“न त्यजेत् आत्मनः उद्योगम् …” – पुरुषार्थ की महत्ता संबंधी हितोपदेश के नीतिवचन

संस्कृत के नीतिविषयक ग्रंथों में से एक हितोपदेश है, जिसमें पशु-चरित्रों के माध्यम से आम जन के समक्ष महत्वपूर्ण सीख की बातें प्रस्तुत की गई हैं । उक्त ग्रंथ का संक्षिप्त परिचय मैंने इसी ब्लॉग के 2 मार्च 2009 की पोस्ट में दिया है । यद्यपि यह ग्रंथ अवयस्कों-बालकों को संबोधित करके लिखा गया है, तथापि इसमें दी गई बातें सभी उम्र के लोगों के लिए उपयोगी हैं । ग्रंथ में एक स्थल पर “होनी टल नहीं सकती” यह कहते हुए भाग्य के भरोसे बैठ जाने की आलोचना की गई  है । मैं तत्संबंधित दो श्लोकों का यहां पर उल्लेख कर रहा हूं:

यदभावि न तद्भावि भावि चेन्न तदन्यथा ।

इति चिन्ताविषघ्नो९यमगदः किं न पीयते ।।

(हितोपदेश, मित्रलाभ, 29)

(यत् अभावि न तत् भावि भावि चेत् न तत् अन्यथा इति चिन्ता-विषघ्नः अयम् अगदः किम् न पीयते ।)

अर्थ – जो नहीं घटित होने वाला है वह होगा नहीं, यदि कुछ होने वाला हो तो वह टलेगा नहीं इस विषरूपी चिंता (विचारणा) के शमन हेतु अमुक (आगे वर्णित) औषधि का सेवन क्यों नहीं किया जाता है ?

न दैवमपि सञ्चित्य त्यजेदुद्योगमात्मनः ।

अनुद्योगेन कस्तैलं तिलेभ्यः प्राप्तुमर्हति ।।

(यथा उपर्युक्त, 30)

(न दैवम् अपि सञ्चित्य त्यजेत् उद्योगम् आत्मनः न-उद्योगेन कः तैलं तिलेभ्यः प्राप्तुम् अर्हति ।)

अर्थ – (और औषधि यह है:) दैव यानी भाग्य का विचार करके व्यक्ति को कार्य-संपादन का अपना प्रयास त्याग नहीं देना चाहिए । भला समुचित प्रयास के बिना कौन तिलों से तेल प्राप्त कर सकता है ?

हितोपदेश के रचनाकार के मतानुसार पुरुषार्थ यानी उद्यम के बिना वांछित फल नहीं मिल सकता है । “जो होना (या नहीं होना) तय है वह तो होगा ही (या होगा ही नहीं)” यह विचार मान्य नहीं हो सकता । यह सही है कि जो हो चुका उसे बदला नहीं जा सकता है । अर्थात् जो घटना भूतकाल का हिस्सा हो चुकी हो उसे कोई परिवर्तित नहीं कर सकता है । यह भी संभव है कि जो भविष्य में होना हो वह भी हो के रहे । परंतु यह कौन बताएगा कि वह भावी घटना क्या होगी ? जब वह घटित हो जाए तब तो वह भूतकाल का अंग बन जाता है और उसके बारे में “यह तो होना था” जैसा वक्तव्य दिया जा सकता है । लेकिन जब तक वह घटित न हो जाए तब तक कैसे पता चलेगा कि क्या होने वाला है ? ऐसी स्थिति में क्या यह नहीं स्वीकारा जाना चाहिए कि उस भावी एवं अज्ञात घटना को संपन्न करने हेतु किए जाने वाले हमारे प्रयास उसके घटित होने के कारण होते हैं । अवश्य ही कुछ ऐसे कारक भी घटना को प्रभावित करते होंगे जिन पर हमारा नियंत्रण न हो अथवा वे पूर्णतः अज्ञात हों । उन कारकों एवं हमारे प्रयासों के सम्मिलित प्रभाव के अधीन ही वह घटना जन्म लेगी जिसके घटित हो चुकने पर ही वह अपरिवर्तनीय कही जाएगी । किंतु उस क्षण से पहले हम जान नहीं सकते कि वह घटना क्या होगी । अतः हमारे प्रयास चलते रहने चाहिए । – योगेन्द्र जोशी

“न अयम् आत्मा प्रवचनेन लभ्यः …” – परब्रह्म की प्राप्ति विषयक मुण्डकोपनिषद् के वचन

वैदिक ग्रंथ ‘मुंडक उपनिषद्’ में परब्रह्म के स्वरूप और उसे प्राप्त करने के मार्ग का वर्णन किया गया है । माना जाता है कि यह ग्रंथ प्रमुखतया उन आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है जो मोक्ष की समझ और उसकी प्राप्ति का मार्ग जानना चाहते हैं । वैदिक दार्शनिेकों के मतानुसार जीवधारियों का भौतिक पदार्थों से बना स्थूल शरीर तो नश्वर है, किंतु उसमें ‘निवास’ करने वाली अमूर्त आत्मा अमर है । स्थूल स्तर पर नाशवान शरीर की जिस मृत्यु का अनुभव हम करते हैं वह वस्तुतः आत्मा का शरीर छोड़ना भर है । वास्तव में आत्मा वारंवार शरीर धारण करती है और कालांतर में उसे छोड़ती है । वह जन्म-मरण के चक्र से बंधी रहती है । प्राचीन वैदिक चिंतक मानने थे कि परमात्मा या परब्रह्म समस्त सृष्टि का मूल है और आत्मा वस्तुतः उसका एक अंश है । परब्रह्म और आत्मा के बीच का संबंध कुछ-कुछ वैसा ही है जैसा विशाल समुद्र और उससे विलग हुई जल की एक बूंद का । अपनी देह से संपादित कर्मफलों के बंधन से आत्मा जन्ममरण के चक्र में तब तक भटकती रहती है जब तक कि उसे अपने वास्तविक स्वरूप अर्थात् परब्रह्म का अंश होने का ज्ञान नहीं हो जाता है । ज्ञानप्राप्ति के पश्चात वह उसी में लीन हो जाती है । उस अवस्था को माक्ष की संज्ञा दी गई है । सामान्य शब्दों में अभिव्यक्त इस दार्शनिक विचार के गहरे अर्थ समझना किस-किस के लिए संभव है यह मैं नहीं कह सकता ।

आत्मा के सही स्वरूप का ज्ञान किसे और कैसे मिलता है इस बात का उल्लेख मुंडक उपनिषद के अधःप्रस्तुत तीन मंत्रों में मिलता है:

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।

यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ।।3।।

(मुण्डकोपनिषद्, मुंडक 3, खंड 2)

(न अयम् आत्मा प्रवचनेन लभ्यः न मेधया न बहुना श्रुतेन, यम् एव एषः वृणुते तेन लभ्यः, तस्य एषः आत्मा विवृणुते तनुम् स्वाम् ।)

अर्थ - यह आत्मा प्रवचनों से नहीं मिलती है और न ही बौद्धिक क्षमता से अथवा शास्त्रों के श्रवण-अध्ययन से । जो इसकी ही इच्छा करता है उसेयह प्राप्त होता है, उसी के समक्ष यह आत्मा अपना स्वरूप उद्घाटित करती है ।

 

यहां आत्मा को पाने का अर्थ है आत्मा के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करना । धार्मिक गुरुओं के प्रवचन सुनने से, शास्त्रों के विद्वत्तापूर्ण अध्ययन से, अथवा ढेर सारा शास्त्रीय वचनों को सुनने से यह ज्ञान नहीं मिल सकता है । इस ज्ञान का अधिकारी वह है जो मात्र उसे पाने की आकांक्षा रखता है । तात्पर्य यह है कि जिसने भौतिक इच्छाओं से मुक्ति पा ली हो और जिसके मन में केवल उस परमात्मा के स्वरूप को जानने की लालसा शेष रह गयी हो वही उस ज्ञान का हकदार है । जो एहिक सुख-दुःखों, नाते-रिश्तों, क्रियाकलापों, में उलझा हो उसे वह ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता है । जिस व्यक्ति का भौतिक संसार से मोह समाप्त हो चला हो वस्तुतः वही कर्मफलों से मुक्त हो जाता है और उसका ही परब्रह्म से साक्षात्कार होता है ।

 

नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिंगात् ।

एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वान्स्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ।।4।।

(यथा पूर्वोक्त)

(न अयम् आत्मा बल-हीनेन लभ्यः न च प्रमादात् तपसः वा अपि अलिंगात् एतैः उपायैः यतते यः तु विद्वान् तस्य एषः आत्मा विशते ब्रह्म-धाम ।)

अर्थ - यह आत्मा बलहीन को प्राप्त नहीं होती है, न ही धनसंपदा, परिवार के विषयों में लिप्त रहने वाले को, और न तपस्यारत किंतु संन्यासरहित व्यक्ति को । जो विद्वान एतद्विषयक उपायों को प्रयास में लेता है उसी की आत्मा परब्रह्मधाम में प्रवेश करती है ।

 

यहां पर बलहीन का अर्थ सामान्य दैहिक अथवा बौद्धिक  बल से नहीं है । जिसके पास आत्मसंयम का सामर्थ्य है वही बलवान है क्योंकि वह विपरीत परिस्थिति में भी अविचलित रह सकता है । किंतु ऐसा व्यक्ति भी मोक्ष्य के योग्य नहीं होता । संन्यास का अर्थ है सांसारिक बंधनों से स्वयं को मुक्त करना । जिस व्यक्ति को कोई लालसा नहीं, जो संभी बंधन तोड़ चुका हो, जिसका न कोई अपना रह गया हो और न पराया वह वीतराग संन्यासी कहलाता है । ऐसा संन्यासी बनना ही परब्रह्म के ज्ञान का उपाय है ।

 

संप्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ताः कृतात्मानो वीतरागः प्रशान्ताः ।

ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति ।।5।।

(यथा पूर्वोक्त)

(संप्राप्य एनम् ऋषयः ज्ञान-तृप्ताः कृत-आत्मानः वीत-रागः प्रशान्ताः ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीराः युक्त-आत्मानः सर्वम् एव आविशन्ति ।)

अर्थ - आत्मा के यथार्थ को पा लेने पर ऋषिगण ज्ञानतृप्त, कृतकृत्य, विरक्त, और परम शान्त हो जाते हैं । वे धीर पुरुष उस सर्वव्यापी परब्रह्म को सर्वत्र प्राप्त करते हुए और उससे युक्तचित्त होकर उसी संपूर्ण ब्रह्म में प्रवेश कर जाते हैं, यानी उससे एकाकार हो जाते हैं ।

इस मंत्र की व्याख्या में कहा गया है कि आत्मा के मूलस्वरूप का ज्ञान पा चुकने वाले ऋषि के लिए उसका शरीर एक अस्थाई सांसारिक बंधन रह जाता है । उसके लिए देहत्याग पर परब्रह्म में लीन होना वैसा ही होता है जैसा किसी घड़े के टूटकर बिखरने पर उसके भीतर के आंशिक आकाश और बाह्य असीमित आकाश के बीच का भेद समाप्त हो जाता है । युक्तचित्त की स्थिति में केवल ब्रह्म का ही भाव उसके मन में रह जाता है और सांसारिक समस्त वस्तुओं में उसी ब्रह्म के दर्शन होने लगते है । उसके लिए कुछ भी सांसारिक बांछनीय नहीं रह जाता है । प्राचीन काल में वैदिक चिंतकों को कदाचित घड़े का दृष्टांत ही उपयुक्त लगा होगा । आज विकल्पतः हवा भरे गुब्बारे का दृष्टांत सोचा जा सकता है जिसके, भीतर का आकाश बाह्य आकाश से पूरी तरह विभक्त रहता है । – योगेन्द्र जोशी

 

 

“राजकलिं हन्युः प्रजाः”(महाभारत के वचन) – प्रजा की सुरक्षा के प्रति बेपरवाह राजा मृत्युदंड के योग्य

भारतीयों के लिए वेदव्यासरचित महाकाव्य महाभारत एक सुपरिचित ग्रंथ है जिसकी कथाओं का जिक्र लोग यदाकदा करते रहते हैं । महाभारत में वर्णित पांडव-कौरवों के युद्ध की समाप्ति के बाद राजा युधिष्ठिर सरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह से राजकार्य संबंधी नीतिवचन प्राप्त करते हैं । राजा के लिए क्या कृत्य है क्या नहीं इस बाबत अनेकानेक बातें भीष्म बताते हैं । उसी प्रकरण में वे यह भी कहते हैं कि उस राजा को प्रजा ने मृत्युदंड दे देना चाहिए जो उनकी सुरक्षा को गंभीरता से नहीं लेता है । मैं तत्संबंधित तीन श्लोकों की चर्चा यहां पर कर रहा हूं । ये तीनों महाभारत के अनुशासनपर्व (अध्याय ६१) से उद्धृत किए जा रहे हैं ।

क्रोश्यन्त्यो यस्य वै राष्ट्राद्ध्रियन्ते तरसा स्त्रियः ।

क्रोशतां पतिपुत्राणां मृतोऽसौ न च जीवति ॥३१॥

(महाभारत, अनुशासनपर्व, अध्याय ६१)

(यस्य वै राष्ट्रात् क्रोशताम् पतिपुत्राणाम् क्रोश्यन्त्यः स्त्रियः तरसा ध्रियन्ते असौ मृतः न च जीवति ।)

अर्थ – जिस राजा के राज्य में चीखती-चिल्लाती स्त्रियों का बलपूर्वक अपहरण होता है और उनके पति-पुत्र रोते-चिल्लाते रहते हैं, वह राजा मरा हुआ है न कि जीवित ।

जो राजा अपहरण की जा रही स्त्रियों की सुरक्षा के लिए समुचित कदम नहीं उठाता और उनके दुःखित बंधु-बांधवों की विवशता से विचलित नहीं होता वह जीते-जी मरे हुए के समान है । उसके जीवित होने की कोई सार्थकता नहीं रह जाती ।

 

ध्यान रहे कि आज के लोकतांत्रिक शासकीय व्यवस्था में जो सत्ता के शीर्ष पर हो वही राजा की भूमिका निभाता है । इसलिए राजा के संदर्भ में जो बातें कही गई हैं वह आज के शासकों पर यथावत लागू होती हैं । अपने देश के कुछ राज्यों, जैसे उत्तर प्रदेश, में इस समय स्त्रियों के प्रति दुष्कर्म के मामले चरम पर हैं, किंतु शासकीय व्यवस्था इतनी गिरी हुई है कि किसी को दंडित नहीं किया जा रहा है । ऐसे शासकों को वस्तुतः डूब मरना चाहिए!

 

अरक्षितारं हर्तारं विलोप्तारमनायकम् ।

तं वै राजकलिं हन्युः प्रजाः सन्नहा निर्घृणम् ॥३२॥

(यथा पूर्वोक्त)

(अरक्षितारम् हर्तारम् विलोप्तारम् अनायकम् तम् निर्घृणम् राजकलिम् प्रजाः वै सन्नहा हन्युः ।)

अर्थ – जो राजा अपनी जनता की रक्षा नहीं करता, उनकी धनसंपदा छीनता या जब्त करता है, जो योग्य नेतृत्व से वंचित हो, उस निकृष्ट राजा को प्रजा ने बंधक बनाकर निर्दयतापूर्वक मार डालना चाहिए ।

 

राजा का कर्तव्य है अपनी प्रजा की रक्षा करना, उसको सुख-समृद्धि के अवसर प्रदान करना । तभी वह जनता से कर वसूलने का हकदार बन सकता है । अपने कर्तव्यों का निर्वाह न करने वाला राजा जब कर वसूले तो उसको लुटेरा ही कहा जाएगा । नीति कहती है कि ऐसे राजा को निकृष्ट कोटि का मानना चाहिए । उसके प्रति दयाभाव रखे बिना ही परलोक भेज देना चाहिए ।

 

आज की शासकीय स्थिति कुछ राज्यों में अति दयनीय है । परंतु दुर्भाग्य से सत्तासुख भोग रहे वहां के शासकों को दंडित करने वाला कोई नहीं । लोग कहते हैं कि पांच-पांच सालों में होने वाले चुनावों द्वारा जनता उन्हें सत्ता से बेदखल कर देती है । लेकिन ध्यान दें कि न चुना जाना कोई दंड नहीं होता है । किसी भी चुनाव में कई प्रत्याशी भाग लेते हैं जिनमें से एक चुना जाता है । “अन्य सभी को दंडित कर दिया” ऐसा क्या कहा जा सकता है ? सवाल असल में दंडित किये जाने का है जो वास्तव में होता नहीं ।

 

अहं वो रक्षितेत्युक्त्वा यो न रक्षति भूमिपः ।

स संहत्य निहंतव्यः श्वेव सोन्मादः आतुरः ॥३३॥

(यथा पूर्वोक्त)

(अहम् वः रक्षिता इति उक्त्वा यः भूमिपः न रक्षति सः स-उन्मादः आतुरः श्व-इव संहत्य निहंतव्यः ।)

अर्थ – मैं आप सबका रक्षक हूं यह वचन देकर जो राजा रक्षा नहीं करता, उसे रोग एवं पागलपन से ग्रस्त कुत्ते की भांति सबने मिलकर मार डालना चाहिए ।

 

इस श्लोक में कटु शब्दों का प्रयोग हुआ है । शासक का पहला कर्तव्य है कि वह भयमुक्त समाज की रचना करे –  भयमुक्त निरीह-निरपराध प्रजा के लिए, न कि अपराधियों के लिए । आज की स्थिति उल्टी है । अपराधी निरंकुश-स्वच्छंद विचरण करते हुए और सामान्य जन डरे-सहमे दिखते हैं । जिस शासक के राज्य में ऐसा हो उसे ग्रंथकार ने पागल कुत्ते की संज्ञा दी है । ऐसे कुत्ते का एक ही इलाज होता है, मौत । दुर्भाग्य से हमारे शासक सबसे पहले अपनी सुरक्षा का इंतजाम करते हैं । कोई सामान्य व्यक्ति उनके पास पहुंच तक नहीं सकता, आगे कुछ करने का तो सवाल ही नहीं ।

 

ये नीतिश्लोक दर्शाते हैं कि महाभारत ग्रंथ में कर्तव्यों में विफल शासक को पतित और निकृष्ट श्रेणी का कहा गया है । – योगेन्द्र जोशी

मे प्राण मा विभेः (अथर्ववेद) – भय से मुक्ति हेतु आत्मप्रेरणा के मंत्र

अथर्ववेद में सुख-संपदा, स्वास्थ, शत्रुविनाश आदि से संबंधित अनेकों मंत्रों का संग्रह है । सामान्यतः ये मंत्र किसी न किसी प्रकार के कर्मकांड से जुड़े देखे जा सकते हैं । इस वेद के दूसरे कांड में मुझे आत्मप्रेरणा के मंत्र पढ़ने को मिले हैं । ग्रंथ के सायणभाष्य से मैं जो समझ पाया उसके अनुसार ये भोजन आरंभ करते समय उच्चारित किए जाने चाहिए । आगे इनका उल्लेख कर रहा हूं:

यथा द्यौश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥1॥

(द्यौश्च = द्यौः च, बिभीतो = बिभीतः, एवा = एवं)

यथाहश्च रात्रीं च न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥2॥

(यथाहश्च = यथा अहः च )

यथा सूर्यश्च चन्द्रश्च न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥3॥

(सूर्यश्च = सूर्यः च, चन्द्रश्च = चन्द्रः च)

यथा ब्रह्म च क्षत्रं च न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥4॥

यथा सत्यं चानृतं न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥5॥

(चानृतं = च अनृतं)

यथा भूतं च भव्यं च न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥6॥

(अथर्ववेद, काण्ड 2, सूक्त 15) 

अर्थ:

(1) जिस प्रकार आकाश एवं पृथिवी न भयग्रस्त होते हैं और न इनका नाश होता है, उसी प्रकार हे मेरे प्राण तुम भी भयमुक्त रहो ।

(2) जिस प्रकार दिन एवं रात को भय नहीं होता और इनका नाश नहीं होता, उसी प्रकार हे मेरे प्राण तुम्हें भी भय नहीं होवे ।

(3) जिस प्रकार सूर्य एवं चंद्र को भय नहीं सताता और इनका विनाश नहीं होता, उसी भांति हे मेरे प्राण तुम भी भय अनुभव न करो ।

(4) जैसे ब्रह्म एवं उसकी शक्ति को कोई भय नहीं होता और उनका विनाश नहीं होता, वैसे ही हे मेरे प्राण तुम भय से मुक्त रहो ।

(5) जैसे सत्य तथा असत्य किसी से भय नहीं खाते और इनका नाश नहीं होता, वैसे ही हे मेरे प्राण तुम्हें भी भय नहीं होना चाहिए ।

(6) जिस भांति भूतकाल तथा भविष्यत्काल को किसी का भय नहीं होता और जिनका विनाश नहीं होता, उसी भांति हे मेरे प्राण तुम भी भय से मुक्त रहो ।

इन मंत्रों में प्रकृति की विविध मूर्तिमान वस्तुओं और अमूर्त भावों का उल्लेख है वे मनुष्य की भांति व्यवहार नहीं करते हैं । उनके लिए भय और विनष्ट होने के भाव का कोई अर्थ नहीं है । मेरी समझ में उनका उल्लेख यह दर्शाने के लिए है कि वे सब अपने-अपने प्रकृति-निर्धारित कार्य में संलग्न रहते हैं । वह किसी भी संभावना से अपने धर्म से विचलित नहीं होते । (प्रकृति में जिससे जिस व्यवहार अथवा कर्म की अपेक्षा की जाती है वह उसका धर्म कहलाता है, जैसे जल का धर्म है गीला करना, अग्नि का धर्म है जलाना, आदि ।)

मैं इन मंत्रों की व्याख्या कुछ यों करता हूं: वैदिक ऋषि इन मंत्रों के माध्यम से स्वयं को यह बताता है कि प्रकृति की सभी वस्तुएं अपने-अपने कार्य-संपादन में अविचलित रूप से निरंतर लगी रहती हैं । वह अपने मन को समझाता है कि वह इन सब से प्रेरणा ले और निर्भय होकर अपने कर्तव्यों का निर्वाह करे ।

उपर्युक्त चौथे मंत्र में “ब्रह्म”एवं “क्षत्र”का उल्लेख है । संबंधित मंत्र के सायणभाष्य में इन शब्दों के अर्थ वर्ण व्यवस्था के “ब्राह्मण”तथा “क्षत्रिय”क्रमशः लिए गए हैं । मुझे इन शब्दों के अर्थ क्रमशः सृष्टि के मूल ब्रह्म एवं उसकी शक्ति लेना अधिक सार्थक लगते हैं । इन संस्कृत शब्दों के ये अर्थ भी होते हैं । ध्यान दें कि इन मंत्रों में जोड़े में वस्तुओं/भावों का उल्लेख हुआ है । केवल दो ही वर्णों (वर्ण व्यवस्था के ब्राह्मण आदि) का उल्लेख मुझे इस तथ्य के अनुरूप नहीं लगा । अतः ब्रह्म एवं उसकी सामर्थ्य-क्षमता मुझे अधिक सार्थक लगते है ।

पांचवें मंत्र में सत्य एवं असत्य विद्यमान हैं । सत्य और असत्य भी कभी बदलते नहीं हैं । जो सत्य है वह सदैव के लिए सत्य है और असत्य सदा के लिए असत्य रहता है । इसी प्रकार अंतिम मंत्र में भूत एवं भविष्य का उल्लेख है । जो हो चुका (भूत) वह “न हुआ”नहीं किया जा सकता है, ओर जो होने वाला है (भविष्य) वह भी नियत बना रहना है । – योगेन्द्र जोशी

 

ऋग्वेद में औषधीय वनस्पतियों की प्रार्थना (2)

अपने चिट्ठे की पिछली प्रविष्टि (21 मार्च 2014) में मैंने चर्चा की थी कि ऋग्वेद में औषधीय वनस्पतियों की प्रार्थना से संबंधित कुछ ऋचाएं पढ़ने को मिलती हैं । उस आलेख में मैंने तीन ऋचाओं का उल्लेख किया था । इस स्थल पर मैं अतिरिक्त तीन ऋचाएं प्रस्तुत कर रहा हूं ।

आगे बढ़ने से पहले मैं यह स्पष्ट कर दूं कि वैदिक ऋषिगण प्रकृति के हर घटक में, जंगम (गतिशील) एवं स्थावर (स्थिर)  कृतियों में, अधिष्ठाता दैवी शक्तियों के अस्तित्व होने का विश्वास करते थे । उनके मत में दैवी शक्तियां वस्तुविशेष के गुणधर्मों पर नियंत्रण रखती हैं । वे मानते थे जिस किसी वस्तु का उपयोग किया जा रहा हो उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जानी चाहिए, उसके प्रति कल्याणप्रद बने रहने की प्रार्थना की जानी चाहिए । प्रकृति को मात्र भोग्य वस्तुओं के संग्रह के रूप में न देखकर उसको हमारे अस्तित्व के चेतन आधार के तौर देखा जाना चाहिए । औषधीय वनस्पतियों के प्रति प्रार्थनाभाव इसी मान्यता से प्रेरित रहा है । इस प्रसंग में प्रस्तुत है एक ऋचा:

          मा वो रिषत्खनिता यस्मै चाहं खनामि वः ।

          द्विपच्चतुष्पदस्माकं सर्वमस्त्वनातुरम् ॥20

          (ऋग्वेद, मण्डल 10, सूक्त 97)

          (अहं खनिता यस्मै च वः खनामि वः मा रिषत् द्विपद्- चतुः-पद् सर्वम् अस्माकं अनातुरम् अस्तु ।)

अर्थः (हे औषधीय वनस्पति) मैं भूमि का खनन करने वाला, और जिसके लिए यह कार्य करता हूं वह, तुम्हारी हिंसा न करें, तुम्हारा नाश न करें । हमसे संबंधित द्विपद (मनुष्यगण) एवं चतुष्पद (पशुगण) रोगमुक्त रहें ।

ओषधि प्राप्ति के लिए भूमि का खननकर्ता वनस्पतियों को हानि तो पहुंचाता ही है । कदाचित प्रार्थना के माध्यम से वह अपनी विवशता व्यक्त करता है । शायद वह यह कहना चाहता है कि अवांझित तौर पर वनस्पतियों को नुकसान पहुंचाना उसका उद्येश्य नहीं । वनस्पतियों को अनावश्यक रूप से नष्ट नहीं करना चाहता है, उनका समूल उच्छेदन नहीं करना चाहता । खननकर्ता के कार्य को हिंसा के तौर पर न देखा जाए । इसके आगे उसकी प्रार्थना है कि औषधियां उससे संबंधित सभी जनों (द्विपद) और पशुसंपदा (चतुष्पद, चौपाये) को रोगमुक्त रखें । अगली ऋचा है:

याश्चेदमुपशृण्वन्ति याश्च दूरं परागताः ।

सर्वाः संगत्य वीरुधोऽस्यै सं दत्त वीर्यम् ॥21

(यथा उपर्युक्त)

(याः च इदम् उपशृण्वन्ति याः च दूरं परागताः सर्वाः वीरुधः संगत्य अस्यै वीर्यम् सं-दत्त ।)

अर्थः इस स्तुति को जो औषधीय लताएं सुन रही हों अथवा जो दूरस्थ हों वे सभी मिलकर इस रोगी को बल प्रदान करें ।

उक्त ऋचा में खननकर्ता द्वारा निकटवर्ती और दूरस्थ औषधीय वनस्पतियों से प्रार्थना की गई है कि वे सभी मिलकर रोगी को रोगमुक्त करें । यहां लता नाम से उन्हें संबोधित किया गया है । लताओं को कदाचित औषधीय गुणों से युक्त सभी वनस्पतियों के प्रतिनिधि के तौर पर देखा गया है । अन्यथा ओषधियां लता से भिन्न रूपों में भी पाई जाती हैं । अंतिम तीसरी ऋचा यों हैः

ओषधयः सं वदन्ते सोमेन सह राज्ञा ।

यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्तं राजन् पारयामसि ॥22

(यथा उपर्युक्त)

(ओषधयः सं-वदन्ते सोमेन राज्ञा सह ब्राह्मणः यस्मै कृणोति तं राजन् पारयामसि ।)

अर्थः सभी ओषधियां राजा सोम के साथ संवाद करती हैं कि हे राजा विशेषज्ञ ब्राह्मण अर्थात वैद्य जिसकी चिकित्सा करें उसे हम रोगों के पार करते हैं ।

सोम चंद्रमा का पर्याय है और उसे औषधीय वनस्पतियों का राजा अथवा अधिष्ठाता देवता माना गया है । इस ऋचा में ओषधियों का अपने राजा चंद्र के साथ संवाद की कल्पना की गई । उनका कथन है कि वे रोग-निवारण में निपुण वैद्य के माध्यम से रोगी को रोगमुक्त करती हैं । प्राचीन काल में वैद्यकी सामान्यतः ब्राह्मणों के कार्यक्षेत्र में रहा होगा ।

वैदिक समाज में भोजन करते, ओषधि सेवन करते, अथवा अन्य कार्य संपन्न करते समय संबंधित वस्तुओं के प्रति कृतज्ञता या प्रार्थना व्यक्त करने की परंपरा रही है । – योगेन्द्र जोशी

 

ऋग्वेद में औषधीय वनस्पतियों की प्रार्थना (1)

          मैंने अपने चिट्ठे की एक प्रविष्टि (31 जनवरी 2010) में औषधीय वनस्पतियों की प्रार्थना संबंधी यजुर्वेद में उपलब्ध मंत्रों का उल्लेख किया था । भावात्मक तौर पर उनसे साम्य रखने वाली ऋचाएं मुझे ऋग्वेद में भी देखने को मिली हैं । मैं उन्हीं में से चुनी हुई कुछएक की चर्चा यहां पर कर रहा हूं:

          याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्चपुष्पिणीः ।

          बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः ॥15

           (ऋग्वेद, मण्डल 10, सूक्त 97)

          (याः फलिनीः याः अफलाः याः अपुष्पाः पुष्पिणीः च बृहस्पति-प्रसूताः ता अंहसः नः मुञ्चन्तु ।)

अर्थ - फलने वाली जो वनस्पतियां हैं या जिन पर फल नहीं लगते हैं, जो पुष्पित नहीं होती अथवा जिन पर फूल खिलते हैं, देव बृहस्पति-जनित ऐसी सभी वनस्पतियां हमें रोगों से मुक्त रखें ।

सभी वनस्पतियां फूलती नहीं हैं, और जो फूलती हैं उन पर फल लगें ही यह भी आवश्यक नहीं हैं । इस मंत्र में औषधीय गुणों वाली ऐसी समस्त वनस्पतियों से प्रार्थना की गई है कि वे उनके समुदाय को रोगों से मुक्त रखें । वैदिक चिंतकों की मान्यतानुसार सृष्टि के सभी तंत्र अपने-अपने अधिष्ठाता देवता से संबद्ध रहते हैं, और वनस्पतियों को उनके औषधीय गुण बृहस्पति देवता से प्राप्त रहते हैं ।

          मुञ्चन्तु मा शपथ्यादथो वरुण्यादुत ।

          अथो यमस्य षड्बीशात् सर्वस्माद्देवकिल्बिषात् ॥16

           (यथा उपर्युक्त)

           (मा शपथ्यात् मुञ्चन्तु अथो वरुण्यात् उत अथो यमस्य षड्बीशात् सर्वस्मात् देवकिल्बिषात् ।)

अर्थ - औषधियां मुझे शापजनित रोग से मुक्त करें, बल्कि वरुण देवता के शाप से भी दूर रखें, यम देवता की बेड़ियों से मुक्त रखें, इतना ही नहीं समस्त दैवप्रदत्त पापों को मुझसे दूर रखें ।

मनुष्य के कष्ट तीन प्रकार के गिनाए गए हैं: आधिभौतिक, आधिदैविक, एवं आघ्यात्मिक । दूसरे मनुष्यों अथवा संसार के अन्य प्राणियों के कारण जो भौतिक कष्ट भोगना पड़ता है उसे आधिभौतिक कहा जाता है । देवताओं के रोष से जो कष्ट भोगना पड़ता है उसे आधिदैविक की संज्ञा दी गई है । अधिकांश कष्टों की अनुभूति इंद्रियों के माध्यम से अनुभव में आती है । इनके अतिरिक्त कभी-कभी विशुद्ध मानसिक कष्ट भी भोगने पड़ते हैं; इन्हीं को आघ्यात्मिक कहा जाता है । ये कष्ट वस्तुतः मन के विकारों के कारण पैदा होते हैं, और उनका कोई स्पष्ट बाह्य कारण नहीं रहता है । उक्त मंत्र में इन सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति की प्रार्थना की गई है । शापजनित कष्ट उसे समझा जा सकता है जो दूसरों के द्वारा कर्मणा अथवा वाचा किसी को पहुंचाया जाता है । दूसरे के अहित की भावना भी कदाचित कष्ट का कारण बन सकता है । इन सभी को शापमूलक मान सकते हैं । वरुण को हाथ में बंधन (फंदा) लिए हुए पश्चिम दिशा का (समुद्र का भी) अधिष्ठाता देवता माना गया है । वरुण देवता के शाप का ठीक-ठीक अर्थ क्या है मैं समझ नहीं पाया । कदाचित जलजनित रोगों से तात्पर्य हो । यम देवता का शाप का अर्थ यही होगा कि उनके रूप में मुत्यु हर क्षण मनुष्य का पीछा करती है । औषधियां कष्टों अथवा मृत्यु के निमित्त बने रोगों से हमें दूर रखती हैं । मनुष्य के अनुचित कर्मों के फल को देवताओं द्वारा दंड-स्वरूप प्रदत्त पाप कहा गया होगा ऐसा मेरा सोचना है ।

           अवपतन्तीरवदन् दिव ओषधयस्परि ।

           यं जीवमश्नवामहै न स रिष्याति पूरुषः ॥17

           (यथा उपर्युक्त)

           (दिव अवपतन्तीः ओषधयः परि अवदन् यं जीवम् अश्नवामहै स पूरुषः न रिष्याति ।)

अर्थ – द्युलोक से धरती पर उतरती औषधियां वचन बोलती हैं कि जिस जीव को हम व्याप्त या आच्छादित कर लें उस पुरुष का विनाश नहीं होता ।

व्याप्त (वि+आप्त) का अर्थ यहां प्राप्त होना लिया जा सकता है । मेरा सोचना है कि प्राचीन मनीषी वनस्पतियों के औषधीय गुण स्वर्ग की देन मानते होंगे । धरती पर होने वाली घटनाएं देवताओं के नियंत्रण में होती हैं, अतः ये औषधियां भी देवों की प्राणियों पर अनुकंपा के परिणाम प्राणियों को प्राप्त होती हैं । स्वर्ग से धरती पर उतरने वाली औषधियां जो कहती हैं उसे वस्तुतः उनके अधिष्ठाता देवता का कथन माना जाना चाहिए । इस कथन में ये उद्गार प्रतिबिंबित होते हैं कि मनुष्य के नाश का कारण अंततः रोग हैं जिन्हें औषधियां दूर कर देती हैं । नीरोग व्यक्ति ही दीर्घजीवी हो सकता है और वही अपने एवं समाज के लिए फलदायी कार्य संपन्न करने में समर्थ होता है । – योगेन्द्र जोशी

मनुस्मृति के अनुसार विवाह के आठ प्रकार – ब्राह्म, दैव, आर्ष आदि (3)

अपनी पिछली पोस्टों (14 जनवरी तथा 28 जनवरीधर्म एवं कर्मकांड संबंधी हिंदुओं के प्राचीन ग्रंथ मनुस्मृति में वर्णित विवाह के आठ प्रकारों – ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस, और पैशाच – का उल्लेख किया था । इनमें से प्रथम पांच की व्याख्या उपर्युक्त पोस्टों में की गई । अंतिम तीन (गान्धर्व, राक्षस, एवं पैशाच) के बारे में आगे अपना कथ्य प्रस्तुत कर रहा हूं । गांधर्व विवाह के बारे में मनुस्मृति का कथन यों है:

इच्छयाऽअन्योन्यसंयोगः कन्यायाश्च वरस्य च ।

गांधर्वः स तु विज्ञेयो मैथुन्यः कामसम्भवः ॥32॥

(मनुस्मृति, अध्याय तीन)

(कन्यायाः च वरस्य च इच्छया अन्योन्य-संयोगः काम-सम्भवः मैथुन्यः स तु गांधर्वः विज्ञेयः ।)

अर्थ - कन्या एवं वर की इच्छा और परस्पर सहमति से स्थापित संबंध, जो शारीरिक संसर्ग तक पहुंच सकते हैं, की परिणति के रूप में हुए विवाह को ‘गांधर्व’ विवाह की संज्ञा दी गई है ।

गांधर्व विवाह का एक उल्लेख्य उदाहरण मुझे शकुंतला-दुष्यंत की पौराणिक कथा में मिलता है । उस कथा में आखेट के लिए गए राजा दुष्यंत की दृष्टि वन में मेनका-विश्वामित्र की पुत्री और कण्व ऋषि के आश्रम में पल रही युवा शकुंतला पर पड़ती है । वे उसके प्रति आकर्षित होते हैं, दोनों के बीच वार्तालाप होता है, निकटता बढ़ती है, जिसकी परिणति शारीरिक संबंध स्थापना में होती है । वे दोनों परस्पर विवाह-संबध में बंध जाते हैं, जिसे कण्व ऋषि की स्वीकृति मिलती है । उसी संबंध से राजा भरत का जन्म होता है । मेरे मत में गांधर्व विवाह वस्तुतः प्रेम विवाह है, जो वर्तमान काल में युवक-युवतियों के बीच लोकप्रिय होता जा रहा है । दरअसल आज के युवाओं को पढ़ाई एवं तत्पश्चात नौकरी-पेशे के समय परस्पर मिलने-जुलने एवं घूमने-फिरने की अधिक स्वतंत्रता मिलने लगी है । माता-पिताओं ने भी वैचारिक खुलापन अपनाना आरंभ कर दिया है । अतः प्रेम-प्रसंग एवं तज्जन्य विवाह सामान्य होते जा रहे हैं ।

राक्षस विवाह को यों परिभाषित किया गया है:

हत्वा छित्वा च भित्वा च क्रोशन्तीं रुदन्तीं गृहात् ।

प्रसह्य कन्याहरणं राक्षसो विधिरुच्यते ॥33॥

(यथा पूर्वोक्त)

(हत्वा छित्वा च भित्वा च प्रसह्य गृहात् क्रोशन्तीम् रुदन्तीम् कन्या-हरणम् राक्षसः विधिः उच्यते ।)

अर्थ - कन्यापक्ष के निकट संबंधियों, मित्रों, सुहृदों आदि को डरा-धमका करके, आहत करके, अथवा उनकी हत्या करके रोती-चीखती-चिल्लाती कन्या घर से जबरन उठाकर ले जाना और विवाह करना राक्षस विधि का विवाह कहलाता है ।

पौराणिक कथाओं में ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे हैं । प्राचीन काल में राजा-महाराजा जब किसी युवती के प्रति आकर्षित होते थे तो उसे विवाह के लिए प्रेरित करते थे; न मानने पर जोर-जबरदस्ती उठा ले जाते थे । आज भी कई युवक एक-तरफा प्रेम में पड़कर इस विधि से युवतियों के साथ दांपत्य-संबंध बना लेते हैं ।

सुप्तां मत्तां प्रमत्तां वा रहो यत्रोपगच्छति ।

सः पापिष्ठो विवाहानां पैशाचश्चाष्टमो९धमः ॥34॥

(यथा पूर्वोक्त)

(यत्र सुप्ताम् मत्ताम् प्रमत्ताम् वा रहः उप-गच्छति सः विवाहानाम् अष्टमः पापिष्ठः अधमः पैशाचः च ।)

अर्थ - जब कोई कन्या सोई हो, भटकी हो, नशे की हालत में हो, अथवा सुरक्षा के प्रति असावधान हो, तब यदि कोई उसके साथ शारीरिक संबंध बनाकर अथवा अन्यथा विवाह कर ले तो उसे निकृष्टतम श्रेणी का ‘पैशाच’ विवाह कहा जाता है ।

पैशाच विवाह को निकृष्ट कोटि का कहा गया है । राक्षस विवाह में कन्यापक्ष के लोगों को डरा-धमकाकर या मार-पीटकर कन्या को विवाह के लिए विवश किया जाता है, किंतु उसके साथ दुष्कर्म से बचा जाता है । लेकिन पैशाच में कन्या के साथ धोखे से शारीरिक संबंध बनाकर उसे मजबूर किया जाता है । दूसरे शब्दों में यह वस्तुतः दुष्कर्म पर आधारित है । आजकल कभी-कभी ऐसे मामले प्रकाश आ जाते हैं, जिसमें दुष्कर्म कर चुका व्यक्ति भुक्तभोगी के साथ विवाह कर लेता है । वह कानून से बचने के लिए अथवा आत्मग्लानि के अधीन ऐसा कर सकता है । – योगेन्द्र जोशी

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