“अहिंसा परमो धर्मः …” – महाभारत में अहिंसा संबंधी नीति वचन (1)

“अहिंसा परमो धर्मः” यह नीति-वचन लोगों के मुख से अक्सर सुनने को मिलता है। प्राचीन काल में अपने भारतवर्ष में जैन तीर्थंकरों ने अहिंसा को केंद्र में रखकर अपने कर्तव्यों का निर्धारण एवं निर्वाह किया। अंतिम तीर्थंकर भगवान् महावीर के लगभग समकालीन (कुछ बाद के) महात्मा बुद्ध ने भी करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व तमाम कर्तव्यों के साथ अहिंसा का उपदेश तत्कालीन समाज को दिया था। अरब भूमि में ईशू मसीह ने भी कुछ उसी प्रकार की बातें कहीं। आधुनिक काल में महात्मा गांधी को भी अहिंसा के महान् पुजारी/उपदेष्टा के रूप में देखा जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने तो उनके सम्मान में 2 अक्टूबर को अहिंसा दिवस घोषित कर दिया।

अहिंसा की बातें घूमफिर कर सभी समाजों में की जाती रही हैं, लेकिन उसकी परिभाषा सर्वत्र एक जैसी नहीं है। उदाहरणार्थ जैन धर्म में अहिंसा की परिभाषा अति व्यापक है, किसी भी जीवधारी को किसी भी प्रकार से कष्ट में डालना वहां वर्जित है। इस धारणा के साथ जीवन धारण करना लगभग नामुमकिन है। अरब मूल के धर्मो के अनुसार मनुष्य को छोड़कर अन्य जीवों में रूह नहीं होती, तदनुसार उनके साथ अहिंसा बेमानी है। कुर’आन से मैंने यही निष्कर्ष निकाला। वास्तव में सभी समाज अपने भौतिक हितों को ध्यान में रखते हुए अहिंसा की परिभाषा अपनाते हैं। विडंबना देखिए कि महावीर, बुद्ध एवं गांधी के इस भारत में अहिंसा की कोई अहमियत नहीं। पग-पग पर हिंसा के दर्शन होते है। अहिंसा वस्तुतः एक आदर्श है जिससे आम तौर पर सभी परहेज करते हैं। लेकिन “अहिंसा परमो धर्मः” की बात मंच पर सभी कहते हैं।

अस्तु, अहिंसा या हिंसा की वकालत करना इस आलेख में मेरा उद्देश्य नहीं है। “अहिंसा परमो धर्मः” की नीति की मानव जीवन में सार्थकता है या नहीं इसकी समीक्षा मैं नहीं कर रहा हूं। मैं केवल यह बताना चाहता हूं कि इस नीति का उल्लेख महाभारत महाकाव्य में कई स्थालों पर देखने को मिलता है। उन्हीं की चर्चा करना मेरा प्रयोजन है। जो यहां उल्लिखित हो उसके अतिरिक्त भी अन्य स्थलों पर बातें कही गयी होंगी जिनका ध्यान या जानकारी मुझे नहीं है।

अहिंसा परमो धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः ।

सत्ये कृत्वा प्रतिष्ठां तु प्रवर्तन्ते प्रवृत्तयः ॥74

(महाभारत, वन पर्व, अध्याय 207 – मारकण्डेयसमास्यापर्व)

(अहिंसा परमः धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः सत्ये तु प्रतिष्ठाम् कृत्वा प्रवृत्तयः प्रवर्तन्ते ।)

अर्थ – अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है, और वह सत्य पर ही टिका होता है। सत्य में निष्ठा रखते हुए ही कार्य संपन्न होते हैं।

यहां कार्य से तात्पर्य सत्कर्मों से होना चाहिए। सत्कर्म सत्य के मार्ग पर चलने से ही संभव होते हैं। धर्म बहुआयामी अवधरणा है। मनुष्य के करने और न करने योग्य अनेकानेक कर्मों का समुच्चय धर्म को परिभाषित करता है। करने योग्य कर्मों में अहिंसा सबसे ऊपर या सबसे पहले है यह उपदेष्टा का मत है।

महाभारत ग्रंथ के वन पर्व में पांडवों के 12 वर्षों के वनवास (उसके पश्चात् एक वर्ष का नगरीय अज्ञातवास भी पूरा करना था) का वर्णन है। वे वन में तमाम ऋषि-मुनियों के संपर्क में आते हैं जिनसे उन्हें भांति-भांति का ज्ञान मिलता है। उसी वन पर्व में पांडवों का साक्षात्कार ऋषि मारकंडेय से भी होता है। ऋषि के मुख से उन्हें कौशिक नाम के ब्राह्मण और धर्मनिष्ठ व्याध के बीच के वार्तालाप की बात सुनने को मिलती है। उक्त श्लोक उसी के अंतर्गत उपलब्ध है।

अगले दो श्लोक अनुशासन पर्व से लिए गए हैं। महाभारत युद्ध के बाद सब शांत हो जाता है और युधिष्ठिर राजा का दायित्व संभाल लेते हैं। भीष्म पितामह सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में मृत्यु-शैया पर लेटे होते हैं। वे युधिष्ठिर को राजधर्म एवं नीति आदि का उपदेश देते हैं। ये श्लोक उसी प्रकरण के हैं।

अहिंसा सर्वभूतेभ्यः संविभागश्च भागशः ।

दमस्त्यागो धृतिः सत्यं भवत्यवभृताय ते ॥18

(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 60 – दानधर्मपर्व)

(अहिंसा सर्व-भूतेभ्यः संविभागः च भागशः दमः त्यागः धृतिः सत्यम् भवति अवभृताय ते ।)

अर्थ – सभी प्राणियों के प्रति अहिंसा बरतना, सभी को यथोचित भाग सोंपना, इंद्रिय-संयम, त्याग, धैर्य एवं सत्य पर टिकना अवभृत स्नान के तुल्य (पुण्यदायी) होता है।

वैदिक परंपरा में यज्ञ-यागादि का विशेष महत्व है और उन्हें पुण्य-प्राप्ति का महान् मार्ग माना जाता है। ऐसे आयोजन के समापन के पश्चात विधि-विधान के साथ किए गये स्नान को अवभृत स्नान कहा गया है। यहां बताये गये अहिंसा आदि उस स्नान के समान फलदातक होते हैं यह श्लोक का भाव है।

उक्त श्लोक में “अहिंसा परमो धर्मः” कथन विद्यमान नहीं है, किंतु अहिंसा के महत्व को अवश्य रेखांकित किया गया है। वनपर्व का अगला श्लोक ये है:

अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तपः ।

अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते ॥23

(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 115 – दानधर्मपर्व)

(अहिंसा परमो धर्मः तथा अहिंसा परम्‍ तपः अहिंसा परमम्‍ सत्यम्‍ यतः धर्मः प्रवर्तते ।)

अर्थ – अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा परम तप है, और अहिंसा ही परम सत्य और जिससे धर्म की प्रवृत्ति आगे बढ़ती है।

इस वचन के अनुसार अहिंसा, तप और सत्य आपस में जुड़े हैं। वस्तुतः अहिंसा स्वयं में तप है, तप का अर्थ है अपने को हर विपरीत परिस्थिति में संयत और शांत रखना। जिसे तप की सामर्थ्य नहीं वह अहिंसा पर टिक नहीं सकता। इसी प्रकार सत्यवादी ही अहिंसा पर टिक सकता है यह उपदेष्टा का मत है।

अहिंसा की जितनी भी प्रशंसा हम कर लें, तथ्य यह है कि मानव समाज अहिंसा से नहीं हिंसा से चलता है। मैं अगले चिट्ठा-प्रवृष्टि में “अहिंसा …” पर अनुशासन पर्व के अन्य श्लोकों के साथ अपने इस मत की भी चर्चा करूंगा। – योगेन्द्र जोशी

“राजकलिं हन्युः प्रजाः”(महाभारत के वचन) – प्रजा की सुरक्षा के प्रति बेपरवाह राजा मृत्युदंड के योग्य

भारतीयों के लिए वेदव्यासरचित महाकाव्य महाभारत एक सुपरिचित ग्रंथ है जिसकी कथाओं का जिक्र लोग यदाकदा करते रहते हैं । महाभारत में वर्णित पांडव-कौरवों के युद्ध की समाप्ति के बाद राजा युधिष्ठिर सरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह से राजकार्य संबंधी नीतिवचन प्राप्त करते हैं । राजा के लिए क्या कृत्य है क्या नहीं इस बाबत अनेकानेक बातें भीष्म बताते हैं । उसी प्रकरण में वे यह भी कहते हैं कि उस राजा को प्रजा ने मृत्युदंड दे देना चाहिए जो उनकी सुरक्षा को गंभीरता से नहीं लेता है । मैं तत्संबंधित तीन श्लोकों की चर्चा यहां पर कर रहा हूं । ये तीनों महाभारत के अनुशासनपर्व (अध्याय ६१) से उद्धृत किए जा रहे हैं ।

क्रोश्यन्त्यो यस्य वै राष्ट्राद्ध्रियन्ते तरसा स्त्रियः ।

क्रोशतां पतिपुत्राणां मृतोऽसौ न च जीवति ॥३१॥

(महाभारत, अनुशासनपर्व, अध्याय ६१)

(यस्य वै राष्ट्रात् क्रोशताम् पतिपुत्राणाम् क्रोश्यन्त्यः स्त्रियः तरसा ध्रियन्ते असौ मृतः न च जीवति ।)

अर्थ – जिस राजा के राज्य में चीखती-चिल्लाती स्त्रियों का बलपूर्वक अपहरण होता है और उनके पति-पुत्र रोते-चिल्लाते रहते हैं, वह राजा मरा हुआ है न कि जीवित ।

जो राजा अपहरण की जा रही स्त्रियों की सुरक्षा के लिए समुचित कदम नहीं उठाता और उनके दुःखित बंधु-बांधवों की विवशता से विचलित नहीं होता वह जीते-जी मरे हुए के समान है । उसके जीवित होने की कोई सार्थकता नहीं रह जाती ।

 

ध्यान रहे कि आज के लोकतांत्रिक शासकीय व्यवस्था में जो सत्ता के शीर्ष पर हो वही राजा की भूमिका निभाता है । इसलिए राजा के संदर्भ में जो बातें कही गई हैं वह आज के शासकों पर यथावत लागू होती हैं । अपने देश के कुछ राज्यों, जैसे उत्तर प्रदेश, में इस समय स्त्रियों के प्रति दुष्कर्म के मामले चरम पर हैं, किंतु शासकीय व्यवस्था इतनी गिरी हुई है कि किसी को दंडित नहीं किया जा रहा है । ऐसे शासकों को वस्तुतः डूब मरना चाहिए!

 

अरक्षितारं हर्तारं विलोप्तारमनायकम् ।

तं वै राजकलिं हन्युः प्रजाः सन्नहा निर्घृणम् ॥३२॥

(यथा पूर्वोक्त)

(अरक्षितारम् हर्तारम् विलोप्तारम् अनायकम् तम् निर्घृणम् राजकलिम् प्रजाः वै सन्नहा हन्युः ।)

अर्थ – जो राजा अपनी जनता की रक्षा नहीं करता, उनकी धनसंपदा छीनता या जब्त करता है, जो योग्य नेतृत्व से वंचित हो, उस निकृष्ट राजा को प्रजा ने बंधक बनाकर निर्दयतापूर्वक मार डालना चाहिए ।

 

राजा का कर्तव्य है अपनी प्रजा की रक्षा करना, उसको सुख-समृद्धि के अवसर प्रदान करना । तभी वह जनता से कर वसूलने का हकदार बन सकता है । अपने कर्तव्यों का निर्वाह न करने वाला राजा जब कर वसूले तो उसको लुटेरा ही कहा जाएगा । नीति कहती है कि ऐसे राजा को निकृष्ट कोटि का मानना चाहिए । उसके प्रति दयाभाव रखे बिना ही परलोक भेज देना चाहिए ।

 

आज की शासकीय स्थिति कुछ राज्यों में अति दयनीय है । परंतु दुर्भाग्य से सत्तासुख भोग रहे वहां के शासकों को दंडित करने वाला कोई नहीं । लोग कहते हैं कि पांच-पांच सालों में होने वाले चुनावों द्वारा जनता उन्हें सत्ता से बेदखल कर देती है । लेकिन ध्यान दें कि न चुना जाना कोई दंड नहीं होता है । किसी भी चुनाव में कई प्रत्याशी भाग लेते हैं जिनमें से एक चुना जाता है । “अन्य सभी को दंडित कर दिया” ऐसा क्या कहा जा सकता है ? सवाल असल में दंडित किये जाने का है जो वास्तव में होता नहीं ।

 

अहं वो रक्षितेत्युक्त्वा यो न रक्षति भूमिपः ।

स संहत्य निहंतव्यः श्वेव सोन्मादः आतुरः ॥३३॥

(यथा पूर्वोक्त)

(अहम् वः रक्षिता इति उक्त्वा यः भूमिपः न रक्षति सः स-उन्मादः आतुरः श्व-इव संहत्य निहंतव्यः ।)

अर्थ – मैं आप सबका रक्षक हूं यह वचन देकर जो राजा रक्षा नहीं करता, उसे रोग एवं पागलपन से ग्रस्त कुत्ते की भांति सबने मिलकर मार डालना चाहिए ।

 

इस श्लोक में कटु शब्दों का प्रयोग हुआ है । शासक का पहला कर्तव्य है कि वह भयमुक्त समाज की रचना करे –  भयमुक्त निरीह-निरपराध प्रजा के लिए, न कि अपराधियों के लिए । आज की स्थिति उल्टी है । अपराधी निरंकुश-स्वच्छंद विचरण करते हुए और सामान्य जन डरे-सहमे दिखते हैं । जिस शासक के राज्य में ऐसा हो उसे ग्रंथकार ने पागल कुत्ते की संज्ञा दी है । ऐसे कुत्ते का एक ही इलाज होता है, मौत । दुर्भाग्य से हमारे शासक सबसे पहले अपनी सुरक्षा का इंतजाम करते हैं । कोई सामान्य व्यक्ति उनके पास पहुंच तक नहीं सकता, आगे कुछ करने का तो सवाल ही नहीं ।

 

ये नीतिश्लोक दर्शाते हैं कि महाभारत ग्रंथ में कर्तव्यों में विफल शासक को पतित और निकृष्ट श्रेणी का कहा गया है । – योगेन्द्र जोशी

‘दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति …’ – महाभारत, शांतिपर्व, में शासकीय दण्ड की नीति

महाभारत महाकाव्य के आरंभिक पर्व – आदिपर्व – में अपराधी को देय दण्ड की महत्ता का उल्लेख है । उसका जिक्र मैंने पहले की एक पोस्ट में किया था । मुझे महाभारत युद्ध के बाद की स्थिति से संबंधित पर्व – शान्तिपर्व – में भी दण्ड की बातें पढ़ने को मिली हैं । मैं कुछ चुने हुए श्लोकों का उल्लेख आगे कर रहा हूं । (संदर्भः महाभारत, शान्तिपर्व, अध्याय 15)

दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति ।

दण्डः सुप्तेषु जागर्र्ति दण्डं धर्म विदुर्बुधाः ॥2॥

(दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वाः दण्ड एव अभिरक्षति दण्डः सुप्तेषु जागर्र्ति दण्डं धर्मः विदुः बुधाः ।)

भावार्थः (अपराधियों को नियंत्रण में रखने के लिए दण्ड की व्यवस्था हर प्रभावी एवं सफल शासकीय तंत्र का आवश्यक अंग होती है ।) यही दण्ड है जो प्रजा को शासित-अनुशासित रखता है और यही उन सबकी रक्षा करता है । यही दण्ड रात्रिकाल में जगा रहता है और इसी को विद्वज्जन धर्म के तौर पर देखते हैं ।

शासन का कर्तव्य है कि वह हर क्षण अपराधों को रोकने के लिए सजग रहे। रात हो या दिन, उसके राजकर्मी घटित हो रहे अपराधों पर नजर रखें और अपराधी को दंडित करें । यदि ऐसा न हो तो लोग सुरक्षित नहीं रहेंगे । दण्ड ही शासकीय तंत्र का प्रमुख धर्म है ।

दण्डश्चेन्न भवेल्लोके विनश्येयुरिमाः प्रजाः ।

जले मत्स्यानिवाभक्षन् दुर्बलान् बलवत्तराः ॥30॥

(दण्डः चेत् न भवेत् लोके विनश्येयुः इमाः प्रजाः जले मत्स्यान् इव अभक्षन् दुर्बलान् बलवत्-तराः ।)

भावार्थः यदि दण्ड न रहे, अर्थात् दण्ड की प्रभावी व्यवस्था न हो, तो प्रजा का विनाश निश्चित है । जिस प्रकार पानी में पलने वाली छोटी मछली का भक्षण बड़ी मछली कर डालती है उसी प्रकार अपेक्षया अधिक बलवान् व्यक्ति दुर्बलों का ‘भक्षण’ कर डालेंगे ।

प्रभावी दण्ड के अभाव का अर्थ है अराजकता । अधिकांश जन दण्ड के भय से अपराधों से बचे रहते हैं । अगर दण्ड न रहे तो लूटपाट-छीनाझपटी आम बात हो जाएंगी । ताकतवर लोग अपनी दबंगई के बल पर कमजोरों को नचाना आरंभ कर देंगे, उन्हें भांति-भांति प्रकार से प्रताड़ित करने लगेंगे । मनुस्मृति में भी यह बात कही गयी है, जिसकी चर्चा मैंने अन्यत्र कही है । वहां दिये गये श्लोक के शब्द थोड़े भिन्न हैं:

यदि न प्रणयेद्राजा दण्डं दण्ड्येष्वतन्द्रितः । शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन्दुर्बलान्बलवत्तराः ॥

सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्जनः ।

दण्डस्य हि भयात् भीतो भोगायैव प्रवर्तते ॥34॥

(सर्वः दण्डजितः लोकः दुर्लभः हि शुचिः जनः दण्डस्य हि भयात् भीतः भोगाय एव प्रवर्तते ।)

भावार्थः यह संसार दण्ड से ही जीता जा सकता है, अर्थात् यहां पर लोग दण्ड के प्रयोग से ही नियंत्रित रहते हैं । अन्यथा स्वभाव से सच्चरित्र लोग यहां विरले ही होते हैं । यह दण्ड का ही भय है कि लोग भोगादि की मर्यायाओं का उल्लंघन नहीं करते हैं ।

मनुस्मृति में यह श्लोक दो-चार शब्दों के अंतर के साथ यों दिया गया हैः

सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्नरः । दण्डस्य हि भयात्सर्वं जगद्भोगाय कल्पते ॥

दण्डे स्थिताः प्रजाः सर्वा भयं दण्डे विदुर्बुधाः ।

दण्डे स्वर्गो मनुष्याणां लोको९यं सुप्रतिष्ठितः ॥43॥

(दण्डे स्थिताः प्रजाः सर्वाः भयं दण्डे विदुः बुधाः दण्डे स्वर्गः मनुष्याणां लोकः अयं सुप्रतिष्ठितः ।)

भावार्थः संपूर्ण प्रजा दण्ड में स्थित रहती है । अर्थात् दण्ड की व्यवस्था के अंतर्गत लोग अनुशासित रहते हैं और अपने कर्तव्यों की अवहेलना नहीं करते हैं । मनुष्य के परलोक एवं इहलोक, दोनों ही, दण्ड पर टिके हैं ।

दण्ड का भय उसे पापकर्मों से बचाता है, अतः उसके कृत्य उसके अपने लिए एवं समाज के लिए अहितकर नहीं होते हैं । उस स्थिति में परलोक भी – यदि इसके अस्तित्व में आस्था रखी जाए तो – दुःखमुक्त होगा ऐसी अपेक्षा की जाती है ।

न तत्र कूटं पापं वा वञ्चना वापि दृष्यते ।

यत्र दण्डः सुविहितश्चरत्यरिविनाशनः ॥44॥

(न तत्र कूटं पापं वा वञ्चना वा अपि दृष्यते यत्र दण्डः सुविहितः चरति अरि-विनाशनः ।)

भावार्थः जहां शत्रुनाशक दण्ड का संचालन सुचारु तौर पर चल रहा हो वहां छल-कपट, पाप या ठगी जैसी बातें देखने को नहीं मिलती हैं ।

शत्रु से मतलब है वह जो अपने भ्रष्ट आचरण से समाज का अहित करने पर तुला हो । दण्ड उनको नियंत्रण में रखता है, अतः उसे शत्रुनाशक कहा गया है । उसी के समुचित प्रयोग किए जाने पर समाज में लोगों का व्यवहार असामाजिक नहीं हो पाता है । मैंने मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, एवं महाभारत आदि जैसे प्राचीन ग्रंथों में दण्ड की बात पढ़ी है । न्याय की बात उनमें कम ही की गयी है । उनमें अपराधियों को दण्डित करने की बातों पर बल दिया गया है । मुझे लगता है कि तत्कालीन नीतिकार भली भांति समझते थे कि अपराधी को दण्डित तो कर सकते हैं, किंतु भुक्तभोगी को न्याय दे सकें यह शायद नहीं हो सकता है । जो हो चुका उसको उलटा ही नहीं जा सकता है । जो मर चुका उसे वापस नहीं ला सकते । दूसरे के कुकृत्य का दंश झेलने वाले की पीड़ा समाप्त नहीं हो सकती । जिसका मूल्यवान् समय छीना जा चुका हो उसे वापस नहीं पाया जा सकता है । इसलिए न्याय की अवधारणा भ्रामक है । केवल दण्ड की ही बात सार्थक है और उसके कार्यान्वयन में न्याय भी निहित हो यह मानना मूर्खता है ।

यह अपने देश का दुर्भाग्य है कि यहां दण्ड व्यवस्था निष्प्रभावी-सी हो चुकी है, खासकर रसूखदार लोगों के मामले में । योगेन्द्र जोशी

“यदा यदा हि धर्मस्य …”: कितना सार्थक है श्रीमद्भगवद्गीता का यह वचन? – शेष भाग

टिप्पणी – मैं अपने जो विचार यहां लिख रहा हूं  उनसे कई जन  असहमत होंगे। कई जन  आक्रोषित भी हो  सकते हैं। मेरी प्रार्थना है कि जैसे ही आपको लगे कि विचार निकृष्ट हैं, आप आगे न पढ़े। असहमत होते हुए भी यदि पढ़्ना स्वीकार्य हो तो अपना ख़ून खौलाए बिना इन बातों को किसी मूर्ख अथवा सनकी की बातें समझकर अनदेखी कर दें और बड़प्पन  दिखाते हुए मुझे क्षमा कर दें। धन्यवाद, शुक्रिया, थैंक्यू। 

जुलाई २६ की अपनी पोस्ट में मैंने श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन के प्रति कहे गये वचन “यदा यदा हि धर्मस्य …” की चर्चा की थी । मैंने अपना मत व्यक्त किया था कि श्रीकृष्ण ने धर्म की स्थापना वास्तव नहीं की और वे ऐसा कर भी नहीं सकते थे । किंतु युद्ध के प्रति बेमन हो चुके अर्जुन को प्रेरित करने के लिए उन्होंने यह तथा अन्य बातें कहीं थीं । मेरा मुख्य तर्क यह था कि महाभारत युद्ध के बाद ही अधर्म अधिक पुष्ट हो कर समाज में छाया और धर्म लोगों के जीवन से गायब होने लगा । श्रीकृष्ण स्वयं यह जानते थे कि जो होना है उसे वस्तुतः टाला नहीं जा सकता है । अपनी बात स्पष्ट करने के लिए मैं उस युद्ध के बाद क्या हुआ इसे बताता हूं ।

महाभारत के स्त्रीपर्व में अठारह-दिवसीय युद्ध की समाप्ति के पश्चात् अपने परिजनों-प्रियजनों की मृत्यु पर शोकाकुल कौरव-पांडव स्त्रियों के विलाप का वर्णन है । उसी में शोकसंतप्त महारानी गांधारी युद्ध को न रोक पाने के लिए श्रीकृष्ण को दोष देती हैं । उन्हें खरीखोटी सुनाते हुए वे बहुत कुछ कह जाती हैं और अंत में श्रीकृष्ण को वृष्णि-अंधक वंशीय यादवों के नाश का शाप दे डालती हैं । गांधारी के तत्संबंधित वचन अधोलिखित श्लोकों में वर्णित हैं:

शक्तेन बहुभृत्येन विपुले तिष्ठता बले ।
उभयत्र समर्थेन श्रुतवाक्येन चैव ह ॥४०॥
इच्छतोपेक्षितो नाशः कुरूणां मधुसूदन ।
यस्मात् त्वया महाबाहो फलं तस्मादाप्नुहि ॥४१॥

(महाभारत, स्त्रीपर्व, अध्याय २५)

हे महाबाहु मदुसूदन श्रीकृष्ण! तुम शक्तिशाली थे, तुम्हारे पास सेवकों एवं सैनिकों की विशाल संख्या थी, तुममें दोनों पक्षों (कौरव-पांडव) को मनवाने की सामर्थ्य थी, तुम शास्त्रादि के ज्ञाता थे, फिर भी तुमने स्वेच्छया कुरुवंश के विनाश की उपेक्षा की (विनाश होने दिया, उसे रोकने के लिए प्रभावी प्रयास नहीं किए) । अतः अपनी इस गंभीर चूक का तुम्हें फल भुगतना होगा ।

पतिशुश्रूषया यन्मे तपः किञ्चिदुपार्जितम् ।
तेन त्वां दुरवापेन शप्स्ये चक्रगदाधर ॥४२॥

(पूर्वोक्त संदर्भ)

हे चक्र एवं गदा धारण करने वाले श्रीकृष्ण! पति की सेवा-सुश्रूषा से मैंने जो भी तपशक्ति अर्जित की है उस दुर्लभ तप के बल पर मैं तुम्हें शाप देती हूं ।

यस्मात् परस्परं घ्नन्तो ज्ञातयः कुरुपाण्डवाः ।
उपेक्षितास्ते गोविन्द तस्मात्ज्ञातीन् बधिस्यति ॥४३॥

(पूर्वोक्त संदर्भ)

हे गोविंद! चूंकि तुमने एक-दूसरे को मौत की घाट उतारते हुए बंधु-बांधव कौरव-पांडवों की उपेक्षा की (उन्हें ऐसा करने से रोका नहीं) अतः तुम स्वयं अपने ही बांधवों का हनन करोगे ।

गांधारी के शाप-वचन को श्रीकृष्ण ने सहज भाव से सुन लिया । प्रत्युत्तर में उन्होंने यह कहा कि उन्हें मालूम है यह होना है और वे जो कह रही हैं उसमें कुछ भी नया नहीं है । वे पूर्वतः निर्धारित घटना का अग्रिम उल्लेख भर कर रही हैं । उनका उत्तर देखिए:

जानेऽहमेतदप्येवं चीर्णं चरसि क्षत्रिये ।
दैवादेव विनश्यन्ति वृष्णयो नात्र संशयः ॥४४॥

(पूर्वोक्त संदर्भ)

मैं जानता हूं कि ऐसा ही होने वाला है । हे क्षत्राणि! आप वही कर रही हैं जो किया जा चुका है । (शाप के माध्यम से आप उसे नियत कर रही हैं जो पहले से ही घटित होने को नियत है ।) वृष्णिवंशीय यादवों का दैव या नियति के द्वारा विनाश हो जायेगा इसमें कोई शंका नहीं है, आप शाप रूप में उसे कहें या न कहें ।

श्रीकृष्ण के उपर्युक्त वचन में इस तथ्य का उद्घाटन है कि सब कुछ काल (समय) के अधीन है । कोई असल में कुछ करता नहीं है (स्व्यं वे भी नहीं), किंतु व्यक्ति इस भ्रम में रहता है कि वही कुछ कर रहा है । वह जो करता है वह काल के वशीभूत होकर । इस पर अधिक टिप्पणी करने से पूर्व मैं विज्ञानियों – वस्तुतः भौतिकीविदों या फिजिसिस्टों – के मत का उल्लेख करता हूं । भौतिकी के अनुसार भवितव्य अननुमेय (unpredictable) है, यानी उसे घटित होने के पूर्व ही जान लेना संभव नहीं । इसके आगे दो मत है: पहला कि भवितव्य क्या पूर्वनिर्धारित (determinate) है ? अर्थात् ‘भविष्य में क्या होगा’ यह है तो निश्चित, पर उसे हम जान नहीं सकते । दूसरा यह कि भवितव्य पूर्वतः अनिर्धारित (indeterminate) है, अर्थात् वर्तमान का क्षण ही भवितव्य की एकाधिक संभावनाओं में से किसी एक को चुनकर नियत करता है । ‘अगले क्षण क्या होगा’ इसे हर बीता क्षण निश्चित करता है । इस प्रकार भवितव्य क्षण दर क्षण स्वरूप ग्रहण करता जाता है । ऐसे में हम केवल सर्वाधिक संभावना वाले अनुमान के आधार पर भविष्य की बात कर पाते हैं । किंतु प्रकृति उसी संभावना को चुनेगी यह निश्चित नहीं रहेगा । काल के बारे में मैंने एक लेख ३० मार्च 2009 की तारीख पर इसी ब्लाग में लिखा है ।

श्रीकृष्ण का कथन इस दूसरे मत के अनुरूप है । जहां भौतिकीविद् भविष्य को अननुमेय मानता है, वहीं श्रीकृष्ण के लिए व पूर्वतः ज्ञात है । तब प्रश्न है कि क्या भविष्य की तस्वीर का आभास किसी बिरले व्यक्ति को मिल जाता है, भले ही वह नियंत्रण से परे हो ? मौजूदा प्रसंग के अनुसार, हां ।

मुझे लगता है कि श्रीकृष्ण को भविष्य की घटनाओं का ज्ञान हो चला था, और वे यह भी जानते थे भविष्य नियंत्रण से परे होता है । लगता है कि वे महाभारत के युद्ध का आभास पा चुके थे और यह भी समझते थे कि उसे टाला नहीं जा सकता है । उस युद्ध में उनकी स्वयं की भूमिका उनकी चुनी हुई नहीं थी । सब कुछ काल के अधीन था । अर्जुन के प्रति उनके उपदेश भी काल के द्वारा सुनियत घटना के हिस्से थे । उनके मुख से जो वचन निकलने थे वे निकले । युद्ध पश्चात् यादवगण आपस में ही लड़ मरेंगे और उनका नाश होगा यह भी वे जानते थे । गांधारी के शाप से वह सब नहीं घटित हुआ, बल्कि भविष्य की उस अटल होनी के अनुरूप ही महारानी के मुख से वे शब्द निसृत हुए । उक्त श्लोक से यही अर्थ प्रतिपादित होता है । यादव-विनाश की कहानी लंबी है और महाभारत के मौसल पर्व में वर्णित है ।

मुझे ऐसा लगता है कि यह सृष्टि एक विशाल रंगमंच है, जिसमें सजीव-निर्जीव सभी अपना-अपना चरित्र निभाते हैं । हरएक का किरदार प्रकृति तय करके बैठी रहती है और उसके अनुरूप वह हर क्षण आपसे कर्म कराती है, मानो कि आप उसके हाथ में कठपुतली हों ।

व्यक्ति का इस प्रकार काल के अधीन होना एक गंभीर सवाल खड़ा कर देता है । क्या हम सचमुच कुछ नहीं करते हैं ? काल सब कुछ हमसे करवाता है ? तब सही-गलत के अर्थ ही क्या रह जाते हैं ? न सत्कर्म का श्रेय किसी को दिया जा सकता है, और न ही दुष्कार्य के लिए दोष । किंतु यह विचार मन के लिए सुपाच्य नहीं है ।

अस्तु, अपनी आरंभिक बात पर लौटते हुए दुबारा यही कहता हूं कि ‘यदा यदा …’ के अनुसार धर्म की जो स्थापना होनी चाहिए थी वह वस्तुतः कभी हुई नहीं ।योगेन्द्र जोशी

“यदा यदा हि धर्मस्य …”: कितना सार्थक है श्रीमद्भगवद्गीता का यह वचन?

टिप्पणी – 

मैं अपने जो विचार यहां लिख रहा हूं  उनसे कई जन  असहमत होंगे। कई जन  आक्रोषित भी हो  सकते हैं।

मेरी प्रार्थना है कि जैसे ही आपको लगे कि विचार निकृष्ट हैं, आप आगे न पढ़ें।

असहमत होते हुए भी यदि पढ़्ना स्वीकार्य हो तो अपना ख़ून खौलाए बिना इन बातों को किसी मूर्ख अथवा सनकी की बातें समझकर अनदेखी कर दें और बड़प्पन  दिखाते हुए मुझे क्षमा कर दें।

धन्यवाद, शुक्रिया, थैंक्यू। 

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥७॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥८॥
(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४)
(यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः भवति भारत, अभि-उत्थानम् अधर्मस्य तदा आत्मानं सृजामि अहम् । परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुस्-कृताम्, धर्म-संस्थापन-अर्थाय सम्भवामि युगे युगे ।)
(टिप्पणीः श्रीमद्भगवद्गीता वस्तुतः महाकाव्य महाभारत के भीष्मपर्व का एक अंश है; इसके १८ अध्याय भीष्मपर्व के क्रमशः अध्याय २५ से ४२ हैं ।)

भावार्थः जब जब धर्म की हानि होने लगती है और अधर्म आगे बढ़ने लगता है, तब तब मैं स्वयं की सृष्टि करता हूं, अर्थात् जन्म लेता हूं । सज्जनों की रक्षा एवं दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनःस्थापना के लिए मैं विभिन्न युगों (कालों) मैं अवतरित होता हूं ।

मैं नहीं जानता कि ईश्वर होता है कि नहीं । जब कोई मुझसे पूछता है तो मेरा उत्तर स्पष्टतः अज्ञान का होता है, यानी साफ तौर पर “मैं नहीं जानता ।” हो सकता है ईश्वर हो । अथवा हो सकता है वह न हो और हम सदियों से उसके अस्तित्व का भ्रम पाले हुए हों । कोई भी व्यक्ति उसके अस्तित्व को प्रमाणित नहीं कर सकता है, और न ही उसके ‘अनस्तित्व’ को । ऐसे प्रश्नों के संदर्भ में अपनी अनभिज्ञता जताना मेरी वैज्ञानिक सोच के अनुरूप है ।

जब ईश्वर के बारे में निश्चित धारणा ही न बन सकी हो तो श्रीकृष्ण के ईश्वरावतार होने-न-होने के बारे में भला क्या कहा जा सकता है ? ऐसी स्थिति में “मैं युग-युग में जन्म लेता हूं ।” कथन कितना सार्थक कहा जाऐगा ? लेकिन मान लेता हूं कि महाभारत का युद्ध हुआ था, उसमें भगवदावतार श्रीकृष्ण की गंभीर भूमिका थी, और उन्होंने अपने हथियार डालने को उद्यत अर्जुन को ‘धर्मयुद्ध’ लड़ने को प्रेरित किया । उन्होंने युद्धक्षेत्र में जो कुछ कहा क्या वह अर्जुन को युद्धार्थ प्रेरित करने भर के लिए था या उसके आगे वह एक सत्य का प्रतिपादन भी था ? दूसरे शब्दों में, उपर्युक्त दोनों श्लोकों में जो कहा गया है वह श्रीकृष्ण का वास्तविक मंतव्य था, या वह उस विशेष अवसर पर अर्जुन को भ्रमित रखने के उद्येश्य से था । जब मैं गंभीरता से चिंतन करता हूं तो मुझे यही लगता है कि ईश्वर धर्म की स्थापना के लिए पुनः-पुनः जन्म नहीं लेता है ! कैसे ? बताता हूं ।

मान्यता है कि महाभारत का युद्ध द्वापर युग के अंत में हुआ था । उसी के बाद कलियुग का आरंभ हुआ । चारों युगों में इसी युग को सर्वाधिक पाप का युग बताया जाता है । सद्व्यवहार एवं पुण्य का लोप होना इस युग की खासियत मानी जाती है । कहा जाता है पापकर्म की पराकाष्ठा के बाद फिर काल उल्टा खेल खेलेगा और युग परिवर्तन होगा । मैं बता नहीं सकता हूं कि कलियुग के पूर्ववर्ती सैकड़ों-हजारों वर्षों तक स्थिति कितनी शोचनीय थी, धर्म का ह्रास किस गति से हो रहा था, किंतु अपने जीवन में जो मैंने अनुभव किया है वह अवश्य ही निराशाप्रद रहा है । समाज में चारित्रिक पतन लगातार देखता आया हूं । देखता हूं कि लोग अधिकाधिक स्वार्थी होते जा रहे हैं और निजी स्वतंत्रता के नाम पर मर्यादाएं भंग करने में नहीं हिचक रहे हैं । सदाचरण वैयक्तिक कमजोरी के तौर पर देखा जाने लगा है । बहुत कुछ और भी हो रहा है ।

इस दशा में मेरे मन में प्रश्न उठता है कि श्रीकृष्ण के उपर्युक्त कथनों के अनुसार तो उन्हें धर्म की स्थापना करने में सफल होना चाहिए था, तदनुसार अपने पीछे उन्हें एक धर्मनिष्ठ समाज छोड़ जाना चाहिए था । लेकिन हुआ तो इसका उल्टा ही । महाभारत की युद्धोपरांत कथा है कि कौरव-पांडवों का ही विनाश नहीं हुआ, अपितु श्रीकृष्ण के अपने वृष्णिवंशीय यादवों का भी नाश हुआ । ‘सामर्थ्यवान्’ श्रीकृष्ण स्थिति को संभालने में असमर्थ सिद्ध हुए थे । अंत में निराश होकर उन्होंने अपने दायित्व अर्जुन को सौंप दिए और अग्रज बलभद्र के साथ वन में तपस्वी का जीवन बिताने चले गये । वहीं एक व्याध के हाथों उनकी मृत्यु हुई थी ।

कथा के इस अंश की किंचित् विस्तार से चर्चा मेरी अगली पोस्ट की विषय-वस्तु रहेगी ।योगेन्द्र जोशी

‘लक्ष्मण रेखा’! किंतु रामचरितमानस, महाभारत एवं रामायण में इसका उल्लेख ही नहीं!

पिछले कुछ समय से मैं वाल्मीकीय रामायण का अध्ययन कर रहा हूं । मेरे पास इस ग्रंथ की गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा दो खंडों में प्रकाशित प्रति है, जिसमें मूल संस्कृत श्लोकों से साथ-साथ हिंदी में भी उनका अनुवाद दिया गया है । इन संस्कृत श्लोकों के अर्थ समझने में मुझे सामान्यतः कोई खास कठिनाई अनुभव नहीं होती है; फिर भी कभी-कभी गाड़ी अटकने लगती है तो संबंधित हिंदी अनुवाद से मुझे पर्याप्त सहायता मिल जाती है । संप्रति मैं राम-कथा के उस प्रसंग पर पहुंच चुका हूं जिसमें हनुमान् समुद्र लांघकर रावण की लंका जाने की तैयारी कर रहे हैं । इसके पूर्व सीताहरण के प्रसंग के बारे में मैं पढ़ चुका था ।

सीताहरण के संदर्भ में मुझे एक रोचक तथ्य इस ग्रंथ में देखने को मिला । वह यह है कि उसमें ऐसा कहीं उल्लिखित नहीं है कि लक्ष्मण ने मारीच-वध के बाद श्रीराम की मिथ्या पुकार (वस्तुतः मारीच द्वारा ‘हा लक्ष्मण’ की कृत्रिम पुकार) सुनने और सीता की उलाहना झेलने के बाद वन की ओर जाने के पहले कुटिया के परितः कोई सुरक्षा घेरा खींचा हो । अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए मैंने महर्षि व्यास द्वारा रचित महाकाव्य महाभारत (उसमें भी रामकथा की चर्चा है) के पन्ने पलटे । और फिर गोस्वामी तुलसीकृत रामचरितमानस के पृष्ठों पर भी दृष्टि दौड़ाई । ‘लक्ष्मण रेखा‘ की बात वहां भी पढ़ने को नहीं मिली । तब मेरे मन में प्रश्न उठा कि लक्ष्मण रेखा की बात कब ओर कहां से आई ?

लक्ष्मण रेखा की बातें मैं बचपन से सुनता आ रहा हूं । कदाचित् कभी कहीं श्रीराम से जुड़ी किसी कथा में इसे पढ़ा हो, अथवा अपने बुजुर्गों के मुख से तत्संबंधित कथा सुनी हो । इस विषय मैं मुझे कुछ भी ठीक से याद नहीं है । हां, रोजमर्रा की जिंदगी में लोगों के मुख से मौके-बेमौके इस शब्दयुग्म को सुनता आ रहा हूं । क्या है यह लक्ष्मण रेखा ? कहा यही जाता है कि जीवन के विभिन्न कार्य-व्यापारों में मनुष्य को कुछेक मर्यादाओं का पालन करना चाहिए, उन सीमाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए जो नैतिकता, वैधानिकता, अथवा स्थापित परंपरा के आधार पर समाज में स्वीकारी गयी हैं । जब भी कोई ऐसे प्रतिबंधों का उल्लंघन कर बैठता है तो उस पर ‘लक्ष्मण रेखा पार कर दी’ का आरोप लगा दिया जाता है । आजकल अपने देश की राजनीति के संदर्भ में भी इस ‘रेखा’ का उल्लेख बहुधा देखा जाता है । यह बात अलग है कि उसका उल्लंघन करना राजनेताओं का शगल या विशिष्टाधिकार बन चुका है । अस्तु ।

मतलब यह कि ‘लक्ष्मण रेखा’ प्रायः सभी के लिए एक सुपरिचित पदबंध अथवा सामासिक शब्द है । मेरा अनुमान है कि प्रायः सभी इसका संबंध उस कथा से जोड़ते हैं, जिसमें रावण द्वारा सीता का अपहरण न होने पाए इस उद्येश्य से सीता की पर्णकुटी के चारों ओर लक्ष्मण ने ‘कथित तौर पर’ अभिमंत्रित सुरक्षा घेरा खींचा था । प्रचलित कथा के अनुसार रावण उस खतरे को भांप गया; परंतु उसके झांसे में आकर स्वयं सीता उस घेरे को पार कर गयीं और रावण द्वारा हरी गईं । सीता ने उस ‘मर्यादा’ का अतिक्रमण कर डाला । और यहीं से ‘लक्ष्मण रेखा’ स्थापित मर्यादा-सीमा का द्योतक हो गयी । मेरा खयाल है कि लोगों की इस ‘रेखा’ के बारे में कुछ ऐसी ही समझ है ।

मुझे जिज्ञासा हुई कि क्या आधुनिक इंटरनेट खजाने में भी इस बारे में कुछ जानकारी उपलब्ध है । ‘विकीपीडिया’ (अंग्रेजी) पर (अथवा विकी-हिंदी पर) जो जानकारी मुझे मिली वह यों हैः

“रामायण के एक प्रसिद्ध प्रसंग के अनुसार वनवास के समय सीता के आग्रह के कारण राम मायावी स्वर्ण म्रग के आखेट हेतु उसके पीछे गये। थोड़ी देर मे सहायता के लिए राम की पुकार सुनाई दी, तो सीता ने लक्ष्मण से जाने को कहा। लक्ष्मण ने बहुत समझाया कि यह सब किसी की माया है,पर सीता न मानी। तब विवश होकर जाते हुए लक्ष्मण ने कुटी के चारों ओर अपने धनुष से एक रेखा खींच दी कि किसी भी दशा मे इस रेखा से बाहर न आना। तपस्वी के वेश मे आए रावण के झाँसे मे आकर सीता ने लक्ष्मण की खींची हुई रेखा से बाहर पैर रखा ही था कि रावण उसका अपहरण कर ले गया। उस रेखा से भीतर रावण सीता का कुछ नहीं बिगाड़ सकता था। तभी से आज तक [[लक्ष्मण रेखा]] नामक उक्ति इस आशय से प्रयुक्त होती है कि, किसी भी मामले मे निश्चित हद को पार नही करना है, वरना बहुत हानि उठानी होगी। “

श्रीराम की कथा पर विभिन्न भाषाओं में शायद एकाधिक ग्रंथ रचे गये हैं, जैसे तमिल में तमिल कवि ‘कंबन’ द्वारा रचित ‘रामावतारम्’ (कंब रामायण) । मैंने कभी यह ग्रंथ नहीं देखा है, लेकिन सुना है कि कंबन तमिल एवं संस्कृत के ज्ञाता थे और उन्होंने वाल्मीकीय रामायण पर आधारित रामकथा लिखी थी । अधिक जानकारी के लिए यहां अथवा यहां देखें । विख्यात भारतीय अंग्रेजी साहित्यकार आर. के. नारायण की ‘दि रामायण’ का भी नाम मैंने सुना है । रामकथा पर फिल्में तथा टेलिविजन भी आधुनिक काल में बन चुकी हैं । ये सब जनश्रुतियों पर आधारित हैं अथवा महर्षि वाल्मीकि की रामायण तथा अन्य ग्रंथों पर । अगर इनमें कहीं ‘लक्ष्मण रेखा’ की बात कही गयी हो तो उसकी वाल्मीकीय रामायण से संगति नहीं बैठेगी । ‘लक्ष्मण रेखा’ का जिक्र तो महाभारत तथा रामचरितमानस में भी देखने को नहीं मिलता है । इस संदर्भ में इन ग्रंथों में मुझे पढ़ने-समझने को क्या मिला इसका उल्लेख आगामी आलेखों में करने का मेरा विचार है । – योगेन्द्र जोशी

क्षमादान सदैव उचित नहीं – महाकाव्य महाभारत में युधिष्ठिर के प्रति द्रौपदी की सलाह

महाकाव्य महाभारत के वन पर्व में पांडवों के बारह-वर्षीय वनवास के समय उनके द्वारा भोगे गये कष्टों का वर्णन है । ध्यान रहे कि कौरवों के साथ खेले गये जुए में युधिष्ठिर के हार जाने के बाद सभी पांडवों को बारह वर्ष के वनवास एवं तदनंतर एक वर्ष के गुप्त वास पर जाना पड़ा था । वनवास काल में उन्हें तरह-तरह की परेशानियां झेलनी पड़ी थीं । युधिष्ठिर के चारों भाई एवं द्रौपदी यह महसूस करते थे कि उनकी दुःसह स्थिति के लिए युधिष्ठिर ही पूर्णतः उत्तरदायी हैं । वे इस तथ्य का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष उल्लेख यदाकदा कर युधिष्ठिर के समक्ष कर लेते थे । इस मामले में द्रौपदी सबसे अधिक मुखर थी । कई ऐसे प्रकरण हैं जिनमें उसके मुख से युधिष्ठिर के प्रति उलाहना के शब्द निकले हैं या उसने दोषारोपण किया है ।

वन पर्व के २८वें अध्याय में एक प्रसंग वर्णित है जिसमें द्रौपदी युधिष्ठिर को प्रेरित करती है कि वह कौरवों को उनकी करतूतों के लिए सजा दे । कौरवों की बारबार की धोखाधड़ी को वह क्षमा न करे । युधिष्ठिर की अति सत्यवादिता, उदारता तथा क्षमाशीलता को वह अनुचित मानती थी । वह युधिष्ठिर को यह समझाने का प्रयास करती है कि हर किसी को क्षमा नहीं किया जाना चाहिए, उस व्यक्ति को तो कतई नहीं जो जानबूझकर धोखा देता हो और अपराध करता हो । अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए वह राक्षसराज प्रह्लाद और उनके पौत्र राजा बलि (विरोचन पुत्र) के बीच के संवाद का जिक्र करती है । विरोचनकुमार बलि द्वारा जिज्ञासा व्यक्त करने पर पितामह प्रह्लाद उसे नीति संबंधी बातें बताते हैं । उसी क्रम में वे कौन क्षमा का पात्र होता है ओर कौन नहीं की बात समझाते हैं । तत्संबंधित बातें उक्त अध्याय के निम्नांकित चार श्लोकों में स्पष्ट की गयी हैं (महाभारत, वनपर्व, अध्याय २८):

अबुद्धिमाश्रितानां तु क्षन्तव्यमपराधिनाम् ।
न हि सर्वत्र पाण्डित्यं सुलभं पुरुषेण वै ।।२७।।
{अबुद्धिम् आश्रितानाम् अपराधिनाम् तु क्षन्तव्यम्, पुुरुषेण सर्वत्र पाण्डित्यम् सुलभम् न हि वै ।}
अनजाने में अर्थात् समुचित् सोच-विचार किए बिना जिन्होंने अपराध किया हो उनका अपराध क्षमा किया जाना चाहिए, क्योंकि हर मौके या स्थान पर समझदारी मनुष्य का साथ दे जाए ऐसा हो नहीं पाता है । भूल हो जाना असामान्य नहीं, अतः भूलवश हो गये अनुचित कार्य को क्षम्य माना जाना चाहिए ।

अथ चेद् बुद्धिजं कृत्वा ब्रूयुस्ते तदबुद्धिजम् ।
पापान् स्वल्पेऽपि तान् हन्यादपराधे तथानृजून् ।।२८।

{अथ चेद् बुद्धिजं कृत्वा ते तत् अबुद्धिजम् ब्रूयुः, सु-अल्पे अपि अपराधे तान् तथा अनृजून् पापान् हन्यात् ।}

अब यदि बुद्धि प्रयोग से यानी सोच-समझकर अपराध करने के बाद वे तुमसे कहें कि अनजाने में ऐसा हो गया है, तो ऐसे मृथ्याचारियों को थोड़े-से अपराध के लिए भी दण्डित किया जाना चाहिए । कुछ मनुष्य जानबूझकर आपराधिक कृत्यों में लगे रहते हैं । अपने उद्येश्य में असफल होने और पकड़ में आ जाने पर वे स्वयं को निरीह और निर्दोष बताने लगते हैं । ऐसे लोगों के प्रति उदारता नहीं दिखानी चाहिए ।

सर्वस्यैकोऽपराधस्ते क्षन्तव्यः प्राणिनो भवेत् ।
द्वितीये सति वध्यस्तु स्वल्पेऽप्यपकृते भवेत् ।।२९।।
{सर्वस्य प्राणिनः एकः अपराधः ते क्षन्तव्यः भवेत्, स्वल्पे अपि अपकृते द्वितीये सति वध्यः तु भवेत् ।}
सभी प्राणियों (प्रसंगानुसार मनुष्य) का एक अपराध तुम्हें क्षमा कर देना चाहिए, किंतु दूसरी बार अनुचित् कर्म किये जाने पर अवश्य उनको दण्डित करना चाहिए । पहिली बार अपराध करने पर क्षमा कर देना समझ में आता है, लेकिन जब व्यक्ति दूसरे की क्षमाशीलता का अनुचित लाभ उठाते हुए दुबारा-तिबारा गलत काम करे तो उसे छोड़ा नहीं जाना चाहिए ।

अजानता भवेत् कश्चिदपराधः कृतो यदि ।
क्षन्तव्यमेव तस्याहुः सुपरीक्ष्य परीक्षया ।।३०।।

{यदि कश्चित् अपराधः अजानता कृतः भवेत्, परीक्षया सुपरीक्ष्य एव तस्य क्षन्तव्यम् आहुः ।}

यदि वास्तव में अज्ञानवश कोई अपराध हो गया हो और समुचित् जांच-पड़ताल के बाद वह अनजाने में की गयी भूल सिद्ध हो जाए, तो उस कृत्य को क्षमायोग्य कहा गया है । भूल दुबारा-तिबारा भी हो सकती है और तदनुसार आरोपी अपने को निर्दोष बताये तो उसका ऐसा करना स्वाभाविक ही होगा । ऐसे अवसरों पर अपराध की बारीकी से छानबीन की जानी चाहिए और अगर यह सिद्ध हो जाये कि भूल से अनुचित कार्य हो गया, तो व्यक्ति को माफ कर देना चाहिए । वस्तुतः सभी सभ्य समाजों की न्यायिक व्यवस्था इसी नीति पर टिकी है ।

उक्त नीति वचनों में अपराधी को माफ न करने की बातें कही गयी हैं । यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसी को दंडित करने से पूर्व यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि आरोपी ने इरादतन अनुचित कार्य किया है या उससे भूल हो गयी । इस उद्येश्य के लिए समुचित छानबीन की व्यवस्था होनी चाहिए यह मत भी इन श्लोकों में निहित है । स्पष्ट है कि अंततोगत्वा महत्त्व होता है जांच करने वालों की निष्ठा और उनकी कार्यक्षमता का । यदि वे ईमानदारी न बरतें या उन्हें जांच करने की कला न आती हो तो उल्टा-सीधा हो सकता है । आज के समय में अपने देश में कुछ ऐसा ही हो रहा है । जहां आपराधिक वृत्तियों में लिप्त जन बारबार पकड़े जाने पर भी अदंडित छोड़ दिये जा रहे हैं, वहीं कई निरपराधियों को अकारण सजा मिल रही है । किसे क्षमा मिले और किसे सजा इसका सही निर्णय कहीं नहीं हो रहा है । – योगेन्द्र जोशी

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