“वसुधैव कुटुम्बकम् …” – पंचतंत्र ग्रंथ में मूर्ख पंडितों की कथा

अपने भारत देश की सभ्यता-संस्कृति की प्रशंसा में अनेक जनों को तरह-तरह के नीति-वाक्यों के दृष्टांतों के साथ बोलते हुए मैंने सुना हैं। “वसुधैव कुटुम्बकम्”, “परोपकाराय सतां विभूतयः”, “अतिथिदेवो भव”, “सत्यमेव जयते” इत्यादि नीति-वाक्यों का उल्लेख करते हुए वे देखे जा सकते हैं। इन कथनों के माध्यम से वे यह जताने की कोशिश करते हैं कि हमारे समाज की मान्यताएं तो सर्वश्रेष्ठ रही हैं। इस संदर्भ में मैं अपने वर्तमान गृह मंत्री को शीर्ष पर रखता हूं। वे हर मौके पर ऐसी उक्तियों से भारतीय समाज की प्रशंसा करते हैं।

इन नीति वचनों को कहने वाले उन प्रसंगों को नजरअंदाज करते हैं जो प्राचीन संस्कृत साहित्य में इनसे संबंधित रहे हैं। उदाहरणार्थ “सत्यमेव जयते” (शुद्ध ‘जयति’ है) को ही ले लीजिए। इस पर मैंने एक आलेख बहुत पहले लिखा था (देखें मेरी ब्लॉग-पोस्ट 4/10/2008)। यह उक्ति मुण्डक उपनिषद्‍ के एक मंत्र का वाक्यांश है। मंत्र में यह संदेश है कि मोक्ष (वैदिक मान्यतानुसार परमात्मतत्त्व में एकाकार हो जाना) का पात्र वही ज्ञानी हो सकता है जो सत्य के मार्ग पर चलता है। इस व्यवहारिक संसार से इस मंत्र का कोई संबंध नहीं है। संसार में तो सत्य-असत्य दोनों ही साथ-साथ चलते हैं। लेकिन आम धारणा है कि संसार में सत्य की विजय होती है।

इसी प्रकार “वसुधैव कुटुम्बकम्” श्रीविष्णुशर्मा-रचित “पञ्चचतन्त्रम्” की एक कथा से संबंधित है। इस कथन से यह निष्कर्ष निकालना भूल होगी कि भारतीय समाज में ऐसी कोई भावना व्याप्त रही थी और है। यह कथन एक विशेष अवसर पर किसी व्यक्ति के अपने मित्रों को बोले गये उद्गार का एक अंश है।

“वसुधैव कुटुम्बकम्” उक्ति के मूल को समझने के लिए उस कथा का उल्लेख करना समीचीन होगा जो पंचतंत्र में वर्णित है। संक्षेप में वह कथा इस प्रकार है:

एक ग्राम में परस्पर मित्र चार युवा रहते थे। उनकी मित्रता बहुत गहरी थी और वे यथासंभव एक-दूसरे के साथ बने रहते थे। उनमें से एक बुद्धिमान था किन्तु संयोग से अन्य तीन की भांति विद्याध्ययन नहीं कर सका। अन्य तीनों ने विभिन्न कलाओं में दक्षता अर्जित कर ली। किन्तु अपने ज्ञान का उपयोग कब एवं किस प्रयोजन के लिए यह समझने की सहज बुद्धि उनमें नहीं थी।

एक बार उन मित्रों के मन में विचार आया कि अर्जित विद्या का उपयोग तो गांव में हो नहीं सकता, इसलिए क्यों न देश-परदेश जाकर उसके माध्यम से धनोपार्जन किया जाए। चूंकि चौथे मित्र ने विद्या अर्जित नहीं की थी इसलिए उनमें से एक बोला, “हम तीन चलते हैं; इस विद्याहीन को साथ ले जाना बेकार है। हम धन कमाएं और उसका एक हिस्सा इसे भी दें यह ठीक नहीं होगा।”

दूसरे ने सहमति जताते हुए चौथे से कहा, “मित्र, तुम विद्याबल से धन कमा नहीं सकते इसलिए तुम साथ मत चलो और यहीं रहो।”

तीसरा उदार विचारों वाला था। उसने कहा, “हम चारों बाल्यावस्था से घनिष्ठ मित्र रहे हैं। संयोग से यह विद्याध्ययन नहीं कर सका तो इसका अर्थ यह नहीं कि हम इसे छोड़ दें। धन-संपदा की सार्थक उपयोगिता इसी में है कि उसका उपभोग औरों के साथ मिल-बांटकर किया जाये। अतः हमारा यह मित्र भी साथ चलेगा।”

पंचतंत्र के रचयिता ने उदारता की उक्त नीति को इस तीसरे मित्र के मुख से इस प्रकार से कहलवाया है:

किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला ।

या न वैश्येव सामान्या पथिकैरुपभुज्यते ॥३६॥

(पञ्चतन्त्रम्, चतुर्थ तंत्र “लब्धप्रणाशम्)

(किम्‍ तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूः इव केवला, या न वैश्या इव सामान्या पथिकैः उपभुज्यते ।)

अर्थ – उस लक्ष्मी (धन) का क्या करना जो केवल (घर की) वधू की तरह हो, जो वैश्या की तरह आम यात्रियों के लिए उपभोग्य न हो।

यहां लक्ष्मी से तात्पर्य है धन से न कि विष्णुपत्नी देवी लक्ष्मी से। धन की उपयोगिता दो प्रकार से हो सकती है: प्रथम है कि वह केवल अपने मालिक के ही सुखभोग के काम आवे। द्वितीय है कि वह दूसरों के हित साधने में प्रयोग में लिया जाये। अर्थात्‍ व्यक्ति उसे या तो केवल अपने स्वार्थ पूरा करने में प्रयोग में ले अथवा उसे परमार्थ के कार्य में भी लगावे। इन दो संभावनों की उपमा कथाकार ने वधू (जो किसी एक की पत्नी भर होती है) एवं वैश्या (जो हर किसीको उपलब्ध होती है) से की है।

औदार्य की इस भावना के बारे में कथाकार अपने पात्र से यह कहलवाता है:

अयं निजः परो वैति गणना लघुचेतसाम् ।

उदारचरितानान्तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥

(पञ्चतन्त्रम्‍, चतुर्थ तंत्र “लब्धप्रणाशम्‍)

(अयम् निजः परः वा इति गणना लघु-चेतसाम् उदार-चरितानाम् तु वसुधा एव कुटुम्बकम् ।)

अर्थ – यह अपना है या पराया है ऐसा आकलन छोटे दिल वालों का होता है। उदार चरित्र वालों के लिए तो पूरी पृथ्वी ही उनका कुटुम्ब होती है।

आम तौर पर कुटुम्ब (कुटुम्बक) का अर्थ परिवार से लिया जाता है, जिसमें पति-पत्नी एवं संतानें और कदाचित् बुजुर्ग माता-पिता। मनुष्य इन्हीं के लिए धन-संपदा अर्जित करता है। कुछ विशेष अवसरों पर वह निकट संबंधियों और मित्रों पर भी धन का एक अंश खर्च कर लेता है। किंतु अधिक व्यापक स्तर पर समाज के सभी सदस्यों के हितों के लिए धन खर्च करने का विचार केवल विरले लोगों में देखने को मिल सकता है।

इस श्लोक का निहितार्थ यह है: अमुक तो अपना व्यक्ति है इसलिए उसकी सहायता करनी चाहिए यह धारणा संकीर्ण मानसिकता वालों की होती है। उदात्त वृत्ति वाले तो समाज के सभी सदस्यों के प्रति परोपकार भावना रखते हैं और सामर्थ्य होने पर सभी की मदद करते हैं।

ध्यान दें कि कथा में एक उदार मित्र अपने दो अपेक्षया अनुदार मित्रों के प्रति “वसुधैव कुटुम्बकम्” की बात कहता है। यह कथन किसी लेखक ने यह बताने के लिए नहीं कहा है कि भारतीय समाज में उदात्त वृत्ति व्यापक रही है। कथा में जो कहा है उसे कथा तक ही सीमित रखा जाना चाहिए। उससे यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि भारतीय समाज उदार रहा है।

अंत में कथा का शेष भाग भी संक्षेप में बता दूं: वे चारों मित्र परदेश के लिए चल पड़े। रास्ते में एक स्थान पर उन्हें हड्डियों का ढेर दिखा। उन मित्रों में से एक ने कहा, “अहो, लगता है किसी जीवधारी की मृत्यु यहां हुई। क्यों न उस बेचारे को हम अपनी विद्या के बल पर पुनः जीवन दे दें।”´

ऐसा कहते हुए उसने हड्डियां जोड़कर मृत जीव का अस्थिपंजर खड़ा कर दिया। उसके बाद दूसरे ने त्वचा-मांस आदि प्रदान करके उस जीव का पूरा शरीर तैयार कर दिया। तत्पश्चात्‍ तीसरे ने उसमें प्राणसंचार करने का विचार किया। तब चौथा उन तीन जनों से बोला, “अरे-अरे, ऐसा मत करो। यह तो शेर का शरीर है। इसमें प्राण-संचार हो गया तो जीवित होकर हम सबको मार डालेगा।”

मित्रों ने उसकी बात मानने से इंकार कर दिया। बात मानने से उनकी विद्या का अपमान जो हो जाता। तब उस चौथे मित्र ने कहा, “तनिक ठहरो, मैं पास के पेड़ पर चढ़ता हूं, उसके बाद प्राणसंचार करना।”

उसके पेड़ पर चढ़ने के बाद उन विद्याधारियों की मूर्खता से शेर जीवित हो गया। वे तीनों शेर द्वारा मारे गये और चौथा विद्याहीन किंतु बुद्धिमान बच गया। – योगेन्द्र जोशी

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“ज्ञानविहीनः सर्वमतेन मुक्तिं न भजति” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् – ६

इस चिट्ठे के छ: आलेखों की शृंखला की यह मेरी छ्ठी एवं अंतिम प्रविष्टि है। ध्यान रहे कि इन आलेखों में आदिशंकराचार्य द्वारा विरचित “चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्” के १८ छंदों की चर्चा की जा रही है। (देखें इसका पूर्ववर्ती आलेख, दिनांक २३ मार्च, २०१७)

पहले आलेख में इस बात का उल्लेख किया गया था कि इस रचना में कुल सत्रह छंद हैं और उनके अतिरिक्त एक स्थायी छंद (भज गोविन्दं भज गोविन्दं …) भी है जो इनमें से प्रत्येक छंद के बाद प्रयुक्त हुआ है। यदि उक्त स्तोत्र को भजन के तौर पर गाया जाये तो यह छंद प्रत्येक के बाद गाया जायेगा। इसकी भूमिका गायन के स्थायी के समान है। इसे आगे उद्धृत किया जा रहा है:

[

भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ्‍ करणे ॥

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब तुम्हारा मरणकाल पास आ जायेगा तब यह “डुकृञ् करणे” की रट तुम्हें नहीं बचाएगी। “डुकृञ्” संस्कृत व्याकरण की एक क्रियाधातु है जिसका अर्थ “(कार्य/कर्तव्य) करना” है। इस क्रियाधातु का व्यवहार में प्रयोग सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। अर्थात् इस पर बहुत दिमाग खपाना कुछ हद तक निरर्थक है। व्याकरण के अध्येता उक्त क्रियाधातु के अर्थ एवं प्रयोजन को याद रखने के लिए “डुकृञ् करणे” रटते होंगे जिसका तात्पर्य है “डुकृञ्” क्रिया “करण” (कार्य करना) के प्रयोजन में लिया जाता है । स्तोत्र के रचनाकार की दृष्टि में जीवन के अंतकाल तक सांसारिक कार्यों में ही निरंतर लिप्त रहना फलदायक नहीं है यह भाव “डुकृञ् करणे” के रटने में प्रतिबिंबित होता है।  “अब तो इस रट को छोड़ो और ईश्वर-प्रार्थना में संलग्न होओ।”

]

चिट्ठे की मौजूदा प्रविष्टि में चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् के अंतिम तीन छंद क्रमशः १५, १६, एवं १७ प्रस्तुत किये जा रहे हैं । इनमें पहला छंद है:

सुखतः क्रियते रामाभोगः पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः ।

यद्यपि लोके मरणं शरणं तदपि न मुञ्चति पापाचरणम् ॥१५॥ भज …

(रामा-भोगः सुखतः क्रियते, हन्त पश्चात् शरीरे रोगः, यद्यपि लोके मरणं शरणं, तत्-अपि पाप-आचरणम् न मुञ्चति।)

अर्थ – मनुष्य (पुरुष) स्त्री-संसर्ग का सुखभोग करता है, अफ़सोस कि बाद में शरीर रोगग्रस्त होता है। यद्यपि संसार में जीवन की अंतिम परिणति मृत्यु है, फिर भी मनुष्य पापकर्मों से अपने को मुक्त नहीं करता।

सांसारिक जीवन में स्त्री-पुरुष संबधों का सदा से महत्व रहा है और दोनों पक्ष (स्त्री एवं पुरुष) तत्संबंधित सुख पाने की लालसा करते हैं। मैं समझ नहीं पाया कि क्या श्रीशंकराचार्य दोनों के संसर्ग को रोग का कारण मानते हैं? या वे यह कहना चाहते हैं कि यौनसुख का समय भी उम्र के साथ समाप्त हो जाता है और रोगग्रस्तता का काल आ जाता है, क्योंकि रोगों का होना शरीर के अनेक दोषों में से एक है । हरएक को मृत्यु पूर्व भातिं-भांति की अवस्थाओं से गुजरना होता है। अस्तु, प्राणिमात्र को अंततः मृत्यु की शरण में ही जाना होता है। उसके बाद का उसका जीवन उसके पूर्व कर्मों पर निर्भर करता है। वे प्रश्न उठाते हैं कि इस तथ्य को जानने पर भी मनुष्य क्यों नहीं सत्कर्मों में लगता है?

एक बात जो मुझे विश्व में प्रचलित प्रायः सभी धर्मग्रंथों, नीति-पुस्तकों आदि में देखने को मिली है वह है कि उनमें प्रस्तुत प्रायः सभी बातें पुरुषों को केन्द्र में रखकर कही गई हैं। जैसे उपर्युक्त श्लोक में कहा गया कि पुरुष स्त्री-संसर्ग के सुख भोगता है। यह नहीं कहा गया है कि स्त्री पुरुष-संसर्ग का सुख भोगती है। धर्मग्रन्थों में – जितना मैं जान पाया – धर्मों की बातें प्रमुखतया पुरुषों के प्रति कही गयी हैं। सभी धर्म किसी पुरुष या किन्ही पुरुषों के वचनों पर आधारित रहे हैं। वस्तुतः स्त्रियों को शायद ही कहीं महत्व दिया गया है । सभी पैगंबर, तीर्थंकर, बौद्धधर्म-प्रवर्तक, वैदिक ऋषि, ईश्वरीय अवतार, आदि पुरुष ही रहे हैं। उक्त छंद में भी ऐसा ही है। सोचिए ऐसा क्यों है?

रथ्याकर्पटविरचितकन्थः पुण्यापुण्यविवर्जितपन्थः ।

नाहं न त्वं नायं लोकस्तदपि किमर्थं क्रियते शोकः ॥१६॥ भज …

(रथ्या-कर्पट-विरचित-कन्थः, पुण्य-अपुण्य-विवर्जित-पन्थः, न अहम् न त्वम् न अयम्, लोकः तत्-अपि किम्-अर्थंम् क्रियते शोकः)

अर्थ – रास्ते में पड़े चिथड़ों से बनी झोली या गुदड़ी काम चला लिया, पुण्य-अपुण्य से परे विशेष जीवन-मार्ग अपना लिया, न मैं हूं, न तुम हो, न ही यह संसार है यह जान लिया, तब भी किस बात शोक किया जाये।

उपर्युक्त कथन उस व्यक्ति के संदर्भ में संन्यास के मार्ग पर चल निकला हो। ऐसा व्यक्ति मार्ग में यानी आम जन से जो कुछ भी पा जाए उसी से काम चलाता है। चिथड़ों से बनी झोली या गुदड़ी से आशय इसी संसाधनविहीन जीवन को अविचलित भाव के साथ जीने से लिया जा सकता है।

पुण्यापुण्यविवर्जितपंथ” का अर्थ मेरी समझ में “पुण्यमय एवं अपुण्य से रहित मार्ग अपनाया हो जिसने” ऐसा होना चाहिए। अपेक्षा की जाती है कि संन्यासी पापमार्ग से बचा रहे। उसे जीवन की नश्वरता का ज्ञान जब हो जाता है तब उसे किसी प्रकार की हानि का भय नहीं रह जाता है।

कुरुते गङ्गासागरगमनं व्रतपरिपालनमथवा दानम्।

ज्ञानविहीनः सर्वमतेन मुक्तिं न भजति जन्मशतेन ॥१७॥ भज …

(गङ्गा-सागर-गमनम्, व्रत-परि-पालनम्, अथवा दानम् कुरुते, ज्ञान-विहीनः सर्व-मतेन जन्म-शतेन मुक्तिम् न भजति ।)

अर्थ – गंगासागर पर तीर्थस्नान कर आवे, व्रत-उपवास करे अथवा दानादि सत्कर्म करे तो भी इन सभी साधनों/प्रयासों से ज्ञानहीन मनुष्य मुक्ति नहीं पाता है।

श्रीशंकराचार्य ज्ञानयोग के समर्थक थे। ज्ञान का तात्पर्य है अध्यात्मज्ञान। उनके अनुसार परमात्मा में विलीन होना यानी मोक्ष तभी मिलता है जब व्यक्ति को परामात्म तत्व का ज्ञान हो जाता है। उनके मतानुसार अन्य सभी पुण्यकर्म ज्ञानप्राप्ति में सहायक होते हैं, किंतु ज्ञान सर्वोपरि है। ज्ञान के अभाव में तीर्थ, व्रत, दान आदि के प्रयास स्वयं में फलदायक नहीं हो पाते हैं।

ये सब बातें उस जमाने की हैं जब संन्यास आश्रम जीवन के सभी बंधनों/आकर्षणों से मुक्ति के प्रयास की अवस्था हुआ करती थी। आज के युग में संन्यास जैसी चीज शायद ही कहीं हो। इस युग में संन्यास का अर्थ है गेरुआ वस्त्र धारण करके दूसरों की कमाई से सुखभोग प्राप्त करना। – योगेन्द्र जोशी

“पृच्छति को॓ऽपि न गेहे” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् – २

इस चिट्ठे की पिछली प्रविष्टि (दिनांक १५ दिसंबर, २०१६) में मैंने आदिशंकराचार्य द्वारा विरचित “चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्” की चर्चा की थी। आलेख में इस बात का उल्लेख किया था कि इस रचना में कुल सत्रह छंद हैं और उनके अतिरिक्त एक स्थायी छंद (भज गोविन्दं भज गोविन्दं …) भी है जो इनमें से प्रत्येक छंद के बाद प्रयुक्त हुआ है। यदि उक्त स्तोत्र को भजन के तौर पर गाया जाये तो यह छंद प्रत्येक के बाद गाया जायेगा। इसकी भूमिका गायन के स्थायी के समान है।

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भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ् करणे ॥

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब तुम्हारा मरणकाल पास आ जायेगा तब यह “डुकृञ् करणे” की रट तुम्हें नहीं बचाएगी। “डुकृञ्” संस्कृत व्याकरण की एक क्रियाधातु है जिसका अर्थ “(कर्वव्य) करना” है। इस क्रियाधातु का व्यवहार में प्रयोग सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। अर्थात् इस पर बहुत दिमाग खपाना कुछ हद तक निरर्थक है। व्याकरण के अध्येता उक्त क्रियाधातु के अर्थ एवं प्रयोजन को याद रखने के लिए “डुकृञ् करणे” रटते होंगे जिसका तात्पर्य है “डुकृञ्” क्रिया “करण” (कार्य करना) के प्रयोजन में ली जाती है । स्तोत्र के रचनाकार की दृष्टि में जीवन के अंतकाल तक सांसारिक कार्यों में ही निरंतर लिप्त रहना फलदायक नहीं है यह भाव “डुकृञ् करणे” के रटने में प्रतिबिंबित होता है।  “अब तो इस रट को छोड़ो और ईश्वर-प्रार्थना में संलग्न होओ।”

]

इस स्थल पर मैं चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्‍ के तीन छंद (क्रमिकता में ३, ४, एवं ५) प्रस्तुत कर रहा हूं। पहला है

यावद्वित्तोपार्जनसक्तस्तावन्निजपरिवारो रक्तः ।

पश्चाद्धावति जर्जरदेहे वार्तां पृच्छति को॓ऽपि न गेहे॥३॥ (भज …)

(यावद् वित्त-उप-अर्जन-सक्त: तावत् निज-परिवार: रक्तः पश्चात् धावति जर्जर-देहे वार्ताम् पृच्छति क: अपि न गेहे |)

अर्थ – जब तक धन-संपत्ति अर्जित करने में समर्थ हो तब तक उसका परिवार उसमें अनुरक्ति रखता है। बाद में वह जर्जर हो चुके शरीर के साथ इधर-उधर भटकता है और घर में उससे हालचाल भी नहीं पूछता।

मनुष्य वृद्धावस्था में प्रवेश करने पर धन-धान्य अर्जित करने की सामर्थ्य  खो बैठता है। वास्तव में जब यह स्थिति आती है तभी उसे वृद्ध कहना चाहिए, महज उम्र के आधार पर नहीं। उसके इस अवस्था में पहुंचने पर परिवार के लोगों का उसके प्रति लगाव समाप्तप्राय हो जाता है। उसे एक बोझ के तौर पर देखा जाता है। हो सकता है कि प्राचीन काल में ऐसा होता रहा होगा, क्योंकि तब सुविधाएं नहीं थीं। किंतु आज के युग में विविध प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध हैं और कई परिवारों में उनका विशेष ख्याल रखा जाता है।  फिर भी कुछ परिवारों में ऐसा नहीं होता और बूढ़े जनों को तिरस्कार भुगतना पड़ता है। अगला छंद –

जटिलो मुण्डी लुञ्चितकेशः काषायांबरबहुकृतवेषः ।

पश्यन्नपि च न पश्यति लोको ह्युदरनिमित्तं बहुकृतशोक: ॥४॥ (भज …)

(जटिल: मुण्डी लुञ्चित-केशः काषाय-अंबर-बहु-कृत-वेषः पश्यन् अपि च न पश्यति लोक: हि उदर-निमित्तं बहु-कृत-शोक: ।)

अर्थ – पेट के खातिर चिन्ता से ग्रस्त व्यक्ति सिर पर जटाएं धारण कर के या सिर मुढ़ा के, गेरुआ वस्त्र धारण कर के, अथवा तरह-तरह के वेष धारण करके कई उपक्रम करता है।

यह श्लोक यह बताता है कि मनुष्य की पहली चिंता होती है शरीर धारण करने के उपाय करना। आज के युग में आपको अनेक तथाकथित साधु-संत, बाबा-महात्मा मिल जायेंगे जो तमाम तरह की लच्छेदार बातें करके, असामान्य वेषभूषा धारण करके, स्वयं को आध्यात्मिक गुरु घोषित करके या इसी प्रकार के अन्य उपक्रम करके आम जनों को प्रभावित करने में सफल होते है और स्वयं चैन से जीवन-यापन करते हैं। यह श्लोक कदाचित् इस वर्ग के लोगों पर एक टिप्पणी है। याद रहे यह सब भारत के हिन्दू समाज के संदर्भ में ही सही है। अन्य समाजों में इस प्रकार के प्रयास शायद नहीं किए जाते हैं। धर्म के नाम पर हिन्दू समाज को सरलता से मूर्ख बनाया जा सकता है ऐसा मेरा सोचना है।

भगवद्गीता किञ्चिदधीता गङ्गाजललवकणिका पीता ।

सकृदपि यस्य मुरारिसमर्चा तस्य यमः किं कुरुते चर्चाम्‍ ॥५॥ (भज …)

(भगवद्गी ताकिञ्चित्‍ अधीता गङ्गा-जल-लव-कणिका पीता सकृत्‍ अपि यस्य मुरारि-सम्‍-अर्चा तस्य यमः किम्‍ कुरुते चर्चाम्‍ ।)

अर्थे – जिस व्यक्ति ने भगवद्गीता का कुछ भी अध्ययन किया हो, गंगाजल का एक कण या बूंद भी पिया हो, भगवान् श्रीकृष्ण “मुरारि” की कुछ भी आराधना-अर्चना की हो, उसकी यम भी क्या चर्चा करेंगे?

जिस व्यक्ति ने धर्मकर्म में मन लगाया हो और ईश्वर-भक्ति में समय-यापन किया हो उसको मरणकाल पर कष्ट देने की यमराज भी नहीं सोचते होंगे मेरे मत में ऐसा इस छंद का निहितार्थ होगा। छंद में भगवद्गीता-अध्ययन आदि की जो बातें कही गई हैं वे पुण्यकर्म के प्रतीक हैं। भगवद्भजन एवं पुण्यकर्म में लगे हुए व्यक्ति को व्रुद्धावस्था एवं मृत्यु भय कम होता है। यह बात कितना सही होगी यह मैं कह नहीं सकता। (मुर एक राक्षक का नाम था जिसको भगवान् श्रीकृष्ण ने मारा था। इसलिए उनका नाम मुरारि = मुर+अरि = मुर के शत्रु भी है।)योगेन्द्र जोशी

“चरैवेति चरैवेति” (ऐतरेय ब्राह्मण) – (2) राजा हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहित को इंद्रदेवता का “चरैवेति” का उपदेश

पिछली पोस्ट में मैंने राजा हरिश्चंद्र और वरुण देवता से वरदान में मिले उनके पुत्र रोहित की कथा का आरंभिक अंश प्रस्तुत किया था । कथा के अनुसार राजा ने रोहित को लेकर वरुण देवता का यज्ञ करना था, जिसको जानने पर रोहित वन को चला गया । वर्षोपरांत उसने घर लौटना चाहा तो मार्ग में ब्राह्ण भेषधारी इंद्र उसे मिल गये । ब्राह्मण के विचारों से प्रेरित होकर वापस पर्यटन पर चला गया । दूसरे वर्ष के समाप्त होते-होते जब वह घर लौटने लगा तो ब्राह्मण रूप में इंद्र उसे फिर मिल गए । ब्राह्मण ने उसे पुनः “चरैवेति” का उपदेश देते हुए पर्यटन करते रहने की सलाह दी –

पुष्पिण्यौ चरतो जङ्घे भूष्णुरात्मा फलग्रहिः ।

शेरेऽस्य सर्वे पाप्मानः श्रमेण प्रपथे हतश्चरैवेति ॥

(ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय 3, खण्ड 3)

(चरतः जङ्घे पुष्पिण्यौ, भूष्णुः आत्मा फलग्रहिः, अस्य श्रमेण प्रपथे हतः सर्वे पाप्मानः शेरे, चर एव इति ॥)

अर्थ – निरंतर चलने वाले की जंघाएं पुष्पित होती हैं, अर्थात उस वृक्ष की शाखाओं-उपशाखाओं की भांति होती है जिन पर सुगंधित एवं फलीभूत होने वाले फूल लगते हैं, और जिसका शरीर बढ़ते हुए वृक्ष की भांति फलों से पूरित होता है, अर्थात वह भी फलग्रहण करता है । प्रकृष्ट मार्गों पर श्रम के साथ चलते हुए उसके समस्त पाप नष्ट होकर सो जाते हैं, अर्थात निष्प्रभावी हो जाते हैं । अतः तुम चलते ही रहो (विचरण ही करते रहो, चर एव) ।

इस श्लोक की व्याख्या मुझे सरल नहीं लगी । सायण भाष्य के अनुसार विचरणशील व्यक्ति की जांघों के श्रम के फलस्वरूप मनुष्य को विभिन्न स्थानों पर भांति-भाति के भोज्य पदार्थ प्राप्त होते हैं जिनसे उसका शरीर वृद्धि एवं आरोग्य पाता है । प्रकृष्ट मार्ग के अर्थ श्रेष्ठ स्थानों यथा तीर्थस्भल, मंदिर, महात्माओं-ज्ञानियों के आश्रम-आवास से लिया गया है । इन स्थानों पर प्रवास या उनके दर्शन से उसे पुण्यलाभ होता है अर्थात उसके पाप क्षीण होकर पिष्प्रभावी हो जाते हैं ।

राजपुत्र रोहित ने ब्राह्मण की बातों को मान लिया और वह घर लौटने का विचार त्यागकर पुनः देशाटन पर निकल गया । घूमते-फिरते तीसरा वर्ष बीतने को हुआ तो उसने वापस घर लौटने का मन बनाया । इस बार भी इन्द्र देव ब्राह्मण भेष में उसे मार्ग में दर्शन देते है । वे उसे पुनः “चरैवेति” का उपदेश देते हैं । वे कहते हैं –

आस्ते भग आसीनस्योर्ध्वस्तिष्ठति तिष्ठतः ।

शेते निपद्यमानस्य चराति चरतो भगश्चरैवेति ॥

(ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय 3, खण्ड 3)

(आसीनस्य भग आस्ते, तिष्ठतः ऊर्ध्वः तिष्ठति, निपद्यमानस्य शेते, चरतः भगः चराति, चर एव इति ॥)

अर्थ – जो मनुष्य बैठा रहता है, उसका सौभाग्य (भग) भी रुका रहता है । जो उठ खड़ा होता है उसका सौभाग्य भी उसी प्रकार उठता है । जो पड़ा या लेटा रहता है उसका सौभाग्य भी सो जाता है । और जो विचरण में लगता है उसका सौभाग्य भी चलने लगता है । इसलिए तुम विचरण ही करते रहो (चर एव) ।

सौभाग्य से तात्पर्य धन-संपदा, सुख-समृद्धि से है । जो व्यक्ति निक्रिय बैठा रहता है, जो उद्यमशील नहीं होता, उसका ऐश्वर्य बढ़ नहीं पाता है । जो उद्यम हेतु उठ खड़ा होता है उसका सौभाग्य भी आगे बढ़ने के लिए उद्यत होता है । जो आलसी होता है, सोया रहता है, निश्चिंत पड़ा रहता है, उसका ऐश्वर्य नष्ट होने लगता है, उसकी समुचित देखभाल नहीं हो पाती । उसके विपरीत जो कर्मठ होता है, उद्यम में लगा रहता है, जो ऐश्वर्य-वृद्धि हेतु विभिन्न कार्यों को संपन्न करने के लिए भ्रमण करता है, यहां-वहां जाता है उसके सौभाग्य की भी वृद्धि होती है, धन-धान्य, संपदा, आगे बढ़ते हैं ।

पर्यटन में लगे रोहित का एक और वर्ष बीत गया और वह घर लौटने लगा । पिछली बारों की तरह इस बार भी उसे मार्ग में ब्राह्मण-रूपी इंद्र मिल गए, जिन्होंने उसे “चरैवेति” कहते हुए पुनः भ्रमण करते रहने की सनाह दी । रोहित उनके बचनों का सम्मान करते हुए फिर से पर्यटन में निकल गया ।

इस प्रकार रोहित चार वर्षों तक यत्रतत्र भ्रमण करता रहा । चौथे वर्ष के अंत पर जब वह घर लौटने को उद्यत हुआ तो मार्ग में उसे ब्राह्मण भेष में इंन्द्रदेव पुनः मिल गए । उन्होंने हर बार की तरह “चरैवेति” का उपदेश दिया और कहा –

कलिः शयानो भवति संजिहानस्तु द्वापरः ।

उत्तिष्ठस्त्रेता भवति कृतं संपाद्यते चरंश्चरैवेति ॥

(ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय 3, खण्ड 3)

 (शयानः कलिः भवति, संजिहानः तु द्वापरः, उत्तिष्ठः त्रेता भवति, चरन् कृतं संपाद्यते, चर एव इति ।)

अर्थ – शयन की अवस्था कलियुग के समान है, जगकर सचेत होना द्वापर के समान है, उठ खड़ा होना त्रेता सदृश है और उद्यम में संलग्न एवं चलनशील होना कृतयुग (सत्ययुग) के समान है । अतः तुम चलते ही रहो (चर एव) ।

इस श्लोक में मनुष्य की चार अवस्थाओं की तुलना चार युगों से क्रमशः की गई है । ये अवस्थाएं हैं (1) मनुष्य के निद्रामग्न एवं निष्क्रिय होने की अवस्था, (2) जागृति किंतु  आलस्य में पड़े रहने की अवस्था, (3) आलस्य त्याग उठ खड़ा होकर कार्य के लिए उद्यत होने की अवस्था, और (4) कार्य-संपादन में लगते हुए चलायमान होना । ब्राह्मण रूपी इन्द्र रोहित को समझाते हैं कि जैसे युगों में सत्ययुग उच्चतम कोटि का कहा जाता है वैसे ही उक्त चौथी अवस्था श्रेष्ठतम स्तर की कही जाएगी । उस युग में समाज सुव्यस्थित होता था और सामाजिक मूल्यों का सर्वत्र सम्मान था । उसके विपरीत कलियुग सबसे घटिया युग कहा गया है क्योंकि इस युग में समाज में स्वार्थपरता सर्वाधिक रहती है और परंपराओं का ह्रास देखने में आता है । उपर्युक्त पहली अवस्था इसी कलियुग के समान निम्न कोटि की होती है ।

उक्त प्रकार से संचरण में लगे रोहित के पांच वर्ष व्यतीत हो गये । कथा के अनुसार ब्राह्मण भेषधारी इन्द्र ने अंतिम (पांचवीं) बार फिर से रोहित को संबोधित करते हुए “चरैवेति” के महत्व का बखान किया । तदनुसार पुनः भ्रमण पर निकले रोहित को अजीगर्त नामक एक निर्धन ब्राह्मण के दर्शन हुए । उक्त वाह्मण से उसने उनके पुत्र, शुनःशेप, को खरीद लिया ताकि वह बालक वरुणदेव के लिए संपन्न किए जाने वाले यज्ञ में स्वयं के बदले इस्तेमाल कर सके ।

शुनःशेप (विकल्पतः शुनःशेफ) से संबंधित कथा का शेष और अंतिम भाग अगली पोस्ट में । – योगेन्द्र जोशी

“न अयम् आत्मा प्रवचनेन लभ्यः …” – परब्रह्म की प्राप्ति विषयक मुण्डकोपनिषद् के वचन

वैदिक ग्रंथ ‘मुंडक उपनिषद्’ में परब्रह्म के स्वरूप और उसे प्राप्त करने के मार्ग का वर्णन किया गया है । माना जाता है कि यह ग्रंथ प्रमुखतया उन आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है जो मोक्ष की समझ और उसकी प्राप्ति का मार्ग जानना चाहते हैं । वैदिक दार्शनिेकों के मतानुसार जीवधारियों का भौतिक पदार्थों से बना स्थूल शरीर तो नश्वर है, किंतु उसमें ‘निवास’ करने वाली अमूर्त आत्मा अमर है । स्थूल स्तर पर नाशवान शरीर की जिस मृत्यु का अनुभव हम करते हैं वह वस्तुतः आत्मा का शरीर छोड़ना भर है । वास्तव में आत्मा वारंवार शरीर धारण करती है और कालांतर में उसे छोड़ती है । वह जन्म-मरण के चक्र से बंधी रहती है । प्राचीन वैदिक चिंतक मानने थे कि परमात्मा या परब्रह्म समस्त सृष्टि का मूल है और आत्मा वस्तुतः उसका एक अंश है । परब्रह्म और आत्मा के बीच का संबंध कुछ-कुछ वैसा ही है जैसा विशाल समुद्र और उससे विलग हुई जल की एक बूंद का । अपनी देह से संपादित कर्मफलों के बंधन से आत्मा जन्ममरण के चक्र में तब तक भटकती रहती है जब तक कि उसे अपने वास्तविक स्वरूप अर्थात् परब्रह्म का अंश होने का ज्ञान नहीं हो जाता है । ज्ञानप्राप्ति के पश्चात वह उसी में लीन हो जाती है । उस अवस्था को माक्ष की संज्ञा दी गई है । सामान्य शब्दों में अभिव्यक्त इस दार्शनिक विचार के गहरे अर्थ समझना किस-किस के लिए संभव है यह मैं नहीं कह सकता ।

आत्मा के सही स्वरूप का ज्ञान किसे और कैसे मिलता है इस बात का उल्लेख मुंडक उपनिषद के अधःप्रस्तुत तीन मंत्रों में मिलता है:

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।

यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ।।3।।

(मुण्डकोपनिषद्, मुंडक 3, खंड 2)

(न अयम् आत्मा प्रवचनेन लभ्यः न मेधया न बहुना श्रुतेन, यम् एव एषः वृणुते तेन लभ्यः, तस्य एषः आत्मा विवृणुते तनुम् स्वाम् ।)

अर्थ – यह आत्मा प्रवचनों से नहीं मिलती है और न ही बौद्धिक क्षमता से अथवा शास्त्रों के श्रवण-अध्ययन से । जो इसकी ही इच्छा करता है उसेयह प्राप्त होता है, उसी के समक्ष यह आत्मा अपना स्वरूप उद्घाटित करती है ।

 

यहां आत्मा को पाने का अर्थ है आत्मा के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करना । धार्मिक गुरुओं के प्रवचन सुनने से, शास्त्रों के विद्वत्तापूर्ण अध्ययन से, अथवा ढेर सारा शास्त्रीय वचनों को सुनने से यह ज्ञान नहीं मिल सकता है । इस ज्ञान का अधिकारी वह है जो मात्र उसे पाने की आकांक्षा रखता है । तात्पर्य यह है कि जिसने भौतिक इच्छाओं से मुक्ति पा ली हो और जिसके मन में केवल उस परमात्मा के स्वरूप को जानने की लालसा शेष रह गयी हो वही उस ज्ञान का हकदार है । जो एहिक सुख-दुःखों, नाते-रिश्तों, क्रियाकलापों, में उलझा हो उसे वह ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता है । जिस व्यक्ति का भौतिक संसार से मोह समाप्त हो चला हो वस्तुतः वही कर्मफलों से मुक्त हो जाता है और उसका ही परब्रह्म से साक्षात्कार होता है ।

 

नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिंगात् ।

एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वान्स्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ।।4।।

(यथा पूर्वोक्त)

(न अयम् आत्मा बल-हीनेन लभ्यः न च प्रमादात् तपसः वा अपि अलिंगात् एतैः उपायैः यतते यः तु विद्वान् तस्य एषः आत्मा विशते ब्रह्म-धाम ।)

अर्थ – यह आत्मा बलहीन को प्राप्त नहीं होती है, न ही धनसंपदा, परिवार के विषयों में लिप्त रहने वाले को, और न तपस्यारत किंतु संन्यासरहित व्यक्ति को । जो विद्वान एतद्विषयक उपायों को प्रयास में लेता है उसी की आत्मा परब्रह्मधाम में प्रवेश करती है ।

 

यहां पर बलहीन का अर्थ सामान्य दैहिक अथवा बौद्धिक  बल से नहीं है । जिसके पास आत्मसंयम का सामर्थ्य है वही बलवान है क्योंकि वह विपरीत परिस्थिति में भी अविचलित रह सकता है । किंतु ऐसा व्यक्ति भी मोक्ष्य के योग्य नहीं होता । संन्यास का अर्थ है सांसारिक बंधनों से स्वयं को मुक्त करना । जिस व्यक्ति को कोई लालसा नहीं, जो संभी बंधन तोड़ चुका हो, जिसका न कोई अपना रह गया हो और न पराया वह वीतराग संन्यासी कहलाता है । ऐसा संन्यासी बनना ही परब्रह्म के ज्ञान का उपाय है ।

 

संप्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ताः कृतात्मानो वीतरागः प्रशान्ताः ।

ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति ।।5।।

(यथा पूर्वोक्त)

(संप्राप्य एनम् ऋषयः ज्ञान-तृप्ताः कृत-आत्मानः वीत-रागः प्रशान्ताः ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीराः युक्त-आत्मानः सर्वम् एव आविशन्ति ।)

अर्थ – आत्मा के यथार्थ को पा लेने पर ऋषिगण ज्ञानतृप्त, कृतकृत्य, विरक्त, और परम शान्त हो जाते हैं । वे धीर पुरुष उस सर्वव्यापी परब्रह्म को सर्वत्र प्राप्त करते हुए और उससे युक्तचित्त होकर उसी संपूर्ण ब्रह्म में प्रवेश कर जाते हैं, यानी उससे एकाकार हो जाते हैं ।

इस मंत्र की व्याख्या में कहा गया है कि आत्मा के मूलस्वरूप का ज्ञान पा चुकने वाले ऋषि के लिए उसका शरीर एक अस्थाई सांसारिक बंधन रह जाता है । उसके लिए देहत्याग पर परब्रह्म में लीन होना वैसा ही होता है जैसा किसी घड़े के टूटकर बिखरने पर उसके भीतर के आंशिक आकाश और बाह्य असीमित आकाश के बीच का भेद समाप्त हो जाता है । युक्तचित्त की स्थिति में केवल ब्रह्म का ही भाव उसके मन में रह जाता है और सांसारिक समस्त वस्तुओं में उसी ब्रह्म के दर्शन होने लगते है । उसके लिए कुछ भी सांसारिक बांछनीय नहीं रह जाता है । प्राचीन काल में वैदिक चिंतकों को कदाचित घड़े का दृष्टांत ही उपयुक्त लगा होगा । आज विकल्पतः हवा भरे गुब्बारे का दृष्टांत सोचा जा सकता है जिसके, भीतर का आकाश बाह्य आकाश से पूरी तरह विभक्त रहता है । – योगेन्द्र जोशी

 

 

“राजकलिं हन्युः प्रजाः”(महाभारत के वचन) – प्रजा की सुरक्षा के प्रति बेपरवाह राजा मृत्युदंड के योग्य

भारतीयों के लिए वेदव्यासरचित महाकाव्य महाभारत एक सुपरिचित ग्रंथ है जिसकी कथाओं का जिक्र लोग यदाकदा करते रहते हैं । महाभारत में वर्णित पांडव-कौरवों के युद्ध की समाप्ति के बाद राजा युधिष्ठिर सरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह से राजकार्य संबंधी नीतिवचन प्राप्त करते हैं । राजा के लिए क्या कृत्य है क्या नहीं इस बाबत अनेकानेक बातें भीष्म बताते हैं । उसी प्रकरण में वे यह भी कहते हैं कि उस राजा को प्रजा ने मृत्युदंड दे देना चाहिए जो उनकी सुरक्षा को गंभीरता से नहीं लेता है । मैं तत्संबंधित तीन श्लोकों की चर्चा यहां पर कर रहा हूं । ये तीनों महाभारत के अनुशासनपर्व (अध्याय ६१) से उद्धृत किए जा रहे हैं ।

क्रोश्यन्त्यो यस्य वै राष्ट्राद्ध्रियन्ते तरसा स्त्रियः ।

क्रोशतां पतिपुत्राणां मृतोऽसौ न च जीवति ॥३१॥

(महाभारत, अनुशासनपर्व, अध्याय ६१)

(यस्य वै राष्ट्रात् क्रोशताम् पतिपुत्राणाम् क्रोश्यन्त्यः स्त्रियः तरसा ध्रियन्ते असौ मृतः न च जीवति ।)

अर्थ – जिस राजा के राज्य में चीखती-चिल्लाती स्त्रियों का बलपूर्वक अपहरण होता है और उनके पति-पुत्र रोते-चिल्लाते रहते हैं, वह राजा मरा हुआ है न कि जीवित ।

जो राजा अपहरण की जा रही स्त्रियों की सुरक्षा के लिए समुचित कदम नहीं उठाता और उनके दुःखित बंधु-बांधवों की विवशता से विचलित नहीं होता वह जीते-जी मरे हुए के समान है । उसके जीवित होने की कोई सार्थकता नहीं रह जाती ।

 

ध्यान रहे कि आज के लोकतांत्रिक शासकीय व्यवस्था में जो सत्ता के शीर्ष पर हो वही राजा की भूमिका निभाता है । इसलिए राजा के संदर्भ में जो बातें कही गई हैं वह आज के शासकों पर यथावत लागू होती हैं । अपने देश के कुछ राज्यों, जैसे उत्तर प्रदेश, में इस समय स्त्रियों के प्रति दुष्कर्म के मामले चरम पर हैं, किंतु शासकीय व्यवस्था इतनी गिरी हुई है कि किसी को दंडित नहीं किया जा रहा है । ऐसे शासकों को वस्तुतः डूब मरना चाहिए!

 

अरक्षितारं हर्तारं विलोप्तारमनायकम् ।

तं वै राजकलिं हन्युः प्रजाः सन्नहा निर्घृणम् ॥३२॥

(यथा पूर्वोक्त)

(अरक्षितारम् हर्तारम् विलोप्तारम् अनायकम् तम् निर्घृणम् राजकलिम् प्रजाः वै सन्नहा हन्युः ।)

अर्थ – जो राजा अपनी जनता की रक्षा नहीं करता, उनकी धनसंपदा छीनता या जब्त करता है, जो योग्य नेतृत्व से वंचित हो, उस निकृष्ट राजा को प्रजा ने बंधक बनाकर निर्दयतापूर्वक मार डालना चाहिए ।

 

राजा का कर्तव्य है अपनी प्रजा की रक्षा करना, उसको सुख-समृद्धि के अवसर प्रदान करना । तभी वह जनता से कर वसूलने का हकदार बन सकता है । अपने कर्तव्यों का निर्वाह न करने वाला राजा जब कर वसूले तो उसको लुटेरा ही कहा जाएगा । नीति कहती है कि ऐसे राजा को निकृष्ट कोटि का मानना चाहिए । उसके प्रति दयाभाव रखे बिना ही परलोक भेज देना चाहिए ।

 

आज की शासकीय स्थिति कुछ राज्यों में अति दयनीय है । परंतु दुर्भाग्य से सत्तासुख भोग रहे वहां के शासकों को दंडित करने वाला कोई नहीं । लोग कहते हैं कि पांच-पांच सालों में होने वाले चुनावों द्वारा जनता उन्हें सत्ता से बेदखल कर देती है । लेकिन ध्यान दें कि न चुना जाना कोई दंड नहीं होता है । किसी भी चुनाव में कई प्रत्याशी भाग लेते हैं जिनमें से एक चुना जाता है । “अन्य सभी को दंडित कर दिया” ऐसा क्या कहा जा सकता है ? सवाल असल में दंडित किये जाने का है जो वास्तव में होता नहीं ।

 

अहं वो रक्षितेत्युक्त्वा यो न रक्षति भूमिपः ।

स संहत्य निहंतव्यः श्वेव सोन्मादः आतुरः ॥३३॥

(यथा पूर्वोक्त)

(अहम् वः रक्षिता इति उक्त्वा यः भूमिपः न रक्षति सः स-उन्मादः आतुरः श्व-इव संहत्य निहंतव्यः ।)

अर्थ – मैं आप सबका रक्षक हूं यह वचन देकर जो राजा रक्षा नहीं करता, उसे रोग एवं पागलपन से ग्रस्त कुत्ते की भांति सबने मिलकर मार डालना चाहिए ।

 

इस श्लोक में कटु शब्दों का प्रयोग हुआ है । शासक का पहला कर्तव्य है कि वह भयमुक्त समाज की रचना करे –  भयमुक्त निरीह-निरपराध प्रजा के लिए, न कि अपराधियों के लिए । आज की स्थिति उल्टी है । अपराधी निरंकुश-स्वच्छंद विचरण करते हुए और सामान्य जन डरे-सहमे दिखते हैं । जिस शासक के राज्य में ऐसा हो उसे ग्रंथकार ने पागल कुत्ते की संज्ञा दी है । ऐसे कुत्ते का एक ही इलाज होता है, मौत । दुर्भाग्य से हमारे शासक सबसे पहले अपनी सुरक्षा का इंतजाम करते हैं । कोई सामान्य व्यक्ति उनके पास पहुंच तक नहीं सकता, आगे कुछ करने का तो सवाल ही नहीं ।

 

ये नीतिश्लोक दर्शाते हैं कि महाभारत ग्रंथ में कर्तव्यों में विफल शासक को पतित और निकृष्ट श्रेणी का कहा गया है । – योगेन्द्र जोशी

ऋग्वेद में औषधीय वनस्पतियों की प्रार्थना (1)

          मैंने अपने चिट्ठे की एक प्रविष्टि (31 जनवरी 2010) में औषधीय वनस्पतियों की प्रार्थना संबंधी यजुर्वेद में उपलब्ध मंत्रों का उल्लेख किया था । भावात्मक तौर पर उनसे साम्य रखने वाली ऋचाएं मुझे ऋग्वेद में भी देखने को मिली हैं । मैं उन्हीं में से चुनी हुई कुछएक की चर्चा यहां पर कर रहा हूं:

          याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्चपुष्पिणीः ।

          बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः ॥15

           (ऋग्वेद, मण्डल 10, सूक्त 97)

          (याः फलिनीः याः अफलाः याः अपुष्पाः पुष्पिणीः च बृहस्पति-प्रसूताः ता अंहसः नः मुञ्चन्तु ।)

अर्थ – फलने वाली जो वनस्पतियां हैं या जिन पर फल नहीं लगते हैं, जो पुष्पित नहीं होती अथवा जिन पर फूल खिलते हैं, देव बृहस्पति-जनित ऐसी सभी वनस्पतियां हमें रोगों से मुक्त रखें ।

सभी वनस्पतियां फूलती नहीं हैं, और जो फूलती हैं उन पर फल लगें ही यह भी आवश्यक नहीं हैं । इस मंत्र में औषधीय गुणों वाली ऐसी समस्त वनस्पतियों से प्रार्थना की गई है कि वे उनके समुदाय को रोगों से मुक्त रखें । वैदिक चिंतकों की मान्यतानुसार सृष्टि के सभी तंत्र अपने-अपने अधिष्ठाता देवता से संबद्ध रहते हैं, और वनस्पतियों को उनके औषधीय गुण बृहस्पति देवता से प्राप्त रहते हैं ।

          मुञ्चन्तु मा शपथ्यादथो वरुण्यादुत ।

          अथो यमस्य षड्बीशात् सर्वस्माद्देवकिल्बिषात् ॥16

           (यथा उपर्युक्त)

           (मा शपथ्यात् मुञ्चन्तु अथो वरुण्यात् उत अथो यमस्य षड्बीशात् सर्वस्मात् देवकिल्बिषात् ।)

अर्थ – औषधियां मुझे शापजनित रोग से मुक्त करें, बल्कि वरुण देवता के शाप से भी दूर रखें, यम देवता की बेड़ियों से मुक्त रखें, इतना ही नहीं समस्त दैवप्रदत्त पापों को मुझसे दूर रखें ।

मनुष्य के कष्ट तीन प्रकार के गिनाए गए हैं: आधिभौतिक, आधिदैविक, एवं आघ्यात्मिक । दूसरे मनुष्यों अथवा संसार के अन्य प्राणियों के कारण जो भौतिक कष्ट भोगना पड़ता है उसे आधिभौतिक कहा जाता है । देवताओं के रोष से जो कष्ट भोगना पड़ता है उसे आधिदैविक की संज्ञा दी गई है । अधिकांश कष्टों की अनुभूति इंद्रियों के माध्यम से अनुभव में आती है । इनके अतिरिक्त कभी-कभी विशुद्ध मानसिक कष्ट भी भोगने पड़ते हैं; इन्हीं को आघ्यात्मिक कहा जाता है । ये कष्ट वस्तुतः मन के विकारों के कारण पैदा होते हैं, और उनका कोई स्पष्ट बाह्य कारण नहीं रहता है । उक्त मंत्र में इन सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति की प्रार्थना की गई है । शापजनित कष्ट उसे समझा जा सकता है जो दूसरों के द्वारा कर्मणा अथवा वाचा किसी को पहुंचाया जाता है । दूसरे के अहित की भावना भी कदाचित कष्ट का कारण बन सकता है । इन सभी को शापमूलक मान सकते हैं । वरुण को हाथ में बंधन (फंदा) लिए हुए पश्चिम दिशा का (समुद्र का भी) अधिष्ठाता देवता माना गया है । वरुण देवता के शाप का ठीक-ठीक अर्थ क्या है मैं समझ नहीं पाया । कदाचित जलजनित रोगों से तात्पर्य हो । यम देवता का शाप का अर्थ यही होगा कि उनके रूप में मुत्यु हर क्षण मनुष्य का पीछा करती है । औषधियां कष्टों अथवा मृत्यु के निमित्त बने रोगों से हमें दूर रखती हैं । मनुष्य के अनुचित कर्मों के फल को देवताओं द्वारा दंड-स्वरूप प्रदत्त पाप कहा गया होगा ऐसा मेरा सोचना है ।

           अवपतन्तीरवदन् दिव ओषधयस्परि ।

           यं जीवमश्नवामहै न स रिष्याति पूरुषः ॥17

           (यथा उपर्युक्त)

           (दिव अवपतन्तीः ओषधयः परि अवदन् यं जीवम् अश्नवामहै स पूरुषः न रिष्याति ।)

अर्थ – द्युलोक से धरती पर उतरती औषधियां वचन बोलती हैं कि जिस जीव को हम व्याप्त या आच्छादित कर लें उस पुरुष का विनाश नहीं होता ।

व्याप्त (वि+आप्त) का अर्थ यहां प्राप्त होना लिया जा सकता है । मेरा सोचना है कि प्राचीन मनीषी वनस्पतियों के औषधीय गुण स्वर्ग की देन मानते होंगे । धरती पर होने वाली घटनाएं देवताओं के नियंत्रण में होती हैं, अतः ये औषधियां भी देवों की प्राणियों पर अनुकंपा के परिणाम प्राणियों को प्राप्त होती हैं । स्वर्ग से धरती पर उतरने वाली औषधियां जो कहती हैं उसे वस्तुतः उनके अधिष्ठाता देवता का कथन माना जाना चाहिए । इस कथन में ये उद्गार प्रतिबिंबित होते हैं कि मनुष्य के नाश का कारण अंततः रोग हैं जिन्हें औषधियां दूर कर देती हैं । नीरोग व्यक्ति ही दीर्घजीवी हो सकता है और वही अपने एवं समाज के लिए फलदायी कार्य संपन्न करने में समर्थ होता है । – योगेन्द्र जोशी

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