“वसुधैव कुटुम्बकम् …” – पंचतंत्र ग्रंथ में मूर्ख पंडितों की कथा

अपने भारत देश की सभ्यता-संस्कृति की प्रशंसा में अनेक जनों को तरह-तरह के नीति-वाक्यों के दृष्टांतों के साथ बोलते हुए मैंने सुना हैं। “वसुधैव कुटुम्बकम्”, “परोपकाराय सतां विभूतयः”, “अतिथिदेवो भव”, “सत्यमेव जयते” इत्यादि नीति-वाक्यों का उल्लेख करते हुए वे देखे जा सकते हैं। इन कथनों के माध्यम से वे यह जताने की कोशिश करते हैं कि हमारे समाज की मान्यताएं तो सर्वश्रेष्ठ रही हैं। इस संदर्भ में मैं अपने वर्तमान गृह मंत्री को शीर्ष पर रखता हूं। वे हर मौके पर ऐसी उक्तियों से भारतीय समाज की प्रशंसा करते हैं।

इन नीति वचनों को कहने वाले उन प्रसंगों को नजरअंदाज करते हैं जो प्राचीन संस्कृत साहित्य में इनसे संबंधित रहे हैं। उदाहरणार्थ “सत्यमेव जयते” (शुद्ध ‘जयति’ है) को ही ले लीजिए। इस पर मैंने एक आलेख बहुत पहले लिखा था (देखें मेरी ब्लॉग-पोस्ट 4/10/2008)। यह उक्ति मुण्डक उपनिषद्‍ के एक मंत्र का वाक्यांश है। मंत्र में यह संदेश है कि मोक्ष (वैदिक मान्यतानुसार परमात्मतत्त्व में एकाकार हो जाना) का पात्र वही ज्ञानी हो सकता है जो सत्य के मार्ग पर चलता है। इस व्यवहारिक संसार से इस मंत्र का कोई संबंध नहीं है। संसार में तो सत्य-असत्य दोनों ही साथ-साथ चलते हैं। लेकिन आम धारणा है कि संसार में सत्य की विजय होती है।

इसी प्रकार “वसुधैव कुटुम्बकम्” श्रीविष्णुशर्मा-रचित “पञ्चचतन्त्रम्” की एक कथा से संबंधित है। इस कथन से यह निष्कर्ष निकालना भूल होगी कि भारतीय समाज में ऐसी कोई भावना व्याप्त रही थी और है। यह कथन एक विशेष अवसर पर किसी व्यक्ति के अपने मित्रों को बोले गये उद्गार का एक अंश है।

“वसुधैव कुटुम्बकम्” उक्ति के मूल को समझने के लिए उस कथा का उल्लेख करना समीचीन होगा जो पंचतंत्र में वर्णित है। संक्षेप में वह कथा इस प्रकार है:

एक ग्राम में परस्पर मित्र चार युवा रहते थे। उनकी मित्रता बहुत गहरी थी और वे यथासंभव एक-दूसरे के साथ बने रहते थे। उनमें से एक बुद्धिमान था किन्तु संयोग से अन्य तीन की भांति विद्याध्ययन नहीं कर सका। अन्य तीनों ने विभिन्न कलाओं में दक्षता अर्जित कर ली। किन्तु अपने ज्ञान का उपयोग कब एवं किस प्रयोजन के लिए यह समझने की सहज बुद्धि उनमें नहीं थी।

एक बार उन मित्रों के मन में विचार आया कि अर्जित विद्या का उपयोग तो गांव में हो नहीं सकता, इसलिए क्यों न देश-परदेश जाकर उसके माध्यम से धनोपार्जन किया जाए। चूंकि चौथे मित्र ने विद्या अर्जित नहीं की थी इसलिए उनमें से एक बोला, “हम तीन चलते हैं; इस विद्याहीन को साथ ले जाना बेकार है। हम धन कमाएं और उसका एक हिस्सा इसे भी दें यह ठीक नहीं होगा।”

दूसरे ने सहमति जताते हुए चौथे से कहा, “मित्र, तुम विद्याबल से धन कमा नहीं सकते इसलिए तुम साथ मत चलो और यहीं रहो।”

तीसरा उदार विचारों वाला था। उसने कहा, “हम चारों बाल्यावस्था से घनिष्ठ मित्र रहे हैं। संयोग से यह विद्याध्ययन नहीं कर सका तो इसका अर्थ यह नहीं कि हम इसे छोड़ दें। धन-संपदा की सार्थक उपयोगिता इसी में है कि उसका उपभोग औरों के साथ मिल-बांटकर किया जाये। अतः हमारा यह मित्र भी साथ चलेगा।”

पंचतंत्र के रचयिता ने उदारता की उक्त नीति को इस तीसरे मित्र के मुख से इस प्रकार से कहलवाया है:

किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला ।

या न वैश्येव सामान्या पथिकैरुपभुज्यते ॥३६॥

(पञ्चतन्त्रम्, चतुर्थ तंत्र “लब्धप्रणाशम्)

(किम्‍ तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूः इव केवला, या न वैश्या इव सामान्या पथिकैः उपभुज्यते ।)

अर्थ – उस लक्ष्मी (धन) का क्या करना जो केवल (घर की) वधू की तरह हो, जो वैश्या की तरह आम यात्रियों के लिए उपभोग्य न हो।

यहां लक्ष्मी से तात्पर्य है धन से न कि विष्णुपत्नी देवी लक्ष्मी से। धन की उपयोगिता दो प्रकार से हो सकती है: प्रथम है कि वह केवल अपने मालिक के ही सुखभोग के काम आवे। द्वितीय है कि वह दूसरों के हित साधने में प्रयोग में लिया जाये। अर्थात्‍ व्यक्ति उसे या तो केवल अपने स्वार्थ पूरा करने में प्रयोग में ले अथवा उसे परमार्थ के कार्य में भी लगावे। इन दो संभावनों की उपमा कथाकार ने वधू (जो किसी एक की पत्नी भर होती है) एवं वैश्या (जो हर किसीको उपलब्ध होती है) से की है।

औदार्य की इस भावना के बारे में कथाकार अपने पात्र से यह कहलवाता है:

अयं निजः परो वैति गणना लघुचेतसाम् ।

उदारचरितानान्तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥

(पञ्चतन्त्रम्‍, चतुर्थ तंत्र “लब्धप्रणाशम्‍)

(अयम् निजः परः वा इति गणना लघु-चेतसाम् उदार-चरितानाम् तु वसुधा एव कुटुम्बकम् ।)

अर्थ – यह अपना है या पराया है ऐसा आकलन छोटे दिल वालों का होता है। उदार चरित्र वालों के लिए तो पूरी पृथ्वी ही उनका कुटुम्ब होती है।

आम तौर पर कुटुम्ब (कुटुम्बक) का अर्थ परिवार से लिया जाता है, जिसमें पति-पत्नी एवं संतानें और कदाचित् बुजुर्ग माता-पिता। मनुष्य इन्हीं के लिए धन-संपदा अर्जित करता है। कुछ विशेष अवसरों पर वह निकट संबंधियों और मित्रों पर भी धन का एक अंश खर्च कर लेता है। किंतु अधिक व्यापक स्तर पर समाज के सभी सदस्यों के हितों के लिए धन खर्च करने का विचार केवल विरले लोगों में देखने को मिल सकता है।

इस श्लोक का निहितार्थ यह है: अमुक तो अपना व्यक्ति है इसलिए उसकी सहायता करनी चाहिए यह धारणा संकीर्ण मानसिकता वालों की होती है। उदात्त वृत्ति वाले तो समाज के सभी सदस्यों के प्रति परोपकार भावना रखते हैं और सामर्थ्य होने पर सभी की मदद करते हैं।

ध्यान दें कि कथा में एक उदार मित्र अपने दो अपेक्षया अनुदार मित्रों के प्रति “वसुधैव कुटुम्बकम्” की बात कहता है। यह कथन किसी लेखक ने यह बताने के लिए नहीं कहा है कि भारतीय समाज में उदात्त वृत्ति व्यापक रही है। कथा में जो कहा है उसे कथा तक ही सीमित रखा जाना चाहिए। उससे यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि भारतीय समाज उदार रहा है।

अंत में कथा का शेष भाग भी संक्षेप में बता दूं: वे चारों मित्र परदेश के लिए चल पड़े। रास्ते में एक स्थान पर उन्हें हड्डियों का ढेर दिखा। उन मित्रों में से एक ने कहा, “अहो, लगता है किसी जीवधारी की मृत्यु यहां हुई। क्यों न उस बेचारे को हम अपनी विद्या के बल पर पुनः जीवन दे दें।”´

ऐसा कहते हुए उसने हड्डियां जोड़कर मृत जीव का अस्थिपंजर खड़ा कर दिया। उसके बाद दूसरे ने त्वचा-मांस आदि प्रदान करके उस जीव का पूरा शरीर तैयार कर दिया। तत्पश्चात्‍ तीसरे ने उसमें प्राणसंचार करने का विचार किया। तब चौथा उन तीन जनों से बोला, “अरे-अरे, ऐसा मत करो। यह तो शेर का शरीर है। इसमें प्राण-संचार हो गया तो जीवित होकर हम सबको मार डालेगा।”

मित्रों ने उसकी बात मानने से इंकार कर दिया। बात मानने से उनकी विद्या का अपमान जो हो जाता। तब उस चौथे मित्र ने कहा, “तनिक ठहरो, मैं पास के पेड़ पर चढ़ता हूं, उसके बाद प्राणसंचार करना।”

उसके पेड़ पर चढ़ने के बाद उन विद्याधारियों की मूर्खता से शेर जीवित हो गया। वे तीनों शेर द्वारा मारे गये और चौथा विद्याहीन किंतु बुद्धिमान बच गया। – योगेन्द्र जोशी

“वित्तं सर्वसाधनम् उच्यते” – पंचतंत्र में धन की महत्ता का वर्णन (3)

संस्कृत नीतिग्रंथ पंचतंत्र के एक प्रकरण में इस बात का उल्लेख पढ़ने को मिलता है कि मनुष्य समाज में धन-संपदा की महत्ता को प्रायः सर्वत्र स्वीकारा जाता है । अपने चिट्ठे की पिछली दो प्रविष्टियों (जून 6 एवं जून 15) में मैंने पंचतंत्र के तत्संबंधित कुछ श्लोकों का जिक्र किया था । यह भी बताया था कि उक्त पुस्तक का एक पशु पात्र (सियार) अपने भाई को पैसे की अहमियत समझाते हुए धनोपार्जन के लिए प्रेरित करता है । अवश्य ही जो बातें कही गई हैं उनमें अतिशयोक्ति है । इसी पुस्तक में अन्यत्र संपदाजनित समस्याओं का उल्लेख भी है, जो यह स्पष्ट करती हैं कि धन को लेकर समाज में मतभिन्नता भी देखने को मिलती है । अतः जो नीतिवचन मौजूदा संदर्भ में कही गई हैं उनका मूल्यांकन स्वविवेक से किया जाना चाहिए । मतभिन्नता संबंधी नीतिवचनों का जिक्र मैं भविष्य में कभी करूंगा । अभी इस चर्चा के अगले एवं अंतिम तीन श्लोक आगे प्रस्तुत कर रहा हूं:

अशनादिन्द्रियाणीव स्युः कार्याण्यखिलान्यपि ।
एतस्मात्कारणाद्वित्तं सर्वसाधनमुच्यते ॥8॥
(पंचतंत्र, मित्रलाभ)
(अशनात् इन्द्रियाणि इव स्युः कार्याणि अखिलानि अपि एतस्मात् कारणात् वित्तं सर्व-साधन् उच्यते ।)

अर्थः भोजन का जो संबंध इंद्रियों के पोषण से है वही संबंध धन का समस्त कार्यों के संपादन से है । इसलिए धन को सभी उद्येश्यों की प्राप्ति अथवा कर्मों को पूरा करने का साधन कहा गया है ।

इस तथ्य को सभी लोग स्वीकार करेंगे कि चाहे धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करने हों या याचकों को दान देेना हो, धन चाहिए ही । शारीरिक स्वास्थ्य, मनोरंजन, एवं सुखसुविधाएं आदि सभी के लिए धन-दौलत चाहिए । आज के जमाने में तो मु्फ्त में सेवा देने वाले अपवाद स्वरूप ही मिलते हैं । एक जमाना था जब सामाजिक कार्य संपन्न करने में परस्पर सहयोग एवं मदद देने की परंपरा थी, परंतु अब सर्वत्र धन का ही बोलबाला है ।

अर्थार्थी जीवलोकोऽयं श्मशानमपि सेवते ।
त्यक्त्वा जनयितारं स्वं निःस्वं गच्छति दूरतः ॥9॥
(यथा उपर्युक्त)
(अर्थ-अर्थी जीवलोकः, अ‌यं श्मशानम् अपि सेवते, त्यक्त्वा जनयितारं स्वं निःस्वं गच्छति दूरतः ।)

अर्थः यह लोक धन का भूख होता है, अतः उसके लिए श्मशान का कार्य भी कार्य करने को तैयार रहता है । धन की प्राप्ति के लिए तो वह अपने ही जन्मदाता हो छोड़ दूर देश भी चला जाता है ।

पंचतंत्र के रचनाकार का मत है कि जीवन-धारण बिना धन के संभव नहीं हैं, अतः मनुष्य धनोपार्जन के लिए कोई भी व्यवसाय अपनाने को विवश होता है । कुछ कामधंधे समाज में अधिक प्रतिष्ठित माने जाते हैं, अतः लोग उनकी ओर दौड़ते हैं और सौभाग्य से उन्हें पा जाते हैं । किंतु सभी भाग्यवान एवं पर्याप्त योग्य नहीं होते । उन्हें उस कार्य में लगना पड़ता है जिसे निकृष्ट श्रेणी का माना जाता है । अथवा धनोपार्जन के लिए घर से दूर निकलना पड़ता है । आज के जमाने में ये बातें सामान्य हो चुकी हैं ।

गतवयसामपि पुंसां येषामर्था भवन्ति ते तरुणाः ।
अर्थे तु ये हीना वृद्धास्ते यौवनेऽपि स्युः ॥10॥
(यथा उपर्युक्त)
(गत-वयसाम् अपि पुंसां येषाम् अर्थाः भवन्ति ते तरुणाः, अर्थे तु ये हीनाः वृद्धाः ते यौवने अपि स्युः ।)

अर्थः उम्र ढल जाने पर भी वे पुरुष युवा रहते हैं जिनके पास धन रहता है । इसके विपरीत जो धन से क्षीण होते हैं वे युवावस्था में भी बुढ़ा जाते हैं ।

इस श्लोक की मैं दो प्रकार से व्याख्या करता हूं । पहली व्याख्या तो यह है धनवान व्यक्ति पौष्टिक भोजन एवं चिकित्सकीय सुविधा से हृष्टपुष्ट एवं स्वस्थ रह सकता है । तदनुसार उस पर बुढ़ापे के लक्षण देर से दिखेंगे । जिसके पास खाने-पीने को ही पर्याप्त न हो, अपना कारगर इलाज न करवा सके, वह तो जल्दी ही बूढ़ा दिखेगा । संपन्न देशों में लोगों की औसत उम्र अधिक देखी गई है । अतः इस कथन में दम है ।

दूसरी संभव व्याख्या यों हैः धनवान व्यक्ति धन के बल पर लंबे समय तक यौनसुख भोग सकता है, चाटुकार उसे घेरे रहेंगे और कहेंगे, “अभी तो आप एकदम जवान हैं ।” कृत्रिम साधनों से भी वह युवा दिख सकता है और युवक-युवतियों के आकर्षण का केंद्र बने रह सकता है । जब मन युवा रहे जो वार्धक्य कैसा ? – योगेन्द्र जोशी

“धनिनां परोऽपि स्वजनायते” – पंचतंत्र में धन की महत्ता का वर्णन (2)

संस्कृत नीतिग्रंथ पंचतंत्र के एक प्रकरण में इस बात का वर्णन मिलता है कि मनुष्य के व्यावहारिक जीवन में धन-संपदा का बहुत महत्त्व है । उक्त तथ्य से संबंधित तीन श्लोकों का उल्लेख मैंने पिछली पोस्ट
में किया है । इस स्थल पर में तीन अन्य श्लोकों की चर्चा कर रहा हूं । ये श्लोक आगे उद्धृत हैं:

इह लोके हि धनिनां परोऽपि स्वजनायते ।
स्वजनोऽपि दरिद्राणां सर्वदा दुर्जनायते ॥5॥
(पंचतंत्र, मित्रलाभ)
(इह लोके हि धनिनां परः अपि स्वजनायते स्वजनः अपि दरिद्राणां सर्वदा दुर्जनायते ।)

अर्थः इस संसार में धनिकों के लिए पराया व्यक्ति भी अपना हो जाता है । और निर्धनों के मामले में तो अपने लोग भी दुर्जन (बुरे अथवा दूरी बनाये रखने वाले) हो जाते हैं ।

उक्त बातें प्राचीन काल में किस हद तक सही रही होंगी यह कहना कठिन है । परंतु आज के विशुद्ध भौतिकवादी युग में ये पूरी तरह खरी उतरती हैं । बहुत कम लोग होंगे जो अपने भाई-बहनों तक के साथ मिलकर अपनी संपदा का भोग करना चाहेंगे । “हम कमाएं और वे खाएं यह भला कैसे हो सकता है ?” यह सोच सबके मन में रहती है । अतः उनसे दूरी बनाए रखने में ही उनकी संपदा परस्पर बंटने से बच सकती है । इसीलिए नीतिकार कहता है कि अगर आप अपनी धनसंपदा खो बैठते हैं तो आपके निकट संबंधी भी आपके नहीं रह जाते हैं । दूसरी ओर किसी धनी से संबंध बढ़ाने में लाभ की संभावना बनी रहती है, इसलिए लोग उसके ‘अपने’ बनने की फिराक में अक्सर देखे जाते हैं ।

अर्थेभ्योऽपि हि वृद्धेभ्यः संवृत्तेभ्य इतस्ततः ।
प्रवर्तन्ते क्रियाः सर्वाः पर्वतेभ्य इवापगाः ॥6॥
(यथा उपर्युक्त)
(अर्थेभ्यः अपि हि वृद्धेभ्यः संवृत्तेभ्य इतः ततः प्रवर्तन्ते क्रियाः सर्वाः पर्वतेभ्य इव आपगाः ।)

अर्थः चारों तरफ से एकत्रित करके बढ़ाये गये धनसंपदा से ही विविध कार्यों का निष्पादन होता है, जैसे पर्वतों से नदियों का उद्गम होता है ।

इस कथन के अनुसार मनुष्य को चाहिए कि वह जैसे भी हो, जहां से भी हो, अपनी धनसंपदा बढ़ाता जाए । जब ढेर सारा धन आपके पास इकट्ठा हो तो उस धन के माध्यम से सभी कार्य एक-एक कर संपन्न होते चले जाएंगे । “हर स्रोत से धन इकट्ठा करे” का अर्थ क्या यह समझा जाए कि आर्थिक भ्रष्टाचार भी मान्य रास्ता है ? शायद हां, तभी तो सर्वत्र भ्रष्टाचार का तांडव देखने को मिल रहा है ।

पूज्यते यदपूज्योऽपि यदगम्यो९पि गम्यते ।
वन्द्यते यदवन्द्योऽपि स प्रभावो धनस्य च ॥7॥
(यथा उपर्युक्त)
(पूज्यते यत् अपूज्यः अपि यत् अगम्यः अपि गम्यते वन्द्यते यत् अवन्द्यः अपि स प्रभावः धनस्य च ।)

अर्थः धन का प्रभाव यह होता है कि जो सम्मान के अयोग्य हो उसकी भी पूजा होती है, जो पास जाने योग्य नहीं होता है उसके पास भी जाया जाता है, जिसकी वंदना (प्रशंसा) का पात्र नहीं होता उसकी भी स्तुति होती है ।

संस्कृत में एक उक्ति है: “धनेन अकुलीनाः कुलीनाः भवन्ति धनम् अर्जयध्वम् ।” अर्थात् धन के बल पर अकुलीन जन भी कुलीन हो जाते हैं, इसलिए धनोपार्जन करना चाहिए । तात्पर्य यह है कि समाज में सामान्य अप्रतिष्ठित व्यक्ति ढेर-सी धनसंपदा जमा कर लेता है तो वह सामाजिक प्रतिष्ठा एवं सम्मान का हकदार हो जाता है । लोग उसके आगे-पीछे घूमना शुरू कर देते हैं । इसके विपरीत प्रतिष्ठित व्यक्ति जब दुर्भाग्य से अपनी संपदा खो बैठता है तो उसे सामाजिक प्रतिष्ठा भी गंवानी पड़ती है । लोग उसका सम्मान करना भूलने लगते हैं, उससे मिलने से भी कतराते हैं ।

धन की महिमा वास्तव में अपरंपार है ! – योगेन्द्र जोशी

“अर्थम् एकं प्रसाधयेत्” – पंचतंत्र में धन की महत्ता का वर्णन (1)

पंचतंत्र संस्कृत साहित्य का सुविख्यात नीतिग्रंथ है, जिसका संक्षिप्त परिचय मैंने अन्यत्र दे रखा है । ग्रंथ के अंतर्गत एक प्रकरण में व्यावहारिक जीवन में धन-संपदा की महत्ता का वर्णन मिलता है । उसके दो सियार पात्रों – वस्तुतः दो भाइयों, दमनक एवं करटक – में से एक दूसरे के समक्ष अधिकाधिक मात्रा में धनसंपदा अर्जित करने का प्रस्ताव रखता है । दूसरे के “बहुत अधिक धन क्यों?” के उत्तर में वह धन के विविध लाभों को गिनाना आंरभ करता है और धन से सभी कुछ संभव है इस बात पर जोर डालता है । ऐसा नहीं है कि पंचतंत्र में धन को ही महत्त्व दिया गया हो । किसी अन्य स्थल पर तो ग्रंथकार ने उपभोग या दान न किए जाने पर धनसंपदा के नाश की भी बात की है । वस्तुतः ग्रंथ में परिस्थिति के अनुसार पशुपात्रों के माध्यम से कर्तव्य-अकर्तव्य की नीतिगत बातें कही गई हैं । याद दिला दूं कि पंचतंत्र के पात्र पशुगण हैं, जो मनुष्यों की भांति व्यवहार करते हैं, और मनुष्य जीवन की समस्याओं से जूझ रहे होते हैं । यहां पर उस सियार पात्र के धनोपार्जन संबंधी कथनों को उद्धृत किया जा रहा है । प्रस्तुत हैं प्रथम तीन श्लोक:

न हि तद्विद्यते किञ्चिद्यदर्थेन न सिद्ध्यति ।
यत्नेन मतिमांस्तस्मादर्थमेकं प्रसाधयेत् ॥2॥
(पंचतंत्र, मित्रलाभ)
(न हि तत् विद्यते किञ्चित् यत् अर्थेन न सिद्ध्यति यत्नेन मतिमान् तस्मात् अर्थम् एकं प्रसाधयेत् ।)

अर्थः ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे धन के द्वारा न पाया जा सकता है । अतः बुद्धिमान् व्यक्ति को एकमेव धन अर्जित करने का प्रयत्न करना चाहिए ।

भौतिक सुख-सुविधाएं धन के माध्यम से एकत्र की जा सकती हैं । इतना ही नहीं सामाजिक संबंध भी धन से प्रभावित होते हैं । ऐसी ही तमाम बातें धन से संभव हो पाती हैं । इनका उल्लेख आगे किया गया हैः

यस्यार्थाः तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः ।
यस्यार्थाः स पुमांल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः ॥3॥
(यथा उपर्युक्त)
(यस्य अर्थाः तस्य मित्राणि यस्य अर्थाः तस्य बान्धवाः यस्य अर्थाः सः पुमान् लोके यस्य अर्थाः सः च पण्डितः ।

 अर्थः जिस व्यक्ति के पास धन हो उसी के मित्र होते हैं, उसी के बंधुबांधव होते हैं, वही संसार में वस्तुतः पुरुष (सफल व्यक्ति) होता है, और वही पंडित या जानकार होता है ।

आज के सामाजिक जीवन में ये बातें सही सिद्ध होती दिखाई देती हैं । आपके पास धन-दौलत है तो यार-दोस्त, रिश्तेदार, परिचित आदि आपको घेरे रहेंगे, अन्यथा आपसे देरी बनाए रहेंगे । जिसने धनोपार्जन कर लिया वही सफल माना जाता है, उसी की योग्यता की बातें की जाती हैं, उसकी हां में हां मिलाई जाती है, मानो कि उसे ही व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त हो । कदाचित् धन की ऐसी खूबी प्राचीन काल में भी स्वीकारी गई होगी । आगे देखिए:

न सा विद्या न तद्दानं न तच्छिल्पं न सा कला ।
न तत्स्थैर्यं हि धनिनां याचकैर्यन्न गीयते ॥4॥
(यथा उपर्युक्त)
(न सा विद्या न तत् दानं न तत् शिल्पं न सा कला न तत् स्थैर्यं हि धनिनां याचकैः यत् न गीयते ।)

अर्थः ऐसी कोई विद्या, दान शिल्प (हुनर), कला, स्थिरता या वचनबद्धता नहीं है जिनके धनिकों में होने का गुणगान याचकवृंद द्वारा न किया जाता हो ।

संपन्न व्यक्ति की अनुकंपा प्राप्त करने और मौके-बेमौके उससे मदद पाने के लिए लोग प्रशंसा के बोल कहते देखे जाते हैं । उसको खुश करने के लिए लोग यह कहने में भी नहीं हिचकते हैं कि वह अनेकों गुणों का धनी है । राजनीति के क्षेत्र में ऐसे अनेकों ‘महापुरुष’ मिल जाएंगे, जिनके गुणगान में लोगों ने ‘चालीसाएं’ तक लिख डाली हैं । धनिकों के प्रति चाटुकारिता एक आम बात है ऐसा ग्रंथकार का मत है । – योगेन्द्र जोशी

पंचतंत्र नीति वचन: विश्वसनीय पर भी पूर्ण विश्वास घातक हो सकता है

पंडित विष्णुशर्मा प्रणीत पंचतंत्र में व्यावहारिक जीवन से संबंधित सार्थक नीति की तमाम बातें कथाओं के माध्यम से समझाई गयी हैं । ग्रंथ का दिलचस्प पहलू यह है कि इन कथाओं के अधिकतर पात्र पशु हैं, जो सामान्य मनुष्यों की तरह समस्याओं का साक्षात्कार करते हैं, उनके समाधान का रास्ता खोजते हैं, और उन पर परस्पर बहस एवं सलाह-मशविरे में शरीक होते हैं । इसके दो प्रमुख पात्र करटक तथा दमनक नाम के सियार हैं, जो जंगल के राजा शेर के मंत्री ‘सियार’ के बेटे हैं । पंचतंत्र के एक प्रकरण में विश्वास किस पर करें और कितना करें की चर्चा करते समय करटक भाई दमनक को समझाता है कि किसी पर भी अतिशय विश्वास विनाश का कारण बन सकता है । उसी संदर्भ में उक्त ग्रंथ में अधोलिखित श्लोक उपलब्ध हैं (पंचतंत्र, द्वितीय तंत्र – मित्रसंप्राप्ति, श्लोक क्रमशः 44 एवं 45):

न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्तेऽपि न विश्वसेत् ।

विश्वासाद्भयमुत्पन्नं मूलान्यपि विकृन्तति ।।44।।

(अविश्वस्ते न विश्वसेद्, विश्वस्ते अपि न विश्वसेत्, विश्वासाद् उत्पन्नं भयं मूलानि अपि विकृन्तति ।)
विश्वास न करने योग्य व्यक्ति में निःसंदेह भरोसा नहीं करना चाहिए, किंतु जिस व्यक्ति को विश्वसनीय पाया जाए उस पर भी एक सीमा से अधिक भरोसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि विश्वास करने से पैदा हुए भय अर्थात् संकट (या परेशानी) व्यक्ति के मूल को काट डालता है । कहने का तात्पर्य यह है कि अति विश्वास मनुष्य को कभी-कभी ऐसी दुरवस्था की स्थिति में धकेल देता है, जिससे पार पाना कठिन होता है । उसे अपने अस्तित्व का आधार भी खोना पड़ जाता है ।

न वध्यते ह्यविश्वस्तो दुर्बलोऽपि बलोत्कटैः ।

विश्वस्ताश्चाशु वध्यन्ते बलवन्तोऽपि दुर्बलैः ।।45।।

(अविश्वस्तः दुर्बलः हि बलोत्कटैः अपि न वध्यते, अपि च विश्वस्ताः बलवन्तः दुर्बलैः आशु वध्यन्ते ।)
जो दूसरे में विश्वास नहीं करता है वह बलवानों के द्वारा भी नहीं मारा जाता है, किंतु जो विश्वास करता है उसका नाश बलवान् होते हुए भी दुर्बलों द्वारा किया जाता है । तात्पर्य यह है कि जिसने कभी धोखा न दिया हो और जिसका आचरण सदैव भरोसे के योग्य लगा हो वह कमजोर होकर भी समर्थ को नुकसान पहुंचा सकता है । इसके विपरीत कमजोर व्यक्ति भी पर्याप्त सावधानी बरतते हुए समर्थ व्यक्ति से स्वयं को बचा सकता है ।

वास्तव में जो व्यक्ति पूर्ण विश्वास का पात्र बन चुका हो, उसके लिए भी यह नहीं कहा जा सकता है कि भविष्य में वह कभी धोखा नहीं देगा । मनुष्य का व्यवहार कब बदल जाएगा इस बात का ही कोई भरोसा नहीं । ऐसे में बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिए कि वह सदा सावधान रहे और यह मानकर चले कि अमुक व्यक्ति आज नहीं तो कल धोखा दे सकता है । यह देखने में आता ही है कि व्यापारिक संबंधों में घनिष्ट मित्र भी ठगी पर उतर आते हैं । व्यक्ति के स्वयं के बेटे-बेटियां तक कभी-कभी वंचक की भूमिका में उतर आते हैं । इसीलिए कहा जाता है कि वृद्धावस्था के लिए मनुष्य को अपनी कारगर व्यवस्था समय रहते कर लेनी चाहिए और अपने बच्चों के भरोसे भी आंख मूंदकर नहीं बैठना चाहिए । कब किसकी नीयत बदल चाए कहा नहीं जा सकता है । मानव व्यवहार विचित्र, अस्थाई एवं परिवर्तनशील होता है । – योगेन्द्र जोशी