“क: त्वम् कः अहम् कुतः आयातः …” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् – ५

इस चिट्ठे के छ: आलेखों की शृंखला की यह मेरी पांचवी प्रविष्टि है। ध्यान रहे कि इन आलेखों में आदिशंकराचार्य द्वारा विरचित “चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्” के १८ छंदों की चर्चा की जा रही है। (देखें इसका पूर्ववर्ती आलेख, दिनांक ७ मार्च, २०१७)

पहले आलेख में इस बात का उल्लेख किया था कि इस रचना में कुल सत्रह छंद हैं और उनके अतिरिक्त एक स्थायी छंद (भज गोविन्दं भज गोविन्दं …) भी है जो इनमें से प्रत्येक छंद के बाद प्रयुक्त हुआ है। यदि उक्त स्तोत्र को भजन के तौर पर गाया जाये तो यह छंद प्रत्येक के बाद गाया जायेगा। इसकी भूमिका गायन के स्थायी के समान है। इसे आगे उद्धृत किया जा रहा है:

[

भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ् करणे ॥

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब तुम्हारा मरणकाल पास आ जायेगा तब यह “डुकृञ् करणे” की रट तुम्हें नहीं बचाएगी। “डुकृञ्” संस्कृत व्याकरण की एक क्रियाधातु है जिसका अर्थ “(कर्वव्य) करना” है। इस क्रियाधातु का व्यवहार में प्रयोग सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। अर्थात्‍ इस पर बहुत दिमाग खपाना कुछ हद तक निरर्थक है। व्याकरण के अध्येता उक्त क्रियाधातु के अर्थ एवं प्रयोजन को याद रखने के लिए “डुकृञ् करणे” रटते होंगे जिसका तात्पर्य है “डुकृञ्” क्रिया “करण” (कार्य करना) के प्रयोजन में लिया जाता है । स्तोत्र के रचनाकार की दृष्टि में जीवन के अंतकाल तक सांसारिक कार्यों में ही निरंतर लिप्त रहना फलदायक नहीं है यह भाव “डुकृञ् करणे” के रटने में प्रतिबिंबित होता है।  “अब तो इस रट को छोड़ो और ईश्वर-प्रार्थना में संलग्न होओ।”

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चिट्ठे की मौजूदा प्रविष्टि में चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् के तीन छंद क्रमशः १२, १३, एवं १४ प्रस्तुत किये जा रहे हैं । इनमें पहला छंद है:

कस्त्वं कोऽहं कुतः आयातः का मे जननी को मे तातः ।

इति परिभावय सर्वमसारं विश्वं त्यक्त्वा स्वप्नविचारम् ॥१२॥ भज …

(सर्वम् असारम् स्वप्न-विचारम् विश्वंम् त्यक्त्वा त्वम् कः, अहम्  कः कुतः आयातः, मे जननी का, मे तातः कः इति परि-भावय ।)

अर्थ – इस सारहीन स्वप्नसदृश संसार में रुचि त्यागते हुए तुम कौन हो, मैं कौन हूं, कहां से आया, कौन मेरी जन्मदात्री, कौन मेरे पिता, इन बातों पर चिंतन करो।

वैदिक दर्शन के अनुसार यह संसार एक दीर्घकालिक स्वप्न से अधिक कुछ नहीं। जब मनुष्य को परमात्म तत्व का ज्ञान हो जाता है तो संसार के सारहीन, मिथ्या अर्थात्‍ अंततः सत्य से परे होने की अनुभूति हो जाती है। तब सभी रिश्ते-नाते अर्थहीन हो जाते हैं।

गेयं गीतानामसहस्रं ध्येयं श्रीपतिरूपमजस्रम् ।

नेयं सज्जनसङ्गे चित्तं देयं दीनजनाय च वित्तम् ॥१३॥ भज …

(गीता-नाम-सहस्रम् गेयम् , अजस्रम् श्री-पति-रूपम् ध्येयंम्, सज्जन-सङ्गे चित्तम्  नेयम् दीन-जनाय च वित्तम् देयम्‍ ।)

अर्थ – भगवद्गीता और विष्णुसहस्रनाम का पाठ करना चाहिए, भगवान्‍ विष्णु के रूप का निरंतर ध्यान करना चाहिए, अपना चित्त सज्जनों की संगत में लगाना चाहिए, और दीनहीन जनों को धन-दान करना चाहिए।

इस छंद में ईश्वरभक्ति और सत्कार्यों में मन लगाने का उपदेश दिया गया है।

यावज्जीवो निवसति देहे कुशलं तावत्पृच्छति गेहे ।

गतवति वायौ देहापाये भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये ॥१४॥ भज …

(जीवः यावत् देहे निवसति तावत् गेहे कुशलम्  पृच्छति, देह-अपाये वायौ गतवति तस्मिन्  काये भार्या बिभ्यति ।)

अर्थ – जब तक जीवधारी (संदर्भ में मनुष्य) शरीर में रहता है तब तक हर कोई घर में कुशलक्षेम पूछता है। शरीर के गिरने और प्राणवायु के निकलने पर उस शरीर से पत्नी तक डर जाती है।

     मनुष्य से किसी का भी लगाव तभी तक रहता है जब तक उसके शरीर में प्राण रहते है। जैसे ही काल-कलवित होकर वह निष्प्राण हो जाता है उससे सभी विरत होने लगते है। जिस पत्नी से आजीवन उसके अंतरंग संबंध रहे हों वह तक उस शरीर से दूर हो जाती है। यही इस जीवन का सच है। इन छंदों से यह संदेश मिलता है कि जब संसार को त्यागना ही होता है, तब क्यों न जीवितावस्था में ही उससे मोह त्यागते हुए ईश्वरप्राप्ति के प्रयास किए जाएं। – योगेन्द्र जोशी

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“… ज्ञाते तत्वे कः संसारः ” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् – ४

… तत्व अर्थात् सृष्टि के अंतिम सत्य (परमात्मा) का ज्ञान प्राप्त हो जाने पर यह संसार अर्थहीन लगने लगता है।

इस चिट्ठे के छ: आलेखों की शृंखला की यह मेरी चौथी प्रविष्टि है। याद दिला दूं कि इन आलेखों में आदिशंकराचार्य द्वारा विरचित “चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्” के १८ छंदों की चर्चा की जा रही है। (देखें इसका पूर्ववर्ती आलेख, दिनांक ११ फरवरी, २०१७)

पहले आलेख में इस बात का उल्लेख किया था कि इस रचना में कुल सत्रह छंद हैं और उनके अतिरिक्त एक स्थायी छंद (भज गोविन्दं भज गोविन्दं …) भी है जो इनमें से प्रत्येक छंद के बाद प्रयुक्त हुआ है। यदि उक्त स्तोत्र को भजन के तौर पर गाया जाये तो यह छंद प्रत्येक के बाद गाया जायेगा। इसकी भूमिका गायन के स्थायी के समान है। इसे आगे उद्धृत किया जा रहा है:

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भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ्‍ करणे ॥

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब तुम्हारा मरणकाल पास आ जायेगा तब यह “डुकृञ्  करणे” की रट तुम्हें नहीं बचाएगी। “डुकृञ्‍” संस्कृत व्याकरण की एक क्रियाधातु है जिसका अर्थ “(कर्वव्य) करना” है। इस क्रियाधातु का व्यवहार में प्रयोग सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। अर्थात्‍ इस पर बहुत दिमाग खपाना कुछ हद तक निरर्थक है। व्याकरण के अध्येता उक्त क्रियाधातु के अर्थ एवं प्रयोजन को याद रखने के लिए “डुकृञ्  करणे” रटते होंगे जिसका तात्पर्य है “डुकृञ्” क्रिया “करण” (कार्य करना) के प्रयोजन में लिया जाता है । स्तोत्र के रचनाकार की दृष्टि में जीवन के अंतकाल तक सांसारिक कार्यों में ही निरंतर लिप्त रहना फलदायक नहीं है यह भाव “डुकृञ्  करणे” के रटने में प्रतिबिंबित होता है।  “अब तो इस रट को छोड़ो और ईश्वर-प्रार्थना में संलग्न होओ।”

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चिट्ठे की मौजूदा प्रविष्टि में चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् के तीन छंद (क्रमिकता में ९, १०, एवं ११) प्रस्तुत किये जा रहे हैं । इनमें पहला छंद है:

पुनरपि रजनी पुनरपि दिवसः पुनरपि पक्षः पुनरपि मासः ।

पुनरप्ययनं पुनरपि वर्षं तदपि न मुञ्चत्याशामर्षम् ॥९॥ भज …

(पुनः अपि रजनी पुनः अपि दिवसः पुनःअपि पक्षः पुनःअपि मासः पुनः अपि अयनंम् पुनः अपि वर्षं तत् अपि न मुञ्चति आशा-अमर्षम् ।)

अर्थ – रात्रि पुनः-पुनः आती है, दिन भी फिर-फिर आता है। महीने के पक्ष और स्वयं महीने बारबार आते-जाते रहते हैं। वर्ष के दोनों अयन (अर्धवार्षिक) एवं स्वयं वर्ष भी आते हैं, जाते हैं। किंतु मनुष्य की आशा और असहनशीलता यथावत बनी रहती हैं, छोड़ के जाती नहीं।

रात्रि, दिवस, पक्ष, माह, अयन और वर्ष ये सभी निरंतर प्रवाहित हो रहे समय के अलग-अलग माप के कालखंड हैं। मनुष्य के जीवन में ये कालखंड बारंबार आते-जाते रहते हैं। श्रीशंकराचार्य का कथन है कि एक नहीं दो नहीं, अनेक कालखंड व्यतीत हो जाते हैं पंरतु उसके जीवन की आशा और असहनशीलता में अंतर नहीं आता है। मेरी समझ में मौजूदा प्रसंग में असहनशीलता के अर्थ “विपरीत परिस्थितियों में विचलित हो जाना” से लिया जाना चाहिए। मतलब यह है कि वृद्धावस्था में मनुष्य मनोनुकूल घटित न होने पर बेचैन हो जाता था। वह वस्तुस्थिति को सह नहीं पाता है।

ध्यान दें कि काल-मापन की भारतीय पद्धति में महीने के दो पक्ष होते हैं: कृष्ण एवं शुक्ल। इसी प्रकार वर्ष के भी अयन नाम से दो भाग होते हैं: दक्षिणायण एवं उत्तरायण। दक्षिणायण में सूर्य का झुकाव दक्षिण की ओर होता जाता है और फलतः दिन छोटे तथा रात्रि बड़ी होने लगते है। उत्तरायण में सूर्य उत्तर की ओर लौटने लगता है और फलतः दिन बड़े होने लगते हैं तथा रातें छोटी। संस्कृत के संधि एवं ध्वनि संबंधी नियमों के अनुसार अयन के न का ण हो जाता है यदि उसके पहले टवर्ग का कोई वर्ण, या ष अथवा र आते हों। अर्थात् उत्तर+अयन = उत्तर+अयण = उत्तरायण और दक्षिण+अयन = दक्षिण+अयण = दक्षिणायण।

अगला छंद है:

वयसि गते कः कामविकारः शुष्के नीरे कः कासारः ।

नष्टे द्रव्ये कः परिवारो ज्ञाते तत्वे कः संसारः ॥१०॥ भज …

(वयसि गते कः काम-विकारः शुष्के नीरे कः कासारः नष्टे द्रव्ये कः परिवारः ज्ञाते तत्वे कः संसारः।)

अर्थ – अवस्था ढलने पर काम-विकार कैसा, पानी सूखने पर जलाशय कहां रह जाता है, धन-संपदा की समाप्ति पर परिवार कैसा, और इसी प्रकार तत्वज्ञान की प्राप्ति पर संसार कहां रह जाता है?

इस कथन के अनुसार कुछ बातें स्वाभाविक तौर पर घटित होती हैं। जीवन के अंतिम पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते काम-भावना समाप्त होने लगती है। काम शब्द के अर्थ सामन्यतः इच्छा या लालसा से लिया जाता है। इसे विशेष तौर पर यौनेच्छा से भी जोड़ा जाता है। (रतिशास्त्र में कामदेव इसी इच्छा के प्रतीक हैं।) इच्छाएं तो मनुष्य की मरते दम तक बनी रहती हैं। यह भी हो जाये, वह भी हो जाए जैसी लालसाएं तो बनी ही रहती हैं। यौनेच्छा कदाचित् समाप्त होने लगती है, शारीरिक सामर्थ्य के घटने से। इसलिए मेरा सोचना है कि इस कथन में काम-विकार उसी को इंगित करता है। जलाशय तभी तक अर्थ रखता है जब तक उसमें जल रहे। परिवार भी आपको तभी तक महत्व देता है जब तक कि संपदा हो। उल्लिखित सभी चीजें स्वाभाविक रूप से समाप्त होने लगती हैं । उनके विपरीत किंतु ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रयास करने होते हैं। और वह जब प्राप्त होता है तब यह संसार सारहीन लगने लगता है।

तृतीय छंद:

नारीस्तनभरनाभिनिवेशं मिथ्यामायामोहावेशम् ।

एतन्मांसवसादिविकारं मनसि विचारय बारम्बारम् ॥११॥ भज …

(नारी-स्तन-भर-नाभि-निवेशं मिथ्या-माया-मोह-आवेशम् एतत् मांस-वसा-आदि विकारम् मनसि विचारय बारम्बारम्)

अर्थ – नारी के स्तनों एवं नाभि (यौनांग) में निवेश माया एवं मोह जनित मिथ्या (निरर्थक) रुचि है। ये शरीर के मांस एवं वसा के विकार मात्र हैं यह बात निरंतर अपने विचार में रखो।

निवेश शब्द के अर्थ संबधित अंगों में रुचि लेना अर्थात्‍ उनको लेकर रतिक्रीड़ा करना लिया जा सकता है। मांस/वसा के विकार का अर्थ है कि मांस एवं वसा से बने इस शरीर के किसी अंग ने कुछ ऐसा स्वरूप ले लिया कि वे आकर्षक लगने लगे। “अरे पुरुष, यह मत भूलो कि ये वस्तुतः मांस-वसा से ही बने हैं जैसे शरीर के अन्य अंग, फिर उनमें विशेष रुचि क्यों?”

काम-भावना से मुक्त, विरक्त, व्यक्ति के लिए ये विचार सहज रूप से स्वीकार्य होंगे, किंतु सामान्य व्यक्ति को दिक्कत होगी।

     इस स्थल पर मुझे एक गंभीर टिप्पणी की आवश्यकता महसूस होती है। इस श्लोक में मुझे लगता है स्त्री को अस्पष्ट शब्दों में भोग्या वस्तु के तौर पर दर्शाया गया है। मैंने जितने भी धर्मों और धार्मिक परंपराओं की जानकारी अर्जित की है उन सभी में पुरुष को ही केंद्र में रखकर बातें कही गयी हैं। इस बात पर गौर करें कि सभी धर्मों के प्रणेता या उनकी मान्यताओं में योगदान करने तथा उन्हें आगे बढ़ाने वाले पुरुष ही रहे हैं। सभी धर्मों में पुरुषों के कर्तव्यों तथा हितों की बातें कही गयी हैं और स्त्री को उनके अधीनस्थ दोयम दर्जे के व्यक्ति के तौर पर देखा गया है। कुर’आन में साफ तौर पर कहा गया है कि अल्लाह ने पुरुष को श्रेष्ठतर बनाया है और स्त्री को उसके कहे अनुसार चलने को कहा गया है (कुर’आन, सुरा ४, आयत ३४)। कहा जाता है कि बौद्ध धर्म के आरंमिक काल में स्त्रियों को धर्म-संघों में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। अरबी मूल के धर्मों मे सभी पैगंबर पुरुष ही रहे हैं। भारत में भी ऋषि-मुनि पुरुष ही हुए हैं (शायद कुछ अपवाद हों)। मनुस्मृति (अध्याय ५, श्लोक १४७, १४८) में कहा गया है कि स्त्री बचपन में पिता के, दाम्पत्य जीवन में पति के, और उसके बाद पुत्रों के अधीन होती है; वह स्वतंत्र रहने की अधिकारिणी नहीं होती है। कट्टर धार्मिक मान्यताओं वाले कुछ लोग स्त्री को नर्क का द्वार बताते हैं। इस प्रकार की तमाम बातें सभी समाजों, धर्मों में देखने को मिलती हैं। उक्त छंद में स्त्री को इन्हीं विचारों के अनुरूप प्रस्तुत किया गया है ऐसा मेरा मत है। इस छंद से यही प्रतीत होता है कि पुरुष के लिए स्त्री मांस का लोथड़ा भर है; स्त्री के लिए पुरुष क्या है? मेरे पास उत्तर नहीं है! – योगेन्द्र जोशी

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“अङ्गम् गलितम् पलितम् मुण्डम् …” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् – ३

इस चिट्ठे के छ: आलेखों की शृंखला की यह मेरी तीसरी प्रविष्टि है। याद दिला दूं कि इन आलेखों में आदिशंकराचार्य द्वारा विरचित “चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्” के १८ छंदों की चर्चा की जा रही है। (देखें दिनांक ६ जनवरी, २०१७, का आलेख)

पहले आलेख में इस बात का उल्लेख किया था कि इस रचना में कुल सत्रह छंद हैं और उनके अतिरिक्त एक स्थायी छंद (भज गोविन्दं भज गोविन्दं …) भी है जो इनमें से प्रत्येक छंद के बाद प्रयुक्त हुआ है। यदि उक्त स्तोत्र को भजन के तौर पर गाया जाये तो यह छंद प्रत्येक के बाद गाया जायेगा। इसकी भूमिका गायन के स्थायी के समान है।

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भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ्करणे ॥

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब तुम्हारा मरणकाल पास आ जायेगा तब यह “डुकृञ्  करणे” की रट तुम्हें नहीं बचाएगी। “डुकृञ्” संस्कृत व्याकरण की एक क्रियाधातु है जिसका अर्थ “(कर्वव्य) करना” है। इस क्रियाधातु का व्यवहार में प्रयोग सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। अर्थात् इस पर बहुत दिमाग खपाना कुछ हद तक निरर्थक है। व्याकरण के अध्येता उक्त क्रियाधातु के अर्थ एवं प्रयोजन को याद रखने के लिए “डुकृञ्‍करणे” रटते होंगे जिसका तात्पर्य है “डुकृञ्” क्रिया “करण” (कार्य करना) के प्रयोजन में लिया जाता है । स्तोत्र के रचनाकार की दृष्टि में जीवन के अंतकाल तक सांसारिक कार्यों में ही निरंतर लिप्त रहना फलदायक नहीं है यह भाव “डुकृञ्‍करणे” के रटने में प्रतिबिंबित होता है।  “अब तो इस रट को छोड़ो और ईश्वर-प्रार्थना में संलग्न होओ।”

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चिट्ठे की इस प्रविष्टि में चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् के तीन छंद (क्रमिकता में ६, ७, एवं ८) प्रस्तुत किये जा रहे हैं । इनमें पहला छंद है:

अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम् ।

वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशा पिण्डम्॥६॥ [भज …]

(अङ्गम् गलितम् पलितम् मुण्डम् दशन-विहीनम् जातम् तुण्डम् वृद्ध: याति गृहीत्वा दण्डम् तत्+अपि न मुञ्चति आशा-पिण्डम्।)

अर्थ –  (वृद्धावस्था में) अंग गलित (या ढीले, निष्क्रिय) हो चुकते हैं, शिर के बाल पक जाते हैं, मुख दंतविहीन हो जाता है। इस अवस्था को प्राप्त बूढ़ा व्यक्ति लाठी ले के चलता है। इतने सब के बावजूद जीवन की आशा पिंड नहीं छोड़ती।

बालस्तावत्क्रीडासक्तस्तरुणस्तावत्तरुणीरक्तः ।

वृद्धस्तावच्चिन्तामग्नः पारे ब्रह्मणि कोऽपि न लग्नः ॥७॥ [भज …]

(बाल: तावत् क्रीडा-आसक्तः तरुण: तावत् तरुणी-रक्तः वृद्ध: तावत् चिन्ता-मग्नः पारे ब्रह्मणि कः अपि न लग्नः।)

अर्थ –  (मनुष्य) बाल्यावस्था में खेलकूद में लगा रहता है, वयस्क होने पर तरुणी (स्त्री अथवा पत्नी) में आसक्त रहता है, और वृद्ध हो जाने पर तमाम चिंताओं से ग्रस्त रहता है। (विडंबना है) कि परब्रह्म (के चिंतन) में कभी संलिप्त नहीं होता है।

पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् ।

इह संसारे खलु दुस्तारे कृपयापारे पाहि मुरारे ॥८॥ [भज …]

(पुनः अपि जननम् पुनः अपि मरणम् पुनः अपि जननी-जठरे शयनम् इह संसारे खलु दुः-तारे कृपया अपारे पाहि मुरारे।)

अर्थ –  (इस संसार में मनुष्य का) पुनःपुनः जन्म होता और वह फिर-फिर मृत्यु को प्राप्त होता है। बारबार जन्मदात्री मां के गर्भ में पड़े रहने  का कष्ट भोगता है। हे भगवान मुरारे, इस दुस्तरणीय (जिसके पार जाया न जा सके) संसार से कृपा करके मुझे पार कर दो।

इन तीनों छंदों के पहले में वृद्धवस्था का वर्णन किया गया। मनुष्य की स्थिति कारुणिक हो जाती है। तिस पर भी उसकी जीने की लालसा और कष्टों से मुक्ति की आशा समाप्त नहीं होती। दूसरे छंद में ग्रंथरचयिता कहता है कि जीवन के अलग-अलग कालखंडों में मनुष्य की गतिविधियां शारीरिक सामर्थ्य और भावनात्मक परिवर्तनों के अनुसार बदलती रहती हैं, किंतु भगवद्भक्ति में लगने का विचार उसमें मन में नहीं उठता जो उसे जन्ममृत्यु के कष्टमय चक्र से मुक्ति दिलाए। तीसरे छंद में जीवन-मरण के कष्टकर चक्र के वर्णन के साथ भगवान – यहां पर उसे मुरारि के रूप में संबोधित किया गया है – से इस भवसागर से मुक्त करने की प्रार्थना की गयी है। – योगेन्द्र जोशी

 

“पृच्छति को॓ऽपि न गेहे” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् – २

इस चिट्ठे की पिछली प्रविष्टि (दिनांक १५ दिसंबर, २०१६) में मैंने आदिशंकराचार्य द्वारा विरचित “चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्” की चर्चा की थी। आलेख में इस बात का उल्लेख किया था कि इस रचना में कुल सत्रह छंद हैं और उनके अतिरिक्त एक स्थायी छंद (भज गोविन्दं भज गोविन्दं …) भी है जो इनमें से प्रत्येक छंद के बाद प्रयुक्त हुआ है। यदि उक्त स्तोत्र को भजन के तौर पर गाया जाये तो यह छंद प्रत्येक के बाद गाया जायेगा। इसकी भूमिका गायन के स्थायी के समान है।

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भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ् करणे ॥

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब तुम्हारा मरणकाल पास आ जायेगा तब यह “डुकृञ् करणे” की रट तुम्हें नहीं बचाएगी। “डुकृञ्” संस्कृत व्याकरण की एक क्रियाधातु है जिसका अर्थ “(कर्वव्य) करना” है। इस क्रियाधातु का व्यवहार में प्रयोग सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। अर्थात् इस पर बहुत दिमाग खपाना कुछ हद तक निरर्थक है। व्याकरण के अध्येता उक्त क्रियाधातु के अर्थ एवं प्रयोजन को याद रखने के लिए “डुकृञ् करणे” रटते होंगे जिसका तात्पर्य है “डुकृञ्” क्रिया “करण” (कार्य करना) के प्रयोजन में ली जाती है । स्तोत्र के रचनाकार की दृष्टि में जीवन के अंतकाल तक सांसारिक कार्यों में ही निरंतर लिप्त रहना फलदायक नहीं है यह भाव “डुकृञ् करणे” के रटने में प्रतिबिंबित होता है।  “अब तो इस रट को छोड़ो और ईश्वर-प्रार्थना में संलग्न होओ।”

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इस स्थल पर मैं चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्‍ के तीन छंद (क्रमिकता में ३, ४, एवं ५) प्रस्तुत कर रहा हूं। पहला है

यावद्वित्तोपार्जनसक्तस्तावन्निजपरिवारो रक्तः ।

पश्चाद्धावति जर्जरदेहे वार्तां पृच्छति को॓ऽपि न गेहे॥३॥ (भज …)

(यावद् वित्त-उप-अर्जन-सक्त: तावत् निज-परिवार: रक्तः पश्चात् धावति जर्जर-देहे वार्ताम् पृच्छति क: अपि न गेहे |)

अर्थ – जब तक धन-संपत्ति अर्जित करने में समर्थ हो तब तक उसका परिवार उसमें अनुरक्ति रखता है। बाद में वह जर्जर हो चुके शरीर के साथ इधर-उधर भटकता है और घर में उससे हालचाल भी नहीं पूछता।

मनुष्य वृद्धावस्था में प्रवेश करने पर धन-धान्य अर्जित करने की सामर्थ्य  खो बैठता है। वास्तव में जब यह स्थिति आती है तभी उसे वृद्ध कहना चाहिए, महज उम्र के आधार पर नहीं। उसके इस अवस्था में पहुंचने पर परिवार के लोगों का उसके प्रति लगाव समाप्तप्राय हो जाता है। उसे एक बोझ के तौर पर देखा जाता है। हो सकता है कि प्राचीन काल में ऐसा होता रहा होगा, क्योंकि तब सुविधाएं नहीं थीं। किंतु आज के युग में विविध प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध हैं और कई परिवारों में उनका विशेष ख्याल रखा जाता है।  फिर भी कुछ परिवारों में ऐसा नहीं होता और बूढ़े जनों को तिरस्कार भुगतना पड़ता है। अगला छंद –

जटिलो मुण्डी लुञ्चितकेशः काषायांबरबहुकृतवेषः ।

पश्यन्नपि च न पश्यति लोको ह्युदरनिमित्तं बहुकृतशोक: ॥४॥ (भज …)

(जटिल: मुण्डी लुञ्चित-केशः काषाय-अंबर-बहु-कृत-वेषः पश्यन् अपि च न पश्यति लोक: हि उदर-निमित्तं बहु-कृत-शोक: ।)

अर्थ – पेट के खातिर चिन्ता से ग्रस्त व्यक्ति सिर पर जटाएं धारण कर के या सिर मुढ़ा के, गेरुआ वस्त्र धारण कर के, अथवा तरह-तरह के वेष धारण करके कई उपक्रम करता है।

यह श्लोक यह बताता है कि मनुष्य की पहली चिंता होती है शरीर धारण करने के उपाय करना। आज के युग में आपको अनेक तथाकथित साधु-संत, बाबा-महात्मा मिल जायेंगे जो तमाम तरह की लच्छेदार बातें करके, असामान्य वेषभूषा धारण करके, स्वयं को आध्यात्मिक गुरु घोषित करके या इसी प्रकार के अन्य उपक्रम करके आम जनों को प्रभावित करने में सफल होते है और स्वयं चैन से जीवन-यापन करते हैं। यह श्लोक कदाचित् इस वर्ग के लोगों पर एक टिप्पणी है। याद रहे यह सब भारत के हिन्दू समाज के संदर्भ में ही सही है। अन्य समाजों में इस प्रकार के प्रयास शायद नहीं किए जाते हैं। धर्म के नाम पर हिन्दू समाज को सरलता से मूर्ख बनाया जा सकता है ऐसा मेरा सोचना है।

भगवद्गीता किञ्चिदधीता गङ्गाजललवकणिका पीता ।

सकृदपि यस्य मुरारिसमर्चा तस्य यमः किं कुरुते चर्चाम्‍ ॥५॥ (भज …)

(भगवद्गी ताकिञ्चित्‍ अधीता गङ्गा-जल-लव-कणिका पीता सकृत्‍ अपि यस्य मुरारि-सम्‍-अर्चा तस्य यमः किम्‍ कुरुते चर्चाम्‍ ।)

अर्थे – जिस व्यक्ति ने भगवद्गीता का कुछ भी अध्ययन किया हो, गंगाजल का एक कण या बूंद भी पिया हो, भगवान् श्रीकृष्ण “मुरारि” की कुछ भी आराधना-अर्चना की हो, उसकी यम भी क्या चर्चा करेंगे?

जिस व्यक्ति ने धर्मकर्म में मन लगाया हो और ईश्वर-भक्ति में समय-यापन किया हो उसको मरणकाल पर कष्ट देने की यमराज भी नहीं सोचते होंगे मेरे मत में ऐसा इस छंद का निहितार्थ होगा। छंद में भगवद्गीता-अध्ययन आदि की जो बातें कही गई हैं वे पुण्यकर्म के प्रतीक हैं। भगवद्भजन एवं पुण्यकर्म में लगे हुए व्यक्ति को व्रुद्धावस्था एवं मृत्यु भय कम होता है। यह बात कितना सही होगी यह मैं कह नहीं सकता। (मुर एक राक्षक का नाम था जिसको भगवान् श्रीकृष्ण ने मारा था। इसलिए उनका नाम मुरारि = मुर+अरि = मुर के शत्रु भी है।)योगेन्द्र जोशी

“न मुञ्चति आशावायुः” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् – १

आदिशंकराचार्य ने वैदिक उपनिषदों के भाष्यों के साथ-साथ अनेक छोटी-बड़ी रचनाएं लिखी हैं। उनमें से एक है चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्। मैंने इसे गीताप्रेस, गोरखपुर, द्वारा प्रकाशित “स्तोत्ररत्नावली” नामक पुस्तक से लिया है। चर्पट का शाब्दिक तात्पर्य है चपत अर्थात् चांटा, पञ्जरिका का पिंजड़ा और स्तोत्र का स्तुति हेतु उच्चारित शब्द। रचना के उक्त नाम का क्या अर्थ निकलता है यह मैं नहीं समझ पाया। मुझे लगता है कि “चर्पट” के स्थान पर “कर्पट” होना चाहिए जिसका अर्थ होता है “चिथड़ा”। तब “चर्पटपञ्जरिका” का अर्थ चिथड़ों से बना पिंजड़ा लिया जा सकता है।

उक्त रचना में कुल सत्रह छंद हैं। उनके अतिरिक्त अधोलिखित एक स्थायी छंद और है जो अन्य छंदों में से हरएक के बाद प्रयुक्त हुआ है:

भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ्‍करणे ॥

(मूढमते, गोविन्दम् भज, गोविन्दम् भज, गोविन्दम् भज। सन्निहिते प्राप्ते मरणे “डुकृञ् करणे” नहि नहि रक्षति।)

स्तोत्र के हरएक अन्य छंद के बाद उपर्युक्त छंद के प्रयोग का क्रम गायन में प्रयुक्त अंतरा एवं स्थायी के क्रम के अनुरूप है। इन सभी छंदों में श्री शंकराचार्य ने जीवन की नश्वरता को समझने और ईश्वरभक्ति में रुचि लेने का संदेश दिया है। वे यह बताते हैं किस प्रकार वृद्धावस्था आते-आते मनुष्य शरीर से अशक्त हो जाता है, परिवार एवं समाज में उसकी अह्मियत समाप्त हो जाती है, लोग पर्याप्त सम्मान देना बंद कर देते हैं, इत्यादि। मैं इस एवं आगामी आलेखों की शृंखला में इन छंदों को तीन-तीन की संख्या में उद्धृत कर रहा हूं:

पहले उपर्युक्त छंद का

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब तुम्हारा मरणकाल पास आ जायेगा तब यह “डुकृञ् करणे” की रट तुम्हें नहीं बचाएगी।
मेरी समझ में यह “डुकृञ्‍करणे” प्रतीक है उन ऐहिक काम-धंधों का जिनमें मनुष्य उलझा रहता है। असल में “डुकृञ्” संस्कृत व्याकरण की एक क्रियाधातु है जिसका अर्थ “(कर्वव्य) करना” है। इसका तथा इसके “डु” हटाकर प्राप्त तुल्य क्रियाधातु “कृञ्” का प्रयोग संस्कृत-व्यवहार में सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। अर्थात् इस कृयाधातु पर बहुत दिमाग खपाना एक प्रकार से निरर्थक है। व्याकरण के अध्येता उक्त क्रियाधातु के अर्थ याद करने के लिए कदाचित “डुकृञ् करणे” (तात्पर्य – कर्म करने के प्रयोजन हेतु डुकृञ्) रटते होंगे। मेरी समझ में स्तोत्र के रचनाकार की दृष्टि के अनुसार जीवन के अंतकाल तक सांसारिक कार्यों में ही लिप्त रहना निरर्थक है यह भाव “डुकृञ् करणे” याद रखने में प्रतिबिंबित होता है। रचना के अगले दो छंद आगे उद्धृत हैं:

दिनमपि रजनी सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायाताः ।

कालः क्रीडति गच्छत्यायुस्तदपि न मुञ्चत्याशावायुः ॥१॥ भज …

(दिनम् रजनी अपि सायम् प्रातः शिशिर-वसन्तौ पुनः आयाताः कालः क्रीडति आयुः गच्छति तद्‍-अपि आशा-वायुः न मुञ्चति ।)

अर्थ – दिन तथा रात, प्रातः, सायं शिशिर एवं वसंत ऋतु फ़िर-फ़िर आते हैं। समय खेलता है, आयु व्यतीत होती है, फ़िर भी आशा रूपी प्राणवायु छूटती नहीं।

यहां शिशिर एवं वसंत सभी छ: ऋतुओं (क्रमशः वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, पावस, शरद्‍, हेमंत तथा शिशिर) के सामूहिक प्रतीक हैं। छंद का भाव है कि काल अर्थात् समय प्राणियों के साथ खिलवाड़ करता है, समय का बीतना तमाम घटनाओं के रूप में दिखता है, और् मनुष्य की शेष आयु घटती जाती है। इतना सब होने पर भी मनुष्य भविष्य की आशा पाले रह्ता है।

अग्रे वह्निः पृष्ठे भानू रात्रौ चिबुकसमर्पितजानुः ।

करतलभिक्षा तरुतलवासस्तदपि न मुञ्चत्याशापाशः ॥२॥ भज …

(वह्निः अग्रे भानू पृष्ठे रात्रौ चिबुक-समर्पित-जानुः करतल-भिक्षा तरु-तल-वासः तद्‍-अपि आशा-पाशः न मुञ्चति ।)

अर्थ – सामने अग्नि और पीछे सूर्य रहते हैं; ठुड्डी घुटनों के बीच समाई रहती है; हथेली में भिक्षा मांगना और वृक्ष के नीचे रहना पड़ता है। फिर भी आशा के बंधन से मनुष्य मुक्त नहीं होता है।

यह छंद मनुष्य की वृद्धावस्था का वर्णन करता है कि ठंड से बचने के लिए उसे पीठ की तरफ़ सूर्य के घाम अथवा पेट की ओर अग्नि के ताप का सहारा लेना होता है। अन्यथा घुटनों के बीच सर रखकर गरमाहट लेनी होती है। स्थिति दयनीय हो चुकती है, लेकिन आशा का बंधन उसे संसार से जोड़े रखता है। – योगेन्द्र जोशी

गात्रं सङ्कुचितं गतिः विगलिता … – वृद्धावस्था संबंधी भर्तृहरि के वचन

जीवन-यात्रा के अंत की ओर अग्रसर हो रहे मेरे एक मित्र जब अपनी व्याधियों का वर्णन करने लगे कि कैसे अब उन्हें सुनाई कम देता है, कि चश्मा भी मददगार नहीं रह गया है, कि दांतों के अभाव में ‘डेंचर’से काम चलाना पड़ता है, कि घुटने में दर्द बना ही रहता है, इत्यादि, तो मुझे राजा भर्तृहरि के वैराग्यशतकम् का एक श्लोक स्मरण हो आया । राजा भर्तृहरि के बारे में मैंने इसी ब्लॉक में पहले कभी दो-चार बातें लिखीं हैं (देखें 30 सित. 2008 की प्रवृष्टि। संबंधित श्लोक ये है:

गात्रं सङ्कुचितं गतिर्विगलिता भ्रष्टा च दन्तावलिर्दृष्टिर्नश्यति वर्धते बधिरता वक्त्रं च लालायते ।

वाक्यं नाद्रियते च बान्धवजनो भार्या न शुश्रूषते हा कष्टं पुरुषस्य जीर्णवयसः पुत्रोऽप्यमित्रायते ॥

(भर्तृहरिरचित वैराग्यशतकम् , १११)

(गात्रं सङ्कुचितं, गतिः विगलिता, दन्तावलिः च भ्रष्टा, दृष्टिः नश्यति, बधिरता वर्धते, वक्त्रं च लालायते, बान्धवजनः च वाक्यं न आद्रियते, भार्या न शुश्रूषते, पुत्रः अपि अमित्रायते, हा जीर्णवयसः पुरुषस्य कष्टं ॥)

अर्थ – (वृद्धावस्था में आदमी की ऐसी दुर्गति होती है कि) शरीर सिकुड़ने लगता है (उसमें झुर्रिया पड़ जाती हैं), चाल-ढाल में विकार आ जाता है (व्यक्ति लड़खड़ाते हुए चलता है), दंतपंक्ति गिर जाती है (दांत सड़-गल जाते हैं), आंखों की ज्योति क्षीण हो जाती है, श्रवण-शक्ति का ह्रास हो जाता है, मुंह से लार चूने लगती है (मुख पर भी नियंत्रण नहीं रह जाता है), सगा-संबंधी या नाते रिश्तेदार भी कहे गये वचन का सम्मान नहीं करता है (यानी वह भी वूढ़े व्यक्ति की बातों को सम्मान नहीं देता), पत्नी भी सेवाभाव नहीं दर्शाती है, और पुत्र भी शत्रु की भांति व्यवहार करने लगता है; अहो, उम्र ढल जाने पर पुरुष का जीवन कितना कष्टमय हो जाता है!

उक्त बातें पुरुष को इंगित करते हुए कही गई हैं, किंतु इन्हें अधिक व्यापक संदर्भ में समझा जाना चाहिए, यानी स्त्री एवं पुरुष दोनों के लिए ही ये लागू होती हैं । आधुनिक काल में शारीरिक रोगों के कारगर उपचार उपलब्ध हैं इसलिए आर्थिक तौर पर समर्थ व्यक्ति के लिए स्थिति इतनी गंभीर नहीं रहती है । फिर भी शरीरतः व्यक्ति असमर्थ तो होने ही लगता है । प्राचीन काल में प्रभावी चिकित्सा का अभाव अधिक सताता रहा होगा, जो धन से कमजोर व्यक्ति को आज भी भुगतना पड़ता है । कुछ भी हो बुढ़ापा एक अभिशाप के तौर पर भोगना ही पड़ता है । – योगेन्द्र जोशी