न अरुन्तुदः स्यात् न नृशंसवादी … – ययाति का पुत्र पुरु को उपदेश (2)

महाकाव्य महाभारत के एक प्रकरण का उल्लेख करते हुए मैंने पिछली पोस्ट में महाराज ययाति का अपने ज्येष्ठ पुत्र पुरु को दिए गए उपदेशों की चर्चा की थी । उन्हीं उपदेशों की शृंखला के तीन अन्य श्लोक मैं यहां पर उद्धृत कर रहा हूं:

नारुन्तुदः स्यान्न नृशंसवादी न हीनतः परमभ्याददीत ।

ययास्य वाचा पर उद्विजेत न तां वदेदुषतीं पापलोक्याम् ॥

(महाभारत, आदिपर्व, अध्याय , श्लोक ८)

(न अरुन्तुदः स्यात् न नृशंस-वादी न हीनतः परम् अभि-आददीत, अस्य यया वाचा परः उद्विजेत ताम्‌ उषतीम् पाप-लोक्याम् न वदेत् ।)

अर्थ – दूसरे के मर्म को चोट न पहुंचाए, चुभने वाली बातें न बोले, घटिया तरीके से दूसरे को वश में न करे, दूसरे को उद्विग्न करने एवं ताप पहुंचाने वाली, पापी जनों के आचरण वाली बोली न बोले ।

शरीर के अतिसंवेदनशील अंग को मर्म कहा जाता है । यह वह स्थल होता है जहां हल्की चोट का लगना भी अत्यंत कष्टदायक एवं असह्य होता है । मर्म शब्द हृदय अथवा मन के लिए भी प्रयुक्त होता है । मनुष्य को दो प्रकार से चोट पहुंचाई जा सकती है; पहला है कि शरीर के अंगविशेष पर प्रहार करना, और दूसरा है कटु वचनों के द्वारा मन को आघात पहुंचाना । आम तौर पर लोग अप्रिय वचनों से ही दूसरों को आहत करते हैं । उक्त नीतिवचन में कदाचित् ऐसा न करने की सलाह है । यह भी कहा है कि दूसरे को घटिया तरीके से अपने वश में न करे । दूसरों को नियंत्रण में लेने हेतु बलप्रयोग करके जंजीर से बांधकर रखना, कोठरी में बंद करना, परिवार के सदस्य का अपहरण करके या वैसी धमकी देकर किसी को अपने अधीन रखना, आदि ऐसे क्रूर तरीके हैं जिनसे बचने की सलाह उक्त श्लोक में निहित है ।

अरुन्तुदं परुषं तीष्णवाचं वाक्कण्टकैर्वितुदन्तं मनुष्यान् ।

विद्यादलक्ष्मीकतमं जनानां मुखे निबद्धां निर्ऋतिं वहन्तम् ॥

(पूर्वोक्त, श्लोक ९)

(अरुन्तुदम् परुषम् तीष्ण-वाचम् वाक्-कण्टकैः मनुष्यान् वितुदन्तम्, मुखे निबद्धाम् निर्ऋतिम् वहन्तम् जनानाम् अलक्ष्मीक-तमम् विद्यात् ।)

अर्थ – मर्म को चोट पहुंचाने वाली, कठोर, तीखी, कांटों के समान लोगों को चुभने वाली बोली बोलने वाले व्यक्ति को लोगों के बीच विद्यमान सर्वाधिक श्रीविहीन और मुख में पिशाचिनी का वहन करने वाले मनुष्य के तौर पर देखा जाना चाहिए ।

दूसरों के साथ कटु व्यवहार करने वाले को श्रीविहीन कहा गया है । व्यक्ति के व्यवहार के आधार पर ही समाज में किसी की प्रतिष्ठा अथवा निंदा होती है । धनवान या राजनैतिक बल आदि से लोगों के बीच झूठी और अस्थाई शान संभव है, किंतु उसे श्रीहीन ही समझा जाएगा इस श्लोक का यही आशय है ।

सद्भिः पुरस्तादभिपूजितः स्यात् सद्भिस्तथा पृष्ठतो रक्षितः स्यात् ।

सदासतामतिवादांस्तितिक्षेत् सतां वृत्तं चाददीतार्यवृत्तः ॥

(पूर्वोक्त, श्लोक १०)

(सद्भिः पुरस्तात् अभिपूजितः स्यात् तथा सद्भिः पृष्ठतः रक्षितः स्यात्, असताम् अतिवादान् सदा तितिक्षेत् आर्यवृत्तः सताम् वृत्तम् च आददीत ।)

अर्थ – व्यक्ति के कर्म ऐसे हों कि सज्जन लोग उसके समक्ष सम्मान व्यक्त करें ही, परोक्ष में भी उनकी धारणाएं सुरक्षित रहें । दुष्ट प्रकृति के लोगों की ऊलजलूल बातें सह ले, और सदैव श्रेष्ठ लोगों के सदाचारण में स्वयं संलग्न रहे ।

आम लोगों के आचरण में यह देखा जाता है कि वे सामने पड़ने पर तो चिकनी-चुपड़ी बातों से सम्मान प्रदर्शित करते हैं, लेकिन पीठ पीछे बुरा-भला भी कहने से नहीं बचते । ऐसे लोगों के कथनों से सदाचारी व्यक्ति को विचलित नहीं होना चाहिए । उसका यत्न होना चाहिए कि लोग उसकी अनुपस्थिति में भी उसके बारे में सम्मानजनक बातें करें, और वह हर दशा में अपने सदाचरण पर टिका रहे । वास्तव में दूसरों के उल्टेसीधे बोल उनके अपने ही व्यक्तित्व के दोष होते हैं । – योगेन्द्र जोशी

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“अक्रोधनो क्रोधनेभ्यो विशिष्टः …” – ययाति का पुत्र पुरु को उपदेश (1)

         महाकाव्य महाभारत में एक प्रकरण का वर्णन है जिसमें महाराज ययाति अपने ज्येष्ठ पुत्र पुरु को मानवीय गुणों को अपनाने का उपदेश देते हैं । पिता-पुत्र के बारे में कथा है कि ययाति जब वृद्ध हो चले परंतु ऐहिक भोग-विलास से उनकी तृप्ति नहीं हो सकी थी तो युवराज पुरु ने अपना यौवन उन्हें प्रदान कर दिया और स्वयं उनका वार्धक्य ग्रहण कर लिया । मैं इस कथा के विस्तार में नहीं जा रहा हूं । महाभारत के अनुसार कौरव-पांडव ययाति-पुत्र पुरु के अनेकों पिढ़ियों बाद के वंशज थे । उसी वंशशृंखला में दुश्यंत, भरत एवं शांतनु चर्चित राजा हुए थे । मैं जिन उपदेशों की चर्चा कर रहा हूं वे आठ श्लोकों में निबद्ध हैं, जिनमें से प्रथम दो का उल्लेख में इस स्थल पर कर रहा हूं:

अक्रोधनो क्रोधनेभ्यो विशिष्टस्तथा तितिक्षुरतितिक्षोर्विशिष्टः ।

अमानुषेभ्यो मानुषाश्च प्रधाना विद्वांस्तथैवाविदुषः प्रधानः ॥

(महाभारत, आदिपर्व, अध्याय , श्लोक 6)

(अक्रोधनः क्रोधनेभ्यः विशिष्टः तथा तितिक्षुः अतितिक्षोः विशिष्टः, अमानुषेभ्यः च मानुषाः प्रधानाः तथा एव विद्वान् अविदुषः प्रधानः ।)

अर्थ – क्रोध न करने वाला क्रोधी व्यक्ति से और सहनशील व्यक्ति असहिष्णु से विशेषतर यानी श्रेष्ठतर होता है; इसी प्रकार अमनुष्य मनुष्यों एवं विद्वान अविद्वान की तुलना में श्रेष्ठतर होते हैं ।

क्रोध तथा असहिष्णुता उच्च जीवधारियों (पशुओं) की स्वाभाविक वृत्तियां हैं, जिन्हें अर्जित करने के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता है । प्रयास तो इन पर नियंत्रण पाने की क्षमता पाने के लिए करना पड़ता है; जिसने नियंत्रण पा लिया हो, वह समाज में निःसंदेह विशेष स्थान का हकदार कहलाएगा । इसी प्रकार विद्वान होना भी व्यक्ति की प्रशंसनीय उपलब्धि है । ‘अमानुष’ का शाब्दिक अर्थ मनुष्य से इतर ‘प्राणी’ होता है, किंतु यहां पर इसे उस पुरुष के लिए प्रयोग में लिया गया है जिसमें अपेक्षित मानवीय गुणों का अभाव हो, अर्थात् जिसमें तमाम प्रकार के दुर्गुण अथवा राक्षसी वृत्तियां हों । दूसरों के प्रति संवेदना, परोपकार की वृत्ति, कर्तव्यनिष्ठा, लोभ-लालच का अभाव इत्यादि अपेक्षित गुण हैं, जो अमानुष में देखने को नहीं मिलते । इन गुणों से युक्त व्यक्ति सामान्य मनुष्य की तुलना में श्रेष्ठतर माना जाएगा ।

वर्तमान युग में ये मानवीय गुणों की बातें कही तो जाती हैं, परंतु कम ही लोग होते हैं जो अपने आचरण में इन्हें अपनाने का संकल्प लेते हैं ।

आक्रुष्यमानो नाक्रोशेन्मन्युरेव तितिक्षतः।

आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति ॥

(पूर्वोक्त, श्लोक 7)

(आक्रुष्यमानः न आक्रोशेत् मन्युः एव तितिक्षतः, आक्रोष्टारं निर्दहति अस्य सुकृतं च विन्दति ।)

अर्थ – यदि अपशब्दों के द्वारा आक्रोशित किया जा रहा हो तो तज्जन्य आक्रोष अथवा क्रोध को सह लेना चाहिए । ऐसा करना आक्रोश पैदा करने वाले को ही जला डालता है और उसके सत्कर्म का फल सहने वाले को प्राप्त होता हो जाता है ।

आक्रोश तथा क्रोध में अंतर होता है । पहले में व्यक्ति अपनी नाराजगी चीखकर, डांट-डपटकर, अपशब्द बोलकर या गाली-गलौज की भाषा से व्यक्त करता है । ऐसा करने से वह ‘मैंने खरी-खोटी सुना दी’ के अहंभाव से संतुष्ट हो जाता है । तत्पश्चात् बात अक्सर आई-गई हो जाती है । किंतु क्रोध की अवस्था में व्यक्ति मारपीट करने और भौतिक रूप से हानि पहुंचाने तक को उतारू हो जाता है । उसका गुस्सा अधिक स्थाई होता है और कभी-कभी हानि पहुंचाने की योजना तक बन जाती है । पहले पक्ष की अनुचित हरकतें जब दूसरा पक्ष शांति से सह लेता है तो कदाचित् पहले पक्ष के मन में हारमान हो जाने का भाव पैदा हो जाता है । अहंकारवश वह अपनी गलती मानने को तैयार तो नहीं हो पाता, किंतु मन ही मन असफल हो जाने का दंश झेलता है । ‘निर्दहति’ या ‘जला डालता है’ कहने का मतलब यही होगा ऐसा मेरा सोचना है । लेकिन उसके सत्कर्म का फल क्रोध सहने वाले को कैसे मिलता है यह मैं नहीं कह सकता ।

दूसरे के अप्रिय व्यवहार को सहज भाव से सह लेना स्वयं में शांति प्रदान करता है यही पर्याप्त है । असहिष्णु व्यक्ति का मन बदले की आग से अशांत तो हो ही जाता है । – योगेन्द्र जोशी