मे प्राण मा विभेः (अथर्ववेद) – भय से मुक्ति हेतु आत्मप्रेरणा के मंत्र

अथर्ववेद में सुख-संपदा, स्वास्थ, शत्रुविनाश आदि से संबंधित अनेकों मंत्रों का संग्रह है । सामान्यतः ये मंत्र किसी न किसी प्रकार के कर्मकांड से जुड़े देखे जा सकते हैं । इस वेद के दूसरे कांड में मुझे आत्मप्रेरणा के मंत्र पढ़ने को मिले हैं । ग्रंथ के सायणभाष्य से मैं जो समझ पाया उसके अनुसार ये भोजन आरंभ करते समय उच्चारित किए जाने चाहिए । आगे इनका उल्लेख कर रहा हूं:

यथा द्यौश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥1॥

(द्यौश्च = द्यौः च, बिभीतो = बिभीतः, एवा = एवं)

यथाहश्च रात्रीं च न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥2॥

(यथाहश्च = यथा अहः च )

यथा सूर्यश्च चन्द्रश्च न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥3॥

(सूर्यश्च = सूर्यः च, चन्द्रश्च = चन्द्रः च)

यथा ब्रह्म च क्षत्रं च न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥4॥

यथा सत्यं चानृतं न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥5॥

(चानृतं = च अनृतं)

यथा भूतं च भव्यं च न बिभीतो न रिष्यतः ।

एवा मे प्राण मा विभेः ॥6॥

(अथर्ववेद, काण्ड 2, सूक्त 15) 

अर्थ:

(1) जिस प्रकार आकाश एवं पृथिवी न भयग्रस्त होते हैं और न इनका नाश होता है, उसी प्रकार हे मेरे प्राण तुम भी भयमुक्त रहो ।

(2) जिस प्रकार दिन एवं रात को भय नहीं होता और इनका नाश नहीं होता, उसी प्रकार हे मेरे प्राण तुम्हें भी भय नहीं होवे ।

(3) जिस प्रकार सूर्य एवं चंद्र को भय नहीं सताता और इनका विनाश नहीं होता, उसी भांति हे मेरे प्राण तुम भी भय अनुभव न करो ।

(4) जैसे ब्रह्म एवं उसकी शक्ति को कोई भय नहीं होता और उनका विनाश नहीं होता, वैसे ही हे मेरे प्राण तुम भय से मुक्त रहो ।

(5) जैसे सत्य तथा असत्य किसी से भय नहीं खाते और इनका नाश नहीं होता, वैसे ही हे मेरे प्राण तुम्हें भी भय नहीं होना चाहिए ।

(6) जिस भांति भूतकाल तथा भविष्यत्काल को किसी का भय नहीं होता और जिनका विनाश नहीं होता, उसी भांति हे मेरे प्राण तुम भी भय से मुक्त रहो ।

इन मंत्रों में प्रकृति की विविध मूर्तिमान वस्तुओं और अमूर्त भावों का उल्लेख है वे मनुष्य की भांति व्यवहार नहीं करते हैं । उनके लिए भय और विनष्ट होने के भाव का कोई अर्थ नहीं है । मेरी समझ में उनका उल्लेख यह दर्शाने के लिए है कि वे सब अपने-अपने प्रकृति-निर्धारित कार्य में संलग्न रहते हैं । वह किसी भी संभावना से अपने धर्म से विचलित नहीं होते । (प्रकृति में जिससे जिस व्यवहार अथवा कर्म की अपेक्षा की जाती है वह उसका धर्म कहलाता है, जैसे जल का धर्म है गीला करना, अग्नि का धर्म है जलाना, आदि ।)

मैं इन मंत्रों की व्याख्या कुछ यों करता हूं: वैदिक ऋषि इन मंत्रों के माध्यम से स्वयं को यह बताता है कि प्रकृति की सभी वस्तुएं अपने-अपने कार्य-संपादन में अविचलित रूप से निरंतर लगी रहती हैं । वह अपने मन को समझाता है कि वह इन सब से प्रेरणा ले और निर्भय होकर अपने कर्तव्यों का निर्वाह करे ।

उपर्युक्त चौथे मंत्र में “ब्रह्म”एवं “क्षत्र”का उल्लेख है । संबंधित मंत्र के सायणभाष्य में इन शब्दों के अर्थ वर्ण व्यवस्था के “ब्राह्मण”तथा “क्षत्रिय”क्रमशः लिए गए हैं । मुझे इन शब्दों के अर्थ क्रमशः सृष्टि के मूल ब्रह्म एवं उसकी शक्ति लेना अधिक सार्थक लगते हैं । इन संस्कृत शब्दों के ये अर्थ भी होते हैं । ध्यान दें कि इन मंत्रों में जोड़े में वस्तुओं/भावों का उल्लेख हुआ है । केवल दो ही वर्णों (वर्ण व्यवस्था के ब्राह्मण आदि) का उल्लेख मुझे इस तथ्य के अनुरूप नहीं लगा । अतः ब्रह्म एवं उसकी सामर्थ्य-क्षमता मुझे अधिक सार्थक लगते है ।

पांचवें मंत्र में सत्य एवं असत्य विद्यमान हैं । सत्य और असत्य भी कभी बदलते नहीं हैं । जो सत्य है वह सदैव के लिए सत्य है और असत्य सदा के लिए असत्य रहता है । इसी प्रकार अंतिम मंत्र में भूत एवं भविष्य का उल्लेख है । जो हो चुका (भूत) वह “न हुआ”नहीं किया जा सकता है, ओर जो होने वाला है (भविष्य) वह भी नियत बना रहना है । – योगेन्द्र जोशी

 

ऋग्वेद में औषधीय वनस्पतियों की प्रार्थना (2)

अपने चिट्ठे की पिछली प्रविष्टि (21 मार्च 2014) में मैंने चर्चा की थी कि ऋग्वेद में औषधीय वनस्पतियों की प्रार्थना से संबंधित कुछ ऋचाएं पढ़ने को मिलती हैं । उस आलेख में मैंने तीन ऋचाओं का उल्लेख किया था । इस स्थल पर मैं अतिरिक्त तीन ऋचाएं प्रस्तुत कर रहा हूं ।

आगे बढ़ने से पहले मैं यह स्पष्ट कर दूं कि वैदिक ऋषिगण प्रकृति के हर घटक में, जंगम (गतिशील) एवं स्थावर (स्थिर)  कृतियों में, अधिष्ठाता दैवी शक्तियों के अस्तित्व होने का विश्वास करते थे । उनके मत में दैवी शक्तियां वस्तुविशेष के गुणधर्मों पर नियंत्रण रखती हैं । वे मानते थे जिस किसी वस्तु का उपयोग किया जा रहा हो उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जानी चाहिए, उसके प्रति कल्याणप्रद बने रहने की प्रार्थना की जानी चाहिए । प्रकृति को मात्र भोग्य वस्तुओं के संग्रह के रूप में न देखकर उसको हमारे अस्तित्व के चेतन आधार के तौर देखा जाना चाहिए । औषधीय वनस्पतियों के प्रति प्रार्थनाभाव इसी मान्यता से प्रेरित रहा है । इस प्रसंग में प्रस्तुत है एक ऋचा:

          मा वो रिषत्खनिता यस्मै चाहं खनामि वः ।

          द्विपच्चतुष्पदस्माकं सर्वमस्त्वनातुरम् ॥20

          (ऋग्वेद, मण्डल 10, सूक्त 97)

          (अहं खनिता यस्मै च वः खनामि वः मा रिषत् द्विपद्- चतुः-पद् सर्वम् अस्माकं अनातुरम् अस्तु ।)

अर्थः (हे औषधीय वनस्पति) मैं भूमि का खनन करने वाला, और जिसके लिए यह कार्य करता हूं वह, तुम्हारी हिंसा न करें, तुम्हारा नाश न करें । हमसे संबंधित द्विपद (मनुष्यगण) एवं चतुष्पद (पशुगण) रोगमुक्त रहें ।

ओषधि प्राप्ति के लिए भूमि का खननकर्ता वनस्पतियों को हानि तो पहुंचाता ही है । कदाचित प्रार्थना के माध्यम से वह अपनी विवशता व्यक्त करता है । शायद वह यह कहना चाहता है कि अवांझित तौर पर वनस्पतियों को नुकसान पहुंचाना उसका उद्येश्य नहीं । वनस्पतियों को अनावश्यक रूप से नष्ट नहीं करना चाहता है, उनका समूल उच्छेदन नहीं करना चाहता । खननकर्ता के कार्य को हिंसा के तौर पर न देखा जाए । इसके आगे उसकी प्रार्थना है कि औषधियां उससे संबंधित सभी जनों (द्विपद) और पशुसंपदा (चतुष्पद, चौपाये) को रोगमुक्त रखें । अगली ऋचा है:

याश्चेदमुपशृण्वन्ति याश्च दूरं परागताः ।

सर्वाः संगत्य वीरुधोऽस्यै सं दत्त वीर्यम् ॥21

(यथा उपर्युक्त)

(याः च इदम् उपशृण्वन्ति याः च दूरं परागताः सर्वाः वीरुधः संगत्य अस्यै वीर्यम् सं-दत्त ।)

अर्थः इस स्तुति को जो औषधीय लताएं सुन रही हों अथवा जो दूरस्थ हों वे सभी मिलकर इस रोगी को बल प्रदान करें ।

उक्त ऋचा में खननकर्ता द्वारा निकटवर्ती और दूरस्थ औषधीय वनस्पतियों से प्रार्थना की गई है कि वे सभी मिलकर रोगी को रोगमुक्त करें । यहां लता नाम से उन्हें संबोधित किया गया है । लताओं को कदाचित औषधीय गुणों से युक्त सभी वनस्पतियों के प्रतिनिधि के तौर पर देखा गया है । अन्यथा ओषधियां लता से भिन्न रूपों में भी पाई जाती हैं । अंतिम तीसरी ऋचा यों हैः

ओषधयः सं वदन्ते सोमेन सह राज्ञा ।

यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्तं राजन् पारयामसि ॥22

(यथा उपर्युक्त)

(ओषधयः सं-वदन्ते सोमेन राज्ञा सह ब्राह्मणः यस्मै कृणोति तं राजन् पारयामसि ।)

अर्थः सभी ओषधियां राजा सोम के साथ संवाद करती हैं कि हे राजा विशेषज्ञ ब्राह्मण अर्थात वैद्य जिसकी चिकित्सा करें उसे हम रोगों के पार करते हैं ।

सोम चंद्रमा का पर्याय है और उसे औषधीय वनस्पतियों का राजा अथवा अधिष्ठाता देवता माना गया है । इस ऋचा में ओषधियों का अपने राजा चंद्र के साथ संवाद की कल्पना की गई । उनका कथन है कि वे रोग-निवारण में निपुण वैद्य के माध्यम से रोगी को रोगमुक्त करती हैं । प्राचीन काल में वैद्यकी सामान्यतः ब्राह्मणों के कार्यक्षेत्र में रहा होगा ।

वैदिक समाज में भोजन करते, ओषधि सेवन करते, अथवा अन्य कार्य संपन्न करते समय संबंधित वस्तुओं के प्रति कृतज्ञता या प्रार्थना व्यक्त करने की परंपरा रही है । – योगेन्द्र जोशी

 

ऋग्वेद में औषधीय वनस्पतियों की प्रार्थना (1)

          मैंने अपने चिट्ठे की एक प्रविष्टि (31 जनवरी 2010) में औषधीय वनस्पतियों की प्रार्थना संबंधी यजुर्वेद में उपलब्ध मंत्रों का उल्लेख किया था । भावात्मक तौर पर उनसे साम्य रखने वाली ऋचाएं मुझे ऋग्वेद में भी देखने को मिली हैं । मैं उन्हीं में से चुनी हुई कुछएक की चर्चा यहां पर कर रहा हूं:

          याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्चपुष्पिणीः ।

          बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः ॥15

           (ऋग्वेद, मण्डल 10, सूक्त 97)

          (याः फलिनीः याः अफलाः याः अपुष्पाः पुष्पिणीः च बृहस्पति-प्रसूताः ता अंहसः नः मुञ्चन्तु ।)

अर्थ - फलने वाली जो वनस्पतियां हैं या जिन पर फल नहीं लगते हैं, जो पुष्पित नहीं होती अथवा जिन पर फूल खिलते हैं, देव बृहस्पति-जनित ऐसी सभी वनस्पतियां हमें रोगों से मुक्त रखें ।

सभी वनस्पतियां फूलती नहीं हैं, और जो फूलती हैं उन पर फल लगें ही यह भी आवश्यक नहीं हैं । इस मंत्र में औषधीय गुणों वाली ऐसी समस्त वनस्पतियों से प्रार्थना की गई है कि वे उनके समुदाय को रोगों से मुक्त रखें । वैदिक चिंतकों की मान्यतानुसार सृष्टि के सभी तंत्र अपने-अपने अधिष्ठाता देवता से संबद्ध रहते हैं, और वनस्पतियों को उनके औषधीय गुण बृहस्पति देवता से प्राप्त रहते हैं ।

          मुञ्चन्तु मा शपथ्यादथो वरुण्यादुत ।

          अथो यमस्य षड्बीशात् सर्वस्माद्देवकिल्बिषात् ॥16

           (यथा उपर्युक्त)

           (मा शपथ्यात् मुञ्चन्तु अथो वरुण्यात् उत अथो यमस्य षड्बीशात् सर्वस्मात् देवकिल्बिषात् ।)

अर्थ - औषधियां मुझे शापजनित रोग से मुक्त करें, बल्कि वरुण देवता के शाप से भी दूर रखें, यम देवता की बेड़ियों से मुक्त रखें, इतना ही नहीं समस्त दैवप्रदत्त पापों को मुझसे दूर रखें ।

मनुष्य के कष्ट तीन प्रकार के गिनाए गए हैं: आधिभौतिक, आधिदैविक, एवं आघ्यात्मिक । दूसरे मनुष्यों अथवा संसार के अन्य प्राणियों के कारण जो भौतिक कष्ट भोगना पड़ता है उसे आधिभौतिक कहा जाता है । देवताओं के रोष से जो कष्ट भोगना पड़ता है उसे आधिदैविक की संज्ञा दी गई है । अधिकांश कष्टों की अनुभूति इंद्रियों के माध्यम से अनुभव में आती है । इनके अतिरिक्त कभी-कभी विशुद्ध मानसिक कष्ट भी भोगने पड़ते हैं; इन्हीं को आघ्यात्मिक कहा जाता है । ये कष्ट वस्तुतः मन के विकारों के कारण पैदा होते हैं, और उनका कोई स्पष्ट बाह्य कारण नहीं रहता है । उक्त मंत्र में इन सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति की प्रार्थना की गई है । शापजनित कष्ट उसे समझा जा सकता है जो दूसरों के द्वारा कर्मणा अथवा वाचा किसी को पहुंचाया जाता है । दूसरे के अहित की भावना भी कदाचित कष्ट का कारण बन सकता है । इन सभी को शापमूलक मान सकते हैं । वरुण को हाथ में बंधन (फंदा) लिए हुए पश्चिम दिशा का (समुद्र का भी) अधिष्ठाता देवता माना गया है । वरुण देवता के शाप का ठीक-ठीक अर्थ क्या है मैं समझ नहीं पाया । कदाचित जलजनित रोगों से तात्पर्य हो । यम देवता का शाप का अर्थ यही होगा कि उनके रूप में मुत्यु हर क्षण मनुष्य का पीछा करती है । औषधियां कष्टों अथवा मृत्यु के निमित्त बने रोगों से हमें दूर रखती हैं । मनुष्य के अनुचित कर्मों के फल को देवताओं द्वारा दंड-स्वरूप प्रदत्त पाप कहा गया होगा ऐसा मेरा सोचना है ।

           अवपतन्तीरवदन् दिव ओषधयस्परि ।

           यं जीवमश्नवामहै न स रिष्याति पूरुषः ॥17

           (यथा उपर्युक्त)

           (दिव अवपतन्तीः ओषधयः परि अवदन् यं जीवम् अश्नवामहै स पूरुषः न रिष्याति ।)

अर्थ – द्युलोक से धरती पर उतरती औषधियां वचन बोलती हैं कि जिस जीव को हम व्याप्त या आच्छादित कर लें उस पुरुष का विनाश नहीं होता ।

व्याप्त (वि+आप्त) का अर्थ यहां प्राप्त होना लिया जा सकता है । मेरा सोचना है कि प्राचीन मनीषी वनस्पतियों के औषधीय गुण स्वर्ग की देन मानते होंगे । धरती पर होने वाली घटनाएं देवताओं के नियंत्रण में होती हैं, अतः ये औषधियां भी देवों की प्राणियों पर अनुकंपा के परिणाम प्राणियों को प्राप्त होती हैं । स्वर्ग से धरती पर उतरने वाली औषधियां जो कहती हैं उसे वस्तुतः उनके अधिष्ठाता देवता का कथन माना जाना चाहिए । इस कथन में ये उद्गार प्रतिबिंबित होते हैं कि मनुष्य के नाश का कारण अंततः रोग हैं जिन्हें औषधियां दूर कर देती हैं । नीरोग व्यक्ति ही दीर्घजीवी हो सकता है और वही अपने एवं समाज के लिए फलदायी कार्य संपन्न करने में समर्थ होता है । – योगेन्द्र जोशी

मनुस्मृति के अनुसार विवाह के आठ प्रकार – ब्राह्म, दैव, आर्ष आदि (3)

अपनी पिछली पोस्टों (14 जनवरी तथा 28 जनवरीधर्म एवं कर्मकांड संबंधी हिंदुओं के प्राचीन ग्रंथ मनुस्मृति में वर्णित विवाह के आठ प्रकारों – ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस, और पैशाच – का उल्लेख किया था । इनमें से प्रथम पांच की व्याख्या उपर्युक्त पोस्टों में की गई । अंतिम तीन (गान्धर्व, राक्षस, एवं पैशाच) के बारे में आगे अपना कथ्य प्रस्तुत कर रहा हूं । गांधर्व विवाह के बारे में मनुस्मृति का कथन यों है:

इच्छयाऽअन्योन्यसंयोगः कन्यायाश्च वरस्य च ।

गांधर्वः स तु विज्ञेयो मैथुन्यः कामसम्भवः ॥32॥

(मनुस्मृति, अध्याय तीन)

(कन्यायाः च वरस्य च इच्छया अन्योन्य-संयोगः काम-सम्भवः मैथुन्यः स तु गांधर्वः विज्ञेयः ।)

अर्थ - कन्या एवं वर की इच्छा और परस्पर सहमति से स्थापित संबंध, जो शारीरिक संसर्ग तक पहुंच सकते हैं, की परिणति के रूप में हुए विवाह को ‘गांधर्व’ विवाह की संज्ञा दी गई है ।

गांधर्व विवाह का एक उल्लेख्य उदाहरण मुझे शकुंतला-दुष्यंत की पौराणिक कथा में मिलता है । उस कथा में आखेट के लिए गए राजा दुष्यंत की दृष्टि वन में मेनका-विश्वामित्र की पुत्री और कण्व ऋषि के आश्रम में पल रही युवा शकुंतला पर पड़ती है । वे उसके प्रति आकर्षित होते हैं, दोनों के बीच वार्तालाप होता है, निकटता बढ़ती है, जिसकी परिणति शारीरिक संबंध स्थापना में होती है । वे दोनों परस्पर विवाह-संबध में बंध जाते हैं, जिसे कण्व ऋषि की स्वीकृति मिलती है । उसी संबंध से राजा भरत का जन्म होता है । मेरे मत में गांधर्व विवाह वस्तुतः प्रेम विवाह है, जो वर्तमान काल में युवक-युवतियों के बीच लोकप्रिय होता जा रहा है । दरअसल आज के युवाओं को पढ़ाई एवं तत्पश्चात नौकरी-पेशे के समय परस्पर मिलने-जुलने एवं घूमने-फिरने की अधिक स्वतंत्रता मिलने लगी है । माता-पिताओं ने भी वैचारिक खुलापन अपनाना आरंभ कर दिया है । अतः प्रेम-प्रसंग एवं तज्जन्य विवाह सामान्य होते जा रहे हैं ।

राक्षस विवाह को यों परिभाषित किया गया है:

हत्वा छित्वा च भित्वा च क्रोशन्तीं रुदन्तीं गृहात् ।

प्रसह्य कन्याहरणं राक्षसो विधिरुच्यते ॥33॥

(यथा पूर्वोक्त)

(हत्वा छित्वा च भित्वा च प्रसह्य गृहात् क्रोशन्तीम् रुदन्तीम् कन्या-हरणम् राक्षसः विधिः उच्यते ।)

अर्थ - कन्यापक्ष के निकट संबंधियों, मित्रों, सुहृदों आदि को डरा-धमका करके, आहत करके, अथवा उनकी हत्या करके रोती-चीखती-चिल्लाती कन्या घर से जबरन उठाकर ले जाना और विवाह करना राक्षस विधि का विवाह कहलाता है ।

पौराणिक कथाओं में ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे हैं । प्राचीन काल में राजा-महाराजा जब किसी युवती के प्रति आकर्षित होते थे तो उसे विवाह के लिए प्रेरित करते थे; न मानने पर जोर-जबरदस्ती उठा ले जाते थे । आज भी कई युवक एक-तरफा प्रेम में पड़कर इस विधि से युवतियों के साथ दांपत्य-संबंध बना लेते हैं ।

सुप्तां मत्तां प्रमत्तां वा रहो यत्रोपगच्छति ।

सः पापिष्ठो विवाहानां पैशाचश्चाष्टमो९धमः ॥34॥

(यथा पूर्वोक्त)

(यत्र सुप्ताम् मत्ताम् प्रमत्ताम् वा रहः उप-गच्छति सः विवाहानाम् अष्टमः पापिष्ठः अधमः पैशाचः च ।)

अर्थ - जब कोई कन्या सोई हो, भटकी हो, नशे की हालत में हो, अथवा सुरक्षा के प्रति असावधान हो, तब यदि कोई उसके साथ शारीरिक संबंध बनाकर अथवा अन्यथा विवाह कर ले तो उसे निकृष्टतम श्रेणी का ‘पैशाच’ विवाह कहा जाता है ।

पैशाच विवाह को निकृष्ट कोटि का कहा गया है । राक्षस विवाह में कन्यापक्ष के लोगों को डरा-धमकाकर या मार-पीटकर कन्या को विवाह के लिए विवश किया जाता है, किंतु उसके साथ दुष्कर्म से बचा जाता है । लेकिन पैशाच में कन्या के साथ धोखे से शारीरिक संबंध बनाकर उसे मजबूर किया जाता है । दूसरे शब्दों में यह वस्तुतः दुष्कर्म पर आधारित है । आजकल कभी-कभी ऐसे मामले प्रकाश आ जाते हैं, जिसमें दुष्कर्म कर चुका व्यक्ति भुक्तभोगी के साथ विवाह कर लेता है । वह कानून से बचने के लिए अथवा आत्मग्लानि के अधीन ऐसा कर सकता है । – योगेन्द्र जोशी

मनुस्मृति के अनुसार विवाह के आठ प्रकार – ब्राह्म, दैव, आर्ष आदि (2)

अपनी पिछली पोस्ट (14 जनवरी) में मैंने इस बात का उल्लेख किया था कि धार्मिक कर्मकांडों एवं सामाजिक दायित्वों से संबंधित हिंदू ग्रंथ, मनुस्मृति, में आठ प्रकार के विवाहों का जिक्र है: ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस, और पैशाच । इनमें से ब्राह्म तथा दैव के बारे में उक्त पोस्ट में ही संक्षिप्त टिप्पणी की गई थी । यहां अगले तीन प्रकारों, आर्ष, प्राजापत्य एवं आसुर, को परिभाषित किया जा रहा है:

एकं गोमिथुनं द्वे वा वरादादाय धर्मतः ।

कन्याप्रदानं विधिवदार्षो धर्मः सः उच्यते ॥29॥

(मनुस्मृति, अध्याय तीन)

(एकम् गोमिथुनम् द्वे वा वरात् आदाय धर्मतः विधिवत् कन्या-प्रदानम् सः धर्मः आर्षः उच्यते ।)

अर्थ - गाय-बैल के एक जोड़े को अथवा दो गायों या बैलों को धार्मिक कृत्य के लिए वर से स्वीकारते हुए समुचित विधि से किए गए कन्यादान को धर्मयुक्त ‘आर्ष’ विवाह कहा जाता है ।

ब्राह्म तथा दैव विवाह में वर को पूजते हुए आभूषण आदि भेंट किये जाते हैं, किंतु उसके विपरीत आर्ष में कन्यापक्ष वर से भेंट-स्वरूप गाय-बैल ग्रहण करता है । हां, उसका पर्याप्त सम्मान करते हुए कन्या प्रदान की जाती है । यहां कहे गये ‘धार्मिक कृत्य के लिए’ शब्दों का अर्थ स्पष्ट नहीं है, अंदाजा ही लगाया जा सकता है । ‘समुचित विधि’ के अर्थ कदाचित यह होंगे कि परंपराओं के अनुरूप पूजा-पाठ संपन्न करते हुए वर को सम्मानित किया जाए । कदाचित उसे भेंट भी दी जाती हो । प्राचीन काल में भारतीय समाज कृषि पर आधारित था, जिसमें गाय-बैलों की निर्विवाद उपयोगिता होती थी । वर्तमान काल में गाय-बैलों की वैसी उपयोगिता रह नहीं गई है । अतः ठीक-ठीक इस रूप में आर्ष विवाह देखने को नहीं मिल सकता है । वर पक्ष से धन या अन्य वस्तुएं स्वीकारते हुए कन्या अर्पित करने की प्रथा कहीं-कहीं प्रचलित है । उसको आधुनिक आर्ष विवाह कहा जा सकता है ।

प्राजापत्य विवाह के बारे में मनुस्मृति में यह श्लोक उपलब्ध हैः

सहोभौ चरतां धर्ममिति वाचाऽनुभाष्य च ।

कन्याप्रदानमभ्यर्च्य प्राजापत्यो विधि स्मृतः ॥30॥

(यथा पूर्वोक्त)

(सह उभौ धर्मम् चरताम् इति वाचा अनुभाष्य अभि-अर्च्य च कन्या-प्रदानम् प्राजापत्यः विधिः स्मृतः ।)

अर्थ - विवाहोत्सुक स्त्री-पुरुष को वर-कन्या के रूप में स्वीकार कर “तुम दोनों मिलकर साथ-साथ धर्माचरण करो” यह कहते हुए और उनका समुचित रूप से स्वागत-सत्कार करते हुए वर को कन्या प्रदान करना ‘प्राजापत्य’ विवाह कहलाता है ।

आजकल कई युवक-युवतियां स्वयं ही वैवाहिक जीवन हेतु  एक-दूसरे का चुनाव कर लेते हैं, और उस निर्णय को अपने-अपने माता-पिता के समक्ष रखकर उनकी सहमति पाने की हर संभव कोशिश करते हैं । माता-पिता इच्छया अनिच्छया वा विवाह का शेष कार्य परंपरानुरूप संपन्न कर देते हैं, यथासंभव स्वागत-सत्कार एवं उपहार भेंट करते हुए । ऐसे विवाह को आधुनिक काल का  प्राजापत्य विवाह माना जा सकता है ।

ज्ञातिभ्यो द्रविणं दत्त्वा कन्यायै चैव शक्तितः ।

कन्याप्रदानं स्वाच्छन्द्यादासुरो धर्म उच्यते ॥31॥

(यथा पूर्वोक्त)

(ज्ञातिभ्यो कन्यायै च शक्तितः द्रविणम् दत्त्वा एव कन्याप्रदानं स्वाच्छन्द्यात् आसुरः धर्मः उच्यते ।)

अर्थ - कन्यापक्ष के बंधु-बांधवों और स्वयं कन्या को वरपक्ष द्वारा स्वेच्छया एवं अपनी सामर्थ्य के अनुसार धन दिए जाने के बाद किये जाने वाले कन्यादान को धर्मसम्मत ‘आसुर’ विवाह कहा जाता है ।

आसुर विवाह एक अर्थ में दैव विवाह का उल्टा माना जा सकता है । दैव विवाह में परपक्ष को धन-आभूषण दिये जाते हैं, उसके विपरीत आसुर विवाह में वरपक्ष कन्यापक्ष को धन आदि देता है । समाज के कुछ तबकों में कदाचित आज भी ऐसे अल्पप्रचलित विवाह देखने को मिलते हैं । इसे भी धर्मसम्मत विवाह ही समझा जाता है ।

विवाह-प्रकारों की इस चर्चा में अंतिम तीन – गान्धर्व, राक्षस, और पैशाच – की चर्चा आगामी पोस्ट में की जाएगी । – योगेन्द्र जोशी

मनुस्मृति के अनुसार विवाह के आठ प्रकार – ब्राह्म, दैव, आर्ष आदि (1)

‘मनुस्मृति’ हिंदुओं का एक चर्चित  धर्मग्रंथ है । किंतु यह पर्याप्त विवादास्पद भी है, क्योंकि कई हिंदू इसमें लिखी बातों से सहमत नहीं होते, अपितु उनकी आलोचना ही करते हैं । मेरे मत में उसकी सभी बातें अस्वीकार्य ही हों ऐसा नहीं है जैसा कि इस ब्लॉग की पूर्ववर्ती एक पोस्ट से स्पष्ट होता है । उस में बहुत-सी बातों को तत्कालीन सामाजिक मान्यताओं का प्रतिबिंबन कहा जा सकता है । ग्रंथ में मुझे उस समय प्रचलित विवाह विधियों के प्रकार – धर्मवेत्ता ऋषि मनु के अनुसार आठ प्रकार – का विवरण पढ़ने को मिला हैं । उन्हीं को मैं आगे प्रस्तुत कर रहा हूं ।

इस संदंर्भ में मनुस्मृति का पहला श्लोक अधोलिखित है:

ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथाऽऽसुरः ।

गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥21॥

(मनुस्मृति, अध्याय तीन)

(ब्राह्मः दैवः तथा एव आर्षः प्राजापत्यः तथा आसुरः गान्धर्वः राक्षसः च एव अष्टमः च अधमः पैशाचः ।)

अर्थ - विवाह आठ प्रकार के होते हैं जो क्रमशः ये हैं: ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस, और आठवां निकृष्टतम श्रेणी का पैशाच ।)

इनमें से पहला, ब्राह्म, इस तरह परिभाषित किया गया है:

आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतिशीलवते स्वयम् ।

आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्मः प्रकीर्तितः ॥27॥

(यथा पूर्वोक्त)

(स्वयम् आहूय आच्छाद्य च अर्चयित्वा च श्रुतिशीलवते कन्यायाः दानम् धर्मः ब्राह्मः प्रकीर्तितः ।)

अर्थ – वेदों-शास्त्रों का अध्ययन जिसने किया हो ऐसे वर को स्वयमेव आमंत्रित करके, उसे वस्त्र-आभूषण आदि अर्पित करके, और समुचित रूप से पूजते हुए कन्या का सोंपा जााना धर्मयुक्त  ‘ब्राह्म ’विवाह कहलाता है ।

आजकल वेदों-शास्त्रों के अध्येता तो न ढूढ़ा जाता है और न ही कोई मिलता है । कहीं यदि मिले तो अपवाद ही कहा जाएगा । इसलिए सही अर्थों में ब्राह्म विवाह अब कहीं देखने को नहीं मिलता है । अधिकांश मौकों पर आज भी सुशिक्षित वर खोजा जाता है जो बारात लेकर कन्यापक्ष के पास पहुंचता है । वेदमंत्रों के उच्चारण के साथ कन्यादान किया जाता है । उसे वस्त्रादि भी भेंट किये जाते हैं । उक्त विवरण में पूजने का अर्थ उसके स्थानीय परंपराओं के अनुरूप स्वागत-सत्कार से लिया जाना चाहिए । इस प्रकार संपन्न विवाह को ब्राह्म विवाह के निकट माना जा सकता है ।

यज्ञे तु वितते सम्यगृत्विजे कर्म कुर्वते ।

अलङ्कृत्य सुतादानं दैवं धर्मं प्रचक्षते ॥28॥

(यथा पूर्वोक्त)

(यज्ञे तु सम्यक् वितते कर्म कुर्वते ऋत्विजे अलङ्कृत्य सुता-दानम् धर्मं दैवम् प्रचक्षते ।)

अर्थ – यज्ञ-कर्म चल रहा हो तो उसमें वेदमंत्रों के उच्चारण का कार्य कर रहे ऋत्विज को वर रूप में चुनते हुए और उसे आभूषण आदि से सुसज्जित करते हुए कन्या समर्पित करना  ‘दैव’ विवाह कहलाता है ।

प्राचीन काल में यज्ञकर्म आम प्रचलन में थे, जिसमें वेदज्ञ पंडितवृंद भाग लेते थे । यज्ञ करना-करवाना ब्राह्मणों के कर्म होते थे । वैदिक मंत्रों के साथ उसे संपादित करने वाले ऋत्विज कहलाते थे । उस काल में वर के तौर पर वे सुयोग्य समझे जाते होंगे । कन्या की अपेक्षा रखने वाला व्यक्ति ऐसे अवसरों पर वर के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करते होंगे । वर की खोज कर रहे माता-पिता ऐसे वरों को कन्यादान करके अपनी पुत्रियों का विवाह संपन्न करते होंगे । दैव विवाह ब्राह्म विवाह से मिलता-जुलता माना जा सकता है, क्योंकि इसमें भी वेदों-शास्त्रों के अध्येता वर को चुना जाता है । शेष कार्य वैसा ही रहता होगा ।

आर्ष आदि अन्य प्रकार के विवाहों की चर्चा अगली पोस्ट में । – योगेन्द्र जोशी

“न भक्षयन्ति ये अर्थान् …” – कौटिलीय अर्थशास्त्र में भ्रष्टाचारी के संबंध में कहे गए वचन (2)

इस ब्लॉग की पिछली पोस्ट में मैंने चाणक्य-विरचित “कौटिलीय अर्थशास्त्र” की चर्चा की थी । तब मैंने उस ग्रंथ में उल्लिखित भ्रष्टाचार तथा भ्रष्ट अधिकारियों से संबंधित 5 श्लोकों में से 3 को उद्धृत किया था । शेष 2 श्लोकों को मैं यहां लिख रहा हूं:

आस्रावयेच्चोपचितान् विपर्यस्येच्च कर्मसु ।

यथा न भक्षयन्त्यर्थं भक्षितं निर्वमन्ति वा ॥

(उपचितान् च आस्रावयेत् विपर्यस्येत् च कर्मसु, यथा अर्थम् न भक्षयन्ति भक्षितम् वा निर्वमन्ति ।) 

(कौटिलीय अर्थशास्त्र, द्वितीय अधिकरण, प्रकरण 25)

अर्थ - सरकारी धन संबंधी दायित्व में लगाए व्यक्तियों से पैसा (दंडस्वरूप) वसूला जाना चाहिए और उनकी पदावनति की जानी चाहिए, ताकि वे फिर धन का भक्षण न कर सकें और जो भक्षण किया हो उसको उगल दें ।

शासन द्वारा नियुक्त अधिकारी धन का दुरुपयोग मूलतः दो प्रकार से करते हैं । एक तो यह है कि वह किसी कार्यविशेष के लिए आबंटित धन को पूरा या अंशतः, अकेले या अन्य जनों से मिलकर, हड़प जाए; दूसरा यह कि वह अपने अधीनस्थ कर्मचारियों एवं कार्य से संबंधित अन्य व्यक्तियों की उचित निगरानी नहीं करता, जिससे वे धनका लाभ स्वयं उठाते हैं और दूसरों को उठाने देते हैं । कौटिल्य (चाणक्य) के अनुसार पहली स्थिति में उस अधिकारी से दायित्व छीन लेना चाहिए, साथ ही उसकी पदावनति की जानी चाहिए अथवा उसे पदमुक्त कर देना चाहिए । इसी के साथ उसके द्वारा अर्जित धन छीन लेना चाहिए । दूसरी स्थिति में कार्यमुक्त करते हुए उसकी पदावनति की जानी चाहिए । उदाहरणार्थ निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर नजर न रखने वाले अधिकारी के विरुद्ध कार्यवाही होनी चाहिए, भले ही वह उस कार्य में धन न कमा रहा हो । कार्य के प्रति लापरवाही भी दंडनीय है ।

न भक्षयन्ति ये अर्थान् न्यायतो वर्धयन्ति च ।

नित्याधिकाराः कार्यास्ते राज्ञः प्रियहिते रताः ॥

(ये अर्थान् न भक्षयन्ति न्यायतः वर्धयन्ति च, राज्ञः प्रिय-हिते रताः ते नित्य-अधिकाराः कार्याः ।)

(कौटिलीय अर्थशास्त्रद्वितीय अधिकरणप्रकरण 25)

अर्थ - जो कर्मचारी राजा का धन नहीं हड़पते, बल्कि उसे न्यायसम्मत तरीके से बढ़ाते हैं, राजा के प्रियदायक हितों में संलग्न रहने वाले वैसे कर्मियों को अधिकारियों के तौर पर कार्य में नियुक्त किया जाना चाहिए ।

पूर्वकाल में राजकीय व्यवस्था प्रायः सभी समाजों में प्रचलित थी तदनुसार राजकीय कोष को राजा का धन कहा जाता है । उसी धन से सभी विकास एवं जनसुविधाओं के कार्य किए जाते थे । आज के संदर्भ में राजा उस संस्था को व्यक्त करता है जो देश की शासकीय व्यवस्था चलाती है । विभिन्न स्रोतों से धन एकत्रित करना और उसे जनकल्याण आदि के कायों में लगाना उसी संस्था का दायित्व होता है । धन प्राप्ति, उसका संचय तथा समुचित व्यय प्रशासनिक तंत्र द्वारा राजाओं के काल में और आज के लोकतंत्रों या अन्य शासकीय व्यवस्थाओं में किया जाता है । उक्त नीतिवचन इस मत पर जोर डालता है कि धन संबंधी तमाम कार्यों में संलग्न अधिकारियों पर राजा या शासकों की पैनी दृष्टि रहनी चाहिए कि वे निष्ठा से कार्य कर रहे कि नहीं । जो व्यक्ति राजकोश को हानि पहुंचा रहा हो उसे तुरंत जिम्मेदारी के पद से हटाया जाना चाहिए, उसके पदावनत कर देना चाहिए और उससे कोश को पहुंचे नुकसान की भरपाई की जानी चाहिए ।

दुर्भाग्य से हमारे देश में ऐसे लोगों के विरुद्ध सामान्यतः कोई कार्रवाई नहीं होती है । चूंकि सरकारी मुलाजिमों को उचित दंड नहीं दिया जाता है, अतः भ्रष्टाचार करने से कोई डरता नहीं । – योगेन्द्र जोशी

(यहां प्रस्तुत जानकारी चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी, द्वारा प्रकाशित कौटिलीय अर्थशास्त्र, संस्करण 2006, पर आधारित है ।)

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