‘सुभाषितरत्नभांडागारम्’ संस्कृत साहित्य का एक अमूल्य ग्रंथ है । इसमें विभिन्न स्रोतों से छंदों के रूप में प्राप्य उक्तियों का संकलन किया गया । (ध्यान रहे कि संस्कृत साहित्य में पद्यात्मक रचनाएं छंदों में लिखित रहती हैं, जिन्हें बोलचाल में अक्सर श्लोकों के नाम से जाना जाता है । परंतु श्लोक शब्द मूलतः अनुष्टुभ् छंद के लिए प्रयुक्त होता है, जिसमें आठ-आठ वर्णों के चार चरण होते हैं ।) मेरे पास उक्त ग्रंथ की नारायण राम आचार्य ‘काव्यतीर्थ’ द्वारा संशोधित एक प्रति है (प्रकाशकः चौखंबा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली, १९९१) । इस ग्रंथ के आरंभ में लिखित परिचय में कहा गया है कि संबंधित संस्करण ‘निर्णय सागर प्रेस’ द्वारा पूर्व में प्रकाशित (१९३५) पुस्तक पर आधारित है । ग्रंथ के इतिहास के बारे में विशेष कुछ नहीं कहा गया है । सांकेतिक तौर पर इतना बताया गया है कि इस ग्रंथ में समय-समय पर कवियों/विद्वानों ने विभिन्न स्रोतों से उक्तियां स्वीकार करके शामिल की हैं । इससे यही लगता है कि इसका मूल लेखक कोई नहीं । इनमें से कई उक्तियों के स्रोत ज्ञात हैं और उनके संदर्भ का ग्रंथ में उल्लेख किया गया है, किंतु अधिकांश उक्तियां के बारे में ठीक से नहीं मालूम । वे जनसामान्य में प्रचलित रही हैं यही ग्रंथ का मत है ।
कथित ग्रंथ में विविध विषयों से संबंधित छंद सम्मिलित हैं, यथा देवी-देवताओं की स्तुति, ज्ञान के विधाओं की महत्ता, साहित्य-संगीत-कला की प्रशंसा, मित्रता-शत्रुता-चाटुकारिता जैसे लौकिक व्यवहार पर टिप्पणियां, कवि-कल्पनाओं की बातें, पेड़-पौधों-औषधियों की उपयोगिता आदि-आदि । ग्रंथ सात प्रकरणों में विभक्त है । उसके द्वितीय प्रकरण, ‘सामान्यप्रकरणम्’, के आरंभ में ‘सुभाषितप्रशंसा’ सम्मिलित है । इसके तीन छंदों का मैं यहां पर उल्लेख कर रहा हूं:
(सुभाषितरत्नभांडागार, सामान्यप्रकरणम्, क्रमशः ३, ४ एवं ६)
सुभाषितमयैर्द्रव्यैः सङ्ग्रहं न करोति यः ।
सो९पि प्रस्तावयज्ञेषु कां प्रदास्यति दक्षिणाम् ।।
(यः सुभाषित-मयैः द्रव्यैः सङ्ग्रहं न करोति सः अपि प्रस्ताव-यज्ञेषु कां दक्षिणाम् प्रदास्यति ?)
भावर्थः सुभाषित कथन रूपी संंपदा का जो संग्रह नहीं करता वह प्रसंगविशेष की चर्चा के यज्ञ में भला क्या दक्षिणा देगा ? समुचित वार्तालाप में भाग लेना एक यज्ञ है और उस यज्ञ में हम दूसरों के प्रति सुभाषित शब्दों की आहुति दे सकते हैं । ऐसे अवसर पर एक व्यक्ति से मीठे बोलों की अपेक्षा की जाती है, किंतु जिसने सुभाषण की संपदा न अर्जित की हो यानी अपना स्वभाव तदनुरूप न ढाला हो वह ऐसे अवसरों पर औरों को क्या दे सकता है ?
संसारकटुवृक्षस्य द्वे फले अमृतोपमे ।
सुभाषितरसास्वादः सङ्गतिः सुजने जने ।।
(संसार-कटु-वृक्षस्य अमृत-उपमे द्वे फले, सुभाषित-रस-आस्वादः सुजने जने सङ्गतिः ।)
भावार्थः संसार रूपी कड़ुवे पेड़ से अमृत तुल्य दो ही फल उपलब्ध हो सकते हैं, एक है मीठे बोलों का रसास्वादन और दूसरा है सज्जनों की संगति । यह संसार कष्टों का भंडार है, पग-पग पर निराशाप्रद स्थितियों का सामना करना पड़ता है । ऐसे संसार में दूसरों से कुछएक मधुर बोल सुनने को मिल जाएं और सद्व्यवहार के धनी लोगों का सान्निध्य मिल जाए तो आदमी को तसल्ली हो जाती है । मीठे बोल और सद्व्यवहार की कोई कीमत नहीं होती है, परंतु ये अन्य लोगों को अपने कष्ट भूलने में मदद करती हैं । कष्टमय संसार में इतना ही बहुत है ।
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् ।
मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते ।।
(पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि, जलम्, अन्नं, सुभाषितम्; मूढैः पाषाण-खण्डेषु रत्न-संज्ञा विधीयते ।)
भावार्थः इस पृथ्वी पर असल रत्न तीन ही हैं, और ये हैं जल, अन्न तथा सुखद बोल । वे लोग वस्तुतः मूर्ख हैं जो पत्थर के टुकड़ों को रत्न मान के चलते हैं । अन्न तथा जल जीवन-धारण के आधारभूत आवश्यक तत्वों के प्रतीक हैं और अन्य सभी वस्तुओं का महत्त्व इन्हीं के बाद है । संसार का आनंद मधुर वचनों को सुनने में है । ये ही सब वास्तविक रत्न हैं । ये जीवन में मिल जाएं तो पत्थर के रत्नों की आवश्यकता ही क्या रह जाती है, और ये नहीं तो उन पाषाण-रत्नों से क्या सुख मिलेगा ?
क्या है सुभाषित ? वे शब्द जो दूसरों को मानसिक क्लेश पहुंचाने के उद्येश्य से न बोले गये हों, जिन्हें सुनने पर एक प्रकार की सुखानुभूति होती है, जो असत्य पर आधारित न हों, जिनमें दूसरों के प्रति निरादर-भाव न झलकता हो, और जिनमें नैतिकता, बुद्धिमत्ता तथा विवेकशीलता निहित हो, आदि । कहना तो सरल है, किंतु दूसरों के समक्ष प्रिय वचन बोलना गंभीर आत्मसंयम पर निर्भर करता है । सामान्यतः मनुष्य अहंभाव से ग्रस्त रहता है, और जब वह बहुत कुछ अपने अहं के प्रतिकूल होते देखता है तो असहिष्णु हो उठता है । तब संयमित वचन बाल पाने की सामर्थ्य खो बैठता है ।
उपरिलिखित छंदों में प्रथम दो का संदर्भ सुभाषितरत्नभांडागार में दिया गया है । प्रथम का स्रोत पंचतंत्र बताया गया है और दूसरे का हितोपदेश । मुझे पंचतंत्र में जो छंद मिला उसके दो-एक शब्द भिन्न है । मुझे यह ‘श्लोक’ पढ़ने को मिला:
सुभाषितमयद्रव्यसङ्ग्रहं न करोति यः ।
स तु प्रस्तावयज्ञेषु कां प्रदास्यति दक्षिणाम् ।।
(पञ्चतन्त्र, प्रथम तंत्र, १७१)
इसी प्रकार अगले श्लोक के शब्द भी कुछ भिन्न हैं:
संसारविषवृक्षस्य द्वे एव रसवत्फले ।
काव्यामृतरसास्वादः सङ्गमः सुजनैः सह ।।
(हितोपदेश, प्रथम भाग, १५४)
फिर भी भावार्थ कमोबेश वही हैं । तीसरा श्लोक कदाचित् जनश्रुत पर आधारित है । – योगेन्द्र जोशी

कहना मुश्किल है कि महाभारत-कालीन लोगों को सूर्य, चंद्र और उनके ग्रहणों के विषय में वही वस्तुनिष्ठ ज्ञान था या नहीं, जो आज के वैज्ञानिक युग में अधिकांश जनों को है ।



