महाभारत महाकाव्यः वृक्षरोपण एवं जलाशय विषयक नीतिवचन (4)

विगत ५ तारीख (जनवरी) और उसके पहले की चिट्ठा-प्रविष्टियों में महाभारत महाकाव्य के एक प्रकरण (भीष्म पितामह द्वारा महाराज युधिष्ठिर को दिये गये वृक्षों एवं जलाशयों की महत्ता के उपदेश) का जिक्र किया गया था । उसी से संबंधित इस अंतिम किश्त में नीति विषयक अन्य दो श्लोकों का उल्लेख मैं आगे कर रहा हूं:

तडागकृत् वृक्षरोपी इष्टयज्ञश्च यो द्विजः ।

एते स्वर्गे महीयन्ते ये चान्ये सत्यवादिनः ॥

(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 58, श्लोक 32)

(तडाग-कृत् वृक्ष-रोपी इष्ट-यज्ञः च यः द्विजः, एते स्वर्गे महीयन्ते ये च अन्ये सत्य-वादिनः ।)

अर्थ – तालाब बनवाने, वृक्षरोपण करने, अैर यज्ञ का अनुष्ठान करने वाले द्विज को स्वर्ग में महत्ता दी जाती है; इसके अतिरिक्त सत्य बोलने वालों को भी महत्व मिलता है ।

द्विज का शाब्दिक अर्थ है जिसका दूसरा जन्म हुआ हो । हिंदु परंपरा के अनुसार आम तौर पर तीन वर्णों, ब्राह्मण, क्षत्रिय, एवं वैश्य के लिए द्विज शब्द प्रयुक्त होता है जिनमें यज्ञोपवीत की प्रथा रही है । यह बात कर्मकांडों से जुड़ी है । गहराई से सोचा जाए तो द्विज का अर्थ संस्कारित व्यक्ति से है । कहा गया है “जन्मना जायते शूद्र संस्कारैर्द्विज उच्यते” । अर्थात् जन्म से तो सभी शूद्र ही पैदा होते हैं, संस्कारित होने से ही वह द्विज होता है । संस्कारवान् से तात्पर्य है सदाचरण का जिसे पाठ दिया जा चुका हो, जैसा यज्ञोपवीत के समय किया जाता है । मात्र जनेऊ धारण करने से संस्कारित नहीं हो जाता है कोई; असल बात सदाचरण से बनती है । मैं समझता हूं उक्त श्लोक में द्विज का निहितार्थ यही है ।

यज्ञ का अर्थ सामान्यतः समिधा से प्रज्वलित अग्निकुंड में घी-तिल-जौ जैसे हवनीय सामग्री से हवन करने से लिया जाता हैं । किंतु मैं मानता हूं कि यज्ञ के अर्थ इससे अधिक व्यापक हैं । मेरी राय में यज्ञ का अर्थ विविध कर्तव्यों के संपादन से लिया जाना चाहिए जिनकी मनुष्य से अपेक्षा की जाती है । कदाचित् इसीलिए शास्त्रों में पंच महायज्ञों (भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, एवं ब्रह्मयज्ञ) का उल्लेख मिलता है, जो मनुष्य और मनुष्येतर प्राणियों, पितरों, आदि के प्रति समर्पित रहते हैं । (देखें https://vichaarsankalan.wordpress.com/2010/09/07/ऋग्वैदिक-सूक्ति-आनोभद्र/)सत्य बोलने की महत्ता को तो विश्व के सभी समाजों में मान्यता प्राप्त है, भले ही व्यवहार में तदनुरूप आचरण विरले ही करते हों ।

तस्मात्तडागं कुर्वीत आरामांश्चैव रोपयेत् ।

यजेच्च विविधैर्यज्ञैः सत्यं च सततं वदेत् ॥

(पूर्वोक्त, श्लोक 33)

(तस्मात् तडागं कुर्वीत आरामान् च एव रोपयेत्, यजेत् च विविधैः यज्ञैः सत्यं च सततं वदेत् ।)

अर्थ – उपर्युक्त बातों को दृष्टि में रखते हुए मनुष्य को चाहिए कि वह तालाबों का निर्माण करे/करवाए; बाग-बगीचे बनवाए; विविध प्रकार के यज्ञों का अनुष्ठान करे; और सत्य बोलने का संकल्प ले ।

आराम शब्द संस्कृत के रम् क्रियाधातु से बना है, जिसका अर्थ है आनंद अनुभव करना, प्रसन्न होना, रम जाना आदि । उसके अनुसार आराम का अर्थ बाग-बगीचा, पार्क, रमणीय स्थल, घूमने-फिरने का स्थान आदि लिया जा सकता है । मनुष्य को ऐसे स्थलों का निर्माण कराना चाहिए । यज्ञ का व्यापक अर्थ मैंने हितकर कर्तव्यों के संपादन से लिया है । मनुष्य सत्कर्म करे और मिथ्या भाषण न करे यही संदेश इस श्लोक से लिया जा सकता है । – योगेन्द्र जोशी

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महाभारत महाकाव्यः वृक्षरोपण एवं जलाशय विषयक नीतिवचन (3)

मैंने १६ अक्टूबर एवं १२ नवंबर के आलेखों में महाभारत महाकाव्य के एक प्रकरण का जिक्र किया था, जिसमें भीष्म पितामह द्वारा महाराज युधिष्ठिर को दिये गये वृक्षों एवं जलाशयों की महत्ता के उपदेश का वर्णन किया गया है । कई हफ़्तों के बाद मैं उसी विषय पर अगले दो श्लोकों को यहां उद्धृत कर रहा हूं:

पुष्पिताः फलवन्तश्च तर्पयन्तीह मानवान् ।

वृक्षदं पुत्रवत् वृक्षास्तारयन्ति परत्र च ॥

(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 58, श्लोक 30)

(इह पुष्पिताः फलवन्तः च मानवान् तर्पयन्ति, वृक्षाः वृक्षदं पुत्रवत् परत्र च तारयन्ति ।)

अर्थ – फलों और फूलों वाले वृक्ष मनुष्यों को तृप्त करते हैं । वृक्ष देने वाले अर्थात् समाजहित में वृक्षरोपण करने वाले व्यक्ति का परलोक में तारण भी वृक्ष करते हैं ।

पेड़-पौधों का महत्व फल-फूलों के कारण होता ही हैं । अन्य प्रकार की उपयोगिताएं भी उनसे जुड़ी हैं, जैसे पथिकों को छाया, गृहस्थों को जलाने के लिए इंधन, भवन निर्माण के लिए लकड़ी, इत्यादि । स्वर्ग-नर्क में विश्वास करने वालों के मतानुसार परलोक में मनुष्य का तारण पुत्र करता है । इस नीति वचन के अनुसार वृक्ष भी पुत्रवत् उसका तारण करते हैं

तस्मात् तडागे सद्वृक्षा रोप्याः श्रेयोऽर्थिना सदा ।

पुत्रवत् परिपाल्याश्च पुत्रास्ते धर्मतः स्मृताः ॥

(पूर्वोक्त, श्लोक 31)

(तस्मात् श्रेयस्-अर्थिना तडागे सद्-वृक्षा सदा रोप्याः पुत्रवत् परिपाल्याः च, ते धर्मतः पुत्राः स्मृताः ।)

अर्थ इसलिए श्रेयस् यानी कल्याण की इच्छा रखने वाले मनुष्य को चाहिए कि वह तालाब के पास अच्छे-अच्छे पेड़ लगाए और उनका पुत्र की भांति पालन करे । वास्तव में धर्मानुसार वृक्षों को पुत्र ही माना गया है ।

वृक्षों की उपयोगिता देखते हुए उनको पुत्र कहा गया है । जिस प्रकार मनुष्य अपने पुत्र का लालन-पालन करता है वैसे ही वृक्षों का भी करे । जैसे सुयोग्य पुत्र माता-पिता एवं समाज का हित साधता है वैसे ही वृक्ष भी समाज के लिए हितकर होते हैं ।

मेरा मानना है कि नीतिवचनों में जहां कहीं पुत्र शब्द का प्रयोग किया जाता है वहां उसका अर्थ संतान समझना चाहिए । इस संसार में पुत्र एवं पुत्री की भूमिका समान रूप से महत्वपूर्ण समझी जानी चाहिए, क्योंकि प्राणीजगत् में दोनो की महत्ता समान रूप से देखी जाती है । – योगेन्द्र जोशी

महाभारत महाकाव्यः वृक्षरोपण एवं जलाशय विषयक नीतिवचन (1)

महर्षि व्यासविरचित महाकाव्य महाभारत में एक प्रकरण है, जिसमें भीष्म पितामह महाराज युधिष्ठिर को प्रजा के हित में शासन चलाने के बारे में उपदेश देते हैं । यह प्रकरण कौरव-पांडव समाप्ति के बाद युधिष्ठिर द्वारा राजकाज संभालने के समय का है । इसी के अंतर्गत एक स्थल पर मृत्युशय्या पर आसीन भीष्म जलाशयों के निर्माण एवं वृक्षरोपण की आवश्यकता स्पष्ट करते हैं । ये बातें महाकाव्य के अनुशासन पर्व के अठावनवें अध्याय में वर्णित हैं । ३३ श्लोकों के उक्त अध्याय में बहुत-सी बातें कही गई हैं । मैं अध्याय के अंतिम ८ श्लोकों को इस ब्लॉग में उद्धृत कर रहा हूं:

अतीतानागते चोभे पितृवंशं च भारत ।
तारयेद् वृक्षरोपी च तस्मात् वृक्षांश्च रोपयेत् ॥
(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय ५८, श्लोक २६)
(भारत! वृक्ष-रोपी अतीत-अनागते च उभे पितृ-वंशं च तारयेद्, तस्मात् च वृक्षान् च रोपयेत् ।)
अर्थ – हे युधिष्ठिर! वृक्षों का रोपण करने वाला मनुष्य अतीत में जन्मे पूर्वजों, भविष्य में जन्मने वाली संतानों एवं अपने पितृवंश का तारण करता है । इसलिए उसे चाहिए कि पेड़-पौंधे लगाये ।

तस्य पुत्रा भवन्त्येते पादपा नात्र संशयः ।
परलोगतः स्वर्गं लोकांश्चाप्नोति सोऽव्ययान् ॥
(पूर्वोक्त, श्लोक २७)
(एते पादपाः तस्य पुत्राः भवन्ति अत्र संशयः न; परलोक-गतः सः स्वर्गं अव्ययान् लोकान् च आप्नोति ।)
अर्थ मनुष्य द्वारा लगाए गये वृक्ष वास्तव में उसके पुत्र होते हैं इस बात में कोई शंका नहीं है । जब उस व्यक्ति का देहावसान होता है तो उसे स्वर्ग एवं अन्य अक्षय लोक प्राप्त होते हैं ।

अधिकतर हिंदू पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं । प्रायः सभी मानते हैं कि आत्मा अमर होती है और उसके जन्म का अर्थ है भौतिक शरीर धारण करना और मृत्यु उस देह का त्यागा जाना । मृत्यु पश्चात् वह इस मर्त्यलोक से अन्य लोकों में विचरण करती है जो उसके कर्मों पर निर्भर करता है और जहां उसे सुख अथवा दुःख भोगने होते हैं ।

मान्यता यह भी है कि देहमुक्त आत्मा का तारण या कष्टों से मुक्ति में पुत्र का योगदान रहता है । संस्कृत में पुत्र शब्द की व्युत्पत्ति इसी रूप में की गयी है । (पुंनाम्नो नरकाद्यस्मात्त्रायते पितरं सुतः । तस्मात्पुत्र इति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयम्भुवा ॥ अर्थात् ‘पुं’ नाम के नरक से जिस कारण सुत पिता का त्रारण करता है उसी कारण से वह पुत्र कहलाता है ऐसा स्वयंभू ब्रह्मा द्वारा कहा गया है । – मनुस्मृति, अध्याय 9, श्लोक 138 ।) मेरा मानना है कि पुत्र शब्द व्यापक अर्थ में प्रयुक्त किया गया है, अर्थात् यह पुत्र एवं पुत्री दोनों को व्यक्त करता है, कारण कि पुत्री – स्त्रीलिंग – की व्युत्पत्ति भी वस्तुतः वही है । कई शब्द पुल्लिंग में इस्तेमाल होते हैं, किंतु उनसे पुरुष या स्त्री दोनों की अभिव्यक्ति होती है, जैसे मानव या मनुष्य अकेले मर्द को ही नहीं दर्शाता बल्कि मर्द-औरत सभी उसमें शामिल रहते हैं । आदमी या इंसान स्त्री-पुरुष सभी के लिए प्रयोग में लिया जाता है । मैं समझता हूं कि प्राचीन काल में पुत्र सभी संतानों के लिए चयनित शब्द रहा होगा। कालांतर में वह रूढ़ अर्थ में प्रयुक्त होने लगा होगा।

उपर्युक्त श्लोकों के भावार्थ यह लिए जा सकते हैं कि वृक्षों का लगाना संतानोत्पत्ति के समान है । वे मनुष्य की संतान के समान हैं, इसलिए वे मनुष्य के पूर्वजों/वंशजों के उद्धार करने में समर्थ होते हैं । वृक्ष की तुलना संतान से की गयी है।

स्वर्ग/नरक की बातें विश्वसनीय हों या न हों, वृक्षों की महत्ता संदेह से परे है । आज के युग में जब मानवजाति परिवेश-पर्यावरण की समस्याओं को वैश्विक स्तर पर झेल रही है, वृक्षों की उपादेयता सहज रूप से अनुभव होने लगी है ।

इस शृंखला के शेष श्लोकों का उल्लेख आगामी आलेखों में – योगेन्द्र जोशी

सामर्थ्यवान् व्यक्ति ‘पापी’ पर नियंत्रण रखे – महाकाव्य महाभारत के और्व ऋषि प्रकरण में वर्णित नीति

महाकाव्य महाभारत में और्व नामक भृगुवंशी ऋषि से संबद्ध एक प्रकरण है । उसके अनुसार एक बार क्षत्रिय लोग धर्मविरुद्ध व्यवहार करते हुए अकारण भृगुवंशियों को सताने और उनका संहार करने लगे । उनके आचरण से कुपित हो ऋषि और्व ने स्वयं उनका विनाश करने का संकल्प ले लिया और अपने अभियान पर उतर पड़े । उनके परलोकवासी पितरों को उनका ऐसा करना अनुचित लगा, फलतः उन्होंने दर्शन देते हुए उन्हें समझाने का प्रयास किया । लेकिन पितरों से असहमति व्यक्त करते हुए उन्होंने अपने अभियान के औचित्य को विस्तार से स्पष्ट किया । उसी संदर्भ में निम्नलिखित दो श्लोक मुझे विशेष रूप से विचारणीय और प्रासंगिक लगेः(महाभारत, आदिपर्व, अध्याय १७९, श्लोक १० एवं ११, क्रमशः)

यदा तु प्रतिषेद्धारं पापो न लभते क्वचित् ।

तिष्ठन्ति बहवो लोकास्तदा पापेषु कर्मसु ।।

(यदा तु पापः प्रतिषेद्धारं क्वचित् न लभते तदा बहवः लोकाः पापेषु कर्मसु तिष्ठन्ति ।)

जब भी किसी पापी पुरुष के सामने कहीं कोई ऐसा व्यक्ति नहीं रह जाता जो उसे पापकर्म से रोके, तब बहुत-से लोग उसकी भांति पापकर्म में लिप्त हो जाते हैं । वस्तुतः पापकर्म में लिप्त होने की प्रवृत्ति संक्रामक होती है । समाज में यही अधिकतर देखने को मिलता है कि लोग ऐसे जनों का अनुकरण सहजता से करते हैं जो अनुचित कार्यों में लिप्त रहते हैं, क्योंकि ऐसा करना स्वार्थसिद्धि में सहायक होता है । जब उद्दंड लोग निर्भय होकर अनुचित कार्य करते हैं तो दूसरे भी वैसे आचरण से परहेज करना छोड़ देते हैं । ऐसी दशा में आदर्श केवल कथनी की बातें होकर रह जाती हैं, न कि करनी की ।

जानन्नपि च यः पापं शक्तिमान् न नियच्छति ।

ईशः सन् सोऽपि तेनैव कर्मणा सम्प्रयुज्यते ।।

(यः शक्तिमान् ईशः सन् अपि च जानन् पापं न नियच्छति सः अपि तेन एव कर्मणा सम्प्रयुज्यते ।)

जो शक्ति-संपन्न व्यक्ति अनुशासित रखने की सामर्थ्य रखते हुए और सब कुछ जानते हुए भी पापी को नियंत्रण में नहीं रखता वह भी उस पाप का भागीदार बन जाता है । सामान्यतः राज्य चलाने वाले (राजा या जनप्रतिनिधि) और उनके प्रतिनिधियों (प्रशासनिक अधिकारियों) को यह अधिकार एवं दायित्व मिला रहता है कि वे पापियों को नियंत्रण में रखें । जब ये लोग अपना दायित्व भूल जाते हैं तो स्वयं वे पापकर्म के लिए जिम्मेदार हो जाते हैं और फलतः दंडित किये जाने चाहिए ।

दंडित कौन करे

दंडित कौन करे इसका उत्तर और्व ऋषि के प्रकारण में प्राप्त होता है । निश्चय ही पापकर्म करने वाले को रोका जाना चाहिए । यदि पापी को रोका न जाये तो अन्य कमजोर तथा स्वार्थी जन यह मानने लगते हैं कि चूंकि कोई रोकने वाला नहीं है अतः पाप से बचने की जरूरत नहीं । एक-दूसरे की देखा-देखी समाज में पाप का भय खोने लगता है । हम देख ही रहे हैं कि आज हमारे समाज में कोई भय नहीं है । वास्तव में दो प्रकार के लोग समाज में देखने में आते हैं; एक वे जो स्वयं ही पाप से बचने का विचार रखते हैं (उन्हें उनकी ‘आत्मा’ की आवाज रोकती है, न कि कोई बाह्य कारण या एजेंसी), और दूसरे वे लोग जो बाह्य कारणों से डरकर पाप से बचते हैं । इस श्रेणी के लोग पापकर्म में तब लिप्त हो जाते हैं जब उन्हें इन बाह्य कारणों का भय नहीं रह जाता है ।

समाज में तरह-तरह के भय होते हैं और उनमें सबसे बड़ा कानून का भय होता है । लेकिन आज कानून का भय लुप्तप्राय हो चुका है । इसके अतिरिक्त किसी समय समाज में उठने वाली उंगली का भय भी व्यक्ति को रोकता था, किंतु आज के युग में सामाजिक बहिष्कार जैसी चीजें नहीं रह गयी हैं । अतः पापकर्म बढ़ने की परिस्थितियां पैदा हो चुकी हैं । ऐसी अवस्था में ‘कानून अपने हाथ में लेने’ की बात उठती है । यही तथ्य और्व ऋषि ने अपने पितरों को समझाया था । और्व ऋषि का कथन था कि जिसे पापियों को रोकने की जिम्मेदारी मिली हो और जो ऐसा करने में साधनों तथा अन्य प्रकार से सक्षम हो वही जब मूक दृष्टा बन जाये और अपना दायित्व न निभाए तब पापी पर नियंत्रण रखने का उस व्यक्ति की हो जाती है जो अपनंे बल पर ऐसा करने में समर्थ हो । अर्थात् उसने ‘कानून को अपने हाथ में’ ले लेना चाहिए । जब सामाजिक व्यवस्था निष्प्रभावी हो जाय तो व्यक्ति को स्वयं सुधार का मार्ग खोजना चाहिए । मैं व्यक्तिगत तौर पर इसका पक्षधर हूं, लेकिन शर्त यह है कि ऐसा स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि समाज को सुधारने और उसे दोषमुक्त करने के इरादे से किया जाए ।

पाप की व्याख्या

उक्त संदर्भ में पाप की व्याख्या क्या हो यह पूछा जा सकता है । मुझे शंका है कि पाप की सुनिश्चित परिभाषा लोगों के बीच नहीं व्याप्त है । पाप शब्द वस्तुतः हिंदू समाज की धार्मिकता से संबद्ध है और उसे अधिकतर लोग धर्म के संदर्भ में ही परिभाषित करते हैं । अंग्रेजी का ‘सिन्’ (sin) इसका तुल्य शब्द माना जाता है । लेकिन ख्रीस्तीय मतावलंबियों के लिए जो ‘सिन्फुल’ हो वह हिंदुओं की दृष्टि में भी वैसा ही हो यह आवश्यक नहीं है । तात्पर्य यह है कि पाप की स्पष्ट तथा सर्वस्वीकार्य परिभाषा शायद नहीं है । मेरी अपनी दृष्टि में पाप की अवधारणा बहुत व्यापक है और आजकल जो निर्बाध गति से बढ़ रहा अनियंत्रित भ्रष्टाचार हमारे समाज में व्याप्त है उसे भी मैं पाप के अंतर्गत मानता हूं । भ्रष्टाचार आम तौर पर प्रचलित कानूनों के संदर्भ में देखा जाता है, और यह संभव है कि जो कानूनन स्वीकार्य हो वह भी पापपूर्ण हो । जिस कार्य के बारे में कानून मूक हो वह भी पापपूर्ण हो सकता है । मेरे मत में पाप को भ्रष्टाचार से कहीं अधिक व्यापक अर्थवत्ता की दृष्टि से देखा जाना चाहिए । मैं मानता हूं कि जो कुछ भी विशुद्ध स्वार्थ से प्रेरित होकर किया जाता है, जिसे धर्म तथा नैतिकता के प्रतिकूल माना जाता है, जो समाज के लिए व्यापक स्तर पर हानिकर अथवा घातक हो, वह सब पाप है । मैं तो यहां तक मानता हूं कि प्रकृति के संसाधनों का जो अमर्यादित दोहन शीघ्रातिशीघ्र और अधिकाधिक संपन्नता अर्जित करने के विचार से कुछ लोगों के द्वारा किया जा रहा है वह भी पापकर्म है । वस्तुतः जब कुछ लोग घोर विपन्नता में जी रहे हों और अन्य कोई व्यक्ति असीमित संपदा बटोरे और उसका एकांश भी समाज हित में न लगाए तो वह भी पापपूर्ण है, हालाकि इसे अवैध नहीं कहा जाएगा । पाप क्या है क्या नहीं यह विषय इस युग में निरर्थक हो चला है । आज का युग ‘यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्‌’ का है । अर्थात् जब तक जीवित हैं तक तक सभी सुख भोग लो, और उसे पाने के लिए जो भी किया जाए वह सब उचित है । वर्तमान युग में पाप-पुण्य की बात करना निरर्थक और कायरतापूर्ण माना जाने लगा है । यही सब मुझे आज के मानव आचरण में दिखाई देता है । – योगेन्द्र जोशी