तु सूर्यः, माध्वीः गावः भवन्तु नः ।)
भावार्थ – वनों के स्वामी (अधिष्ठाता देवता) मधुर फल देने वाले हों; आकाश में विचरण करने वाले सूर्य मधुरता प्रदान करें; हमारी गौवें मधुमय दूध देने वाली हों । (वनस्पति माने वनों का पति या पालनकर्ता; सामान्य बोलचाल में वनस्पति पेड़-पौधों आदि के लिए प्रयोग में लिया जाता है ।)

वनों के स्वामी फल दें अर्थात् वनस्पतियां ऐसी हों कि उन पर मीठे फल लगें । सूर्य आकाश में सरण (सरकना) करता है जिससे उसे यह नाम मिला है । वह अपने द्वारा नियंत्रित ऋतुओं के माध्यम से हमें समुचित फल प्रदान करे यह भाव व्यक्त है । गायें सुस्वादु एवं प्रचुर मात्रा में दूध प्रदान करें ।

दैवी शक्तियों को संबोधित ऐसे वैदिक मंत्र क्या वास्तव में प्रभावी हो सकते हैं । मेरे पास कोई उत्तर नहीं है । इतना अवश्य है जैसे हम परस्पर शुभकामनाएं व्यक्त करते हैं उसी प्रकार इन ऋचाओं में सुखद एवं सफल जीवन की कामना या कल्पना का भाव निहित है । इसके अतिरिक्त प्रकृति के विभिन्न घटकों अथवा अंगों के प्रति सम्मान भाव भी इनमें दिखाई देता है । यह भावना आधुनिक समय में अधिक प्रासंगिक हो चला है । – योगेन्द्र जोशी

“न स सखा यो न ददाति सख्ये… ” – ऋग्वेद में दानशीलता की नीतिगत बातें

हिंदुओं के लिए वेदों का सैद्धांतिक महत्त्व आज भी है । सैद्धांतिक शब्द का प्रयोग मैं इसलिए कर रहा हूं कि व्यवहार में अब वेदों का अध्ययन करने वाले प्रायः नहीं के बराबर रह गये हैं, और उनके अनुसार जीवन यापन करने वाला तो शायद ही कोई रह गया होगा । वेद कितने स्वीकार्य हैं, इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता, लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि उनकी कई बातें प्रासंगिक और व्यावहारिक उपयोगिता की हैं । 

पुरातन ऋग्वेद ग्रंथ में मुझे तीन प्रकार की बातें पढ़ने को मिली हैं । एक ओर तो इसमें कर्मकांड और यज्ञयाज्ञादि के अनुष्ठान की वातें हैं, तो दूसरी ओर अध्यात्म और दर्शन के विचार हैं । इनके अतिरिक्त व्यावहारिक जीवन के कर्तव्यों और नीतियों का भी उल्लेख इसमें है । गंथ के मंडल 10 में मुझे दान देने और जरूरतमंदों की मदद करने संबंधी उपदेश पढ़ने को मिले हैं । मैं यहां पर चुनी हुई तीन ऋचाएं (मंत्र) प्रस्तुत कर रहा हूं ।

(ऋग्वेद, मंडल 10, सूक्त 117, ऋचाएं क्रमशः 2, 4, एवं 5)

य आध्राय चकमानाय पित्वो९न्नवान्सन्रफितायोपजग्मुषे । स्थिरं मनः कृणुते सेवते पुरोतो चित्स मर्डितारं न विन्दते ॥ 
(य आध्राय चकमानाय पित्वः अन्नवान् सन् रफिताय उपजग्मुषे स्थिरं मनः कृणुते सेवते पुरा उतो चित् सः मर्डितारं न विन्दते ।) 
जो व्यक्ति अन्नवान् होते हुए निर्धनता से दुर्बल हुए पास आए याचक को अन्नदान नहीं करता, बल्कि मन कठोर रखते हुए उसके समक्ष अन्न का उपभोग अकेले करता है वह स्वयं भी कहीं सुख नहीं पा सकता । 

मेरे मतानुसार इस मंत्र में अन्न का अर्थ जीवनाधार अन्न-संपदाएं यानी भोग्य वस्तुएं होना चाहिए । संपन्न व्यक्ति के मन में भूखे-प्यासे के प्रति कुछ करुणा भाव तो जगना ही चाहिए । ‘कहीं सुख नहीं पा सकता’ के अर्थ पारलौकिक सुख से तो नहीं है ? वैदिक चिंतक इहलोक-परलोक के सतत चलने वाले चक्र में विश्वास करते थे, और मानते थे कि इहलोक के कर्मों पर परलोक निर्भर करता है । 

न स सखा यो न ददाति सख्ये सचाभुवे सचमानाय पित्वः । अपास्मात्प्रेयान्न तदोको अस्ति पृणन्तमन्यमरणं चिदिच्छेत् ॥ 
(न स सखा यः न ददाति सख्ये सचाभुवे सचमानाय पित्वः अप अस्मात् प्रेयात् न तत् ओको अस्ति पृणन्तम् अन्यं अरणं चित् इच्छेत् ।) 
जो व्यक्ति अपने साथ रहने वाले सहायक सहचर सखा को अन्नादि नहीं देता वह सुहृद् कहलाने के योग्य नहीं है । इस व्यक्ति का घर अपने योग्य नहीं है इस विचार के साथ सखा को उस व्यक्ति साथ छोड़कर अन्नादि की याचना करते हुए अन्यत्र अपना आश्रय तलाशना चाहिए ।  

सखा और मित्र शब्दों में भेद है । मोटे तौर पर दोनों समानार्थी मान लिए जाते हैं । मित्र व्यक्ति सदैव पास रहता हो आवश्यक नहीं; यह भावनात्मक अधिक है । इसके विपरीत सखा साथ में रहकर सहचर/परिचर की भूमिका में रहता है; अर्थात् साथ में रहने वाला सखा होता है । 

पृणीयादिन्नाधमानाय तव्यान्द्राघीयांसमनु पश्येत पन्थाम् । ओ हि वर्तन्ते रथ्येव चक्रान्यमन्यमुपतिष्ठन्त रायः ॥ 
(पृणीयात् इत् न अधमानाय तव्यान् द्राघीयांसम् अनुपश्येत पन्थाम् ओ हि वर्तन्ते रथ्या इव चक्रा अन्यम् अन्यम् उपतिष्ठन्त रायः ।) 
धनसंपदाओं से सुसमृद्ध व्यक्ति को चाहिए कि वह याचक की मांग को पूरी करते हुए पुण्यमार्ग का अनुसरण करे । संपदाओं का क्या है, वे तो कहीं भी सदैव के लिए नहीं टिकतीं । जैसे रथ के पहिए के अर (आरा) एक-दूसरे का स्थान लेती हुई अपना स्थान बदलती हैं वैसे ही संपदा भी अपना स्थान बदलती रहती हैं । 

यह मंत्र मनुष्य को धनसंपदा की नश्वरता का ध्यान दिलाती है । मंत्र कहता है कि कल तुम भी निर्धन हो सकते हो या कालांतर में तुम्हारी संपदा का नाश हो सकता है । निश्चय की धन की अनश्वरता संदेहास्पद है । यदि आप इतिहास पर दृष्टि डालें तो पाएंगे कि आज के सुसंपन्न लोगों की पूर्ववर्ती चौथी-पांचवीं पीढ़ियां सामान्य ही रही हैं, और जो लोग तीन-चार पीढ़ी पहले तक संपन्न रहे हैं उनके वंशजों की सुसंपन्नता की बातें नहीं होती हैं । असल में धन की तीन नियतियों का उल्लेख नीतिशास्त्रों में मिलता हैः भोग, दान एवं नाश । मनुष्य एक सीमा से अधिक भोग कर ही नहीं सकता है । ऐसे में उसे धन का एक अंश दान में खर्च करना ही चाहिए । यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो उस धन का अन्य तरीके से नाश ही अंतिम परिणति रह जाती है । अयोग्य उत्तराधिकारियों के हाथ में पहुंचकर उस धन की बरबादी अवश्यंभावी है । 

यह दुर्भाग्य की बात है कि स्वयं को धर्मनिष्ठ कहने वाले भारतीय समाज के लोगों के मन में जरूरतमंदों की आर्थिक मदद का विचार आता ही नहीं है । सीमित भोग के पश्चात् अपने धन को वे ‘और अधिक धन’ बटोरने में निवेश करते हैं । धन बढ़ता जाता है, लेकिन निरंतर बढ़ते हुए उस धन का उपभोग होगा कैसे यह प्रश्न उनके लिए महत्त्व नहीं रखता है । - योगेन्द्र जोशी

संस्कृत छंदों के उल्लेख करने में त्रुटियां – एक दृष्टांत: “मंगलम् भगवान …”

हिंदू परिवारों के धार्मिक कर्मकांडों के निमंत्रणपत्रों पर अक्सर देव-वंदना के छंद मुद्रित देखने को मिलते हैं । कम से कम उत्तर भारतीयों में तो यह परंपरा प्रचलित है ही । चूंकि शुभकार्यों का आरंभ गणेश-पूजन से होता है, अतः गणेश-वंदना के छंदों का प्रयोग सर्वाधिक मिलता है । कतिपय छंदों के उल्लेख के साथ इस विषय की चर्चा मैंने अपने हाल के ब्लाग-प्रविष्टियों (क्लिक करें) में की है । मुझे मिलने वाले निमंत्रणपत्रों पर यदाकदा विष्णु-वंदना के श्लोक भी पढ़ने को मिलते हैं । एक श्लोक, जिसका उल्लेख संभवतः सर्वाधिक किया जाता है, को इस लेख के आंरभ में चित्र में दिया गया है, जिसे मैंने किसी निमंत्रणपत्र से ही स्कैन किया है । मैं इसको दुबारा सामान्य पाठ के रूप में यथावत् (प्रस्तुत चित्र में जैसा है) आगे लिख रहा हूं:

मंगलम् भगवान विष्णुः, मंगलम् गरूणध्वजः ।

मंगलम् पुण्डरी काक्षः, मंगलाय तनो हरिः ॥

इस स्थल पर मेरा मुख्य उद्येश्य इस छंद की व्याख्या करना अथवा इसकी उपयोगिता/अर्थवत्ता स्पष्ट करना नहीं है । मैं यह बताना चाहता हूं कि कई बार लोग संस्कृत मंत्रों/छंदों का दोषपूर्ण पाठ लिखते हैं और वैसा ही दोषपूर्ण उच्चारण करते हैं । आगे कुछ कहूं इसके पहले इस श्लोक को लिखने में कौन-कौन-सी त्रुटियां मेरी दृष्टि में आई हैं उन्हें बता दूं । एक त्रुटि तो यह है कि गरुण शब्द के बदले गरुड होना चाहिए । इसे मैं टाइप करने में गलती मान लेता हूं । इसके अतिरिक्त मैं दो प्रकार की त्रुटियां देखता हूं: पहले वे जो गंभीर हैं और अर्थ का अनर्थ कर सकती हैं, या श्लोक को निरर्थक बना देती हैं । दूसरे वे जो संस्कृत के छंदों को लिपिबद्ध करने के नियमों अथवा परंपराओं के अनुसार नहीं हैं ।

पहले प्रकार के दोष स्पष्ट कर दूं । उक्त श्लोक के तीसरे चरण में ‘पुण्डरी काक्षः’ लिख गया है । ऐसा लगता है कि मानो ‘पुण्डरी’ एवं ‘काक्षः’ दो शब्द हैं । क्या अर्थ हैं इन शब्दों के ? सही शब्द (वस्तुतः पदबंध) ‘पुण्डरीकाक्षः’ है, जो दरअसल दो शब्दों के संयोग और संधि (दीर्घसंधि) से बना है:

पुण्डरीकाक्षः = पुण्डरीक+अक्षः

‘पुण्डरीक’ का अर्थ है ‘श्वेत कमल’ और अक्ष का अर्थ है इंद्रिय; यह बहुधा नेत्र के अर्थ में प्रयुक्त होता है । बहुब्रीहि समास के अंतर्गत रचे गये इस संयुक्त शब्द का अर्थ है ‘श्वेत कमल के समान नेत्र वाला’ । संस्कृत साहित्य में उपमा देने के अपने तरीके हैं । कमलनयन या कमलनेत्र जैसे शब्दों का प्रयोग सौंदर्य-वर्णन में आम रहा है । वही यहां पर किया गया है । लेकिन अगर आप ‘पुण्डरी काक्षः’ लिखते हैं, तो ये शब्द अर्थहीन हो जाते हैं ।

दूसरा दोष है ‘मंगलाय तनो’ में । यह शब्द भी वस्तुतः एक सामासिक संयुक्त पदबंध है । वस्तुतः यह ‘मंगलायतनः’ है जिसका ‘नः’ संधि के नियमों के तहत श्लोक में आगे ‘हरिः’ शब्द की मौजूदगी के कारण ‘नो’ लिखा जाता है । अतः ‘नो’ लिखा जाना तो सही है, किंतु इसे दो हिस्सों में तोड़ कर नहीं लिखा जा सकता है । कहने का अर्थ यह है कि ‘मंगलायतनो’ के स्थान पर ‘मंगलाय’ + ‘तनो’ लिखने पर उसका वांछित अर्थ समाप्त हो जाता है । अगर इसे टुकड़ों में लिखा ही जाना हो (जिसकी श्लोक-लेखन में अनुमति नहीं) तब इसे ‘मंगल आयतनो’ लिखा जा सकता था । वास्तव में

मंगलायतनः = मंगल+आयतनः

मंगल का अर्थ है शुभ फल और आयतन का अर्थ है आश्रय, शरणस्थली अथवा रहने का स्थान, आदि । अतः ‘मंगलायतनः’ का तात्पर्य है शुभ फलों का घर, भंडार या प्राप्तिस्थल

अब मैं उक्त श्लोक में विद्यमान उन त्रुटियों की ओर इशारा करता हूं जो श्लोक के अर्थ को प्रभावित तो नहीं करते, परंतु संस्कृत छंदों के लेखन में प्रचलित नियमों के अनुरूप नहीं हैं । संस्कृत के ज्ञाता इस प्रकार की त्रुटियों से बचने का प्रयास अवश्य करते होंगे । मेरी नजर में आई त्रुटियां ये हैं:

1. श्लोक में सर्वत्र ‘मंगल’ के स्थान पर ‘मङ्गल’ लिखा जाना चाहिए । संस्कृत में किसी शब्द के अंतर्गत वर्णमाला के कवर्ग से पवर्ग तक के वर्णों (अर्थात् ‘क’ से ‘म’ तक के वर्ण) के पूर्व अनुस्वार नहीं लिखा जाता है, बल्कि उसके स्थान पर संबंधित वर्ग का पांचवां वर्ण लिखा जाता है, जैसे कङ्कण (कड़ा या चूड़ी), कञ्चन (स्वर्ण), कण्टक (कांटा), कन्दर (गुफा), कम्पन (कांपना), आदि । शब्दों के अंतर्गत अनुस्वार का प्रयोग य से ह तक के वर्णों के पूर्व किया जाता है, यथा कंस, दंश, संयम, आदि ।

2. यद्यपि ‘मङ्गलम्’ स्वयं में सही है और गद्य में इसे लिखा भी जाता है, किंतु संस्कृत व्याकरण के संधि के नियमों के अनुसार उक्त श्लोक में इसे ‘मङ्गलं’ लिखा जाना चाहिए । नियम यह है कि यदि छंदों के किसी पद के अंत में ‘म्’ हो और उसके पश्चात् व्यंजन से आरंभ होने वाला पद हो तो ‘म्’ को अनुस्वार लिख जाना चाहिए । और यदि इसके पश्चात् स्वर वर्ण हो तो ‘म्’ ही लिखा जाना चाहिए । ध्यान दें कि उक्त श्लोक में ‘म्’ के आगे तीनों स्थलों पर क्रमशः ‘भ’, ‘ग’, एवं ‘पु’ (व्यंजन) विद्यमान हैं ।

3. संस्कृत में ‘भगवान्’ (हलंत ‘न’) शब्द है न कि ‘भगवान’ । यह संज्ञाशब्द ‘भगवत्’ का प्रथमा विभक्ति (कर्ता कारक, nominative case) का एकबचन में विभक्ति रूप है । अतः श्लोक में यही लिखा होना चाहिए ।

4. अंत में यह भी बताना भी आवश्यक है कि संस्कृत में विरामचिह्न कॉमा के प्रयोग की परंपरा नहीं है । अब कुछ लोग उसका प्रयोग करने लगे हैं । स्पष्टता के लिए गद्य-लेखन में इसका प्रयोग अब होने लगा है । लेकिन प्राचीन रचनाओं की मौलिकता को यथासंभव बनाए रखा जाना चाहिए । तदनुसार उक्त श्लोक में इसका प्रयोग न करना समीचीन होगा ।

ये चार त्रुटियां गंभीर नहीं हैं, किंतु छंद की शुद्धता के लिए इनसे बचा जाना चाहिए । किंतु पहले जिन त्रुटियों की बात की है, वे निःसंदेह गंभीर एवं अक्षम्य हैं । इन बातों को ध्यान में रखते हुए श्लोक यों लिखा जाना चाहिए:

मङ्गलं भगवान् विष्णुः मङ्गलं गरूडध्वजः ।

मङ्गलं पुण्डरीकाक्षः मंगलायतनो हरिः ॥

(भगवान् विष्णु मंगल हैं, गरुड़ वाहन वाले मंगल हैं, कमल के समान नेत्र वाले मंगल हैं, हरि मंगल के भंडार हैं । मंगल अर्थात् जो मंगलमय हैं, शुभ हैं, कल्याणप्रद हैं,  जैसे समझ लें ।)

अपनी बात समाप्त करने से पहले एक टिप्पणी करनी है । लोगों का संस्कृत-ज्ञान आम तौर पर शून्य या कम रहता है । ज्ञान न होना कोई अनुचित बात नहीं है । किंतु जब किसी अवसर पर संस्कृत का प्रयोग किया जा रहा हो तो इतना जानने की उत्कंठा तो होनी ही चाहिए कि लिखित पाठ का अर्थ क्या है और वह शुद्ध लिखा जा रहा है कि नहीं । मुझे लगता है कि लोग इस मामले में लापरवाह होते हैं । अधिक चिंताजनक पक्ष यह है कि पुरोहितगण भी इन बातों पर गौर नहीं करते है । मुझे तो इस बात की शंका रहती है कि उन लोगों को संस्कृत का समुचित ज्ञान होता भी है कि नहीं । बहुत संभव है कि उनमें से अधिकतर रट-रटाकर और स्थापित पुरोहितों की नकल करके इस कार्य में जुटते हैं । अवश्य ही सही सीखने में मेहनत तथा वक्त लगते हैं, कोई सीखा-सिखासा पैदा नहीं होता है । फिर भी उस दिशा में आगे बढ़ने का विचार तो मन में उठना ही चाहिए । – योगेन्द्र जोशी

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