“यथा हि जिह्वा-तलस्थम् मधु …” – कौटिलीय अर्थशास्त्र में भ्रष्टाचारी के संबंध में कहे गए वचन (1)

आचार्य चाणक्य के नाम से प्रायः सभी परचित होंगे । चणक के पुत्र होने के कारण उनको चाणक्य कहा जाता था, अन्यथा उनका नाम विष्णुदत्त था । उन्हें कौटिल्य के नाम से भी जाना जाता है । मैंने पहले कभी लिखी गई एक पोस्ट में उनका संक्षिप्त परिचय दिया है ।

“कौटिलीय अर्थशास्त्र” चाणक्यरचित एक ग्रंथ है, जिसमें राजा, राजकर्मचारियों एवं प्रजा के अलग-अलग क्षेत्रों में भूमिकाओं तथा कर्तव्यों का विवरण दिया गया है । उसके एक अध्याय में भ्रष्टाचार तथा भ्रष्ट अधिकारियों के बारे में लिखा गया है । मैं यहां पर तत्संबंधित 5 श्लोकों में से 3 को उद्धृत कर रहा हूं ।

यथा ह्यनास्वादयितुं न शक्यं जिह्वातलस्थं मधु वा विषं वा ।

अर्थस्तथा ह्यर्थचरेण राज्ञः स्वल्पोऽप्यनास्वादयितुं न शक्यः ॥

(यथा हि जिह्वा-तलस्थम् मधु वा विषम् वा न-आस्वादयितुम् न शक्यम्, तथा हि राज्ञः अर्थचरेण अर्थः स्वल्पः अपि न-आस्वादयितुं न शक्यः ।)

(यह तथा आगे दिए गए नीतिवचन कौटिलीय अर्थशास्त्र, द्वितीय अधिकरण, प्रकरण 25 से लिए गए हैं ।)

अर्थ – जिस प्रकार जीभ पर रखे शहद अथवा विष का रसास्वादन किए बिना नहीं रहा जा सकता है, ठीक वैसे ही राजा द्वारा आर्थिक प्रबंधन में लगाए गए व्यक्ति द्वारा धन का थोड़ा भी स्वाद न लिया जा रहा हो यह संभव नहीं ।

तात्पर्य यह है कि जो चीज आपके मुख में आ चुकी है उसका स्वाद कैसा है यह तो आपको पता चलेगा ही । और यदि वह स्वाद मन माफिक हुआ तो उसका आकर्षण तो अनुभव करेंगे ही, अधिक नहीं तो कुछ तो उसे और चखने की लालसा आपमें जग सकती है । कौटिल्य के अनुसार कुछ ऐसा ही राजकीय धन के साथ भी हो सकता है । जिस व्यक्ति को उसे संचित रखने या सही तरीके से खर्चने की जिम्मेदारी दी गई हो उसके मन में उसका कुछ हिस्सा पाने का, उससे कुछ लाभ कमाने का, लालच कदाचित उपज सकता है । उसमें से कुछ चुंगी अपने नाम करने में वह संभवतः हिचके ही नहीं । यह चुंगी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष तौर पर लिया जा सकता है, जैसे दलाली के रूप में । बिरले ही होते हैं जो इस लालच से अपने को मुक्त रखना चाहते हों या रख पाते हों ।

मत्स्या यथान्तःसलिले चरन्तो ज्ञातं न शक्याः सलिलं पिबन्तः ।

युक्तास्तथा कार्यविधौ नियुक्ता ज्ञातुं न शक्या धनमाददानाः ॥

(मत्स्याः यथा अन्तः-सलिले चरन्तः सलिलम् पिबन्तः ज्ञातुम् न शक्याः, तथा कार्य-विधौ युक्ताः नियुक्ताः धनम् आददानाः ज्ञातुम् न शक्याः ।)

अर्थ – जैसे पानी के अंदर चलायमान मछलियों का पानी पीना जाना नहीं जा सकता, वैसे ही कार्य-संपादन में लगाये जाने पर नियुक्त अधिकारियों द्वारा धन के अपहरण को नहीं जाना जा सकता है ।

राजस्व एकत्रित करने अथवा उसे उचित प्रकार से खर्चने की जिन अधिकारियों पर जिम्मेदारी होती है वे वस्तुतः कितनी ईमानदारी बरत रहे हैं यह आम जन प्रत्यक्षतः नहीं जान पाते हैं, क्योंकि उनके पास संबंधित धनराशि और उसके उपयोग का विवरण नहीं होता । जब कोई संस्था या व्यक्ति काफी मेहनत और छानबीन से जानकारी इकठ्ठा करता है तभी लोग कुछ जान पाते हैं । इसीलिए यह कहा जा सकता है कि पता नहीं वे क्या और कैसे कार्य कर रहे हैं ।

अपि शक्या गतिर्ज्ञातुं पततां खे पतत्त्रिणाम् ।

न तु प्रच्छन्नभावानां युक्तानां चरतां गतिः ॥

(खे पतताम् पतत्त्रिणाम् गतिः ज्ञातुम् अपि शक्या, न तु चरताम् प्रच्छन्न-भावानाम् युक्तानाम् गतिः ।)

अर्थ – आसमान में उड़ रहे पक्षियों की गति का ज्ञान पाना संभव है, किंतु कार्य में लगाए गए छिपे हुए भावों वाले व्यक्तियों के दायित्व-निर्वाह-प्रणाली को समझ पाना संभव नहीं ।

कहने का मतलब यह है कि उड़ते पक्षी किधर एवं किस रफ्तार से उड़ रहे है इसे उन पर नजर डालकर सामान्य व्यक्ति काफी हद तक समझ सकता है । उनका व्यवहार संदिग्ध नहीं होता । सरकारी कर्मचारी क्या सोच के बैठा है, वह दिखा क्या रहा है और वास्तव में क्या करने का इरादा रखता है, यह सब सरलता से नहीं जाना जा सकता है ये बातें । अपने देश में आजकल के घटित हो रहे आर्थिक अपराधों से समझ में आ जाती हैं । जब सब कुछ घट जाता है तब समझ में आता है कि बहुत कुछ गलत हो रहा है । तब भी यह स्पष्ट हो पाता है कि वास्तव में कौन जिम्मेदार है । यही कारण है कि देश में अपराधों की बाढ़ तो आ रही लेकिन दंडित बिरले ही होते हैं ।

लोभ-लालच-लालसा मनुष्य में तमाम अन्य गुणावगुणों की भांति स्वभावतः विद्यमान रहते हैं । इनकी मौजूदगी कभी धन-लोलुपता के रूप में स्वयं को उजागर करती है, तो कभी समाज में प्रतिष्ठित पदों पर पहुंचने अथवा कभी लोगों पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के तौर पर, इत्यादि । इनको प्राप्त करने के लिए अनुचित कदम भी उठाने की इच्छा यदाकदा मनुष्य में जागने लगती है । किंतु सभ्य मानव समाज के मूल्य मनुष्य को आत्मसंयमित रहने को प्रेरित करते हैं । फिर भी सभी मनुष्य चारित्रिक तौर पर पर्याप्त सक्षम नहीं होते और इसी कारण अपनी लालसाओं को पूरा करने वे को भ्रष्टाचार का मार्ग अपना लेते हैं । कौटिलीय अर्थशास्त्र के उपर्युक्त वचन यह स्पष्ट करते हैं कि भ्रष्टाचार समाज में सदा से रहा है । हां, ढाई हजार वर्ष पूर्व की तुलना में आज यह अधिक व्यापकता पा चुका है । वस्तुतः इसमें उत्तरोत्तर वृद्धि ही हो रही है । – योगेन्द्र जोशी

(यहां प्रस्तुत जानकारी चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी, द्वारा प्रकाशित कौटिलीय अर्थशास्त्र, संस्करण 2006, पर आधारित है ।)

अंत में भोजपुर मंदिर (भोपाल के पास) की तस्वीर –

भोजपुर मंदिर, म.प्र. 1

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