कठोपनिषद् के नीति वचन – श्रेयस् (कल्याणप्रद) एवं प्रेयस् (चित्ताकर्षक) में चुनाव

कठोपनिषद् में ऋषिकुमार बालक नचिकेता और यम देवता के बीच प्रश्नोत्तरों की कथा का वर्णन है । नचिकेता की शंकाओं का समाधान करते हुए यम उपदेश देते हैं कि मनुष्य दो प्रकार के कर्मों से बंधा रहता है, प्रथम वे जो कल्याणकारी होते हैं और द्वितीय वे जो उसको प्रिय लगते हैं तथा उसे अपनी ओर खींचते हैं । तद्विषयक ये दो मंत्र विशेष तौर पर उल्लेखनीय हैं:

अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषंसिनीतः ।
तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ।।

(कठोपनिषद्, अध्याय १, बल्ली २, मंत्र १)
[अन्यत् श्रेयः उत अन्यत् (च) एव प्रेयः, ते उभे पुरुषम् नाना अर्थे सिनीतः; तयोः श्रेयः आददानस्य साधुः भवति, यः उ प्रेयः वृणीते (सः) अर्थात् हीयते ।]

एक वह कर्म है जिसमें उसका हित निहित रहता है और दूसरा वह है जो उसे प्रिय लगता है । ये दोनों ही उसे विभिन्न प्रयोजनों से बांधे रहते हैं । इन दो में से प्रथम कल्याणकारी कर्म को चुनने वाले का भला होता है, किंतु लुभाने वाले दूसरे कर्म में संलग्न पुरुष सार्थक पुरुषार्थ से च्युत हो जाता है ।

श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ।
श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते ।।

(कठोपनिषद्, अध्याय १, बल्ली २, मंत्र २)
[श्रेयः च प्रेयः च मनुष्यम् एतः, धीरः तौ सम्परीत्य विविनक्ति, धीरः हि श्रेयः अभि प्रेयसः वृणीते, प्रेयः मन्दः योग-क्षेमात् वृणीते ।]

मंगलकारी तथा प्रिय लगने वाले कर्म मनुष्य के पास क्रमशः आते रहते हैं, अर्थात् चुने और संपन्न किये जाने हेतु वे उपस्थित होते रहते हैं । गहन विचारणा के पश्चात् विवेकशील व्यक्ति दोनों के मध्य भेद करता है और प्रिय की तुलना में हितकर का चुनाव करता है । अविवेकी पुरुष (ऐहिक) योगक्षेम के कारण मन को अच्छा लगने वाले कर्म को चुनता है ।

कठोपनिषद् में (जैसा अन्य सभी उपनिषदों में है) दर्शन (फिलॉसफी) तथा अध्यात्म (स्पिरिच्युअलिज्म्) से संबंधित बातों की चर्चा की गयी है । वैदिक चिंतन के अनुसार मानव जीवन का अंतिम उद्येश्य आध्यात्मिक उन्नति है, परमात्म-तत्व का साक्षात्कार करना है, जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होना है । आत्मिक उत्थान हेतु किये गये प्रयास को ही श्रेयस्कर कर्म की संज्ञा दी गयी है । इसके विपरीत सांसारिक सुखभोग, शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्यलाभ, संपदा-संपन्नता का अर्जन इत्यादि (योगक्षेम) को प्रेयस् या प्रिय लगने वाला कर्म कहा गया है । उक्त मंत्रों का आशय यह है कि मनुष्य द्वितीय प्रकार के ऐहिक प्रयोजनों हेतु किये जाने वाले कर्मों में लिप्त रहता है, क्योंकि उसे तात्कालिक अथवा अल्पकालिक लाभ का आकर्षण बांधे रहता है । लेकिन उसे अपने आध्यात्मिक श्रेयस् में स्वयं को लगाना चाहिए ।

अध्यात्म की कोई सार्थकता आज के युग में है भी ? इस बात पर मुझे शंका है । मेरे अनुभव और अनुमान से अब अध्यात्म की बात एक औपचारिकता की बात भर रह गयी है । इस भौतिक जीवन के परे भी कुछ है यह शंकास्पद है, और उस दिशा में अपना समय लगाना निष्प्रयोजन समझा जाता है । वस्तुतः मनुष्य धर्मकर्म जैसी बातें भी ऐहिक सुखप्राप्ति के लिए ही करता है ऐसा मुझे प्रतीत होता है । कितने जन होंगे जो कभी कुछ पल का समय निकालकर अपने कृत्यों का आकलन आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में करते हों । मुझे लगता है कि इन मंत्रों की उपरिचर्चित व्याख्या अब शायद ही स्वीकार्य हो । ऐसे में इनकी पुनर्व्याख्या की जा सकती है ।

यदि हम आज की स्थिति, जिसमें सब कुछ सांसारिक है और उसके परे कुछ है भी कि नहीं इस बात पर चिंतन शायद ही कहीं होता हो, के अनुरूप इन मंत्रों की प्रासंगिकता की बात करें, तो भी इन मंत्रों के कुछ अर्थ ढूढ़े जा सकते हैं । सांसारिक संदर्भ में भी कल्याणकारी एवं लुभावने कर्मों में भेद किया जाता है । अपने दीर्घकालिक तथा स्थाई हितों और क्षणिक या तात्कालिक आनंदप्रद कार्यों में किसे चुनें यह प्रश्न हमारे समक्ष सदा से ही रहता आया है । व्यक्ति आनंदभोग में लिप्त रहे और अपना बहुत कुछ बर्बाद होने दे यह सदा ही कटु आलोचना का विषय रहा है, और विद्वज्जन सदा ही ऐसे कार्यों से बचने की राय देते हैं । दूसरी तरफ हम अपने जीवन के उच्च उद्येश्य निर्धारित करते हैं, जो भौतिक सुखप्राप्ति से एक कदम आगे मानव-समाज तथा संसार के व्यापक हितों के अनुरूप होते हैं । ऐसे कर्म हमारे कृत्यों के अंग बनें इस विचार को आदर्श के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है । कदाचित् यही इन मंत्रों में छिपा संदेश है कि विवेकी मनुष्य अपने कर्मों के परिणामों का सावधानी से आकलन करते हुए उनमें से प्रेयस् के स्थान पर श्रेयस् को चुने । – योगेन्द्र जोशी

1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. श्रीपाद
    फरवरी 18, 2012 @ 16:40:07

    अलौकिक

    प्रतिक्रिया

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