“निषेवते प्रशस्तानि निन्दितानि न सेवते” … – विदुरनीति के सद्वचन

महर्षि व्यासकृत महाकाव्य महाभारत में एक प्रकरण है, महाराज धृतराष्ट्र एवं ज्ञानी विदुर के मध्य संवाद का। विदुर वस्तुतः ऋषि व्यास से उत्पन्न दासीपुत्र थे और उचितानुचित की समझ रखने वाले नीतिज्ञ व्यक्ति थे। इतना और बता दूं कि प्राचीन काल में “नियोग” नामक प्रथा प्रचलित थी जिसके अंतर्गत देवर या अतिनिकट संबधी के संसर्ग से नि:संतान विधवाएं सन्तान जन्मती थीं। ऐसी सन्तान को क्षेत्रज कहा जाता था। धृतराष्ट्र एवं पांडु राजा विचित्रवीर्य की विधवा महारानियों, क्रमशः अंबिका एवं अंबालिका, से जन्मीं क्षेत्रज संतानें थीं। इस नाते विदुर धृतराष्ट्र के भाई थे। धृतराष्ट्र जब भी असमंजस या अनिर्णय की स्थिति में होते थे तो विदुर से सलाह-मशविरा करते थे।

महाभारत के उद्योग पर्व के अध्याय ३३ से ४० में विदुर द्वारा कहे गए नीति वचनों का उल्लेख मिलता है। इन अध्यायों के ग्रंथ रूप में उपलब्ध संकलन को विदुरनीति के नाम से जाना जाता है। मैं उसी ग्रंथ के प्रथम अध्याय के कुछएक श्लोकों का उल्लेख कर रहा हूं। इन छंदों में ज्ञानी विदुर “पंडित” की परिभाषा समझाते हैं।

मेरी समझ में पंडित शब्द बहुआयामी अर्थ रखता है। आम जनभाषा में किसी विषय विशेष का जानकार पंडित कहा जाता है। उसके ज्ञान को पांडित्य कहकर पुकारा जाता है। हम लोग ब्राह्मण कुल में जन्मे व्यक्ति को भी अक्सर पंडित कहते है, खास तौर पर जब वह पौरोहित्य कर्म करता हो। इस संबोधन में कदाचित यह भावना निहित रहती है कि ऐसे व्यक्ति धर्मज्ञ होगा, धर्मकर्म में लगा रहता होगा। (यद्यपि ऐसा आज के युग में होता नहीं।) विदुर इस शब्द को कई प्रकार से परिभाषित करते हैं; सभी के निचोड़ से पंडित किसे कहें यह समझा जा सकता है। विदुरनीति के प्रथम अध्याय से चयनित संबंधित छंद आगे प्रस्तुत हैं:

आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता ।

यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पंडित उच्यते ॥२०॥

(आत्म-ज्ञानम् समारम्भः तितिक्षा धर्म-नित्यता यम् अर्थात् न अपकर्षन्ति सः वै पंडितः उच्यते ।)

आत्मज्ञान, उद्योग, कष्ट सहने की सामर्थ्य, और धर्म में स्थिरता, ये बातें जिसको “अर्थ” से भटकाती नहीं वही पंडित कहलाता है।

इस छंद का मन्तव्य मुझे स्पष्टतः समझ में नहीं आया। मेरे विचार में आत्मज्ञान का तात्पर्य कदाचित् समाज एवं स्वयं के प्रति अपने कर्तव्यों एवं आध्यात्मिक दर्शन की समझ से होगा। उद्योग है किसी न किसी परिश्रम में स्वयं को लगाना। “अर्थ” का तात्पर्य जीवन की आवश्यकता के प्रतीक भौतिक संपदा से है। भारतीय दर्शन के अनुसार मनुष्य का जीवन और उसकी सार्थकता चार पुरुषार्थों पर टिके हैं : धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष। धर्म – कर्तव्यों का निर्वाह; अर्थ – जीवन के आधार संपदा की प्राप्ति; काम – इच्छापूर्ति यानी भोग; और मोक्ष – कामनाओं से मुक्त होकर संसार त्याग। उक्त श्लोक में उल्लिखित अर्थ इन्हीं में से एक है।

निषेवते प्रशस्तानि निन्दितानि न सेवते ।

अनास्तिकः श्रद्दधान एतत्‍ पण्डितलक्षणम्‍ ॥२१॥

(निषेवते प्रशस्तानि निन्दितानि न सेवते अ-नास्तिकः श्रद्दधानः एतत्‍ पण्डित-लक्षणम्‍ ।)

जो प्रशंसनीय कार्यों में लगा रहता है और निन्द्य कार्यों से दूर रहता है, जो नास्तिक नहीं है और सद्विचारों के प्रति श्रद्धालु है उसके संबंधित गुण उसके पंडित होने के लक्षण दर्शाते हैं।

नास्तिक का क्या अर्थ है? आम तौर पर नास्तिक का अर्थ ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास न करना समझा जाता है। लेकिन इसके अर्थ अधिक व्यापक हैं ऐसा मैं मानता हूं। ऐहिक (इस लोक के) जीवन से परे भी कुछ है इस विश्वास को आस्तिकता कहा जाएगा। जीवन के परे है क्या इसका ठीक-ठीक ज्ञान न होने पर भी “कुछ है” में विश्वास रखने वाला आस्तिक कहा जाएगा।

क्रोधो हर्षश्च दर्पश्च ह्रीः स्तम्भो मान्यमानिता ।

यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पंडित उच्यते ॥२२॥

(क्रोधः हर्षः च दर्पः च ह्रीः स्तम्भः मान्य-मानिता यम् अर्थात् न अपकर्षन्ति सः वै पंडितः उच्यते ।)

क्रोध, खुशी, गर्व, लजा-भाव, उद्दंडता, स्वयं को माननीय (श्रेष्ठ) समझने का भाव, ये गुण-अवगुण जिसको पुरुषार्थ से विमुख नहीं करते उसी को पंडित कहा जाता है।

दरअसल इस परिभाषा के अनुसार जो व्यक्ति पुरुषार्थ, अर्थात्‍ शास्त्रसम्मत कर्तव्यों, में लगा रहता है उसे न क्रोध विचलित करता है और न ही खुशी या मनुष्य स्वभाव के अन्य पहलू। स्वयं को श्रेष्ठ मानते हुए दूसरों द्वारा पूज्य माने जाने की इच्छा बहुतों को होती है, किंतु पंडित उससे मुक्त रहता है।

यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्रं वा मन्त्रितं  परे ।

कृतमेवास्य जानन्ति स वै पंडित उच्यते ॥२३॥

(यस्य कृत्यम् न जानन्ति मन्त्रम् वा मन्त्रितम् परे कृतम् एव अस्य जानन्ति सः वै पंडितः उच्यते)

दूसरे लोग जिसके कर्तव्य को नहीं जानते, न उसके परामर्श या जिसका विचार किया गये को, बल्कि जिसके संपन्न किए कार्य को ही केवल अन्य जन जान पाते हैं उसी को पंडित कहते हैं।

कर्तव्य से तात्पर्य यहां पर उन बातों से नहीं है जिनकी आम चर्चा मानव समाज में की जाती है, बल्कि इससे मतलब है किसी अवसर पर क्या करना उचित होगा इसका निर्णय लेना है। व्यक्ति किसी को क्या सलाह देगा, अपने मन में वह क्या विचार कर रहा है, इन बातों का ज्ञान या अनुमान दूसरों को नहीं हो पाता है। अन्य लोग उसके किए जा चुके कार्य ही केवल जान पाते हैं। असल में उक्त श्लोक में यह बताया गया है कि पंडित व्यक्ति ढिंढोरा पीटकर कार्य नहीं करता है, वह इस बात का हल्ला नहीं करता कि मैं यह करूंगा, वह करूंगा। वह बिना कुछ कहे कार्य संपन्न करता है और उस संपादित कार्य को देखकर लोगों को उसकी योजना समझ में आती है। इसके विपरीत बहुत-से लोग हल्ला अधिक मचाते हैं किंतु काम कम करते हैं।

यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रतिः ।

समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पंडित उच्यते ॥२४॥

(यस्य कृत्यम न विघ्नन्ति शीतम् उष्णम् भयम् रतिः समृद्धिः असमृद्धिः वा सः वै पंडितः उच्यते ।)

जिसके किये जा रहे कार्य में सर्दी-गर्मी, भय, प्रेम, संपन्नता अथवा विपन्नता विघ्न नहीं डालतीं उसी को पंडित कहते हैं।

सर्दी-गर्मी आदि बातें पंडित व्यक्ति को सद्विचारों एवं सत्कर्मों से विचलित नहीं करतीं यह श्लोक का भाव है। उक्त सभी श्लोकों में व्यक्त भावों को समग्रता में देखकर ही पंडित, यानी समझदार, बुद्धिमान, विद्वान व्यक्ति को परिभाषित किया जाना चाहिए।

विदुर के द्वारा दी गई परिभाषा वस्तुतः एक आदर्श प्रस्तुत करता है। ऐसे सर्वगुणसंपन्न व्यक्ति समाज में अलभ्य ही होते हैं। फिर भी इन लक्षणों के निकट पहुंचे व्यक्ति कुछ हद तक मिल सकते हैं। – योगेन्द्र जोशी

 

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क्या नेरेन्द्र मोदी फिर से प्रधान मंत्री बनेंगे? लगता तो ऐसा ही है!  

I am living at Varanasi and am a NOTA advocate.
I press the NOTA button instead of voting in favour of any candidate including Modi whose constituency is Varanasi. That I do for serious reasons.
Recently on different occasions and in different places I talked with some people ( a small number indeed) about the 2019 election prospects. I realized that Modi turned out to be the choice of a significant majority of them. This post presents my experience. (in Hindi)

इंडिया बनाम भारत

आगे बढ़ने से पहले एक बात स्पष्ट कर दूं —

मैं वाराणसी का वरिष्ठ (उम्र 70+) मतदाता हूं। मतदान छोड़ता नहीं किंतु किसी भी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान नहीं करता, मोदीजी के पक्ष में भी नहीं। दरअसल मैं नोटा का प्रबल पक्षधर हूं और उसकी वकालत करता हूं। मैंने एक वयस्क नागरिक के रूप में 1969 और उसके बाद के चुनाव देखे हैं और पिछले दो-तीन दशकों से लोकतांत्रिक प्रणाली में गंभीर और तेजी से गिरावट महसूस करने लगा हूं। फलतः लोकतंत्र के मौजूदा मॉडल से मेरा मोहभंग हो चुका है। किस-किस तरीके की गिरावट देख रहा हूं इसका विवरण मैं यहां नहीं दे सकता, क्योंकि इस आलेख का विषय वह नहीं है।

मैंने पिछले कुछ दिनों जिज्ञासावश यह जानने-समझने की कोशिश की कि मोदीजी के सत्ता में लौटने की संभावना कितनी है। मेरा अनुमान या आकलन अलग-अलग मौकों तथा स्थानों पर आम लोगों से हुई बातों पर आधारित…

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महाभारत महाकाव्य में मूषक एवं विडाल की अल्पकालिक मित्रता की कथा

निकट भविष्य में देश में लोकसभा चुनाव होने हैं। अपने-अपने हित साधने या अस्तित्व बचाने के लिए राजनैतिक दल मेल-बेमेल गठबंधन बनाने में जुटे हैं। बेमेल गठबंधनों को देखने पर मुझे महाकाव्य महाभारत (शान्ति पर्व, अध्याय १३८) में वर्णित विडाल (बिलाव) एवं मूषक (मूस) की अल्पकालिक मित्रता की एक कथा याद आ रही है। उसी कथा से संबंधित कुछएक नीतिवचनों का उल्लेख यहां पर कर रहा हूं।

 

संक्षेप में कथा कुछ इस प्रकार है — किसी वन में एक विशाल पेड़ था, जिसके जड़ के पास एक मूस (बड़े आकार का चूहा) बिल बनाकर रहता था। उसी पेड़ पर एक बिलाव (बिल्ला) भी रहा करता था। बिल्ले से बचते हुए मूस बिल के बाहर भोजन की तलाश में निकला करता था।

एक बार एक बहेलिये ने पेड़ के पास जाल बिछा दिया, जंगली जानवरों एवं पक्षियों को फंसाकर कब्जे में लेने के लिए। उसका इरादा दूसरे दिन प्रातः आकर उन पशु-पक्षियों को ले जाने का था जो जाल में फंसे हों। दुर्भाग्य से वह बिलाव जाल में फंस गया। उसे जाल में फंसा देख चूहा आश्वस्त हो गया और निर्भय होकर इधर-उधर भोजन तलाशने लगा। कुछ देर में उसे एक नेवला दिखाई दिया जो उस मूस की गंध पाकर उस स्थान के आसपास पहुंचा और उसे मारने के लिए मौके का इंतिजार करने लगा। मूस को पेड़ की एक डाल पर बैठा हुआ एक और दुश्मन उल्लू भी नजर आया। मूस को तीन-तीन शत्रु आसपास नजर आए।

वस्तुस्थिति को देख उसने सोचा, “अपने बिल की ओर जाना अभी मेरे लिए सुरक्षित नहीं है। तीनों शत्रुओं में मेरा सबसे बड़ा शत्रु, जिससे शेष दो भी दूरी बनाए रखते हैं, जाल में फंसा असहाय है। अपनी खुद की विवशता देख मुझे मारने का प्रयास नहीं करेगा। अतः उसी के सान्निध्य में पहुंचकर अपने को सुरक्षित रखना बुद्धिमत्ता होगी। उसकी सुरक्षा का आश्वासन देकर मैं स्वयं उसका विश्वास पा सकता हूं।”

उसने बिल्ले के पास जाकर कहा, “मित्र बिडाल, आप इस समय आपत्ति में फंसे हैं। जाल काटकर मैं आपकी सहायता कर सकता हूं, बशर्ते आप मेरी सुरक्षा के लिए बचनबद्ध होवें।”

बिल्ले ने कहा, “ठीक है मुझे मंजूर है। परन्तु मुझे करना क्या है?”

“आप मुझे अपने संरक्षण में ले लें ताकि मैं सुरक्षित रात बिता सकूं। मैं आपको वचन देता हूं कि प्रातः बहेलिये के आने तक मैं आपको पाश-मुक्त कर दूंगा।” मूस ने कहा।

बिल्ले ने उसकी बात मान ली। उसने समझ लिया था कि उस परिस्थिति में कोई उसे बचाने नहीं आने वाला। मूस ही उसका हित साध सकता था, इसलिए उसकी बात मानना उसकी मजबूरी बन चुकी थी। इसके बाद वह बीच-बीच में मूस को उसके वचन की याद दिलाता और पूछता कि वह कब उसके बंधन काटेगा। प्रातःकाल होते-होते मूस ने जाल के कई तंतुओं को काट लिए, लेकिन कुछ बंधन जानबूझकर छोड़े रखा।

बिल्ला उसको याद दिला रहा था कि जब उन दोनों ने परस्पर मित्रता कर ली है तो वह जाल के बंधन काटकर उसे मुक्त क्यों नहीं कर रहा है। तब मूस ने बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए बिल्ले को ये नीतिवचन सुनाए:

न कश्चित्कस्यचिन्मित्रं न कश्चित्‍कस्यचिद्‍ रिपु: ।

अर्थतस्तु निबध्यन्ते मित्राणि रिपवस्तथा ॥११०॥

(महाभारत, शान्तिपर्व के अंतर्गत आपद्धर्मपर्व, अध्याय १३८)

(कश्चित् कस्यचित् मित्रम् न, कश्चित् कस्यचित् रिपु: न, मित्राणि तथा रिपवः अर्थत: तु निबध्यन्ते ।)

अर्थ – न कोई किसी का मित्र होता है और न ही शत्रु। अपने-अपने स्वार्थवश ही मित्र तथा शत्रु परस्पर जुड़ते हैं। [वैकल्पिक अर्थ – मनुष्य से जुड़ते हैं।]

और

शत्रुरूपा हि सुहृदो मित्ररूपाश्च शत्रवः ।

संधितास्ते न बुध्यन्ते कामक्रोधवशं गताः ॥१३८॥

(यथा उपर्युक्त)

(सुहृदः शत्रुरूपाः हि शत्रवः च मित्ररूपाः, संधिताः ते काम-क्रोध-वशं गताः न बुध्यन्ते ।)

अर्थ – परिस्थिति के अनुरूप सुहृज्जन भी शत्रुरूप धारण कर लेते हैं (शत्रु बन जाते हैं) और शत्रु भी मित्र बन जाते हैं। परस्पर संधि (समझौते) से जुड़े होने पर भी काम (प्रबल इच्छा) एवं क्रोध के वशीभूत होने पर (उनके व्यवहार से) समझ में नहीं आता कि वे शत्रु हैं या मित्र?

उक्त दो छंदों के माध्यम से चूहे ने यह स्पष्ट किया कि मित्रता एवं शत्रुता का आधार स्वार्थ होता है। फलतः परिस्थितियां बदल जाने पर मित्रता-शत्रुता के भाव भी बदल जाते हैं। परस्पर मित्रता से बंधे होने पर भी जब व्यक्ति के मन में प्रबल इच्छा-भाव जगता है या उसे आक्रोश घेर लेता है मित्रता का विचार बदल जाता है।

मूस के कहने का मंतव्य यह है कि जब दो जने मित्रता में बंधे होते हैं तब भी विपरीत परिस्थिति पैदा हो जाने पर अपनी प्रबल इच्छा अथवा गुस्सा के वशीभूत होने पर वे मित्रता का भी ध्यान खो बैठते हैं। उसने स्पष्ट संकेत बिल्ले को दिया कि यदि वह जाल से मुक्त हो गया तो वह मित्रता का वचन भुला सकता है और उसी (मूस) पर हमला कर सकता है। इसलिए वह उसे (बिल्ले को) को मुक्त करने को उपयुक्त समय की प्रतीक्षा करेगा।

आगे मूस इस तथ्य की ओर ध्यान खींचता है कि

नास्ति मैत्री स्थिरा नाम न च ध्रुवमसौहृदम् ।

अर्थयुक्त्यानुजायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा ॥१४१॥

(यथा उपर्युक्त)

(मैत्री नाम स्थिरा न अस्ति, असौहृदम् च न ध्रुवम्, मित्राणि तथा रिपवः अर्थ-युक्त्या अनुजायन्ते ।)

अर्थ – अवश्य ही मित्रता स्थायी नहीं होती और विद्वेष भी स्थायी नहीं होता। स्वार्थ से(अर्थात् अपने-अपने हित साधने के लिए) ही लोग मित्र एवं शत्रु बनते हैं।

कहने का तात्पर्य यह है कि मित्रता एवं शत्रुता मौके-मौके की बातें है। जब व्यक्ति को किसी से अपने स्वार्थ सिद्ध करने हों तो वह मित्रता कर लेता है। किन्तु जब उनके हित टकराने लगते हैं तो वह व्यक्ति शत्रुता पर उतर आता है। उसने बिलाव को याद दिलाया कि उन दोनों की मित्रता अस्थायी है और कभी भी टूट सकती है।

मूस के अनुसार हमारे सामाजिक रिश्ते दरअसल स्थार्थ्यजनित ही होते हैं जैसा अगले छंद में कहा गया है:

अर्थयुक्त्या हि जायन्ते पिता माता सुतस्तथा ।

मातुला भागिनेयाश्च तथासम्बन्धिबान्धवाः ॥१४५॥

(यथा उपर्युक्त)

(पिता माता सुत: तथा च मातुलाः भागिनेया: तथा सम्बन्धि-बान्धवाः अर्थ-युक्त्या हि जायन्ते ।)

अर्थ – माता, पिता, पुत्र, मामा, भांजा इत्यादि संबंधी एवं बंधुबान्धव आदि के परस्पर संबंध स्वार्थ के कारण बनते हैं।

स्वार्थ में कितनी शक्ति है यह अगले नीति-छंद से स्पष्ट होता है:

पुत्रं हि मातापितरौ त्यजतः पतितं प्रियम् ।

लोको रक्षति चात्मानं पश्य स्वार्थस्य सारताम् ॥१४६॥
(यथा उपर्युक्त)

(पतितम् प्रियम् पुत्रं हि माता-पितरौ त्यजतः, लोक: रक्षति च आत्मानम् स्वार्थस्य सारताम् पश्य ।)

अर्थ –मार्गभ्रष्ट (चारित्रिक तौर से गिरे) पुत्र (संतान) को माता-पिता भी त्याग देते हैं। निश्चय ही मनुष्य पहले अपनी रक्षा करता है। देखो स्वार्थ का सार इसी तथ्य में निहित है।

अर्थात् यदि संतान के कारण अपनी प्रतिष्ठा गिरने का डर हो तब माता-पिता भी उसका बहिष्कार कर डालते हैं। ऐसा कुछ आज के समाज में देखने को कम ही मिलता है। इस युग में बहिष्कार-योग्य व्यक्ति का बचाव करने माता-पिता ही नहीं अपितु संबंधी, परिचित, मित्र आदि भी मैदान में कूद पड़ते हैं। शायद प्राचीन काल में कभी स्थिति भिन्न रही होगी।

इन नीति-वचनों के द्वारा मूस स्पष्ट कर देता है कि वह बिलाव की मित्रता के प्रति पूर्णतः आश्वस्त नहीं हो सकता है।

इस कथा का अंत इस प्रकार है — प्रातःकाल मूस एवं बिलाव बहेलिये को निकट आता हुए दिखते हैं। तब सही क्षण पर मूस अपना वचन निभाते हुए जाल के शेष बंधन काटकर बिलाव को बंधन-मुक्त कर देता है और तेजी से अपने बिल की ओर भाग जाता है। बिलाव भी बहेलिए को पास आ चुका देखकर पेड़ की ओर भागकर उसमें चढ़ जाता है। इसके साथ ही उन दोनों के बीच की अल्पकालिक मित्रता समाप्त हो जाती है।

इस स्थल पर एक टिप्पणी करना समीचीन होगा। प्राचीन संस्कृत साहित्य में शिक्षाप्रद संदेश देने के ऐसे दृष्टांत देखने को मिल जाते हैं जिनमें पशु-पक्षियों को पात्रों के तौर पर प्रयोग में लिया गया हो। पंचतंत्र एवं हितोपदेश ऐसी शैली या परंपरा के सुविख्यात उदाहरण हैं। महाभारत महाकाव्य ग्रंथ में भी किसी-किसी स्थल पर पशु-पक्षियों के माध्यम से दिए गए नीति संदेश पढ़ने को मिल जाते हैं। इस विधि से दिए गए नीति-संदेश मनोरंजक होते हैं न कि शुष्क एवं उबाऊ। – योगेन्द्र जोशी

“कलियुगे जना: अघासुरायन्ते” – श्रीमद्भागवत्पुराण के अनुसार कलियुग का मूल स्वरूप

श्रीमद्भागवत्पुराण १८ प्रमुख पुराणों में से एक है जिसमें भगवान् विष्णु एवं उनके अवतारों, विशेषतः कृष्णावतार, का विस्तृत वर्णन है। भक्ति की महत्ता को दर्शाने वाले इस ग्रंथ के आरंभ के द्वितीय अध्याय में एक प्रकरण है जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि कैसे कलियुग में योग एवं ज्ञान मार्गों को छोड़ भक्ति ही परमात्मा की प्राप्ति का साधन रह जाता है।

इस प्रकरण में बताया गया है कि एक बार देवर्षि नारद घुमते-फिरते धरती पर पहुंचे। कलि (युग) के प्रभाव में उन्होंने सर्वत्र पापकर्मों का बोलबाला देखा। जब वे वृंदावन के निकट यमुना तीर पर पहुंचे तो उनकी दृष्टि एक युवती पर पड़ी जो असामयिक बुढ़ापे से ग्रस्त अचेतन अवस्था में धरती पर पड़े हुए दो बालकों को उठाने का प्रयास करते हुए रो रही थी। मुनि नारद उसके पास गए और उन्होंने पूछा, “अरे बालिके, तुम कौन हो और ये दो जने कौन हैं।”

उस युवती ने उत्तर दिया, “मैं “भक्ति” हूं और ये दोनों मेरे पुत्र “ज्ञान” एवं “योग” हैं। पता नहीं क्यों ये बालक वृद्धावस्था से ग्रस्त हो चुके हैं और अचेत पड़े हुए हैं।”

देवर्षि नारद ने समस्या का कोई समाधान तो नहीं बताया किंतु इतना कहा कि तुम्हारे पुत्रद्वय की यह गति कलि (कलियुग) के प्रभाव से हुई है। उन्होंने ये बातें कहीं:

शृणुष्वावहिता बाले युगोऽयं दारुणः कलिः।

तेन लुप्तः सदाचारो योगमार्गस्तपांसि च।

जना अघासुरायन्ते शाठ्यदुष्कर्मकारिणः॥५७॥

(श्रीमद्‍भागवत्, अध्याय २, माहात्म्यम्)

(बाले अवहिता शृणुष्व, अयं कलिः युगो दारुणः, तेन सदाचार: योग-मार्ग: तपांसि च लुप्तः, शाठ्य-दुष्कर्म-कारिणः जनाः अघासुरायन्ते ।)

अर्थ – हे बाले (युवती) ध्यान से सुनो। यह निष्ठुर कलियुग है। उसी के प्रभाव से सदाचार, योगमार्ग एवं तपकर्म विलुप्त हो गये हैं और ठग-धूर्त तथा दुष्कर्म में लिप्त लोग पापी राक्षसों की भांति व्यवहार करते हैं। (अघासुर एक राक्षक का नाम भी था। अतः उक्त अर्थ में “अघासुर की भांति” भी विकल्पतः कह सकते हैं। कुल मिलाकर अर्थ वही निकलता है।)

इह सन्तो विषीदन्ति प्रहृश्यन्ति ह्यसाधव:

धत्ते धैर्यं तु यो धीमान् स धीरः पण्डितोऽथवा॥५८॥

(यथा पूर्वोक्त)

(इह सन्तः विषीदन्ति, असाधव: हि प्रहृश्यन्ति, यो तु धीमान् धैर्यं धत्ते सः धीरः अथवा पण्डितः।)

अर्थ – यहां (इस युग में) सज्जन-महात्मा-जन दुःखी रहते हैं और अधर्म में लिप्त लोग आनंदित रह्ते हैं। जो बुद्धिमान् व्यक्ति धैर्य रख लेता है वही धीरज वाला एवं ज्ञानी होता है।

मेरा मत है कि इस प्रकार की कथाओं में अमूर्त भावों को मानव-शरीरी पात्र बनाकर उनके मुख से बहुत कुछ कहलवाने की पद्धति अक्सर प्रयोग में ली जाती है। ये सब वस्तुस्थिति के निरूपण की प्रतीकात्मक शैली है। इन कथाओं को शब्दशः व्याख्यायित करना अधिक माने नहीं रखता, बल्कि असल संदेश क्या दिया जा रहा है इसका महत्व है। महाभारत महाकाव्य, पंचतंत्र एवं हितोपदेश जैसे ग्रंथों में कई नीतिवचन पशु पात्रों के मुख से कहलवाए गये हैं। “कालीदास के मेघदूतम्” में बादलों को संबोधित करते हुए प्रेमी प्रेमिका को संदेश भेजता है। काव्यों-कथाओं में इस प्रकार के प्रयास रोचक बनाने के लिए किए जाते होंगे ऐसा मेरा मानना हैं।

दरअसल कथाकार इस तथ्य को जनसमूह के सम्मुख रखना चाहता है कि कलियुग में मनुष्य स्वार्थी, धनलोलुप एवं अहंकारी हो गए हैं। परोपकार एवं दूसरे हितों की चिंता करना वह छोड़ चुके हैं। वह राक्षसों की भांति व्यवहार करने लगे हैं। अर्थात् ठगी करना, लूटपाट मचाना, दूसरे के कार्यों में विघ्न डालना, बात-बात पर क्रोधित होकर मारपीट पर उतर जाना, आदि आम बातें हो चुकी हैं।

इस युग में परमात्मा को पाने के ज्ञानमार्ग एवं योगमार्ग भुला दिए गए हैं क्योंकि ये समयसाध्य एवं श्रमसाध्य हैं, अतः लोगों में इन्हें अपनाने का उत्साह नहीं रहता। कथा में उल्लिखित बालकों की असामयिक वृद्धावस्था कलियुग में इन दो मार्गों की दुर्दशा का प्रतीकात्मक वर्णन है। दूसरी तरफ भक्तिमार्ग सरल है और किसी के लिए भी उसको अपनाना अपेक्षया आसान है। श्रद्धावान व्यक्ति रोचक तरीके से प्रस्तुत भगवत्कथाओं को ध्यान से सुनने का इच्छुक होता है। इसलिए भक्तिमार्ग अभी बचा है।

मैं विश्व के अन्य समाजों की बात नहीं करता। लेकिन भारतीय समाज में जो देख रहा हूं वह निराशाप्रद है। लगता है जैसे एक प्रकार की अराजकता फैली हुई है। जिसे जो मन होता है बोल देता है, वाणी पर संयम नहीं किसी का, छोटी-छोटी बातों पर वाग्युद्ध से आरंभ करते हुए मल्लयुद्ध और हत्या तक पर उतर आते हैं, अवैधानिक तरीकों से धन कमाने की अदम्य लालसा लोगों में दिखती हैं, लूटपाट एवं धोखाधड़ी लोगों का शौक बन रहा है, कमजोर व्यक्ति का शोषण और उपकार के नाम पर अनाथों का दुष्कर्म देखने को मिल रहा है, और सबसे घृणास्पद तो यह है कि गेरुआवस्त्रधारी जन धर्म के नाम पर पापकृत्य में संलग्न हो रहे हैं। यह सब कलियुग की पहचान है। – योगेन्द्र जोशी

“न विश्वसेत् अविश्वस्ते …” – पंचतंत्र में वर्णित कौवे एवं चूहे की नीतिकथा

पंचतंत्र के नीतिवचनों पर आधारित अपनी 7 फरवरी 2010 की पोस्ट में मैंने ग्रंथ का संक्षिप्त और एक प्रकार से अधूरा परिचय दिया था। उसके बारे में इस स्थल पर विस्तार से बताना मेरा उद्देश्य नहीं है। फिर भी इतना कहना चाहूंगा कि इसमें व्यावहारिक जीवन से संबंधित सार्थक नीति की तमाम बातें कथाओं के माध्यम से समझाई गयी हैं । इन कथाओं में अधिकतर पात्र मनुष्येतर प्राणी यथा लोमड़ी, शेर, बैल, कौआ आदि हैं। कथाएं आपस में शृंखलाबद्ध तरीके जुड़ी हुई हैं अर्थात्‍ एक कथा में दूसरी कथा और उसमें तीसरी आदि के क्रम से कथाओं का बखान किया गया है। उक्त ग्रंथ पांच खंडों में विभक्त है जिन्हें “तंत्र” पुकारा गया है। ये हैं:

1. मित्रभेदः, 2. मित्रसंप्राप्तिः, 3. काकोलूकीयम्, 4. लब्धप्रणाशम्, एवं 5. अपरीक्षितकारकम् ।

प्रत्येक तंत्र में किसी एक प्रकार की विषयवस्तु लेकर कथाएं रची गई हैं, जैसे मित्रभेदः में वे कथाएं हैं जो दिखाती हैं कि किस प्रकार प्रगाढ़ मित्रों के बीच फूट डालकर अपना हित साधा जा सकता है। इसी प्रकार अंतिम तंत्र अपरीक्षितकारकम्‍ में वे कथाएं हैं जो दर्शाती हैं कि समुचित सोचविचार के बिना किया जाने वाला कार्य कैसे घातक हो सकता है।

पंचतन्त्र का आरंभ कुछ यों होता है: सुना जाता है कि दक्षिण देश में महिलारोप्य नामक नगर हुआ करता था। वहां अमरशक्ति नाम के हर प्रकार से योग्य राजा शासन करते थे। उनके तीन पुत्र थे जिनके नाम क्रमश: बहुशक्ति, उग्रशक्ति तथा अनंतशक्ति थे। कुबुद्धि प्रकार के वे तीनों राजपुत्र शास्त्रादि के अध्ययन में बिल्कुल भी रुचि नहीं लेते थे। राजा उनके बारे में सोच-सोचकर दुःखी रहते थे। उन्होंने एक बार अपने मन के बोझ की बात मंत्रियों के सामने रखते हुए राजपुत्रों को विवेकशील एवं शिक्षित बनाने के उपाय के बारे में पूछा। सोचविचार के बाद मंत्रियों ने उन्हें बताया कि शास्त्रों एवं अनेक विद्याओं के ज्ञाता एक ब्राह्मण राज्य में हैं। उन्हीं के संरक्षण में राजपुत्रों को सौंप दिया जाए। ब्राह्मण ने राजपुत्रों को सुधारने का जिम्मा ले लिया इस शर्त के साथ कि वे छः महीने तक उनके साथ रहेंगे और राजा या अन्य कोई उनके कार्य में हस्तक्षेप नहीं करेगा। ये ब्राह्मण स्वयं पंचतंत्र ग्रंथ के रचयिता विष्णुशर्मा थे। माना जा सकता है कि विष्णुशर्मा ने सरल, रोचक, एवं शिक्षाप्रद कथाओं के माध्यम से राजपुत्रों में विद्याध्ययन के प्रति रुचि जगाई।

मैं यहां पर उक्त ग्रंथ की एक कथा प्रस्तुत करते हुए नीतिप्रद श्लोकों का उल्लेख कर रहा हूं।

एक बार एक बहेलिये ने पक्षियों को पकड़ने के लिए जंगल में चारा डालते हुए जाल फैला दिया। कुछ समय बाद कबूतरों का एक झुंड उधर आया और वहां पड़े चारे को खाने के लिए लालायित हुआ। कबूतरों के मुखिया/राजा, चित्रग्रीव, ने झुंड के सदस्यों से कहा, “इतना सारा चारा यहां पर कैसे और कहां से आया होगा यह सोचने की बात है। अवश्य ही कुछ रहस्य है और हमें इससे बचना चाहिए।”

झुंड के सदस्यों ने कहा, “आप यों ही सशंकित हो रहे हैं। इसे चुगने पर कोई खतरा नहीं होगा।” और वे सभी नीचे उतर गए और जाल में फंस गए।

स्वयं को विपत्ति में पड़ा हुआ पाने पर कतोतराज चित्रग्रीव ने शेष कबूतरों से कहा, “तुम लोग धैर्य से काम लेना। अब हम एक कार्य कर सकते हैं। जाल समेत यहां से उड़ चलें और हिरण्यक नामक मेरे घनिष्ठ मित्र चूहे के पास पहुंचें। वह जंगल ही में एक पेड़ के जड़ के पास बने बिल में रहता है।”

उस पेड़ के पास पहुंचने पर चित्रग्रीव ने मित्र हिरण्यक चूहे को मदद के लिए पुकारा। हिरण्यक ने जानी-पहचानी सी आवाज सुनी तो उसने बिल के अंदर से ही पूछा, “कौन है बाहर मुझे पुकारने वाला? नाम-पता तो बताओ।”

चित्रग्रीव ने जवाब दिया, “भाई, मैं हूं तुम्हारा मित्र कपोतराज चित्रग्रीव। मैं विपत्ति में फंस गया हूं, इसलिए शीघ्र मेरी मदद करो।”

हिरण्यक ने बिल से बाहर निकलने पर देखा कि उसका मित्र अपने साथी कबूतरों के  साथ जाल में फंसा हुआ है। वह शीघ्र चित्रग्रीव के पास पहुंचा और उसके बंधन काटने लगा। कपोतराज ने उसे मना किया और कहा, “पहले इनके बंधन काटो और अंत में मेरे।”

हिरण्यक ने आपत्ति व्यक्त करते हुए कहा, “पहले तुम्हें मुक्त होना चाहिए। बाद में देर हो जाए, या मैं थक जाऊं, अथवा मेरे दांत टूट जाएं तो तुम्हें मुक्त करना संभव नहीं हो पाएगा।”

“मैं इन सब का मुखिया हूं, राजा हूं। मेरा कर्तव्य है कि पहले प्रजा का हित साधूं न कि अपना। मुझे त्याग करना पड़े तो कोई बात नहीं; इनकी मुक्ति पहले होनी चाहिए।” कपोतराज ने उत्तर दिया।

हिरण्यक ने सहमति जताते हुए कहा, “मित्र, मैं तो देखना चाहता था कि तुम राजा के तौर पर कितने स्वार्थी हो। मुझे विश्वास था ही तुम योग्य राजा के अनुरूप ही निर्णय लोगे।” और उसने तेजी से उन सभी के बंधन काट डाले। तब दोनों मित्रों के बीच कर्तव्याकर्तव्य और कुशलक्षेम की संक्षिप्त बातें हुई और अंत में चित्रग्रीव ने हिरण्यक के प्रति आभार प्रकट करते हुए विदा ली। हिरण्यक भी सतर्क अपने बिल में सुरक्षित चला गया।

उसी पेड़ की एक डाली पर लघुपतनक नामक एक कौआ भी रहता था। वह उस घटना को देख रहा था और दोनों के बीच हुए वार्तालाप को ध्यान से सुन रहा था। चूहे हिरण्यक की विद्वतापूर्ण बातें उसे खूब भाईं और उसे लगा कि उससे मित्रता की जानी चाहिए। तब वह बिल के पास आकर बोला, “अरे हिरण्यक भाई, बाहर आओ, मैं भी तुमसे मित्रता करना चाहता हूं।”

हिरण्यक ने उससे उसका परिचय जानना चाहा। उस कौवे ने बताया कि वह लघुपतनक नाम का कौआ है जो उसी पेड़ पर रहता है। अपने बिल में सुरक्षित टिके हुए  हाजिरजवाब हिरण्यक ने आपत्ति जाहिर की, “अरे काक लघुपतनक, तुम्हारे-मेरे मध्य मित्रता कैसे संभव है? मेरी प्रजाति तो तुम्हारी प्रजाति के लिए भक्ष्य है। मैं शिकार और तुम शिकारी। मैं तो तुम्हारी मौजूदगी में बिल के बाहर भी निकलने की हिम्मत नहीं सकता, दोस्ती तो बहुत दूर की बात है।”

हिरण्यक ने बिल के अंदर से ही लघुपतनक से कहा कि परस्पर संबंध स्थापित करते समय दो जनों को अधोलिखित नीति-श्लोक पर ध्यान देना चाहिए:

ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं कुलम् ।

तयोर्मैत्री विवाहश्च न तु पुष्टविपुष्टयोः ॥२९॥

(पञ्चतंत्र, द्वितीय तंत्र मित्रसंप्राप्ति)

(ययोः एव समम् वित्तम् ययोः एव समम् कुलम् तयोः मैत्री विवाहः च न तु पुष्ट-विपुष्टयोः ।)

शब्दार्थ – जिनका (दो व्यक्तियों का) समान वित्त हो, जिनका कुल समान हो, उन्हीं में परस्पर मित्रता एवं विवाह ठीक है न कि सक्षम एवं असक्षम के बीच।

अर्थात् दो जनों के मध्य यारी-दोस्ती और वैवाहिक संबंध तभी स्थापित होने चाहिए जब वे समकक्ष कुलों से जुड़े हों और उनकी आर्थिक-सामाजिक स्थिति में समानता हो। जहां दोनों के बीच आर्थिक असमानता हो या दोनों की सामाजिक प्रतिष्ठा के स्तर में अंतर हो वहां संबंध नहीं बनाए जाने चाहिए।

इसके आगे भी हिरण्यक समझाया:

यो मित्रं कुरुते मूढ आत्मनोऽसदृशं कुधीः ।

हीनं वाप्यधिकं वापि हास्यतां यात्यसौ जनः ॥३०॥

(यथा उपर्युक्त)

यः मित्रम् कुरुते मूढः आत्मनः असदृशम् कुधीः हीनम् वा अपि अधिकम् वा अपि हास्यताम् याति असौ जनः ।)

शब्दार्थ – जो कुबुद्धि अपने असमान, अपने से हीनतर हो अथवा श्रेष्ठतर, के साथ मित्रता करता है वह जगहंसाई का पात्र बन जाता है।

जो व्यक्ति अपने से सर्वथा भिन्न आर्थिक अथवा सामाजिक स्तर के व्यक्ति के साथ मित्रता अथवा पारिवारिक संबंध स्थापित करता है वह मूर्ख कहा जाएगा। ऐसा व्यक्ति अपने से श्रेष्टतर स्थिति वाले व्यक्ति द्वारा हेय दृष्टि से देखा जाता है। मानव समाज में ऐसा सदैव नहीं देखने को मिलता है जहां दो, विशेषतः जब जने वैचारिक कारणों से मित्र बनते हैं। किंतु वैवाहिक मामलों में यह काफी हद तक सही है। हीनतर स्थिति वाले व्यक्ति का कभी-कभी स्पष्ट तौर पर तिरस्कार होता है। ऐसी संभावनाओं के कारण ही बराबरी के रिश्ते को उचित माना जाता है।

नीति की इस प्रकार की बातों से लघुपतनक हिरण्यक से बहुत प्रभावित हुआ। उसने समझाने की कोशिश की, “मैं तुम्हें धोखा देने के विचार से मित्रता की बात नहीं करता। मैं वास्तव में गंभीर हूं क्योंकि मैं तुमसे विद्वता की बातें सुनना चाहता हूं, तुम्हारे साथ विचारों का आदान-प्रदान करना चाहता हूं। तुम मेरा विश्वास करो।”

विश्वास की बात पर हिरण्यक ने उत्तर दिया:

न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्तेऽपि न विश्वसेत् ।

विश्वासाद्भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृतन्ति ॥४४॥

(यथा उपर्युक्त)

(न विश्वसेत् अविश्वस्ते विश्वस्ते अपि न विश्वसेत् विश्वासात् भयम् उत्पन्नम् मूलानि अपि निकृतन्ति ।)

शब्दार्थ – अविश्वसनीय व्यक्ति का तो विश्वास न ही करे और विश्वसनीय पर भी विश्वास न करे। विश्वास करने पर जो संकट पैदा होता है वह जड़ों को भी काट डालता है। तात्पर्य यह कि अपने विश्वस्त पर भी पूरा विश्वास नहीं ही होना चाहिए क्योंकि वह भी धोखा दे सकता है।

न वध्यते ह्यविश्वस्तो दुर्बलोऽपि बलोत्कटैः ।

विश्वस्ताश्चाशु बध्यन्ते बलवन्तोऽपि दुर्बलैः ॥४५॥

(यथा उपर्युक्त)

(न वध्यते हि अविश्वस्तः दुर्बलः अपि बल-उत्कटैः विश्वस्ताः च आशु बध्यन्ते बलवन्तः अपि दुर्बलैः ।)

शब्दार्थ – विश्वास न हो जिसे (अविश्वस्त) ऐसा दुर्बल व्यक्ति बलशाली द्वारा भी नहीं मारा जाता है। विश्वस्त व्यक्ति तो दुर्बल के द्वारा भी शीघ्र मारा जाता है।

इन दो छंदों का उल्लेख अपनी टिप्पणी के साथ मैंने २०१० की एक प्रविष्टि (७ फरवरी) में किया है। अतः यहां पर उस टिप्पणी का पुनरुल्लेख नहीं कर रहा हूं।

टिप्पणी – उपर्युक्त छंद ४४ में द्वितीय चरण का पाठ “विश्वस्तेऽपि न विश्वसेत्” है। मेरे पास पंचतंत्र की चौखंबा विद्याभवन द्वारा प्रकाशित (वाराणसी, १९९४) की प्रति है। उसमें यही पाठ है। मुझे लगता है कि इसके बदले “विश्वस्ते नाति विश्वसेत्” होता तो अधिक उपयुक्त होता। उस स्थिति में उसका अर्थ अधिक स्वीकार्य होता। अर्थ होता “विश्वस्त व्यक्ति पर भी अधिक विश्वास नही करना चाहिए।” यानी उस पर भी थोड़ी-बहुत शंका बनी रहनी चाहिए। हो सकता है किसी अन्य संस्करण में ऐसा ही हो।

हिरण्यक को विश्वास दिलाने का लघुपतनक ने काफी प्रयास किया । उसने, “ठीक है, तुम्हें विश्वास नहीं होता कि मैं तुम्हें हानि नहीं पहुंचाऊंगा। तुम मित्रता न करो न सही। फिर भी अपने बिल में सुरक्षित अनुभव करते हुए मुझसे बातें तो कर ही सकते हो। मैं रोज तुम्हारी पांडित्य भरी बातें सुनने आया करूंगा, इतना तो कर सकते हो न?”

हिरण्यक ने उसकी बात मान ली। इसके बाद उन दोनों के बीच प्रायः प्रतिदिन मुलाकातें होने लगीं, पहला बिल के अंदर मुहाने पर सुरक्षित और दूसरा बिल के बाहर। दोनों के बीच विविध विषयों पर वार्तालापों का सिलसिला चल पड़ा । हिरण्यक के मन में शनैः-शनैः लघुपतनक के प्रति विश्वास एवं लगाव जगने लगा। लघुपत्तनक दिन के समय बीन-बटोर कर लाई गईं भोज्य वस्तुएं हिरण्यक को भेंट करने लगा और इसी प्रकार हिरण्यक भी रात में खोज-बीन कर लाईं चीजें लघुपतनक को खिलाने लगा। इस प्रकार के लंबे सान्निध्य के बाद हिरण्यक को लगने लगा कि लघुपतक उसे धोखा नहीं देगा। वह बिल के बाहर आने लगा। दोनों की मित्रता हो जाती है। साथ-साथ उठना-बैठना, खेलना-कूदना होने लगा।

यह है पंचतंत्र के दूसरे तंत्र, मित्रसंप्राप्ति, की एक कथा। उक्त कहानी यही पर खत्म नहीं होती। कथा के दोनों पात्र मित्र बन जाते हैं कालांतर में वे उस स्थान को छोड़कर एक नए मित्र कछुए के पास पहुंचते हैं और वहां जुड़ती है एक और कथा। और यह सिलसिला आगे बढ़ता है। – योगेन्द्र जोशी

ईशवास्योपनिषद्‍ का दर्शन – परमात्मा विविध प्राणियों के रूप में स्वयं को प्रकट करता है

ईशावास्योपनिषद्‍ ग्यारह प्रमुख उपनिषदों में से एक है। यह बहुत ही छोटा ग्रंथ है, मात्र १८ मंत्रों का संकलन। दरअसल यह शुक्लयजुर्वेद का ४०वां एवं अंतिम अध्याय है और उस वेद का दार्शनिक पक्ष सार रूप में प्रस्तुत करता है।

मैं यहां पर उक्त उपनिषद्‍ के ६ठे एवं ७वें मंत्र का उल्लेख कर रहा हूं जिनमें परमात्मा की व्यापकता की बात की गयी है और यह बताया गया है वही परमात्मा स्वयं को समस्त प्राणियों के रूप में प्रकट करता है। जो मोक्षार्थी इस सत्य को आत्मसात् कर लेता है वह सभी प्रणियों में स्वयं की आत्मा को देखता है। उक्त मंत्र ये हैं –

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।

सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥६॥

(यः तु सर्वाणि भूतानि आत्मनि एव अनुपश्यति सर्व-भूतेषु च आत्मानम् ततः न वि-जुगुप्सते ।)

यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः ।

तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥७॥

(यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मा एव अभूत् वि-जानतः तत्र कः मोहः कः शोक: एकत्वम् अनुपश्यतः ।)

इन मंत्रों में जो “आत्मन्” शब्द विद्यमान है उसकी व्याख्या कुछ विद्वानों ने परमात्मन् के पर्याय के तौर पर की है तो कुछ अन्य ने प्राणियों की, विशेषतः मनुष्य की, आत्मा के तौर पर। संयोग से मेरे पास पांच व्यख्याएं उपलब्ध हैं, जिनमें ऊपरी तौर पर न्यूनाधिक शाब्दिक अंतर दिखता है किन्तु जिनका सार एक ही है। ये व्याख्याएं यों हैं –

(१) शुक्लयजुर्वेद (प्रकाशक पांडुरंग जावजी, बंबई, १९२९) में वर्णित श्रीमद्‍ उवटाचार्य के एवं श्रीमन्महीधर के भाष्य;

(२) आदिशंकराचार्यकृत भाष्य (गीताप्रेस, गोरखपुर, संवत् २०२४);

(३) भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद की टीका (भक्तिवेदांत बुक ट्रस्ट, मुंबई, २००६) एवं

(४) कल्याण उपनिषद्‍ अंक (गीताप्रेस, गोरखपुर, संवत्, २०५२)।

उक्त मंत्रों का शब्दार्थ क्रमशः कुछ यों दिया जा सकता है:

जो निःसंदेह सभी प्राणियों को अपनी आत्मा (या परमात्मा) में देखता है, और सभी प्राणियों में स्वयं की आत्मा (या परमात्मा) का दर्शन पाता है, वह किसी से घृणा नहीं करता ॥६॥

जिस अवस्था में आत्मा (या परमात्मा) ही सभी प्राणियों के रूप में प्रकटित हुआ है ऐसा ज्ञान किसी व्यक्ति को प्राप्त हो जाता है, सर्वत्र एकत्व देख रहे उस व्यक्ति के लिए न कोई मोह और न ही शोक रह जाता है॥७॥

प्राचीन काल के वैदिक दार्शनिकों की मान्यता थी कि समस्त चराचर जगत उसी एक परब्रह्म अथवा परमात्मा के स्वयं को बहु-रूपों में प्रकट करने का परिणाम है। दूसरे शब्दों में सभी प्राणी उसी के अंश हैं जो उसी के बनाये (?) मायाजाल में अपने मूल स्वरूप को भूले रहते हैं। मानव जीवन सृष्टि के इस सत्य के साक्षात्कार का एक साधन है। (जीवों की) आत्मा एवं परमात्मा के बीच कुछ वैसा ही संबंध जैसे जलभंडार समुद्र और उससे अलग हुई जल की बूंद के बीच।

उक्त मंत्रद्वय के अनुसार ज्ञानी पुरुष अपनी आत्मा का परमात्मा के साथ एकत्वभाव अनुभव करने में सफल रहता है। अर्थात् उसे यह ज्ञान हो जाता है कि समस्त प्राणी परमात्मा के अंश हैं: “मैं ही वह परमात्मा हूं और फंला प्राणी भी वही परमात्मा है। तब फंला प्राणी से घृणा, परहेज या विद्वेष कैसा? घृणा करना अपने आप से घृणा करना नहीं हो जाएगा?” इस प्रकार का चिंतन मोक्ष की दिशा में बढ़ रहे व्यक्ति के आचरण का हिस्सा बन जाता है। ऐसी अवस्था में लगाव और विलगाव की कोई सार्थकता नहीं रह जाती है। उक्त दूसरे मंत्र में एकत्व भाव के कारण किसी के प्रति मोह अथवा शोक मोक्षार्थी को नहीं हो सकता है।

ऊपर मैंने मोक्षार्थी शब्द का प्रयोग किया है क्योंकि आम जन सांसारिक क्रियाकलापों में उलझे रहते हैं। अध्यात्म की दिशा में आगे बढ़ने और ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने का विचार उनके मन में उठता ही नहीं। उस स्थिति में उनके लिए उपर्युक्त दार्शनिक बातें कितनी सार्थक अथवा निरर्थक रहती हैं यह प्रश्न भी बेमानी हो जाता है। इसलिए अध्यात्म की दिशा में अग्रसर मोक्षार्थी के लिए ही इन बातों का  महत्व है। (मोक्ष = जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर अपने मूल स्वरूप सत्-चित्-आनंद परब्रह्म को प्राप्त करना।) – योगेन्द्र जोशी

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