संन्यास-धर्म के बारे में महाभारत में व्यक्त विचार – परिव्रजन्ति दानार्थं मुण्डाः काषायवाससः (4)

संन्यास धर्म के बारे महाभारत ग्रंथ में बहुत-सी बातें कही गई हैं । उनमें से कुछ चुनी हुई बातों का उल्लेख मैंने पिछले तीन आलेखों में किया है

(दिनांक ११ मई, ७ जून, एवं २७ जुलाई) । चार आलेखों की इस शृंखला का चतुर्थ एवं अंतिम आलेख यहां पर प्रस्तुत है ।

महाभारत ग्रंथ के शान्तिपर्व में कौरव-पांडव युद्ध की समाप्ति के बाद की स्थितियों का वर्णन है । उसी के अंतर्गत एक प्रकरण है जिसके अनुसार युद्ध के दुःखद परिणामों से विचलित होकर राजा युधिष्ठिर राजकाज छोड़कर संन्यास ग्रहण करने का विचार अपने भाइयों के समक्ष रखते हैं । द्रौपदी समेत सभी भाई उनके विचार को नकारते हुए सलाह देते हैं कि उन्हें जनता का हित साधने के लिए राजकाज चलाना चाहिए । वार्तालाप के उस सिलसिले में अर्जुन गेरुआवस्त्रधारी तथाकथित साधु-महात्माओं की कटु आलोचना भी कर डालते हैं । वे कहते हैं कि ऐसे कई लोग ढोंगी होते हैं और आम जन को मूर्ख बनाकर अपनी जीविका चलाते हैं । तत्संबंधित दो कथन आगे प्रस्तुत हैं:

परिव्रजन्ति दानार्थं मुण्डाः काषायवाससः ।

सिता बहुविधैः पाशैः सञ्चिन्वन्तो वृथामिषम् ॥32॥

(महाभारत, शान्तिपर्व, राजधर्मानुशासनपर्व, अध्याय 18)

(परि-व्रजन्ति दान-अर्थम् मुण्डाः काषाय-वाससः सिता बहु-विधैः पाशैः सञ्चिन्वन्तः वृथा आमिषम् ।)

अर्थ – मानव समाज में गेरुआ वस्त्र धारण किए हुए, विविध प्रकार के बंधनों से बंंधे हुए, भोग-लालसा की खोज में लगे हुए, कुछ लोग दान पाने की इच्छा से विचरण करते हैं ।

‘दान पाने की इच्छा’ का यहां पर तात्पर्य है बिना परिश्रम किए हुए दूसरों से धन-संपदा पाने का रास्ता अपनाना । संन्यासी सरीखे दिखने वाले वे सम्मोहक बातों से लोगों में यह भ्रम पैदा करते हैं कि वे धर्म एवं अध्यात्म परम ज्ञाता हैं और सांसारिक मोहमाया से मुक्त हैं । गंभीरता से ध्यान देने पर पता चलता है कि वे अपनी भोगेच्छाओं की पूर्ति के लिए भ्रमजाल फैलाने में दक्ष होते हैं । आम जनों में अनेक उनके शब्दजाल में ऐसे फंसते हैं कि उनके असली इरादों को भांप ही नहीं पाते । हिंदू जनमानस चूंकि गेरुआ वस्त्र को संन्यासधर्मी की पहचान मानते हैं इसलिए जो भी ये स्वांग रचता है उसके चंगुल में लोग फंस जाते हैं । वे मोहमाया में फंसे हैं इस बात को लोग सोच भी नहीं पाते । इस प्रकार गेरुआवस्त्रधारी वे लोगों की निरीहता का लाभ उठाते हैं ।

अनिष्कषाये काषायमीहार्थमिति विद्धि तम् ।

धर्मध्वजानां मुण्डानां वृत्त्यर्थमिति मे मतम् ॥34॥

(यथोपर्युक्त)

(अ-निस्-कषाये काषायम् इह अर्थम् इति विद्धि तम् धर्म-ध्वजानां मुण्डानां वृत्ति-अर्थम् इति मे मतम् ।)

अर्थ – दूषित मन के साथ गेरुआ (या केसरिया) चोला पहनने को स्वार्थ-साधन समझा जाना चाहिए । ऐसे नरों का (मिथ्या) धर्म के नाम का झंडा उठाकर चलना वस्तुतः जीविका चलाने का धंधा है ऐसा मेरा (प्रसंगानुसार अर्जुन का) मत है । (निष्कषाय = स्वच्छ, मैलरहित, निष्कपट)

गेरुआवस्त्रधारी व्यक्ति का मन क्या अनिवार्यतः निष्कपट होता है यह प्रश्न हर व्यक्ति के मन में उठना चाहिए । ऐसे वस्त्र छलकपट करके स्वार्थसिद्धि के साधन भी हो सकते हैं, क्योंकि सामान्य जनों को इन्हें देखकर यह भ्रम होता है कि वस्त्रधारी मोहमाया और भौतिक लालसाओं से विरक्त योगी होता है । वास्तविकता बहुधा इसके विपरीत होती है । गंभीरता से परीक्षण करने पर देखने को मिलता है कि वे भौतिक सुखों में लिप्त रहते हैं । जब महाभारत काल में ऐसे ढोंगी हो सकते थे तो आज भौतिकवादी युग में उनका होना आश्चर्य की बात नहीं है । यहां गेरुआ वस्त्र मात्र प्रतीक है । ढोंगी श्वेतवस्त्रधारी भी हो सकता है । अनेकों ऐसे रूप यह धर सकता है जिससे लोग उसे सिद्ध महात्मा समझ बैठे एवं उसके प्रति खिंचे चले आवें और वह उनकी सिधाई का लाभ उठाये । आजकल हमारे समाज में पग-पग पर ऐसे धोखेबाज मिल रहे हैं ।

धर्म के नाम पर आम जनों को धोखा देने में दक्ष तथाकथित धर्मरक्षकों के बारे में उक्त ग्रंथ के शान्तिपर्व के अन्य अध्याय में अधोलिखित बात कही गयी है । प्रसंग है पांडव-पितामह भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को नीति संबंधी उपदेश दिया जाना ।

अन्तःक्रूरा वाङ्मधुराः कूपाश्छन्नास्त्रिणैरिव ।

धर्मवैतं सिकाःक्षुद्रा मुष्णन्ति ध्वजिनो जगत् ॥18॥

(महाभारत, शान्तिपर्व, राजधर्मानुशासनपर्व, अध्याय 158)

(अन्तः-क्रूराः वाक्-मधुराः कूपाः छन्नाः त्रिणैः इव धर्मौ एतम् सिकाः क्षुद्राः मुष्णन्ति ध्वजिनः जगत् ।)

अर्थ – जो भीतर से क्रूर होते हैं किंतु मधुर वाणी बोलते हैं वे घासफूस से ढके कुंए के समान होते है । इसी प्रकार धर्म के नाम पर धोखा देने वाले क्षुद्र स्तर के लोग धर्म का झंडा लिए हुए संसार को लूटते हैं ।

कहा जाता है कि जंगली जानवरों को पकड़ने के लिए धोखा देकर गड्ढे में फंसाया जाता है । गड्ढे को घासफूस से ऐसे ढक दिया जाता है कि जानवर को उसका तनिक भी एहसास न हो । उस छिपे गड्ढे को पार करने पर वह जानवर उसमें गिर पड़ता है। प्रस्तुत नीतिवचन के अनुसार गेरुआवस्त्रधारियों के इरादा भी उक्त तरीके का ही होता है ।

इस कथन का तात्पर्य है कि धर्म के नाम पर धोखाधड़ी कोई नयी बात नहीं है । धर्म के ठेकेदार भी एक प्रकार के लुटेरे होते हैं । कुछ की हरकतें तो खुल्लमखुल्ला गुंडागर्दी की होती हैं जैसा कि आजकल देखने को मिल रहा है । कई ऐसे होते है जिनके मन में छल-कपट होता है परंतु व्यवहार में वे मोहक वाणी बोलते हैं जिससे उनके असली इरादे छिप जाते हैं । जैसा पहले कहा जा चुका है वे आम जनों से किसी न किसी रूप में धन एवं सुखसाधन पा जाते हैं । वे बहुत बारीकी से हमें लूट रहे हैं इस बात का एहसास आम जनों को नहीं हो पाता है ।

इस स्थल पर मैं मनुस्मृति से भी एक उद्धरण प्रस्तुत कर रहा हूं जो कहता है कि बाह्य प्रतीक धर्म के लक्षण नहीं होतेः

दूषितोऽपि चरेद्धर्मं यत्र तत्राश्रमे रतः ।

समः सर्वेषु भूतेषु न लिङ्गं धर्मकारणम् ॥

(मनुस्मृति 6, 66)

(दूषितः अपि चरेद् धर्मम् यत्र तत्र आश्रमे रतः समः सर्वेषु भूतेषु न लिङ्गं धर्म-कारणम् ।)

अर्थ – यहां-वहां जिस किसी आश्रम में रहते हुए दूषित होने पर भी धर्मानुसार आचरण करे । सभी प्राणियों को समान दृष्टि से देखे । प्रतीकों का धारण करना धर्म के कारण नहीं होता  ।

दूषित का अर्थ में कि स्थान-विशेष के नियमों का ठीक से पालन न कर पाना । ऐसे दोष के बावजूद उसे धर्माचरण यथावत करते रहना चाहिए ।प्रतीकों से अर्थ है गेरुआ या श्वेत प्रकार के वस्त्र धारण करना, माथे पर चंदन-तिलक लगा के रहना, शरीर पर राख चुपड़ना इत्यादि । इन सबको धर्म के कारण नहीं किया जाता । अर्थात् इनका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है । धर्म तो व्यक्ति के आचरण में परिलक्षित होता है । मन का निष्कपट होना, सत्य, निष्ठा, अहिंसा, परोपकार आदि में स्वयं को लगाना, अर्थात् सन्मार्ग पर चलना ही धर्म है ।

भोग-विलास में लिप्त व्यक्ति भला संन्यासी कैसे हो सकता है । सुखसाधनों से दूर रहना तो संन्यासी के आचरण का अभिन्न अंग है । आपने किसी कथित संत महात्मा को देखा है जो जमीन में साधारण से आसन पर बैठकर बातें करता हो ? वातानुकूूलित यान से यात्रा न करता हो ? मुझे तो अपने शंकराचार्यों पर भी तरस आता है कि वे स्वयं को संन्यासी कहते हैं और उच्च सिंहासन पर विराजमान रहते हैं । क्या आदि शंकराचार्य ऐसा ही करते थे ?

मेरे मन में आजकल के इन संतों-महात्माओं के प्रति कोई सम्मान जागृत नहीं होता । – योगेन्द्र जोशी

 

संन्यास.धर्म के बारे में महाभारत में व्यक्त विचार – अहिंसकः समः … (3)

महाकाव्य महाभारत में महर्षि व्यास द्वारा अपने पुत्र शुकदेव को दिए गए धर्मोपदेश के अंतर्गत संन्यास धर्म की बातें भी कही गई हैं । पिछले दो ब्लॉग-प्रविष्टियों (दिनांक 11 मई 2016 एवं 7 मई 2016) में मैंने उस लंबे संवाद से संबंधित कुछ चुने हुए श्लोकों को उद्धृत किया था । अधोलिखित विवेचना में मैं चुने हुए अन्य तीन श्लोकों को प्रस्तुत कर रहा हूं ।

अहिंसकः समः सत्यो धृतिमान्नियतेन्द्रियः ।

शरण्यः सर्वभूतानां गतिमाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥20

(महाभारत, शान्तिपर्व, मोक्षधर्मपर्व, अध्याय 245)

(अहिंसकः समः सत्यः धृतिमान् नियत-इन्द्रियः शरण्यः सर्व-भूतानाम् गतिम् आप्नोति अन्-उत्तमाम् ।)

हिंसा की भावना से मुक्त, सबके प्रति समान भाव वाला, सत्यनिष्ठ, धैर्यवान, संयमित इंद्रियों वाला, सभी प्राणियों के शरण के योग्य मनुष्य उत्तमतम गति प्राप्त करता है । (अनुत्तमाम्  के स्थान पर अत्युत्तमाम्  भी हो सकता है।)

          इस श्लोक में अनुत्तमाम् शब्द का अर्थ है वह जिससे उत्तमतर कुछ न हो यानी सर्वोत्तम (न+उत्तम) । सामान्यतः इसका अर्थ लिया जाएगा जो अच्छा नहीं हो  । ग्रंथ का कहना है कि उक्त गुणों से संपन्न संन्यासी परलोक में उत्तमतर दशा प्राप्त करता है, अपने सत्कर्मों का फल भोगता है ।

विमुक्तं सर्वसङ्गेभ्यः मुनिमाकाशवत् स्थितम् ।

अस्वमेकचरं शान्तं तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥22

(यथोपर्युक्त)

(विमुक्तम् सर्व-सङ्गेभ्यः मुनिम् आकाशवत् स्थितम् अस्वम् एकचरं शान्तम् तम् देवाः ब्राह्मणम् विदुः ।)

जो पुरुष सभी के साथ की इच्छा से मुक्त हो, मौनव्रती तपस्वी हो, आकाश की तरह स्थिर हो, ‘मेरा है’की भावना से ग्रस्त न हो, अकेला विचरण करने वाला हो, शांतचित्त हो, उसे देवतागण ब्राह्मण कहते हैं ।

          ध्यान रहे कि इस स्थल पर ब्राह्मण शब्द का अर्थ प्राचीन सामाजिक वर्ण-व्यवस्था के चार वर्णो में से एक ‘ब्राह्मण’नहीं है । यहां इसका अर्थ ब्रह्मवेत्ता अर्थात् ज्ञानी लिया जाना चाहिए । वर्णाश्रम व्यवस्था में भी ब्राह्मण वह होता था जिसे आध्यात्मिक ज्ञान हो और जो लोगों को शिक्षित करता हो । संन्यासी के लिए समूह में रहना वर्जित रहा है, क्योंकि उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह सबसे संबंध तोड़कर मेरे-तेरे की भावना से मुक्त हो चुका हो ।

निराशिषमनारम्भं निर्नमस्कारमस्तुतिम् ।

निर्मुक्तं बन्धनैः सर्वैस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥24

(यथोपर्युक्त)

(निर्-आशिषम् अन्-आरम्भं निर्-नमस्कारम् अस्तुतिम् निर्-मुक्तम् बन्धनैः सर्वैः तम् देवाः ब्राह्मणम् विदुः ।)

जिसे कामनाएं न हों, जो कुछ अर्जित करने का प्रयास न करे, जिसे दूसरों से नमस्कार या सम्मान की अपेक्षा न हो, जो प्रशंसा की इच्छा न रखता हो, सभी बंधनों से मुक्त हो, उसे देवतागण ब्राह्मण अथवा संन्यासी कहते हैं ।

          उपर्युक्त श्लोक में संन्यासी के अतिरिक्त गुणों का उल्लेख किया गया है । सार-संक्षेप यह है कि संन्यासी सभी इच्छाओं-आकांक्षाओं-अपेक्षाओं के परे होता है । हर व्यक्ति का सबसे बड़ा बंधन उसका स्वयं का परिवार होता है, उसके बाद संबंधियों-मित्रों से वह बंधा रहता है । संन्यासधर्म में प्रवेश करने के लिए सर्वप्रथम इन रिश्तों को तोड़ना होता है । तत्पश्चात् अपनी सभी सांसारिक कमजोरियों से अपने को अलग करना होता है । यह प्रक्रिया प्रबल संकल्प-शक्ति की मांग करता है ।

क्या आज के युग में इस संन्यासधर्म के अनुसार चलने वाला कोई है ? महाभारत ग्रंथ में यह भी स्पष्ट किया गया है कि गेरुआ वस्त्र धारण करने से कोई संन्यासी नहीं होता । इस बात की चर्चा अगले चिट्ठा-लेख में की जाएगी । – योगेन्द्र जोशी

 

 

संन्यास धर्म के बारे में महाभारत में व्यक्त विचार – न क्रुद्ध्येत् न प्रहृष्येत् … (2)

अपने पिछले ब्लॉग-लेख में मैंने संन्यासी एवं संन्यासधर्म के बारे में महाकाव्य महाभारत में क्या कहा गया है इसकी चर्चा की थी (देखें पोस्ट दिनांक 11 मई 2016) । वे बातें उक्त ग्रंथ में वर्णित महर्षि व्यास का अपने पुत्र शुकदेव को दिए गए धर्मोपदेश पर आधारित थीं । संबंधित वार्ता पर्याप्त लंबी है । मैं उसी प्रकरण से चुने हुए तीन अन्य श्लोकों को उद्धृत कर रहा हूं:

न क्रुद्ध्येन्न प्रहृष्येच्च मानितोऽमानितश्च यः ।

सर्वभूतेष्वभयदस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥14

(महाभारत, शान्तिपर्व, मोक्षधर्मपर्व, अध्याय 245)

(न क्रुद्ध्येत् न प्रहृष्येत् च मानितः अमानितः च यः सर्वभूतेषु अभयदः तम् देवा ब्राह्मणम् विदुः ।)

अर्थ – जो व्यक्ति सम्मान दिए जाने अथवा अपमान किये जाने पर न तो प्रसन्न होता है और न ही नाखुश, और जो सभी प्राणियों अभय देता है उसी को देवतागण ब्राह्मण कहते है ।

यहां पर ब्राह्मण का तात्पर्य वर्णव्यवस्था के ब्राह्मण से नहीं है, बल्कि ब्रह्ज्ञानी से है । संन्यासी ही वह व्यक्ति होता है जो ब्रह्मज्ञान की दिशा में आगे बढ़ रहा होता है । ऐसे व्यक्ति के लिए मान-अपमान की कोई सार्थकता नहीं रह जाती है । वह इनके प्रति उदासीन भाव रखता है यानी मान-अपमान के प्रति वह कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करता है । अभयद का अर्थ है अभयदान देने वाला यानी जिससे किसी को भय नहीं होता । संन्यासी जब किसी से नाखुश नहीं होता है और तदनुसार किसी का अहित नहीं करता है तो उससे किसी को भय नहीं हो सकता है ।

नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देत जीवितम् ।

कालमेव प्रतीक्षेत निदेशं भृतको यथा ॥15

(यथोपर्युक्त)

(न अभि-नन्देत मरणम् न अभि-नन्देत जीवितम् कालम् एव प्रतीक्षेत निदेशम् भृतकः यथा ।)

अर्थ – संन्यासी न तो मृत्यु की इच्छा करता है और न ही जीवित रहने की कामना । वह बस काल (समय) की प्रतीक्षा करता है जैसे कि सेवक अपने स्वामी के निदेशों का ।

संन्यासी जीवन तथा मृत्युु के प्रति उदासीन भाव प्राप्त कर चुका होता है । तब उसे इन दो में से किसी के भी प्रति आकर्षण अथवा विलगाव नहीं रह जाता है । उसे न तो सुख-सुविधाओं के साथ जीते रहने की कामना रहती है और न ही मृत्यु का भय सताता है । अतः वह न तो येनकेन प्रकारेण जीवित रहने के प्रयास (यथा अस्पताल में भरती होना) करता है और न ही अस्वाभाविक मृत्यु (यथा आत्महत्या) का विकल्प चुनता है ।

अनभ्याहतचित्तः स्यादनभ्याहतवाग् भवेत् ।

निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यो निरमित्रस्य किं भयम् ॥16॥

(यथोपर्युक्त)

(अन्-अभि-आहत-चित्तः स्यात् अन्-अभि-आहत-वाग् भवेत् निर्-मुक्तः सर्व-पापेभ्यः निर्-अमित्रस्य किम् भयम् ।)

अर्थ – संन्यासी के चित्त में अहितकारी विचार न हों, उसके वचन कष्ट पहुंचाने वाले न हों । जो सभी पापकर्मों से मुक्त हो उसका क्या भय हो सकता है ?

तात्पर्य यह है कि संन्यासी को मन, वचन, कर्म – सभी प्रकार से – स्वच्छ एवं अकलुषित होना चाहिए । वह किसी के अहित की नहीं सोचे तो भला उससे किसी को क्या भय हो सकता है ।

हमारे समाज में गेरुआ वस्त्रधारियों की कोई कमी नहीं है, पर क्या वे वस्तुतः संन्यासी हैं यह विचारणीय प्रश्न है । अगली पोस्ट में कुछ और बातों का उल्लेख किया जाना है । – योगेन्द्र जोशी

संन्यास-धर्म के बारे में महाभारत में व्यक्त विचार – (1) एकश्चरति यः …

महाकाव्य महाभारत में संन्यासधर्म के बारे बहुत कुछ कहा गया है और यह स्पष्ट किया गया है कि गेरुआ वस्त्र धारण करना संन्यासी की पहचान नहीं है । मनुस्मृति जैसे अन्य ग्रंथों में भी कमोबेश वही बातें कही गयी हैं । संन्यासी के लक्षणों वाले व्यक्ति आजकल कहीं नहीं दिखते हैं । संन्यासी होने का दावा करने वाले सभी आम जनों को मूर्ख बनाते हैं यह मेरा मत है । मैं महाभारत में वर्णित चुने हुए कुछ श्लोकों का उल्लेख अपने तीन-चार लेखों की शृंखला में कर रहा हूं । महर्षि व्यास द्वारा अपने पुत्र शुकदेव को दिये गये धर्मविषयक उपदेश में संन्यास की चर्चा की गयी है । उसी वार्तालाप से उद्धृत तीन श्लोकों के साथ प्रस्तुत है पहला आलेख:

एकश्चरति यः पश्यन् न जहाति न हीयते ।

अनग्निरनिकेतश्च ग्राममन्नार्थमाश्रयेत् ॥5

(महाभारत, शान्तिपर्व, मोक्षधर्मपर्व, अध्याय 245)

(पश्यन् यः एकः चरति, न जहाति न हीयते, अन्-अग्निः च अनिकेतः च ग्रामम् अन्न-अर्थम् आश्रयेत् ।)

अर्थः – (संन्यासी की विशिष्टता यह है कि वह) अकेला विचरण करता है, सत्य के ज्ञान के फलस्वरूप न किसी को त्यागता है और न ही किसी के द्वारा त्यागा जाता है । अग्नि की स्थापना न करे और उसका कोई आवास (घर) भी न होवे । उसे चाहिए कि वह केवल अन्नप्राप्ति के लिए ग्राम में प्रवेश करे ।

          संन्यासी का कोई संगीसाथी नहीं होता है । उसका किसी के साथ अपना-पराया का भाव नहीं रहता है और इसी भाव के साथ लोग भी उसे देखते हैं । वैदिक सभ्यता में सभी कर्मकाण्डों के केन्द्र में अग्नि होती है । संन्यासी सभी कर्मकाण्डों को छोड़ चुका होता है इसलिए वह अग्नि भी प्रज्वलित नहीं करता है । संन्यासी को किसी पक्के आवास में नहीं रहना चाहिए और उसे चाहिए कि ग्रामक्षेत्र में केवल भोजनार्थ भिक्षा के लिए प्रवेश करे । ग्राम वह स्थान होता है जहां लोग समूह में रहते हैं । संन्यासी एकाकी रहता है इसलिए ऐसे स्थान में रहना उसके लिए वर्जित है ।

अश्वस्तनविधाता स्यान्मुनिर्भावसमाहितः ।

लघ्वाशी नियताहारः सकृदन्ननिषेविता ॥6

(यथा पूर्वोक्त)

(अश्वस्तन-विधाता, मुनिः, भाव-समाहितः, लघु-आशी, नियत-आहारः, सकृत्-अन्न-निषेविता स्यात् ।)

अर्थः – संन्यासी आने वाले कल के लिए भोजनादि का संग्रह करने वाला न बने, चिंतनशील (एकाग्रचित्त) रहे और मनोभावों को अपने भीतर ही सीमित रखे, अर्थात् संयम बरते । वह अल्पाहारी एवं नियमानुकूल भोजन करने वाला बने तथा दिन भर में एक बार ही अन्न ग्रहण करे ।

          संन्यास का अर्थ है त्याग करना । संन्यासी शनैःशनैः सभी भौतिक वस्तुओं को त्यागता है और जीवन-धारण हेतु जितना आवश्यक हो उतने तक अपने को सीमित रखता है । इसलिए भविष्य की चिंता करते हुए भोजन आदि का संचय करना उसके लिए धर्मविरुद्ध हो जाता है । ऐसा संचय वैदिक आश्रम व्यवस्था के आरंभिक तीन आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ, वानप्रस्थ) में ही अनुमत है । उसका समय ब्रह्मज्ञान अर्जित करने और भौतिक संसार से जुड़े मनोभावों से स्वयं को मुक्त करने में बीतना चाहिए ।

कपालं वृक्षमूलानि कुचैलमसहायता ।

उपेक्षा सर्वभूतानामेतावद् भिक्षुलक्षणम् ॥7

(यथा पूर्वोक्त)

(कपालं वृक्ष-मूलानि कुचैलम् असहायता सर्वभूतानाम् उपेक्षा एतावत् भिक्षु-लक्षणम् ।)

अर्थः – संन्यासी के लक्षण ये होने चाहिएः वह भिक्षा के लिए कपाल को पात्र के तौर पर प्रयोग करे, रात्रि विश्राम पेड़-पौधों के साये में करे, सादे असुन्दर वस्त्र धारण करे, किसी को साथ न रखे, सभी प्राणियों के प्रति उपेक्षाभाव रखे ।

          कपाल का सामान्य अर्थ है मनुष्य का माथा । कुछ अघोरपंथी हठयोगी कापालिक नरमुंड-माला पहनते हैं और मनुष्य की खोपड़ी बर्तन के तौर पर प्रयोग में लेते हैं । लेकिन यहां कपाल का अर्थ है टूटा मिट्टी का बर्तन, जैसे घड़े का टुकड़ा । मैंने अपनी बाल्यावस्था (उत्तराखंड में व्यतीत समय) में योगी-योगिनियों को पुष्ट गोल लौकी (तुम्बा) के बाहरी सख्त खोल से बना बर्तन भिक्षा हेतु प्रयोग में लेते देखा है जिसे कपाल कहा जाता है । संन्यासधर्म में पक्के मकान के भीतर निवास करना वर्जित है । संन्यासी पेड़ की छाया में निवास करे और वर्षा आदि से बचने के लिए घास-फूस से बनी कुटिया में रह सकता है । कुचैल का अर्थ सामान्यतः फटा-पुराना मैला होता है । मन की शुचिता के साथ देह की शुचिता की अपेक्षा संन्यासी से भी रहती है । मैं समझता हूं कि कुचैल से यहां मतलब है केवल पानी से साफ किया हुआ न कि साबुन जैसे चीज का प्रयोग करते हुए । उक्त कथन में उपेक्षा का अर्थ तिरस्कार से नहीं है, बल्कि उदासीनता से है । अर्थात् संन्यासी न तो किसी से लगाव रखे न किसी से द्वेष ।

अगले आलेखों में भी उक्त ग्रंथ से एतद्विषयक अतिरिक्त सामग्री । – योगेन्द्र जोशी

कौटिलीय वचन: “अर्थैः अर्थाः प्रबध्यन्ते …” अर्थात धन से ही अधिक धन अर्जित होता है

कौटिलीय अर्थशास्त्र”  महान राजनीतिवेत्ता कौटिल्य द्वारा राज्य का शासन कारगर तरीके से चलाने की प्रणाली पर रचित ग्रंथ है । कौटिल्य चाणक्य (चणक-पुत्र, असल नाम विष्णुगुप्त) का वैकल्पिक नाम है, जिन्होंने करीब ढाई हजार साल पहले चंद्रगुप्त को राजगदी पर बिठाकर मौर्य राज्य की स्थापना की थी । उनके बारे में कुछ जानकारी मैंने अपने 23 सितंबर, 2009, की ब्लॉग-प्रविष्टि में दी है ।

उक्त ग्रंथ में शासकीय व्यवस्था की तमाम बातों के साथ पुरुषार्थ की महत्ता की भी बात की गई है । चाणक्य के अनुसार भाग्य के भरोसे बैठना नासमझों का काम है । ग्रंथकार ने यह भी कहा है कि धन से ही और अधिक धन का उपार्जन होता है । तत्संबंधित दो श्लोक मुझे ग्रंथ में पढ़ने को मिले हैं जिनका उल्लेख मैं इस स्थल पर कर रहा हूं ।

(स्रोत संदर्भ – कौटिलीय अर्थशास्त्र, अधिकरण 9, प्रकरण 142)

नक्षत्रमतिपृच्छन्तं बालमर्थोऽतिवर्तते ।

अर्थो ह्यर्थस्य नक्षत्रं किं करिस्यन्ति तारकाः ॥

( नक्षत्रम् अति-पृच्छन्तम् बालम् अर्थः अति-वर्तते, अर्थः हि अर्थस्य नक्षत्रम् तारकाः किम् करिस्यन्ति ।)

अर्थ – नक्षत्रों की गणना करने वाले नासमझ से धन दूर ही रहता है । दरअसल धन के लिए धन ही नक्षत्र होता है, उसके लिए तारागण की क्या भूमिका ?

धनोपार्जन के कार्य में ग्रह-नक्षत्रों की गणना, ज्योतिषीय सलाह-मशविरा, शुभ मुहूर्त का विचार, आदि का कोई महत्व नहीं होता । जो इन पचड़ों में रहता है वह व्यावहारिक जीवन में एक नादान बच्चे की-सी नासमझी करता है । असल तथ्य तो यह है कि धनोपार्जन के लिए आपके पास की धन-संपदा ही ग्रह-नक्षत्र की भूमिका निभाती हैं । तात्पर्य यह है कि आकाशीय पिंड धनोपार्जन को प्रभावित करने की क्षमता नहीं रख्रते, बल्कि आपकी पहले से ही अर्जित धनसंपदा उनकी जगह प्रभावी होती हैं, जैसा कि अगले श्लोक से स्पष्ट है ।

नाधनाः प्राप्नुवन्त्यर्थान्नरा यत्नशतैरपि ।

अर्थैरर्थाः प्रबध्यन्ते गजाः प्रतिगजैरिव ॥

(अधनाः नराः यत्न-शतैः अपि अर्थान् न प्राप्नुवन्ति, प्रति-गजैः गजाः इव अर्थाः अर्थैः प्रबध्यन्ते ।)

अर्थ – निर्धन जन सौ प्रयत्न कर लें तो भी धन नहीं कमा सकते हैं । जैसे हाथियों के माध्यम से हाथी वश में किए जाते हैं वैसे ही धन से धन को कब्जे में लिया जाता है ।

यह सुविख्यात है कि वनक्षेत्र में रह रहे हाथी को पालतू हाथियों की मदद से वश में किया जाता है और कालांतर में उसे पालतू बनाने में सफलता मिल जाती है । कुछ ऐसा ही धन के साथ होता है । एक कहावत हैः “पैसा पैसे को खींचता है ।” जिसके निहितार्थ यही हैं । दरअसल जब मनुष्य के पास धन होता है तभी वह उसका समुचित निवेश कर सकता है जिससे उसे अतिरिक्त धन की प्राप्ति होती है । जो निवेश करने में जितना अधिक समर्थ होगा उसे उसी अनुपात में लाभ भी मिलेगा । जिसके पास धन ही न हो वह निवेश कहां से कर पाएगा ?

व्यवहारिक जीवन में उपर्युक्त बात कमोवेश सही ठहरती है बशर्ते कि हम धनसंपदा के अर्थ अधिक व्यापक लेते हुए उसमें बौद्धिक संपदा को भी जोड़ लें । आजकल बौद्धिक कौशल का जमाना है । आप अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हुए भी धनोपार्जन कर सकते हैं । ऐसा व्यक्ति पहले उसी का निवेश करता है, फिर उससे पाप्त धन का निवेश करता है । अंततः सभी को निवेश का ही रास्ता अपनाता होता है ।

मेरी समझ में चाणक्य का संदेश यही है कि भविष्यवाणी की ज्योतिष् या तत्सदृश कलाओं पर निर्भर न होकर व्यक्ति को अपने धन या हुनर से ही संपदा अर्जित करने की सोचनी चाहिए । – योगेन्द्र जोशी

“चरैवेति चरैवेति” (ऐतरेय ब्राह्मण) – (3) “चरैवेति” का उपदेश एवं ब्राह्मण बालक शुनःशेप की कथा

पिछली दो ब्लॉग-प्रविष्टियों (अक्टूबर 3 तथा अक्टूबर 5, 2015) में मैंने राजा हरिश्चंद्र और उनके पुत्र रोहित की कथा का वर्णन करते हुए इस बात का उल्लेख किया था कि कैसे ब्राह्मण भेषधारी इंद्र द्वारा “चरैवेति” के उपदेश से प्रेरित होकर रोहित करीब पांच वर्ष तक देश-प्रदेश में विचरण करता रहा । पांचवें वर्ष के अंत पर जब वह घर लौटने को उद्यत हुआ तो मार्ग में उसे ब्राह्मण भेष में पुनः इंन्द्र देवता मिल गए । उन्होंने पिछली बारों की तरह “चरैवेति” का उपदेश दिया और कहा –

चरन् वै मधु विन्दति चरन् स्वादुमुदुम्बरम् ।

सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरंश्चरैवेति ॥

(चरन् वै मधु विन्दति, चरन् स्वादुम् उदुम्बरम्, सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यः चरन् न तन्द्रयते, चर एव इति ।)

अर्थ – इतस्ततः भ्रमण करते हुए मनुष्य को मधु (शहद) प्राप्त होता है, उसे उदुम्बर (गूलर?) सरीखे सुस्वादु फल मिलते हैं । सूर्य की श्रेष्ठता को तो देखो जो विचरणरत रहते हुए आलस्य नहीं करता है । उसी प्रकार तुम भी चलते रहो (चर एव) ।

मधु और उदुम्बर प्रतीक हैं मार्ग में उपलब्ध खाद्य पदाथों के । (शब्दकोश में उदुम्बर का अर्थ गूलर का फल दिया गया है ।) प्राचीन काल में विचरण करता हुआ व्यक्ति कभी वनों से गुजरता होगा तो कभी ऋषि-मुनियों के आश्रम में और कभी गांवों में पहुंचता होगा । उसे वन्य कंद-फल आदि के अतिरिक्त वन तथा ग्रामवासियों से आतिथ्य में विविध भोज्य पदार्थ प्राप्त होते होंगे । उक्त श्लोक उन्हीं की ओर संकेत करता है ।

ब्राह्मण की सलाह के अनुरूप कुमार रोहित छठे वर्ष भी पर्यटन पर चला गया । इस बार वनक्षेत्र में विचरण करते हुए उसकी भेंट सुयवस के पुत्र निर्धन अजीगर्त नामक ऋषि से हुई ।

अजीगर्त के तीन बालक-पुत्र थे जिनके नाम क्रमशः शुनःपुच्छ, शुनःशेप और शुनोलांगूल थे । (तीनों शब्दों, पुच्छ, शेप तथा लांगूल, का एक ही अर्थ पूंछ होता है । श्वन् = कुत्ता; शुनः = कुत्ते की; शुनःपुच्छ = कुत्ते की पूंछ । ऐसे नाम क्यों चुने गये होंगे ? मैं कह नहीं सक्ता ।) रोहित ने अजीगर्त के सम्मुख प्रस्ताव रखा कि वह किसी एक पुत्र को उसे (रोहित को) बेच दे । मूल्य रूप में उनको सौ गायें दी जाएंगी । अजीगर्त को ज्येष्ठ और उसकी पत्नी को कनिष्ठ पुत्र प्यारे थे, उन्होंने मंझले शुनःशेप को बेच दिया । रोहित उसको लेकर घर लौट आया । इसके साथ ही “चरैवेति” उपदेशों की शृखला समाप्त हो गई ।

रोहित ने शुनःशेप को पिता हरिश्चन्द्र, जो जलोदर  रोग (Hydropsy या Oedema, जिसमें शरीर के कुछ अंगों में जल भरने से सूजन पैदा हो जाती है ।)से पीड़ित थे, को सोंप दिया, ताकि उसके बदले उस बालक से वरुणदेव का यजन किया जा सके और वह स्वयं मुक्त हो जावे । कथा के अनुसार वरुणदेव को क्षत्रिय बालक के बदले ब्राह्मण बालक अधिक स्वीकार्य था ।

तत्पश्चात यज्ञ की व्यवस्था की गई, जिसमें स्वयं अजीगर्त भी सम्मिलित हुए । सभी तैयारियों के अंतर्गत जब शुनःशेप को पशु की भांति यूप पर बांधने की बारी आई तो कोई भी व्यक्ति इस पापकर्म को करने को तैयार नहीं हुआ । (यज्ञमंडप में याज्ञिक कर्मों के लिए खंभा यूप कहलाता है ।) तब अजीगर्त ने सौ गायें लेकर स्वयं ही इस कार्य को संपन्न कर दिया । यूप पर पशुवत बंधे उस बालक का बध करके बलि देने के लिए कोई तैयार न हुआ । तब अजीगर्त ने अतिरिक्त सौ गायें मांगकर उस कार्य को भी पूरा करना स्वीकार कर लिया ।

शुनःशेप को यह आभास हो गया कि एक पशु की तरह यज्ञ में उसका बध किया जाना है । यज्ञ संबंधी उसके ज्ञान के अनुसार यज्ञ की “पर्यग्नि” नामक प्रक्रिया के बाद उसे बन में छोड़ा जाना चाहिए था । किंतु वहां तो उसका बध वास्तव में किया जाने वाला है । वह आत्मरक्षा हेतु ऋग्वैदिक मंत्रों से देवताओं की अर्चना करने लगा । उसने सर्वप्रथम प्रजापति (ब्रह्मा?) की प्रार्थना की जिन्होने उसे अग्नि की स्तुति करने को कहा क्योंकि वे सभी देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं ।

अग्नि की अर्चना करने पर उस ब्राह्मण बालक को सविता (सूर्य?) की प्रार्थना करने को कहा, जो सभी जीवों के जन्मदाता-पालनकर्ता हैं । सविता ने बालक से कहा कि चूंकि उसे वरुणदेव के लिए यूप पर बांधा गया है अतः वह उन्हीं की शरण में जावे । स्तुति करने पर वरुण ने कहा कि अग्नि सभी देवताओं के मुखस्वरूप हैं, क्योंकि यज्ञ की आहुतियां उन्हीं के माध्यम से देवताओं को प्राप्त होती हैं, अतः उन्हीं की शरण में वे जावें ।

बालक ने फिर से अग्नि की स्तुति की तो अग्निदेव बोले कि तुम समस्त देवों की सामूहिक स्तुति करो । उसने वही किया । तब देवगण बोले कि वह इंद्र की प्रार्थना करे जो उन सभी में श्रेष्ठतम हैं । उसने वही किया । इंद्र ने उसके लिए एक दिव्यरथ भेज दिया और कहा कि वह अश्विनी कुमारों की स्तुति करे वही उसे छोड़ देंगे । अश्विनियों की प्रार्थना करने पर उन्होंने बालक से कहा कि वह उषा (?) की स्तुति करे ताकि सभी देवता उसे मुक्त कर दें ।

शुनःशेप ने वेद की ऋचाओं के साथ स्तुति आंरभ की । जैसे-जैसे उसने एक-एककर ऋचाओं से देवताओं की स्तुति की वैसे-वैसे उसके बंधन खुलते गए, और जलोदर से स्थूल हो चुके राजा का पेट भी सामान्य होता गया । मुक्त हो चुका बालक शुनःशेप ऋषि विश्वामित्र की गोद में स्वयं को उनका पुत्र मानते हुए बैठ गया ।

शुनःशेप के विश्वामित्र का पुत्र घोषित होने पर अजीगर्त का पुत्रमोह जाग गया । उन्होंने उसे ऐसा करने से मना किया और उनके पास वापस आ जाने का आग्रह किया । इस प्रयोजन के लिए उन्होंने पूर्व में पाये गये तीन सौ गायें राजा को लौटाने की बात भी रखी । किंतु बालक शुनःशेप ने यह कहते हुए प्रस्ताव अस्वीकृत कर दिया कि जो पिता यज्ञ में अपने पुत्र का पशुवत वध करने के कुत्सित कृत्य के लिए तैयार हो उसके पितृत्व को वह अस्वीकार करता है । देवताओं की कृपा से ऋषि विश्वामित्र उसके पिता बन गयेे ।

अंततः कतिपय टिप्पणियां

“चरैवेति चरैवेति” के नाम से तीन भागों में जिस कथा का विवरण मैंने प्रस्तुत किया है उसमें निहित संदेश वस्तुतः क्या हैं यह मैं ठीक से नहीं बता सकता । मुझे ये बातें समझ में आती हैंः

(1) पु़त्र पाने की इच्छा मनुष्य में प्राचीन काल से ही रही हैं और उसके लिए वह दैवी शक्तियों के समक्ष अव्यावहारिक संकल्प भी कर बैठता है ।

(2) प्रिय व्यक्ति/वस्तु के मोह में मनुष्य अपने वादे से मुकरने हेतु बहाने भी तलाशता है ।

(3) अपने त्याग से बचने के लिये मनुष्य दूसरे को धन-संपदा देकर त्याग के लिए प्रेरित करने से नहीं हिचकता है ।

(4) अपनी प्रिय वस्तु/व्यक्ति की रक्षा के लिए मनुष्य का दैवी शक्तियों की शरण में जाना सामान्यतः सदैव होता रहा है ।

(5) इन्द्र द्वारा दिए गए “चरैवेति” के उपदेश में उद्यमशीलता का संदेश स्पष्ट है ।

(6) शुनःशेप (शुनःशेफ)  की कथा से यह भी ज्ञात होता है कि यज्ञ में नरबलि वास्तविक न होकर मात्र प्रतीकात्मक होती थी । अर्थात याज्ञिक प्रक्रिया “पर्यग्नि”(अग्निज्वालाओं से घिरा हुआ) के पश्चात बलि-पुरुष को वन में छोड़ दिया जाता था । – योगेन्द्र जोशी

 

“चरैवेति चरैवेति” (ऐतरेय ब्राह्मण) – (2) राजा हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहित को इंद्रदेवता का “चरैवेति” का उपदेश

पिछली पोस्ट में मैंने राजा हरिश्चंद्र और वरुण देवता से वरदान में मिले उनके पुत्र रोहित की कथा का आरंभिक अंश प्रस्तुत किया था । कथा के अनुसार राजा ने रोहित को लेकर वरुण देवता का यज्ञ करना था, जिसको जानने पर रोहित वन को चला गया । वर्षोपरांत उसने घर लौटना चाहा तो मार्ग में ब्राह्ण भेषधारी इंद्र उसे मिल गये । ब्राह्मण के विचारों से प्रेरित होकर वापस पर्यटन पर चला गया । दूसरे वर्ष के समाप्त होते-होते जब वह घर लौटने लगा तो ब्राह्मण रूप में इंद्र उसे फिर मिल गए । ब्राह्मण ने उसे पुनः “चरैवेति” का उपदेश देते हुए पर्यटन करते रहने की सलाह दी –

पुष्पिण्यौ चरतो जङ्घे भूष्णुरात्मा फलग्रहिः ।

शेरेऽस्य सर्वे पाप्मानः श्रमेण प्रपथे हतश्चरैवेति ॥

(ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय 3, खण्ड 3)

(चरतः जङ्घे पुष्पिण्यौ, भूष्णुः आत्मा फलग्रहिः, अस्य श्रमेण प्रपथे हतः सर्वे पाप्मानः शेरे, चर एव इति ॥)

अर्थ – निरंतर चलने वाले की जंघाएं पुष्पित होती हैं, अर्थात उस वृक्ष की शाखाओं-उपशाखाओं की भांति होती है जिन पर सुगंधित एवं फलीभूत होने वाले फूल लगते हैं, और जिसका शरीर बढ़ते हुए वृक्ष की भांति फलों से पूरित होता है, अर्थात वह भी फलग्रहण करता है । प्रकृष्ट मार्गों पर श्रम के साथ चलते हुए उसके समस्त पाप नष्ट होकर सो जाते हैं, अर्थात निष्प्रभावी हो जाते हैं । अतः तुम चलते ही रहो (विचरण ही करते रहो, चर एव) ।

इस श्लोक की व्याख्या मुझे सरल नहीं लगी । सायण भाष्य के अनुसार विचरणशील व्यक्ति की जांघों के श्रम के फलस्वरूप मनुष्य को विभिन्न स्थानों पर भांति-भाति के भोज्य पदार्थ प्राप्त होते हैं जिनसे उसका शरीर वृद्धि एवं आरोग्य पाता है । प्रकृष्ट मार्ग के अर्थ श्रेष्ठ स्थानों यथा तीर्थस्भल, मंदिर, महात्माओं-ज्ञानियों के आश्रम-आवास से लिया गया है । इन स्थानों पर प्रवास या उनके दर्शन से उसे पुण्यलाभ होता है अर्थात उसके पाप क्षीण होकर पिष्प्रभावी हो जाते हैं ।

राजपुत्र रोहित ने ब्राह्मण की बातों को मान लिया और वह घर लौटने का विचार त्यागकर पुनः देशाटन पर निकल गया । घूमते-फिरते तीसरा वर्ष बीतने को हुआ तो उसने वापस घर लौटने का मन बनाया । इस बार भी इन्द्र देव ब्राह्मण भेष में उसे मार्ग में दर्शन देते है । वे उसे पुनः “चरैवेति” का उपदेश देते हैं । वे कहते हैं –

आस्ते भग आसीनस्योर्ध्वस्तिष्ठति तिष्ठतः ।

शेते निपद्यमानस्य चराति चरतो भगश्चरैवेति ॥

(ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय 3, खण्ड 3)

(आसीनस्य भग आस्ते, तिष्ठतः ऊर्ध्वः तिष्ठति, निपद्यमानस्य शेते, चरतः भगः चराति, चर एव इति ॥)

अर्थ – जो मनुष्य बैठा रहता है, उसका सौभाग्य (भग) भी रुका रहता है । जो उठ खड़ा होता है उसका सौभाग्य भी उसी प्रकार उठता है । जो पड़ा या लेटा रहता है उसका सौभाग्य भी सो जाता है । और जो विचरण में लगता है उसका सौभाग्य भी चलने लगता है । इसलिए तुम विचरण ही करते रहो (चर एव) ।

सौभाग्य से तात्पर्य धन-संपदा, सुख-समृद्धि से है । जो व्यक्ति निक्रिय बैठा रहता है, जो उद्यमशील नहीं होता, उसका ऐश्वर्य बढ़ नहीं पाता है । जो उद्यम हेतु उठ खड़ा होता है उसका सौभाग्य भी आगे बढ़ने के लिए उद्यत होता है । जो आलसी होता है, सोया रहता है, निश्चिंत पड़ा रहता है, उसका ऐश्वर्य नष्ट होने लगता है, उसकी समुचित देखभाल नहीं हो पाती । उसके विपरीत जो कर्मठ होता है, उद्यम में लगा रहता है, जो ऐश्वर्य-वृद्धि हेतु विभिन्न कार्यों को संपन्न करने के लिए भ्रमण करता है, यहां-वहां जाता है उसके सौभाग्य की भी वृद्धि होती है, धन-धान्य, संपदा, आगे बढ़ते हैं ।

पर्यटन में लगे रोहित का एक और वर्ष बीत गया और वह घर लौटने लगा । पिछली बारों की तरह इस बार भी उसे मार्ग में ब्राह्मण-रूपी इंद्र मिल गए, जिन्होंने उसे “चरैवेति” कहते हुए पुनः भ्रमण करते रहने की सनाह दी । रोहित उनके बचनों का सम्मान करते हुए फिर से पर्यटन में निकल गया ।

इस प्रकार रोहित चार वर्षों तक यत्रतत्र भ्रमण करता रहा । चौथे वर्ष के अंत पर जब वह घर लौटने को उद्यत हुआ तो मार्ग में उसे ब्राह्मण भेष में इंन्द्रदेव पुनः मिल गए । उन्होंने हर बार की तरह “चरैवेति” का उपदेश दिया और कहा –

कलिः शयानो भवति संजिहानस्तु द्वापरः ।

उत्तिष्ठस्त्रेता भवति कृतं संपाद्यते चरंश्चरैवेति ॥

(ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय 3, खण्ड 3)

 (शयानः कलिः भवति, संजिहानः तु द्वापरः, उत्तिष्ठः त्रेता भवति, चरन् कृतं संपाद्यते, चर एव इति ।)

अर्थ – शयन की अवस्था कलियुग के समान है, जगकर सचेत होना द्वापर के समान है, उठ खड़ा होना त्रेता सदृश है और उद्यम में संलग्न एवं चलनशील होना कृतयुग (सत्ययुग) के समान है । अतः तुम चलते ही रहो (चर एव) ।

इस श्लोक में मनुष्य की चार अवस्थाओं की तुलना चार युगों से क्रमशः की गई है । ये अवस्थाएं हैं (1) मनुष्य के निद्रामग्न एवं निष्क्रिय होने की अवस्था, (2) जागृति किंतु  आलस्य में पड़े रहने की अवस्था, (3) आलस्य त्याग उठ खड़ा होकर कार्य के लिए उद्यत होने की अवस्था, और (4) कार्य-संपादन में लगते हुए चलायमान होना । ब्राह्मण रूपी इन्द्र रोहित को समझाते हैं कि जैसे युगों में सत्ययुग उच्चतम कोटि का कहा जाता है वैसे ही उक्त चौथी अवस्था श्रेष्ठतम स्तर की कही जाएगी । उस युग में समाज सुव्यस्थित होता था और सामाजिक मूल्यों का सर्वत्र सम्मान था । उसके विपरीत कलियुग सबसे घटिया युग कहा गया है क्योंकि इस युग में समाज में स्वार्थपरता सर्वाधिक रहती है और परंपराओं का ह्रास देखने में आता है । उपर्युक्त पहली अवस्था इसी कलियुग के समान निम्न कोटि की होती है ।

उक्त प्रकार से संचरण में लगे रोहित के पांच वर्ष व्यतीत हो गये । कथा के अनुसार ब्राह्मण भेषधारी इन्द्र ने अंतिम (पांचवीं) बार फिर से रोहित को संबोधित करते हुए “चरैवेति” के महत्व का बखान किया । तदनुसार पुनः भ्रमण पर निकले रोहित को अजीगर्त नामक एक निर्धन ब्राह्मण के दर्शन हुए । उक्त वाह्मण से उसने उनके पुत्र, शुनःशेप, को खरीद लिया ताकि वह बालक वरुणदेव के लिए संपन्न किए जाने वाले यज्ञ में स्वयं के बदले इस्तेमाल कर सके ।

शुनःशेप (विकल्पतः शुनःशेफ) से संबंधित कथा का शेष और अंतिम भाग अगली पोस्ट में । – योगेन्द्र जोशी

Previous Older Entries