ईशवास्योपनिषद्‍ का दर्शन – परमात्मा विविध प्राणियों के रूप में स्वयं को प्रकट करता है

ईशावास्योपनिषद्‍ ग्यारह प्रमुख उपनिषदों में से एक है। यह बहुत ही छोटा ग्रंथ है, मात्र १८ मंत्रों का संकलन। दरअसल यह शुक्लयजुर्वेद का ४०वां एवं अंतिम अध्याय है और उस वेद का दार्शनिक पक्ष सार रूप में प्रस्तुत करता है।

मैं यहां पर उक्त उपनिषद्‍ के ६ठे एवं ७वें मंत्र का उल्लेख कर रहा हूं जिनमें परमात्मा की व्यापकता की बात की गयी है और यह बताया गया है वही परमात्मा स्वयं को समस्त प्राणियों के रूप में प्रकट करता है। जो मोक्षार्थी इस सत्य को आत्मसात् कर लेता है वह सभी प्रणियों में स्वयं की आत्मा को देखता है। उक्त मंत्र ये हैं –

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।

सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥६॥

(यः तु सर्वाणि भूतानि आत्मनि एव अनुपश्यति सर्व-भूतेषु च आत्मानम् ततः न वि-जुगुप्सते ।)

यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः ।

तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥७॥

(यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मा एव अभूत् वि-जानतः तत्र कः मोहः कः शोक: एकत्वम् अनुपश्यतः ।)

इन मंत्रों में जो “आत्मन्” शब्द विद्यमान है उसकी व्याख्या कुछ विद्वानों ने परमात्मन् के पर्याय के तौर पर की है तो कुछ अन्य ने प्राणियों की, विशेषतः मनुष्य की, आत्मा के तौर पर। संयोग से मेरे पास पांच व्यख्याएं उपलब्ध हैं, जिनमें ऊपरी तौर पर न्यूनाधिक शाब्दिक अंतर दिखता है किन्तु जिनका सार एक ही है। ये व्याख्याएं यों हैं –

(१) शुक्लयजुर्वेद (प्रकाशक पांडुरंग जावजी, बंबई, १९२९) में वर्णित श्रीमद्‍ उवटाचार्य के एवं श्रीमन्महीधर के भाष्य;

(२) आदिशंकराचार्यकृत भाष्य (गीताप्रेस, गोरखपुर, संवत् २०२४);

(३) भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद की टीका (भक्तिवेदांत बुक ट्रस्ट, मुंबई, २००६) एवं

(४) कल्याण उपनिषद्‍ अंक (गीताप्रेस, गोरखपुर, संवत्, २०५२)।

उक्त मंत्रों का शब्दार्थ क्रमशः कुछ यों दिया जा सकता है:

जो निःसंदेह सभी प्राणियों को अपनी आत्मा (या परमात्मा) में देखता है, और सभी प्राणियों में स्वयं की आत्मा (या परमात्मा) का दर्शन पाता है, वह किसी से घृणा नहीं करता ॥६॥

जिस अवस्था में आत्मा (या परमात्मा) ही सभी प्राणियों के रूप में प्रकटित हुआ है ऐसा ज्ञान किसी व्यक्ति को प्राप्त हो जाता है, सर्वत्र एकत्व देख रहे उस व्यक्ति के लिए न कोई मोह और न ही शोक रह जाता है॥७॥

प्राचीन काल के वैदिक दार्शनिकों की मान्यता थी कि समस्त चराचर जगत उसी एक परब्रह्म अथवा परमात्मा के स्वयं को बहु-रूपों में प्रकट करने का परिणाम है। दूसरे शब्दों में सभी प्राणी उसी के अंश हैं जो उसी के बनाये (?) मायाजाल में अपने मूल स्वरूप को भूले रहते हैं। मानव जीवन सृष्टि के इस सत्य के साक्षात्कार का एक साधन है। (जीवों की) आत्मा एवं परमात्मा के बीच कुछ वैसा ही संबंध जैसे जलभंडार समुद्र और उससे अलग हुई जल की बूंद के बीच।

उक्त मंत्रद्वय के अनुसार ज्ञानी पुरुष अपनी आत्मा का परमात्मा के साथ एकत्वभाव अनुभव करने में सफल रहता है। अर्थात् उसे यह ज्ञान हो जाता है कि समस्त प्राणी परमात्मा के अंश हैं: “मैं ही वह परमात्मा हूं और फंला प्राणी भी वही परमात्मा है। तब फंला प्राणी से घृणा, परहेज या विद्वेष कैसा? घृणा करना अपने आप से घृणा करना नहीं हो जाएगा?” इस प्रकार का चिंतन मोक्ष की दिशा में बढ़ रहे व्यक्ति के आचरण का हिस्सा बन जाता है। ऐसी अवस्था में लगाव और विलगाव की कोई सार्थकता नहीं रह जाती है। उक्त दूसरे मंत्र में एकत्व भाव के कारण किसी के प्रति मोह अथवा शोक मोक्षार्थी को नहीं हो सकता है।

ऊपर मैंने मोक्षार्थी शब्द का प्रयोग किया है क्योंकि आम जन सांसारिक क्रियाकलापों में उलझे रहते हैं। अध्यात्म की दिशा में आगे बढ़ने और ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने का विचार उनके मन में उठता ही नहीं। उस स्थिति में उनके लिए उपर्युक्त दार्शनिक बातें कितनी सार्थक अथवा निरर्थक रहती हैं यह प्रश्न भी बेमानी हो जाता है। इसलिए अध्यात्म की दिशा में अग्रसर मोक्षार्थी के लिए ही इन बातों का  महत्व है। (मोक्ष = जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर अपने मूल स्वरूप सत्-चित्-आनंद परब्रह्म को प्राप्त करना।) – योगेन्द्र जोशी

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छान्दोग्य उपनिषद्‍ में परमात्मा की व्यापकता पर उद्दालक-श्वेतकेतु संवाद

वैदिक चिंतकों के अनुसार यह सृष्टि परब्रह्म या परमात्मा से उत्पन्न हुई है और अंत में उसी में इसका विलय हो जाना है। उत्पत्ति और विलय का यह चक्र चलता रहता है। यद्यपि वैदिक चिंतकों के मतों में भी परस्पर न्यूनाधिक भेद देखने को मिलता है फिर भी परब्रह्म की व्यापकता को सभी स्वीकारते हैं और मानते हैं वही परब्रह्म स्वयं को इस संसार के रूप में प्रकट करता है।

छान्दोग्य उपनिषद्‍ (अध्याय ६, खंड १३) में परमात्मा या परब्रह्म की व्यापकता को लेकर ऋषि उद्दालक (अरुणपुत्र आरुणि) एवं उनके पुत्र श्वेतकेतु के बीच एक संवाद का उल्लेख मिलता है। उसी की चर्चा मैं यहां पर कर रहा हूं। उपनिषद्‍ में श्वेतकेतु की आयु का जिक्र तो नहीं है, किंतु ऐसा लगता है कि वह परमात्मा के व्यापकता का अर्थ समझना चाहता है और इस प्रकार आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित करना चाह्ता है।

उक्त उपनिषद्‍ में उल्लेख है:

“लवणमेतदुदकेऽवधायाथ मा प्रातरुपसीदथा इति सह तथा चकार तंहोवाच यद्दोषा लवणमुदकेऽवाधा अङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य न विवेद॥१॥”

(लवणम् तत् उदके अवधाय अथ मा प्रातः उपसीदथा इति । सह (सः?) तथा चकार । तम् ह उवाच यत् दोषा लवणम् उदके अवाधा अङ्ग तत् आहर इति । तत् ह अवमृश्य न विवेद ।)

(ऋषि उद्दालक पुत्र से कहते हैं) उस लवण को जल में डालकर प्रातःकाल मेरे समीप आना। उसने वैसा ही किया। उसने (उद्दालक) ने उससे कहा अच्छा रात्रि में जो लवण जल में डाला था उसे ले आओ। देखने/ढूढ़ने पर वह जान नहीं पाया।

ऋषि उद्दालक ने श्वेतकेतु को नमक की डली को पानी में डालकर रात भर छोड़ देने को कहा। प्रातःकाल उससे कहा गया कि वह नमक की डली पानी से निकालकर ले आए। रात भर में नमक पानी में घुल चुका था, अतः वह अपने पूर्व रूप डली के तौर पर नहीं मिल सका। नमक की डली वापस कैसे मिले यह उसे समझ में नहीं आया। तब उद्दालक उसे समझाते हैं कि वह तो पानी के साथ एकाकार हो चुका है। वह पानी में है तो किंतु वह दिख नहीं सकता। वस्तुस्थिति स्पष्ट करने के लिए वे श्वेतकेतु से कहते हैं:

“यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्तादाचामेति कथमिति लवणमिति मध्यादाचामेति कथमिति लवणमित्यन्तादाचामेति लवणमित्यभिप्रास्यैतदथ मोपसीदथा इति तद्ध तथा चकार तच्छश्वत्संवर्तते तंहोवाचात्र वाव किल सत्सोम्य न  निभालयसेऽत्रैव किलेति॥२॥

(यथा विलीनम् एव अङ्ग अस्य अन्तात् आचाम इति । कथम् इति । लवणम् इति । मध्यात् आचाम् इति । कथम् इति । लवणम् इति । अन्तात् आचाम इति । लवणम् इति । अभिप्रास्य एतत् अथ मा उपसीदथा इति । तत् ह तथा चकार । तत् शश्वत् संवर्तते तम् ह उवाच अत्र वाव किल सत् सोम्य न निभालयसे अत्र एव किल इति ।)

हे वत्स, विलीन (लवण) वाले जल से कुछ मात्रा लेकर आचमन करो। कैसा लगा? नमकीन। उस जल के मध्य भाग से लो। कैसा लगा? नमकीन। उसके अंत (तले) से लेकर आचमन करो। कैसा लगा? नमकीन। उसे छोड़कर/ फैंककर मेरे पास आओ। उसने वैसा ही किया। (ऋषि ने) उसको बताया वह (लवण) सदा ही उसमें विद्यमान है। हे सोम्य, उसी भांति वह “सत्” भी निश्चय ही यहीं विद्यमान है। तुम उसे देख नहीं पाते, किंतु वह अवश्य ही यहीं है। (सत् अर्थात्  अंतिम सत्य, सृष्टि का सार तत्व, परमात्मा)

उद्दालक पानी में नमक के घोल को उदाहरण के तौर अपने जिज्ञासु पुत्र के सामने रखते हैं। पानी में उस नमक की विद्यमानता दिखती नहीं परंतु पानी चखने पर उसके होने का ज्ञान श्वेतकेतु को मिल जाता है। यहां पर एक सफल इंद्रिय के तौर पर मनुष्य की जिह्वा सहायक सिद्ध होती है। परब्रह्म की व्यापकता भी कुछ इसी प्रकार समझी जा सकती है। परंतु उसके मामले में कोई भी ज्ञानेन्द्रिय सहायक नहीं होती है। वैदिक दार्शनिकों के अनुसार ज्ञानमार्ग उसकी व्यापकता का अनुभव कराती है। भक्तिमार्ग के अनुयायियों के अनुसार भगवद्भक्ति परब्रह्म को पाने का साधन है। परमात्मा तक पहुंचने के मार्गों के बारे में मतमतांतर देखने को मिलते हैं। – योगेन्द्र जोशी

“अर्थनाशं मनस्तापं … मतिमान्न न प्रकाशयेत्” आदि चाणक्यनीति वचन

“चाण्क्यनीतिदर्पण” एक छोटी पुस्तिका है जिसके सभी छंदों में नीतिवचन निहित हैं। इस ग्रंथ के रचयिता विष्णुशर्मा बताए जाते हैं। विष्णुशर्मा को ही चणक-पुत्र होने के नाते चाणक्य और राजनीति के दांवपेंचों के ज्ञाता होने के नाते कौटिल्य कहा जाता है।

उक्त ग्रंथ के सातवें अध्याय में २१ छंद हैं और उनमें व्यावहारिक जीवन में कब कैसे समाज के समक्ष व्यवहार करना उचित एवं उपयोगी होगा यह बताया गया है। उनमें से ४ छंदों का उल्लेख मैं यहां पर कर रहा हूं। ये मुझे खास तौर पर दिलचस्प एवं विचारणीय लगे। ये हैं:

अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च ।

वञ्चनं चापमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत् ॥१॥

(अर्थ-नाशं मनस्-तापम्  गृहे दुः-चरितानि च वञ्चनम् च अपमानम्  च मतिमान् न प्रकाशयेत्।)

ये सभी श्लोक सरल संस्कृत भाषा में लिखे गए हैं अतः उनके अर्थ समझने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए।

उपरिलिखित पहले श्लोक का निहितार्थ यह है कि सामान्य जीवन में व्यक्ति तमाम प्रकार के खट्टे-मीठे अनुभव पाता है। उनका उल्लेख दूसरों के समक्ष करने लिए वह अक्सर उत्साहित हो उठता है। जहां तक सुखद अनुभवों की बात है दूसरों को बताने से नुकसान की संभावना नहीं रहती है या कम रहती है। लेकिन कड़वे अनुभवों और परेशानियों के बारे में ऐसा कहना ठीक नहीं होगा। यह संभव है कुछ गिने-चुने लोग व्यक्ति के प्रति सहानुभूति रखें और आवश्यकतानुसार उपयोगी सलाह एवं सहायता भी दें। किंतु ऐसी उदार वृत्ति कम लोगों में ही देखने को मिलती है। कई ऐसे लोग होते हैं जो व्यक्ति की बातों का मन ही मन आनंद लेते हैं, उसकी पीठ पीछे जग-हंसाई करने/कराने से नहीं चूकते। मेरे जीवन का अनुभव यही रहा है कि ऐसे जनों के मन की कुटिलता भांपना आसान नहीं होता।

इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए चाणक्य का मत है कि धन की हानि, अनिष्ट घटनाओं से प्राप्त मानसिक कष्ट, घर-परिवार में दुःखद किंतु गोपनीय घटनाएं, ठगे जाने, और अपमानिन होने की बातों का खुलासा बुद्धिमान व्यक्ति न करे। उन्हें अपने मन ही तक सीमित रखे।

शकटं पञ्चहस्तेन दशहस्तेन वाजिनम् ॥

गजं हस्तसहस्रेण देशत्यागेन दुर्जनम् ॥७॥

(शकटम् पञ्च-हस्तेन दश-हस्तेन वाजिनम् गजम् हस्त-सहस्रेण देश-त्यागेन दुर्जनम्।)

इस श्लोक के माध्यम से चाणक्य दुर्जनों के सान्निध्य से दूर रहने की सलाह देते हैं। वे कहते है गाड़ी से पांच हाथ की दूरी बनाए रखना चाहिए। घोड़े से दस हाथ और हाथी से हजार हाथ की दूरी रखनी चाहिए। किंतु दुर्जन से तो दूरी बनाए रखने के लिए स्थान ही त्याग देना चाहिए।

पांच दस आदि शब्द प्रतीकात्मक भर हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि गाड़ी के नजदीक नहीं पहुंचना चाहिए ताकि संभावित दुर्घटना से बचा जा सके। प्राचीन काल में गाड़ी घोड़े से खिंचा जाने वाला वाहन हुआ करता था। गाड़ी के घोड़े से अधिक खतरा तो खुले घोड़े से रहता है। अतः उससे और भी अधिक दूरी रखनी चाहिए। हाथी घोड़े से भी अधिक खतरनाक सिद्ध हो सकता है इसलिए उससे बचने के लिए सुरक्षित दूरी और भी अधिक होगी। चाणक्य का मत है कि दुर्जन व्यक्ति कब कैसे अहित कर सकता है यह अनुमान लगाना ही कठिन है। ऐसे व्यक्ति से बचने के लिए दुर्जन वाले स्थान को ही छोड़ देना चाहिए। यहां पर देश शब्द का अर्थ उस सीमित स्थान से है जो दुर्जन के प्रभाव क्षेत्र में आता हो। उदाहरणार्थ पड़ोसी दुर्जन हो तो पड़ोस से हट जाना चाहिए। यदि दुर्जन गांव या मोहल्ले में उत्पात मचाता हो तो गांव-मोहल्ले को ही बदल लेना चाहिए, इत्यादि।

नात्यल्पं सरलैर्भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम् ॥

छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठन्ति पादपा: ॥१२॥

(न अति-अल्पम् सरलैः भाव्यम् गत्वा पश्य वन-स्थलीम् छिद्यन्ते सरलाः तत्र कुब्जाः तिष्ठन्ति पादपा:।)

उक्त तीसरे छंद में सरल स्वभाव से होने वाले नुकसान की ओर संकेत किया गया है।

मनुष्य को बहुत सरल स्वभाव का नहीं होना चाहिए। अर्थात् व्यावहारिक जीवन में थोड़ा बहुत कुटिलता, दुराव-छिपाव, सच छिपा के रखना, आदि भी आवश्यक होता है। ये तथाकथित “दोष” दूसरे का अहित करने के लिए नहीं, बल्कि अपनी स्वयं की हानि कोई अन्य न करने पावे इस विचार से अपनाए जाने चाहिए, क्योंकि कई बार मनुष्य की सिधाई का नाजायज लाभ दूसरे चालाक जन उठाते हैं। नीतिवेत्ता चाणक्य इस बात को समझाने के लिए पेड़ों का उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि वन में जाकर देखो कि किस प्रकार सीधे पेड़ों को काटा जाता है और टेड़े-मेड़े पेड़ों को छोड़ दिया जाता है। ध्यान रहे कि प्रायः सभी उद्येश्यों के लिए सीधी लकड़ी पसंद की जाती है। इसलिए सीधे पेड़ों को ही काटे जाने के लिए चुना जाता है। मेरा खुद का अनुभव रहा है कि कार्यालयों में सीधे-सरल व्यक्ति के ऊपर कार्य लाद दिए जाते हैं और चालाक व्यक्ति काम के बोझ से बच जाता है।

अंत में चौथा नीति वचन यह है:

यस्यार्थस्तस्य मित्राणि यस्यार्थस्तस्य बान्धवाः ॥

यस्यार्थः स पुमांल्लोके यस्यार्थः स च जीवति ॥१५॥

(यस्य अर्थः तस्य मित्राणि यस्य अर्थः तस्य बान्धवाः यस्य अर्थः स पुमान् लोके यस्य अर्थः स च जीवति।)

इस श्लोक में धन की महत्ता का जिक्र किया गया है।

नीतिवेत्ता का मानना है कि जिस व्यक्ति के पास धन-संपदा होती है उसी के मित्र होते भी होती हैं। अर्थात् जिसके पास धन होता है उसी से अन्य जन मित्रता करते हैं, अन्यथा उससे दूर रहने की कोशिश करते हैं। निर्धन से मित्रता कोई नहीं करना चाहता। इसी प्रकार जो धनवान हो उसी के बंधु-बांधव होते है। नाते-रिश्तेदार धनवान से ही संबंध रखते हैं, अन्यथा उससे दूरी बनाए रहने में ही भलाई देखते हैं। जिसके पास धन हो वही पुरुष माना जाता है यानी उसी को प्रतिष्ठित, पुरुषार्थवान, कर्मठ समझा जाता है। और धनवान व्यक्ति ही जीने का सुख पाता है। उसे धनहीन की तरह जिंदगी ढोनी नहीं पड़ती है।

मानव जीवन में धन कितनी अहमियत रखता है यह तो इस युग में सभी अनुभव करते हैं। किंतु चाण्क्य के उक्त वचन से यही निष्कर्ष निकलता है कि उस काल में भी सामाजिक संबंध धन-संपदा के होने न होने पर निर्भय करते थे। मानव समाज में धन की महत्ता सदा से ही रही है. परंतु वर्तमान युग में धन को ही सर्वोपरि माना जाता है। सब उसी की ओर भागते हुए देखे जा सकते हैं। -योगेन्द्र जोशी

“… सनिं मेधामयासिषं …” – यजुर्वेद में अग्नि देवता से बुद्धि एवं धन की प्रार्थना

वेदों में देवताओं की प्रार्थना से संबंधित अनेक मंत्र पढ़ने को मिलते हैं। ये देवता कौन हैं, क्या हैं, यह मैं नहीं समझ पाया हूं। प्रकृति की विभिन्न शक्तियों के अमूर्त नियंता ही ये देवता हैं ऐसा मेरी समझ में आता है। प्राचीन पौराणिक साहित्य में भी देवताओं से जुड़ी कथाओं का वर्णन मिलता है। लेकिन उन कथाओं से यह नहीं लगता कि देवतागण प्रकृति की शक्तियों के प्रतीक हैं। बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि वे पुण्यकर्मों के फलस्वरूप देवत्व-प्राप्त एवं विशिष्ट सामर्थ्य से संपन्न स्वर्गस्थ आत्माएं होती हैं जो पुण्यकर्मों के भोग के बाद पुनः धरती पर जन्म लेती हैं जैसा कि विष्णुपुराण में पढ़ने को मिलता है (गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे। स्वर्गापवर्गास्पदहेतुभूते भवन्ति भूयः मनुजाः सुरत्वात् ॥)। बहरहाल मैं वेदों एवं पुराणों में चर्चित देवताओं में क्या अंतर है – यदि है तो – इसकी विवेचना नहीं कर रहा हूं, बल्कि अग्नि देवता से जुड़े चार मंत्रों का जिक्र कर रहा हूं।

वेदों में देवताओं की स्तुतिपरक मंत्र ही अधिकांशतः देखने को मिलते हैं। इन देवताओं में इन्द्र एवं अग्नि की स्तुतियां बहुतायत में प्राप्य हैं। अग्नि देवता को अन्य सभी देवताओं के प्रतिनिधि के तौर पर देखा गया है, क्योंकि यज्ञ-संपादन में दी जाने वाली आहुतियों का वाहक अग्नि ही है। यज्ञकुंड की प्रज्वलित अग्नि में गोघृत, तिल, जौ आदि से बने सुगंधित हवन सामग्री की जब आहुति दी जाती है तो “स्वाहा” का उच्चारण किया जाता है; उसका अर्थ है कि अग्नि देवता के माध्यम से सभी देवताओं को वह आहुति प्राप्त हो। इसलिए वैदिक अनुष्ठानों में अग्नि देवता और उसके भौतिक प्रतीक प्रज्वलित अग्नि का विशेष महत्व है।

शुक्लयजुर्वेद संहिता में अग्नि देवता को संबोधित चार ऐसे मंत्र मुझे पढ़ने को मिले जिनमें मेधा (उत्कृष्ट श्रेणी की बौद्धिक क्षमता) और धनधान्य की याचना की गई है। उन्ही का उल्लेख मैं यहां पर कर रहा हूं, जिनके अर्थ के लिए मैंने श्रीमद्‍-उवटाचार्य एवं श्रीमद्‍महीधर के भाष्यों का सहारा लिया है। (शुक्लयजुर्वेदसंहिता, अध्याय ३२, कंडिका/मंत्र १३-१६)

सदसस्पतिमद्भुतं प्रियमिन्द्रस्य काम्यम् । सनिं मेधामयासिषं स्वाहा ॥१३॥

(सदसः पतिम् अद्भुतंम् प्रियम् इन्द्रस्य काम्यम् सनिम् मेधाम् अयासिषम् स्वाहा।)

यज्ञशाला के पति/स्वामी, इन्द्र के प्रिय, कामना के योग्य, (अग्नि से) धन (सनि) एवं मेधा की याचना करते हैं; स्वाहा अर्थात्‍ सभी देवताओं के प्रति आहुति।

यां मेधां देवगणाः पितरश्चोपासते । तया मामद्य मेधयाग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा ॥१४॥

(याम् मेधाम् देवगणाः पितरः च उपासते तया माम् अद्य मेधया अग्ने मेधाविनम् कुरु स्वाहा।)

जिस मेधा की उपसना देवगण और पितृवृन्द करते हैं, हे अग्नि आज मुझे उस मेधा से मेधावी (मेधावान्‍) बनावें; स्वाहा।

मेधां मे वरुणो ददातु मेधामग्निः प्रजापतिः । मेधामिन्द्रश्च वायुश्च मेधां धाता ददातु मे स्वाहा ॥१५॥

(मेधाम् मे वरुणः ददातु मेधाम् अग्निः प्रजापतिः मेधाम् इन्द्रः च वायुः च मेधाम् धाता ददातु मे स्वाहा।)

वरुण देवता मुझे मेधा प्रदान करें, अग्नि मेधा दें, प्रजापति (ब्रह्मा), इन्द्र एवं वायु मेधा दें, विधाता मुझे मेधा प्रदान करें; स्वाहा।

इदं मे ब्रह्म क्षत्रं चोभे श्रियमस्नुताम् मयि देवा दधतु श्रियमुत्तरां तस्यै ते स्वाहा ॥१६॥

(इदम् मे ब्रह्म क्षत्रम् च उभे श्रियम् अस्नुताम्मयि देवा दधतु श्रियम् उत्तराम् तस्यै ते स्वाहा।)

मेरी श्री (धन-संपदा) का भोग ब्राह्मण और क्षत्रिय, दोनों, करें। देवगण मुझे धन-ऐश्वर्य प्रदान करें; उसके लिए (अग्नि!) आपके प्रति आहुति; स्वाहा।

मेरी जानकारी के अनुसार वैदिक काल में यज्ञ-संपादन दैनिक जीवन का अंग हुआ करता था, और उसके लिए यज्ञशाला (सदस्) में अग्नि प्रज्वलित रहती थी। अग्नि को इस यज्ञगृह का स्वामी या पालनकर्ता कहा गया है। प्रथम मंत्र में अग्नि को इन्द्र के प्रिय साथी के तौर पर प्रस्तुत किया गया है। मेधा बुद्धि का पर्याय है; किंतु मेरी समझ में यह विवेक से परिपूर्ण बुद्धि है। आम तौर पर मनुष्य को बुद्धि सन्मार्ग पर ले चले यह आवश्यक नहीं। मेधा उत्कृष्ट स्तर की बुद्धि है जो उचितानुचित में भेद करने की प्रेरणा देती है।

पितरों से तात्पर्य पूर्वजों से होना चाहिए जो मेधा की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते रहे हों। देवगणों द्वारा उपासना का अर्थ कुछ भिन्न होना चाहिए, क्योंकि वे तो मेधा का वरदान स्वयं ही देते हैं। उनकी उपासना से अर्थ यही होगा की मेधा की श्रेष्ठता/महत्ता को वे भी स्वीकारते हैं और उसे उपास्य के तौर पर देखते हैं।

तीसरी कंडिका में वरुण (जल के देवता) आदि अन्य प्रमुख देवताओं का संबोधन स्पष्टतः करते हुए सभी से मेधा की याचना की गई है।

अंतिम मंत्र में यह यज्ञकर्ता कहता है उसका धन, जिसकी याचना प्रारंभ में की गई है, ब्राह्मणों और क्षत्रियों के भोग के लिए भी उपलब्ध होवे न कि अकेले उसके भोग के लिए। यहां पर केवल दो वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय) का नाम शामिल किया गया है। वैदिक काल में कार्य (पेशा) विभाजन के अनुरूप समाज चार वर्णों में विभक्त था: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। मेरा सोचना है कि इस कथन का आशय होना चाहिए कि मेरा धन समाज के उपयोग में आवे। तब केवल ब्राह्मण एवं क्षत्रिय का उल्लेख क्यों किया है? कदाचित् यह मंत्र के छंद-स्वरूप को सुसंगत बनाये रखने के लिए किया गया होगा। इसलिए केवल दो वर्णों का उल्लेख पूरे समाज को इंगित करने हेतु किया गया होगा ऐसा मेरा सोचना है। इस प्रकार इस मंत्र में ‘मेरा धन समाज-हित में प्रयुक्त होवे’ यह भावना निहित है। – योगेन्द्र जोशी

अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्ठो … – आत्मा की व्यापकता पर कठोपनिषद्‍ के वचन

वेदों का आरंभिक एवं अधिकांश भाग देवी-देवताओं की प्रार्थनाओं और कर्मकांडों के लिए प्रयुक्त मंत्रों से संबंधित मिलता है। इसके अतिरिक्त उनमें मनुष्य के ऐहिक (लौकिक) जीवन के कर्तव्याकर्तव्यों का भी उल्लेख देखने को मिलता है। उनका दार्शनिक पक्ष भी है। तत्संबंधित अध्यात्मिक ज्ञान जिन ग्रंथों के रूप में संकलित हैं उन्हें उपनिषदों के नाम से जाना जाता है।

उपनिषदों की कुल संख्या कितनी है यह मैं ठीक-से नहीं जान पाया हूं। मेरे पास गीताप्रेस, गोरखपुर, का एक विशेषांक – उपनिषद्‍ अंक – है जिसमें ५४ उपनिषदों की विस्तृत अथवा संक्षिप्त चर्चा की गई है। मेरी जानकारी के अनुसार इनमें से ११ उपनिषद्‍ मुख्य माने जाते है और उन्हीं की चर्चा अक्सर होती है। ये है (अकारादि क्रम से):

(१) ईशावास्योपनिषद्‍ (या ईशोपनिषद्‍)

(२) ऐतरेयोपनिषद्‍

(३) कठोपनिषद्‍

(४) केनोपनिषद्‍

(५) छान्दोग्योपनिषद्‍

(६) तैत्तरीयोपनिषद्‍

(७) प्रश्नोपनिषद्‍

(८) माण्डूक्योपनिषद्‍

(९) मुण्डकोपनिषद्‍

(१०) वृहदारण्यकोपनिषद्‍

(११) श्वेताश्वरोपनिषद्‍

इनमें वृहदारण्यक एवं छान्दोग्य उपनिषद्‍ सबसे बड़े हैं। उपर्युक्त उपनिषदों में परब्रह्म अथवा परमात्मा एवं सृष्टि की रचना की व्याख्या अपने-अपने तरीके से की गयी है।

कठोपनिषद्‍ के अध्याय २, वल्ली २, मैं मुझे ३ मंत्र पढ़ने को मिले जो परमात्मा की व्यापकता को अग्नि, वायु एवं सूर्य की उपमा के माध्यम से स्पष्ट करते हैं। ये मंत्र हैं:

अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्ठो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥९॥

(अग्निः यथा एकः भुवनम् प्रविष्ठः रूपम् रूपम् प्रतिरूपः बभूव तथा एकः सर्व-भूत-अन्तः-आत्मा रूपम् रूपम् प्रतिरूपः बहिः च।)

जिस प्रकार एक ही अग्नि इस संसार में अदृश्य रूप से प्रवेश करते हुए जिस किसी वस्तु में प्रज्वलित होती है और उसी के अनुरूप दृश्यमान्‍ होती है, उसी प्रकार सभी प्राणियों में विद्यमान्‍ परमात्मा (अदृश्य) एक ही होते हुए जिसमें प्रविष्ट होता है उसी के अनुसार रूप धारण कर लेता है और उनसे बाहर भी रहता है ।

वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्ठो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥१०॥

(वायुः यथा एकः भुवनम् प्रविष्ठः रूपम् रूपम् प्रतिरूपः बभूव तथा एकः सर्व-भूत-अन्तःर्‍-आत्मा रूपम् रूपम् प्रतिरूपः बहि: च।

जिस प्रकार एक ही वायु संसार में प्रवेश करते हुए जिस किसी वस्तु में समाहित होती है उसी के अनुरूप रूप धारण कर लेती है, उसी प्रकार सभी प्राणियों में विद्यमान् परमात्मा (अदृश्य) एक ही होते हुए जिस वस्तु में प्रविष्ट होता है उसी के अनुसार रूप धारण कर लेता है और उनसे बाहर भी रहता है।

सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ।

एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोक-दुःखेन बाह्यः ॥११॥

(सूर्यः यथा सर्व-लोकस्य चक्षुः न लिप्यते चाक्षुषैः बाह्य-दोषैः तथा एकः सर्व-भूत-अन्तःर्‍-आत्मा न लिप्यते लोक-दुःखेन बाह्य: ।)

जिस प्रकार एक ही सूर्य संसार का चक्षु (प्रकाशक) बनते हुए प्राणियों के चक्षु-संबंधी बाह्य-दोषों से मुक्त रहता है, उसी प्रकार सभी प्राणियों में विद्यमान्‍ एक ही परमात्मा संसार के दुःखों से निर्लिप्त रहता है और उनसे बाहर भी रहता है।

ऊपर के प्रथम दो श्लोकों में वस्तुतः एक ही बात दो प्रकार से कही गई है। इन उपमाओं की व्याख्या शब्दशः करना कोई माने नहीं रखता। यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि आध्यात्मिक दर्शन की प्रस्तुति सृष्टि के अमूर्त पक्ष के स्वरूप को समझने/समझाने का एक अपूर्ण प्रयास भर होता है। इस संदर्भ में यह स्वीकारा जाना चाहिए कि वैदान्तिक दर्शन विश्व में प्रचलित अन्य दर्शनों से अधिक पेचीदा है। परमात्मा और जीवात्मा के संबंध को दर्शाने के लिए भौतिक संसार के ही दृश्य दृष्टान्तों का सहारा लिया जाता है, जो स्वयं में नाकाफी प्रयास है।

यहां पर यह बताना समीचीन होगा कि इस प्रकार की मिलती-जुलती बात “माण्डूक्य उपनिषद्” में भी कही गई है [आत्मा ह्याकाशवज्जीवैर्घटाकाशैरिवोदितः … (अद्वैतप्रकरण, ३, ४)], जिसकी चर्चा मैंने अपनी एक पोस्ट में कुछ वर्ष पहले की थी (देखें 2009/04/25 की पोस्ट)।

तीसरा श्लोक वस्तुस्थिति के एक अलग पक्ष का स्पष्टीकरण प्रस्तुत करता है। यह बताता है कि परमात्मा उस सूर्य के समान है जो संसार को प्रकाशित करता है और प्राणियों को वस्तुओं के दर्शन कराता है। प्राणियों की अनुभूतियों में विविधता रहती है। उन्हें भांति-भांति के गुण-दोष अपने परिवेश में दिखते हैं। लेकिन स्वयं सूर्य उन गुण-दोषों से परे रहता है। ये गुण-दोष हमारे सुख-दुःखों के कारण होते हैं जो सबके लिए अलग-अलग रहते हैं, किंतु वह सूर्य सभी से मुक्त रहता है। अर्थात्‍ जीवात्माओं की अनुभूतियों से परमात्मा पूर्णतः निर्लिप्त रहता है।

वैदिक चिंतक यह मानते हैं कि आत्मा परमात्मा का ही अंश है लेकिन वह अपने परमात्मात्मक स्वरूप को भूल चुकती है। कुछ दार्शनिक इसको माया मानते हैं जो कदाचित् परमात्मा का ही खेल है।

मैं वैदिक दर्शन को ठीक-से नहीं समझ पाता। जो कुछ कहा जाता है वह शब्दमात्र होते हैं। वे जिस गूढ़ रहस्य की ओर संकेत करते हैं उसे समझने के प्रयास सबके भिन्न-भिन्न होते हैं। बहुतों के लिए वह बेमानी होते हैं क्योंकि उनकी सांसारिक कार्यों के संपादन में कोई महत्ता नहीं होती। – योगेन्द्र जोशी

अहिंसा परमो धर्मः …” – महाभारत में अहिंसा संबंधी नीति वचन (2)

“अहिंसा परमो धर्मः” प्राचीन संस्कृत साहित्य में उपलब्ध नीति-वचनों में से एक है जिसका उल्लेख अहिंसा के पक्षधर लोग अक्सर करते हैं। इस विषय में महाकाव्य महाभारत के तीन श्लोकों का उल्लेख मैंने अपने पिछली चिट्ठा-प्रविष्टि (ब्लॉग-पोस्ट) में किया था। मौजूदा आलेख में उसी महाभारत ग्रंथ के अन्य तीन श्लोकों को उद्धृत कर रहा हूं जो मुझे ग्रंथ में पढ़ने को मिले। इनकी चर्चा के बाद अहिंसा कितना अव्यावहारिक विचार है इस पर मैं अपने विचार प्रस्तुत करूंगा। पहले श्लोक:

अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परो दमः ।

अहिंसा परमं दानमहिंसा परमं तपः ॥28

(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 116, दानधर्मपर्व)

(अहिंसा परमः धर्मः तथा अहिंसा परः दमः अहिंसा परमम दानम् अहिंसा परमम् तपः ।)

शब्दार्थ – अहिंसा परम धर्म है, वही परम आत्मसंयम है, वही परम दान है, और वही परम तप है।

अहिंसा परमो यज्ञस्तथाहिंसा परं फलम् ।

अहिंसा परमं मित्रमहिंसा परमं सुखम् ॥29

(यथा पूर्वोक्त)

(अहिंसा परमः यज्ञः तथा अहिंसा परम् फलम् अहिंसा परमम् मित्रम् अहिंसा परमम् सुखम् ।)

शब्दार्थ – अहिंसा परम यज्ञ है, अहिंसा ही परम फल है, वह परम मित्र है, और वही परम सुख है।

सर्वयज्ञेषु वा दानं सर्वतीर्थेषु वाऽऽप्लुतम् ।

सर्वदानफलं वापि नैतत्तुल्यमहिंसया ॥30

(यथा पूर्वोक्त)

(सर्व-यज्ञेषु वा दानम् सर्व-तीर्थेषु वा आप्लुतम् सर्व-दान-फलम् वा अपि न एतत् अहिंसया तुल्यम् ।)

शब्दार्थ – सभी यज्ञों में भरपूर दान-दक्षिणा देना, या सभी तीर्थों में पुण्यार्थ स्नान करना, या सर्वस्व दान का फल बटोरना, यह सब अहिंसा के तुल्य (समान फलदाई) नहीं हैं।

ऊपरी तौर पर देखें तो इन श्लोकों में कोई प्रभावी बात नहीं दृष्टिगत होती है। अहिंसा परम धर्म, परम आत्मसंयम, परम दान एवं  परम तप है (उपर्युक्त प्रथम श्लोक) कहने का तात्पर्य यही लिया जा सकता है कि धर्म के अंतर्गत आने वाले सभी सत्कर्मों में अहिंसा प्रथम यानी सर्वोपरि है। अहिंसा का व्रत सरल नहीं हो सकता। अहिंसा में संलग्न व्यक्ति धर्म-कर्म की अन्य बातों पर भी टिका ही रहेगा। शायद यही इस श्लोक का संदेश है।

आम तौर पर हवनकुंड की प्रज्वलित अग्नि में हविष्य (हवन-सामग्री) की आहुति देकर देवताओं की प्रार्थना को यज्ञ कहा जाता है। लेकिन यज्ञ के इससे अधिक व्यापक अर्थ भी हैं। वस्तुतः पूजा-अर्चना से परे अन्य पुण्यकर्म करना भी यज्ञ कहलाता है। मनुस्मृति में पांच महायज्ञों का जिक्र पढ़ने को मिलता है: ये हैं:

ब्रह्मयज्ञ अध्यापन-कार्य अर्थात्‍ लोगों का ज्ञानवर्धन करना।

पितृयज्ञ पितृ-तर्पण अर्थात्‍ पितरों का स्मरण एवं श्रद्धा अभिव्यक्ति।

होमकार्य दैवयज्ञ यानी देवताओं की पूजा अर्चना, यज्ञ-यागादि। (दैवयज्ञ)

भूतयज्ञ  बलिप्रदान अर्थात्‍ अन्य प्राणियों को अपने भोजन का एक अंश, जिसे बलि कहते हैं, अर्पित करना।

नृयज्ञ – विविध प्रकार से अतिथियों का सत्कार, जिसमें भोजन प्रमुख है।

इन महायज्ञों के विषय पर मैंने इसी ब्लॉग पर दो आलेख (31 मार्च, 2015 एवं 16 मार्च, 2015) विगत काल में पोस्ट की थीं।

इस स्थल पर आम आदमी के मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या अहिंसा वाकई में धर्म का श्रेष्ठतम कर्म है। उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि धर्म का क्या अर्थ है और उसके पालन का क्या उद्देश्य है। प्राचीन भारतीय चिंतकों का मत रहा है कि मनुष्य के जीवन का अंतिम उद्देश्य मुक्ति प्राप्त करना है। अर्थात् जीवन-मरण के निरंतर चलने वाले चक्र से स्वयं को मुक्त करना। इसके लिए स्वयं का आध्यात्मिक उत्थान और इस संसार के मोह से अपने को बचाना है। इसके लिए आत्मिक परिष्करण और शेष संसार के प्रति सत्कर्म करना ही मार्ग है यह उनका मत रहा है। लोकायत परंपरा (चार्वाक सिद्धांत) को छोड़कर अन्य सभी धार्मिक मत एक ही प्रकार से सोचते हैं, अंतर है तो आध्यात्मिक दर्शन में और सत्कर्मों की परिभाषा तथा उनकी परस्पर सापेक्ष वरीयता में। लोकायत में तो इस भौतिक शरीर से परे कुछ नहीं है और तदनुसार कर्मों का महत्व व्यक्ति एवं समाज के परस्पर रिश्तों के संदर्भ में होता है। इसके विपरीत जैन मत में जीवधारी सत्कर्मों के फलस्वरूप उत्तरोत्तर श्रेष्ठतर अवस्था प्राप्त करते हुए अंत में मुक्तजीव हो जाता है; बौद्ध मत में जीवधारी का कर्मशरीर शून्य में विलीन हो जाता है, कुछ भी शेष नहीं रहता; और वैदिक दर्शन में जीवधारी की आत्मा परमात्मा में मिल जाती है, इत्यादि।

आध्यात्मिक उत्थान के लिए मनुष्य के लिए सत्कर्मों का संपादन आवश्यक है और उपर्युक्त श्लोकों में वही संदेश मुझे दिखता है।

मेरा मानना है कि दुनियाबी जिंदगी में अहिंसा स्वीकार्य नहीं हो सकती है। हिंसा मनुष्य के स्वभाव का अपरिहार्य अंग है और आत्मसंयम द्वारा विरले जन ही उसे नियंत्रित कर पाते हैं। व्यवहार में अहिंसा पर टिके रहना आम जन के लिए असंभव है। यह निर्विवाद तथ्य है कि सामाजिक व्यवस्था सुचारु बनाए रखना हिंसा को नकारने पर असंभव है। हिंसा का प्रयोग यथासंभव कम एवं विवेकपूर्ण तरीके से करना सामाजिक व्यवस्था के लिए आवश्यक है। यह हिंसा ही है जिससे मनुष्य डरता है और सन्मार्ग पर टिकने के लिए विवश होता है।

उपर्युक्त श्लोक जिस महाभारत ग्रंथ में मिलते हैं उसी में सर्वत्र हिंसा के तमाम दृष्टांतों का उल्लेख है। इतना ही नहीं, इसी ग्रंथ में हिंसा की अपरिहार्यता की बातें भी कही गयी हैं। इसी प्रकार वाल्मिकीय रामायण भी हिंसात्मक घटनाओं का लेखाजोखा है। रामायण काल में हो महाभारत काल, हिंसा का बोलबाला सदा से ही रहा। हिंसा के बल पर ही समाज में अनुशासन स्थापित हो पाता है।

तो फिर अहिंसा के पक्ष में इतना कुछ क्यों कहा गया है? मेरी धारणा है कि जो व्यक्ति आध्यात्मिक दिशा में अग्रसर होता है वह अहिंसा का मार्ग अपनाता है, भौतिक सुख छोड़ देता है, अधिकाधिक संपदा अर्जित करने से बचता है, इत्यादि। प्राचीन काल में आध्यात्मिक उत्थान को अधिक महत्व दिया जाता था र्भौतिक उन्नति की तुलना में। “अहिंसा परमो धर्मः” धर्म के उसी आध्यात्मिक पक्ष के संदर्भ में कहा गया होगा यह मेरा मत है। धर्म के इस पक्ष को आम जन व्यवहार में न तब अपना सकते थे और न अब।

हिंसा पूर्णतः त्याज्य कभी नहीं रही है। इस विषय पर किंचित् चर्चा मेरे आगामी लेख में। – योगेन्द्र जोशी

“अहिंसा परमो धर्मः …” – महाभारत में अहिंसा संबंधी नीति वचन (1)

“अहिंसा परमो धर्मः” यह नीति-वचन लोगों के मुख से अक्सर सुनने को मिलता है। प्राचीन काल में अपने भारतवर्ष में जैन तीर्थंकरों ने अहिंसा को केंद्र में रखकर अपने कर्तव्यों का निर्धारण एवं निर्वाह किया। अंतिम तीर्थंकर भगवान् महावीर के लगभग समकालीन (कुछ बाद के) महात्मा बुद्ध ने भी करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व तमाम कर्तव्यों के साथ अहिंसा का उपदेश तत्कालीन समाज को दिया था। अरब भूमि में ईशू मसीह ने भी कुछ उसी प्रकार की बातें कहीं। आधुनिक काल में महात्मा गांधी को भी अहिंसा के महान् पुजारी/उपदेष्टा के रूप में देखा जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने तो उनके सम्मान में 2 अक्टूबर को अहिंसा दिवस घोषित कर दिया।

अहिंसा की बातें घूमफिर कर सभी समाजों में की जाती रही हैं, लेकिन उसकी परिभाषा सर्वत्र एक जैसी नहीं है। उदाहरणार्थ जैन धर्म में अहिंसा की परिभाषा अति व्यापक है, किसी भी जीवधारी को किसी भी प्रकार से कष्ट में डालना वहां वर्जित है। इस धारणा के साथ जीवन धारण करना लगभग नामुमकिन है। अरब मूल के धर्मो के अनुसार मनुष्य को छोड़कर अन्य जीवों में रूह नहीं होती, तदनुसार उनके साथ अहिंसा बेमानी है। कुर’आन से मैंने यही निष्कर्ष निकाला। वास्तव में सभी समाज अपने भौतिक हितों को ध्यान में रखते हुए अहिंसा की परिभाषा अपनाते हैं। विडंबना देखिए कि महावीर, बुद्ध एवं गांधी के इस भारत में अहिंसा की कोई अहमियत नहीं। पग-पग पर हिंसा के दर्शन होते है। अहिंसा वस्तुतः एक आदर्श है जिससे आम तौर पर सभी परहेज करते हैं। लेकिन “अहिंसा परमो धर्मः” की बात मंच पर सभी कहते हैं।

अस्तु, अहिंसा या हिंसा की वकालत करना इस आलेख में मेरा उद्देश्य नहीं है। “अहिंसा परमो धर्मः” की नीति की मानव जीवन में सार्थकता है या नहीं इसकी समीक्षा मैं नहीं कर रहा हूं। मैं केवल यह बताना चाहता हूं कि इस नीति का उल्लेख महाभारत महाकाव्य में कई स्थालों पर देखने को मिलता है। उन्हीं की चर्चा करना मेरा प्रयोजन है। जो यहां उल्लिखित हो उसके अतिरिक्त भी अन्य स्थलों पर बातें कही गयी होंगी जिनका ध्यान या जानकारी मुझे नहीं है।

अहिंसा परमो धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः ।

सत्ये कृत्वा प्रतिष्ठां तु प्रवर्तन्ते प्रवृत्तयः ॥74

(महाभारत, वन पर्व, अध्याय 207 – मारकण्डेयसमास्यापर्व)

(अहिंसा परमः धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः सत्ये तु प्रतिष्ठाम् कृत्वा प्रवृत्तयः प्रवर्तन्ते ।)

अर्थ – अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है, और वह सत्य पर ही टिका होता है। सत्य में निष्ठा रखते हुए ही कार्य संपन्न होते हैं।

यहां कार्य से तात्पर्य सत्कर्मों से होना चाहिए। सत्कर्म सत्य के मार्ग पर चलने से ही संभव होते हैं। धर्म बहुआयामी अवधरणा है। मनुष्य के करने और न करने योग्य अनेकानेक कर्मों का समुच्चय धर्म को परिभाषित करता है। करने योग्य कर्मों में अहिंसा सबसे ऊपर या सबसे पहले है यह उपदेष्टा का मत है।

महाभारत ग्रंथ के वन पर्व में पांडवों के 12 वर्षों के वनवास (उसके पश्चात् एक वर्ष का नगरीय अज्ञातवास भी पूरा करना था) का वर्णन है। वे वन में तमाम ऋषि-मुनियों के संपर्क में आते हैं जिनसे उन्हें भांति-भांति का ज्ञान मिलता है। उसी वन पर्व में पांडवों का साक्षात्कार ऋषि मारकंडेय से भी होता है। ऋषि के मुख से उन्हें कौशिक नाम के ब्राह्मण और धर्मनिष्ठ व्याध के बीच के वार्तालाप की बात सुनने को मिलती है। उक्त श्लोक उसी के अंतर्गत उपलब्ध है।

अगले दो श्लोक अनुशासन पर्व से लिए गए हैं। महाभारत युद्ध के बाद सब शांत हो जाता है और युधिष्ठिर राजा का दायित्व संभाल लेते हैं। भीष्म पितामह सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में मृत्यु-शैया पर लेटे होते हैं। वे युधिष्ठिर को राजधर्म एवं नीति आदि का उपदेश देते हैं। ये श्लोक उसी प्रकरण के हैं।

अहिंसा सर्वभूतेभ्यः संविभागश्च भागशः ।

दमस्त्यागो धृतिः सत्यं भवत्यवभृताय ते ॥18

(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 60 – दानधर्मपर्व)

(अहिंसा सर्व-भूतेभ्यः संविभागः च भागशः दमः त्यागः धृतिः सत्यम् भवति अवभृताय ते ।)

अर्थ – सभी प्राणियों के प्रति अहिंसा बरतना, सभी को यथोचित भाग सोंपना, इंद्रिय-संयम, त्याग, धैर्य एवं सत्य पर टिकना अवभृत स्नान के तुल्य (पुण्यदायी) होता है।

वैदिक परंपरा में यज्ञ-यागादि का विशेष महत्व है और उन्हें पुण्य-प्राप्ति का महान् मार्ग माना जाता है। ऐसे आयोजन के समापन के पश्चात विधि-विधान के साथ किए गये स्नान को अवभृत स्नान कहा गया है। यहां बताये गये अहिंसा आदि उस स्नान के समान फलदातक होते हैं यह श्लोक का भाव है।

उक्त श्लोक में “अहिंसा परमो धर्मः” कथन विद्यमान नहीं है, किंतु अहिंसा के महत्व को अवश्य रेखांकित किया गया है। वनपर्व का अगला श्लोक ये है:

अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तपः ।

अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते ॥23

(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 115 – दानधर्मपर्व)

(अहिंसा परमो धर्मः तथा अहिंसा परम्‍ तपः अहिंसा परमम्‍ सत्यम्‍ यतः धर्मः प्रवर्तते ।)

अर्थ – अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा परम तप है, और अहिंसा ही परम सत्य और जिससे धर्म की प्रवृत्ति आगे बढ़ती है।

इस वचन के अनुसार अहिंसा, तप और सत्य आपस में जुड़े हैं। वस्तुतः अहिंसा स्वयं में तप है, तप का अर्थ है अपने को हर विपरीत परिस्थिति में संयत और शांत रखना। जिसे तप की सामर्थ्य नहीं वह अहिंसा पर टिक नहीं सकता। इसी प्रकार सत्यवादी ही अहिंसा पर टिक सकता है यह उपदेष्टा का मत है।

अहिंसा की जितनी भी प्रशंसा हम कर लें, तथ्य यह है कि मानव समाज अहिंसा से नहीं हिंसा से चलता है। मैं अगले चिट्ठा-प्रवृष्टि में “अहिंसा …” पर अनुशासन पर्व के अन्य श्लोकों के साथ अपने इस मत की भी चर्चा करूंगा। – योगेन्द्र जोशी

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