गात्रं सङ्कुचितं गतिः विगलिता … – वृद्धावस्था संबंधी भर्तृहरि के वचन

जीवन-यात्रा के अंत की ओर अग्रसर हो रहे मेरे एक मित्र जब अपनी व्याधियों का वर्णन करने लगे कि कैसे अब उन्हें सुनाई कम देता है, कि चश्मा भी मददगार नहीं रह गया है, कि दांतों के अभाव में ‘डेंचर’से काम चलाना पड़ता है, कि घुटने में दर्द बना ही रहता है, इत्यादि, तो मुझे राजा भर्तृहरि के वैराग्यशतकम् का एक श्लोक स्मरण हो आया । राजा भर्तृहरि के बारे में मैंने इसी ब्लॉक में पहले कभी दो-चार बातें लिखीं हैं (देखें 30 सित. 2008 की प्रवृष्टि। संबंधित श्लोक ये है:

गात्रं सङ्कुचितं गतिर्विगलिता भ्रष्टा च दन्तावलिर्दृष्टिर्नश्यति वर्धते बधिरता वक्त्रं च लालायते ।

वाक्यं नाद्रियते च बान्धवजनो भार्या न शुश्रूषते हा कष्टं पुरुषस्य जीर्णवयसः पुत्रोऽप्यमित्रायते ॥

(भर्तृहरिरचित वैराग्यशतकम् , १११)

(गात्रं सङ्कुचितं, गतिः विगलिता, दन्तावलिः च भ्रष्टा, दृष्टिः नश्यति, बधिरता वर्धते, वक्त्रं च लालायते, बान्धवजनः च वाक्यं न आद्रियते, भार्या न शुश्रूषते, पुत्रः अपि अमित्रायते, हा जीर्णवयसः पुरुषस्य कष्टं ॥)

अर्थ - (वृद्धावस्था में आदमी की ऐसी दुर्गति होती है कि) शरीर सिकुड़ने लगता है (उसमें झुर्रिया पड़ जाती हैं), चाल-ढाल में विकार आ जाता है (व्यक्ति लड़खड़ाते हुए चलता है), दंतपंक्ति गिर जाती है (दांत सड़-गल जाते हैं), आंखों की ज्योति क्षीण हो जाती है, श्रवण-शक्ति का ह्रास हो जाता है, मुंह से लार चूने लगती है (मुख पर भी नियंत्रण नहीं रह जाता है), सगा-संबंधी या नाते रिश्तेदार भी कहे गये वचन का सम्मान नहीं करता है (यानी वह भी वूढ़े व्यक्ति की बातों को सम्मान नहीं देता), पत्नी भी सेवाभाव नहीं दर्शाती है, और पुत्र भी शत्रु की भांति व्यवहार करने लगता है; अहो, उम्र ढल जाने पर पुरुष का जीवन कितना कष्टमय हो जाता है!

उक्त बातें पुरुष को इंगित करते हुए कही गई हैं, किंतु इन्हें अधिक व्यापक संदर्भ में समझा जाना चाहिए, यानी स्त्री एवं पुरुष दोनों के लिए ही ये लागू होती हैं । आधुनिक काल में शारीरिक रोगों के कारगर उपचार उपलब्ध हैं इसलिए आर्थिक तौर पर समर्थ व्यक्ति के लिए स्थिति इतनी गंभीर नहीं रहती है । फिर भी शरीरतः व्यक्ति असमर्थ तो होने ही लगता है । प्राचीन काल में प्रभावी चिकित्सा का अभाव अधिक सताता रहा होगा, जो धन से कमजोर व्यक्ति को आज भी भुगतना पड़ता है । कुछ भी हो बुढ़ापा एक अभिशाप के तौर पर भोगना ही पड़ता है । – योगेन्द्र जोशी

मृच्छकटिकम् नाट्यरचना – चोरी के पक्ष में चोर का तर्क

मृच्छकटिकम् संस्कृत साहित्य की एक चर्चित नाट्यरचना है जिसकी चर्चा मैं पहले कभी कर चुका हूं (देखें ‘संस्कृत नाट्यकृति …’) । इस रचना में चोरी का एक प्रकरण है, जिसमें चोरी के धंधे से जीवनयापन करने वाले चोर के मन में घुप अंधेरी रात में सेंध लगाते समय क्या-क्या विचार उपजते हैं इसका वर्णन किया गया है । शर्विलक नामक वह चोर स्वयं से कहता है कि समाज में चोरी की निःसंदेह निंदा की जाती है, लेकिन वह इस मत को अस्वीकार करता है, क्योंकि याचक की भांति किसी की चाकरी करने से भला तो स्वतंत्र होकर चोरी करना है । लोग कुछ भी मानें, मैं तो इसी कार्य में लगना ठीक मानता हूं । देखिए उसके उद्गार:

कामं नीचमिदं वदन्तु पुरुषाः स्वप्ने तु यद्वर्द्धते

विश्वस्तेसु च वञ्चनापरिभवश्चौर्यं न शौर्यं हि तत् ।

स्वाधीना वचनीयतापि हि वरं वद्धो न सेवाञ्जलिः

मार्गो ह्येष नरेन्द्रसौप्तिकवधे पूर्वं कृतो द्रोणिना ॥

(मृच्छकटिकम्, तृतीय अंक, 11)

(यत् तु स्वप्ने वर्द्धते, विश्वस्तेसु च वञ्चना-परिभवः तत् चौर्यम् शौर्यम् न हि, पुरुषाः इदम् कामम् नीचम् वदन्तु, स्वाधीना वचनीयता अपि हि वरम्, वद्धः सेवा-अञ्जलिः न, पूर्वम् एषः मार्गः हि द्रोणिना नरेन्द्र-सौप्तिक-वधे कृतः ।)

अर्थ - जो लोगों की निद्रावस्था में किया जाता है, अनिष्ट के प्रति अशंकित लोगों का जिस चोरी से तिरस्कार हो जाता है, उसे किसी शूरवीर का कार्य तो नहीं माना जा सकता है । लोग इस कार्य की निंदा करते रहें, परंतु मैं तो निंद्य होने के बावजूद स्वतंत्र वृत्ति होने के कारण इसे श्रेष्ठ मानता हूं; यह किसी के समक्ष सेवक की भांति बद्धहस्त होने से तो बेहतर है । इतना ही नहीं, पहले भी इस मार्ग को द्रोणाचार्य-पु़त्र ने महाराज के पुत्रों के बध हेतु अपनाया था ।

चोर शर्विलक के मतानुसार किसी के आगे हाथ जोड़ने से अच्छा तो स्वतंत्र रूप से संपन्न किया जाने वाला चौर्यकार्य बेहतर है । लोग इसकी निंदा करते हैं, किंतु चर्चित लोगों ने तक चोरी का रास्ता अपनाया  है । इस प्रकरण में महाभारत की उस घटना का उल्लेख चोर करता है जिसमें द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने रात में पांडवों के शिबिर में चोरी से घुसकर द्रौपदी-पुत्रों का बध किया थाजयद्रथ का वध भी श्रीकृष्ण ने धोखे से ही करवाया था । असल में देखा जाए तो चोरी से अपना मकसद सिद्ध करने की तमाम घटनाओं का जिक्र पौराणिक कथाओं में मिलता है । चोरी का मतलब है किसी को धोखा देकर कुछ भी हासिल करना । रामायण में सीताहरण एवं बालीबध ऐसे ही कृत्य थे । इंद्र ने चोरी से ही गौतम-पत्नी अहिल्या का सतीत्व लूटा था ।

आजकल तो ‘चोरी’ आम बात हो गई है । अपने महान् देश में जिधर देखो उधर संभ्रांत कहे जाने वाले अनेकों राजनेता और शासकीय कर्मचारी चोरी में लिप्त पाए जा रहे हैं ।

नाटक में अन्यत्र स्थल पर चोर शर्विलक अपनी प्रेमिका को समझाता है कि चोरी की भी उसकी कुछ मर्यादाएं हैं । वह कहता है:

नो मुष्णाम्यबलां विभूषणवतीं फुल्लामिवाहं लतां

विप्रस्वं न हरामि काञ्चनमथो यज्ञार्थमभ्युद्धृतम् ।

धात्र्युत्सङ्गगतं हरामि न तथा बालं धनार्थी क्वचित्

कार्य्याकार्य्यविचारिणी मम मतिश्चौर्ये९पि नित्यं स्थिता ॥

(मृच्छकटिकम्, चतुर्थ अंक, 6)

(फुल्लाम् लताम् इव विभूषण-वतीम् अबलाम् धनार्थी अहम् नो मुष्णामि, विप्रस्वम् अथो यज्ञार्थम् अभि-उुद्-धृतम् काञ्चनम् न हरामि, तथा धात्रि-उत्सङ्ग-गतम् बालम् न क्वचित् हरामि, चौर्ये अपि कार्य्य-अकार्य्य-विचारिणी मम मतिः नित्यम् स्थिता ।)

अर्थ - सुपुष्पित लता की भांति आभूषणों से लदी स्त्री के आभूषण मैं नहीं छीनता, ब्राह्मण की संपदा और यज्ञकर्म के लिए सुरक्षित सोने पर हाथ साफ नहीं करता, धाय या उपमाता की गोद में स्थित बच्चे की चोरी नहीं करता; दरअसल चोरी के काम में भी मेरी मति करणीय एवं अकरणीय के विवेक पर टिकी रहती है ।

चोर का मंतव्य है कि वह हर प्रकार की, हर किसी की चोरी नहीं करता है । कदाचित् वह कमजोर से छीनाछपटी नहीं करता, गरीब की चोरी नही करता, धर्मकर्म से जुड़ी चीजों की चोरी नहीं करता । चोरी के भी उसके कुछ उसूल हैं ।

आज की सामाजिक स्थिति देखिए । सर्वत्र चोरी और लूटपाट चल रही है । न किसी की उम्र का लिहाज है, न किसी की आर्थिक स्थिति का विचार है, न किसी प्रकार को शर्मोहया है । वस्तुतः चौर्य में संलिप्त मृच्छकटिकम् के पात्र शर्विलक का चरित्र आज के सफेदपोश चोरों से कहीं ऊपर है । – योगेन्द्र जोशी

ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः … – तैत्तिरीय उपनिषद् की प्रार्थना

तैत्तिरीय उपनिषद् 11 प्रमुख उपनिषदों (ईश, ऐतरेय, कठ, केन, छान्दोग्य, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक, माण्डूक्य, मुण्डक, प्रश्न, श्वेताश्वर) में से एक है । यों उपनिषदों की कुल संख्या इससे कहीं अधिक बताई जाती है । गीता प्रेस, गोरखपुर, के एक उपनिषद् विशेषांक में 54 उपनिषदों का उल्लेख है । किंतु पूर्वोक्त उपनिषदों को छोड़ अन्य चर्चा में कम ही सुनाई देते हैं । हर उपनिषद् का आरंभ ‘शान्तिपाठ’ से होता है, जो वस्तुतः एक प्रकार की प्रार्थना है । ये प्रार्थनाएं उन दैवी शक्तियों को संबोधित रहती हैं जिन्हें आस्थावान् लोग सृष्टि के विविध घटकों से जोड़कर देखते आए हैं । वैदिक मान्यता है कि निर्जीव-सी दिखने वाली हर वस्तु के पीछे एक अधिष्ठाता देवता रहता है । उस देवता से कल्याण की प्रार्थना शान्तिपाठ में निहित रहती है ।

तैत्तिरीय उपनिषद् तीन अध्यायों में बंटा है जिनको ‘वल्ली’नाम दिया गया है; ये हैं शिक्षावल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली, एवं भृगुवल्ली । प्रत्येक वल्ली में दिये गये वचन ‘अनुवाक’कहे जाते हैं । इस उपनिषद् का अध्ययन जिस शान्तिपाठ अथवा प्रार्थना से होता है वह अपेक्षया अचर्चित कौषितकीब्राह्मणोपनिषद् तथा मुद्गलोपनिषद् में भी शामिल है । यह प्रार्थना निम्नलिखित है:

ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं नो इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं बह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम । अवतु वक्तारम् ।

ॐ शान्तिः । शान्तिः । शान्तिः ।   

 (ॐ शं नः मित्रः शं वरुणः । शं नः भवतु अर्यमा । शं नः इन्द्रः बृहस्पतिः । शं नः विष्णुः उरुक्रमः । नमः ब्रह्मणे । नमः ते वायो । त्वम् एव प्रत्यक्षं बह्म असि । त्वाम् एव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तत् माम् अवतु । तत् वक्तारम् अवतु । अवतु माम । अवतु वक्तारम् । ॐ शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः ।)  

अर्थ - देवता ‘मित्र’ हमारे लिए कल्याणकारी हों, वरुण कल्याणकारी हों । ‘अर्यमा’हमारा कल्याण करें । हमारे लिए इन्द्र एवं बृहस्पति कल्याणप्रद हों । ‘उरुक्रम’ (विशाल डगों वाले) विष्णु हमारे प्रति कल्याणप्रद हों । ब्रह्म को नमन है । वायुदेव तुम्हें नमस्कार है । तुम ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हो । अतः तुम्हें ही प्रत्यक्ष तौर पर ब्रह्म कहूंगा । ऋत बोलूंगा । सत्य बोलूंगा । वह ब्रह्म मेरी रक्षा करें । वह वक्ता आचार्य की रक्षा करें । रक्षा करें मेरी । रक्षा करें वक्ता आचार्य की । त्रिविध ताप की शांति हो ।

मैं इस प्रार्थना में प्रयुक्त कई संबोधनों/शब्दों के अर्थ समझ नहीं पाया हूं । जैसा पहले कहा गया है, प्रकृति के विविध घटकों और प्राणियों की जैविक प्रक्रियाओं के साथ देवताओं को अधिष्ठाता के तौर पर जोड़ा गया है । ‘मित्र प्राणवायु एवं दिन का अधिष्ठाता देवता है, जब कि वरुण रात्रि एवं अपानवायु का अधिष्ठाता है । सामान्यतः मित्र  के अर्थ सूर्य से लिया जाता है और वरुण को समुद्र तथा जल से जोड़ा जाता है । अर्यमा सूर्यमंडल का देवता है । शब्दकोष में सूर्य को अर्यमा भी कहा गया है । इंद्र वर्षा एवं बृहस्पति बुद्धि के देवता माने गये हैं । (संस्कत में ‘मित्र’शब्द पृल्लिंग में सूर्य, और नपुंसकलिंग में यार-दोस्त-सुहृद् को व्यक्त करता है ।)

विष्णु को पैरों का देवता, अर्थतः गति का देवता, माना गया है । उरुक्रम का शाब्दिक अर्थ है विशाल डगों वाला । कदाचित् इसका संबंध पौराणिक कथाओं में वर्णित वामनावतार में विष्णु द्वारा तीन लोकों को तीन चरणों में नापे जाने से है ।

वैदिक चिंतक शरीर में उपस्थित पांच वायुओं की बात करते हैं । ये हैं: प्राण, अपान, समान, व्यान एवं उदान प्राणवायु का स्थान फेफड़े हैं । शरीर में इसका आवागमन मुख/नासिका के माध्यम से होता है तथा यह जीवन का आधार है । इसके विपरीत अपान मलद्वार से निष्कासित होने वाली वायु है । नाभिक्षेत्र में स्थित पाचन क्रिया में सम्मिलित प्राणशक्ति को समान कहा जाता है । व्यान वह प्राणशक्ति है जो समस्त शरीर में व्याप्त रहती है । इसे कदाचित् रक्त द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंचने वाले पोषक तत्वों के प्रवाह से जोड़ा जा सकता है । और अंत में उदान मस्तिष्क की क्रियाओं को संचालित करने वाली प्राणशक्ति है । वास्तव में ये प्राणशक्तियां क्या हैं मैं समझ नहीं सका हूं ।

इस प्रार्थना में यह तथ्य निहित है कि वह परम ब्रह्म स्वयं को अलग-अलग स्वरूपों में प्रस्तुत करता है । उस ब्रह्म को प्रणाम किया जा रहा है । वायु प्रत्यक्ष और सर्वप्रथम अनुभव की जाने वाली वस्तु है । अतः वायु को ब्रह्म का प्रत्यक्षतः अनुभव में आने वाला देवता कहकर उसी को ब्रह्म कहने की बात कही गयी है ।

ऋत सत्य का ही पर्याय है । यहां पर ऋत वचन उचित एवं निष्ठापरक कथन को व्यक्त करता है । वस्तुनिष्ठ स्तर पर कोई चीज जैसी हो वैसी कहना सत्य कहा गया है ।

इस शान्तिपाठ में शिष्य ब्रह्म से अपनी एवं अपने आचार्य यानी उपदेष्टा वक्ता की रक्षा की प्रार्थना करता है ।

और अंत में तीन बार ‘शान्तिः’ का उच्चारण त्रिविध तापों का कष्टों के शमन हेतु किया गया है । ये ताप हैं: आधिभौतिक, आधिदैविक, एवं आध्यात्मिक – (क्रमशः सांसारिक वस्तुओं/जीवों से प्राप्त कष्ट, दैवी शक्तियों द्वारा दिया गया या पूर्व में स्वयं के किए गये कर्मों से प्राप्त कष्ट, और अध्यात्मिक अज्ञानजनित कष्ट ।) – योगेन्द्र जोशी

महाभारत महाकाव्यः वृक्षरोपण एवं जलाशय विषयक नीतिवचन (4)

विगत ५ तारीख (जनवरी) और उसके पहले की चिट्ठा-प्रविष्टियों में महाभारत महाकाव्य के एक प्रकरण (भीष्म पितामह द्वारा महाराज युधिष्ठिर को दिये गये वृक्षों एवं जलाशयों की महत्ता के उपदेश) का जिक्र किया गया था । उसी से संबंधित इस अंतिम किश्त में नीति विषयक अन्य दो श्लोकों का उल्लेख मैं आगे कर रहा हूं:

तडागकृत् वृक्षरोपी इष्टयज्ञश्च यो द्विजः ।

एते स्वर्गे महीयन्ते ये चान्ये सत्यवादिनः ॥

(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 58, श्लोक 32)

(तडाग-कृत् वृक्ष-रोपी इष्ट-यज्ञः च यः द्विजः, एते स्वर्गे महीयन्ते ये च अन्ये सत्य-वादिनः ।)

अर्थ - तालाब बनवाने, वृक्षरोपण करने, अैर यज्ञ का अनुष्ठान करने वाले द्विज को स्वर्ग में महत्ता दी जाती है; इसके अतिरिक्त सत्य बोलने वालों को भी महत्व मिलता है ।

द्विज का शाब्दिक अर्थ है जिसका दूसरा जन्म हुआ हो । हिंदु परंपरा के अनुसार आम तौर पर तीन वर्णों, ब्राह्मण, क्षत्रिय, एवं वैश्य के लिए द्विज शब्द प्रयुक्त होता है जिनमें यज्ञोपवीत की प्रथा रही है । यह बात कर्मकांडों से जुड़ी है । गहराई से सोचा जाए तो द्विज का अर्थ संस्कारित व्यक्ति से है । कहा गया है “जन्मना जायते शूद्र संस्कारैर्द्विज उच्यते” । अर्थात् जन्म से तो सभी शूद्र ही पैदा होते हैं, संस्कारित होने से ही वह द्विज होता है । संस्कारवान् से तात्पर्य है सदाचरण का जिसे पाठ दिया जा चुका हो, जैसा यज्ञोपवीत के समय किया जाता है । मात्र जनेऊ धारण करने से संस्कारित नहीं हो जाता है कोई; असल बात सदाचरण से बनती है । मैं समझता हूं उक्त श्लोक में द्विज का निहितार्थ यही है ।

यज्ञ का अर्थ सामान्यतः समिधा से प्रज्वलित अग्निकुंड में घी-तिल-जौ जैसे हवनीय सामग्री से हवन करने से लिया जाता हैं । किंतु मैं मानता हूं कि यज्ञ के अर्थ इससे अधिक व्यापक हैं । मेरी राय में यज्ञ का अर्थ विविध कर्तव्यों के संपादन से लिया जाना चाहिए जिनकी मनुष्य से अपेक्षा की जाती है । कदाचित् इसीलिए शास्त्रों में पंच महायज्ञों (भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, एवं ब्रह्मयज्ञ) का उल्लेख मिलता है, जो मनुष्य और मनुष्येतर प्राणियों, पितरों, आदि के प्रति समर्पित रहते हैं । (देखें http://vichaarsankalan.wordpress.com/2010/09/07/ऋग्वैदिक-सूक्ति-आनोभद्र/)सत्य बोलने की महत्ता को तो विश्व के सभी समाजों में मान्यता प्राप्त है, भले ही व्यवहार में तदनुरूप आचरण विरले ही करते हों ।

तस्मात्तडागं कुर्वीत आरामांश्चैव रोपयेत् ।

यजेच्च विविधैर्यज्ञैः सत्यं च सततं वदेत् ॥

(पूर्वोक्त, श्लोक 33)

(तस्मात् तडागं कुर्वीत आरामान् च एव रोपयेत्, यजेत् च विविधैः यज्ञैः सत्यं च सततं वदेत् ।)

अर्थ - उपर्युक्त बातों को दृष्टि में रखते हुए मनुष्य को चाहिए कि वह तालाबों का निर्माण करे/करवाए; बाग-बगीचे बनवाए; विविध प्रकार के यज्ञों का अनुष्ठान करे; और सत्य बोलने का संकल्प ले ।

आराम शब्द संस्कृत के रम् क्रियाधातु से बना है, जिसका अर्थ है आनंद अनुभव करना, प्रसन्न होना, रम जाना आदि । उसके अनुसार आराम का अर्थ बाग-बगीचा, पार्क, रमणीय स्थल, घूमने-फिरने का स्थान आदि लिया जा सकता है । मनुष्य को ऐसे स्थलों का निर्माण कराना चाहिए । यज्ञ का व्यापक अर्थ मैंने हितकर कर्तव्यों के संपादन से लिया है । मनुष्य सत्कर्म करे और मिथ्या भाषण न करे यही संदेश इस श्लोक से लिया जा सकता है । – योगेन्द्र जोशी

महाभारत महाकाव्यः वृक्षरोपण एवं जलाशय विषयक नीतिवचन (3)

मैंने १६ अक्टूबर एवं १२ नवंबर के आलेखों में महाभारत महाकाव्य के एक प्रकरण का जिक्र किया था, जिसमें भीष्म पितामह द्वारा महाराज युधिष्ठिर को दिये गये वृक्षों एवं जलाशयों की महत्ता के उपदेश का वर्णन किया गया है । कई हफ़्तों के बाद मैं उसी विषय पर अगले दो श्लोकों को यहां उद्धृत कर रहा हूं:

पुष्पिताः फलवन्तश्च तर्पयन्तीह मानवान् ।

वृक्षदं पुत्रवत् वृक्षास्तारयन्ति परत्र च ॥

(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 58, श्लोक 30)

(इह पुष्पिताः फलवन्तः च मानवान् तर्पयन्ति, वृक्षाः वृक्षदं पुत्रवत् परत्र च तारयन्ति ।)

अर्थ – फलों और फूलों वाले वृक्ष मनुष्यों को तृप्त करते हैं । वृक्ष देने वाले अर्थात् समाजहित में वृक्षरोपण करने वाले व्यक्ति का परलोक में तारण भी वृक्ष करते हैं ।

पेड़-पौधों का महत्व फल-फूलों के कारण होता ही हैं । अन्य प्रकार की उपयोगिताएं भी उनसे जुड़ी हैं, जैसे पथिकों को छाया, गृहस्थों को जलाने के लिए इंधन, भवन निर्माण के लिए लकड़ी, इत्यादि । स्वर्ग-नर्क में विश्वास करने वालों के मतानुसार परलोक में मनुष्य का तारण पुत्र करता है । इस नीति वचन के अनुसार वृक्ष भी पुत्रवत् उसका तारण करते हैं

तस्मात् तडागे सद्वृक्षा रोप्याः श्रेयोऽर्थिना सदा ।

पुत्रवत् परिपाल्याश्च पुत्रास्ते धर्मतः स्मृताः ॥

(पूर्वोक्त, श्लोक 31)

(तस्मात् श्रेयस्-अर्थिना तडागे सद्-वृक्षा सदा रोप्याः पुत्रवत् परिपाल्याः च, ते धर्मतः पुत्राः स्मृताः ।)

अर्थ - इसलिए श्रेयस् यानी कल्याण की इच्छा रखने वाले मनुष्य को चाहिए कि वह तालाब के पास अच्छे-अच्छे पेड़ लगाए और उनका पुत्र की भांति पालन करे । वास्तव में धर्मानुसार वृक्षों को पुत्र ही माना गया है ।

वृक्षों की उपयोगिता देखते हुए उनको पुत्र कहा गया है । जिस प्रकार मनुष्य अपने पुत्र का लालन-पालन करता है वैसे ही वृक्षों का भी करे । जैसे सुयोग्य पुत्र माता-पिता एवं समाज का हित साधता है वैसे ही वृक्ष भी समाज के लिए हितकर होते हैं ।

मेरा मानना है कि नीतिवचनों में जहां कहीं पुत्र शब्द का प्रयोग किया जाता है वहां उसका अर्थ संतान समझना चाहिए । इस संसार में पुत्र एवं पुत्री की भूमिका समान रूप से महत्वपूर्ण समझी जानी चाहिए, क्योंकि प्राणीजगत् में दोनो की महत्ता समान रूप से देखी जाती है । – योगेन्द्र जोशी

महाभारत महाकाव्यः वृक्षरोपण एवं जलाशय विषयक नीतिवचन (2)

इस चिठ्ठे की पिछली प्रविष्टि (16 अक्टूबर) में मैंने इस बात की चर्चा की थी कि महाभारत महाकाव्य के एक प्रकरण में भीष्म पितामह द्वारा महाराज युधिष्ठिर को वृक्षों एवं जलाशयों की महत्ता के उपदेश का वर्णन किया गया है । उसी विषय पर उपलब्ध अगले दो श्लोकों को यहां उद्धृत किया जा रहा है:

पुष्पैः सुरगणान् वृक्षाः फलैश्चापि तथा पितॄन् ।
छायया चातिथिं तात पूजयन्ति महीरुहः ॥
(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 58, श्लोक 28)
(पुष्पैः सुर-गणान् वृक्षाः फलैः च अपि तथा पितॄन्, छायया च अतिथिं तात पूजयन्ति महीरुहः ।)

अर्थ - हे मेरे तात युधिष्ठिर, वृक्षवृंद अपने फूलों से देवताओं को और उसी प्रकार फलों से पितरों की पूजा करते हैं । इसके अलावा ये वृक्ष अपनी छाया द्वारा अतिथि जनों के प्रति सम्मान दर्शाते हैं ।

तात्पर्य यह है कि पेड़ों से प्राप्त फल-फूलों के माध्यम से ही देवों-पितरों की पूजा-अर्चना की जाती है । थके-मांदे अतिथि (पथिक) को इनसे विश्राम हेतु छाया प्राप्त होती है । इसलिए इनकी महत्ता सर्वस्वीकार्य है ।

किन्नरोरगरक्षांसि देवगन्दर्भमानवाः ।
तथा ऋषिगणाश्चैव संश्रयन्ति महीरुहान् ॥
(पूर्वोक्त, श्लोक 29)
(किन्नर-उरग-रक्षांसि देव-गन्दर्भ-मानवाः, तथा ऋषि-गणाः च एव महीरुहान् संश्रयन्ति ।)

अर्थ - किन्नर, उरग, राक्षस, देवता, मनुष्य और ऋषियों के समूह वृक्षों का आश्रय स्वीकारते है ।

मैं इस श्लोक का अर्थ ठीक से नहीं समझ सका हूं । यहां उल्लिखित किन्नर आदि के वास्तव में क्या तात्पर्य हैं ? उरग शब्द सामान्यतः सरीसृप प्रजाति के जीवधारियों के लिए प्रयुक्त होता है । यों किन्नर का शाब्दिक अर्थ है विकृत पुरुष – पुरुष जिसमें मानसिक अथवा शारीरिक तौर पर विकार हो । आजकल यौनांगों की विकृति वालों को किन्नर पुकारा जाता है । पौराणिक कथाओं से ऐसा प्रतीत होता है कि किन्नर मानवशरीरधारी जीव थे । मैं मानता हूं कि वे मानवों की एक जाति थी जो स्वयं को सभ्य कहने वाले आर्यों के क्षेत्र से दूर अलग प्रकार की जीवन शैली वाले लोग थे । कुछ ऐसी ही बात राक्षसों के लिए लागू होती है, जो मानवशरीरधारी उग्र स्वभाव वाले, उत्पाती, एवं आर्यों की नजर में ‘असभ्य’ रहे होंगे । देवताओं को उच्च क्षमताओं के पूज्य ‘प्राणी’ समझा जाता था । नृत्य गायन आदि में पारंगत जाति गंदर्भ कही जाती थी । मेरा मानना है कि ये सब वस्तुतः मनुष्यों की अलग-अलग जातियां रही होंगी । ऐसा इसलिए कि पुराणों में जैविक दृष्टि से सभी समान थे । उनके परस्पर दैहिक संसर्ग, वैवाहिक संबंधों की कथाएं पढ़ने को मिलती हैं । उरग भी एक जाति रही होगी । अगर उरग सामान्य अजगर-सांप आदि को इंगित करता होता, तो पशु शब्द का प्रयोग अधिक सार्थक होता । किन्नर, गंदर्भ आदि के साथ पशु अर्थ में उरग शामिल करना अटपटा लगता है । यों भी पुराणों में नागकन्याओं के साथ विवाह आदि की कथाएं प्रचलित हैं । इस प्रकार ये सभी शब्द मानवों की विविध जातियों को व्यक्त करते होंगे ऐसा मेरा सोचना है । श्लोक के अनुसार ये सभी पेड़.-पौधों पर अलग-अलग प्रकार से निर्भर करते हैं । – योगेन्द्र जोशी

महाभारत महाकाव्यः वृक्षरोपण एवं जलाशय विषयक नीतिवचन (1)

महर्षि व्यासविरचित महाकाव्य महाभारत में एक प्रकरण है, जिसमें भीष्म पितामह महाराज युधिष्ठिर को प्रजा के हित में शासन चलाने के बारे में उपदेश देते हैं । यह प्रकरण कौरव-पांडव समाप्ति के बाद युधिष्ठिर द्वारा राजकाज संभालने के समय का है । इसी के अंतर्गत एक स्थल पर मृत्युशय्या पर आसीन भीष्म जलाशयों के निर्माण एवं वृक्षरोपण की आवश्यकता स्पष्ट करते हैं । ये बातें महाकाव्य के अनुशासन पर्व के अठावनवें अध्याय में वर्णित हैं । ३३ श्लोकों के उक्त अध्याय में बहुत-सी बातें कही गई हैं । मैं अध्याय के अंतिम ८ श्लोकों को इस ब्लॉग में उद्धृत कर रहा हूं:

अतीतानागते चोभे पितृवंशं च भारत ।
तारयेद् वृक्षरोपी च तस्मात् वृक्षांश्च रोपयेत् ॥
(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय ५८, श्लोक २६)
(भारत! वृक्ष-रोपी अतीत-अनागते च उभे पितृ-वंशं च तारयेद्, तस्मात् च वृक्षान् च रोपयेत् ।)
अर्थ - हे युधिष्ठिर! वृक्षों का रोपण करने वाला मनुष्य अतीत में जन्मे पूर्वजों, भविष्य में जन्मने वाली संतानों एवं अपने पितृवंश का तारण करता है । इसलिए उसे चाहिए कि पेड़-पौंधे लगाये ।

तस्य पुत्रा भवन्त्येते पादपा नात्र संशयः ।
परलोगतः स्वर्गं लोकांश्चाप्नोति सोऽव्ययान् ॥
(पूर्वोक्त, श्लोक २७)
(एते पादपाः तस्य पुत्राः भवन्ति अत्र संशयः न; परलोक-गतः सः स्वर्गं अव्ययान् लोकान् च आप्नोति ।)
अर्थ - मनुष्य द्वारा लगाए गये वृक्ष वास्तव में उसके पुत्र होते हैं इस बात में कोई शंका नहीं है । जब उस व्यक्ति का देहावसान होता है तो उसे स्वर्ग एवं अन्य अक्षय लोक प्राप्त होते हैं ।

अधिकतर हिंदू पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं । प्रायः सभी मानते हैं कि आत्मा अमर होती है और उसके जन्म का अर्थ है भौतिक शरीर धारण करना और मृत्यु उस देह का त्यागा जाना । मृत्यु पश्चात् वह इस मर्त्यलोक से अन्य लोकों में विचरण करती है जो उसके कर्मों पर निर्भर करता है और जहां उसे सुख अथवा दुःख भोगने होते हैं ।

मान्यता यह भी है कि देहमुक्त आत्मा का तारण या कष्टों से मुक्ति में पुत्र का योगदान रहता है । संस्कृत में पुत्र शब्द की व्युत्पत्ति इसी रूप में की गयी है । (पुंनाम्नो नरकाद्यस्मात्त्रायते पितरं सुतः । तस्मात्पुत्र इति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयम्भुवा ॥ अर्थात् ‘पुं’ नाम के नरक से जिस कारण सुत पिता का त्रारण करता है उसी कारण से वह पुत्र कहलाता है ऐसा स्वयंभू ब्रह्मा द्वारा कहा गया है । – मनुस्मृति, अध्याय 9, श्लोक 138 ।) मेरा मानना है कि पुत्र शब्द व्यापक अर्थ में प्रयुक्त किया गया है, अर्थात् यह पुत्र एवं पुत्री दोनों को व्यक्त करता है, कारण कि पुत्री – स्त्रीलिंग – की व्युत्पत्ति भी वस्तुतः वही है । कई शब्द पुल्लिंग में इस्तेमाल होते हैं, किंतु उनसे पुरुष या स्त्री दोनों की अभिव्यक्ति होती है, जैसे मानव या मनुष्य अकेले मर्द को ही नहीं दर्शाता बल्कि मर्द-औरत सभी उसमें शामिल रहते हैं । आदमी या इंसान स्त्री-पुरुष सभी के लिए प्रयोग में लिया जाता है । मैं समझता हूं कि प्राचीन काल में पुत्र सभी संतानों के लिए चयनित शब्द रहा होगा। कालांतर में वह रूढ़ अर्थ में प्रयुक्त होने लगा होगा।

उपर्युक्त श्लोकों के भावार्थ यह लिए जा सकते हैं कि वृक्षों का लगाना संतानोत्पत्ति के समान है । वे मनुष्य की संतान के समान हैं, इसलिए वे मनुष्य के पूर्वजों/वंशजों के उद्धार करने में समर्थ होते हैं । वृक्ष की तुलना संतान से की गयी है।

स्वर्ग/नरक की बातें विश्वसनीय हों या न हों, वृक्षों की महत्ता संदेह से परे है । आज के युग में जब मानवजाति परिवेश-पर्यावरण की समस्याओं को वैश्विक स्तर पर झेल रही है, वृक्षों की उपादेयता सहज रूप से अनुभव होने लगी है ।

इस शृंखला के शेष श्लोकों का उल्लेख आगामी आलेखों में – योगेन्द्र जोशी

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