“अङ्गम् गलितम् पलितम् मुण्डम् …” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् – ३

इस चिट्ठे के छ: आलेखों की शृंखला की यह मेरी तीसरी प्रविष्टि है। याद दिला दूं कि इन आलेखों में आदिशंकराचार्य द्वारा विरचित “चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्” के १८ छंदों की चर्चा की जा रही है। (देखें दिनांक ६ जनवरी, २०१७, का आलेख)

पहले आलेख में इस बात का उल्लेख किया था कि इस रचना में कुल सत्रह छंद हैं और उनके अतिरिक्त एक स्थायी छंद (भज गोविन्दं भज गोविन्दं …) भी है जो इनमें से प्रत्येक छंद के बाद प्रयुक्त हुआ है। यदि उक्त स्तोत्र को भजन के तौर पर गाया जाये तो यह छंद प्रत्येक के बाद गाया जायेगा। इसकी भूमिका गायन के स्थायी के समान है।

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भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ्करणे ॥

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब तुम्हारा मरणकाल पास आ जायेगा तब यह “डुकृञ्  करणे” की रट तुम्हें नहीं बचाएगी। “डुकृञ्” संस्कृत व्याकरण की एक क्रियाधातु है जिसका अर्थ “(कर्वव्य) करना” है। इस क्रियाधातु का व्यवहार में प्रयोग सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। अर्थात् इस पर बहुत दिमाग खपाना कुछ हद तक निरर्थक है। व्याकरण के अध्येता उक्त क्रियाधातु के अर्थ एवं प्रयोजन को याद रखने के लिए “डुकृञ्‍करणे” रटते होंगे जिसका तात्पर्य है “डुकृञ्” क्रिया “करण” (कार्य करना) के प्रयोजन में लिया जाता है । स्तोत्र के रचनाकार की दृष्टि में जीवन के अंतकाल तक सांसारिक कार्यों में ही निरंतर लिप्त रहना फलदायक नहीं है यह भाव “डुकृञ्‍करणे” के रटने में प्रतिबिंबित होता है।  “अब तो इस रट को छोड़ो और ईश्वर-प्रार्थना में संलग्न होओ।”

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चिट्ठे की इस प्रविष्टि में चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् के तीन छंद (क्रमिकता में ६, ७, एवं ८) प्रस्तुत किये जा रहे हैं । इनमें पहला छंद है:

अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम् ।

वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशा पिण्डम्॥६॥ [भज …]

(अङ्गम् गलितम् पलितम् मुण्डम् दशन-विहीनम् जातम् तुण्डम् वृद्ध: याति गृहीत्वा दण्डम् तत्+अपि न मुञ्चति आशा-पिण्डम्।)

अर्थ –  (वृद्धावस्था में) अंग गलित (या ढीले, निष्क्रिय) हो चुकते हैं, शिर के बाल पक जाते हैं, मुख दंतविहीन हो जाता है। इस अवस्था को प्राप्त बूढ़ा व्यक्ति लाठी ले के चलता है। इतने सब के बावजूद जीवन की आशा पिंड नहीं छोड़ती।

बालस्तावत्क्रीडासक्तस्तरुणस्तावत्तरुणीरक्तः ।

वृद्धस्तावच्चिन्तामग्नः पारे ब्रह्मणि कोऽपि न लग्नः ॥७॥ [भज …]

(बाल: तावत् क्रीडा-आसक्तः तरुण: तावत् तरुणी-रक्तः वृद्ध: तावत् चिन्ता-मग्नः पारे ब्रह्मणि कः अपि न लग्नः।)

अर्थ –  (मनुष्य) बाल्यावस्था में खेलकूद में लगा रहता है, वयस्क होने पर तरुणी (स्त्री अथवा पत्नी) में आसक्त रहता है, और वृद्ध हो जाने पर तमाम चिंताओं से ग्रस्त रहता है। (विडंबना है) कि परब्रह्म (के चिंतन) में कभी संलिप्त नहीं होता है।

पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् ।

इह संसारे खलु दुस्तारे कृपयापारे पाहि मुरारे ॥८॥ [भज …]

(पुनः अपि जननम् पुनः अपि मरणम् पुनः अपि जननी-जठरे शयनम् इह संसारे खलु दुः-तारे कृपया अपारे पाहि मुरारे।)

अर्थ –  (इस संसार में मनुष्य का) पुनःपुनः जन्म होता और वह फिर-फिर मृत्यु को प्राप्त होता है। बारबार जन्मदात्री मां के गर्भ में पड़े रहने  का कष्ट भोगता है। हे भगवान मुरारे, इस दुस्तरणीय (जिसके पार जाया न जा सके) संसार से कृपा करके मुझे पार कर दो।

इन तीनों छंदों के पहले में वृद्धवस्था का वर्णन किया गया। मनुष्य की स्थिति कारुणिक हो जाती है। तिस पर भी उसकी जीने की लालसा और कष्टों से मुक्ति की आशा समाप्त नहीं होती। दूसरे छंद में ग्रंथरचयिता कहता है कि जीवन के अलग-अलग कालखंडों में मनुष्य की गतिविधियां शारीरिक सामर्थ्य और भावनात्मक परिवर्तनों के अनुसार बदलती रहती हैं, किंतु भगवद्भक्ति में लगने का विचार उसमें मन में नहीं उठता जो उसे जन्ममृत्यु के कष्टमय चक्र से मुक्ति दिलाए। तीसरे छंद में जीवन-मरण के कष्टकर चक्र के वर्णन के साथ भगवान – यहां पर उसे मुरारि के रूप में संबोधित किया गया है – से इस भवसागर से मुक्त करने की प्रार्थना की गयी है। – योगेन्द्र जोशी

 

“पृच्छति को॓ऽपि न गेहे” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् – २

इस चिट्ठे की पिछली प्रविष्टि (दिनांक १५ दिसंबर, २०१६) में मैंने आदिशंकराचार्य द्वारा विरचित “चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्” की चर्चा की थी। आलेख में इस बात का उल्लेख किया था कि इस रचना में कुल सत्रह छंद हैं और उनके अतिरिक्त एक स्थायी छंद (भज गोविन्दं भज गोविन्दं …) भी है जो इनमें से प्रत्येक छंद के बाद प्रयुक्त हुआ है। यदि उक्त स्तोत्र को भजन के तौर पर गाया जाये तो यह छंद प्रत्येक के बाद गाया जायेगा। इसकी भूमिका गायन के स्थायी के समान है।

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भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ् करणे ॥

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब तुम्हारा मरणकाल पास आ जायेगा तब यह “डुकृञ् करणे” की रट तुम्हें नहीं बचाएगी। “डुकृञ्” संस्कृत व्याकरण की एक क्रियाधातु है जिसका अर्थ “(कर्वव्य) करना” है। इस क्रियाधातु का व्यवहार में प्रयोग सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। अर्थात् इस पर बहुत दिमाग खपाना कुछ हद तक निरर्थक है। व्याकरण के अध्येता उक्त क्रियाधातु के अर्थ एवं प्रयोजन को याद रखने के लिए “डुकृञ् करणे” रटते होंगे जिसका तात्पर्य है “डुकृञ्” क्रिया “करण” (कार्य करना) के प्रयोजन में ली जाती है । स्तोत्र के रचनाकार की दृष्टि में जीवन के अंतकाल तक सांसारिक कार्यों में ही निरंतर लिप्त रहना फलदायक नहीं है यह भाव “डुकृञ् करणे” के रटने में प्रतिबिंबित होता है।  “अब तो इस रट को छोड़ो और ईश्वर-प्रार्थना में संलग्न होओ।”

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इस स्थल पर मैं चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्‍ के तीन छंद (क्रमिकता में ३, ४, एवं ५) प्रस्तुत कर रहा हूं। पहला है

यावद्वित्तोपार्जनसक्तस्तावन्निजपरिवारो रक्तः ।

पश्चाद्धावति जर्जरदेहे वार्तां पृच्छति को॓ऽपि न गेहे॥३॥ (भज …)

(यावद् वित्त-उप-अर्जन-सक्त: तावत् निज-परिवार: रक्तः पश्चात् धावति जर्जर-देहे वार्ताम् पृच्छति क: अपि न गेहे |)

अर्थ – जब तक धन-संपत्ति अर्जित करने में समर्थ हो तब तक उसका परिवार उसमें अनुरक्ति रखता है। बाद में वह जर्जर हो चुके शरीर के साथ इधर-उधर भटकता है और घर में उससे हालचाल भी नहीं पूछता।

मनुष्य वृद्धावस्था में प्रवेश करने पर धन-धान्य अर्जित करने की सामर्थ्य  खो बैठता है। वास्तव में जब यह स्थिति आती है तभी उसे वृद्ध कहना चाहिए, महज उम्र के आधार पर नहीं। उसके इस अवस्था में पहुंचने पर परिवार के लोगों का उसके प्रति लगाव समाप्तप्राय हो जाता है। उसे एक बोझ के तौर पर देखा जाता है। हो सकता है कि प्राचीन काल में ऐसा होता रहा होगा, क्योंकि तब सुविधाएं नहीं थीं। किंतु आज के युग में विविध प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध हैं और कई परिवारों में उनका विशेष ख्याल रखा जाता है।  फिर भी कुछ परिवारों में ऐसा नहीं होता और बूढ़े जनों को तिरस्कार भुगतना पड़ता है। अगला छंद –

जटिलो मुण्डी लुञ्चितकेशः काषायांबरबहुकृतवेषः ।

पश्यन्नपि च न पश्यति लोको ह्युदरनिमित्तं बहुकृतशोक: ॥४॥ (भज …)

(जटिल: मुण्डी लुञ्चित-केशः काषाय-अंबर-बहु-कृत-वेषः पश्यन् अपि च न पश्यति लोक: हि उदर-निमित्तं बहु-कृत-शोक: ।)

अर्थ – पेट के खातिर चिन्ता से ग्रस्त व्यक्ति सिर पर जटाएं धारण कर के या सिर मुढ़ा के, गेरुआ वस्त्र धारण कर के, अथवा तरह-तरह के वेष धारण करके कई उपक्रम करता है।

यह श्लोक यह बताता है कि मनुष्य की पहली चिंता होती है शरीर धारण करने के उपाय करना। आज के युग में आपको अनेक तथाकथित साधु-संत, बाबा-महात्मा मिल जायेंगे जो तमाम तरह की लच्छेदार बातें करके, असामान्य वेषभूषा धारण करके, स्वयं को आध्यात्मिक गुरु घोषित करके या इसी प्रकार के अन्य उपक्रम करके आम जनों को प्रभावित करने में सफल होते है और स्वयं चैन से जीवन-यापन करते हैं। यह श्लोक कदाचित् इस वर्ग के लोगों पर एक टिप्पणी है। याद रहे यह सब भारत के हिन्दू समाज के संदर्भ में ही सही है। अन्य समाजों में इस प्रकार के प्रयास शायद नहीं किए जाते हैं। धर्म के नाम पर हिन्दू समाज को सरलता से मूर्ख बनाया जा सकता है ऐसा मेरा सोचना है।

भगवद्गीता किञ्चिदधीता गङ्गाजललवकणिका पीता ।

सकृदपि यस्य मुरारिसमर्चा तस्य यमः किं कुरुते चर्चाम्‍ ॥५॥ (भज …)

(भगवद्गी ताकिञ्चित्‍ अधीता गङ्गा-जल-लव-कणिका पीता सकृत्‍ अपि यस्य मुरारि-सम्‍-अर्चा तस्य यमः किम्‍ कुरुते चर्चाम्‍ ।)

अर्थे – जिस व्यक्ति ने भगवद्गीता का कुछ भी अध्ययन किया हो, गंगाजल का एक कण या बूंद भी पिया हो, भगवान् श्रीकृष्ण “मुरारि” की कुछ भी आराधना-अर्चना की हो, उसकी यम भी क्या चर्चा करेंगे?

जिस व्यक्ति ने धर्मकर्म में मन लगाया हो और ईश्वर-भक्ति में समय-यापन किया हो उसको मरणकाल पर कष्ट देने की यमराज भी नहीं सोचते होंगे मेरे मत में ऐसा इस छंद का निहितार्थ होगा। छंद में भगवद्गीता-अध्ययन आदि की जो बातें कही गई हैं वे पुण्यकर्म के प्रतीक हैं। भगवद्भजन एवं पुण्यकर्म में लगे हुए व्यक्ति को व्रुद्धावस्था एवं मृत्यु भय कम होता है। यह बात कितना सही होगी यह मैं कह नहीं सकता। (मुर एक राक्षक का नाम था जिसको भगवान् श्रीकृष्ण ने मारा था। इसलिए उनका नाम मुरारि = मुर+अरि = मुर के शत्रु भी है।)योगेन्द्र जोशी

“न मुञ्चति आशावायुः” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् – १

आदिशंकराचार्य ने वैदिक उपनिषदों के भाष्यों के साथ-साथ अनेक छोटी-बड़ी रचनाएं लिखी हैं। उनमें से एक है चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्। मैंने इसे गीताप्रेस, गोरखपुर, द्वारा प्रकाशित “स्तोत्ररत्नावली” नामक पुस्तक से लिया है। चर्पट का शाब्दिक तात्पर्य है चपत अर्थात् चांटा, पञ्जरिका का पिंजड़ा और स्तोत्र का स्तुति हेतु उच्चारित शब्द। रचना के उक्त नाम का क्या अर्थ निकलता है यह मैं नहीं समझ पाया। मुझे लगता है कि “चर्पट” के स्थान पर “कर्पट” होना चाहिए जिसका अर्थ होता है “चिथड़ा”। तब “चर्पटपञ्जरिका” का अर्थ चिथड़ों से बना पिंजड़ा लिया जा सकता है।

उक्त रचना में कुल सत्रह छंद हैं। उनके अतिरिक्त अधोलिखित एक स्थायी छंद और है जो अन्य छंदों में से हरएक के बाद प्रयुक्त हुआ है:

भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ्‍करणे ॥

(मूढमते, गोविन्दम् भज, गोविन्दम् भज, गोविन्दम् भज। सन्निहिते प्राप्ते मरणे “डुकृञ् करणे” नहि नहि रक्षति।)

स्तोत्र के हरएक अन्य छंद के बाद उपर्युक्त छंद के प्रयोग का क्रम गायन में प्रयुक्त अंतरा एवं स्थायी के क्रम के अनुरूप है। इन सभी छंदों में श्री शंकराचार्य ने जीवन की नश्वरता को समझने और ईश्वरभक्ति में रुचि लेने का संदेश दिया है। वे यह बताते हैं किस प्रकार वृद्धावस्था आते-आते मनुष्य शरीर से अशक्त हो जाता है, परिवार एवं समाज में उसकी अह्मियत समाप्त हो जाती है, लोग पर्याप्त सम्मान देना बंद कर देते हैं, इत्यादि। मैं इस एवं आगामी आलेखों की शृंखला में इन छंदों को तीन-तीन की संख्या में उद्धृत कर रहा हूं:

पहले उपर्युक्त छंद का

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब तुम्हारा मरणकाल पास आ जायेगा तब यह “डुकृञ् करणे” की रट तुम्हें नहीं बचाएगी।
मेरी समझ में यह “डुकृञ्‍करणे” प्रतीक है उन ऐहिक काम-धंधों का जिनमें मनुष्य उलझा रहता है। असल में “डुकृञ्” संस्कृत व्याकरण की एक क्रियाधातु है जिसका अर्थ “(कर्वव्य) करना” है। इसका तथा इसके “डु” हटाकर प्राप्त तुल्य क्रियाधातु “कृञ्” का प्रयोग संस्कृत-व्यवहार में सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। अर्थात् इस कृयाधातु पर बहुत दिमाग खपाना एक प्रकार से निरर्थक है। व्याकरण के अध्येता उक्त क्रियाधातु के अर्थ याद करने के लिए कदाचित “डुकृञ् करणे” (तात्पर्य – कर्म करने के प्रयोजन हेतु डुकृञ्) रटते होंगे। मेरी समझ में स्तोत्र के रचनाकार की दृष्टि के अनुसार जीवन के अंतकाल तक सांसारिक कार्यों में ही लिप्त रहना निरर्थक है यह भाव “डुकृञ् करणे” याद रखने में प्रतिबिंबित होता है। रचना के अगले दो छंद आगे उद्धृत हैं:

दिनमपि रजनी सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायाताः ।

कालः क्रीडति गच्छत्यायुस्तदपि न मुञ्चत्याशावायुः ॥१॥ भज …

(दिनम् रजनी अपि सायम् प्रातः शिशिर-वसन्तौ पुनः आयाताः कालः क्रीडति आयुः गच्छति तद्‍-अपि आशा-वायुः न मुञ्चति ।)

अर्थ – दिन तथा रात, प्रातः, सायं शिशिर एवं वसंत ऋतु फ़िर-फ़िर आते हैं। समय खेलता है, आयु व्यतीत होती है, फ़िर भी आशा रूपी प्राणवायु छूटती नहीं।

यहां शिशिर एवं वसंत सभी छ: ऋतुओं (क्रमशः वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, पावस, शरद्‍, हेमंत तथा शिशिर) के सामूहिक प्रतीक हैं। छंद का भाव है कि काल अर्थात् समय प्राणियों के साथ खिलवाड़ करता है, समय का बीतना तमाम घटनाओं के रूप में दिखता है, और् मनुष्य की शेष आयु घटती जाती है। इतना सब होने पर भी मनुष्य भविष्य की आशा पाले रह्ता है।

अग्रे वह्निः पृष्ठे भानू रात्रौ चिबुकसमर्पितजानुः ।

करतलभिक्षा तरुतलवासस्तदपि न मुञ्चत्याशापाशः ॥२॥ भज …

(वह्निः अग्रे भानू पृष्ठे रात्रौ चिबुक-समर्पित-जानुः करतल-भिक्षा तरु-तल-वासः तद्‍-अपि आशा-पाशः न मुञ्चति ।)

अर्थ – सामने अग्नि और पीछे सूर्य रहते हैं; ठुड्डी घुटनों के बीच समाई रहती है; हथेली में भिक्षा मांगना और वृक्ष के नीचे रहना पड़ता है। फिर भी आशा के बंधन से मनुष्य मुक्त नहीं होता है।

यह छंद मनुष्य की वृद्धावस्था का वर्णन करता है कि ठंड से बचने के लिए उसे पीठ की तरफ़ सूर्य के घाम अथवा पेट की ओर अग्नि के ताप का सहारा लेना होता है। अन्यथा घुटनों के बीच सर रखकर गरमाहट लेनी होती है। स्थिति दयनीय हो चुकती है, लेकिन आशा का बंधन उसे संसार से जोड़े रखता है। – योगेन्द्र जोशी

न शूद्र-राज्ये निवसेत् … – मनुस्मृति में शूद्र-“अस्पृश्यता”

मनुस्मृति धर्मकर्म या रिति-रिवाजों से संबंधित एक विवादास्पद ग्रन्थ है। इस ग्रंथ में बहुत-सी बातें हैं जिन पर आपत्ति नहीं की जा सकती है, बल्कि उन्हें स्वस्थ-सभ्य समाज के अनुरूप माना जायेगा। मनुस्मृति का “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते … “ कथन लोगों के मुख से अक्सर सुन्ने को मिलते हैं। निःसंदेह इस कथन में अनुकरणीय सलाह निहित है। किंतु इसी ग्रंथ में स्त्रियों के लिए कर्तव्याकर्तव्य की ऐसी अनेक बातें भी कही गई हैं जिसे महिला संगठन अमान्य कहेंगे। मैंने अपने वर्तमान ब्लॉग में मनुस्मृति पर आधारित तीन आलेख पहले कभी लिखे थे। देखें नारी संबंधी (2009-09-11), शुचिता संबंधी (2011-01-18), एवं शासकीय दंड संबंधी (2011-05-14) ब्लॉग प्रविष्टियां ।

https://vichaarsankalan.wordpress.com/2009/09/11/

https://vichaarsankalan.wordpress.com/2011/01/18/

https://vichaarsankalan.wordpress.com/2011/05/14/

मैं मौजूदा इस आलेख में हिन्दुओं में प्रचलित वर्ण-व्यवस्था के चतुर्थ वर्ण – “शूद्र” नाम से संबोधित – के बारे में मनुस्मृति के दो-चार श्लोकों का उद्धरण प्रस्तुत कर रहा हूं जिनमें नकारात्मक और “कदाचित्” आपत्तिजनक विचार व्यक्त किए गए हैं:

न शूद्रराज्ये निवसेन्नाधार्मिकजनावृते ।

न पाषण्डिगणाक्रान्ते नोपसृष्टेऽन्त्यजैर्नृभिः ॥

(मनुस्मृति, अध्याय 4, श्लोक 61)

(न शूद्र-राज्ये, न अधार्मिक-जन-आवृते, न पाषण्डि-गण-आक्रान्ते, न अन्त्यजैः नृभिः उपसृष्टे निवसेत्।)

अर्थ – (व्यक्ति को) शूद्र से शासित राज्य में, धर्मकर्म से विरत जनसमूह के मध्य, पाखंडी लोगों से व्याप्त स्थान में, और अन्त्यजों के निवासस्थल में नहीं वास नहीं करना चाहिए।

यहां व्यक्ति से तात्पर्य होना चाहिए उस व्यक्ति से जो वर्ण के अनुसार शूद्र से भिन्न हो, अर्थात वह जिसे आम तौर पर सवर्ण कहा जाता है (ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य)। धर्मकर्म से विरत उनको कहा जायेगा जो सवर्ण होते हुए धर्मानुकूल आचरण नहीं करते हैं। पाखंडी और धर्म-विमुख जनों में मुझे कोई अंतर नहीं दिखता। अंत्यज के अर्थ बहुत स्पष्ट नहीं हैं। मेरी समझ के अनुसार इस वर्ग में विधर्मी जनों को गिना जायेगा और उन्हें भी जो वर्णव्यवस्था को नकार कर अपनी स्वतंत्र व्यवस्था के अनुसार रहते हों। “चांडाल” को भी इसमें गिना जाता है, किंतु मैं चांडाल किसे कहा जाता है यह आज तक नहीं जान पाया! अस्तु।

आज के विशुद्ध भौतिकवादी युग में हर व्यक्ति का जीवनोद्येश्य एक ही है: किसी भी व्यवसाय से धनोपार्जन करना। कर्म के अनुसार देखा जाये तो किसी भी व्यक्ति का कोई वर्ण नहीं रह गया। वर्ण का अर्थ जातिसूचक शब्द रह गया है और धर्म स्वयं में दिखावा मात्र।

न शूद्राय मतिं दद्यान्नोच्छिष्टं न हविष्कृतम्।

न चास्योपदिशेद्धर्मं न चास्य व्रतमादिशेत्॥

(मनुस्मृति, अध्याय 4, श्लोक 80)

(शूद्राय मतिम् न दद्यात्, न उच्छिष्टम्, न हविष्कृतम्, न च अस्य धर्मम् उपदिशेत्, न च अस्य व्रतम् आदिशेत्।)

अर्थ – किसी प्रयोजन की सिद्धि को ध्यान में रखते हुए दिया जाने वाला उपदेश शूद्र को न दिया जाये। उसे जूठा यानी बचा हुआ भोजन न दे और न यज्ञकर्म से बचा हविष्य प्रदान करे। उसे न तो धार्मिक उपदेश दिया जाये और न ही उससे व्रत रखने की बात की जाये।

जूठा का मतलब उस खाने से है जो किसी के लिए परोसा गया हो और छोड़ दिया गया हो। जूठे से तात्पर्य उस भोजन से नहीं लिया जाना चाहिए जो खाते-खाते थाली में बच जाये। यज्ञकर्म हेतु अग्निकुंड में जिस पदार्थ की आहुति दी जाती है उसे  हविष्य कहा जाता है। यह घी या मक्खन हो सकता है, पर्वों पर बने पकवान हो सकते हैं, अथवा तिल, घी, चंदन-चूर्ण आदि का मिश्रण हो सकता है। व्रत से तात्पर्य है पापकर्मों से मुक्ति के निमित्त उपवास, दान, आदि के रूप में किए जाने वाला प्रायश्चित्त।

नाद्याच्छूद्रस्य पक्वान्नं विद्वानश्राद्धिनो द्विजः ।

आददीताममेवास्मादवृत्तावेकरात्रिकम्॥

(मनुस्मृति, अध्याय 4, श्लोक 223)

(विद्वान् द्विजः अश्राद्धिनः अस्य पक्व-अन्नम् न अद्यात्, अवृत्तौ अस्मात् एक-रात्रिकम्  अमम्  एव आददीत ।)

अर्थ – विद्वान्‍ द्विज अश्राद्धिन्‍ शूद्र द्वारा पकाया हुआ भोजन न खावे। परंतु तात्कालिक आर्थिक व्यवस्था न कर पाने की स्थिति में उससे एक रात्रि भर का कच्चा भोजन ग्रहण कर ले।

द्विज शब्द शूद्रेतर तीनों वर्णों के संस्कारित जन के लिए प्रयुक्त होता है। संस्कारित वह है जिसका उपनयन संस्कार हुआ हो। इस संस्कार के अंतर्गत व्यक्ति गुरु से शिक्षित होता है और ऐसा होना द्वितीय जन्म के तुल्य होता है। संस्कार के अभाव में व्यक्ति को पूर्व काल में शूद्र के तुल्य समझा जाता था। आज के युग में उपनयन की प्रथा बहुत कम प्रचलन में रह गयी है। ब्राह्मण जाति में भी यह परंपरा टूट रही है। इस दृष्टि से प्रायः सभी शूद्र हैं। अश्राद्धिन वह व्यक्ति है जो श्राद्ध आदि कर्म न करता हो; शूद्रों के लिए ये कार्य वर्जित कहे गये हैं। कच्चा भोजन वह है जिसे आग से न पकाया गया हो। आटा-दाल-चावल पकाये जाने से पहले कच्चे कहे जायेंगे।

न विप्रं स्वेषु तिष्ठत्सु मृतं शूद्रेण नाययेत्।

अस्वर्ग्या ह्याहुतिः सा स्याच्छूद्रसंस्पर्शदूषिता ॥

(मनुस्मृति, अध्याय 5, श्लोक 104)

(मृतम् विप्रंम्  स्वेषु तिष्ठत्सु शूद्रेण न नाययेत्, सा शूद्र-संस्पर्श-दूषिता आहुतिः अस्वर्ग्या हि स्यात्।)

अर्थ – बंधु-बांधओं के उपलब्ध रहते हुए मृत ब्राह्मण का शरीर शूद्र के द्वारा बाहर न निकलवाए। शरीर के शूद्र के स्पर्श से दूषित होना ब्राह्मण के स्वर्गप्राप्ति में बाधक होती है।

यहां आहुति का क्या अर्थ है मैं समझ नहीं पाया। इन श्लोकों में शूद्र को खुलकर अस्पृश्य नहीं कहा गया है, किंतु जो कुछ कहा गया वह स्पष्ट करता है कि शूद्र कहे जाने वाले को शेष समाज हेय दृष्टि से देखता आ रहा है। सवर्णों का यह व्यवहार परंपरा के रूप में कब स्थापित हुआ होगा कहना मुश्किल है। कई “पंडित” जन ऋग्वेद के “ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू …” (ऋग्वेद संहिता, मण्डल 10, सूक्त 90, ऋचा 12) एवं मनुस्मृति के “लोकानां तु विवृद्ध्यर्थं …” (मनुस्मृति, अध्याय 1, श्लोक 31) का उल्लेख करते हुए शूद्रों की हीनता को सिद्ध करते हैं। मैंने एक आलेख में ऋग्वेद के उक्त श्लोक की व्याख्या अपने प्रकार से की है (देखें ब्लॉग-प्रविष्टि 2013-9-26)

जो प्रचलित व्याख्या से पूर्णतः भिन्न है। मनुस्मृति के उपर्युक्त एवं अन्य कुछ कथन प्रचलित व्याख्या के पक्ष में जाते हैं। किंतु मेरा मत है कि वैदिक काल में स्थिति एकदम भिन्न रही होगी और पौराणिक काल से वर्ण-व्यवस्था में शनैःशनिः विकार आना शुरू हुआ होगा।

अस्तु, पाठक स्वविवेक से अपना मत नियत कर सकते हैं। -योगेन्द्र जोशी

संन्यास-धर्म के बारे में महाभारत में व्यक्त विचार – परिव्रजन्ति दानार्थं मुण्डाः काषायवाससः (4)

संन्यास धर्म के बारे महाभारत ग्रंथ में बहुत-सी बातें कही गई हैं । उनमें से कुछ चुनी हुई बातों का उल्लेख मैंने पिछले तीन आलेखों में किया है

(दिनांक ११ मई, ७ जून, एवं २७ जुलाई) । चार आलेखों की इस शृंखला का चतुर्थ एवं अंतिम आलेख यहां पर प्रस्तुत है ।

महाभारत ग्रंथ के शान्तिपर्व में कौरव-पांडव युद्ध की समाप्ति के बाद की स्थितियों का वर्णन है । उसी के अंतर्गत एक प्रकरण है जिसके अनुसार युद्ध के दुःखद परिणामों से विचलित होकर राजा युधिष्ठिर राजकाज छोड़कर संन्यास ग्रहण करने का विचार अपने भाइयों के समक्ष रखते हैं । द्रौपदी समेत सभी भाई उनके विचार को नकारते हुए सलाह देते हैं कि उन्हें जनता का हित साधने के लिए राजकाज चलाना चाहिए । वार्तालाप के उस सिलसिले में अर्जुन गेरुआवस्त्रधारी तथाकथित साधु-महात्माओं की कटु आलोचना भी कर डालते हैं । वे कहते हैं कि ऐसे कई लोग ढोंगी होते हैं और आम जन को मूर्ख बनाकर अपनी जीविका चलाते हैं । तत्संबंधित दो कथन आगे प्रस्तुत हैं:

परिव्रजन्ति दानार्थं मुण्डाः काषायवाससः ।

सिता बहुविधैः पाशैः सञ्चिन्वन्तो वृथामिषम् ॥32॥

(महाभारत, शान्तिपर्व, राजधर्मानुशासनपर्व, अध्याय 18)

(परि-व्रजन्ति दान-अर्थम् मुण्डाः काषाय-वाससः सिता बहु-विधैः पाशैः सञ्चिन्वन्तः वृथा आमिषम् ।)

अर्थ – मानव समाज में गेरुआ वस्त्र धारण किए हुए, विविध प्रकार के बंधनों से बंंधे हुए, भोग-लालसा की खोज में लगे हुए, कुछ लोग दान पाने की इच्छा से विचरण करते हैं ।

‘दान पाने की इच्छा’ का यहां पर तात्पर्य है बिना परिश्रम किए हुए दूसरों से धन-संपदा पाने का रास्ता अपनाना । संन्यासी सरीखे दिखने वाले वे सम्मोहक बातों से लोगों में यह भ्रम पैदा करते हैं कि वे धर्म एवं अध्यात्म परम ज्ञाता हैं और सांसारिक मोहमाया से मुक्त हैं । गंभीरता से ध्यान देने पर पता चलता है कि वे अपनी भोगेच्छाओं की पूर्ति के लिए भ्रमजाल फैलाने में दक्ष होते हैं । आम जनों में अनेक उनके शब्दजाल में ऐसे फंसते हैं कि उनके असली इरादों को भांप ही नहीं पाते । हिंदू जनमानस चूंकि गेरुआ वस्त्र को संन्यासधर्मी की पहचान मानते हैं इसलिए जो भी ये स्वांग रचता है उसके चंगुल में लोग फंस जाते हैं । वे मोहमाया में फंसे हैं इस बात को लोग सोच भी नहीं पाते । इस प्रकार गेरुआवस्त्रधारी वे लोगों की निरीहता का लाभ उठाते हैं ।

अनिष्कषाये काषायमीहार्थमिति विद्धि तम् ।

धर्मध्वजानां मुण्डानां वृत्त्यर्थमिति मे मतम् ॥34॥

(यथोपर्युक्त)

(अ-निस्-कषाये काषायम् इह अर्थम् इति विद्धि तम् धर्म-ध्वजानां मुण्डानां वृत्ति-अर्थम् इति मे मतम् ।)

अर्थ – दूषित मन के साथ गेरुआ (या केसरिया) चोला पहनने को स्वार्थ-साधन समझा जाना चाहिए । ऐसे नरों का (मिथ्या) धर्म के नाम का झंडा उठाकर चलना वस्तुतः जीविका चलाने का धंधा है ऐसा मेरा (प्रसंगानुसार अर्जुन का) मत है । (निष्कषाय = स्वच्छ, मैलरहित, निष्कपट)

गेरुआवस्त्रधारी व्यक्ति का मन क्या अनिवार्यतः निष्कपट होता है यह प्रश्न हर व्यक्ति के मन में उठना चाहिए । ऐसे वस्त्र छलकपट करके स्वार्थसिद्धि के साधन भी हो सकते हैं, क्योंकि सामान्य जनों को इन्हें देखकर यह भ्रम होता है कि वस्त्रधारी मोहमाया और भौतिक लालसाओं से विरक्त योगी होता है । वास्तविकता बहुधा इसके विपरीत होती है । गंभीरता से परीक्षण करने पर देखने को मिलता है कि वे भौतिक सुखों में लिप्त रहते हैं । जब महाभारत काल में ऐसे ढोंगी हो सकते थे तो आज भौतिकवादी युग में उनका होना आश्चर्य की बात नहीं है । यहां गेरुआ वस्त्र मात्र प्रतीक है । ढोंगी श्वेतवस्त्रधारी भी हो सकता है । अनेकों ऐसे रूप यह धर सकता है जिससे लोग उसे सिद्ध महात्मा समझ बैठे एवं उसके प्रति खिंचे चले आवें और वह उनकी सिधाई का लाभ उठाये । आजकल हमारे समाज में पग-पग पर ऐसे धोखेबाज मिल रहे हैं ।

धर्म के नाम पर आम जनों को धोखा देने में दक्ष तथाकथित धर्मरक्षकों के बारे में उक्त ग्रंथ के शान्तिपर्व के अन्य अध्याय में अधोलिखित बात कही गयी है । प्रसंग है पांडव-पितामह भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को नीति संबंधी उपदेश दिया जाना ।

अन्तःक्रूरा वाङ्मधुराः कूपाश्छन्नास्त्रिणैरिव ।

धर्मवैतं सिकाःक्षुद्रा मुष्णन्ति ध्वजिनो जगत् ॥18॥

(महाभारत, शान्तिपर्व, राजधर्मानुशासनपर्व, अध्याय 158)

(अन्तः-क्रूराः वाक्-मधुराः कूपाः छन्नाः त्रिणैः इव धर्मौ एतम् सिकाः क्षुद्राः मुष्णन्ति ध्वजिनः जगत् ।)

अर्थ – जो भीतर से क्रूर होते हैं किंतु मधुर वाणी बोलते हैं वे घासफूस से ढके कुंए के समान होते है । इसी प्रकार धर्म के नाम पर धोखा देने वाले क्षुद्र स्तर के लोग धर्म का झंडा लिए हुए संसार को लूटते हैं ।

कहा जाता है कि जंगली जानवरों को पकड़ने के लिए धोखा देकर गड्ढे में फंसाया जाता है । गड्ढे को घासफूस से ऐसे ढक दिया जाता है कि जानवर को उसका तनिक भी एहसास न हो । उस छिपे गड्ढे को पार करने पर वह जानवर उसमें गिर पड़ता है। प्रस्तुत नीतिवचन के अनुसार गेरुआवस्त्रधारियों के इरादा भी उक्त तरीके का ही होता है ।

इस कथन का तात्पर्य है कि धर्म के नाम पर धोखाधड़ी कोई नयी बात नहीं है । धर्म के ठेकेदार भी एक प्रकार के लुटेरे होते हैं । कुछ की हरकतें तो खुल्लमखुल्ला गुंडागर्दी की होती हैं जैसा कि आजकल देखने को मिल रहा है । कई ऐसे होते है जिनके मन में छल-कपट होता है परंतु व्यवहार में वे मोहक वाणी बोलते हैं जिससे उनके असली इरादे छिप जाते हैं । जैसा पहले कहा जा चुका है वे आम जनों से किसी न किसी रूप में धन एवं सुखसाधन पा जाते हैं । वे बहुत बारीकी से हमें लूट रहे हैं इस बात का एहसास आम जनों को नहीं हो पाता है ।

इस स्थल पर मैं मनुस्मृति से भी एक उद्धरण प्रस्तुत कर रहा हूं जो कहता है कि बाह्य प्रतीक धर्म के लक्षण नहीं होतेः

दूषितोऽपि चरेद्धर्मं यत्र तत्राश्रमे रतः ।

समः सर्वेषु भूतेषु न लिङ्गं धर्मकारणम् ॥

(मनुस्मृति 6, 66)

(दूषितः अपि चरेद् धर्मम् यत्र तत्र आश्रमे रतः समः सर्वेषु भूतेषु न लिङ्गं धर्म-कारणम् ।)

अर्थ – यहां-वहां जिस किसी आश्रम में रहते हुए दूषित होने पर भी धर्मानुसार आचरण करे । सभी प्राणियों को समान दृष्टि से देखे । प्रतीकों का धारण करना धर्म के कारण नहीं होता  ।

दूषित का अर्थ में कि स्थान-विशेष के नियमों का ठीक से पालन न कर पाना । ऐसे दोष के बावजूद उसे धर्माचरण यथावत करते रहना चाहिए ।प्रतीकों से अर्थ है गेरुआ या श्वेत प्रकार के वस्त्र धारण करना, माथे पर चंदन-तिलक लगा के रहना, शरीर पर राख चुपड़ना इत्यादि । इन सबको धर्म के कारण नहीं किया जाता । अर्थात् इनका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है । धर्म तो व्यक्ति के आचरण में परिलक्षित होता है । मन का निष्कपट होना, सत्य, निष्ठा, अहिंसा, परोपकार आदि में स्वयं को लगाना, अर्थात् सन्मार्ग पर चलना ही धर्म है ।

भोग-विलास में लिप्त व्यक्ति भला संन्यासी कैसे हो सकता है । सुखसाधनों से दूर रहना तो संन्यासी के आचरण का अभिन्न अंग है । आपने किसी कथित संत महात्मा को देखा है जो जमीन में साधारण से आसन पर बैठकर बातें करता हो ? वातानुकूूलित यान से यात्रा न करता हो ? मुझे तो अपने शंकराचार्यों पर भी तरस आता है कि वे स्वयं को संन्यासी कहते हैं और उच्च सिंहासन पर विराजमान रहते हैं । क्या आदि शंकराचार्य ऐसा ही करते थे ?

मेरे मन में आजकल के इन संतों-महात्माओं के प्रति कोई सम्मान जागृत नहीं होता । – योगेन्द्र जोशी

 

संन्यास.धर्म के बारे में महाभारत में व्यक्त विचार – अहिंसकः समः … (3)

महाकाव्य महाभारत में महर्षि व्यास द्वारा अपने पुत्र शुकदेव को दिए गए धर्मोपदेश के अंतर्गत संन्यास धर्म की बातें भी कही गई हैं । पिछले दो ब्लॉग-प्रविष्टियों (दिनांक 11 मई 2016 एवं 7 मई 2016) में मैंने उस लंबे संवाद से संबंधित कुछ चुने हुए श्लोकों को उद्धृत किया था । अधोलिखित विवेचना में मैं चुने हुए अन्य तीन श्लोकों को प्रस्तुत कर रहा हूं ।

अहिंसकः समः सत्यो धृतिमान्नियतेन्द्रियः ।

शरण्यः सर्वभूतानां गतिमाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥20

(महाभारत, शान्तिपर्व, मोक्षधर्मपर्व, अध्याय 245)

(अहिंसकः समः सत्यः धृतिमान् नियत-इन्द्रियः शरण्यः सर्व-भूतानाम् गतिम् आप्नोति अन्-उत्तमाम् ।)

हिंसा की भावना से मुक्त, सबके प्रति समान भाव वाला, सत्यनिष्ठ, धैर्यवान, संयमित इंद्रियों वाला, सभी प्राणियों के शरण के योग्य मनुष्य उत्तमतम गति प्राप्त करता है । (अनुत्तमाम्  के स्थान पर अत्युत्तमाम्  भी हो सकता है।)

          इस श्लोक में अनुत्तमाम् शब्द का अर्थ है वह जिससे उत्तमतर कुछ न हो यानी सर्वोत्तम (न+उत्तम) । सामान्यतः इसका अर्थ लिया जाएगा जो अच्छा नहीं हो  । ग्रंथ का कहना है कि उक्त गुणों से संपन्न संन्यासी परलोक में उत्तमतर दशा प्राप्त करता है, अपने सत्कर्मों का फल भोगता है ।

विमुक्तं सर्वसङ्गेभ्यः मुनिमाकाशवत् स्थितम् ।

अस्वमेकचरं शान्तं तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥22

(यथोपर्युक्त)

(विमुक्तम् सर्व-सङ्गेभ्यः मुनिम् आकाशवत् स्थितम् अस्वम् एकचरं शान्तम् तम् देवाः ब्राह्मणम् विदुः ।)

जो पुरुष सभी के साथ की इच्छा से मुक्त हो, मौनव्रती तपस्वी हो, आकाश की तरह स्थिर हो, ‘मेरा है’की भावना से ग्रस्त न हो, अकेला विचरण करने वाला हो, शांतचित्त हो, उसे देवतागण ब्राह्मण कहते हैं ।

          ध्यान रहे कि इस स्थल पर ब्राह्मण शब्द का अर्थ प्राचीन सामाजिक वर्ण-व्यवस्था के चार वर्णो में से एक ‘ब्राह्मण’नहीं है । यहां इसका अर्थ ब्रह्मवेत्ता अर्थात् ज्ञानी लिया जाना चाहिए । वर्णाश्रम व्यवस्था में भी ब्राह्मण वह होता था जिसे आध्यात्मिक ज्ञान हो और जो लोगों को शिक्षित करता हो । संन्यासी के लिए समूह में रहना वर्जित रहा है, क्योंकि उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह सबसे संबंध तोड़कर मेरे-तेरे की भावना से मुक्त हो चुका हो ।

निराशिषमनारम्भं निर्नमस्कारमस्तुतिम् ।

निर्मुक्तं बन्धनैः सर्वैस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥24

(यथोपर्युक्त)

(निर्-आशिषम् अन्-आरम्भं निर्-नमस्कारम् अस्तुतिम् निर्-मुक्तम् बन्धनैः सर्वैः तम् देवाः ब्राह्मणम् विदुः ।)

जिसे कामनाएं न हों, जो कुछ अर्जित करने का प्रयास न करे, जिसे दूसरों से नमस्कार या सम्मान की अपेक्षा न हो, जो प्रशंसा की इच्छा न रखता हो, सभी बंधनों से मुक्त हो, उसे देवतागण ब्राह्मण अथवा संन्यासी कहते हैं ।

          उपर्युक्त श्लोक में संन्यासी के अतिरिक्त गुणों का उल्लेख किया गया है । सार-संक्षेप यह है कि संन्यासी सभी इच्छाओं-आकांक्षाओं-अपेक्षाओं के परे होता है । हर व्यक्ति का सबसे बड़ा बंधन उसका स्वयं का परिवार होता है, उसके बाद संबंधियों-मित्रों से वह बंधा रहता है । संन्यासधर्म में प्रवेश करने के लिए सर्वप्रथम इन रिश्तों को तोड़ना होता है । तत्पश्चात् अपनी सभी सांसारिक कमजोरियों से अपने को अलग करना होता है । यह प्रक्रिया प्रबल संकल्प-शक्ति की मांग करता है ।

क्या आज के युग में इस संन्यासधर्म के अनुसार चलने वाला कोई है ? महाभारत ग्रंथ में यह भी स्पष्ट किया गया है कि गेरुआ वस्त्र धारण करने से कोई संन्यासी नहीं होता । इस बात की चर्चा अगले चिट्ठा-लेख में की जाएगी । – योगेन्द्र जोशी

 

 

संन्यास धर्म के बारे में महाभारत में व्यक्त विचार – न क्रुद्ध्येत् न प्रहृष्येत् … (2)

अपने पिछले ब्लॉग-लेख में मैंने संन्यासी एवं संन्यासधर्म के बारे में महाकाव्य महाभारत में क्या कहा गया है इसकी चर्चा की थी (देखें पोस्ट दिनांक 11 मई 2016) । वे बातें उक्त ग्रंथ में वर्णित महर्षि व्यास का अपने पुत्र शुकदेव को दिए गए धर्मोपदेश पर आधारित थीं । संबंधित वार्ता पर्याप्त लंबी है । मैं उसी प्रकरण से चुने हुए तीन अन्य श्लोकों को उद्धृत कर रहा हूं:

न क्रुद्ध्येन्न प्रहृष्येच्च मानितोऽमानितश्च यः ।

सर्वभूतेष्वभयदस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥14

(महाभारत, शान्तिपर्व, मोक्षधर्मपर्व, अध्याय 245)

(न क्रुद्ध्येत् न प्रहृष्येत् च मानितः अमानितः च यः सर्वभूतेषु अभयदः तम् देवा ब्राह्मणम् विदुः ।)

अर्थ – जो व्यक्ति सम्मान दिए जाने अथवा अपमान किये जाने पर न तो प्रसन्न होता है और न ही नाखुश, और जो सभी प्राणियों अभय देता है उसी को देवतागण ब्राह्मण कहते है ।

यहां पर ब्राह्मण का तात्पर्य वर्णव्यवस्था के ब्राह्मण से नहीं है, बल्कि ब्रह्ज्ञानी से है । संन्यासी ही वह व्यक्ति होता है जो ब्रह्मज्ञान की दिशा में आगे बढ़ रहा होता है । ऐसे व्यक्ति के लिए मान-अपमान की कोई सार्थकता नहीं रह जाती है । वह इनके प्रति उदासीन भाव रखता है यानी मान-अपमान के प्रति वह कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करता है । अभयद का अर्थ है अभयदान देने वाला यानी जिससे किसी को भय नहीं होता । संन्यासी जब किसी से नाखुश नहीं होता है और तदनुसार किसी का अहित नहीं करता है तो उससे किसी को भय नहीं हो सकता है ।

नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देत जीवितम् ।

कालमेव प्रतीक्षेत निदेशं भृतको यथा ॥15

(यथोपर्युक्त)

(न अभि-नन्देत मरणम् न अभि-नन्देत जीवितम् कालम् एव प्रतीक्षेत निदेशम् भृतकः यथा ।)

अर्थ – संन्यासी न तो मृत्यु की इच्छा करता है और न ही जीवित रहने की कामना । वह बस काल (समय) की प्रतीक्षा करता है जैसे कि सेवक अपने स्वामी के निदेशों का ।

संन्यासी जीवन तथा मृत्युु के प्रति उदासीन भाव प्राप्त कर चुका होता है । तब उसे इन दो में से किसी के भी प्रति आकर्षण अथवा विलगाव नहीं रह जाता है । उसे न तो सुख-सुविधाओं के साथ जीते रहने की कामना रहती है और न ही मृत्यु का भय सताता है । अतः वह न तो येनकेन प्रकारेण जीवित रहने के प्रयास (यथा अस्पताल में भरती होना) करता है और न ही अस्वाभाविक मृत्यु (यथा आत्महत्या) का विकल्प चुनता है ।

अनभ्याहतचित्तः स्यादनभ्याहतवाग् भवेत् ।

निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यो निरमित्रस्य किं भयम् ॥16॥

(यथोपर्युक्त)

(अन्-अभि-आहत-चित्तः स्यात् अन्-अभि-आहत-वाग् भवेत् निर्-मुक्तः सर्व-पापेभ्यः निर्-अमित्रस्य किम् भयम् ।)

अर्थ – संन्यासी के चित्त में अहितकारी विचार न हों, उसके वचन कष्ट पहुंचाने वाले न हों । जो सभी पापकर्मों से मुक्त हो उसका क्या भय हो सकता है ?

तात्पर्य यह है कि संन्यासी को मन, वचन, कर्म – सभी प्रकार से – स्वच्छ एवं अकलुषित होना चाहिए । वह किसी के अहित की नहीं सोचे तो भला उससे किसी को क्या भय हो सकता है ।

हमारे समाज में गेरुआ वस्त्रधारियों की कोई कमी नहीं है, पर क्या वे वस्तुतः संन्यासी हैं यह विचारणीय प्रश्न है । अगली पोस्ट में कुछ और बातों का उल्लेख किया जाना है । – योगेन्द्र जोशी

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