“चरैवेति चरैवेति” (ऐतरेय ब्राह्मण) – (3) “चरैवेति” का उपदेश एवं ब्राह्मण बालक शुनःशेप की कथा

पिछली दो ब्लॉग-प्रविष्टियों (अक्टूबर 3 तथा अक्टूबर 5, 2015) में मैंने राजा हरिश्चंद्र और उनके पुत्र रोहित की कथा का वर्णन करते हुए इस बात का उल्लेख किया था कि कैसे ब्राह्मण भेषधारी इंद्र द्वारा “चरैवेति” के उपदेश से प्रेरित होकर रोहित करीब पांच वर्ष तक देश-प्रदेश में विचरण करता रहा । पांचवें वर्ष के अंत पर जब वह घर लौटने को उद्यत हुआ तो मार्ग में उसे ब्राह्मण भेष में पुनः इंन्द्र देवता मिल गए । उन्होंने पिछली बारों की तरह “चरैवेति” का उपदेश दिया और कहा –

चरन् वै मधु विन्दति चरन् स्वादुमुदुम्बरम् ।

सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरंश्चरैवेति ॥

(चरन् वै मधु विन्दति, चरन् स्वादुम् उदुम्बरम्, सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यः चरन् न तन्द्रयते, चर एव इति ।)

अर्थ – इतस्ततः भ्रमण करते हुए मनुष्य को मधु (शहद) प्राप्त होता है, उसे उदुम्बर (गूलर?) सरीखे सुस्वादु फल मिलते हैं । सूर्य की श्रेष्ठता को तो देखो जो विचरणरत रहते हुए आलस्य नहीं करता है । उसी प्रकार तुम भी चलते रहो (चर एव) ।

मधु और उदुम्बर प्रतीक हैं मार्ग में उपलब्ध खाद्य पदाथों के । (शब्दकोश में उदुम्बर का अर्थ गूलर का फल दिया गया है ।) प्राचीन काल में विचरण करता हुआ व्यक्ति कभी वनों से गुजरता होगा तो कभी ऋषि-मुनियों के आश्रम में और कभी गांवों में पहुंचता होगा । उसे वन्य कंद-फल आदि के अतिरिक्त वन तथा ग्रामवासियों से आतिथ्य में विविध भोज्य पदार्थ प्राप्त होते होंगे । उक्त श्लोक उन्हीं की ओर संकेत करता है ।

ब्राह्मण की सलाह के अनुरूप कुमार रोहित छठे वर्ष भी पर्यटन पर चला गया । इस बार वनक्षेत्र में विचरण करते हुए उसकी भेंट सुयवस के पुत्र निर्धन अजीगर्त नामक ऋषि से हुई ।

अजीगर्त के तीन बालक-पुत्र थे जिनके नाम क्रमशः शुनःपुच्छ, शुनःशेप और शुनोलांगूल थे । (तीनों शब्दों, पुच्छ, शेप तथा लांगूल, का एक ही अर्थ पूंछ होता है । श्वन् = कुत्ता; शुनः = कुत्ते की; शुनःपुच्छ = कुत्ते की पूंछ । ऐसे नाम क्यों चुने गये होंगे ? मैं कह नहीं सक्ता ।) रोहित ने अजीगर्त के सम्मुख प्रस्ताव रखा कि वह किसी एक पुत्र को उसे (रोहित को) बेच दे । मूल्य रूप में उनको सौ गायें दी जाएंगी । अजीगर्त को ज्येष्ठ और उसकी पत्नी को कनिष्ठ पुत्र प्यारे थे, उन्होंने मंझले शुनःशेप को बेच दिया । रोहित उसको लेकर घर लौट आया । इसके साथ ही “चरैवेति” उपदेशों की शृखला समाप्त हो गई ।

रोहित ने शुनःशेप को पिता हरिश्चन्द्र, जो जलोदर  रोग (Hydropsy या Oedema, जिसमें शरीर के कुछ अंगों में जल भरने से सूजन पैदा हो जाती है ।)से पीड़ित थे, को सोंप दिया, ताकि उसके बदले उस बालक से वरुणदेव का यजन किया जा सके और वह स्वयं मुक्त हो जावे । कथा के अनुसार वरुणदेव को क्षत्रिय बालक के बदले ब्राह्मण बालक अधिक स्वीकार्य था ।

तत्पश्चात यज्ञ की व्यवस्था की गई, जिसमें स्वयं अजीगर्त भी सम्मिलित हुए । सभी तैयारियों के अंतर्गत जब शुनःशेप को पशु की भांति यूप पर बांधने की बारी आई तो कोई भी व्यक्ति इस पापकर्म को करने को तैयार नहीं हुआ । (यज्ञमंडप में याज्ञिक कर्मों के लिए खंभा यूप कहलाता है ।) तब अजीगर्त ने सौ गायें लेकर स्वयं ही इस कार्य को संपन्न कर दिया । यूप पर पशुवत बंधे उस बालक का बध करके बलि देने के लिए कोई तैयार न हुआ । तब अजीगर्त ने अतिरिक्त सौ गायें मांगकर उस कार्य को भी पूरा करना स्वीकार कर लिया ।

शुनःशेप को यह आभास हो गया कि एक पशु की तरह यज्ञ में उसका बध किया जाना है । यज्ञ संबंधी उसके ज्ञान के अनुसार यज्ञ की “पर्यग्नि” नामक प्रक्रिया के बाद उसे बन में छोड़ा जाना चाहिए था । किंतु वहां तो उसका बध वास्तव में किया जाने वाला है । वह आत्मरक्षा हेतु ऋग्वैदिक मंत्रों से देवताओं की अर्चना करने लगा । उसने सर्वप्रथम प्रजापति (ब्रह्मा?) की प्रार्थना की जिन्होने उसे अग्नि की स्तुति करने को कहा क्योंकि वे सभी देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं ।

अग्नि की अर्चना करने पर उस ब्राह्मण बालक को सविता (सूर्य?) की प्रार्थना करने को कहा, जो सभी जीवों के जन्मदाता-पालनकर्ता हैं । सविता ने बालक से कहा कि चूंकि उसे वरुणदेव के लिए यूप पर बांधा गया है अतः वह उन्हीं की शरण में जावे । स्तुति करने पर वरुण ने कहा कि अग्नि सभी देवताओं के मुखस्वरूप हैं, क्योंकि यज्ञ की आहुतियां उन्हीं के माध्यम से देवताओं को प्राप्त होती हैं, अतः उन्हीं की शरण में वे जावें ।

बालक ने फिर से अग्नि की स्तुति की तो अग्निदेव बोले कि तुम समस्त देवों की सामूहिक स्तुति करो । उसने वही किया । तब देवगण बोले कि वह इंद्र की प्रार्थना करे जो उन सभी में श्रेष्ठतम हैं । उसने वही किया । इंद्र ने उसके लिए एक दिव्यरथ भेज दिया और कहा कि वह अश्विनी कुमारों की स्तुति करे वही उसे छोड़ देंगे । अश्विनियों की प्रार्थना करने पर उन्होंने बालक से कहा कि वह उषा (?) की स्तुति करे ताकि सभी देवता उसे मुक्त कर दें ।

शुनःशेप ने वेद की ऋचाओं के साथ स्तुति आंरभ की । जैसे-जैसे उसने एक-एककर ऋचाओं से देवताओं की स्तुति की वैसे-वैसे उसके बंधन खुलते गए, और जलोदर से स्थूल हो चुके राजा का पेट भी सामान्य होता गया । मुक्त हो चुका बालक शुनःशेप ऋषि विश्वामित्र की गोद में स्वयं को उनका पुत्र मानते हुए बैठ गया ।

शुनःशेप के विश्वामित्र का पुत्र घोषित होने पर अजीगर्त का पुत्रमोह जाग गया । उन्होंने उसे ऐसा करने से मना किया और उनके पास वापस आ जाने का आग्रह किया । इस प्रयोजन के लिए उन्होंने पूर्व में पाये गये तीन सौ गायें राजा को लौटाने की बात भी रखी । किंतु बालक शुनःशेप ने यह कहते हुए प्रस्ताव अस्वीकृत कर दिया कि जो पिता यज्ञ में अपने पुत्र का पशुवत वध करने के कुत्सित कृत्य के लिए तैयार हो उसके पितृत्व को वह अस्वीकार करता है । देवताओं की कृपा से ऋषि विश्वामित्र उसके पिता बन गयेे ।

अंततः कतिपय टिप्पणियां

“चरैवेति चरैवेति” के नाम से तीन भागों में जिस कथा का विवरण मैंने प्रस्तुत किया है उसमें निहित संदेश वस्तुतः क्या हैं यह मैं ठीक से नहीं बता सकता । मुझे ये बातें समझ में आती हैंः

(1) पु़त्र पाने की इच्छा मनुष्य में प्राचीन काल से ही रही हैं और उसके लिए वह दैवी शक्तियों के समक्ष अव्यावहारिक संकल्प भी कर बैठता है ।

(2) प्रिय व्यक्ति/वस्तु के मोह में मनुष्य अपने वादे से मुकरने हेतु बहाने भी तलाशता है ।

(3) अपने त्याग से बचने के लिये मनुष्य दूसरे को धन-संपदा देकर त्याग के लिए प्रेरित करने से नहीं हिचकता है ।

(4) अपनी प्रिय वस्तु/व्यक्ति की रक्षा के लिए मनुष्य का दैवी शक्तियों की शरण में जाना सामान्यतः सदैव होता रहा है ।

(5) इन्द्र द्वारा दिए गए “चरैवेति” के उपदेश में उद्यमशीलता का संदेश स्पष्ट है ।

(6) शुनःशेप (शुनःशेफ)  की कथा से यह भी ज्ञात होता है कि यज्ञ में नरबलि वास्तविक न होकर मात्र प्रतीकात्मक होती थी । अर्थात याज्ञिक प्रक्रिया “पर्यग्नि”(अग्निज्वालाओं से घिरा हुआ) के पश्चात बलि-पुरुष को वन में छोड़ दिया जाता था । – योगेन्द्र जोशी

 

“चरैवेति चरैवेति” (ऐतरेय ब्राह्मण) – (2) राजा हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहित को इंद्रदेवता का “चरैवेति” का उपदेश

पिछली पोस्ट में मैंने राजा हरिश्चंद्र और वरुण देवता से वरदान में मिले उनके पुत्र रोहित की कथा का आरंभिक अंश प्रस्तुत किया था । कथा के अनुसार राजा ने रोहित को लेकर वरुण देवता का यज्ञ करना था, जिसको जानने पर रोहित वन को चला गया । वर्षोपरांत उसने घर लौटना चाहा तो मार्ग में ब्राह्ण भेषधारी इंद्र उसे मिल गये । ब्राह्मण के विचारों से प्रेरित होकर वापस पर्यटन पर चला गया । दूसरे वर्ष के समाप्त होते-होते जब वह घर लौटने लगा तो ब्राह्मण रूप में इंद्र उसे फिर मिल गए । ब्राह्मण ने उसे पुनः “चरैवेति” का उपदेश देते हुए पर्यटन करते रहने की सलाह दी –

पुष्पिण्यौ चरतो जङ्घे भूष्णुरात्मा फलग्रहिः ।

शेरेऽस्य सर्वे पाप्मानः श्रमेण प्रपथे हतश्चरैवेति ॥

(ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय 3, खण्ड 3)

(चरतः जङ्घे पुष्पिण्यौ, भूष्णुः आत्मा फलग्रहिः, अस्य श्रमेण प्रपथे हतः सर्वे पाप्मानः शेरे, चर एव इति ॥)

अर्थ – निरंतर चलने वाले की जंघाएं पुष्पित होती हैं, अर्थात उस वृक्ष की शाखाओं-उपशाखाओं की भांति होती है जिन पर सुगंधित एवं फलीभूत होने वाले फूल लगते हैं, और जिसका शरीर बढ़ते हुए वृक्ष की भांति फलों से पूरित होता है, अर्थात वह भी फलग्रहण करता है । प्रकृष्ट मार्गों पर श्रम के साथ चलते हुए उसके समस्त पाप नष्ट होकर सो जाते हैं, अर्थात निष्प्रभावी हो जाते हैं । अतः तुम चलते ही रहो (विचरण ही करते रहो, चर एव) ।

इस श्लोक की व्याख्या मुझे सरल नहीं लगी । सायण भाष्य के अनुसार विचरणशील व्यक्ति की जांघों के श्रम के फलस्वरूप मनुष्य को विभिन्न स्थानों पर भांति-भाति के भोज्य पदार्थ प्राप्त होते हैं जिनसे उसका शरीर वृद्धि एवं आरोग्य पाता है । प्रकृष्ट मार्ग के अर्थ श्रेष्ठ स्थानों यथा तीर्थस्भल, मंदिर, महात्माओं-ज्ञानियों के आश्रम-आवास से लिया गया है । इन स्थानों पर प्रवास या उनके दर्शन से उसे पुण्यलाभ होता है अर्थात उसके पाप क्षीण होकर पिष्प्रभावी हो जाते हैं ।

राजपुत्र रोहित ने ब्राह्मण की बातों को मान लिया और वह घर लौटने का विचार त्यागकर पुनः देशाटन पर निकल गया । घूमते-फिरते तीसरा वर्ष बीतने को हुआ तो उसने वापस घर लौटने का मन बनाया । इस बार भी इन्द्र देव ब्राह्मण भेष में उसे मार्ग में दर्शन देते है । वे उसे पुनः “चरैवेति” का उपदेश देते हैं । वे कहते हैं –

आस्ते भग आसीनस्योर्ध्वस्तिष्ठति तिष्ठतः ।

शेते निपद्यमानस्य चराति चरतो भगश्चरैवेति ॥

(ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय 3, खण्ड 3)

(आसीनस्य भग आस्ते, तिष्ठतः ऊर्ध्वः तिष्ठति, निपद्यमानस्य शेते, चरतः भगः चराति, चर एव इति ॥)

अर्थ – जो मनुष्य बैठा रहता है, उसका सौभाग्य (भग) भी रुका रहता है । जो उठ खड़ा होता है उसका सौभाग्य भी उसी प्रकार उठता है । जो पड़ा या लेटा रहता है उसका सौभाग्य भी सो जाता है । और जो विचरण में लगता है उसका सौभाग्य भी चलने लगता है । इसलिए तुम विचरण ही करते रहो (चर एव) ।

सौभाग्य से तात्पर्य धन-संपदा, सुख-समृद्धि से है । जो व्यक्ति निक्रिय बैठा रहता है, जो उद्यमशील नहीं होता, उसका ऐश्वर्य बढ़ नहीं पाता है । जो उद्यम हेतु उठ खड़ा होता है उसका सौभाग्य भी आगे बढ़ने के लिए उद्यत होता है । जो आलसी होता है, सोया रहता है, निश्चिंत पड़ा रहता है, उसका ऐश्वर्य नष्ट होने लगता है, उसकी समुचित देखभाल नहीं हो पाती । उसके विपरीत जो कर्मठ होता है, उद्यम में लगा रहता है, जो ऐश्वर्य-वृद्धि हेतु विभिन्न कार्यों को संपन्न करने के लिए भ्रमण करता है, यहां-वहां जाता है उसके सौभाग्य की भी वृद्धि होती है, धन-धान्य, संपदा, आगे बढ़ते हैं ।

पर्यटन में लगे रोहित का एक और वर्ष बीत गया और वह घर लौटने लगा । पिछली बारों की तरह इस बार भी उसे मार्ग में ब्राह्मण-रूपी इंद्र मिल गए, जिन्होंने उसे “चरैवेति” कहते हुए पुनः भ्रमण करते रहने की सनाह दी । रोहित उनके बचनों का सम्मान करते हुए फिर से पर्यटन में निकल गया ।

इस प्रकार रोहित चार वर्षों तक यत्रतत्र भ्रमण करता रहा । चौथे वर्ष के अंत पर जब वह घर लौटने को उद्यत हुआ तो मार्ग में उसे ब्राह्मण भेष में इंन्द्रदेव पुनः मिल गए । उन्होंने हर बार की तरह “चरैवेति” का उपदेश दिया और कहा –

कलिः शयानो भवति संजिहानस्तु द्वापरः ।

उत्तिष्ठस्त्रेता भवति कृतं संपाद्यते चरंश्चरैवेति ॥

(ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय 3, खण्ड 3)

 (शयानः कलिः भवति, संजिहानः तु द्वापरः, उत्तिष्ठः त्रेता भवति, चरन् कृतं संपाद्यते, चर एव इति ।)

अर्थ – शयन की अवस्था कलियुग के समान है, जगकर सचेत होना द्वापर के समान है, उठ खड़ा होना त्रेता सदृश है और उद्यम में संलग्न एवं चलनशील होना कृतयुग (सत्ययुग) के समान है । अतः तुम चलते ही रहो (चर एव) ।

इस श्लोक में मनुष्य की चार अवस्थाओं की तुलना चार युगों से क्रमशः की गई है । ये अवस्थाएं हैं (1) मनुष्य के निद्रामग्न एवं निष्क्रिय होने की अवस्था, (2) जागृति किंतु  आलस्य में पड़े रहने की अवस्था, (3) आलस्य त्याग उठ खड़ा होकर कार्य के लिए उद्यत होने की अवस्था, और (4) कार्य-संपादन में लगते हुए चलायमान होना । ब्राह्मण रूपी इन्द्र रोहित को समझाते हैं कि जैसे युगों में सत्ययुग उच्चतम कोटि का कहा जाता है वैसे ही उक्त चौथी अवस्था श्रेष्ठतम स्तर की कही जाएगी । उस युग में समाज सुव्यस्थित होता था और सामाजिक मूल्यों का सर्वत्र सम्मान था । उसके विपरीत कलियुग सबसे घटिया युग कहा गया है क्योंकि इस युग में समाज में स्वार्थपरता सर्वाधिक रहती है और परंपराओं का ह्रास देखने में आता है । उपर्युक्त पहली अवस्था इसी कलियुग के समान निम्न कोटि की होती है ।

उक्त प्रकार से संचरण में लगे रोहित के पांच वर्ष व्यतीत हो गये । कथा के अनुसार ब्राह्मण भेषधारी इन्द्र ने अंतिम (पांचवीं) बार फिर से रोहित को संबोधित करते हुए “चरैवेति” के महत्व का बखान किया । तदनुसार पुनः भ्रमण पर निकले रोहित को अजीगर्त नामक एक निर्धन ब्राह्मण के दर्शन हुए । उक्त वाह्मण से उसने उनके पुत्र, शुनःशेप, को खरीद लिया ताकि वह बालक वरुणदेव के लिए संपन्न किए जाने वाले यज्ञ में स्वयं के बदले इस्तेमाल कर सके ।

शुनःशेप (विकल्पतः शुनःशेफ) से संबंधित कथा का शेष और अंतिम भाग अगली पोस्ट में । – योगेन्द्र जोशी

“चरैवेति चरैवेति” (ऐतरेय ब्राह्मण) – (1) इक्ष्वाकुवंशीय राजा हरिश्चन्द्र की पुत्र-कामना की कथा

 ऐतरेय ब्राह्मण ऋग्वेद की ऋचाओं पर आधारित वैदिक कर्मकांडों से संबंधित ग्रंथ है । उसमें एक कथा का उल्लेख है इक्ष्वाकुवंशीय राजा हरिश्चन्द्र और उनके पुत्र रोहित से संबंधित । उस कथा में पांच श्लोकों का उल्लेख है, जिनके अंतिम चरण का अंत “चरैवेति” से होता है ।

कथा के अनुसार राजा हरिश्चन्द्र की कई रानियां थीं, किंतु उनको किसी से भी पुत्र की प्राप्ति न हो सकी । शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार निष्पुत्र मनुष्य का मृत्योपरांत तारण या उद्धार बिना पुत्र के नहीं होता । राजा को यही चिंता सताती रहती थी ।

एक बार उनके राजमहल में पर्वत एवं नारद नाम के दो ऋषियों ने रात्रि-विश्राम किया । उस अवसर पर राजा ने अपनी चिंता व्यक्त की और ऋषि नारद से पुत्रप्राप्ति का उपाय पूछा । ऋषि ने उनसे कहा कि वे वरुण देवता की प्रार्थना-अर्चना करें जो प्रसन्न होकर उन्हें पुत्रोत्पत्ति का वरदान देंगे ।

राजा ने वही मार्ग अपनाया । कालांतर में वरुण देवता प्रकट हुए और राजा ने उनसे कहा कि वे उन्हें पुत्र का वरदान दें जिसको लेकर वे उनका यजन (यज्ञ) करेंगे ।

टिप्पणी – जहां तक मैं जानता हूं वैदिक काल में यज्ञ में किसी प्रकार के जीवधारी की बलि देना आवश्यक नहीं होता था । फिर भी पशुबलि का उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में मिलता है । लेकिन जिस कथा का मैं जिक्र कर रहा हूं उसमें वर्णित घटनाक्रम से प्रतीत होता है कि राजा का विचार अपने भावी पुत्र की ही बलि देने का था । कदाचित वे मतिभ्रम में एक अनुचित वचन वरुणदेव को दे बैठे । इसी कथा में यह उल्लेख भी पढ़ने में आता है कि निंद्य कहते हुए नरबलि को संपन्न करने को कोई तैयार नहीं था ।

कालांतर में राजा के यहां पुत्र जन्म हो गया । तब वरुण देवता प्रकट होकर राजा को उनके संकल्प की याद दिलाई और नवजात को लेकर यज्ञ संपन्न करने को कहा । राजा ने कहा, “अभी तो अशौच की स्थिति है अतः उससे यज्ञ अनुमत नहीं है ।”

देवता वरुण मान गये । 10-दिनी अशौच पूर्ण होने पर वे पुनः प्रकट हुए और उन्होंने राजा को यज्ञ की याद दिलाई । राजा ने इस बार कहा, “किसी पशु की बलि तब तक नहीं दी जाती जब तक उसके दांत न निकल आवें । अतः दांत तो निकलने दीजिए ।”

ठीक है कहते हुए देवता चले गये । जब उस बच्चे के दांत कुछ वर्षों में निकल गये वे पुनः आए और राजा को संकल्प की याद दिलाई । इस बार राजा ने फिर बहाना बनाया और कहा, “जब पशु के आरंभिक (दूध के) सभी दांत गिर जावें तभी उसे यज्ञ में दिया जा सकता है ।”

तथास्तु कहते हुए देवता लौट गये । जब उसके दांत गिर गए तो वरुणदेव ने पुनः राजा को वादे की याद दिलाई । राजा को पुत्रमोह हो चला था, अतः उन्होंने नया बहाना पेश किया । वे बोले, “जब बालक के स्थाई दांत निकल आवें तभी उसका यजन किया जाना चाहिए ।”

इस बार फिर वरुण देवता लौट गए । समयांतर पर बालक के स्थाई दांत आ गये । राजा को उसका संकल्प स्मरण कराने देवता प्रकट हुए । राजा बोले, “हे देव, जब बालक धनुर्विद्या, युद्धकला आदि क्षत्त्रियोचित संस्कार प्राप्त कर ले तो उसके बाद मैं उससे आपका यजन करूंगा ।”

बालक का नाम रोहित था और जब वह उक्त प्रकार से सुसंस्कृत हो गया तो वरुण ने अपनी मांग पुनः दोहराई । इस बार राजा कोई बहाना नहीं बना सके । उन्होंने पुत्र रोहित को पास बुलाकर कहा, “बेटा, मैंने वरुण देवता के वरदान से तुम्हें प्राप्त किया । तब मैंने उन्हें वचन दिया था कि मैं तुम्हें बलि के रूप उन्हें सोंप दूंगा । निःसंदेह यह मेरे पाप-वचन थे । अब मुझे यजन करना ही है ।”

कुमार रोहित को यह प्रस्ताव स्वीकार्य नहीं था । उसने अपना धनुषादि आयुध उठाए और चला गया वन की ओर । एक वर्ष तक वह देशाटन करता रहा । अलग-अलग स्थलों पर गया, विभिन्न घटनाओं का अनुभव किया । इसी दौरान वरुणदेव के रोष के फलस्वरूप राजा हरिश्चंद्र रोगग्रस्त हो गए । वर्ष बीतते-बीतते रोहित ने पिता के अस्वस्थ होने का समाचार लोगों के मुख से सुना । वह घर लौटने को उद्यत हुआ । वापसी के मार्ग में ब्राह्मण भेष धारण करके इंद्र देवता उससे मिले, जिन्होंने उसे घर जाने के बजाय पुनः पर्यटन-देशाटन करते रहो की सलाह दी । ब्राह्मण ने उसको ज्ञानोपदेश दिया –

नानाश्रान्ताय श्रीरस्तीति रोहित शुश्रुम ।

पापो नृषद्वरो जन इन्द्र इच्चरतः सखा चरैवेति ॥

(ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय 3, खण्ड 3)

(रोहित, श्रान्ताय नाना श्रीः अस्ति इति शुश्रुम, नृषद्वरः जनः पापः, इन्द्रः इत् चरतः सखा, चर एव इति ।)

अर्थ – हे रोहित, परिश्रम से थकने वाले व्यक्ति को भांति-भांति की श्री यानी वैभव/संपदा प्राप्त होती हैं ऐसा हमने ज्ञानी जनों से सुना है । एक ही स्थान पर निष्क्रिय बैठे रहने वाले विद्वान व्यक्ति तक को लोग तुच्छ मानते हैं । विचरण में लगे जन का इन्द्र यानी ईश्वर साथी होता है । अतः तुम चलते ही रहो (विचरण ही करते रहो, चर एव) ।

            मेरा सोचना है कि ‘श्री’ से यहां मतलब केवल भौतिक संपदा से नहीं है बल्कि स्थान-स्थान पर विचरण करने से प्राप्त ज्ञान, भांति-भांति के लोगों से प्राप्य अनुभव, उनसे सीखे गए कर्म-संपादन का कौशल, आदि से होगा । इंद्र रोहित को बताना चाहते हैं कि सम्मान उसी को मिलता है जो कर्मठ हो, अपने लिए संपदा स्वयं अर्जित करे, दूसरों पर आश्रित न हो । वह स्वयं को अकेला न समझे बल्कि दैव (ईश्वर) पर भरोसा करे ।

ब्राह्मण के उपदेशों से प्रभावित होकर रोहित पुनः देश-प्रदेश में विचरण करने लगा ।

विचरण का यह सिलसिला चार बार और चलता है । प्रत्येक वर्ष के बाद जब रोहित घर लौटने की सोचता है तो मार्ग में फिर ब्राह्ण रूपधारी इन्द्र मिलते हैं जो पुनः “चरैवेति” की सलाह देते हैं । कथा का शेष भाग देखें अगली ब्लॉग-प्रविष्टि में ।

यहां इतना और जोड़ दूं कि “चरैवेति” श्लोकों की व्याख्या ऐतरेय ब्राह्मण गंथ के सायण-भाष्य पर आधारित है । – योगेन्द्र जोशी

मनुस्मृति में वर्णित पंचपाप एवं पंचमहायज्ञ (भाग – 2)

अपनी पिछली ब्लाग-प्रविष्टि में मैंने पंचपापों की चर्चा की थी । मेरी उस चर्चा का आधार मनुस्मृति था । उक्त स्मृति के अनुसार मनुष्य अपने दैनिक जीवन में तरह-तरह के छोटे-मोटे पापकर्म करता रहता है । मनुस्मृति का मत है कि जीवनधारण के लिए चूल्हा-चक्की जैसे आवश्यक कार्यों को संपन्न करते समय मनुष्य प्राणिहिंसा या तद्सदृश अन्य कर्मों से नहीं बच पाता है । इन सबमें लगा व्यक्ति पापों का भागीदार बन जाता है । प्रौद्योगिकी-प्रधान आधुनिक युग में लोगों की दैनिक चर्या प्राचीन काल की जैसी नहीं रही । फिर भी चलते-फिरते या मशीनों के प्रयोग में वह कुछ न कुछ अनिष्टप्रद कर ही बैठता है । मनुस्मृति कहती है कि उनसे जुड़े पापों के दोषों की भरपाई वह सत्कर्मों के संपादन से कर सकता है । स्मृतिकार ने इन सत्कर्मों को पंच महायज्ञ कहा है । उक्त स्मृति के अधोलिखित श्लोकों में इनका विवरण यों उपलब्ध है:

अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम् ।

होमो दैवो बलिर्भौतो नृयज्ञो‍ऽतिथिपूजनम् ।।

(मनुस्मृति, 3, 70)

(अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः, तर्पणम् तु पितृयज्ञः, होमः दैवः, बलिः भौतः, अतिथि-पूजनम् नृयज्ञः ।)

अर्थ – अध्यापन-कार्य ब्रह्मयज्ञ, पितरों का तर्पण पितृयज्ञ, होमकार्य दैवयज्ञ, बलिप्रदान भूतयज्ञ, एवं अतिथि-सत्कार नृयज्ञ हैं ।    

यज्ञ का अर्थ सामान्यतः देवताओं की वैदिक मंत्रों के साथ की जाने वाली स्तुति से लिया जाता है, जिसे हवनकुण्ड में प्रज्वलित अग्नि में हव्य (घी, तिल आदि) की आहुति देकर मंत्रोच्चार से साथ संपन्न किया जाता है । यज्ञ का यह अर्थ रूढ़ि एवं आम प्रचलन में है, परंतु कई अवसरों पर यज्ञ इससे अधिक व्यापक अर्थ रखता है । यज्ञ शब्द उक्त श्लोक में मनुष्य से अपेक्षित अन्य कर्मों को इंगित करता है ।

यहां पांच यज्ञों का उल्लेख किया गया है जिनमें प्रथम  (ब्रह्मयज्ञहै अध्यापन जिसका तात्पर्य है अन्य लोगों को ज्ञान बांटना, उनमें उचितानुचित का विवेक जगाना, उन्हें आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करना आदि । प्राचीन वैदिक काल की वर्ण-व्यवस्था में यह कार्य औपचारिक तौर पर ब्राह्मणों के जिम्मे हुआ करता था । पर मैं समझता हूं कि तब भी किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा रहती होगी कि वह अनौपचारिक रूप से अपनी संतान एवं अन्य जनों को अपने सीमित ज्ञान से संस्कारित करे ।

अगला यज्ञ है पितृयज्ञ जिसे उक्त ग्रंथ में तर्पण द्वारा संपन्न करने की बात कही है । तर्पण का अर्थ है तृप्त करना । धर्मशास्त्रों के अनुसार स्नानादि के समय पितरों के नाम पर जल चढ़ाकर तर्पण किया जाता है । मैं तर्पण को अधिक व्यापक अर्थ देता हूं । वे सभी कार्य – जैसे दान – जो पितरों के नाम पर किए जाएं तर्पण माने जा सकते हैं । रोजमर्रा के जीवन में उनका स्मरण करना, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना, आदि तर्पण समझे जा सकते हैं ।

प्रज्वलित अग्नि में मंत्रोच्चार के साथ हव्यसामग्री सोंपना देवयज्ञ कहा जाता है । वैदिक मान्यता के अनुसार प्रकृति के विविध निष्प्राण भौतिक घटकों पर किसी एक या दूसरे देवता का नियंत्रण या स्वामित्व रहता है किसे अधिष्ठाता देवता कहा जाता है । मान्यता रही है कि हवन की अग्नि को समर्पित हव्य सामग्री उसके माध्यम से उन देवताओं को प्राप्त होती है । यज्ञ सामान्यतः इस विधि से देवताओं के प्रति की गई स्तुति है ।

वैदिक लोकव्यवहार मनुष्य से यह अपेक्षा करता है कि वह भोजन की व्यवस्था केवल अपने लिए ही न करे बल्कि अन्य जीवधारियों के नाम पर भी उसका एक अंश छोड़ दे जिसे बलि कहा गया है । मुझे याद है जब मेरे ग्राम्य समाज में भोजन-काल में उसका एक अंश अलग करने के बाद खाना आरंभ करते थे । उस बलि को भोजनांतर बाहर खुले में डाल देते थे जिसे कुत्ते-बिल्ली, कौवे या चिड़िया खा लेते थे । किसी न किसी बहाने पशुपक्षियों को भोजन खिलाने-पिलाने का व्रत कई लोग लिए रहते हैं । यह सब करना भूतयज्ञ के नाम से जाना गया है । भूत का अर्थ है भौतिक देहधारी प्राणी ।

अंत में नृयज्ञ, जिसका तात्पर्य अतिथि-सत्कार से है । समाज में किसी भी अन्य व्यक्ति, चाहे वह अनजान ही क्यों न हो, की सहायता करना, उसके प्रति सदाशयता दिखाना, सद्व्यवहार करना अतिथि सत्कार है । भूखे या रोगग्रस्त व्यक्ति के घर के प्रवेशद्वार पर आकर भोजन अथवा औषधि की याचना करने पर उसकी यथासंभव मदद करना अतिथि सत्कार कहा जाएगा । इसी प्रकार रात्रिविश्राम की मांग करने वाले के लिए समुचित व्यवथा करना अतिथि सत्कार के अंतर्गत माना जाएगा । अतिथि का मतलब है ऐसा व्यक्ति जिसका साक्षात्कार अप्रत्याशित रूप से हो जाए । दशकों पहले तक अपने समाज में अतिथि-सत्कार की प्रथा रही है (अतिथिदेवो भव) । लेकिन आज के ‘सभ्य’ समाज में लोग सामाजिक संवेदनाओं से दूर एवं परस्पर शंकालु होते जा रहे हैं और तदनुसार एक-दूसरे से बचते हैं ।

उक्त प्रकार के यज्ञसंज्ञात्मक कर्मों के निष्पादन के विषय में आगे यह कहा गया है:

पञ्चैतान्यो महायज्ञान्न हापयति शक्तितः ।

स गृहे‍ऽपि वसन्नित्यं सूनादोषैर्न लिप्यते ।।

(मनुस्मृति, 3, 71)

(एतान्यः पञ्च महायज्ञान् शक्तितः न हापयति सः नित्यं गृहे वसन् अपि सूना-दोषैः न लिप्यते ।)

अर्थ – यहां कथित इन पांच महायज्ञों को जो यथासामर्थ्य नहीं छोड़ता वह घर में रहते हुए भी पूर्वचर्चित पापकमों के दोषों से नहीं लिप्त होता है ।

घर में रहते हुए का तात्पर्य है गृहस्थ जीवन निभाते हुए । गृहस्थाश्रम मानवसमाज का सबसे अहम आश्रम है क्योंकि इसी पर अन्य आश्रमों का अस्तित्व टिका रहता है । इसी आश्रम के लोग दूसरों की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं । लेकिन गृहस्थाश्रम के तमाम दैनिक कार्यों को संपन्न करते हुए मनुष्य जाने-अनजाने पापकर्म कर बैठता है जिनके दोषों से वह मुक्त हो जाता है अन्य परोपकर्मों को करने पर । पापों की भरपाई पुण्यकर्मों से संभव है यही संदेश मनुस्मृति के इन वचनों में निहित है ।

पंचपापों एवं पंचमहायज्ञों को मैं शाब्दिक अर्थ में नहीं लेता, प्रत्युत इनको मैं प्रतीकात्मक समझता हूं । छोटे-मोटे सभी कर्म पाप के स्रोत हो सकते हैं और देवताओं-पितरों के प्रति श्रद्धाभिव्यक्ति एवं समाज तथा अन्य प्राणियों के प्रति उपकार-भावना उन पापों का प्रतिकार है । – योगेन्द्र जोशी

मनुस्मृति में वर्णित पंचपाप एवं पंचमहायज्ञ (१)

प्रचीन भारतीय दर्शन में पाप एवं पुण्य को बहुत महत्त्व दिया गया है । इन्हें क्रमशः नर्क तथा स्वर्ग लोकों का मार्ग बताया गया है । सत्कमों को पुण्यदायक एवं कदाचारण-दुराचरण को पापों का जनक माना जाता रहा है । भारतभूमि में प्रचलित सभी धर्म पापकर्मों से बचने की शिक्षा देते हैं ताकि मनुष्य को मरणोपरांत नर्कलोक की यातना न भुगतना पड़े । भारतीय दार्शनिक चिंतन में मनुष्य मात्र देही नहीं होता है । देह तो उसके भीतर निवासस्थ आत्मा द्वारा धारण किया हुआ भौतिक कलेवर होता है । मान्यतानुसार आत्मा कभी मरती नहीं बल्कि इस भूलोक के अलावा स्वर्ग-नर्क आदि लोकों का अपने कर्मों के अनुसार भोग करती है । यद्यपि बौद्ध तथा जैन धर्म में आत्मा संबंधी मान्यताएं किंचित भिन्न हैं, तथापि पाप-पुण्य की महत्ता वहां कम नहीं है ।

कहने का तात्पर्य है कि अपने देश में पाप से बचने की बातें आम जीवन में प्रायः होती रहती हैं । किंतु यह भी सच है कि जीवन-यापन हेतु किए जाने वाले दैनिक कर्मों के दौरान जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे, मनुष्य पाप कर बैठता है, या उससे पापकर्म होते रहते हैं । मनुस्मृति में उन कर्मों का जिक्र मिलता है जिन्हें जीवन-धारण हेतु प्रायः प्रतिदिन किया जाता है और जो मनुष्य को पाप का भागी बनाते हैं । आज के प्रौद्योगिकी आधारित जीवन में वे कर्म बेमानी कहे जा सकते हैं, फिर भी कुछ लोगों के दैनिक जीवन का वे आज भी हिस्सा होते हैं । अस्तु्, उक्त स्मृति में पंचपाप संबंधी ये श्लोक देखने को मिलता है:

पञ्च सूना गृहस्थस्य चुल्ली पेषण्युपस्करः ।

कण्डनी चोदकुम्भश्च बध्यते यास्तु वाहयन् ।।

(मनुस्मृति 3, 68)

(चुल्ली पेषणी उपस्करः कण्डनी च उदकुम्भः च गृहस्थस्य पञ्च सूनाः याः तु वाहयन् बध्यते ।)

          अर्थ –  चुल्ली (चूल्हा), चक्की, झाड़ू-पोछे के साधन, सिलबट्टा तथा पानी का घड़ा, ये पांच पाप के कारण हैं जिनका व्यवहार करते हुए मनुष्य पापों से बधता है ।

अर्थात् चूल्हा-चक्की, झाड़ू-पोंछा आदि का प्रयोग करते समय कुछ न कुछ पापकर्म हो ही जाता है, जैसे घुन-कीड़े जैसे जीवों की हत्या हो ही जाती है । भारतीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार किसी भी प्राणी की हिंसा नहीं करनी चाहिए । लेकिन जीवन-धारण के कार्य में ऐसे पापों से बचना संभव नहीं है । मनुस्मृति में इनके दोषों के निवारण का भी मार्ग बतलाया हैः

 

तासां क्रमेण सर्वासां निष्कृत्यर्थं महर्षिभिः ।

पञ्च क्लृप्ता महायज्ञाः प्रत्यहं गृहमेधिनाम् ।।

(मनुस्मृति 3, 69)

(तासां सर्वासां क्रमेण निष्कृति-अर्थं महर्षिभिः गृह-मेधिनाम् प्रति अहं पञ्च महा-यज्ञाः क्लृप्ता ।)

          अर्थ – इन सबसे क्रमानुसार निवृत्ति हेतु महर्षियों ने गृहस्थाश्रमियों के लिए प्रतिदिन पांच महायज्ञों का विधान सुझाया है ।

मनुस्मृति के अनुसार किसी पापकर्म के दोष से मुक्त होने के लिए हमें उसके बदले समुचित सत्कर्म करने चाहिए । अर्थात पुण्यकार्य करके हम पापकर्मजनित हानि की भरपाई कर सकते हैं । दानपुण्य, देवोपासना, सदुपदेश, मनुष्यों तथा अन्य प्राणियों का हितसाधन आदि कर्म इस श्रेणी में आते हैं । ऐसा करना एक प्रकार का प्रायश्चित्त करना है । प्रायः सभी धर्मों में प्रायश्चित्त की बातें कही जाती हैं । जिन महायज्ञों का उल्लेख मनुस्मृति में मिलता है वे हैं ब्रह्मयज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ एवं नृयज्ञ । इनकी चर्चा किंचित विस्तार से अगली बलॉग-प्रविष्टि में की जाएगी ।

चुल्हा-चौकी जैसे कार्य आज के मशीनी युग में कुछ हद तक बेमानी हो चुके हैं । मैं इन्हें प्रतीकात्मक मानता हूं । तदनुसार रोजमर्रा के जीवन में उठने-बैठने, खाने-पीने, चलने-फिरने आदि जैसे कार्य करते समय जाने-अनजाने व्यक्ति को पाप का दोष लगता रहता है । भले ही मशीनों का प्रयोग हो रहा हो, वे व्यक्ति पाप के परोक्षतः भागी होंगे ही जिनके हेतु मशीनें कार्यरत हों । उन दोषों के निवारण के लिए सत्कर्मों को दरशाने वाले कर्म उसे करना चाहिए यही मंतव्य उक्त कथनों का निहितार्थ होना चाहिए ऐसा मेरा मानना है । – योगेन्द्र जोशी

“प्रजासुखे सुखं राज्ञः …” – कौटिल्य अर्थशास्त्र के राजधर्म संबंधी नीतिवचन

करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व भारतभूमि पर जिस मौर्य सामाज्य की स्थापना हुई थी उसका श्रेय उस काल के महान राजनीतिज्ञ चाणक्य को जाता है । राजनैतिक चातुर्य के धनी चाणक्य को ही कौटिल्य कहा जाता है । उनके बारे में मैंने पहले कभी अपने इसी ब्लॉग में लिखा है । कौटिलीय अर्थशास्त्र चाणक्य-विरचित ग्रंथ है, जिसमें राजा के कर्तव्यों का, आर्थिक तंत्र के विकास का, प्रभावी शासन एवं दण्ड व्यवस्था आदि का विवरण दिया गया है । उसी ग्रंथ के तीन चुने हुए श्लोकों का उल्लेख मैं यहां पर कर रहा हूं ।

(कौटिलीय अर्थशास्त्र, प्रथम अधिकरण, अध्याय 18)

1.

प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां तु हिते हितम् ।

नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम् ॥

(प्रजा-सुखे सुखम् राज्ञः प्रजानाम् तु हिते हितम्, न आत्मप्रियम् हितम् राज्ञः प्रजानाम् तु प्रियम् हितम् ।)

प्रजा के सुख में राजा का सुख निहित है, प्रजा के हित में ही उसे अपना हित दिखना चाहिए । जो स्वयं को प्रिय लगे उसमें राजा का हित नहीं है, उसका हित तो प्रजा को जो प्रिय लगे उसमें है ।

2.

तस्मान्नित्योत्थितो राजा कुर्यादर्थानुशासनम्् ।

अर्थस्य मूलमुत्थानमनर्थस्य विपर्ययः ॥

(तस्मात् नित्य-उत्थितः राजा कुर्यात् अर्थ अनुशासनम्, अर्थस्य मूलम् उत्थानम् अनर्थस्य विपर्ययः ।)

इसलिए राजा को चाहिए कि वह नित्यप्रति उद्यमशील होकर अर्थोपार्जन तथा शासकीय व्यवहार संपन्न करे । उद्यमशीलता ही अर्थ (संपन्नता) का मूल है एवं उसके विपरीत उद्यमहीनता अर्थहीनता का कारण है ।

3.

अनुत्थाने ध्रुवो नाशः प्राप्तस्यानागतस्य च ।

प्राप्यते फलमुत्थानाल्लभते चार्थसम्पदम् ॥

(अनुत्थाने ध्रुवः नाशः प्राप्तस्य अनागतस्य च, प्राप्यते फलम् उत्थानात् लभते च अर्थ-सम्पदम् ।)

उद्यमशीलता के अभाव में पहले से जो प्राप्त है एवं भविष्य में जो प्राप्त हो पाता उन दोनों का ही नाश निश्चित है । उद्यम करने से ही वांछित फल प्राप्त होता है ओर उसी से आर्थिक संपन्नता मिलती है ।

कौटिल्य ने इन श्लोकों के माध्यम से अपना यह मत व्यक्त किया है कि राजा का कर्तव्य अपना हित साधना और सत्तासुख भोगना नहीं है । आज के युग में राजा अपवाद रूप में ही बचे हैं और उनका स्थान अधिकांश समाजों में जनप्रतिनिधियों ने ले लिया है जिन्हें आम जनता शासकीय व्यवस्था चलाने का दायित्व सोंपती है । कौटिल्य की बातें तो उन पर अधिक ही प्रासंगिक मानी जायेंगी क्योकि वे जनता के हित साधने के लिए जनप्रतिनिधि बनने की बात करते हैं । दुर्भाग्य से अपने समाज में उन उद्येश्यों की पूर्ति विरले जनप्रतिनिधि ही करते हैं ।

उद्योग शब्द से मतलब है निष्ठा के साथ उस कार्य में लग जाना जो व्यक्ति के लिए उसकी योग्यतानुसार शासन ने निर्धारित किया हो, या जिसे उसने अपने लिए स्वयं चुना हो । राजा यानी शासक का कर्तव्य है कि वह लोगों को अनुशासित रखे और कार्यसंस्कृति को प्रेरित करे । अनुशासन एवं कार्यसंस्कृति के अभाव में आर्थिक प्रगति संभव नहीं है । जिस समाज में लोग लापरवाह बने रहें, कार्य करने से बचते हों, समय का मूल्य न समझते हों, और शासन चलाने वाले अपने हित साधने में लगे रहें, वहां संपन्नता पाना संभव नहीं यह आचार्य कौटिल्य का संदेश है । – योगेन्द्र जोशी

 

“न त्यजेत् आत्मनः उद्योगम् …” – पुरुषार्थ की महत्ता संबंधी हितोपदेश के नीतिवचन

संस्कृत के नीतिविषयक ग्रंथों में से एक हितोपदेश है, जिसमें पशु-चरित्रों के माध्यम से आम जन के समक्ष महत्वपूर्ण सीख की बातें प्रस्तुत की गई हैं । उक्त ग्रंथ का संक्षिप्त परिचय मैंने इसी ब्लॉग के 2 मार्च 2009 की पोस्ट में दिया है । यद्यपि यह ग्रंथ अवयस्कों-बालकों को संबोधित करके लिखा गया है, तथापि इसमें दी गई बातें सभी उम्र के लोगों के लिए उपयोगी हैं । ग्रंथ में एक स्थल पर “होनी टल नहीं सकती” यह कहते हुए भाग्य के भरोसे बैठ जाने की आलोचना की गई  है । मैं तत्संबंधित दो श्लोकों का यहां पर उल्लेख कर रहा हूं:

यदभावि न तद्भावि भावि चेन्न तदन्यथा ।

इति चिन्ताविषघ्नो९यमगदः किं न पीयते ।।

(हितोपदेश, मित्रलाभ, 29)

(यत् अभावि न तत् भावि भावि चेत् न तत् अन्यथा इति चिन्ता-विषघ्नः अयम् अगदः किम् न पीयते ।)

अर्थ – जो नहीं घटित होने वाला है वह होगा नहीं, यदि कुछ होने वाला हो तो वह टलेगा नहीं इस विषरूपी चिंता (विचारणा) के शमन हेतु अमुक (आगे वर्णित) औषधि का सेवन क्यों नहीं किया जाता है ?

न दैवमपि सञ्चित्य त्यजेदुद्योगमात्मनः ।

अनुद्योगेन कस्तैलं तिलेभ्यः प्राप्तुमर्हति ।।

(यथा उपर्युक्त, 30)

(न दैवम् अपि सञ्चित्य त्यजेत् उद्योगम् आत्मनः न-उद्योगेन कः तैलं तिलेभ्यः प्राप्तुम् अर्हति ।)

अर्थ – (और औषधि यह है:) दैव यानी भाग्य का विचार करके व्यक्ति को कार्य-संपादन का अपना प्रयास त्याग नहीं देना चाहिए । भला समुचित प्रयास के बिना कौन तिलों से तेल प्राप्त कर सकता है ?

हितोपदेश के रचनाकार के मतानुसार पुरुषार्थ यानी उद्यम के बिना वांछित फल नहीं मिल सकता है । “जो होना (या नहीं होना) तय है वह तो होगा ही (या होगा ही नहीं)” यह विचार मान्य नहीं हो सकता । यह सही है कि जो हो चुका उसे बदला नहीं जा सकता है । अर्थात् जो घटना भूतकाल का हिस्सा हो चुकी हो उसे कोई परिवर्तित नहीं कर सकता है । यह भी संभव है कि जो भविष्य में होना हो वह भी हो के रहे । परंतु यह कौन बताएगा कि वह भावी घटना क्या होगी ? जब वह घटित हो जाए तब तो वह भूतकाल का अंग बन जाता है और उसके बारे में “यह तो होना था” जैसा वक्तव्य दिया जा सकता है । लेकिन जब तक वह घटित न हो जाए तब तक कैसे पता चलेगा कि क्या होने वाला है ? ऐसी स्थिति में क्या यह नहीं स्वीकारा जाना चाहिए कि उस भावी एवं अज्ञात घटना को संपन्न करने हेतु किए जाने वाले हमारे प्रयास उसके घटित होने के कारण होते हैं । अवश्य ही कुछ ऐसे कारक भी घटना को प्रभावित करते होंगे जिन पर हमारा नियंत्रण न हो अथवा वे पूर्णतः अज्ञात हों । उन कारकों एवं हमारे प्रयासों के सम्मिलित प्रभाव के अधीन ही वह घटना जन्म लेगी जिसके घटित हो चुकने पर ही वह अपरिवर्तनीय कही जाएगी । किंतु उस क्षण से पहले हम जान नहीं सकते कि वह घटना क्या होगी । अतः हमारे प्रयास चलते रहने चाहिए । – योगेन्द्र जोशी

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