जीवन-यात्रा के अंत की ओर अग्रसर हो रहे मेरे एक मित्र जब अपनी व्याधियों का वर्णन करने लगे कि कैसे अब उन्हें सुनाई कम देता है, कि चश्मा भी मददगार नहीं रह गया है, कि दांतों के अभाव में ‘डेंचर’से काम चलाना पड़ता है, कि घुटने में दर्द बना ही रहता है, इत्यादि, तो मुझे राजा भर्तृहरि के वैराग्यशतकम् का एक श्लोक स्मरण हो आया । राजा भर्तृहरि के बारे में मैंने इसी ब्लॉक में पहले कभी दो-चार बातें लिखीं हैं (देखें 30 सित. 2008 की प्रवृष्टि) । संबंधित श्लोक ये है:
गात्रं सङ्कुचितं गतिर्विगलिता भ्रष्टा च दन्तावलिर्दृष्टिर्नश्यति वर्धते बधिरता वक्त्रं च लालायते ।
वाक्यं नाद्रियते च बान्धवजनो भार्या न शुश्रूषते हा कष्टं पुरुषस्य जीर्णवयसः पुत्रोऽप्यमित्रायते ॥
(भर्तृहरिरचित वैराग्यशतकम् , १११)
(गात्रं सङ्कुचितं, गतिः विगलिता, दन्तावलिः च भ्रष्टा, दृष्टिः नश्यति, बधिरता वर्धते, वक्त्रं च लालायते, बान्धवजनः च वाक्यं न आद्रियते, भार्या न शुश्रूषते, पुत्रः अपि अमित्रायते, हा जीर्णवयसः पुरुषस्य कष्टं ॥)
अर्थ - (वृद्धावस्था में आदमी की ऐसी दुर्गति होती है कि) शरीर सिकुड़ने लगता है (उसमें झुर्रिया पड़ जाती हैं), चाल-ढाल में विकार आ जाता है (व्यक्ति लड़खड़ाते हुए चलता है), दंतपंक्ति गिर जाती है (दांत सड़-गल जाते हैं), आंखों की ज्योति क्षीण हो जाती है, श्रवण-शक्ति का ह्रास हो जाता है, मुंह से लार चूने लगती है (मुख पर भी नियंत्रण नहीं रह जाता है), सगा-संबंधी या नाते रिश्तेदार भी कहे गये वचन का सम्मान नहीं करता है (यानी वह भी वूढ़े व्यक्ति की बातों को सम्मान नहीं देता), पत्नी भी सेवाभाव नहीं दर्शाती है, और पुत्र भी शत्रु की भांति व्यवहार करने लगता है; अहो, उम्र ढल जाने पर पुरुष का जीवन कितना कष्टमय हो जाता है!
उक्त बातें पुरुष को इंगित करते हुए कही गई हैं, किंतु इन्हें अधिक व्यापक संदर्भ में समझा जाना चाहिए, यानी स्त्री एवं पुरुष दोनों के लिए ही ये लागू होती हैं । आधुनिक काल में शारीरिक रोगों के कारगर उपचार उपलब्ध हैं इसलिए आर्थिक तौर पर समर्थ व्यक्ति के लिए स्थिति इतनी गंभीर नहीं रहती है । फिर भी शरीरतः व्यक्ति असमर्थ तो होने ही लगता है । प्राचीन काल में प्रभावी चिकित्सा का अभाव अधिक सताता रहा होगा, जो धन से कमजोर व्यक्ति को आज भी भुगतना पड़ता है । कुछ भी हो बुढ़ापा एक अभिशाप के तौर पर भोगना ही पड़ता है । – योगेन्द्र जोशी


