“… सनिं मेधामयासिषं …” – यजुर्वेद में अग्नि देवता से बुद्धि एवं धन की प्रार्थना

वेदों में देवताओं की प्रार्थना से संबंधित अनेक मंत्र पढ़ने को मिलते हैं। ये देवता कौन हैं, क्या हैं, यह मैं नहीं समझ पाया हूं। प्रकृति की विभिन्न शक्तियों के अमूर्त नियंता ही ये देवता हैं ऐसा मेरी समझ में आता है। प्राचीन पौराणिक साहित्य में भी देवताओं से जुड़ी कथाओं का वर्णन मिलता है। लेकिन उन कथाओं से यह नहीं लगता कि देवतागण प्रकृति की शक्तियों के प्रतीक हैं। बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि वे पुण्यकर्मों के फलस्वरूप देवत्व-प्राप्त एवं विशिष्ट सामर्थ्य से संपन्न स्वर्गस्थ आत्माएं होती हैं जो पुण्यकर्मों के भोग के बाद पुनः धरती पर जन्म लेती हैं जैसा कि विष्णुपुराण में पढ़ने को मिलता है (गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे। स्वर्गापवर्गास्पदहेतुभूते भवन्ति भूयः मनुजाः सुरत्वात् ॥)। बहरहाल मैं वेदों एवं पुराणों में चर्चित देवताओं में क्या अंतर है – यदि है तो – इसकी विवेचना नहीं कर रहा हूं, बल्कि अग्नि देवता से जुड़े चार मंत्रों का जिक्र कर रहा हूं।

वेदों में देवताओं की स्तुतिपरक मंत्र ही अधिकांशतः देखने को मिलते हैं। इन देवताओं में इन्द्र एवं अग्नि की स्तुतियां बहुतायत में प्राप्य हैं। अग्नि देवता को अन्य सभी देवताओं के प्रतिनिधि के तौर पर देखा गया है, क्योंकि यज्ञ-संपादन में दी जाने वाली आहुतियों का वाहक अग्नि ही है। यज्ञकुंड की प्रज्वलित अग्नि में गोघृत, तिल, जौ आदि से बने सुगंधित हवन सामग्री की जब आहुति दी जाती है तो “स्वाहा” का उच्चारण किया जाता है; उसका अर्थ है कि अग्नि देवता के माध्यम से सभी देवताओं को वह आहुति प्राप्त हो। इसलिए वैदिक अनुष्ठानों में अग्नि देवता और उसके भौतिक प्रतीक प्रज्वलित अग्नि का विशेष महत्व है।

शुक्लयजुर्वेद संहिता में अग्नि देवता को संबोधित चार ऐसे मंत्र मुझे पढ़ने को मिले जिनमें मेधा (उत्कृष्ट श्रेणी की बौद्धिक क्षमता) और धनधान्य की याचना की गई है। उन्ही का उल्लेख मैं यहां पर कर रहा हूं, जिनके अर्थ के लिए मैंने श्रीमद्‍-उवटाचार्य एवं श्रीमद्‍महीधर के भाष्यों का सहारा लिया है। (शुक्लयजुर्वेदसंहिता, अध्याय ३२, कंडिका/मंत्र १३-१६)

सदसस्पतिमद्भुतं प्रियमिन्द्रस्य काम्यम् । सनिं मेधामयासिषं स्वाहा ॥१३॥

(सदसः पतिम् अद्भुतंम् प्रियम् इन्द्रस्य काम्यम् सनिम् मेधाम् अयासिषम् स्वाहा।)

यज्ञशाला के पति/स्वामी, इन्द्र के प्रिय, कामना के योग्य, (अग्नि से) धन (सनि) एवं मेधा की याचना करते हैं; स्वाहा अर्थात्‍ सभी देवताओं के प्रति आहुति।

यां मेधां देवगणाः पितरश्चोपासते । तया मामद्य मेधयाग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा ॥१४॥

(याम् मेधाम् देवगणाः पितरः च उपासते तया माम् अद्य मेधया अग्ने मेधाविनम् कुरु स्वाहा।)

जिस मेधा की उपसना देवगण और पितृवृन्द करते हैं, हे अग्नि आज मुझे उस मेधा से मेधावी (मेधावान्‍) बनावें; स्वाहा।

मेधां मे वरुणो ददातु मेधामग्निः प्रजापतिः । मेधामिन्द्रश्च वायुश्च मेधां धाता ददातु मे स्वाहा ॥१५॥

(मेधाम् मे वरुणः ददातु मेधाम् अग्निः प्रजापतिः मेधाम् इन्द्रः च वायुः च मेधाम् धाता ददातु मे स्वाहा।)

वरुण देवता मुझे मेधा प्रदान करें, अग्नि मेधा दें, प्रजापति (ब्रह्मा), इन्द्र एवं वायु मेधा दें, विधाता मुझे मेधा प्रदान करें; स्वाहा।

इदं मे ब्रह्म क्षत्रं चोभे श्रियमस्नुताम् मयि देवा दधतु श्रियमुत्तरां तस्यै ते स्वाहा ॥१६॥

(इदम् मे ब्रह्म क्षत्रम् च उभे श्रियम् अस्नुताम्मयि देवा दधतु श्रियम् उत्तराम् तस्यै ते स्वाहा।)

मेरी श्री (धन-संपदा) का भोग ब्राह्मण और क्षत्रिय, दोनों, करें। देवगण मुझे धन-ऐश्वर्य प्रदान करें; उसके लिए (अग्नि!) आपके प्रति आहुति; स्वाहा।

मेरी जानकारी के अनुसार वैदिक काल में यज्ञ-संपादन दैनिक जीवन का अंग हुआ करता था, और उसके लिए यज्ञशाला (सदस्) में अग्नि प्रज्वलित रहती थी। अग्नि को इस यज्ञगृह का स्वामी या पालनकर्ता कहा गया है। प्रथम मंत्र में अग्नि को इन्द्र के प्रिय साथी के तौर पर प्रस्तुत किया गया है। मेधा बुद्धि का पर्याय है; किंतु मेरी समझ में यह विवेक से परिपूर्ण बुद्धि है। आम तौर पर मनुष्य को बुद्धि सन्मार्ग पर ले चले यह आवश्यक नहीं। मेधा उत्कृष्ट स्तर की बुद्धि है जो उचितानुचित में भेद करने की प्रेरणा देती है।

पितरों से तात्पर्य पूर्वजों से होना चाहिए जो मेधा की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते रहे हों। देवगणों द्वारा उपासना का अर्थ कुछ भिन्न होना चाहिए, क्योंकि वे तो मेधा का वरदान स्वयं ही देते हैं। उनकी उपासना से अर्थ यही होगा की मेधा की श्रेष्ठता/महत्ता को वे भी स्वीकारते हैं और उसे उपास्य के तौर पर देखते हैं।

तीसरी कंडिका में वरुण (जल के देवता) आदि अन्य प्रमुख देवताओं का संबोधन स्पष्टतः करते हुए सभी से मेधा की याचना की गई है।

अंतिम मंत्र में यह यज्ञकर्ता कहता है उसका धन, जिसकी याचना प्रारंभ में की गई है, ब्राह्मणों और क्षत्रियों के भोग के लिए भी उपलब्ध होवे न कि अकेले उसके भोग के लिए। यहां पर केवल दो वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय) का नाम शामिल किया गया है। वैदिक काल में कार्य (पेशा) विभाजन के अनुरूप समाज चार वर्णों में विभक्त था: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। मेरा सोचना है कि इस कथन का आशय होना चाहिए कि मेरा धन समाज के उपयोग में आवे। तब केवल ब्राह्मण एवं क्षत्रिय का उल्लेख क्यों किया है? कदाचित् यह मंत्र के छंद-स्वरूप को सुसंगत बनाये रखने के लिए किया गया होगा। इसलिए केवल दो वर्णों का उल्लेख पूरे समाज को इंगित करने हेतु किया गया होगा ऐसा मेरा सोचना है। इस प्रकार इस मंत्र में ‘मेरा धन समाज-हित में प्रयुक्त होवे’ यह भावना निहित है। – योगेन्द्र जोशी

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अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्ठो … – आत्मा की व्यापकता पर कठोपनिषद्‍ के वचन

वेदों का आरंभिक एवं अधिकांश भाग देवी-देवताओं की प्रार्थनाओं और कर्मकांडों के लिए प्रयुक्त मंत्रों से संबंधित मिलता है। इसके अतिरिक्त उनमें मनुष्य के ऐहिक (लौकिक) जीवन के कर्तव्याकर्तव्यों का भी उल्लेख देखने को मिलता है। उनका दार्शनिक पक्ष भी है। तत्संबंधित अध्यात्मिक ज्ञान जिन ग्रंथों के रूप में संकलित हैं उन्हें उपनिषदों के नाम से जाना जाता है।

उपनिषदों की कुल संख्या कितनी है यह मैं ठीक-से नहीं जान पाया हूं। मेरे पास गीताप्रेस, गोरखपुर, का एक विशेषांक – उपनिषद्‍ अंक – है जिसमें ५४ उपनिषदों की विस्तृत अथवा संक्षिप्त चर्चा की गई है। मेरी जानकारी के अनुसार इनमें से ११ उपनिषद्‍ मुख्य माने जाते है और उन्हीं की चर्चा अक्सर होती है। ये है (अकारादि क्रम से):

(१) ईशावास्योपनिषद्‍ (या ईशोपनिषद्‍)

(२) ऐतरेयोपनिषद्‍

(३) कठोपनिषद्‍

(४) केनोपनिषद्‍

(५) छान्दोग्योपनिषद्‍

(६) तैत्तरीयोपनिषद्‍

(७) प्रश्नोपनिषद्‍

(८) माण्डूक्योपनिषद्‍

(९) मुण्डकोपनिषद्‍

(१०) वृहदारण्यकोपनिषद्‍

(११) श्वेताश्वरोपनिषद्‍

इनमें वृहदारण्यक एवं छान्दोग्य उपनिषद्‍ सबसे बड़े हैं। उपर्युक्त उपनिषदों में परब्रह्म अथवा परमात्मा एवं सृष्टि की रचना की व्याख्या अपने-अपने तरीके से की गयी है।

कठोपनिषद्‍ के अध्याय २, वल्ली २, मैं मुझे ३ मंत्र पढ़ने को मिले जो परमात्मा की व्यापकता को अग्नि, वायु एवं सूर्य की उपमा के माध्यम से स्पष्ट करते हैं। ये मंत्र हैं:

अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्ठो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥९॥

(अग्निः यथा एकः भुवनम् प्रविष्ठः रूपम् रूपम् प्रतिरूपः बभूव तथा एकः सर्व-भूत-अन्तः-आत्मा रूपम् रूपम् प्रतिरूपः बहिः च।)

जिस प्रकार एक ही अग्नि इस संसार में अदृश्य रूप से प्रवेश करते हुए जिस किसी वस्तु में प्रज्वलित होती है और उसी के अनुरूप दृश्यमान्‍ होती है, उसी प्रकार सभी प्राणियों में विद्यमान्‍ परमात्मा (अदृश्य) एक ही होते हुए जिसमें प्रविष्ट होता है उसी के अनुसार रूप धारण कर लेता है और उनसे बाहर भी रहता है ।

वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्ठो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥१०॥

(वायुः यथा एकः भुवनम् प्रविष्ठः रूपम् रूपम् प्रतिरूपः बभूव तथा एकः सर्व-भूत-अन्तःर्‍-आत्मा रूपम् रूपम् प्रतिरूपः बहि: च।

जिस प्रकार एक ही वायु संसार में प्रवेश करते हुए जिस किसी वस्तु में समाहित होती है उसी के अनुरूप रूप धारण कर लेती है, उसी प्रकार सभी प्राणियों में विद्यमान् परमात्मा (अदृश्य) एक ही होते हुए जिस वस्तु में प्रविष्ट होता है उसी के अनुसार रूप धारण कर लेता है और उनसे बाहर भी रहता है।

सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोक-दुःखेन बाह्यः ॥११॥

(सूर्यः यथा सर्व-लोकस्य चक्षुः न लिप्यते चाक्षुषैः बाह्य-दोषैः तथा एकः सर्व-भूत-अन्तःर्‍-आत्मा न लिप्यते लोक-दुःखेन बाह्य: ।)

जिस प्रकार एक ही सूर्य संसार का चक्षु (प्रकाशक) बनते हुए प्राणियों के चक्षु-संबंधी बाह्य-दोषों से मुक्त रहता है, उसी प्रकार सभी प्राणियों में विद्यमान्‍ एक ही परमात्मा संसार के दुःखों से निर्लिप्त रहता है और उनसे बाहर भी रहता है।

ऊपर के प्रथम दो श्लोकों में वस्तुतः एक ही बात दो प्रकार से कही गई है। इन उपमाओं की व्याख्या शब्दशः करना कोई माने नहीं रखता। यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि आध्यात्मिक दर्शन की प्रस्तुति सृष्टि के अमूर्त पक्ष के स्वरूप को समझने/समझाने का एक अपूर्ण प्रयास भर होता है। इस संदर्भ में यह स्वीकारा जाना चाहिए कि वैदान्तिक दर्शन विश्व में प्रचलित अन्य दर्शनों से अधिक पेचीदा है। परमात्मा और जीवात्मा के संबंध को दर्शाने के लिए भौतिक संसार के ही दृश्य दृष्टान्तों का सहारा लिया जाता है, जो स्वयं में नाकाफी प्रयास है।

यहां पर यह बताना समीचीन होगा कि इस प्रकार की मिलती-जुलती बात “माण्डूक्य उपनिषद्” में भी कही गई है [आत्मा ह्याकाशवज्जीवैर्घटाकाशैरिवोदितः … (अद्वैतप्रकरण, ३, ४)], जिसकी चर्चा मैंने अपनी एक पोस्ट में कुछ वर्ष पहले की थी (देखें 2009/04/25 की पोस्ट)।

तीसरा श्लोक वस्तुस्थिति के एक अलग पक्ष का स्पष्टीकरण प्रस्तुत करता है। यह बताता है कि परमात्मा उस सूर्य के समान है जो संसार को प्रकाशित करता है और प्राणियों को वस्तुओं के दर्शन कराता है। प्राणियों की अनुभूतियों में विविधता रहती है। उन्हें भांति-भांति के गुण-दोष अपने परिवेश में दिखते हैं। लेकिन स्वयं सूर्य उन गुण-दोषों से परे रहता है। ये गुण-दोष हमारे सुख-दुःखों के कारण होते हैं जो सबके लिए अलग-अलग रहते हैं, किंतु वह सूर्य सभी से मुक्त रहता है। अर्थात्‍ जीवात्माओं की अनुभूतियों से परमात्मा पूर्णतः निर्लिप्त रहता है।

वैदिक चिंतक यह मानते हैं कि आत्मा परमात्मा का ही अंश है लेकिन वह अपने परमात्मात्मक स्वरूप को भूल चुकती है। कुछ दार्शनिक इसको माया मानते हैं जो कदाचित् परमात्मा का ही खेल है।

मैं वैदिक दर्शन को ठीक-से नहीं समझ पाता। जो कुछ कहा जाता है वह शब्दमात्र होते हैं। वे जिस गूढ़ रहस्य की ओर संकेत करते हैं उसे समझने के प्रयास सबके भिन्न-भिन्न होते हैं। बहुतों के लिए वह बेमानी होते हैं क्योंकि उनकी सांसारिक कार्यों के संपादन में कोई महत्ता नहीं होती। – योगेन्द्र जोशी

“चरैवेति चरैवेति” (ऐतरेय ब्राह्मण) – (1) इक्ष्वाकुवंशीय राजा हरिश्चन्द्र की पुत्र-कामना की कथा

 ऐतरेय ब्राह्मण ऋग्वेद की ऋचाओं पर आधारित वैदिक कर्मकांडों से संबंधित ग्रंथ है । उसमें एक कथा का उल्लेख है इक्ष्वाकुवंशीय राजा हरिश्चन्द्र और उनके पुत्र रोहित से संबंधित । उस कथा में पांच श्लोकों का उल्लेख है, जिनके अंतिम चरण का अंत “चरैवेति” से होता है ।

कथा के अनुसार राजा हरिश्चन्द्र की कई रानियां थीं, किंतु उनको किसी से भी पुत्र की प्राप्ति न हो सकी । शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार निष्पुत्र मनुष्य का मृत्योपरांत तारण या उद्धार बिना पुत्र के नहीं होता । राजा को यही चिंता सताती रहती थी ।

एक बार उनके राजमहल में पर्वत एवं नारद नाम के दो ऋषियों ने रात्रि-विश्राम किया । उस अवसर पर राजा ने अपनी चिंता व्यक्त की और ऋषि नारद से पुत्रप्राप्ति का उपाय पूछा । ऋषि ने उनसे कहा कि वे वरुण देवता की प्रार्थना-अर्चना करें जो प्रसन्न होकर उन्हें पुत्रोत्पत्ति का वरदान देंगे ।

राजा ने वही मार्ग अपनाया । कालांतर में वरुण देवता प्रकट हुए और राजा ने उनसे कहा कि वे उन्हें पुत्र का वरदान दें जिसको लेकर वे उनका यजन (यज्ञ) करेंगे ।

टिप्पणी – जहां तक मैं जानता हूं वैदिक काल में यज्ञ में किसी प्रकार के जीवधारी की बलि देना आवश्यक नहीं होता था । फिर भी पशुबलि का उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में मिलता है । लेकिन जिस कथा का मैं जिक्र कर रहा हूं उसमें वर्णित घटनाक्रम से प्रतीत होता है कि राजा का विचार अपने भावी पुत्र की ही बलि देने का था । कदाचित वे मतिभ्रम में एक अनुचित वचन वरुणदेव को दे बैठे । इसी कथा में यह उल्लेख भी पढ़ने में आता है कि निंद्य कहते हुए नरबलि को संपन्न करने को कोई तैयार नहीं था ।

कालांतर में राजा के यहां पुत्र जन्म हो गया । तब वरुण देवता प्रकट होकर राजा को उनके संकल्प की याद दिलाई और नवजात को लेकर यज्ञ संपन्न करने को कहा । राजा ने कहा, “अभी तो अशौच की स्थिति है अतः उससे यज्ञ अनुमत नहीं है ।”

देवता वरुण मान गये । 10-दिनी अशौच पूर्ण होने पर वे पुनः प्रकट हुए और उन्होंने राजा को यज्ञ की याद दिलाई । राजा ने इस बार कहा, “किसी पशु की बलि तब तक नहीं दी जाती जब तक उसके दांत न निकल आवें । अतः दांत तो निकलने दीजिए ।”

ठीक है कहते हुए देवता चले गये । जब उस बच्चे के दांत कुछ वर्षों में निकल गये वे पुनः आए और राजा को संकल्प की याद दिलाई । इस बार राजा ने फिर बहाना बनाया और कहा, “जब पशु के आरंभिक (दूध के) सभी दांत गिर जावें तभी उसे यज्ञ में दिया जा सकता है ।”

तथास्तु कहते हुए देवता लौट गये । जब उसके दांत गिर गए तो वरुणदेव ने पुनः राजा को वादे की याद दिलाई । राजा को पुत्रमोह हो चला था, अतः उन्होंने नया बहाना पेश किया । वे बोले, “जब बालक के स्थाई दांत निकल आवें तभी उसका यजन किया जाना चाहिए ।”

इस बार फिर वरुण देवता लौट गए । समयांतर पर बालक के स्थाई दांत आ गये । राजा को उसका संकल्प स्मरण कराने देवता प्रकट हुए । राजा बोले, “हे देव, जब बालक धनुर्विद्या, युद्धकला आदि क्षत्त्रियोचित संस्कार प्राप्त कर ले तो उसके बाद मैं उससे आपका यजन करूंगा ।”

बालक का नाम रोहित था और जब वह उक्त प्रकार से सुसंस्कृत हो गया तो वरुण ने अपनी मांग पुनः दोहराई । इस बार राजा कोई बहाना नहीं बना सके । उन्होंने पुत्र रोहित को पास बुलाकर कहा, “बेटा, मैंने वरुण देवता के वरदान से तुम्हें प्राप्त किया । तब मैंने उन्हें वचन दिया था कि मैं तुम्हें बलि के रूप उन्हें सोंप दूंगा । निःसंदेह यह मेरे पाप-वचन थे । अब मुझे यजन करना ही है ।”

कुमार रोहित को यह प्रस्ताव स्वीकार्य नहीं था । उसने अपना धनुषादि आयुध उठाए और चला गया वन की ओर । एक वर्ष तक वह देशाटन करता रहा । अलग-अलग स्थलों पर गया, विभिन्न घटनाओं का अनुभव किया । इसी दौरान वरुणदेव के रोष के फलस्वरूप राजा हरिश्चंद्र रोगग्रस्त हो गए । वर्ष बीतते-बीतते रोहित ने पिता के अस्वस्थ होने का समाचार लोगों के मुख से सुना । वह घर लौटने को उद्यत हुआ । वापसी के मार्ग में ब्राह्मण भेष धारण करके इंद्र देवता उससे मिले, जिन्होंने उसे घर जाने के बजाय पुनः पर्यटन-देशाटन करते रहो की सलाह दी । ब्राह्मण ने उसको ज्ञानोपदेश दिया –

नानाश्रान्ताय श्रीरस्तीति रोहित शुश्रुम ।

पापो नृषद्वरो जन इन्द्र इच्चरतः सखा चरैवेति ॥

(ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय 3, खण्ड 3)

(रोहित, श्रान्ताय नाना श्रीः अस्ति इति शुश्रुम, नृषद्वरः जनः पापः, इन्द्रः इत् चरतः सखा, चर एव इति ।)

अर्थ – हे रोहित, परिश्रम से थकने वाले व्यक्ति को भांति-भांति की श्री यानी वैभव/संपदा प्राप्त होती हैं ऐसा हमने ज्ञानी जनों से सुना है । एक ही स्थान पर निष्क्रिय बैठे रहने वाले विद्वान व्यक्ति तक को लोग तुच्छ मानते हैं । विचरण में लगे जन का इन्द्र यानी ईश्वर साथी होता है । अतः तुम चलते ही रहो (विचरण ही करते रहो, चर एव) ।

            मेरा सोचना है कि ‘श्री’ से यहां मतलब केवल भौतिक संपदा से नहीं है बल्कि स्थान-स्थान पर विचरण करने से प्राप्त ज्ञान, भांति-भांति के लोगों से प्राप्य अनुभव, उनसे सीखे गए कर्म-संपादन का कौशल, आदि से होगा । इंद्र रोहित को बताना चाहते हैं कि सम्मान उसी को मिलता है जो कर्मठ हो, अपने लिए संपदा स्वयं अर्जित करे, दूसरों पर आश्रित न हो । वह स्वयं को अकेला न समझे बल्कि दैव (ईश्वर) पर भरोसा करे ।

ब्राह्मण के उपदेशों से प्रभावित होकर रोहित पुनः देश-प्रदेश में विचरण करने लगा ।

विचरण का यह सिलसिला चार बार और चलता है । प्रत्येक वर्ष के बाद जब रोहित घर लौटने की सोचता है तो मार्ग में फिर ब्राह्ण रूपधारी इन्द्र मिलते हैं जो पुनः “चरैवेति” की सलाह देते हैं । कथा का शेष भाग देखें अगली ब्लॉग-प्रविष्टि में ।

यहां इतना और जोड़ दूं कि “चरैवेति” श्लोकों की व्याख्या ऐतरेय ब्राह्मण गंथ के सायण-भाष्य पर आधारित है । – योगेन्द्र जोशी

मे प्राण मा विभेः (अथर्ववेद) – भय से मुक्ति हेतु आत्मप्रेरणा के मंत्र

अथर्ववेद में सुख-संपदा, स्वास्थ, शत्रुविनाश आदि से संबंधित अनेकों मंत्रों का संग्रह है । सामान्यतः ये मंत्र किसी न किसी प्रकार के कर्मकांड से जुड़े देखे जा सकते हैं । इस वेद के दूसरे कांड में मुझे आत्मप्रेरणा के मंत्र पढ़ने को मिले हैं । ग्रंथ के सायणभाष्य से मैं जो समझ पाया उसके अनुसार ये भोजन आरंभ करते समय उच्चारित किए जाने चाहिए । आगे इनका उल्लेख कर रहा हूं:

यथा द्यौश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥1॥

(द्यौश्च = द्यौः च, बिभीतो = बिभीतः, एवा = एवं)

यथाहश्च रात्रीं च न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥2॥

(यथाहश्च = यथा अहः च )

यथा सूर्यश्च चन्द्रश्च न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥3॥

(सूर्यश्च = सूर्यः च, चन्द्रश्च = चन्द्रः च)

यथा ब्रह्म च क्षत्रं च न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥4॥

यथा सत्यं चानृतं न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥5॥

(चानृतं = च अनृतं)

यथा भूतं च भव्यं च न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥6॥

(अथर्ववेद, काण्ड 2, सूक्त 15) 

अर्थ:

(1) जिस प्रकार आकाश एवं पृथिवी न भयग्रस्त होते हैं और न इनका नाश होता है, उसी प्रकार हे मेरे प्राण तुम भी भयमुक्त रहो ।

(2) जिस प्रकार दिन एवं रात को भय नहीं होता और इनका नाश नहीं होता, उसी प्रकार हे मेरे प्राण तुम्हें भी भय नहीं होवे ।

(3) जिस प्रकार सूर्य एवं चंद्र को भय नहीं सताता और इनका विनाश नहीं होता, उसी भांति हे मेरे प्राण तुम भी भय अनुभव न करो ।

(4) जैसे ब्रह्म एवं उसकी शक्ति को कोई भय नहीं होता और उनका विनाश नहीं होता, वैसे ही हे मेरे प्राण तुम भय से मुक्त रहो ।

(5) जैसे सत्य तथा असत्य किसी से भय नहीं खाते और इनका नाश नहीं होता, वैसे ही हे मेरे प्राण तुम्हें भी भय नहीं होना चाहिए ।

(6) जिस भांति भूतकाल तथा भविष्यत्काल को किसी का भय नहीं होता और जिनका विनाश नहीं होता, उसी भांति हे मेरे प्राण तुम भी भय से मुक्त रहो ।

इन मंत्रों में प्रकृति की विविध मूर्तिमान वस्तुओं और अमूर्त भावों का उल्लेख है वे मनुष्य की भांति व्यवहार नहीं करते हैं । उनके लिए भय और विनष्ट होने के भाव का कोई अर्थ नहीं है । मेरी समझ में उनका उल्लेख यह दर्शाने के लिए है कि वे सब अपने-अपने प्रकृति-निर्धारित कार्य में संलग्न रहते हैं । वह किसी भी संभावना से अपने धर्म से विचलित नहीं होते । (प्रकृति में जिससे जिस व्यवहार अथवा कर्म की अपेक्षा की जाती है वह उसका धर्म कहलाता है, जैसे जल का धर्म है गीला करना, अग्नि का धर्म है जलाना, आदि ।)

मैं इन मंत्रों की व्याख्या कुछ यों करता हूं: वैदिक ऋषि इन मंत्रों के माध्यम से स्वयं को यह बताता है कि प्रकृति की सभी वस्तुएं अपने-अपने कार्य-संपादन में अविचलित रूप से निरंतर लगी रहती हैं । वह अपने मन को समझाता है कि वह इन सब से प्रेरणा ले और निर्भय होकर अपने कर्तव्यों का निर्वाह करे ।

उपर्युक्त चौथे मंत्र में “ब्रह्म”एवं “क्षत्र”का उल्लेख है । संबंधित मंत्र के सायणभाष्य में इन शब्दों के अर्थ वर्ण व्यवस्था के “ब्राह्मण”तथा “क्षत्रिय”क्रमशः लिए गए हैं । मुझे इन शब्दों के अर्थ क्रमशः सृष्टि के मूल ब्रह्म एवं उसकी शक्ति लेना अधिक सार्थक लगते हैं । इन संस्कृत शब्दों के ये अर्थ भी होते हैं । ध्यान दें कि इन मंत्रों में जोड़े में वस्तुओं/भावों का उल्लेख हुआ है । केवल दो ही वर्णों (वर्ण व्यवस्था के ब्राह्मण आदि) का उल्लेख मुझे इस तथ्य के अनुरूप नहीं लगा । अतः ब्रह्म एवं उसकी सामर्थ्य-क्षमता मुझे अधिक सार्थक लगते है ।

पांचवें मंत्र में सत्य एवं असत्य विद्यमान हैं । सत्य और असत्य भी कभी बदलते नहीं हैं । जो सत्य है वह सदैव के लिए सत्य है और असत्य सदा के लिए असत्य रहता है । इसी प्रकार अंतिम मंत्र में भूत एवं भविष्य का उल्लेख है । जो हो चुका (भूत) वह “न हुआ”नहीं किया जा सकता है, ओर जो होने वाला है (भविष्य) वह भी नियत बना रहना है । – योगेन्द्र जोशी

 

ऋग्वेद में औषधीय वनस्पतियों की प्रार्थना (2)

अपने चिट्ठे की पिछली प्रविष्टि (21 मार्च 2014) में मैंने चर्चा की थी कि ऋग्वेद में औषधीय वनस्पतियों की प्रार्थना से संबंधित कुछ ऋचाएं पढ़ने को मिलती हैं । उस आलेख में मैंने तीन ऋचाओं का उल्लेख किया था । इस स्थल पर मैं अतिरिक्त तीन ऋचाएं प्रस्तुत कर रहा हूं ।

आगे बढ़ने से पहले मैं यह स्पष्ट कर दूं कि वैदिक ऋषिगण प्रकृति के हर घटक में, जंगम (गतिशील) एवं स्थावर (स्थिर)  कृतियों में, अधिष्ठाता दैवी शक्तियों के अस्तित्व होने का विश्वास करते थे । उनके मत में दैवी शक्तियां वस्तुविशेष के गुणधर्मों पर नियंत्रण रखती हैं । वे मानते थे जिस किसी वस्तु का उपयोग किया जा रहा हो उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जानी चाहिए, उसके प्रति कल्याणप्रद बने रहने की प्रार्थना की जानी चाहिए । प्रकृति को मात्र भोग्य वस्तुओं के संग्रह के रूप में न देखकर उसको हमारे अस्तित्व के चेतन आधार के तौर देखा जाना चाहिए । औषधीय वनस्पतियों के प्रति प्रार्थनाभाव इसी मान्यता से प्रेरित रहा है । इस प्रसंग में प्रस्तुत है एक ऋचा:

          मा वो रिषत्खनिता यस्मै चाहं खनामि वः ।

          द्विपच्चतुष्पदस्माकं सर्वमस्त्वनातुरम् ॥20

          (ऋग्वेद, मण्डल 10, सूक्त 97)

          (अहं खनिता यस्मै च वः खनामि वः मा रिषत् द्विपद्- चतुः-पद् सर्वम् अस्माकं अनातुरम् अस्तु ।)

अर्थः (हे औषधीय वनस्पति) मैं भूमि का खनन करने वाला, और जिसके लिए यह कार्य करता हूं वह, तुम्हारी हिंसा न करें, तुम्हारा नाश न करें । हमसे संबंधित द्विपद (मनुष्यगण) एवं चतुष्पद (पशुगण) रोगमुक्त रहें ।

ओषधि प्राप्ति के लिए भूमि का खननकर्ता वनस्पतियों को हानि तो पहुंचाता ही है । कदाचित प्रार्थना के माध्यम से वह अपनी विवशता व्यक्त करता है । शायद वह यह कहना चाहता है कि अवांझित तौर पर वनस्पतियों को नुकसान पहुंचाना उसका उद्येश्य नहीं । वनस्पतियों को अनावश्यक रूप से नष्ट नहीं करना चाहता है, उनका समूल उच्छेदन नहीं करना चाहता । खननकर्ता के कार्य को हिंसा के तौर पर न देखा जाए । इसके आगे उसकी प्रार्थना है कि औषधियां उससे संबंधित सभी जनों (द्विपद) और पशुसंपदा (चतुष्पद, चौपाये) को रोगमुक्त रखें । अगली ऋचा है:

याश्चेदमुपशृण्वन्ति याश्च दूरं परागताः ।

सर्वाः संगत्य वीरुधोऽस्यै सं दत्त वीर्यम् ॥21

(यथा उपर्युक्त)

(याः च इदम् उपशृण्वन्ति याः च दूरं परागताः सर्वाः वीरुधः संगत्य अस्यै वीर्यम् सं-दत्त ।)

अर्थः इस स्तुति को जो औषधीय लताएं सुन रही हों अथवा जो दूरस्थ हों वे सभी मिलकर इस रोगी को बल प्रदान करें ।

उक्त ऋचा में खननकर्ता द्वारा निकटवर्ती और दूरस्थ औषधीय वनस्पतियों से प्रार्थना की गई है कि वे सभी मिलकर रोगी को रोगमुक्त करें । यहां लता नाम से उन्हें संबोधित किया गया है । लताओं को कदाचित औषधीय गुणों से युक्त सभी वनस्पतियों के प्रतिनिधि के तौर पर देखा गया है । अन्यथा ओषधियां लता से भिन्न रूपों में भी पाई जाती हैं । अंतिम तीसरी ऋचा यों हैः

ओषधयः सं वदन्ते सोमेन सह राज्ञा ।

यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्तं राजन् पारयामसि ॥22

(यथा उपर्युक्त)

(ओषधयः सं-वदन्ते सोमेन राज्ञा सह ब्राह्मणः यस्मै कृणोति तं राजन् पारयामसि ।)

अर्थः सभी ओषधियां राजा सोम के साथ संवाद करती हैं कि हे राजा विशेषज्ञ ब्राह्मण अर्थात वैद्य जिसकी चिकित्सा करें उसे हम रोगों के पार करते हैं ।

सोम चंद्रमा का पर्याय है और उसे औषधीय वनस्पतियों का राजा अथवा अधिष्ठाता देवता माना गया है । इस ऋचा में ओषधियों का अपने राजा चंद्र के साथ संवाद की कल्पना की गई । उनका कथन है कि वे रोग-निवारण में निपुण वैद्य के माध्यम से रोगी को रोगमुक्त करती हैं । प्राचीन काल में वैद्यकी सामान्यतः ब्राह्मणों के कार्यक्षेत्र में रहा होगा ।

वैदिक समाज में भोजन करते, ओषधि सेवन करते, अथवा अन्य कार्य संपन्न करते समय संबंधित वस्तुओं के प्रति कृतज्ञता या प्रार्थना व्यक्त करने की परंपरा रही है । – योगेन्द्र जोशी

 

ऋग्वेद में औषधीय वनस्पतियों की प्रार्थना (1)

          मैंने अपने चिट्ठे की एक प्रविष्टि (31 जनवरी 2010) में औषधीय वनस्पतियों की प्रार्थना संबंधी यजुर्वेद में उपलब्ध मंत्रों का उल्लेख किया था । भावात्मक तौर पर उनसे साम्य रखने वाली ऋचाएं मुझे ऋग्वेद में भी देखने को मिली हैं । मैं उन्हीं में से चुनी हुई कुछएक की चर्चा यहां पर कर रहा हूं:

          याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्चपुष्पिणीः ।

          बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः ॥15

           (ऋग्वेद, मण्डल 10, सूक्त 97)

          (याः फलिनीः याः अफलाः याः अपुष्पाः पुष्पिणीः च बृहस्पति-प्रसूताः ता अंहसः नः मुञ्चन्तु ।)

अर्थ – फलने वाली जो वनस्पतियां हैं या जिन पर फल नहीं लगते हैं, जो पुष्पित नहीं होती अथवा जिन पर फूल खिलते हैं, देव बृहस्पति-जनित ऐसी सभी वनस्पतियां हमें रोगों से मुक्त रखें ।

सभी वनस्पतियां फूलती नहीं हैं, और जो फूलती हैं उन पर फल लगें ही यह भी आवश्यक नहीं हैं । इस मंत्र में औषधीय गुणों वाली ऐसी समस्त वनस्पतियों से प्रार्थना की गई है कि वे उनके समुदाय को रोगों से मुक्त रखें । वैदिक चिंतकों की मान्यतानुसार सृष्टि के सभी तंत्र अपने-अपने अधिष्ठाता देवता से संबद्ध रहते हैं, और वनस्पतियों को उनके औषधीय गुण बृहस्पति देवता से प्राप्त रहते हैं ।

          मुञ्चन्तु मा शपथ्यादथो वरुण्यादुत ।

          अथो यमस्य षड्बीशात् सर्वस्माद्देवकिल्बिषात् ॥16

           (यथा उपर्युक्त)

           (मा शपथ्यात् मुञ्चन्तु अथो वरुण्यात् उत अथो यमस्य षड्बीशात् सर्वस्मात् देवकिल्बिषात् ।)

अर्थ – औषधियां मुझे शापजनित रोग से मुक्त करें, बल्कि वरुण देवता के शाप से भी दूर रखें, यम देवता की बेड़ियों से मुक्त रखें, इतना ही नहीं समस्त दैवप्रदत्त पापों को मुझसे दूर रखें ।

मनुष्य के कष्ट तीन प्रकार के गिनाए गए हैं: आधिभौतिक, आधिदैविक, एवं आघ्यात्मिक । दूसरे मनुष्यों अथवा संसार के अन्य प्राणियों के कारण जो भौतिक कष्ट भोगना पड़ता है उसे आधिभौतिक कहा जाता है । देवताओं के रोष से जो कष्ट भोगना पड़ता है उसे आधिदैविक की संज्ञा दी गई है । अधिकांश कष्टों की अनुभूति इंद्रियों के माध्यम से अनुभव में आती है । इनके अतिरिक्त कभी-कभी विशुद्ध मानसिक कष्ट भी भोगने पड़ते हैं; इन्हीं को आघ्यात्मिक कहा जाता है । ये कष्ट वस्तुतः मन के विकारों के कारण पैदा होते हैं, और उनका कोई स्पष्ट बाह्य कारण नहीं रहता है । उक्त मंत्र में इन सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति की प्रार्थना की गई है । शापजनित कष्ट उसे समझा जा सकता है जो दूसरों के द्वारा कर्मणा अथवा वाचा किसी को पहुंचाया जाता है । दूसरे के अहित की भावना भी कदाचित कष्ट का कारण बन सकता है । इन सभी को शापमूलक मान सकते हैं । वरुण को हाथ में बंधन (फंदा) लिए हुए पश्चिम दिशा का (समुद्र का भी) अधिष्ठाता देवता माना गया है । वरुण देवता के शाप का ठीक-ठीक अर्थ क्या है मैं समझ नहीं पाया । कदाचित जलजनित रोगों से तात्पर्य हो । यम देवता का शाप का अर्थ यही होगा कि उनके रूप में मुत्यु हर क्षण मनुष्य का पीछा करती है । औषधियां कष्टों अथवा मृत्यु के निमित्त बने रोगों से हमें दूर रखती हैं । मनुष्य के अनुचित कर्मों के फल को देवताओं द्वारा दंड-स्वरूप प्रदत्त पाप कहा गया होगा ऐसा मेरा सोचना है ।

           अवपतन्तीरवदन् दिव ओषधयस्परि ।

           यं जीवमश्नवामहै न स रिष्याति पूरुषः ॥17

           (यथा उपर्युक्त)

           (दिव अवपतन्तीः ओषधयः परि अवदन् यं जीवम् अश्नवामहै स पूरुषः न रिष्याति ।)

अर्थ – द्युलोक से धरती पर उतरती औषधियां वचन बोलती हैं कि जिस जीव को हम व्याप्त या आच्छादित कर लें उस पुरुष का विनाश नहीं होता ।

व्याप्त (वि+आप्त) का अर्थ यहां प्राप्त होना लिया जा सकता है । मेरा सोचना है कि प्राचीन मनीषी वनस्पतियों के औषधीय गुण स्वर्ग की देन मानते होंगे । धरती पर होने वाली घटनाएं देवताओं के नियंत्रण में होती हैं, अतः ये औषधियां भी देवों की प्राणियों पर अनुकंपा के परिणाम प्राणियों को प्राप्त होती हैं । स्वर्ग से धरती पर उतरने वाली औषधियां जो कहती हैं उसे वस्तुतः उनके अधिष्ठाता देवता का कथन माना जाना चाहिए । इस कथन में ये उद्गार प्रतिबिंबित होते हैं कि मनुष्य के नाश का कारण अंततः रोग हैं जिन्हें औषधियां दूर कर देती हैं । नीरोग व्यक्ति ही दीर्घजीवी हो सकता है और वही अपने एवं समाज के लिए फलदायी कार्य संपन्न करने में समर्थ होता है । – योगेन्द्र जोशी

“ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् …” – समाज में वर्ण-व्यवस्था संबंधी ऋग्वैदिक वचन

वर्णाश्रम हिन्दुओं में प्रचलित एक ऐसी प्राचीन समाजिक व्यवस्था है जिसे आज की सामाजिक वास्तविकता के परिप्रेक्ष में समझ पाना कठिन है । इस व्यवस्था के दो पक्ष रहे हैं, पहला है श्रम अथवा कार्य विभाजन के आधार पर सामुदायिक स्तर के दायित्वों की 4 श्रेणियों का निर्धारण करना । इसे वर्ण व्यवस्था के नाम से जाना जाता है । दूसरा है वह पहलू जिसका संबंध इन बातों से रहता है कि मनुष्य अपनी उम्र के अलग-अलग पड़ावों पर किन दायित्वों को निभाए, कैसी दिनचर्या अपनाए, और कैसे जीवन के अपरिहार्य अवसान के लिए स्वयं को तैयार करे । ये बातें 4 कालखंडों की आश्रम व्यवस्था से संबंधित रहती हैं । मैं इस स्थल पर ऋग्वेद की उस ऋचा का उल्लेख कर रहा हूं जिसमें चारों वर्णों की बात की गई है:

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः ।

ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रोऽजायतः ॥

(ऋग्वेद संहिता, मण्डल 10, सूक्त 90, ऋचा 12)

(ब्राह्मणः अस्य मुखम् आसीत् बाहू राजन्यः कृतः ऊरू तत्-अस्य यत्-वैश्यः पद्भ्याम् शूद्रः अजायतः ।)

यदि शब्दों के अनुसार देखें तो इस ऋचा का अर्थ यों समझा जा सकता है:

सृष्टि के मूल उस परम ब्रह्म का मुख ब्राह्ण था, बाहु क्षत्रिय के कारण बने, उसकी जंघाएं वैश्य बने और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुआ ।

क्या उक्त ऋचा की व्याख्या इतने सरल एवं नितांत शाब्दिक तरीके से किया जाना चाहिए ? या यह बौद्धिक तथा दैहिक श्रम-विभाजन पर आधारित एक अधिक सार्थक सामाजिक व्यवस्था की ओर इशारा करती है ? मैं आगे अपना मत व्यक्त करूं उससे पहले यह बताना चाहता हूं कि किंचित् अंतर के साथ इस ऋचा से साम्य रखने वाला श्लोक मनुस्मृति में भी उपलब्ध है:

लोकानां तु विवृद्ध्यर्थं मुखबाहूरूपादतः ।

ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं च निरवर्तयत् ॥

(मनुस्मृति, अध्याय 1, श्लोक 31)

(लोकानां तु विवृद्धि-अर्थम् मुख-बाहू-ऊरू-पादतः ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं च निर्-अवर्तयत् ।)

शाब्दिक अर्थ: समाज की वृद्धि के उद्येश्य से उसने (ब्रह्म ने) मुख, बाहुओं, जंघाओं एवं पैरों से क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र का निर्माण किया ।

मेरी अपनी धारणा है कि उक्त चार वर्णों के पुरूषों का शरीरतः जन्म ब्रह्मा के चार कथित अंगों से हुआ है ऐसा मंतव्य उल्लिखित ऋग्वैदिक ऋचा में निहित नहीं होना चाहिए । मैं समझता हूं कि ये चार अंग श्रम विभाजन के चार श्रेणियों को व्यक्त करते हैं । ध्यान दें कि मनुष्य का मुख लोगों को शिक्षित करने, उन्हें उचितानुचित की बातें बताने, उन्हें अध्यात्म एवं दर्शन का जानकारी देने जैसे कार्य की भूमिका निभाता है । तदनुसार मुख  ब्राह्मणोचित बौद्धिक कार्यों में संलग्नता का द्योतक है, जिसमें शारीरिक श्रम गौण होता है । इसी प्रकार भुजाओं को राज्य की बाह्य आक्रांताओं से रक्षा करने, नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करने, समाज-विरोधी तत्वों पर नियंत्रण रखने जैसी भूमिका का द्योतक समझा जाना चाहिए । ये ऐसे कार्य हैं जिनमें अच्छी शारीरिक सामर्थ्य के साथ प्रत्युत्पन्नमतिता की बाद्धिक क्षमता की आवश्यकता अनुभव की जाती है । प्राचीन ग्रंथों में इनको क्षत्रियोचित कार्य कहा गया है ।

ऋचा में उल्लिखित शब्द जंघाओं (जांघों) को मैं तीसरी श्रेणी के कार्यों से जोड़ता हूं । ये कार्य हैं नागरिकों के भोजन हेतु कृषि कार्य में लगना, उनकी रोजमर्रा की जरूरतों की पूर्ति करना, वाणिज्यिक कार्यों को संपन्न करना आदि । इन कार्यों में व्यापार विशेष के योग्य सामान्य बुद्धि की भूमिका प्रमुख रहती है और शारीरिक श्रम की विशेष आवश्यकता नहीं होती । इन्हें वैश्यों के कार्य कहा गया है । इन सब के विपरीत वे कार्य भी समाज में आवश्यक रहे हैं, जिनमें अतिसामान्य प्रकार की बौद्धिक क्षमता पर्याप्त रहती है और जिनमें शारीरिक श्रम ही प्रायः आवश्यक होता है । मनुष्य के पांव श्रमिकोचित कार्य के द्योतक के तौर पर देखे जा सकते हैं । हाथों का कार्य प्रायः हस्तकौशल के साथ संपादित किए जाते हैं, किंतु पांव से कार्य लेना सामान्यतः मात्र श्रमसाध्य होते हैं । दूसरों को विविध सेवाएं देने वाले इस वर्ग के लोगों को शूद्र कहा गया ।

समाज में बौद्धिक एवं दैहिक श्रम के उपयोग को मोटे तौर पर उपर्युक्त प्रकार से विभाजित किया जा सकता है । हम कह सकते हैं कि ब्रह्म अर्थात् परमात्मा ने इस विभाजन के साथ ही मानव समाज की रचना की है ।

इस तथ्य को भी ध्यान में रखना चाहिए कि आज हिन्दू समाज में सैकड़ों प्रकार की जातियां देखने को मिलती हैं । ऐसे जातीय विभाजन का जिक्र प्राचीन साहित्य में नहीं मिलता । कदाचित् इस विभाजन को समय के साथ समाज में घर कर गई विकृति के तौर पर देखा जाना चाहिए । प्राचीन भारत में समाज चार वर्णों में विभक्त था और उसी का उल्लेख प्राचीन साहित्य में मिलता है ।

जिस प्रकार के कार्य में किसी परिवार के सदस्य संलग्न हों कदाचित् वही आगे की पीढ़ियां भी सीखती होंगी । ऐसा समाज में आज भी कुछ हद तक देखने को मिलता है । कुछ समय पहले तक कई व्यवसाय पीढ़ी दर पीढ़ी चलते रहे हैं । अब स्थितियां कुछ बदल गई हैं । शायद समय के साथ वर्ण विशेष परिवारों की विशिष्टता बन गया हो और ब्राह्मण के बेटा ब्राह्मण आदि की परंपरा ने जन्म लिया हो । – योगेन्द्र जोशी

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