चिंतन

मनुष्य चौबीसों घंटे अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति में ही बिताये यह कदाचित् प्रबुद्ध वर्ग को स्वीकार्य नहीं होगा, विशेषतया जब वह वैसा करने को विवश न हो । कम से कम कुछ लोग इतने भाग्यशाली तो होते ही हैं कि वे चौबीस घंटे के अंतराल में कुछ समय आत्मिक चिंतन में बितायें । उस सीमित समय में वे रोजी-रोटी से कुछ आगे जाकर अध्यात्म, धर्म, नीति, मानव-व्यवहार आदि जैसे विषयों पर एक दृष्टि डालें और इस संसार को व्यापक अर्थों में समझने का प्रयास करें । मैं कह नहीं सकता कि कितने लोग ऐसा करने को आत्मप्रेरित होते हैं । कम से कम मैं तो ऐसा करना इंद्रियग्राह्य सुख से कुछ अधिक ही आनंदप्रद पाता हूं । विविध दिशाओं में निरंतर चलने वाले अपने चिंतन को शब्दों में व्यक्त करने हेतु मैंने यह ब्लाग आरंभ किया । – योगेन्द्र

7 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. Rajeev Dwivedi
    दिसम्बर 10, 2008 @ 12:10:34

    chintan dharm ,puja kya ha. puja kasi ki jati ha.

    प्रतिक्रिया

  2. L. N. Gaur
    जुलाई 04, 2012 @ 17:00:37

    I agree with your thoughts. One should spare some time for ‘deep thought’, by which, oneself can enjoy and for others it will be fruitful.

    प्रतिक्रिया

  3. Sham Lal Mehta
    अगस्त 16, 2012 @ 14:48:03

    प्रिय भाई
    वैदिक और पौराणिक श्‍लोकों की विषय और संदर्भ के अनुकूल व्‍याख्‍या तथा पूर्वापर प्रसंग—यह सब एकसाथ पढ़कर बहुत सी जिज्ञासाएं, जो काफी समय से मन में थी, शांत हुई हैं। आभार व्‍यक्‍त करता हूं। हमारा संस्‍कृत में रचित मूल साहित्‍य भंडार इतना विशाल है कि सामान्‍य व्‍यक्ति के लिए, संदर्भ हेतु उसका अवगाहन लगभग असंभव हो जाता है। दुर्भाग्‍यवश, आज की पीढ़ी तो संस्‍कृत भाषा से पूरी तरह अनभिज्ञ है। लोग संदर्भ के लिए अंग्रेज़ों द्वारा या अंग्रेजी भाषा में अन्‍यों द्वारा लिखे या अनुवादित ग्रंथों पर ही निर्भर हैं, जो कि अधिकांश मामलों में त्रुटियों से भरे पड़े हैं। इन परिस्थितियों में आपका प्रयास अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण, अत: स्‍तुत्‍य है।
    मेरा एक स्‍वार्थ भी है। मेरी जानकारी के अनुसार संत कबीर का दोहा –निंदक नियरे राखिए——
    एक पौराणिक संस्‍कृत श्‍लोक पर आधारित है। मैं यह मूल श्‍लोक एवं संदर्भ नहीं तलाश पा रहा हूं। यदि इस दिशा में मार्गदर्शन कर सकें तो कपा होगी।
    शाम लाल मेहता

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  4. Sanjeev Kumar
    फरवरी 10, 2015 @ 04:41:34

    स्मृ्ति तो निर्विकार आत्मा ही है, लेकिन जब उसमे जीवत्व(मै शरीर हूँ या ये शरीर मेरा है, ये भाव) प्रक्ट होने लगता है तो वही जीव की स्मृति कही जाती है ।
    जय श्री कृष्ण

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  5. Sanjeev Kumar
    मार्च 05, 2015 @ 05:28:21

    त्रिबिध ताप महँ तपत नहीं सुख महँ सुखी न संत।
    क्रोध राग भय रहित सो स्थितप्रज्ञ अनंत।।
    भावः संत तीनो तापों मे दुखी नही होता न ही सुख मे सुखी होता है अपितु वह राग,क्रोध,भय आदि से रहित स्थितप्रज्ञ अथार्त दृड़ इच्छा्शक्ति वाला अन्नत ब्रह्म
    ही होता है।

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  6. Sanjeev Kumar
    मार्च 08, 2015 @ 11:32:52

    यहि जीवहिं परमार्थ सच आत्मज्ञान सो पाय।
    प्रबल अबिद्या संग सब मोह सोक भ्रम जाय।।

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  7. Sanjeev Kumar
    मार्च 08, 2015 @ 11:34:05

    राग द्वेष बहु दोष बस जाकर चित्त फँसाय।
    ता कहँ मोह बृषभ ग्रसे जासों ज्ञान नसाय।।

    प्रतिक्रिया

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