अथर्ववेद में गर्भिणी नारी के प्रति शुभाशीर्वचन – “ते ध्रियतां गर्भो …”

“अथर्ववेद” चार वेदों में चौथा वेद है। वेदों का उल्लेख ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद के क्रम में ही किया जाता है। इनकी रचना शायद इसी क्रम में की गयी होगी। रचना कहना कदचित उचित नहीं होगा, क्योंकि कोई भी वेद किसी एक ऋषि की रचना नहीं। मान्यता यह है कि वैदिक मंत्रों के अलग-अलग अनेक “मंत्रद्रष्टा” रहे हैं, जिन्हें विभिन्न मंत्रों का दैवी ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्हीं मंत्रों का कालांतर में इन चार वेदों के रूप में संकलन किया गया; संकलनकर्ता संभवतः महर्षि व्यास (वेदव्यास) थे। व्यास कोई एक व्यक्ति थे ऐसा मुझे नहीं लगता है। कदाचित व्यास गुरु-शिष्य की आश्रमिक व्यवस्था में पद अथवा उपाधि रही होगी।

अथर्ववेद पहले के तीन वेदों से कुछ हटकर है। इसमें व्यावहारिक जीवन की बातें भी शामिल हैं। यह वेद काण्डों में विभाजित है; हर कांड में सूक्त हैं और सूक्तों में मंत्र। इस वेद के 6ठे कांड में चार मंत्र मुझे देखने को मिले हैं जिनमें गर्भिणी नारी के प्रति शुभाशीर्वाद के वचन व्यक्त हैं। उन्हीं का उल्लेख यहां पर किया जा रहा है:

(अथर्ववेद, काण्ड 6, सूक्त 18)

यथेयं पृथिवी मही भूतानां गर्भमादधे ।

एवा ते ध्रियतां गर्भो अनु सूतुं सवितवे ॥1॥

(यथा इयं पृथिवी मही भूतानां गर्भम्‍ आदधे एवा ते ध्रियतां गर्भः अनु सूतुं सवितवे।)

जिस प्रकार यह महान् पृथिवी सभी प्राणियों को अपने में धारण किये रहती है, उसी प्रकार (हे नारि) समुचित अवधि पर प्रसव हेतु तुम्हारा गर्भ धारण रहे (अस्थिर न होने पावे)।

यथेयं पृथिवी मही दाधारेमान् वनस्पतीन् ।

एवा ते ध्रियतां गर्भो अनु सूतुं सवितवे ॥2॥

(यथा इयं पृथिवी मही दाधार इमान् वनस्पतीन् एवा ते ध्रियतां गर्भः अनु सूतुं सवितवे।)

जिस प्रकार यह महान्‍ पृथिवी इन वनस्पतियों को अपने में धारण किये रहती है, उसी प्रकार (हे नारि) समुचित अवधि पर प्रसव हेतु तुम्हारा गर्भ धारण रहे (अस्थिर न होने पावे)।

यथेयं पृथिवी मही दाधार पर्वतान् गिरीन् ।

एवा ते ध्रियतां गर्भो अनु सूतुं सवितवे ॥3॥

(यथा इयं पृथिवी मही दाधार पर्वतान् गिरीन् एवा ते ध्रियतां गर्भः अनु सूतुं सवितवे।)

जिस प्रकार यह महान्‍ पृथिवी पर्वतों-चट्टानों को अपने में धारण किये रहती है, उसी प्रकार (हे नारि) समुचित अवधि पर प्रसव हेतु तुम्हारा गर्भ धारण रहे (अस्थिर न होने पावे)।

यथेयं पृथिवी मही दाधार विष्ठितं जगत् ।

एवा ते ध्रियतां गर्भो अनु सूतुं सवितवे ॥4॥

(यथा इयं पृथिवी मही दाधार वि-स्थितम्‍ जगत् एवा ते ध्रियतां गर्भः अनु सूतुं सवितवे।)

जिस प्रकार यह महान्‍ पृथिवी विविध चर-अचर जीवों एवं निर्जीव वस्तुओं का जगत्‍ अपने में धारण किये रहती है, उसी प्रकार (हे नारि) समुचित अवधि पर प्रसव हेतु तुम्हारा गर्भ धारण रहे (अस्थिर न होने पावे)।

पहले मंत्र में भूत शब्द चर यानी जंगम प्राणियों के लिए किया गया है। अचर (स्थावर) वनस्पतियों का उल्लेख दूसरे मंत्र में है। दोनों प्रकार के प्राणी इस धरती पर जन्म लेते हैं और पनपते हैं। नारी के गर्भ की तुलना इसी धरती से की गयी है, क्योंकि नारी गर्भ में भी मानव शिशु के जीवन का आरंभ होता है और दसवें मास की अवधि तक उसे गर्भ में ही वृद्धि पाने का अवसर और सुरक्षित रहने का ठौर मिलता है। इतना ही नहीं, इसी धरती पर तमाम निर्जीव वस्तुएं यथा पर्वत और शिलाखंड भी टिके रहते हैं। जिस प्रकार धरती समस्त चराचर प्राणियों एवं वस्तुओं को आधार एवं सुरक्षा प्रदान करने में समर्थ होती है, उसी प्रकार नारी के गर्भ को भी वह सामर्थ्य प्राप्त हो जिससे  अजन्मा प्राणी विकसित हो सके और समुचित अंतराल पर जन्म लेने तक सुरक्षित रह सके। यही भावना इन मंत्रों में व्यक्त की गई है। – योगेन्द्र जोशी

“वसुधैव कुटुम्बकम् …” – पंचतंत्र ग्रंथ में मूर्ख पंडितों की कथा

अपने भारत देश की सभ्यता-संस्कृति की प्रशंसा में अनेक जनों को तरह-तरह के नीति-वाक्यों के दृष्टांतों के साथ बोलते हुए मैंने सुना हैं। “वसुधैव कुटुम्बकम्”, “परोपकाराय सतां विभूतयः”, “अतिथिदेवो भव”, “सत्यमेव जयते” इत्यादि नीति-वाक्यों का उल्लेख करते हुए वे देखे जा सकते हैं। इन कथनों के माध्यम से वे यह जताने की कोशिश करते हैं कि हमारे समाज की मान्यताएं तो सर्वश्रेष्ठ रही हैं। इस संदर्भ में मैं अपने वर्तमान गृह मंत्री को शीर्ष पर रखता हूं। वे हर मौके पर ऐसी उक्तियों से भारतीय समाज की प्रशंसा करते हैं।

इन नीति वचनों को कहने वाले उन प्रसंगों को नजरअंदाज करते हैं जो प्राचीन संस्कृत साहित्य में इनसे संबंधित रहे हैं। उदाहरणार्थ “सत्यमेव जयते” (शुद्ध ‘जयति’ है) को ही ले लीजिए। इस पर मैंने एक आलेख बहुत पहले लिखा था (देखें मेरी ब्लॉग-पोस्ट 4/10/2008)। यह उक्ति मुण्डक उपनिषद्‍ के एक मंत्र का वाक्यांश है। मंत्र में यह संदेश है कि मोक्ष (वैदिक मान्यतानुसार परमात्मतत्त्व में एकाकार हो जाना) का पात्र वही ज्ञानी हो सकता है जो सत्य के मार्ग पर चलता है। इस व्यवहारिक संसार से इस मंत्र का कोई संबंध नहीं है। संसार में तो सत्य-असत्य दोनों ही साथ-साथ चलते हैं। लेकिन आम धारणा है कि संसार में सत्य की विजय होती है।

इसी प्रकार “वसुधैव कुटुम्बकम्” श्रीविष्णुशर्मा-रचित “पञ्चचतन्त्रम्” की एक कथा से संबंधित है। इस कथन से यह निष्कर्ष निकालना भूल होगी कि भारतीय समाज में ऐसी कोई भावना व्याप्त रही थी और है। यह कथन एक विशेष अवसर पर किसी व्यक्ति के अपने मित्रों को बोले गये उद्गार का एक अंश है।

“वसुधैव कुटुम्बकम्” उक्ति के मूल को समझने के लिए उस कथा का उल्लेख करना समीचीन होगा जो पंचतंत्र में वर्णित है। संक्षेप में वह कथा इस प्रकार है:

एक ग्राम में परस्पर मित्र चार युवा रहते थे। उनकी मित्रता बहुत गहरी थी और वे यथासंभव एक-दूसरे के साथ बने रहते थे। उनमें से एक बुद्धिमान था किन्तु संयोग से अन्य तीन की भांति विद्याध्ययन नहीं कर सका। अन्य तीनों ने विभिन्न कलाओं में दक्षता अर्जित कर ली। किन्तु अपने ज्ञान का उपयोग कब एवं किस प्रयोजन के लिए यह समझने की सहज बुद्धि उनमें नहीं थी।

एक बार उन मित्रों के मन में विचार आया कि अर्जित विद्या का उपयोग तो गांव में हो नहीं सकता, इसलिए क्यों न देश-परदेश जाकर उसके माध्यम से धनोपार्जन किया जाए। चूंकि चौथे मित्र ने विद्या अर्जित नहीं की थी इसलिए उनमें से एक बोला, “हम तीन चलते हैं; इस विद्याहीन को साथ ले जाना बेकार है। हम धन कमाएं और उसका एक हिस्सा इसे भी दें यह ठीक नहीं होगा।”

दूसरे ने सहमति जताते हुए चौथे से कहा, “मित्र, तुम विद्याबल से धन कमा नहीं सकते इसलिए तुम साथ मत चलो और यहीं रहो।”

तीसरा उदार विचारों वाला था। उसने कहा, “हम चारों बाल्यावस्था से घनिष्ठ मित्र रहे हैं। संयोग से यह विद्याध्ययन नहीं कर सका तो इसका अर्थ यह नहीं कि हम इसे छोड़ दें। धन-संपदा की सार्थक उपयोगिता इसी में है कि उसका उपभोग औरों के साथ मिल-बांटकर किया जाये। अतः हमारा यह मित्र भी साथ चलेगा।”

पंचतंत्र के रचयिता ने उदारता की उक्त नीति को इस तीसरे मित्र के मुख से इस प्रकार से कहलवाया है:

किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला ।

या न वैश्येव सामान्या पथिकैरुपभुज्यते ॥३६॥

(पञ्चतन्त्रम्, चतुर्थ तंत्र “लब्धप्रणाशम्)

(किम्‍ तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूः इव केवला, या न वैश्या इव सामान्या पथिकैः उपभुज्यते ।)

अर्थ – उस लक्ष्मी (धन) का क्या करना जो केवल (घर की) वधू की तरह हो, जो वैश्या की तरह आम यात्रियों के लिए उपभोग्य न हो।

यहां लक्ष्मी से तात्पर्य है धन से न कि विष्णुपत्नी देवी लक्ष्मी से। धन की उपयोगिता दो प्रकार से हो सकती है: प्रथम है कि वह केवल अपने मालिक के ही सुखभोग के काम आवे। द्वितीय है कि वह दूसरों के हित साधने में प्रयोग में लिया जाये। अर्थात्‍ व्यक्ति उसे या तो केवल अपने स्वार्थ पूरा करने में प्रयोग में ले अथवा उसे परमार्थ के कार्य में भी लगावे। इन दो संभावनों की उपमा कथाकार ने वधू (जो किसी एक की पत्नी भर होती है) एवं वैश्या (जो हर किसीको उपलब्ध होती है) से की है।

औदार्य की इस भावना के बारे में कथाकार अपने पात्र से यह कहलवाता है:

अयं निजः परो वैति गणना लघुचेतसाम् ।

उदारचरितानान्तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥

(पञ्चतन्त्रम्‍, चतुर्थ तंत्र “लब्धप्रणाशम्‍)

(अयम् निजः परः वा इति गणना लघु-चेतसाम् उदार-चरितानाम् तु वसुधा एव कुटुम्बकम् ।)

अर्थ – यह अपना है या पराया है ऐसा आकलन छोटे दिल वालों का होता है। उदार चरित्र वालों के लिए तो पूरी पृथ्वी ही उनका कुटुम्ब होती है।

आम तौर पर कुटुम्ब (कुटुम्बक) का अर्थ परिवार से लिया जाता है, जिसमें पति-पत्नी एवं संतानें और कदाचित् बुजुर्ग माता-पिता। मनुष्य इन्हीं के लिए धन-संपदा अर्जित करता है। कुछ विशेष अवसरों पर वह निकट संबंधियों और मित्रों पर भी धन का एक अंश खर्च कर लेता है। किंतु अधिक व्यापक स्तर पर समाज के सभी सदस्यों के हितों के लिए धन खर्च करने का विचार केवल विरले लोगों में देखने को मिल सकता है।

इस श्लोक का निहितार्थ यह है: अमुक तो अपना व्यक्ति है इसलिए उसकी सहायता करनी चाहिए यह धारणा संकीर्ण मानसिकता वालों की होती है। उदात्त वृत्ति वाले तो समाज के सभी सदस्यों के प्रति परोपकार भावना रखते हैं और सामर्थ्य होने पर सभी की मदद करते हैं।

ध्यान दें कि कथा में एक उदार मित्र अपने दो अपेक्षया अनुदार मित्रों के प्रति “वसुधैव कुटुम्बकम्” की बात कहता है। यह कथन किसी लेखक ने यह बताने के लिए नहीं कहा है कि भारतीय समाज में उदात्त वृत्ति व्यापक रही है। कथा में जो कहा है उसे कथा तक ही सीमित रखा जाना चाहिए। उससे यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि भारतीय समाज उदार रहा है।

अंत में कथा का शेष भाग भी संक्षेप में बता दूं: वे चारों मित्र परदेश के लिए चल पड़े। रास्ते में एक स्थान पर उन्हें हड्डियों का ढेर दिखा। उन मित्रों में से एक ने कहा, “अहो, लगता है किसी जीवधारी की मृत्यु यहां हुई। क्यों न उस बेचारे को हम अपनी विद्या के बल पर पुनः जीवन दे दें।”´

ऐसा कहते हुए उसने हड्डियां जोड़कर मृत जीव का अस्थिपंजर खड़ा कर दिया। उसके बाद दूसरे ने त्वचा-मांस आदि प्रदान करके उस जीव का पूरा शरीर तैयार कर दिया। तत्पश्चात्‍ तीसरे ने उसमें प्राणसंचार करने का विचार किया। तब चौथा उन तीन जनों से बोला, “अरे-अरे, ऐसा मत करो। यह तो शेर का शरीर है। इसमें प्राण-संचार हो गया तो जीवित होकर हम सबको मार डालेगा।”

मित्रों ने उसकी बात मानने से इंकार कर दिया। बात मानने से उनकी विद्या का अपमान जो हो जाता। तब उस चौथे मित्र ने कहा, “तनिक ठहरो, मैं पास के पेड़ पर चढ़ता हूं, उसके बाद प्राणसंचार करना।”

उसके पेड़ पर चढ़ने के बाद उन विद्याधारियों की मूर्खता से शेर जीवित हो गया। वे तीनों शेर द्वारा मारे गये और चौथा विद्याहीन किंतु बुद्धिमान बच गया। – योगेन्द्र जोशी

“ज्ञानविहीनः सर्वमतेन मुक्तिं न भजति” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् – ६

इस चिट्ठे के छ: आलेखों की शृंखला की यह मेरी छ्ठी एवं अंतिम प्रविष्टि है। ध्यान रहे कि इन आलेखों में आदिशंकराचार्य द्वारा विरचित “चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्” के १८ छंदों की चर्चा की जा रही है। (देखें इसका पूर्ववर्ती आलेख, दिनांक २३ मार्च, २०१७)

पहले आलेख में इस बात का उल्लेख किया गया था कि इस रचना में कुल सत्रह छंद हैं और उनके अतिरिक्त एक स्थायी छंद (भज गोविन्दं भज गोविन्दं …) भी है जो इनमें से प्रत्येक छंद के बाद प्रयुक्त हुआ है। यदि उक्त स्तोत्र को भजन के तौर पर गाया जाये तो यह छंद प्रत्येक के बाद गाया जायेगा। इसकी भूमिका गायन के स्थायी के समान है। इसे आगे उद्धृत किया जा रहा है:

[

भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ्‍ करणे ॥

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब तुम्हारा मरणकाल पास आ जायेगा तब यह “डुकृञ् करणे” की रट तुम्हें नहीं बचाएगी। “डुकृञ्” संस्कृत व्याकरण की एक क्रियाधातु है जिसका अर्थ “(कार्य/कर्तव्य) करना” है। इस क्रियाधातु का व्यवहार में प्रयोग सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। अर्थात् इस पर बहुत दिमाग खपाना कुछ हद तक निरर्थक है। व्याकरण के अध्येता उक्त क्रियाधातु के अर्थ एवं प्रयोजन को याद रखने के लिए “डुकृञ् करणे” रटते होंगे जिसका तात्पर्य है “डुकृञ्” क्रिया “करण” (कार्य करना) के प्रयोजन में लिया जाता है । स्तोत्र के रचनाकार की दृष्टि में जीवन के अंतकाल तक सांसारिक कार्यों में ही निरंतर लिप्त रहना फलदायक नहीं है यह भाव “डुकृञ् करणे” के रटने में प्रतिबिंबित होता है।  “अब तो इस रट को छोड़ो और ईश्वर-प्रार्थना में संलग्न होओ।”

]

चिट्ठे की मौजूदा प्रविष्टि में चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् के अंतिम तीन छंद क्रमशः १५, १६, एवं १७ प्रस्तुत किये जा रहे हैं । इनमें पहला छंद है:

सुखतः क्रियते रामाभोगः पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः ।

यद्यपि लोके मरणं शरणं तदपि न मुञ्चति पापाचरणम् ॥१५॥ भज …

(रामा-भोगः सुखतः क्रियते, हन्त पश्चात् शरीरे रोगः, यद्यपि लोके मरणं शरणं, तत्-अपि पाप-आचरणम् न मुञ्चति।)

अर्थ – मनुष्य (पुरुष) स्त्री-संसर्ग का सुखभोग करता है, अफ़सोस कि बाद में शरीर रोगग्रस्त होता है। यद्यपि संसार में जीवन की अंतिम परिणति मृत्यु है, फिर भी मनुष्य पापकर्मों से अपने को मुक्त नहीं करता।

सांसारिक जीवन में स्त्री-पुरुष संबधों का सदा से महत्व रहा है और दोनों पक्ष (स्त्री एवं पुरुष) तत्संबंधित सुख पाने की लालसा करते हैं। मैं समझ नहीं पाया कि क्या श्रीशंकराचार्य दोनों के संसर्ग को रोग का कारण मानते हैं? या वे यह कहना चाहते हैं कि यौनसुख का समय भी उम्र के साथ समाप्त हो जाता है और रोगग्रस्तता का काल आ जाता है, क्योंकि रोगों का होना शरीर के अनेक दोषों में से एक है । हरएक को मृत्यु पूर्व भातिं-भांति की अवस्थाओं से गुजरना होता है। अस्तु, प्राणिमात्र को अंततः मृत्यु की शरण में ही जाना होता है। उसके बाद का उसका जीवन उसके पूर्व कर्मों पर निर्भर करता है। वे प्रश्न उठाते हैं कि इस तथ्य को जानने पर भी मनुष्य क्यों नहीं सत्कर्मों में लगता है?

एक बात जो मुझे विश्व में प्रचलित प्रायः सभी धर्मग्रंथों, नीति-पुस्तकों आदि में देखने को मिली है वह है कि उनमें प्रस्तुत प्रायः सभी बातें पुरुषों को केन्द्र में रखकर कही गई हैं। जैसे उपर्युक्त श्लोक में कहा गया कि पुरुष स्त्री-संसर्ग के सुख भोगता है। यह नहीं कहा गया है कि स्त्री पुरुष-संसर्ग का सुख भोगती है। धर्मग्रन्थों में – जितना मैं जान पाया – धर्मों की बातें प्रमुखतया पुरुषों के प्रति कही गयी हैं। सभी धर्म किसी पुरुष या किन्ही पुरुषों के वचनों पर आधारित रहे हैं। वस्तुतः स्त्रियों को शायद ही कहीं महत्व दिया गया है । सभी पैगंबर, तीर्थंकर, बौद्धधर्म-प्रवर्तक, वैदिक ऋषि, ईश्वरीय अवतार, आदि पुरुष ही रहे हैं। उक्त छंद में भी ऐसा ही है। सोचिए ऐसा क्यों है?

रथ्याकर्पटविरचितकन्थः पुण्यापुण्यविवर्जितपन्थः ।

नाहं न त्वं नायं लोकस्तदपि किमर्थं क्रियते शोकः ॥१६॥ भज …

(रथ्या-कर्पट-विरचित-कन्थः, पुण्य-अपुण्य-विवर्जित-पन्थः, न अहम् न त्वम् न अयम्, लोकः तत्-अपि किम्-अर्थंम् क्रियते शोकः)

अर्थ – रास्ते में पड़े चिथड़ों से बनी झोली या गुदड़ी काम चला लिया, पुण्य-अपुण्य से परे विशेष जीवन-मार्ग अपना लिया, न मैं हूं, न तुम हो, न ही यह संसार है यह जान लिया, तब भी किस बात शोक किया जाये।

उपर्युक्त कथन उस व्यक्ति के संदर्भ में संन्यास के मार्ग पर चल निकला हो। ऐसा व्यक्ति मार्ग में यानी आम जन से जो कुछ भी पा जाए उसी से काम चलाता है। चिथड़ों से बनी झोली या गुदड़ी से आशय इसी संसाधनविहीन जीवन को अविचलित भाव के साथ जीने से लिया जा सकता है।

पुण्यापुण्यविवर्जितपंथ” का अर्थ मेरी समझ में “पुण्यमय एवं अपुण्य से रहित मार्ग अपनाया हो जिसने” ऐसा होना चाहिए। अपेक्षा की जाती है कि संन्यासी पापमार्ग से बचा रहे। उसे जीवन की नश्वरता का ज्ञान जब हो जाता है तब उसे किसी प्रकार की हानि का भय नहीं रह जाता है।

कुरुते गङ्गासागरगमनं व्रतपरिपालनमथवा दानम्।

ज्ञानविहीनः सर्वमतेन मुक्तिं न भजति जन्मशतेन ॥१७॥ भज …

(गङ्गा-सागर-गमनम्, व्रत-परि-पालनम्, अथवा दानम् कुरुते, ज्ञान-विहीनः सर्व-मतेन जन्म-शतेन मुक्तिम् न भजति ।)

अर्थ – गंगासागर पर तीर्थस्नान कर आवे, व्रत-उपवास करे अथवा दानादि सत्कर्म करे तो भी इन सभी साधनों/प्रयासों से ज्ञानहीन मनुष्य मुक्ति नहीं पाता है।

श्रीशंकराचार्य ज्ञानयोग के समर्थक थे। ज्ञान का तात्पर्य है अध्यात्मज्ञान। उनके अनुसार परमात्मा में विलीन होना यानी मोक्ष तभी मिलता है जब व्यक्ति को परामात्म तत्व का ज्ञान हो जाता है। उनके मतानुसार अन्य सभी पुण्यकर्म ज्ञानप्राप्ति में सहायक होते हैं, किंतु ज्ञान सर्वोपरि है। ज्ञान के अभाव में तीर्थ, व्रत, दान आदि के प्रयास स्वयं में फलदायक नहीं हो पाते हैं।

ये सब बातें उस जमाने की हैं जब संन्यास आश्रम जीवन के सभी बंधनों/आकर्षणों से मुक्ति के प्रयास की अवस्था हुआ करती थी। आज के युग में संन्यास जैसी चीज शायद ही कहीं हो। इस युग में संन्यास का अर्थ है गेरुआ वस्त्र धारण करके दूसरों की कमाई से सुखभोग प्राप्त करना। – योगेन्द्र जोशी

“क: त्वम् कः अहम् कुतः आयातः …” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् – ५

इस चिट्ठे के छ: आलेखों की शृंखला की यह मेरी पांचवी प्रविष्टि है। ध्यान रहे कि इन आलेखों में आदिशंकराचार्य द्वारा विरचित “चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्” के १८ छंदों की चर्चा की जा रही है। (देखें इसका पूर्ववर्ती आलेख, दिनांक ७ मार्च, २०१७)

पहले आलेख में इस बात का उल्लेख किया था कि इस रचना में कुल सत्रह छंद हैं और उनके अतिरिक्त एक स्थायी छंद (भज गोविन्दं भज गोविन्दं …) भी है जो इनमें से प्रत्येक छंद के बाद प्रयुक्त हुआ है। यदि उक्त स्तोत्र को भजन के तौर पर गाया जाये तो यह छंद प्रत्येक के बाद गाया जायेगा। इसकी भूमिका गायन के स्थायी के समान है। इसे आगे उद्धृत किया जा रहा है:

[

भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ् करणे ॥

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब तुम्हारा मरणकाल पास आ जायेगा तब यह “डुकृञ् करणे” की रट तुम्हें नहीं बचाएगी। “डुकृञ्” संस्कृत व्याकरण की एक क्रियाधातु है जिसका अर्थ “(कर्वव्य) करना” है। इस क्रियाधातु का व्यवहार में प्रयोग सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। अर्थात्‍ इस पर बहुत दिमाग खपाना कुछ हद तक निरर्थक है। व्याकरण के अध्येता उक्त क्रियाधातु के अर्थ एवं प्रयोजन को याद रखने के लिए “डुकृञ् करणे” रटते होंगे जिसका तात्पर्य है “डुकृञ्” क्रिया “करण” (कार्य करना) के प्रयोजन में लिया जाता है । स्तोत्र के रचनाकार की दृष्टि में जीवन के अंतकाल तक सांसारिक कार्यों में ही निरंतर लिप्त रहना फलदायक नहीं है यह भाव “डुकृञ् करणे” के रटने में प्रतिबिंबित होता है।  “अब तो इस रट को छोड़ो और ईश्वर-प्रार्थना में संलग्न होओ।”

]

चिट्ठे की मौजूदा प्रविष्टि में चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् के तीन छंद क्रमशः १२, १३, एवं १४ प्रस्तुत किये जा रहे हैं । इनमें पहला छंद है:

कस्त्वं कोऽहं कुतः आयातः का मे जननी को मे तातः ।

इति परिभावय सर्वमसारं विश्वं त्यक्त्वा स्वप्नविचारम् ॥१२॥ भज …

(सर्वम् असारम् स्वप्न-विचारम् विश्वंम् त्यक्त्वा त्वम् कः, अहम्  कः कुतः आयातः, मे जननी का, मे तातः कः इति परि-भावय ।)

अर्थ – इस सारहीन स्वप्नसदृश संसार में रुचि त्यागते हुए तुम कौन हो, मैं कौन हूं, कहां से आया, कौन मेरी जन्मदात्री, कौन मेरे पिता, इन बातों पर चिंतन करो।

वैदिक दर्शन के अनुसार यह संसार एक दीर्घकालिक स्वप्न से अधिक कुछ नहीं। जब मनुष्य को परमात्म तत्व का ज्ञान हो जाता है तो संसार के सारहीन, मिथ्या अर्थात्‍ अंततः सत्य से परे होने की अनुभूति हो जाती है। तब सभी रिश्ते-नाते अर्थहीन हो जाते हैं।

गेयं गीतानामसहस्रं ध्येयं श्रीपतिरूपमजस्रम् ।

नेयं सज्जनसङ्गे चित्तं देयं दीनजनाय च वित्तम् ॥१३॥ भज …

(गीता-नाम-सहस्रम् गेयम् , अजस्रम् श्री-पति-रूपम् ध्येयंम्, सज्जन-सङ्गे चित्तम्  नेयम् दीन-जनाय च वित्तम् देयम्‍ ।)

अर्थ – भगवद्गीता और विष्णुसहस्रनाम का पाठ करना चाहिए, भगवान्‍ विष्णु के रूप का निरंतर ध्यान करना चाहिए, अपना चित्त सज्जनों की संगत में लगाना चाहिए, और दीनहीन जनों को धन-दान करना चाहिए।

इस छंद में ईश्वरभक्ति और सत्कार्यों में मन लगाने का उपदेश दिया गया है।

यावज्जीवो निवसति देहे कुशलं तावत्पृच्छति गेहे ।

गतवति वायौ देहापाये भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये ॥१४॥ भज …

(जीवः यावत् देहे निवसति तावत् गेहे कुशलम्  पृच्छति, देह-अपाये वायौ गतवति तस्मिन्  काये भार्या बिभ्यति ।)

अर्थ – जब तक जीवधारी (संदर्भ में मनुष्य) शरीर में रहता है तब तक हर कोई घर में कुशलक्षेम पूछता है। शरीर के गिरने और प्राणवायु के निकलने पर उस शरीर से पत्नी तक डर जाती है।

     मनुष्य से किसी का भी लगाव तभी तक रहता है जब तक उसके शरीर में प्राण रहते है। जैसे ही काल-कलवित होकर वह निष्प्राण हो जाता है उससे सभी विरत होने लगते है। जिस पत्नी से आजीवन उसके अंतरंग संबंध रहे हों वह तक उस शरीर से दूर हो जाती है। यही इस जीवन का सच है। इन छंदों से यह संदेश मिलता है कि जब संसार को त्यागना ही होता है, तब क्यों न जीवितावस्था में ही उससे मोह त्यागते हुए ईश्वरप्राप्ति के प्रयास किए जाएं। – योगेन्द्र जोशी

“… ज्ञाते तत्वे कः संसारः ” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् – ४

… तत्व अर्थात् सृष्टि के अंतिम सत्य (परमात्मा) का ज्ञान प्राप्त हो जाने पर यह संसार अर्थहीन लगने लगता है।

इस चिट्ठे के छ: आलेखों की शृंखला की यह मेरी चौथी प्रविष्टि है। याद दिला दूं कि इन आलेखों में आदिशंकराचार्य द्वारा विरचित “चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्” के १८ छंदों की चर्चा की जा रही है। (देखें इसका पूर्ववर्ती आलेख, दिनांक ११ फरवरी, २०१७)

पहले आलेख में इस बात का उल्लेख किया था कि इस रचना में कुल सत्रह छंद हैं और उनके अतिरिक्त एक स्थायी छंद (भज गोविन्दं भज गोविन्दं …) भी है जो इनमें से प्रत्येक छंद के बाद प्रयुक्त हुआ है। यदि उक्त स्तोत्र को भजन के तौर पर गाया जाये तो यह छंद प्रत्येक के बाद गाया जायेगा। इसकी भूमिका गायन के स्थायी के समान है। इसे आगे उद्धृत किया जा रहा है:

[

भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ्‍ करणे ॥

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब तुम्हारा मरणकाल पास आ जायेगा तब यह “डुकृञ्  करणे” की रट तुम्हें नहीं बचाएगी। “डुकृञ्‍” संस्कृत व्याकरण की एक क्रियाधातु है जिसका अर्थ “(कर्वव्य) करना” है। इस क्रियाधातु का व्यवहार में प्रयोग सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। अर्थात्‍ इस पर बहुत दिमाग खपाना कुछ हद तक निरर्थक है। व्याकरण के अध्येता उक्त क्रियाधातु के अर्थ एवं प्रयोजन को याद रखने के लिए “डुकृञ्  करणे” रटते होंगे जिसका तात्पर्य है “डुकृञ्” क्रिया “करण” (कार्य करना) के प्रयोजन में लिया जाता है । स्तोत्र के रचनाकार की दृष्टि में जीवन के अंतकाल तक सांसारिक कार्यों में ही निरंतर लिप्त रहना फलदायक नहीं है यह भाव “डुकृञ्  करणे” के रटने में प्रतिबिंबित होता है।  “अब तो इस रट को छोड़ो और ईश्वर-प्रार्थना में संलग्न होओ।”

]

चिट्ठे की मौजूदा प्रविष्टि में चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् के तीन छंद (क्रमिकता में ९, १०, एवं ११) प्रस्तुत किये जा रहे हैं । इनमें पहला छंद है:

पुनरपि रजनी पुनरपि दिवसः पुनरपि पक्षः पुनरपि मासः ।

पुनरप्ययनं पुनरपि वर्षं तदपि न मुञ्चत्याशामर्षम् ॥९॥ भज …

(पुनः अपि रजनी पुनः अपि दिवसः पुनःअपि पक्षः पुनःअपि मासः पुनः अपि अयनंम् पुनः अपि वर्षं तत् अपि न मुञ्चति आशा-अमर्षम् ।)

अर्थ – रात्रि पुनः-पुनः आती है, दिन भी फिर-फिर आता है। महीने के पक्ष और स्वयं महीने बारबार आते-जाते रहते हैं। वर्ष के दोनों अयन (अर्धवार्षिक) एवं स्वयं वर्ष भी आते हैं, जाते हैं। किंतु मनुष्य की आशा और असहनशीलता यथावत बनी रहती हैं, छोड़ के जाती नहीं।

रात्रि, दिवस, पक्ष, माह, अयन और वर्ष ये सभी निरंतर प्रवाहित हो रहे समय के अलग-अलग माप के कालखंड हैं। मनुष्य के जीवन में ये कालखंड बारंबार आते-जाते रहते हैं। श्रीशंकराचार्य का कथन है कि एक नहीं दो नहीं, अनेक कालखंड व्यतीत हो जाते हैं पंरतु उसके जीवन की आशा और असहनशीलता में अंतर नहीं आता है। मेरी समझ में मौजूदा प्रसंग में असहनशीलता के अर्थ “विपरीत परिस्थितियों में विचलित हो जाना” से लिया जाना चाहिए। मतलब यह है कि वृद्धावस्था में मनुष्य मनोनुकूल घटित न होने पर बेचैन हो जाता था। वह वस्तुस्थिति को सह नहीं पाता है।

ध्यान दें कि काल-मापन की भारतीय पद्धति में महीने के दो पक्ष होते हैं: कृष्ण एवं शुक्ल। इसी प्रकार वर्ष के भी अयन नाम से दो भाग होते हैं: दक्षिणायण एवं उत्तरायण। दक्षिणायण में सूर्य का झुकाव दक्षिण की ओर होता जाता है और फलतः दिन छोटे तथा रात्रि बड़ी होने लगते है। उत्तरायण में सूर्य उत्तर की ओर लौटने लगता है और फलतः दिन बड़े होने लगते हैं तथा रातें छोटी। संस्कृत के संधि एवं ध्वनि संबंधी नियमों के अनुसार अयन के न का ण हो जाता है यदि उसके पहले टवर्ग का कोई वर्ण, या ष अथवा र आते हों। अर्थात् उत्तर+अयन = उत्तर+अयण = उत्तरायण और दक्षिण+अयन = दक्षिण+अयण = दक्षिणायण।

अगला छंद है:

वयसि गते कः कामविकारः शुष्के नीरे कः कासारः ।

नष्टे द्रव्ये कः परिवारो ज्ञाते तत्वे कः संसारः ॥१०॥ भज …

(वयसि गते कः काम-विकारः शुष्के नीरे कः कासारः नष्टे द्रव्ये कः परिवारः ज्ञाते तत्वे कः संसारः।)

अर्थ – अवस्था ढलने पर काम-विकार कैसा, पानी सूखने पर जलाशय कहां रह जाता है, धन-संपदा की समाप्ति पर परिवार कैसा, और इसी प्रकार तत्वज्ञान की प्राप्ति पर संसार कहां रह जाता है?

इस कथन के अनुसार कुछ बातें स्वाभाविक तौर पर घटित होती हैं। जीवन के अंतिम पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते काम-भावना समाप्त होने लगती है। काम शब्द के अर्थ सामन्यतः इच्छा या लालसा से लिया जाता है। इसे विशेष तौर पर यौनेच्छा से भी जोड़ा जाता है। (रतिशास्त्र में कामदेव इसी इच्छा के प्रतीक हैं।) इच्छाएं तो मनुष्य की मरते दम तक बनी रहती हैं। यह भी हो जाये, वह भी हो जाए जैसी लालसाएं तो बनी ही रहती हैं। यौनेच्छा कदाचित् समाप्त होने लगती है, शारीरिक सामर्थ्य के घटने से। इसलिए मेरा सोचना है कि इस कथन में काम-विकार उसी को इंगित करता है। जलाशय तभी तक अर्थ रखता है जब तक उसमें जल रहे। परिवार भी आपको तभी तक महत्व देता है जब तक कि संपदा हो। उल्लिखित सभी चीजें स्वाभाविक रूप से समाप्त होने लगती हैं । उनके विपरीत किंतु ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रयास करने होते हैं। और वह जब प्राप्त होता है तब यह संसार सारहीन लगने लगता है।

तृतीय छंद:

नारीस्तनभरनाभिनिवेशं मिथ्यामायामोहावेशम् ।

एतन्मांसवसादिविकारं मनसि विचारय बारम्बारम् ॥११॥ भज …

(नारी-स्तन-भर-नाभि-निवेशं मिथ्या-माया-मोह-आवेशम् एतत् मांस-वसा-आदि विकारम् मनसि विचारय बारम्बारम्)

अर्थ – नारी के स्तनों एवं नाभि (यौनांग) में निवेश माया एवं मोह जनित मिथ्या (निरर्थक) रुचि है। ये शरीर के मांस एवं वसा के विकार मात्र हैं यह बात निरंतर अपने विचार में रखो।

निवेश शब्द के अर्थ संबधित अंगों में रुचि लेना अर्थात्‍ उनको लेकर रतिक्रीड़ा करना लिया जा सकता है। मांस/वसा के विकार का अर्थ है कि मांस एवं वसा से बने इस शरीर के किसी अंग ने कुछ ऐसा स्वरूप ले लिया कि वे आकर्षक लगने लगे। “अरे पुरुष, यह मत भूलो कि ये वस्तुतः मांस-वसा से ही बने हैं जैसे शरीर के अन्य अंग, फिर उनमें विशेष रुचि क्यों?”

काम-भावना से मुक्त, विरक्त, व्यक्ति के लिए ये विचार सहज रूप से स्वीकार्य होंगे, किंतु सामान्य व्यक्ति को दिक्कत होगी।

     इस स्थल पर मुझे एक गंभीर टिप्पणी की आवश्यकता महसूस होती है। इस श्लोक में मुझे लगता है स्त्री को अस्पष्ट शब्दों में भोग्या वस्तु के तौर पर दर्शाया गया है। मैंने जितने भी धर्मों और धार्मिक परंपराओं की जानकारी अर्जित की है उन सभी में पुरुष को ही केंद्र में रखकर बातें कही गयी हैं। इस बात पर गौर करें कि सभी धर्मों के प्रणेता या उनकी मान्यताओं में योगदान करने तथा उन्हें आगे बढ़ाने वाले पुरुष ही रहे हैं। सभी धर्मों में पुरुषों के कर्तव्यों तथा हितों की बातें कही गयी हैं और स्त्री को उनके अधीनस्थ दोयम दर्जे के व्यक्ति के तौर पर देखा गया है। कुर’आन में साफ तौर पर कहा गया है कि अल्लाह ने पुरुष को श्रेष्ठतर बनाया है और स्त्री को उसके कहे अनुसार चलने को कहा गया है (कुर’आन, सुरा ४, आयत ३४)। कहा जाता है कि बौद्ध धर्म के आरंमिक काल में स्त्रियों को धर्म-संघों में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। अरबी मूल के धर्मों मे सभी पैगंबर पुरुष ही रहे हैं। भारत में भी ऋषि-मुनि पुरुष ही हुए हैं (शायद कुछ अपवाद हों)। मनुस्मृति (अध्याय ५, श्लोक १४७, १४८) में कहा गया है कि स्त्री बचपन में पिता के, दाम्पत्य जीवन में पति के, और उसके बाद पुत्रों के अधीन होती है; वह स्वतंत्र रहने की अधिकारिणी नहीं होती है। कट्टर धार्मिक मान्यताओं वाले कुछ लोग स्त्री को नर्क का द्वार बताते हैं। इस प्रकार की तमाम बातें सभी समाजों, धर्मों में देखने को मिलती हैं। उक्त छंद में स्त्री को इन्हीं विचारों के अनुरूप प्रस्तुत किया गया है ऐसा मेरा मत है। इस छंद से यही प्रतीत होता है कि पुरुष के लिए स्त्री मांस का लोथड़ा भर है; स्त्री के लिए पुरुष क्या है? मेरे पास उत्तर नहीं है! – योगेन्द्र जोशी

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“अङ्गम् गलितम् पलितम् मुण्डम् …” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् – ३

इस चिट्ठे के छ: आलेखों की शृंखला की यह मेरी तीसरी प्रविष्टि है। याद दिला दूं कि इन आलेखों में आदिशंकराचार्य द्वारा विरचित “चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्” के १८ छंदों की चर्चा की जा रही है। (देखें दिनांक ६ जनवरी, २०१७, का आलेख)

पहले आलेख में इस बात का उल्लेख किया था कि इस रचना में कुल सत्रह छंद हैं और उनके अतिरिक्त एक स्थायी छंद (भज गोविन्दं भज गोविन्दं …) भी है जो इनमें से प्रत्येक छंद के बाद प्रयुक्त हुआ है। यदि उक्त स्तोत्र को भजन के तौर पर गाया जाये तो यह छंद प्रत्येक के बाद गाया जायेगा। इसकी भूमिका गायन के स्थायी के समान है।

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भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ्करणे ॥

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब तुम्हारा मरणकाल पास आ जायेगा तब यह “डुकृञ्  करणे” की रट तुम्हें नहीं बचाएगी। “डुकृञ्” संस्कृत व्याकरण की एक क्रियाधातु है जिसका अर्थ “(कर्वव्य) करना” है। इस क्रियाधातु का व्यवहार में प्रयोग सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। अर्थात् इस पर बहुत दिमाग खपाना कुछ हद तक निरर्थक है। व्याकरण के अध्येता उक्त क्रियाधातु के अर्थ एवं प्रयोजन को याद रखने के लिए “डुकृञ्‍करणे” रटते होंगे जिसका तात्पर्य है “डुकृञ्” क्रिया “करण” (कार्य करना) के प्रयोजन में लिया जाता है । स्तोत्र के रचनाकार की दृष्टि में जीवन के अंतकाल तक सांसारिक कार्यों में ही निरंतर लिप्त रहना फलदायक नहीं है यह भाव “डुकृञ्‍करणे” के रटने में प्रतिबिंबित होता है।  “अब तो इस रट को छोड़ो और ईश्वर-प्रार्थना में संलग्न होओ।”

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चिट्ठे की इस प्रविष्टि में चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् के तीन छंद (क्रमिकता में ६, ७, एवं ८) प्रस्तुत किये जा रहे हैं । इनमें पहला छंद है:

अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम् ।

वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशा पिण्डम्॥६॥ [भज …]

(अङ्गम् गलितम् पलितम् मुण्डम् दशन-विहीनम् जातम् तुण्डम् वृद्ध: याति गृहीत्वा दण्डम् तत्+अपि न मुञ्चति आशा-पिण्डम्।)

अर्थ –  (वृद्धावस्था में) अंग गलित (या ढीले, निष्क्रिय) हो चुकते हैं, शिर के बाल पक जाते हैं, मुख दंतविहीन हो जाता है। इस अवस्था को प्राप्त बूढ़ा व्यक्ति लाठी ले के चलता है। इतने सब के बावजूद जीवन की आशा पिंड नहीं छोड़ती।

बालस्तावत्क्रीडासक्तस्तरुणस्तावत्तरुणीरक्तः ।

वृद्धस्तावच्चिन्तामग्नः पारे ब्रह्मणि कोऽपि न लग्नः ॥७॥ [भज …]

(बाल: तावत् क्रीडा-आसक्तः तरुण: तावत् तरुणी-रक्तः वृद्ध: तावत् चिन्ता-मग्नः पारे ब्रह्मणि कः अपि न लग्नः।)

अर्थ –  (मनुष्य) बाल्यावस्था में खेलकूद में लगा रहता है, वयस्क होने पर तरुणी (स्त्री अथवा पत्नी) में आसक्त रहता है, और वृद्ध हो जाने पर तमाम चिंताओं से ग्रस्त रहता है। (विडंबना है) कि परब्रह्म (के चिंतन) में कभी संलिप्त नहीं होता है।

पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् ।

इह संसारे खलु दुस्तारे कृपयापारे पाहि मुरारे ॥८॥ [भज …]

(पुनः अपि जननम् पुनः अपि मरणम् पुनः अपि जननी-जठरे शयनम् इह संसारे खलु दुः-तारे कृपया अपारे पाहि मुरारे।)

अर्थ –  (इस संसार में मनुष्य का) पुनःपुनः जन्म होता और वह फिर-फिर मृत्यु को प्राप्त होता है। बारबार जन्मदात्री मां के गर्भ में पड़े रहने  का कष्ट भोगता है। हे भगवान मुरारे, इस दुस्तरणीय (जिसके पार जाया न जा सके) संसार से कृपा करके मुझे पार कर दो।

इन तीनों छंदों के पहले में वृद्धवस्था का वर्णन किया गया। मनुष्य की स्थिति कारुणिक हो जाती है। तिस पर भी उसकी जीने की लालसा और कष्टों से मुक्ति की आशा समाप्त नहीं होती। दूसरे छंद में ग्रंथरचयिता कहता है कि जीवन के अलग-अलग कालखंडों में मनुष्य की गतिविधियां शारीरिक सामर्थ्य और भावनात्मक परिवर्तनों के अनुसार बदलती रहती हैं, किंतु भगवद्भक्ति में लगने का विचार उसमें मन में नहीं उठता जो उसे जन्ममृत्यु के कष्टमय चक्र से मुक्ति दिलाए। तीसरे छंद में जीवन-मरण के कष्टकर चक्र के वर्णन के साथ भगवान – यहां पर उसे मुरारि के रूप में संबोधित किया गया है – से इस भवसागर से मुक्त करने की प्रार्थना की गयी है। – योगेन्द्र जोशी

 

“पृच्छति को॓ऽपि न गेहे” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् – २

इस चिट्ठे की पिछली प्रविष्टि (दिनांक १५ दिसंबर, २०१६) में मैंने आदिशंकराचार्य द्वारा विरचित “चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्” की चर्चा की थी। आलेख में इस बात का उल्लेख किया था कि इस रचना में कुल सत्रह छंद हैं और उनके अतिरिक्त एक स्थायी छंद (भज गोविन्दं भज गोविन्दं …) भी है जो इनमें से प्रत्येक छंद के बाद प्रयुक्त हुआ है। यदि उक्त स्तोत्र को भजन के तौर पर गाया जाये तो यह छंद प्रत्येक के बाद गाया जायेगा। इसकी भूमिका गायन के स्थायी के समान है।

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भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ् करणे ॥

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब तुम्हारा मरणकाल पास आ जायेगा तब यह “डुकृञ् करणे” की रट तुम्हें नहीं बचाएगी। “डुकृञ्” संस्कृत व्याकरण की एक क्रियाधातु है जिसका अर्थ “(कर्वव्य) करना” है। इस क्रियाधातु का व्यवहार में प्रयोग सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। अर्थात् इस पर बहुत दिमाग खपाना कुछ हद तक निरर्थक है। व्याकरण के अध्येता उक्त क्रियाधातु के अर्थ एवं प्रयोजन को याद रखने के लिए “डुकृञ् करणे” रटते होंगे जिसका तात्पर्य है “डुकृञ्” क्रिया “करण” (कार्य करना) के प्रयोजन में ली जाती है । स्तोत्र के रचनाकार की दृष्टि में जीवन के अंतकाल तक सांसारिक कार्यों में ही निरंतर लिप्त रहना फलदायक नहीं है यह भाव “डुकृञ् करणे” के रटने में प्रतिबिंबित होता है।  “अब तो इस रट को छोड़ो और ईश्वर-प्रार्थना में संलग्न होओ।”

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इस स्थल पर मैं चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्‍ के तीन छंद (क्रमिकता में ३, ४, एवं ५) प्रस्तुत कर रहा हूं। पहला है

यावद्वित्तोपार्जनसक्तस्तावन्निजपरिवारो रक्तः ।

पश्चाद्धावति जर्जरदेहे वार्तां पृच्छति को॓ऽपि न गेहे॥३॥ (भज …)

(यावद् वित्त-उप-अर्जन-सक्त: तावत् निज-परिवार: रक्तः पश्चात् धावति जर्जर-देहे वार्ताम् पृच्छति क: अपि न गेहे |)

अर्थ – जब तक धन-संपत्ति अर्जित करने में समर्थ हो तब तक उसका परिवार उसमें अनुरक्ति रखता है। बाद में वह जर्जर हो चुके शरीर के साथ इधर-उधर भटकता है और घर में उससे हालचाल भी नहीं पूछता।

मनुष्य वृद्धावस्था में प्रवेश करने पर धन-धान्य अर्जित करने की सामर्थ्य  खो बैठता है। वास्तव में जब यह स्थिति आती है तभी उसे वृद्ध कहना चाहिए, महज उम्र के आधार पर नहीं। उसके इस अवस्था में पहुंचने पर परिवार के लोगों का उसके प्रति लगाव समाप्तप्राय हो जाता है। उसे एक बोझ के तौर पर देखा जाता है। हो सकता है कि प्राचीन काल में ऐसा होता रहा होगा, क्योंकि तब सुविधाएं नहीं थीं। किंतु आज के युग में विविध प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध हैं और कई परिवारों में उनका विशेष ख्याल रखा जाता है।  फिर भी कुछ परिवारों में ऐसा नहीं होता और बूढ़े जनों को तिरस्कार भुगतना पड़ता है। अगला छंद –

जटिलो मुण्डी लुञ्चितकेशः काषायांबरबहुकृतवेषः ।

पश्यन्नपि च न पश्यति लोको ह्युदरनिमित्तं बहुकृतशोक: ॥४॥ (भज …)

(जटिल: मुण्डी लुञ्चित-केशः काषाय-अंबर-बहु-कृत-वेषः पश्यन् अपि च न पश्यति लोक: हि उदर-निमित्तं बहु-कृत-शोक: ।)

अर्थ – पेट के खातिर चिन्ता से ग्रस्त व्यक्ति सिर पर जटाएं धारण कर के या सिर मुढ़ा के, गेरुआ वस्त्र धारण कर के, अथवा तरह-तरह के वेष धारण करके कई उपक्रम करता है।

यह श्लोक यह बताता है कि मनुष्य की पहली चिंता होती है शरीर धारण करने के उपाय करना। आज के युग में आपको अनेक तथाकथित साधु-संत, बाबा-महात्मा मिल जायेंगे जो तमाम तरह की लच्छेदार बातें करके, असामान्य वेषभूषा धारण करके, स्वयं को आध्यात्मिक गुरु घोषित करके या इसी प्रकार के अन्य उपक्रम करके आम जनों को प्रभावित करने में सफल होते है और स्वयं चैन से जीवन-यापन करते हैं। यह श्लोक कदाचित् इस वर्ग के लोगों पर एक टिप्पणी है। याद रहे यह सब भारत के हिन्दू समाज के संदर्भ में ही सही है। अन्य समाजों में इस प्रकार के प्रयास शायद नहीं किए जाते हैं। धर्म के नाम पर हिन्दू समाज को सरलता से मूर्ख बनाया जा सकता है ऐसा मेरा सोचना है।

भगवद्गीता किञ्चिदधीता गङ्गाजललवकणिका पीता ।

सकृदपि यस्य मुरारिसमर्चा तस्य यमः किं कुरुते चर्चाम्‍ ॥५॥ (भज …)

(भगवद्गी ताकिञ्चित्‍ अधीता गङ्गा-जल-लव-कणिका पीता सकृत्‍ अपि यस्य मुरारि-सम्‍-अर्चा तस्य यमः किम्‍ कुरुते चर्चाम्‍ ।)

अर्थे – जिस व्यक्ति ने भगवद्गीता का कुछ भी अध्ययन किया हो, गंगाजल का एक कण या बूंद भी पिया हो, भगवान् श्रीकृष्ण “मुरारि” की कुछ भी आराधना-अर्चना की हो, उसकी यम भी क्या चर्चा करेंगे?

जिस व्यक्ति ने धर्मकर्म में मन लगाया हो और ईश्वर-भक्ति में समय-यापन किया हो उसको मरणकाल पर कष्ट देने की यमराज भी नहीं सोचते होंगे मेरे मत में ऐसा इस छंद का निहितार्थ होगा। छंद में भगवद्गीता-अध्ययन आदि की जो बातें कही गई हैं वे पुण्यकर्म के प्रतीक हैं। भगवद्भजन एवं पुण्यकर्म में लगे हुए व्यक्ति को व्रुद्धावस्था एवं मृत्यु भय कम होता है। यह बात कितना सही होगी यह मैं कह नहीं सकता। (मुर एक राक्षक का नाम था जिसको भगवान् श्रीकृष्ण ने मारा था। इसलिए उनका नाम मुरारि = मुर+अरि = मुर के शत्रु भी है।)योगेन्द्र जोशी

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