कौटिलीय वचन: “अर्थैः अर्थाः प्रबध्यन्ते …” अर्थात धन से ही अधिक धन अर्जित होता है

कौटिलीय अर्थशास्त्र”  महान राजनीतिवेत्ता कौटिल्य द्वारा राज्य का शासन कारगर तरीके से चलाने की प्रणाली पर रचित ग्रंथ है । कौटिल्य चाणक्य (चणक-पुत्र, असल नाम विष्णुगुप्त) का वैकल्पिक नाम है, जिन्होंने करीब ढाई हजार साल पहले चंद्रगुप्त को राजगदी पर बिठाकर मौर्य राज्य की स्थापना की थी । उनके बारे में कुछ जानकारी मैंने अपने 23 सितंबर, 2009, की ब्लॉग-प्रविष्टि में दी है ।

उक्त ग्रंथ में शासकीय व्यवस्था की तमाम बातों के साथ पुरुषार्थ की महत्ता की भी बात की गई है । चाणक्य के अनुसार भाग्य के भरोसे बैठना नासमझों का काम है । ग्रंथकार ने यह भी कहा है कि धन से ही और अधिक धन का उपार्जन होता है । तत्संबंधित दो श्लोक मुझे ग्रंथ में पढ़ने को मिले हैं जिनका उल्लेख मैं इस स्थल पर कर रहा हूं ।

(स्रोत संदर्भ – कौटिलीय अर्थशास्त्र, अधिकरण 9, प्रकरण 142)

नक्षत्रमतिपृच्छन्तं बालमर्थोऽतिवर्तते ।

अर्थो ह्यर्थस्य नक्षत्रं किं करिस्यन्ति तारकाः ॥

( नक्षत्रम् अति-पृच्छन्तम् बालम् अर्थः अति-वर्तते, अर्थः हि अर्थस्य नक्षत्रम् तारकाः किम् करिस्यन्ति ।)

अर्थ – नक्षत्रों की गणना करने वाले नासमझ से धन दूर ही रहता है । दरअसल धन के लिए धन ही नक्षत्र होता है, उसके लिए तारागण की क्या भूमिका ?

धनोपार्जन के कार्य में ग्रह-नक्षत्रों की गणना, ज्योतिषीय सलाह-मशविरा, शुभ मुहूर्त का विचार, आदि का कोई महत्व नहीं होता । जो इन पचड़ों में रहता है वह व्यावहारिक जीवन में एक नादान बच्चे की-सी नासमझी करता है । असल तथ्य तो यह है कि धनोपार्जन के लिए आपके पास की धन-संपदा ही ग्रह-नक्षत्र की भूमिका निभाती हैं । तात्पर्य यह है कि आकाशीय पिंड धनोपार्जन को प्रभावित करने की क्षमता नहीं रख्रते, बल्कि आपकी पहले से ही अर्जित धनसंपदा उनकी जगह प्रभावी होती हैं, जैसा कि अगले श्लोक से स्पष्ट है ।

नाधनाः प्राप्नुवन्त्यर्थान्नरा यत्नशतैरपि ।

अर्थैरर्थाः प्रबध्यन्ते गजाः प्रतिगजैरिव ॥

(अधनाः नराः यत्न-शतैः अपि अर्थान् न प्राप्नुवन्ति, प्रति-गजैः गजाः इव अर्थाः अर्थैः प्रबध्यन्ते ।)

अर्थ – निर्धन जन सौ प्रयत्न कर लें तो भी धन नहीं कमा सकते हैं । जैसे हाथियों के माध्यम से हाथी वश में किए जाते हैं वैसे ही धन से धन को कब्जे में लिया जाता है ।

यह सुविख्यात है कि वनक्षेत्र में रह रहे हाथी को पालतू हाथियों की मदद से वश में किया जाता है और कालांतर में उसे पालतू बनाने में सफलता मिल जाती है । कुछ ऐसा ही धन के साथ होता है । एक कहावत हैः “पैसा पैसे को खींचता है ।” जिसके निहितार्थ यही हैं । दरअसल जब मनुष्य के पास धन होता है तभी वह उसका समुचित निवेश कर सकता है जिससे उसे अतिरिक्त धन की प्राप्ति होती है । जो निवेश करने में जितना अधिक समर्थ होगा उसे उसी अनुपात में लाभ भी मिलेगा । जिसके पास धन ही न हो वह निवेश कहां से कर पाएगा ?

व्यवहारिक जीवन में उपर्युक्त बात कमोवेश सही ठहरती है बशर्ते कि हम धनसंपदा के अर्थ अधिक व्यापक लेते हुए उसमें बौद्धिक संपदा को भी जोड़ लें । आजकल बौद्धिक कौशल का जमाना है । आप अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हुए भी धनोपार्जन कर सकते हैं । ऐसा व्यक्ति पहले उसी का निवेश करता है, फिर उससे पाप्त धन का निवेश करता है । अंततः सभी को निवेश का ही रास्ता अपनाता होता है ।

मेरी समझ में चाणक्य का संदेश यही है कि भविष्यवाणी की ज्योतिष् या तत्सदृश कलाओं पर निर्भर न होकर व्यक्ति को अपने धन या हुनर से ही संपदा अर्जित करने की सोचनी चाहिए । – योगेन्द्र जोशी

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“प्रजासुखे सुखं राज्ञः …” – कौटिल्य अर्थशास्त्र के राजधर्म संबंधी नीतिवचन

करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व भारतभूमि पर जिस मौर्य सामाज्य की स्थापना हुई थी उसका श्रेय उस काल के महान राजनीतिज्ञ चाणक्य को जाता है । राजनैतिक चातुर्य के धनी चाणक्य को ही कौटिल्य कहा जाता है । उनके बारे में मैंने पहले कभी अपने इसी ब्लॉग में लिखा है । कौटिलीय अर्थशास्त्र चाणक्य-विरचित ग्रंथ है, जिसमें राजा के कर्तव्यों का, आर्थिक तंत्र के विकास का, प्रभावी शासन एवं दण्ड व्यवस्था आदि का विवरण दिया गया है । उसी ग्रंथ के तीन चुने हुए श्लोकों का उल्लेख मैं यहां पर कर रहा हूं ।

(कौटिलीय अर्थशास्त्र, प्रथम अधिकरण, अध्याय 18)

1.

प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां तु हिते हितम् ।

नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम् ॥

(प्रजा-सुखे सुखम् राज्ञः प्रजानाम् तु हिते हितम्, न आत्मप्रियम् हितम् राज्ञः प्रजानाम् तु प्रियम् हितम् ।)

प्रजा के सुख में राजा का सुख निहित है, प्रजा के हित में ही उसे अपना हित दिखना चाहिए । जो स्वयं को प्रिय लगे उसमें राजा का हित नहीं है, उसका हित तो प्रजा को जो प्रिय लगे उसमें है ।

2.

तस्मान्नित्योत्थितो राजा कुर्यादर्थानुशासनम्् ।

अर्थस्य मूलमुत्थानमनर्थस्य विपर्ययः ॥

(तस्मात् नित्य-उत्थितः राजा कुर्यात् अर्थ अनुशासनम्, अर्थस्य मूलम् उत्थानम् अनर्थस्य विपर्ययः ।)

इसलिए राजा को चाहिए कि वह नित्यप्रति उद्यमशील होकर अर्थोपार्जन तथा शासकीय व्यवहार संपन्न करे । उद्यमशीलता ही अर्थ (संपन्नता) का मूल है एवं उसके विपरीत उद्यमहीनता अर्थहीनता का कारण है ।

3.

अनुत्थाने ध्रुवो नाशः प्राप्तस्यानागतस्य च ।

प्राप्यते फलमुत्थानाल्लभते चार्थसम्पदम् ॥

(अनुत्थाने ध्रुवः नाशः प्राप्तस्य अनागतस्य च, प्राप्यते फलम् उत्थानात् लभते च अर्थ-सम्पदम् ।)

उद्यमशीलता के अभाव में पहले से जो प्राप्त है एवं भविष्य में जो प्राप्त हो पाता उन दोनों का ही नाश निश्चित है । उद्यम करने से ही वांछित फल प्राप्त होता है ओर उसी से आर्थिक संपन्नता मिलती है ।

कौटिल्य ने इन श्लोकों के माध्यम से अपना यह मत व्यक्त किया है कि राजा का कर्तव्य अपना हित साधना और सत्तासुख भोगना नहीं है । आज के युग में राजा अपवाद रूप में ही बचे हैं और उनका स्थान अधिकांश समाजों में जनप्रतिनिधियों ने ले लिया है जिन्हें आम जनता शासकीय व्यवस्था चलाने का दायित्व सोंपती है । कौटिल्य की बातें तो उन पर अधिक ही प्रासंगिक मानी जायेंगी क्योकि वे जनता के हित साधने के लिए जनप्रतिनिधि बनने की बात करते हैं । दुर्भाग्य से अपने समाज में उन उद्येश्यों की पूर्ति विरले जनप्रतिनिधि ही करते हैं ।

उद्योग शब्द से मतलब है निष्ठा के साथ उस कार्य में लग जाना जो व्यक्ति के लिए उसकी योग्यतानुसार शासन ने निर्धारित किया हो, या जिसे उसने अपने लिए स्वयं चुना हो । राजा यानी शासक का कर्तव्य है कि वह लोगों को अनुशासित रखे और कार्यसंस्कृति को प्रेरित करे । अनुशासन एवं कार्यसंस्कृति के अभाव में आर्थिक प्रगति संभव नहीं है । जिस समाज में लोग लापरवाह बने रहें, कार्य करने से बचते हों, समय का मूल्य न समझते हों, और शासन चलाने वाले अपने हित साधने में लगे रहें, वहां संपन्नता पाना संभव नहीं यह आचार्य कौटिल्य का संदेश है । – योगेन्द्र जोशी

 

“न भक्षयन्ति ये अर्थान् …” – कौटिलीय अर्थशास्त्र में भ्रष्टाचारी के संबंध में कहे गए वचन (2)

इस ब्लॉग की पिछली पोस्ट में मैंने चाणक्य-विरचित “कौटिलीय अर्थशास्त्र” की चर्चा की थी । तब मैंने उस ग्रंथ में उल्लिखित भ्रष्टाचार तथा भ्रष्ट अधिकारियों से संबंधित 5 श्लोकों में से 3 को उद्धृत किया था । शेष 2 श्लोकों को मैं यहां लिख रहा हूं:

आस्रावयेच्चोपचितान् विपर्यस्येच्च कर्मसु ।

यथा न भक्षयन्त्यर्थं भक्षितं निर्वमन्ति वा ॥

(उपचितान् च आस्रावयेत् विपर्यस्येत् च कर्मसु, यथा अर्थम् न भक्षयन्ति भक्षितम् वा निर्वमन्ति ।) 

(कौटिलीय अर्थशास्त्र, द्वितीय अधिकरण, प्रकरण 25)

अर्थ – सरकारी धन संबंधी दायित्व में लगाए व्यक्तियों से पैसा (दंडस्वरूप) वसूला जाना चाहिए और उनकी पदावनति की जानी चाहिए, ताकि वे फिर धन का भक्षण न कर सकें और जो भक्षण किया हो उसको उगल दें ।

शासन द्वारा नियुक्त अधिकारी धन का दुरुपयोग मूलतः दो प्रकार से करते हैं । एक तो यह है कि वह किसी कार्यविशेष के लिए आबंटित धन को पूरा या अंशतः, अकेले या अन्य जनों से मिलकर, हड़प जाए; दूसरा यह कि वह अपने अधीनस्थ कर्मचारियों एवं कार्य से संबंधित अन्य व्यक्तियों की उचित निगरानी नहीं करता, जिससे वे धनका लाभ स्वयं उठाते हैं और दूसरों को उठाने देते हैं । कौटिल्य (चाणक्य) के अनुसार पहली स्थिति में उस अधिकारी से दायित्व छीन लेना चाहिए, साथ ही उसकी पदावनति की जानी चाहिए अथवा उसे पदमुक्त कर देना चाहिए । इसी के साथ उसके द्वारा अर्जित धन छीन लेना चाहिए । दूसरी स्थिति में कार्यमुक्त करते हुए उसकी पदावनति की जानी चाहिए । उदाहरणार्थ निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर नजर न रखने वाले अधिकारी के विरुद्ध कार्यवाही होनी चाहिए, भले ही वह उस कार्य में धन न कमा रहा हो । कार्य के प्रति लापरवाही भी दंडनीय है ।

न भक्षयन्ति ये अर्थान् न्यायतो वर्धयन्ति च ।

नित्याधिकाराः कार्यास्ते राज्ञः प्रियहिते रताः ॥

(ये अर्थान् न भक्षयन्ति न्यायतः वर्धयन्ति च, राज्ञः प्रिय-हिते रताः ते नित्य-अधिकाराः कार्याः ।)

(कौटिलीय अर्थशास्त्रद्वितीय अधिकरणप्रकरण 25)

अर्थ – जो कर्मचारी राजा का धन नहीं हड़पते, बल्कि उसे न्यायसम्मत तरीके से बढ़ाते हैं, राजा के प्रियदायक हितों में संलग्न रहने वाले वैसे कर्मियों को अधिकारियों के तौर पर कार्य में नियुक्त किया जाना चाहिए ।

पूर्वकाल में राजकीय व्यवस्था प्रायः सभी समाजों में प्रचलित थी तदनुसार राजकीय कोष को राजा का धन कहा जाता है । उसी धन से सभी विकास एवं जनसुविधाओं के कार्य किए जाते थे । आज के संदर्भ में राजा उस संस्था को व्यक्त करता है जो देश की शासकीय व्यवस्था चलाती है । विभिन्न स्रोतों से धन एकत्रित करना और उसे जनकल्याण आदि के कायों में लगाना उसी संस्था का दायित्व होता है । धन प्राप्ति, उसका संचय तथा समुचित व्यय प्रशासनिक तंत्र द्वारा राजाओं के काल में और आज के लोकतंत्रों या अन्य शासकीय व्यवस्थाओं में किया जाता है । उक्त नीतिवचन इस मत पर जोर डालता है कि धन संबंधी तमाम कार्यों में संलग्न अधिकारियों पर राजा या शासकों की पैनी दृष्टि रहनी चाहिए कि वे निष्ठा से कार्य कर रहे कि नहीं । जो व्यक्ति राजकोश को हानि पहुंचा रहा हो उसे तुरंत जिम्मेदारी के पद से हटाया जाना चाहिए, उसके पदावनत कर देना चाहिए और उससे कोश को पहुंचे नुकसान की भरपाई की जानी चाहिए ।

दुर्भाग्य से हमारे देश में ऐसे लोगों के विरुद्ध सामान्यतः कोई कार्रवाई नहीं होती है । चूंकि सरकारी मुलाजिमों को उचित दंड नहीं दिया जाता है, अतः भ्रष्टाचार करने से कोई डरता नहीं । – योगेन्द्र जोशी

(यहां प्रस्तुत जानकारी चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी, द्वारा प्रकाशित कौटिलीय अर्थशास्त्र, संस्करण 2006, पर आधारित है ।)

“यथा हि जिह्वा-तलस्थम् मधु …” – कौटिलीय अर्थशास्त्र में भ्रष्टाचारी के संबंध में कहे गए वचन (1)

आचार्य चाणक्य के नाम से प्रायः सभी परचित होंगे । चणक के पुत्र होने के कारण उनको चाणक्य कहा जाता था, अन्यथा उनका नाम विष्णुदत्त था । उन्हें कौटिल्य के नाम से भी जाना जाता है । मैंने पहले कभी लिखी गई एक पोस्ट में उनका संक्षिप्त परिचय दिया है ।

“कौटिलीय अर्थशास्त्र” चाणक्यरचित एक ग्रंथ है, जिसमें राजा, राजकर्मचारियों एवं प्रजा के अलग-अलग क्षेत्रों में भूमिकाओं तथा कर्तव्यों का विवरण दिया गया है । उसके एक अध्याय में भ्रष्टाचार तथा भ्रष्ट अधिकारियों के बारे में लिखा गया है । मैं यहां पर तत्संबंधित 5 श्लोकों में से 3 को उद्धृत कर रहा हूं ।

यथा ह्यनास्वादयितुं न शक्यं जिह्वातलस्थं मधु वा विषं वा ।

अर्थस्तथा ह्यर्थचरेण राज्ञः स्वल्पोऽप्यनास्वादयितुं न शक्यः ॥

(यथा हि जिह्वा-तलस्थम् मधु वा विषम् वा न-आस्वादयितुम् न शक्यम्, तथा हि राज्ञः अर्थचरेण अर्थः स्वल्पः अपि न-आस्वादयितुं न शक्यः ।)

(यह तथा आगे दिए गए नीतिवचन कौटिलीय अर्थशास्त्र, द्वितीय अधिकरण, प्रकरण 25 से लिए गए हैं ।)

अर्थ – जिस प्रकार जीभ पर रखे शहद अथवा विष का रसास्वादन किए बिना नहीं रहा जा सकता है, ठीक वैसे ही राजा द्वारा आर्थिक प्रबंधन में लगाए गए व्यक्ति द्वारा धन का थोड़ा भी स्वाद न लिया जा रहा हो यह संभव नहीं ।

तात्पर्य यह है कि जो चीज आपके मुख में आ चुकी है उसका स्वाद कैसा है यह तो आपको पता चलेगा ही । और यदि वह स्वाद मन माफिक हुआ तो उसका आकर्षण तो अनुभव करेंगे ही, अधिक नहीं तो कुछ तो उसे और चखने की लालसा आपमें जग सकती है । कौटिल्य के अनुसार कुछ ऐसा ही राजकीय धन के साथ भी हो सकता है । जिस व्यक्ति को उसे संचित रखने या सही तरीके से खर्चने की जिम्मेदारी दी गई हो उसके मन में उसका कुछ हिस्सा पाने का, उससे कुछ लाभ कमाने का, लालच कदाचित उपज सकता है । उसमें से कुछ चुंगी अपने नाम करने में वह संभवतः हिचके ही नहीं । यह चुंगी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष तौर पर लिया जा सकता है, जैसे दलाली के रूप में । बिरले ही होते हैं जो इस लालच से अपने को मुक्त रखना चाहते हों या रख पाते हों ।

मत्स्या यथान्तःसलिले चरन्तो ज्ञातं न शक्याः सलिलं पिबन्तः ।

युक्तास्तथा कार्यविधौ नियुक्ता ज्ञातुं न शक्या धनमाददानाः ॥

(मत्स्याः यथा अन्तः-सलिले चरन्तः सलिलम् पिबन्तः ज्ञातुम् न शक्याः, तथा कार्य-विधौ युक्ताः नियुक्ताः धनम् आददानाः ज्ञातुम् न शक्याः ।)

अर्थ – जैसे पानी के अंदर चलायमान मछलियों का पानी पीना जाना नहीं जा सकता, वैसे ही कार्य-संपादन में लगाये जाने पर नियुक्त अधिकारियों द्वारा धन के अपहरण को नहीं जाना जा सकता है ।

राजस्व एकत्रित करने अथवा उसे उचित प्रकार से खर्चने की जिन अधिकारियों पर जिम्मेदारी होती है वे वस्तुतः कितनी ईमानदारी बरत रहे हैं यह आम जन प्रत्यक्षतः नहीं जान पाते हैं, क्योंकि उनके पास संबंधित धनराशि और उसके उपयोग का विवरण नहीं होता । जब कोई संस्था या व्यक्ति काफी मेहनत और छानबीन से जानकारी इकठ्ठा करता है तभी लोग कुछ जान पाते हैं । इसीलिए यह कहा जा सकता है कि पता नहीं वे क्या और कैसे कार्य कर रहे हैं ।

अपि शक्या गतिर्ज्ञातुं पततां खे पतत्त्रिणाम् ।

न तु प्रच्छन्नभावानां युक्तानां चरतां गतिः ॥

(खे पतताम् पतत्त्रिणाम् गतिः ज्ञातुम् अपि शक्या, न तु चरताम् प्रच्छन्न-भावानाम् युक्तानाम् गतिः ।)

अर्थ – आसमान में उड़ रहे पक्षियों की गति का ज्ञान पाना संभव है, किंतु कार्य में लगाए गए छिपे हुए भावों वाले व्यक्तियों के दायित्व-निर्वाह-प्रणाली को समझ पाना संभव नहीं ।

कहने का मतलब यह है कि उड़ते पक्षी किधर एवं किस रफ्तार से उड़ रहे है इसे उन पर नजर डालकर सामान्य व्यक्ति काफी हद तक समझ सकता है । उनका व्यवहार संदिग्ध नहीं होता । सरकारी कर्मचारी क्या सोच के बैठा है, वह दिखा क्या रहा है और वास्तव में क्या करने का इरादा रखता है, यह सब सरलता से नहीं जाना जा सकता है ये बातें । अपने देश में आजकल के घटित हो रहे आर्थिक अपराधों से समझ में आ जाती हैं । जब सब कुछ घट जाता है तब समझ में आता है कि बहुत कुछ गलत हो रहा है । तब भी यह स्पष्ट हो पाता है कि वास्तव में कौन जिम्मेदार है । यही कारण है कि देश में अपराधों की बाढ़ तो आ रही लेकिन दंडित बिरले ही होते हैं ।

लोभ-लालच-लालसा मनुष्य में तमाम अन्य गुणावगुणों की भांति स्वभावतः विद्यमान रहते हैं । इनकी मौजूदगी कभी धन-लोलुपता के रूप में स्वयं को उजागर करती है, तो कभी समाज में प्रतिष्ठित पदों पर पहुंचने अथवा कभी लोगों पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के तौर पर, इत्यादि । इनको प्राप्त करने के लिए अनुचित कदम भी उठाने की इच्छा यदाकदा मनुष्य में जागने लगती है । किंतु सभ्य मानव समाज के मूल्य मनुष्य को आत्मसंयमित रहने को प्रेरित करते हैं । फिर भी सभी मनुष्य चारित्रिक तौर पर पर्याप्त सक्षम नहीं होते और इसी कारण अपनी लालसाओं को पूरा करने वे को भ्रष्टाचार का मार्ग अपना लेते हैं । कौटिलीय अर्थशास्त्र के उपर्युक्त वचन यह स्पष्ट करते हैं कि भ्रष्टाचार समाज में सदा से रहा है । हां, ढाई हजार वर्ष पूर्व की तुलना में आज यह अधिक व्यापकता पा चुका है । वस्तुतः इसमें उत्तरोत्तर वृद्धि ही हो रही है । – योगेन्द्र जोशी

(यहां प्रस्तुत जानकारी चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी, द्वारा प्रकाशित कौटिलीय अर्थशास्त्र, संस्करण 2006, पर आधारित है ।)

अंत में भोजपुर मंदिर (भोपाल के पास) की तस्वीर –

भोजपुर मंदिर, म.प्र. 1

कौटिलीय अर्थशास्त्र का मत (2) – धन के गबन का पता करना असंभव-सा

इस ब्लॉग की पिछली प्रविष्टि में मैंने सरकारी धन के दुरुपयोग के संदर्भ में कौटिल्य (चाणक्य) के विचारों का आंशिक उल्लेख किया था । इस आलेख में उसी सिलसिले में अन्य तीन श्लोकों की मैं चर्चा कर रहा हूं ।

अपि शक्या गतिर्ज्ञातुं पततां खे पतत्त्रिणाम् ।
न तु प्रच्छन्नभावानां युक्तानां चरतां गतिः ॥
(कौटिलीय अर्थशास्त्र, प्रकरण 25 – उपयुक्तपरीक्षा)
(खे पततां पतत्त्रिणाम् गतिः ज्ञातुं अपि शक्या, प्रच्छन्न-भावानां चरतां युक्तानां गतिः तु न ।)

अर्थः आकाश में उड़ते-विचरते पक्षियों की गति को समझना (कि वे किस दिशा में आगे बढ़ेंगे या चक्कर लगाने लगेंगे, आदि) संभव है, किंतु राजकाज में नियुक्त व्यक्ति के मन में (धन लूटने, उसके दुरुपयोग करने, आदि) छिपे भावों को जान पाना संभव नहीं ।

सरकारी धन के दुरुपयोग के बारे किसी शासकीय कर्मी की योजना का पता कोई नहीं कर सकता । दुरुपयोग हो चुकने पर ही पता चलता है कि उसने क्या-क्या हथकंडे अपनाए होंगे ।

आस्रावयेच्चोपचितान् विपर्यस्येच्च कर्मसु ।
यथा न भक्षयन्त्यर्थं भक्षितं निर्वमन्ति वा ॥
(यथा पूर्वोक्त)
(कर्मसु उपचितान् च आस्रावयेत्, विपर्यस्येत् च, यथा अर्थं न भक्षयन्ति, भक्षितं वा निर्वमन्ति ।)

अर्थः (राजा का कर्तव्य है कि गबन करने वाले) राजकार्य में नियुक्त व्यक्तियों की संपदा छीन ले और उन्हें निम्नतर पदों पर अवनत कर दे, ताकि वे राज्य-धन न डकार पावें तथा उदरस्थ किये गये को उगल दें ।

मंतव्य यह है कि भ्रष्ट राज्यकर्मी को दंडित किया जाए । सबसे सार्थक एवं भयोत्पादक दंड यही है उसकी संपदा छीन ली जाए, ताकि उसे लेने के देने पड जाएं । दुर्भाग्य से अपने मौजूदा शासकीय व्यवस्था में आर्थिक अपराधी मुश्किल से ही कभी दंडित होते हैं । दंड के अभाव में उनके हौसले बुलंद रहते हैं ।

न भक्षयन्ति ये त्वर्थान् न्यायतो वर्धयन्ति च ।
नित्याधिकाराः कार्यास्ते राज्ञः प्रियहिते रताः ॥
(यथा पूर्वोक्त)
(ये तु अर्थान् न भक्षयन्ति, न्यायतः वर्धयन्ति च, राज्ञः प्रिय-हिते रताः ते नित्य-अधिकाराः कार्याः ।)

अर्थः जो शासकीय धन नहीं हड़पते बल्कि उचित विधि से उसकी वृद्धि करते हैं, राजा के हित में लगे रहने वाले ऐसे राज्यकर्मियों को अधिकार-संपन्न पदों पर नियुक्त किया जाना चाहिए ।

राज्यकर्मी की नियुक्ति की योग्यता का एक आवश्यक पहलू है उसकी निष्ठा । महज शैक्षिक योग्यता राज्यहित नहीं साधती है । शासन को चाहिए कि वह व्यक्ति की नीयत एवं राज्य के प्रति कर्तव्यशीलता को ध्यान में रखते हुए उसे नियुक्त करे । हमारी व्यवस्था में कागजी योग्यता ही सर्वोपरि समझी जाती है । उसका चारित्रिक आकलन शायद ही कहीं किया जाता है । सर्वत्र व्याप्त आर्थिक भ्रष्टाचार इस बात का प्रमाण है । – योगेन्द्र जोशी

कौटिलीय अर्थशास्त्र का मत (1) – शासकीय धन का अपहरण राजकर्मियों का स्वभाव है

कौटिल्य सुविख्यात ऐतिहासिक पुरुष चाणक्य का वैकल्पिक नाम हैचाणक्य के बारे में दो-चार परिचयात्मक शब्द पहले कभी मैंने इसी ब्लॉग में लिखे हैं । उनका परिवार-प्रदत्त असली नाम विष्णुदत्त था किंतु चणक के पुत्र होने के नाते वे चाणक्य नाम से ही विख्यात हुए । कुटिल राजनीति में पारंगत होने के कारण उन्हें कौटिल्य नाम से भी संबोधित किया जाता है । एक बात पर विशेष ध्यान देना चाहिए कि चाणक्य की राजनीति उस अर्थ में कुटिल नहीं थी जिस रूप में हमें आजकल देखने को मिल रही है । अपने वैयक्तिक हित साधने में उन्होंने कुटिल मार्ग अपनाया हो ऐसा मैं नहीं मानता । चातुर्यपूर्ण राजनीति का समाज एवं राष्ट्रहित में उन्होंने भरपूर प्रयोग किया और यही औसत आदमी की दृष्टि में कुटिलता थी ।

कौटिलीय अर्थशास्त्र चाणक्य की एक कृति है जिसमें उन्होंने राजकाज की कारगर व्यवस्था कैसी होनी चाहिए इसका वर्णन किया है । राजा ने जनहित में क्या करना चाहिए एवं क्या नहीं इसका उल्लेख किया है । चाणक्य ने ईसा से करीब 320 वर्ष पूर्व चंद्रगुप्त मौर्य का शासन स्थापित किया था । यूनानी शासक सिकंदर उनका समकालीन था । बाद में उसी मौर्य कुल में अशोक महान सम्राट हुए थे । उस काल की व्यवस्था राजा-केंद्रित थी और परिस्थितियां आज से सर्वथा भिन्न थीं । अतः कौटिलीय अर्थशास्त्र की समस्त बातें आज के युग के लिए बहुत अर्थ नहीं रखती हैं । फिर भी उसमें ऐसी बहुत-सी बातें पढ़ने को मिल जाती हैं जो काफी महत्व की हैं । अधोलिखित पाठ में मैंने कौटिल्य के उन वचनों का उल्लेख किया है जो यह स्पष्ट करते हैं कि कैसे शासकीय कार्य के लिए नियत धन राजकर्मियों द्वारा ‘लूटी’ जाती है और उसका पता तक नहीं चल पाता है । तत्संबंधित दो श्लोक आगे दिए गए हैं:

यथा ह्यनास्वादयितुं न शक्यं जिह्वातलस्थं मधु वा विषं वा ।
अर्थस्तथा ह्यर्थचरेण राज्ञः स्वल्पोऽप्यनास्वादयितुं न शक्यः ॥
(कौटिलीय अर्थशास्त्र, प्रकरण 25 – उपयुक्तपरीक्षा)
(यथा हि जिह्वा-तल-स्थं मधु वा विषं वा अन्-आ-स्वादयितुं न शक्यं, तथा हि राज्ञः अर्थ-चरेण स्वल्पः अर्थः अपि अन्-आ-स्वादयितुं न शक्यः ।) (अन्-आ-स्वादयितुं = न आस्वादयितुं)

अर्थः जिस प्रकार जीभ पर पड़ा मधु (शहद या मधुर खाद्य पदार्थ) अथवा विष (घातक या कष्टप्रद अखाद्य) पदार्थ का स्वाद लिये बिना रहना असंभव है, उसी प्रकार का कल्याण-कार्य में नियुक्त कर्मी के लिए योजना हेतु प्रदत्त धन के एक अंश का स्वाद लिए बिना रह पाना मुश्किल है ।

तात्पर्य यह है कि जब किसी अधिकारी को योजना के लिए धन मिलता है तो उसकी लार टपकने लगती है, और वह उसमें से चुंगी निकालकर अपनी जेब में डालने की कोशिश करता है । यह प्रवृत्ति मनुष्य में सदा से ही रही है । खर्च को थोड़ा बढ़ाचढ़ाकर दिखाने और वास्तविक खर्च कुछ कम करके पैसा बटोरने का रास्ता सदा से अपनाया जाता रहा है । दुर्भाग्य से आजकल हालत यह हो चुकी है कि कागज पर कार्य दिखाकर पूरा पैसा हजम करने में भी अब लोगों को लज्जा नहीं आती । देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के हाल सभी के समक्ष है ।

मत्स्या यथान्तःसलिले चरन्तो ज्ञातुं न शक्याः सलिलं पिबन्तः ।
युक्तास्तथा कार्यविधौ नियुक्ता ज्ञातुं न शक्या धनमाददानाः ॥
(यथा पूर्वोक्त)
(यथा अन्तः-सलिले चरन्तः मत्स्याः सलिलं पिबन्तः ज्ञातुं न शक्याः, तथा कार्य-विधौ युक्ताः नियुक्ताः धनम् आददानाः ज्ञातुं न शक्याः ।)

अर्थः जिस प्रकार यह जान पाना संभव नहीं हो पाता है कि कब तालाब के चल में तैरती मछलियां पानी पा रही हैं और बक नहीं, उसी प्रकार राजकीय कार्य में लगाये गए कर्मचारी के बारे में यह पता लगा पाना मुश्किल होता है कि वह कब धन हड़प रहा है ।

शासकीय कार्य का धन शासन द्वारा नियुक्त कर्मचारियों के हाथों में होता है । वे कब किस प्रकार उसे खर्च कर रहे हैं इसका पता सरलता से नहीं लगता है । उनकी हरकतों पर नजर रखने के लिए जांच-पड़ताल वाली संस्थाएं जरूर होती हैं । किंतु वे हर क्षण नजर नहीं रखती हैं । अधिकांशतः सब कुछ कर्मचारियों के विवेक एवं निष्ठा पर टिका रहता है । इसी का लाभ उठाकर वे स्वयं को सोंपे गये धन का अपव्यय कर डालते हैं । इस अपव्यय का पता चलाना और उसे सिद्ध कर पाना कितना पेचीदा होता है यह हम देख ही रहे हैं । – योगेन्द्र जोशी