मनुस्मृति में वर्णित पंचपाप एवं पंचमहायज्ञ (भाग – 2)

अपनी पिछली ब्लाग-प्रविष्टि में मैंने पंचपापों की चर्चा की थी । मेरी उस चर्चा का आधार मनुस्मृति था । उक्त स्मृति के अनुसार मनुष्य अपने दैनिक जीवन में तरह-तरह के छोटे-मोटे पापकर्म करता रहता है । मनुस्मृति का मत है कि जीवनधारण के लिए चूल्हा-चक्की जैसे आवश्यक कार्यों को संपन्न करते समय मनुष्य प्राणिहिंसा या तद्सदृश अन्य कर्मों से नहीं बच पाता है । इन सबमें लगा व्यक्ति पापों का भागीदार बन जाता है । प्रौद्योगिकी-प्रधान आधुनिक युग में लोगों की दैनिक चर्या प्राचीन काल की जैसी नहीं रही । फिर भी चलते-फिरते या मशीनों के प्रयोग में वह कुछ न कुछ अनिष्टप्रद कर ही बैठता है । मनुस्मृति कहती है कि उनसे जुड़े पापों के दोषों की भरपाई वह सत्कर्मों के संपादन से कर सकता है । स्मृतिकार ने इन सत्कर्मों को पंच महायज्ञ कहा है । उक्त स्मृति के अधोलिखित श्लोकों में इनका विवरण यों उपलब्ध है:

अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम् ।

होमो दैवो बलिर्भौतो नृयज्ञो‍ऽतिथिपूजनम् ।।

(मनुस्मृति, 3, 70)

(अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः, तर्पणम् तु पितृयज्ञः, होमः दैवः, बलिः भौतः, अतिथि-पूजनम् नृयज्ञः ।)

अर्थ – अध्यापन-कार्य ब्रह्मयज्ञ, पितरों का तर्पण पितृयज्ञ, होमकार्य दैवयज्ञ, बलिप्रदान भूतयज्ञ, एवं अतिथि-सत्कार नृयज्ञ हैं ।    

यज्ञ का अर्थ सामान्यतः देवताओं की वैदिक मंत्रों के साथ की जाने वाली स्तुति से लिया जाता है, जिसे हवनकुण्ड में प्रज्वलित अग्नि में हव्य (घी, तिल आदि) की आहुति देकर मंत्रोच्चार से साथ संपन्न किया जाता है । यज्ञ का यह अर्थ रूढ़ि एवं आम प्रचलन में है, परंतु कई अवसरों पर यज्ञ इससे अधिक व्यापक अर्थ रखता है । यज्ञ शब्द उक्त श्लोक में मनुष्य से अपेक्षित अन्य कर्मों को इंगित करता है ।

यहां पांच यज्ञों का उल्लेख किया गया है जिनमें प्रथम  (ब्रह्मयज्ञहै अध्यापन जिसका तात्पर्य है अन्य लोगों को ज्ञान बांटना, उनमें उचितानुचित का विवेक जगाना, उन्हें आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करना आदि । प्राचीन वैदिक काल की वर्ण-व्यवस्था में यह कार्य औपचारिक तौर पर ब्राह्मणों के जिम्मे हुआ करता था । पर मैं समझता हूं कि तब भी किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा रहती होगी कि वह अनौपचारिक रूप से अपनी संतान एवं अन्य जनों को अपने सीमित ज्ञान से संस्कारित करे ।

अगला यज्ञ है पितृयज्ञ जिसे उक्त ग्रंथ में तर्पण द्वारा संपन्न करने की बात कही है । तर्पण का अर्थ है तृप्त करना । धर्मशास्त्रों के अनुसार स्नानादि के समय पितरों के नाम पर जल चढ़ाकर तर्पण किया जाता है । मैं तर्पण को अधिक व्यापक अर्थ देता हूं । वे सभी कार्य – जैसे दान – जो पितरों के नाम पर किए जाएं तर्पण माने जा सकते हैं । रोजमर्रा के जीवन में उनका स्मरण करना, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना, आदि तर्पण समझे जा सकते हैं ।

प्रज्वलित अग्नि में मंत्रोच्चार के साथ हव्यसामग्री सोंपना देवयज्ञ कहा जाता है । वैदिक मान्यता के अनुसार प्रकृति के विविध निष्प्राण भौतिक घटकों पर किसी एक या दूसरे देवता का नियंत्रण या स्वामित्व रहता है किसे अधिष्ठाता देवता कहा जाता है । मान्यता रही है कि हवन की अग्नि को समर्पित हव्य सामग्री उसके माध्यम से उन देवताओं को प्राप्त होती है । यज्ञ सामान्यतः इस विधि से देवताओं के प्रति की गई स्तुति है ।

वैदिक लोकव्यवहार मनुष्य से यह अपेक्षा करता है कि वह भोजन की व्यवस्था केवल अपने लिए ही न करे बल्कि अन्य जीवधारियों के नाम पर भी उसका एक अंश छोड़ दे जिसे बलि कहा गया है । मुझे याद है जब मेरे ग्राम्य समाज में भोजन-काल में उसका एक अंश अलग करने के बाद खाना आरंभ करते थे । उस बलि को भोजनांतर बाहर खुले में डाल देते थे जिसे कुत्ते-बिल्ली, कौवे या चिड़िया खा लेते थे । किसी न किसी बहाने पशुपक्षियों को भोजन खिलाने-पिलाने का व्रत कई लोग लिए रहते हैं । यह सब करना भूतयज्ञ के नाम से जाना गया है । भूत का अर्थ है भौतिक देहधारी प्राणी ।

अंत में नृयज्ञ, जिसका तात्पर्य अतिथि-सत्कार से है । समाज में किसी भी अन्य व्यक्ति, चाहे वह अनजान ही क्यों न हो, की सहायता करना, उसके प्रति सदाशयता दिखाना, सद्व्यवहार करना अतिथि सत्कार है । भूखे या रोगग्रस्त व्यक्ति के घर के प्रवेशद्वार पर आकर भोजन अथवा औषधि की याचना करने पर उसकी यथासंभव मदद करना अतिथि सत्कार कहा जाएगा । इसी प्रकार रात्रिविश्राम की मांग करने वाले के लिए समुचित व्यवथा करना अतिथि सत्कार के अंतर्गत माना जाएगा । अतिथि का मतलब है ऐसा व्यक्ति जिसका साक्षात्कार अप्रत्याशित रूप से हो जाए । दशकों पहले तक अपने समाज में अतिथि-सत्कार की प्रथा रही है (अतिथिदेवो भव) । लेकिन आज के ‘सभ्य’ समाज में लोग सामाजिक संवेदनाओं से दूर एवं परस्पर शंकालु होते जा रहे हैं और तदनुसार एक-दूसरे से बचते हैं ।

उक्त प्रकार के यज्ञसंज्ञात्मक कर्मों के निष्पादन के विषय में आगे यह कहा गया है:

पञ्चैतान्यो महायज्ञान्न हापयति शक्तितः ।

स गृहे‍ऽपि वसन्नित्यं सूनादोषैर्न लिप्यते ।।

(मनुस्मृति, 3, 71)

(एतान्यः पञ्च महायज्ञान् शक्तितः न हापयति सः नित्यं गृहे वसन् अपि सूना-दोषैः न लिप्यते ।)

अर्थ – यहां कथित इन पांच महायज्ञों को जो यथासामर्थ्य नहीं छोड़ता वह घर में रहते हुए भी पूर्वचर्चित पापकमों के दोषों से नहीं लिप्त होता है ।

घर में रहते हुए का तात्पर्य है गृहस्थ जीवन निभाते हुए । गृहस्थाश्रम मानवसमाज का सबसे अहम आश्रम है क्योंकि इसी पर अन्य आश्रमों का अस्तित्व टिका रहता है । इसी आश्रम के लोग दूसरों की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं । लेकिन गृहस्थाश्रम के तमाम दैनिक कार्यों को संपन्न करते हुए मनुष्य जाने-अनजाने पापकर्म कर बैठता है जिनके दोषों से वह मुक्त हो जाता है अन्य परोपकर्मों को करने पर । पापों की भरपाई पुण्यकर्मों से संभव है यही संदेश मनुस्मृति के इन वचनों में निहित है ।

पंचपापों एवं पंचमहायज्ञों को मैं शाब्दिक अर्थ में नहीं लेता, प्रत्युत इनको मैं प्रतीकात्मक समझता हूं । छोटे-मोटे सभी कर्म पाप के स्रोत हो सकते हैं और देवताओं-पितरों के प्रति श्रद्धाभिव्यक्ति एवं समाज तथा अन्य प्राणियों के प्रति उपकार-भावना उन पापों का प्रतिकार है । – योगेन्द्र जोशी

मनुस्मृति में वर्णित पंचपाप एवं पंचमहायज्ञ (१)

प्रचीन भारतीय दर्शन में पाप एवं पुण्य को बहुत महत्त्व दिया गया है । इन्हें क्रमशः नर्क तथा स्वर्ग लोकों का मार्ग बताया गया है । सत्कमों को पुण्यदायक एवं कदाचारण-दुराचरण को पापों का जनक माना जाता रहा है । भारतभूमि में प्रचलित सभी धर्म पापकर्मों से बचने की शिक्षा देते हैं ताकि मनुष्य को मरणोपरांत नर्कलोक की यातना न भुगतना पड़े । भारतीय दार्शनिक चिंतन में मनुष्य मात्र देही नहीं होता है । देह तो उसके भीतर निवासस्थ आत्मा द्वारा धारण किया हुआ भौतिक कलेवर होता है । मान्यतानुसार आत्मा कभी मरती नहीं बल्कि इस भूलोक के अलावा स्वर्ग-नर्क आदि लोकों का अपने कर्मों के अनुसार भोग करती है । यद्यपि बौद्ध तथा जैन धर्म में आत्मा संबंधी मान्यताएं किंचित भिन्न हैं, तथापि पाप-पुण्य की महत्ता वहां कम नहीं है ।

कहने का तात्पर्य है कि अपने देश में पाप से बचने की बातें आम जीवन में प्रायः होती रहती हैं । किंतु यह भी सच है कि जीवन-यापन हेतु किए जाने वाले दैनिक कर्मों के दौरान जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे, मनुष्य पाप कर बैठता है, या उससे पापकर्म होते रहते हैं । मनुस्मृति में उन कर्मों का जिक्र मिलता है जिन्हें जीवन-धारण हेतु प्रायः प्रतिदिन किया जाता है और जो मनुष्य को पाप का भागी बनाते हैं । आज के प्रौद्योगिकी आधारित जीवन में वे कर्म बेमानी कहे जा सकते हैं, फिर भी कुछ लोगों के दैनिक जीवन का वे आज भी हिस्सा होते हैं । अस्तु्, उक्त स्मृति में पंचपाप संबंधी ये श्लोक देखने को मिलता है:

पञ्च सूना गृहस्थस्य चुल्ली पेषण्युपस्करः ।

कण्डनी चोदकुम्भश्च बध्यते यास्तु वाहयन् ।।

(मनुस्मृति 3, 68)

(चुल्ली पेषणी उपस्करः कण्डनी च उदकुम्भः च गृहस्थस्य पञ्च सूनाः याः तु वाहयन् बध्यते ।)

          अर्थ –  चुल्ली (चूल्हा), चक्की, झाड़ू-पोछे के साधन, सिलबट्टा तथा पानी का घड़ा, ये पांच पाप के कारण हैं जिनका व्यवहार करते हुए मनुष्य पापों से बधता है ।

अर्थात् चूल्हा-चक्की, झाड़ू-पोंछा आदि का प्रयोग करते समय कुछ न कुछ पापकर्म हो ही जाता है, जैसे घुन-कीड़े जैसे जीवों की हत्या हो ही जाती है । भारतीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार किसी भी प्राणी की हिंसा नहीं करनी चाहिए । लेकिन जीवन-धारण के कार्य में ऐसे पापों से बचना संभव नहीं है । मनुस्मृति में इनके दोषों के निवारण का भी मार्ग बतलाया हैः

 

तासां क्रमेण सर्वासां निष्कृत्यर्थं महर्षिभिः ।

पञ्च क्लृप्ता महायज्ञाः प्रत्यहं गृहमेधिनाम् ।।

(मनुस्मृति 3, 69)

(तासां सर्वासां क्रमेण निष्कृति-अर्थं महर्षिभिः गृह-मेधिनाम् प्रति अहं पञ्च महा-यज्ञाः क्लृप्ता ।)

          अर्थ – इन सबसे क्रमानुसार निवृत्ति हेतु महर्षियों ने गृहस्थाश्रमियों के लिए प्रतिदिन पांच महायज्ञों का विधान सुझाया है ।

मनुस्मृति के अनुसार किसी पापकर्म के दोष से मुक्त होने के लिए हमें उसके बदले समुचित सत्कर्म करने चाहिए । अर्थात पुण्यकार्य करके हम पापकर्मजनित हानि की भरपाई कर सकते हैं । दानपुण्य, देवोपासना, सदुपदेश, मनुष्यों तथा अन्य प्राणियों का हितसाधन आदि कर्म इस श्रेणी में आते हैं । ऐसा करना एक प्रकार का प्रायश्चित्त करना है । प्रायः सभी धर्मों में प्रायश्चित्त की बातें कही जाती हैं । जिन महायज्ञों का उल्लेख मनुस्मृति में मिलता है वे हैं ब्रह्मयज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ एवं नृयज्ञ । इनकी चर्चा किंचित विस्तार से अगली बलॉग-प्रविष्टि में की जाएगी ।

चुल्हा-चौकी जैसे कार्य आज के मशीनी युग में कुछ हद तक बेमानी हो चुके हैं । मैं इन्हें प्रतीकात्मक मानता हूं । तदनुसार रोजमर्रा के जीवन में उठने-बैठने, खाने-पीने, चलने-फिरने आदि जैसे कार्य करते समय जाने-अनजाने व्यक्ति को पाप का दोष लगता रहता है । भले ही मशीनों का प्रयोग हो रहा हो, वे व्यक्ति पाप के परोक्षतः भागी होंगे ही जिनके हेतु मशीनें कार्यरत हों । उन दोषों के निवारण के लिए सत्कर्मों को दरशाने वाले कर्म उसे करना चाहिए यही मंतव्य उक्त कथनों का निहितार्थ होना चाहिए ऐसा मेरा मानना है । – योगेन्द्र जोशी

“प्रजासुखे सुखं राज्ञः …” – कौटिल्य अर्थशास्त्र के राजधर्म संबंधी नीतिवचन

करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व भारतभूमि पर जिस मौर्य सामाज्य की स्थापना हुई थी उसका श्रेय उस काल के महान राजनीतिज्ञ चाणक्य को जाता है । राजनैतिक चातुर्य के धनी चाणक्य को ही कौटिल्य कहा जाता है । उनके बारे में मैंने पहले कभी अपने इसी ब्लॉग में लिखा है । कौटिलीय अर्थशास्त्र चाणक्य-विरचित ग्रंथ है, जिसमें राजा के कर्तव्यों का, आर्थिक तंत्र के विकास का, प्रभावी शासन एवं दण्ड व्यवस्था आदि का विवरण दिया गया है । उसी ग्रंथ के तीन चुने हुए श्लोकों का उल्लेख मैं यहां पर कर रहा हूं ।

(कौटिलीय अर्थशास्त्र, प्रथम अधिकरण, अध्याय 18)

1.

प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां तु हिते हितम् ।

नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम् ॥

(प्रजा-सुखे सुखम् राज्ञः प्रजानाम् तु हिते हितम्, न आत्मप्रियम् हितम् राज्ञः प्रजानाम् तु प्रियम् हितम् ।)

प्रजा के सुख में राजा का सुख निहित है, प्रजा के हित में ही उसे अपना हित दिखना चाहिए । जो स्वयं को प्रिय लगे उसमें राजा का हित नहीं है, उसका हित तो प्रजा को जो प्रिय लगे उसमें है ।

2.

तस्मान्नित्योत्थितो राजा कुर्यादर्थानुशासनम्् ।

अर्थस्य मूलमुत्थानमनर्थस्य विपर्ययः ॥

(तस्मात् नित्य-उत्थितः राजा कुर्यात् अर्थ अनुशासनम्, अर्थस्य मूलम् उत्थानम् अनर्थस्य विपर्ययः ।)

इसलिए राजा को चाहिए कि वह नित्यप्रति उद्यमशील होकर अर्थोपार्जन तथा शासकीय व्यवहार संपन्न करे । उद्यमशीलता ही अर्थ (संपन्नता) का मूल है एवं उसके विपरीत उद्यमहीनता अर्थहीनता का कारण है ।

3.

अनुत्थाने ध्रुवो नाशः प्राप्तस्यानागतस्य च ।

प्राप्यते फलमुत्थानाल्लभते चार्थसम्पदम् ॥

(अनुत्थाने ध्रुवः नाशः प्राप्तस्य अनागतस्य च, प्राप्यते फलम् उत्थानात् लभते च अर्थ-सम्पदम् ।)

उद्यमशीलता के अभाव में पहले से जो प्राप्त है एवं भविष्य में जो प्राप्त हो पाता उन दोनों का ही नाश निश्चित है । उद्यम करने से ही वांछित फल प्राप्त होता है ओर उसी से आर्थिक संपन्नता मिलती है ।

कौटिल्य ने इन श्लोकों के माध्यम से अपना यह मत व्यक्त किया है कि राजा का कर्तव्य अपना हित साधना और सत्तासुख भोगना नहीं है । आज के युग में राजा अपवाद रूप में ही बचे हैं और उनका स्थान अधिकांश समाजों में जनप्रतिनिधियों ने ले लिया है जिन्हें आम जनता शासकीय व्यवस्था चलाने का दायित्व सोंपती है । कौटिल्य की बातें तो उन पर अधिक ही प्रासंगिक मानी जायेंगी क्योकि वे जनता के हित साधने के लिए जनप्रतिनिधि बनने की बात करते हैं । दुर्भाग्य से अपने समाज में उन उद्येश्यों की पूर्ति विरले जनप्रतिनिधि ही करते हैं ।

उद्योग शब्द से मतलब है निष्ठा के साथ उस कार्य में लग जाना जो व्यक्ति के लिए उसकी योग्यतानुसार शासन ने निर्धारित किया हो, या जिसे उसने अपने लिए स्वयं चुना हो । राजा यानी शासक का कर्तव्य है कि वह लोगों को अनुशासित रखे और कार्यसंस्कृति को प्रेरित करे । अनुशासन एवं कार्यसंस्कृति के अभाव में आर्थिक प्रगति संभव नहीं है । जिस समाज में लोग लापरवाह बने रहें, कार्य करने से बचते हों, समय का मूल्य न समझते हों, और शासन चलाने वाले अपने हित साधने में लगे रहें, वहां संपन्नता पाना संभव नहीं यह आचार्य कौटिल्य का संदेश है । – योगेन्द्र जोशी

 

“न त्यजेत् आत्मनः उद्योगम् …” – पुरुषार्थ की महत्ता संबंधी हितोपदेश के नीतिवचन

संस्कृत के नीतिविषयक ग्रंथों में से एक हितोपदेश है, जिसमें पशु-चरित्रों के माध्यम से आम जन के समक्ष महत्वपूर्ण सीख की बातें प्रस्तुत की गई हैं । उक्त ग्रंथ का संक्षिप्त परिचय मैंने इसी ब्लॉग के 2 मार्च 2009 की पोस्ट में दिया है । यद्यपि यह ग्रंथ अवयस्कों-बालकों को संबोधित करके लिखा गया है, तथापि इसमें दी गई बातें सभी उम्र के लोगों के लिए उपयोगी हैं । ग्रंथ में एक स्थल पर “होनी टल नहीं सकती” यह कहते हुए भाग्य के भरोसे बैठ जाने की आलोचना की गई  है । मैं तत्संबंधित दो श्लोकों का यहां पर उल्लेख कर रहा हूं:

यदभावि न तद्भावि भावि चेन्न तदन्यथा ।

इति चिन्ताविषघ्नो९यमगदः किं न पीयते ।।

(हितोपदेश, मित्रलाभ, 29)

(यत् अभावि न तत् भावि भावि चेत् न तत् अन्यथा इति चिन्ता-विषघ्नः अयम् अगदः किम् न पीयते ।)

अर्थ – जो नहीं घटित होने वाला है वह होगा नहीं, यदि कुछ होने वाला हो तो वह टलेगा नहीं इस विषरूपी चिंता (विचारणा) के शमन हेतु अमुक (आगे वर्णित) औषधि का सेवन क्यों नहीं किया जाता है ?

न दैवमपि सञ्चित्य त्यजेदुद्योगमात्मनः ।

अनुद्योगेन कस्तैलं तिलेभ्यः प्राप्तुमर्हति ।।

(यथा उपर्युक्त, 30)

(न दैवम् अपि सञ्चित्य त्यजेत् उद्योगम् आत्मनः न-उद्योगेन कः तैलं तिलेभ्यः प्राप्तुम् अर्हति ।)

अर्थ – (और औषधि यह है:) दैव यानी भाग्य का विचार करके व्यक्ति को कार्य-संपादन का अपना प्रयास त्याग नहीं देना चाहिए । भला समुचित प्रयास के बिना कौन तिलों से तेल प्राप्त कर सकता है ?

हितोपदेश के रचनाकार के मतानुसार पुरुषार्थ यानी उद्यम के बिना वांछित फल नहीं मिल सकता है । “जो होना (या नहीं होना) तय है वह तो होगा ही (या होगा ही नहीं)” यह विचार मान्य नहीं हो सकता । यह सही है कि जो हो चुका उसे बदला नहीं जा सकता है । अर्थात् जो घटना भूतकाल का हिस्सा हो चुकी हो उसे कोई परिवर्तित नहीं कर सकता है । यह भी संभव है कि जो भविष्य में होना हो वह भी हो के रहे । परंतु यह कौन बताएगा कि वह भावी घटना क्या होगी ? जब वह घटित हो जाए तब तो वह भूतकाल का अंग बन जाता है और उसके बारे में “यह तो होना था” जैसा वक्तव्य दिया जा सकता है । लेकिन जब तक वह घटित न हो जाए तब तक कैसे पता चलेगा कि क्या होने वाला है ? ऐसी स्थिति में क्या यह नहीं स्वीकारा जाना चाहिए कि उस भावी एवं अज्ञात घटना को संपन्न करने हेतु किए जाने वाले हमारे प्रयास उसके घटित होने के कारण होते हैं । अवश्य ही कुछ ऐसे कारक भी घटना को प्रभावित करते होंगे जिन पर हमारा नियंत्रण न हो अथवा वे पूर्णतः अज्ञात हों । उन कारकों एवं हमारे प्रयासों के सम्मिलित प्रभाव के अधीन ही वह घटना जन्म लेगी जिसके घटित हो चुकने पर ही वह अपरिवर्तनीय कही जाएगी । किंतु उस क्षण से पहले हम जान नहीं सकते कि वह घटना क्या होगी । अतः हमारे प्रयास चलते रहने चाहिए । – योगेन्द्र जोशी

“न अयम् आत्मा प्रवचनेन लभ्यः …” – परब्रह्म की प्राप्ति विषयक मुण्डकोपनिषद् के वचन

वैदिक ग्रंथ ‘मुंडक उपनिषद्’ में परब्रह्म के स्वरूप और उसे प्राप्त करने के मार्ग का वर्णन किया गया है । माना जाता है कि यह ग्रंथ प्रमुखतया उन आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है जो मोक्ष की समझ और उसकी प्राप्ति का मार्ग जानना चाहते हैं । वैदिक दार्शनिेकों के मतानुसार जीवधारियों का भौतिक पदार्थों से बना स्थूल शरीर तो नश्वर है, किंतु उसमें ‘निवास’ करने वाली अमूर्त आत्मा अमर है । स्थूल स्तर पर नाशवान शरीर की जिस मृत्यु का अनुभव हम करते हैं वह वस्तुतः आत्मा का शरीर छोड़ना भर है । वास्तव में आत्मा वारंवार शरीर धारण करती है और कालांतर में उसे छोड़ती है । वह जन्म-मरण के चक्र से बंधी रहती है । प्राचीन वैदिक चिंतक मानने थे कि परमात्मा या परब्रह्म समस्त सृष्टि का मूल है और आत्मा वस्तुतः उसका एक अंश है । परब्रह्म और आत्मा के बीच का संबंध कुछ-कुछ वैसा ही है जैसा विशाल समुद्र और उससे विलग हुई जल की एक बूंद का । अपनी देह से संपादित कर्मफलों के बंधन से आत्मा जन्ममरण के चक्र में तब तक भटकती रहती है जब तक कि उसे अपने वास्तविक स्वरूप अर्थात् परब्रह्म का अंश होने का ज्ञान नहीं हो जाता है । ज्ञानप्राप्ति के पश्चात वह उसी में लीन हो जाती है । उस अवस्था को माक्ष की संज्ञा दी गई है । सामान्य शब्दों में अभिव्यक्त इस दार्शनिक विचार के गहरे अर्थ समझना किस-किस के लिए संभव है यह मैं नहीं कह सकता ।

आत्मा के सही स्वरूप का ज्ञान किसे और कैसे मिलता है इस बात का उल्लेख मुंडक उपनिषद के अधःप्रस्तुत तीन मंत्रों में मिलता है:

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।

यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ।।3।।

(मुण्डकोपनिषद्, मुंडक 3, खंड 2)

(न अयम् आत्मा प्रवचनेन लभ्यः न मेधया न बहुना श्रुतेन, यम् एव एषः वृणुते तेन लभ्यः, तस्य एषः आत्मा विवृणुते तनुम् स्वाम् ।)

अर्थ – यह आत्मा प्रवचनों से नहीं मिलती है और न ही बौद्धिक क्षमता से अथवा शास्त्रों के श्रवण-अध्ययन से । जो इसकी ही इच्छा करता है उसेयह प्राप्त होता है, उसी के समक्ष यह आत्मा अपना स्वरूप उद्घाटित करती है ।

 

यहां आत्मा को पाने का अर्थ है आत्मा के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करना । धार्मिक गुरुओं के प्रवचन सुनने से, शास्त्रों के विद्वत्तापूर्ण अध्ययन से, अथवा ढेर सारा शास्त्रीय वचनों को सुनने से यह ज्ञान नहीं मिल सकता है । इस ज्ञान का अधिकारी वह है जो मात्र उसे पाने की आकांक्षा रखता है । तात्पर्य यह है कि जिसने भौतिक इच्छाओं से मुक्ति पा ली हो और जिसके मन में केवल उस परमात्मा के स्वरूप को जानने की लालसा शेष रह गयी हो वही उस ज्ञान का हकदार है । जो एहिक सुख-दुःखों, नाते-रिश्तों, क्रियाकलापों, में उलझा हो उसे वह ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता है । जिस व्यक्ति का भौतिक संसार से मोह समाप्त हो चला हो वस्तुतः वही कर्मफलों से मुक्त हो जाता है और उसका ही परब्रह्म से साक्षात्कार होता है ।

 

नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिंगात् ।

एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वान्स्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ।।4।।

(यथा पूर्वोक्त)

(न अयम् आत्मा बल-हीनेन लभ्यः न च प्रमादात् तपसः वा अपि अलिंगात् एतैः उपायैः यतते यः तु विद्वान् तस्य एषः आत्मा विशते ब्रह्म-धाम ।)

अर्थ – यह आत्मा बलहीन को प्राप्त नहीं होती है, न ही धनसंपदा, परिवार के विषयों में लिप्त रहने वाले को, और न तपस्यारत किंतु संन्यासरहित व्यक्ति को । जो विद्वान एतद्विषयक उपायों को प्रयास में लेता है उसी की आत्मा परब्रह्मधाम में प्रवेश करती है ।

 

यहां पर बलहीन का अर्थ सामान्य दैहिक अथवा बौद्धिक  बल से नहीं है । जिसके पास आत्मसंयम का सामर्थ्य है वही बलवान है क्योंकि वह विपरीत परिस्थिति में भी अविचलित रह सकता है । किंतु ऐसा व्यक्ति भी मोक्ष्य के योग्य नहीं होता । संन्यास का अर्थ है सांसारिक बंधनों से स्वयं को मुक्त करना । जिस व्यक्ति को कोई लालसा नहीं, जो संभी बंधन तोड़ चुका हो, जिसका न कोई अपना रह गया हो और न पराया वह वीतराग संन्यासी कहलाता है । ऐसा संन्यासी बनना ही परब्रह्म के ज्ञान का उपाय है ।

 

संप्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ताः कृतात्मानो वीतरागः प्रशान्ताः ।

ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति ।।5।।

(यथा पूर्वोक्त)

(संप्राप्य एनम् ऋषयः ज्ञान-तृप्ताः कृत-आत्मानः वीत-रागः प्रशान्ताः ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीराः युक्त-आत्मानः सर्वम् एव आविशन्ति ।)

अर्थ – आत्मा के यथार्थ को पा लेने पर ऋषिगण ज्ञानतृप्त, कृतकृत्य, विरक्त, और परम शान्त हो जाते हैं । वे धीर पुरुष उस सर्वव्यापी परब्रह्म को सर्वत्र प्राप्त करते हुए और उससे युक्तचित्त होकर उसी संपूर्ण ब्रह्म में प्रवेश कर जाते हैं, यानी उससे एकाकार हो जाते हैं ।

इस मंत्र की व्याख्या में कहा गया है कि आत्मा के मूलस्वरूप का ज्ञान पा चुकने वाले ऋषि के लिए उसका शरीर एक अस्थाई सांसारिक बंधन रह जाता है । उसके लिए देहत्याग पर परब्रह्म में लीन होना वैसा ही होता है जैसा किसी घड़े के टूटकर बिखरने पर उसके भीतर के आंशिक आकाश और बाह्य असीमित आकाश के बीच का भेद समाप्त हो जाता है । युक्तचित्त की स्थिति में केवल ब्रह्म का ही भाव उसके मन में रह जाता है और सांसारिक समस्त वस्तुओं में उसी ब्रह्म के दर्शन होने लगते है । उसके लिए कुछ भी सांसारिक बांछनीय नहीं रह जाता है । प्राचीन काल में वैदिक चिंतकों को कदाचित घड़े का दृष्टांत ही उपयुक्त लगा होगा । आज विकल्पतः हवा भरे गुब्बारे का दृष्टांत सोचा जा सकता है जिसके, भीतर का आकाश बाह्य आकाश से पूरी तरह विभक्त रहता है । – योगेन्द्र जोशी

 

 

“राजकलिं हन्युः प्रजाः”(महाभारत के वचन) – प्रजा की सुरक्षा के प्रति बेपरवाह राजा मृत्युदंड के योग्य

भारतीयों के लिए वेदव्यासरचित महाकाव्य महाभारत एक सुपरिचित ग्रंथ है जिसकी कथाओं का जिक्र लोग यदाकदा करते रहते हैं । महाभारत में वर्णित पांडव-कौरवों के युद्ध की समाप्ति के बाद राजा युधिष्ठिर सरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह से राजकार्य संबंधी नीतिवचन प्राप्त करते हैं । राजा के लिए क्या कृत्य है क्या नहीं इस बाबत अनेकानेक बातें भीष्म बताते हैं । उसी प्रकरण में वे यह भी कहते हैं कि उस राजा को प्रजा ने मृत्युदंड दे देना चाहिए जो उनकी सुरक्षा को गंभीरता से नहीं लेता है । मैं तत्संबंधित तीन श्लोकों की चर्चा यहां पर कर रहा हूं । ये तीनों महाभारत के अनुशासनपर्व (अध्याय ६१) से उद्धृत किए जा रहे हैं ।

क्रोश्यन्त्यो यस्य वै राष्ट्राद्ध्रियन्ते तरसा स्त्रियः ।

क्रोशतां पतिपुत्राणां मृतोऽसौ न च जीवति ॥३१॥

(महाभारत, अनुशासनपर्व, अध्याय ६१)

(यस्य वै राष्ट्रात् क्रोशताम् पतिपुत्राणाम् क्रोश्यन्त्यः स्त्रियः तरसा ध्रियन्ते असौ मृतः न च जीवति ।)

अर्थ – जिस राजा के राज्य में चीखती-चिल्लाती स्त्रियों का बलपूर्वक अपहरण होता है और उनके पति-पुत्र रोते-चिल्लाते रहते हैं, वह राजा मरा हुआ है न कि जीवित ।

जो राजा अपहरण की जा रही स्त्रियों की सुरक्षा के लिए समुचित कदम नहीं उठाता और उनके दुःखित बंधु-बांधवों की विवशता से विचलित नहीं होता वह जीते-जी मरे हुए के समान है । उसके जीवित होने की कोई सार्थकता नहीं रह जाती ।

 

ध्यान रहे कि आज के लोकतांत्रिक शासकीय व्यवस्था में जो सत्ता के शीर्ष पर हो वही राजा की भूमिका निभाता है । इसलिए राजा के संदर्भ में जो बातें कही गई हैं वह आज के शासकों पर यथावत लागू होती हैं । अपने देश के कुछ राज्यों, जैसे उत्तर प्रदेश, में इस समय स्त्रियों के प्रति दुष्कर्म के मामले चरम पर हैं, किंतु शासकीय व्यवस्था इतनी गिरी हुई है कि किसी को दंडित नहीं किया जा रहा है । ऐसे शासकों को वस्तुतः डूब मरना चाहिए!

 

अरक्षितारं हर्तारं विलोप्तारमनायकम् ।

तं वै राजकलिं हन्युः प्रजाः सन्नहा निर्घृणम् ॥३२॥

(यथा पूर्वोक्त)

(अरक्षितारम् हर्तारम् विलोप्तारम् अनायकम् तम् निर्घृणम् राजकलिम् प्रजाः वै सन्नहा हन्युः ।)

अर्थ – जो राजा अपनी जनता की रक्षा नहीं करता, उनकी धनसंपदा छीनता या जब्त करता है, जो योग्य नेतृत्व से वंचित हो, उस निकृष्ट राजा को प्रजा ने बंधक बनाकर निर्दयतापूर्वक मार डालना चाहिए ।

 

राजा का कर्तव्य है अपनी प्रजा की रक्षा करना, उसको सुख-समृद्धि के अवसर प्रदान करना । तभी वह जनता से कर वसूलने का हकदार बन सकता है । अपने कर्तव्यों का निर्वाह न करने वाला राजा जब कर वसूले तो उसको लुटेरा ही कहा जाएगा । नीति कहती है कि ऐसे राजा को निकृष्ट कोटि का मानना चाहिए । उसके प्रति दयाभाव रखे बिना ही परलोक भेज देना चाहिए ।

 

आज की शासकीय स्थिति कुछ राज्यों में अति दयनीय है । परंतु दुर्भाग्य से सत्तासुख भोग रहे वहां के शासकों को दंडित करने वाला कोई नहीं । लोग कहते हैं कि पांच-पांच सालों में होने वाले चुनावों द्वारा जनता उन्हें सत्ता से बेदखल कर देती है । लेकिन ध्यान दें कि न चुना जाना कोई दंड नहीं होता है । किसी भी चुनाव में कई प्रत्याशी भाग लेते हैं जिनमें से एक चुना जाता है । “अन्य सभी को दंडित कर दिया” ऐसा क्या कहा जा सकता है ? सवाल असल में दंडित किये जाने का है जो वास्तव में होता नहीं ।

 

अहं वो रक्षितेत्युक्त्वा यो न रक्षति भूमिपः ।

स संहत्य निहंतव्यः श्वेव सोन्मादः आतुरः ॥३३॥

(यथा पूर्वोक्त)

(अहम् वः रक्षिता इति उक्त्वा यः भूमिपः न रक्षति सः स-उन्मादः आतुरः श्व-इव संहत्य निहंतव्यः ।)

अर्थ – मैं आप सबका रक्षक हूं यह वचन देकर जो राजा रक्षा नहीं करता, उसे रोग एवं पागलपन से ग्रस्त कुत्ते की भांति सबने मिलकर मार डालना चाहिए ।

 

इस श्लोक में कटु शब्दों का प्रयोग हुआ है । शासक का पहला कर्तव्य है कि वह भयमुक्त समाज की रचना करे –  भयमुक्त निरीह-निरपराध प्रजा के लिए, न कि अपराधियों के लिए । आज की स्थिति उल्टी है । अपराधी निरंकुश-स्वच्छंद विचरण करते हुए और सामान्य जन डरे-सहमे दिखते हैं । जिस शासक के राज्य में ऐसा हो उसे ग्रंथकार ने पागल कुत्ते की संज्ञा दी है । ऐसे कुत्ते का एक ही इलाज होता है, मौत । दुर्भाग्य से हमारे शासक सबसे पहले अपनी सुरक्षा का इंतजाम करते हैं । कोई सामान्य व्यक्ति उनके पास पहुंच तक नहीं सकता, आगे कुछ करने का तो सवाल ही नहीं ।

 

ये नीतिश्लोक दर्शाते हैं कि महाभारत ग्रंथ में कर्तव्यों में विफल शासक को पतित और निकृष्ट श्रेणी का कहा गया है । – योगेन्द्र जोशी

मे प्राण मा विभेः (अथर्ववेद) – भय से मुक्ति हेतु आत्मप्रेरणा के मंत्र

अथर्ववेद में सुख-संपदा, स्वास्थ, शत्रुविनाश आदि से संबंधित अनेकों मंत्रों का संग्रह है । सामान्यतः ये मंत्र किसी न किसी प्रकार के कर्मकांड से जुड़े देखे जा सकते हैं । इस वेद के दूसरे कांड में मुझे आत्मप्रेरणा के मंत्र पढ़ने को मिले हैं । ग्रंथ के सायणभाष्य से मैं जो समझ पाया उसके अनुसार ये भोजन आरंभ करते समय उच्चारित किए जाने चाहिए । आगे इनका उल्लेख कर रहा हूं:

यथा द्यौश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥1॥

(द्यौश्च = द्यौः च, बिभीतो = बिभीतः, एवा = एवं)

यथाहश्च रात्रीं च न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥2॥

(यथाहश्च = यथा अहः च )

यथा सूर्यश्च चन्द्रश्च न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥3॥

(सूर्यश्च = सूर्यः च, चन्द्रश्च = चन्द्रः च)

यथा ब्रह्म च क्षत्रं च न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥4॥

यथा सत्यं चानृतं न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥5॥

(चानृतं = च अनृतं)

यथा भूतं च भव्यं च न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥6॥

(अथर्ववेद, काण्ड 2, सूक्त 15) 

अर्थ:

(1) जिस प्रकार आकाश एवं पृथिवी न भयग्रस्त होते हैं और न इनका नाश होता है, उसी प्रकार हे मेरे प्राण तुम भी भयमुक्त रहो ।

(2) जिस प्रकार दिन एवं रात को भय नहीं होता और इनका नाश नहीं होता, उसी प्रकार हे मेरे प्राण तुम्हें भी भय नहीं होवे ।

(3) जिस प्रकार सूर्य एवं चंद्र को भय नहीं सताता और इनका विनाश नहीं होता, उसी भांति हे मेरे प्राण तुम भी भय अनुभव न करो ।

(4) जैसे ब्रह्म एवं उसकी शक्ति को कोई भय नहीं होता और उनका विनाश नहीं होता, वैसे ही हे मेरे प्राण तुम भय से मुक्त रहो ।

(5) जैसे सत्य तथा असत्य किसी से भय नहीं खाते और इनका नाश नहीं होता, वैसे ही हे मेरे प्राण तुम्हें भी भय नहीं होना चाहिए ।

(6) जिस भांति भूतकाल तथा भविष्यत्काल को किसी का भय नहीं होता और जिनका विनाश नहीं होता, उसी भांति हे मेरे प्राण तुम भी भय से मुक्त रहो ।

इन मंत्रों में प्रकृति की विविध मूर्तिमान वस्तुओं और अमूर्त भावों का उल्लेख है वे मनुष्य की भांति व्यवहार नहीं करते हैं । उनके लिए भय और विनष्ट होने के भाव का कोई अर्थ नहीं है । मेरी समझ में उनका उल्लेख यह दर्शाने के लिए है कि वे सब अपने-अपने प्रकृति-निर्धारित कार्य में संलग्न रहते हैं । वह किसी भी संभावना से अपने धर्म से विचलित नहीं होते । (प्रकृति में जिससे जिस व्यवहार अथवा कर्म की अपेक्षा की जाती है वह उसका धर्म कहलाता है, जैसे जल का धर्म है गीला करना, अग्नि का धर्म है जलाना, आदि ।)

मैं इन मंत्रों की व्याख्या कुछ यों करता हूं: वैदिक ऋषि इन मंत्रों के माध्यम से स्वयं को यह बताता है कि प्रकृति की सभी वस्तुएं अपने-अपने कार्य-संपादन में अविचलित रूप से निरंतर लगी रहती हैं । वह अपने मन को समझाता है कि वह इन सब से प्रेरणा ले और निर्भय होकर अपने कर्तव्यों का निर्वाह करे ।

उपर्युक्त चौथे मंत्र में “ब्रह्म”एवं “क्षत्र”का उल्लेख है । संबंधित मंत्र के सायणभाष्य में इन शब्दों के अर्थ वर्ण व्यवस्था के “ब्राह्मण”तथा “क्षत्रिय”क्रमशः लिए गए हैं । मुझे इन शब्दों के अर्थ क्रमशः सृष्टि के मूल ब्रह्म एवं उसकी शक्ति लेना अधिक सार्थक लगते हैं । इन संस्कृत शब्दों के ये अर्थ भी होते हैं । ध्यान दें कि इन मंत्रों में जोड़े में वस्तुओं/भावों का उल्लेख हुआ है । केवल दो ही वर्णों (वर्ण व्यवस्था के ब्राह्मण आदि) का उल्लेख मुझे इस तथ्य के अनुरूप नहीं लगा । अतः ब्रह्म एवं उसकी सामर्थ्य-क्षमता मुझे अधिक सार्थक लगते है ।

पांचवें मंत्र में सत्य एवं असत्य विद्यमान हैं । सत्य और असत्य भी कभी बदलते नहीं हैं । जो सत्य है वह सदैव के लिए सत्य है और असत्य सदा के लिए असत्य रहता है । इसी प्रकार अंतिम मंत्र में भूत एवं भविष्य का उल्लेख है । जो हो चुका (भूत) वह “न हुआ”नहीं किया जा सकता है, ओर जो होने वाला है (भविष्य) वह भी नियत बना रहना है । – योगेन्द्र जोशी

 

Previous Older Entries

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 108 other followers