सुभाषित वचन प्रशंसा – यथा ‘सुभाषितरत्नभांडागार’ ग्रंथ में वर्णित

‘सुभाषितरत्नभांडागारम्’ संस्कृत साहित्य का एक अमूल्य ग्रंथ है । इसमें विभिन्न स्रोतों से छंदों के रूप में प्राप्य उक्तियों का संकलन किया गया । (ध्यान रहे कि संस्कृत साहित्य में पद्यात्मक रचनाएं छंदों में लिखित रहती हैं, जिन्हें बोलचाल में अक्सर श्लोकों के नाम से जाना जाता है । परंतु श्लोक शब्द मूलतः अनुष्टुभ् छंद के लिए प्रयुक्त होता है, जिसमें आठ-आठ वर्णों के चार चरण होते हैं ।) मेरे पास उक्त ग्रंथ की नारायण राम आचार्य ‘काव्यतीर्थ’ द्वारा संशोधित एक प्रति है (प्रकाशकः चौखंबा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली, १९९१) । इस ग्रंथ के आरंभ में लिखित परिचय में कहा गया है कि संबंधित संस्करण ‘निर्णय सागर प्रेस’ द्वारा पूर्व में प्रकाशित (१९३५) पुस्तक पर आधारित है । ग्रंथ के इतिहास के बारे में विशेष कुछ नहीं कहा गया है । सांकेतिक तौर पर इतना बताया गया है कि इस ग्रंथ में समय-समय पर कवियों/विद्वानों ने विभिन्न स्रोतों से उक्तियां स्वीकार करके शामिल की हैं । इससे यही लगता है कि इसका मूल लेखक कोई नहीं । इनमें से कई उक्तियों के स्रोत ज्ञात हैं और उनके संदर्भ का ग्रंथ में उल्लेख किया गया है, किंतु अधिकांश उक्तियां के बारे में ठीक से नहीं मालूम । वे जनसामान्य में प्रचलित रही हैं यही ग्रंथ का मत है ।

कथित ग्रंथ में विविध विषयों से संबंधित छंद सम्मिलित हैं, यथा देवी-देवताओं की स्तुति, ज्ञान के विधाओं की महत्ता, साहित्य-संगीत-कला की प्रशंसा, मित्रता-शत्रुता-चाटुकारिता जैसे लौकिक व्यवहार पर टिप्पणियां, कवि-कल्पनाओं की बातें, पेड़-पौधों-औषधियों की उपयोगिता आदि-आदि । ग्रंथ सात प्रकरणों में विभक्त है । उसके द्वितीय प्रकरण, ‘सामान्यप्रकरणम्’, के आरंभ में ‘सुभाषितप्रशंसा’ सम्मिलित है । इसके तीन छंदों का मैं यहां पर उल्लेख कर रहा हूं:

(सुभाषितरत्नभांडागार, सामान्यप्रकरणम्, क्रमशः ३, ४ एवं ६)
सुभाषितमयैर्द्रव्यैः सङ्ग्रहं न करोति यः ।
सो९पि प्रस्तावयज्ञेषु कां प्रदास्यति दक्षिणाम् ।।
(यः सुभाषित-मयैः द्रव्यैः सङ्ग्रहं न करोति सः अपि प्रस्ताव-यज्ञेषु कां दक्षिणाम् प्रदास्यति ?)
भावर्थः सुभाषित कथन रूपी संंपदा का जो संग्रह नहीं करता वह प्रसंगविशेष की चर्चा के यज्ञ में भला क्या दक्षिणा देगा ? समुचित वार्तालाप में भाग लेना एक यज्ञ है और उस यज्ञ में हम दूसरों के प्रति सुभाषित शब्दों की आहुति दे सकते हैं । ऐसे अवसर पर एक व्यक्ति से मीठे बोलों की अपेक्षा की जाती है, किंतु जिसने सुभाषण की संपदा न अर्जित की हो यानी अपना स्वभाव तदनुरूप न ढाला हो वह ऐसे अवसरों पर औरों को क्या दे सकता है ?

संसारकटुवृक्षस्य द्वे फले अमृतोपमे ।
सुभाषितरसास्वादः सङ्गतिः सुजने जने ।।
(संसार-कटु-वृक्षस्य अमृत-उपमे द्वे फले, सुभाषित-रस-आस्वादः सुजने जने सङ्गतिः ।)
भावार्थः संसार रूपी कड़ुवे पेड़ से अमृत तुल्य दो ही फल उपलब्ध हो सकते हैं, एक है मीठे बोलों का रसास्वादन और दूसरा है सज्जनों की संगति । यह संसार कष्टों का भंडार है, पग-पग पर निराशाप्रद स्थितियों का सामना करना पड़ता है । ऐसे संसार में दूसरों से कुछएक मधुर बोल सुनने को मिल जाएं और सद्व्यवहार के धनी लोगों का सान्निध्य मिल जाए तो आदमी को तसल्ली हो जाती है । मीठे बोल और सद्व्यवहार की कोई कीमत नहीं होती है, परंतु ये अन्य लोगों को अपने कष्ट भूलने में मदद करती हैं । कष्टमय संसार में इतना ही बहुत है ।

पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् ।
मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते ।।

(पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि, जलम्, अन्नं, सुभाषितम्; मूढैः पाषाण-खण्डेषु रत्न-संज्ञा विधीयते ।)
भावार्थः इस पृथ्वी पर असल रत्न तीन ही हैं, और ये हैं जल, अन्न तथा सुखद बोल । वे लोग वस्तुतः मूर्ख हैं जो पत्थर के टुकड़ों को रत्न मान के चलते हैं । अन्न तथा जल जीवन-धारण के आधारभूत आवश्यक तत्वों के प्रतीक हैं और अन्य सभी वस्तुओं का महत्त्व इन्हीं के बाद है । संसार का आनंद मधुर वचनों को सुनने में है । ये ही सब वास्तविक रत्न हैं । ये जीवन में मिल जाएं तो पत्थर के रत्नों की आवश्यकता ही क्या रह जाती है, और ये नहीं तो उन पाषाण-रत्नों से क्या सुख मिलेगा ?

क्या है सुभाषित ? वे शब्द जो दूसरों को मानसिक क्लेश पहुंचाने के उद्येश्य से न बोले गये हों, जिन्हें सुनने पर एक प्रकार की सुखानुभूति होती है, जो असत्य पर आधारित न हों, जिनमें दूसरों के प्रति निरादर-भाव न झलकता हो, और जिनमें नैतिकता, बुद्धिमत्ता तथा विवेकशीलता निहित हो, आदि । कहना तो सरल है, किंतु दूसरों के समक्ष प्रिय वचन बोलना गंभीर आत्मसंयम पर निर्भर करता है । सामान्यतः मनुष्य अहंभाव से ग्रस्त रहता है, और जब वह बहुत कुछ अपने अहं के प्रतिकूल होते देखता है तो असहिष्णु हो उठता है । तब संयमित वचन बाल पाने की सामर्थ्य खो बैठता है ।

उपरिलिखित छंदों में प्रथम दो का संदर्भ सुभाषितरत्नभांडागार में दिया गया है । प्रथम का स्रोत पंचतंत्र बताया गया है और दूसरे का हितोपदेश । मुझे पंचतंत्र में जो छंद मिला उसके दो-एक शब्द भिन्न है । मुझे यह ‘श्लोक’ पढ़ने को मिला:
सुभाषितमयद्रव्यसङ्ग्रहं न करोति यः ।
स तु प्रस्तावयज्ञेषु कां प्रदास्यति दक्षिणाम् ।।

(पञ्चतन्त्र, प्रथम तंत्र, १७१)

इसी प्रकार अगले श्लोक के शब्द भी कुछ भिन्न हैं:
संसारविषवृक्षस्य द्वे एव रसवत्फले ।
काव्यामृतरसास्वादः सङ्गमः सुजनैः सह ।।

(हितोपदेश, प्रथम भाग, १५४)

फिर भी भावार्थ कमोबेश वही हैं । तीसरा श्लोक कदाचित् जनश्रुत पर आधारित है । – योगेन्द्र जोशी

‘आत्मानं रथिनं विद्धि …’: कठोपनिषद् में आत्मा एवं शरीर के संबंध की व्याख्या

पहले की एक पोस्ट (७ अक्टूबर २००९) में इस बात का उल्लेख किया गया है कि कठोपनिषद् में वाजश्रवापुत्र ऋषिकुमार नचिकेता और यम देवता के बीच प्रश्नोत्तरों की कथा का वर्णन है । बालक नचिकेता की शंकाओं का समाधान करते हुए यमराज उसे उपमाओं के माध्यम से सांसारिक भोगों में लिप्त आत्मा, अर्थात् जीवात्मा, और उसके शरीर के मध्य का संबंध स्पष्ट करते हैं । संबंधित आख्यान में यम देवता के निम्नांकित श्लोकनिबद्ध दो वचन मुझे रोचक लगे:

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।।

(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ३)
(आत्मानम् रथिनम् विद्धि, शरीरम् तु एव रथम्, बुद्धिम् तु सारथिम् विद्धि, मनः च एव प्रग्रहम् ।)

इस जीवात्मा को तुम रथी, रथ का स्वामी, समझो, शरीर को उसका रथ, बुद्धि को सारथी, रथ हांकने वाला, और मन को लगाम समझो । (लगाम – इंद्रियों पर नियंत्रण हेतु, अगले मंत्र में उल्लेख ।)

इंद्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ।।

(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ४)
(मनीषिणः इंद्रियाणि हयान् आहुः, विषयान् तेषु गोचरान्, आत्मा-इन्द्रिय-मनस्-युक्तम् भोक्ता इति आहुः ।)

मनीषियों, विवेकी पुरुषों, ने इंद्रियों को इस शरीर-रथ को खींचने वाले घोड़े कहा है, जिनके लिए इंद्रिय-विषय विचरण के मार्ग हैं, इंद्रियों तथा मन से युक्त इस आत्मा को उन्होंने शरीररूपी रथ का भोग करने वाला बताया है ।

प्राचीन भारतीय विचारकों का चिंतन प्रमुखतया आध्यात्मिक प्रकृति का रहा है । ऐहिक सुखों के आकर्षण का ज्ञान उन्हें भी रहा ही होगा । किंतु उनके प्रयास रहे थे कि वे उस आकर्षण पर विजय पायें । उनकी जीवन-पद्धति आधुनिक काल की पद्धति के विपरीत रही । स्वाभाविक भौतिक आकर्षण से लोग स्वयं को मुक्त करने का प्रयास करें ऐसा वे सोचते रहे होंगे और उपनिषद् आदि ग्रंथ उनकी इसी सोच को प्रदर्शित करते हैं ।

उनके दर्शन के अनुसार अमरणशील आत्मा शरीर के द्वारा इस भौतिक संसार से जुड़ी रहती है और यहां के सुख-दुःखों का अनुभव मन के द्वारा करती हैं । मन का संबंध बाह्य जगत् से इंद्रियों के माध्यम से होता है । दर्शन शास्त्र में दस इंद्रियों की व्याख्या की जाती हैः पांच ज्ञानेंद्रियां (आंख, कान, नाक, जीभ तथा त्वचा) और पांच कर्मेद्रियां (हाथ, पांव, मुख, मलद्वार तथा उपस्थ यानी जननेद्रिय, पुरुषों में लिंग एवं स्त्रियों में योनि) ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से मिलने वाले संवेदन-संकेत को मन अपने प्रकार से व्याख्या करता है, सुख या दुःख के तौर पर । इंद्रिय-संवेदना क्रमशः देखने, सुनने, सूंघने, चखने तथा स्पर्शानुभूति से संबंधित रहती हैं । किन विषयों में इंद्रियां विचरेंगी और कितना तत्संबंधित संवेदनाओं को बटोरेंगी यह मन के उन पर नियंत्रण पर रहता है । इंद्रिय-विषयों की उपलब्धता होने पर भी मन उनके प्रति उदासीन हो सकता है ऐसा मत मनीषियों का सदैव से रहा है । उक्त मंत्रों के अनुसार क्या कर्तव्य है और क्या नहीं का निर्धारण बुद्धि करती है और मन तदनुसार इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है । इन मंत्रों का सार यह है: भौतिक भोग्य विषयों रूपी मार्गों में विचरण करने वाले इंद्रिय रूपी घोड़ों पर मन रूपी लगाम के द्वारा बुद्धि रूपी सारथी नियंत्रण रखता है । – योगेन्द्र जोशी

क्षमादान सदैव उचित नहीं – महाकाव्य महाभारत में युधिष्ठिर के प्रति द्रौपदी की सलाह

महाकाव्य महाभारत के वन पर्व में पांडवों के बारह-वर्षीय वनवास के समय उनके द्वारा भोगे गये कष्टों का वर्णन है । ध्यान रहे कि कौरवों के साथ खेले गये जुए में युधिष्ठिर के हार जाने के बाद सभी पांडवों को बारह वर्ष के वनवास एवं तदनंतर एक वर्ष के गुप्त वास पर जाना पड़ा था । वनवास काल में उन्हें तरह-तरह की परेशानियां झेलनी पड़ी थीं । युधिष्ठिर के चारों भाई एवं द्रौपदी यह महसूस करते थे कि उनकी दुःसह स्थिति के लिए युधिष्ठिर ही पूर्णतः उत्तरदायी हैं । वे इस तथ्य का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष उल्लेख यदाकदा कर युधिष्ठिर के समक्ष कर लेते थे । इस मामले में द्रौपदी सबसे अधिक मुखर थी । कई ऐसे प्रकरण हैं जिनमें उसके मुख से युधिष्ठिर के प्रति उलाहना के शब्द निकले हैं या उसने दोषारोपण किया है ।

वन पर्व के २८वें अध्याय में एक प्रसंग वर्णित है जिसमें द्रौपदी युधिष्ठिर को प्रेरित करती है कि वह कौरवों को उनकी करतूतों के लिए सजा दे । कौरवों की बारबार की धोखाधड़ी को वह क्षमा न करे । युधिष्ठिर की अति सत्यवादिता, उदारता तथा क्षमाशीलता को वह अनुचित मानती थी । वह युधिष्ठिर को यह समझाने का प्रयास करती है कि हर किसी को क्षमा नहीं किया जाना चाहिए, उस व्यक्ति को तो कतई नहीं जो जानबूझकर धोखा देता हो और अपराध करता हो । अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए वह राक्षसराज प्रह्लाद और उनके पौत्र राजा बलि (विरोचन पुत्र) के बीच के संवाद का जिक्र करती है । विरोचनकुमार बलि द्वारा जिज्ञासा व्यक्त करने पर पितामह प्रह्लाद उसे नीति संबंधी बातें बताते हैं । उसी क्रम में वे कौन क्षमा का पात्र होता है ओर कौन नहीं की बात समझाते हैं । तत्संबंधित बातें उक्त अध्याय के निम्नांकित चार श्लोकों में स्पष्ट की गयी हैं (महाभारत, वनपर्व, अध्याय २८):

अबुद्धिमाश्रितानां तु क्षन्तव्यमपराधिनाम् ।
न हि सर्वत्र पाण्डित्यं सुलभं पुरुषेण वै ।।२७।।
{अबुद्धिम् आश्रितानाम् अपराधिनाम् तु क्षन्तव्यम्, पुुरुषेण सर्वत्र पाण्डित्यम् सुलभम् न हि वै ।}
अनजाने में अर्थात् समुचित् सोच-विचार किए बिना जिन्होंने अपराध किया हो उनका अपराध क्षमा किया जाना चाहिए, क्योंकि हर मौके या स्थान पर समझदारी मनुष्य का साथ दे जाए ऐसा हो नहीं पाता है । भूल हो जाना असामान्य नहीं, अतः भूलवश हो गये अनुचित कार्य को क्षम्य माना जाना चाहिए ।

अथ चेद् बुद्धिजं कृत्वा ब्रूयुस्ते तदबुद्धिजम् ।
पापान् स्वल्पेऽपि तान् हन्यादपराधे तथानृजून् ।।२८।

{अथ चेद् बुद्धिजं कृत्वा ते तत् अबुद्धिजम् ब्रूयुः, सु-अल्पे अपि अपराधे तान् तथा अनृजून् पापान् हन्यात् ।}

अब यदि बुद्धि प्रयोग से यानी सोच-समझकर अपराध करने के बाद वे तुमसे कहें कि अनजाने में ऐसा हो गया है, तो ऐसे मृथ्याचारियों को थोड़े-से अपराध के लिए भी दण्डित किया जाना चाहिए । कुछ मनुष्य जानबूझकर आपराधिक कृत्यों में लगे रहते हैं । अपने उद्येश्य में असफल होने और पकड़ में आ जाने पर वे स्वयं को निरीह और निर्दोष बताने लगते हैं । ऐसे लोगों के प्रति उदारता नहीं दिखानी चाहिए ।

सर्वस्यैकोऽपराधस्ते क्षन्तव्यः प्राणिनो भवेत् ।
द्वितीये सति वध्यस्तु स्वल्पेऽप्यपकृते भवेत् ।।२९।।
{सर्वस्य प्राणिनः एकः अपराधः ते क्षन्तव्यः भवेत्, स्वल्पे अपि अपकृते द्वितीये सति वध्यः तु भवेत् ।}
सभी प्राणियों (प्रसंगानुसार मनुष्य) का एक अपराध तुम्हें क्षमा कर देना चाहिए, किंतु दूसरी बार अनुचित् कर्म किये जाने पर अवश्य उनको दण्डित करना चाहिए । पहिली बार अपराध करने पर क्षमा कर देना समझ में आता है, लेकिन जब व्यक्ति दूसरे की क्षमाशीलता का अनुचित लाभ उठाते हुए दुबारा-तिबारा गलत काम करे तो उसे छोड़ा नहीं जाना चाहिए ।

अजानता भवेत् कश्चिदपराधः कृतो यदि ।
क्षन्तव्यमेव तस्याहुः सुपरीक्ष्य परीक्षया ।।३०।।

{यदि कश्चित् अपराधः अजानता कृतः भवेत्, परीक्षया सुपरीक्ष्य एव तस्य क्षन्तव्यम् आहुः ।}

यदि वास्तव में अज्ञानवश कोई अपराध हो गया हो और समुचित् जांच-पड़ताल के बाद वह अनजाने में की गयी भूल सिद्ध हो जाए, तो उस कृत्य को क्षमायोग्य कहा गया है । भूल दुबारा-तिबारा भी हो सकती है और तदनुसार आरोपी अपने को निर्दोष बताये तो उसका ऐसा करना स्वाभाविक ही होगा । ऐसे अवसरों पर अपराध की बारीकी से छानबीन की जानी चाहिए और अगर यह सिद्ध हो जाये कि भूल से अनुचित कार्य हो गया, तो व्यक्ति को माफ कर देना चाहिए । वस्तुतः सभी सभ्य समाजों की न्यायिक व्यवस्था इसी नीति पर टिकी है ।

उक्त नीति वचनों में अपराधी को माफ न करने की बातें कही गयी हैं । यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसी को दंडित करने से पूर्व यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि आरोपी ने इरादतन अनुचित कार्य किया है या उससे भूल हो गयी । इस उद्येश्य के लिए समुचित छानबीन की व्यवस्था होनी चाहिए यह मत भी इन श्लोकों में निहित है । स्पष्ट है कि अंततोगत्वा महत्त्व होता है जांच करने वालों की निष्ठा और उनकी कार्यक्षमता का । यदि वे ईमानदारी न बरतें या उन्हें जांच करने की कला न आती हो तो उल्टा-सीधा हो सकता है । आज के समय में अपने देश में कुछ ऐसा ही हो रहा है । जहां आपराधिक वृत्तियों में लिप्त जन बारबार पकड़े जाने पर भी अदंडित छोड़ दिये जा रहे हैं, वहीं कई निरपराधियों को अकारण सजा मिल रही है । किसे क्षमा मिले और किसे सजा इसका सही निर्णय कहीं नहीं हो रहा है । – योगेन्द्र जोशी

‘मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः …’ – बाल्मीकि रामायण का आधारभूत श्लोक

महर्षि बाल्मीकि द्वारा रचित ग्रंथ ‘रामायण’ को संस्कृत साहित्य का प्रथम महाकाव्य कहा जाता है । यह महाकाव्य बालकांड, अयोध्याकांड, आदि (जैसा श्री तुलसीदासकृत ‘रामचरितमानस’ में है) में विभक्त है, और हर कांड सर्गों में बंटा है । ग्रंथ के आरंभ में, वस्तुतः सर्ग दो में, निम्नलिखित श्लोक का उल्लेख है:

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ।
यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी काममोहितम् ।।

(रामायण, बालकाण्ड, द्वितीय सर्ग, श्लोक १५)
{निषाद, त्वम् शाश्वतीः समाः प्रतिष्ठां मा अगमः, यत् (त्वम्) क्रौंच-मिथुनात् एकम् काम-मोहितम् अवधीः ।}

हे निषाद, तुम अनंत वर्षों तक प्रतिष्ठा प्राप्त न कर सको, क्योंकि तुमने क्रौंच पक्षियों के जोड़े में से कामभावना से ग्रस्त एक का वध कर डाला है । (क्रौंच कदाचित् चकवा या चकोर को कहा जाता है ।)

यह श्लोक महर्षि बाल्मीकि के मुख से एक बहेलिए के प्रति अनायास निकला शाप है कि वह कभी भी प्रतिष्ठा न पा सके । (मेरे पास उपलब्ध गीताप्रेस, गोरखपुर, की प्रति में प्रतिष्ठा का हिंदी में अर्थ शांति किया गया है ।) रामायण ग्रंथ के पहले सर्ग में इस बात का उल्लेख है कि देवर्षि नारद महर्षि बाल्मीकि के तमसा नदी तट पर अवस्थित आश्रम पर पधारते हैं और उन्हें रामकथा का संक्षिप्त परिचय देते हैं । देवर्षि के चले जाने के बाद महर्षि अपने शिष्यों के साथ तमसा नदी तट पर स्नानार्थ जाते हैं । तभी वे अपने वस्त्रादि अपने प्रिय शिष्य भरद्वाज को सौंप पेड़-पौधों से हरे-भरे निकट के वन में भ्रमणार्थ चले जाते हैं । उस वन में एक स्थान पर उन की दृष्टि क्रौंच पक्षियों के रतिक्रिया में लिप्त एक असावधान जोड़े पर पड़ती है । कुछ ही क्षणों के बाद वे देखते हैं कि उस जोड़े का एक सदस्य चीखते और पंख फड़फड़ाते हुए जमींन पर गिर पड़ता है । और दूसरा उसके शोक में चित्कार मचाते हुए एक शाखा से दूसरे पर भटकने लगता है । उस समय अनायास ही उक्त निंदात्मक वचन उनके मुख से निकल पड़ते हैं ।

महर्षि के मुख से निकले उक्त छंदबद्ध वचन उनके किसी प्रयास के परिणाम नहीं थे । घटना के बाद महर्षि इस विचार में खो गये कि उनके मुख से वे शब्द क्यों निकले होंगे । वे सोचने लगे कि क्यों उनके मुख से बहेलिए के प्रति शाप-वचन निकले । इसी प्रकार के विचारों में खोकर वे नदी तट पर लौट आये । घटना का वर्णन उन्होंने अपने शिष्य भरद्वाज के समक्ष किया और उसे बताया कि उनके मुख से अनायास एक छंद-निबद्ध वाक्य निकला जो आठ-आठ अक्षरों के चार चरणों, कुल बत्तीस अक्षरों, से बना है । इस छंद को उन्होंने ‘श्लोक’ नाम दिया । वे बोले “श्लोक नामक यह छंद काव्य-रचना का आधार बनना चाहिए; यह यूं ही मेरे मुख से नहीं निकले हैं ।” पर कौन-सी रचना श्लोकबद्ध होवे यह वे निश्चित कर पा रहे थे ।

आगे की कथा यह है कि तमसा नदी पर स्नानादि कर्म संपन्न करने के पश्चात् महर्षि आश्रम लौट आये और आसनस्थ होकर विभिन्न विचारों में खो गये । तभी सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने उन्हें दर्शन दिये और देवर्षि नारद द्वारा उन्हें सुनाये गये रामकथा का स्मरण कराया । उन्होंने महर्षि को प्रेरित किया कि वे पुरुषोत्तम राम की कथा को काव्यबद्ध करें । रामायण के इन दो श्लोकों में इस प्रेरणा का उल्लेख हैः

रामस्य चरितं कृत्स्नं कुरु त्वमृषिसत्तम ।
धर्मात्मनो भगवतो लोके रामस्य धीमतः ।।
वृत्तं कथय धीरस्य यथा ते नारदाच्छ्रुतम् ।
रहस्यं च प्रकाशं च यद् वृत्तं तस्य धीमतः ।।

(रामायण, बालकाण्ड, द्वितीय सर्ग, श्लोक ३२ एवं ३३)
{ऋषि-सत्तम, त्वम् रामस्य कृत्स्नं चरितं कुरु, (कस्य?) लोके धर्मात्मनः धीमतः भगवतः रामस्य । नारदात् ते यथा श्रुतम् (तथा एव तस्य) धीरस्य वृत्तं कथय, तस्य धीमतः रहस्यं च प्रकाशं च यद् वृत्तं (तत् कथय) ।}

हे ऋषिश्रेष्ठ, तुम श्रीराम के समस्त चरित्र का काव्यात्मक वर्णन करो, उन भगवान् राम का जो धर्मात्मा हैं, धैर्यवान् हैं, बुद्धिमान् हैं । देवर्षि नारद के मुख से जैसा सुना है वैसा उस धीर पुरुष के जीवनवृत्त का बखान करो; उस बुद्धिमान् पुरुष के साथ प्रकाशित (ज्ञात रूप में) तथा अप्रकाशित (अज्ञात तौर पर) में जो कुछ घटित हुआ उसकी चर्चा करो । सृष्टिकर्ता ने उन्हें आश्वस्त किया कि अंतर्दृष्टि के द्वारा उन्हें श्रीराम के जीवन की घटनाओं का ज्ञान हो जायेगा, चाहे उनकी चर्चा आम जन में होती आ रही हो या न ।

और तब आरंभ हुआ रामायण ग्रंथ की रचना श्लोकों में निबद्ध होकर । देवर्षि नारद द्वारा कथित बातें, सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की प्रेरणा, और रामकथा की पृष्ठभूमि आदि का उल्लेख महर्षि बाल्मीकि ने स्वयं अपने ग्रंथ के आरंभ में किया है । पूरा ग्रंथ ‘श्लोक’ नामक छंदों में लिखित है । मैंने अभी रामायण का अध्ययन आरंभ ही किया है, लेकिन सरसरी निगाह डालने पर मैंने पाया कि ग्रंथ की भाषा काफी सरल है, और श्लोकों को समझना संस्कृत के सामान्य ज्ञान वाले व्यक्ति के लिए भी संभव है

रामकथा वस्तुतः पौराणिक है । इसलिए रामायण में जो कुछ वर्णित है वह अक्षरशः सही है क्या, इस बारे में कुछ कहना मेरे लिए संभव नहीं है । मुनि नारद कौन थे मैं नहीं जानता । क्या ऋषि बाल्मीकि को ब्रह्मा ने वास्तव में साक्षात् दर्शन दिये? या ऋषि को स्वप्न में उनके दर्शन हुए और उसी में उन्हें काव्यरचना की प्रेरणा प्राप्त हुई ? ऐसे प्रश्न मन में उठ सकते हैं । क्रौंच पक्षियुग्म में एक के हताहत होने से श्रीराम पर केंद्रित काव्यरचना का विचार मन में आया होगा मुझे ऐसा लगता है । वस्तुतः उस घटना को राम-सीता के संयोग-वियोग की कहानी के एक प्रतीक के रूप में लिया जा सकता है ।

आरंभ में ‘मा निषाद …’ का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि आठ-आठ अक्षर वाले चार चरणों की यह विशेष पद्य-रचना को आदिकवि बाल्मीकि ने ‘श्लोक’ की संज्ञा दी थी । इसका तात्पर्य यह हुआ कि संस्कृत-साहित्य में पद्य-रचना छंदों में रहती है और ‘श्लोक’ विभिन्न प्रकार के छंदों में से एक है (जैसे हिंदी में दोहा, सोरठा, चौपाई, कुंडली आदि होते हैं) । यानी हर छंद को श्लोक नहीं कहा जा सकता है । इस तथ्य की जानकारी मुझे उपर्युक्त छंद के अध्ययन के बाद हुआ । संयोग से पद्यात्मक संस्कृत रचनाओं में ‘श्लोकों’ का ही प्रयोग अधिकतया देखने को मिलता है । महाभारत के प्रायः सभी छंद श्लोक ही हैं । जितना इस समय मुझे याद आ रहा है, पूरी भगवद्गीता श्लोकों में ही हैमनुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति, पंचतंत्र, हितोपदेश, चाणक्यनीतिदर्पण, आदि में भी श्लोक ही प्रमुखतया विद्यमान हैं । – योगेन्द्र जोशी

कठोपनिषद् के नीति वचन – श्रेयस् (कल्याणप्रद) एवं प्रेयस् (चित्ताकर्षक) में चुनाव

कठोपनिषद् में ऋषिकुमार बालक नचिकेता और यम देवता के बीच प्रश्नोत्तरों की कथा का वर्णन है । नचिकेता की शंकाओं का समाधान करते हुए यम उपदेश देते हैं कि मनुष्य दो प्रकार के कर्मों से बंधा रहता है, प्रथम वे जो कल्याणकारी होते हैं और द्वितीय वे जो उसको प्रिय लगते हैं तथा उसे अपनी ओर खींचते हैं । तद्विषयक ये दो मंत्र विशेष तौर पर उल्लेखनीय हैं:

अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषंसिनीतः ।
तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ।।

(कठोपनिषद्, अध्याय १, बल्ली २, मंत्र १)
[अन्यत् श्रेयः उत अन्यत् (च) एव प्रेयः, ते उभे पुरुषम् नाना अर्थे सिनीतः; तयोः श्रेयः आददानस्य साधुः भवति, यः उ प्रेयः वृणीते (सः) अर्थात् हीयते ।]

एक वह कर्म है जिसमें उसका हित निहित रहता है और दूसरा वह है जो उसे प्रिय लगता है । ये दोनों ही उसे विभिन्न प्रयोजनों से बांधे रहते हैं । इन दो में से प्रथम कल्याणकारी कर्म को चुनने वाले का भला होता है, किंतु लुभाने वाले दूसरे कर्म में संलग्न पुरुष सार्थक पुरुषार्थ से च्युत हो जाता है ।

श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ।
श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते ।।

(कठोपनिषद्, अध्याय १, बल्ली २, मंत्र २)
[श्रेयः च प्रेयः च मनुष्यम् एतः, धीरः तौ सम्परीत्य विविनक्ति, धीरः हि श्रेयः अभि प्रेयसः वृणीते, प्रेयः मन्दः योग-क्षेमात् वृणीते ।]

मंगलकारी तथा प्रिय लगने वाले कर्म मनुष्य के पास क्रमशः आते रहते हैं, अर्थात् चुने और संपन्न किये जाने हेतु वे उपस्थित होते रहते हैं । गहन विचारणा के पश्चात् विवेकशील व्यक्ति दोनों के मध्य भेद करता है और प्रिय की तुलना में हितकर का चुनाव करता है । अविवेकी पुरुष (ऐहिक) योगक्षेम के कारण मन को अच्छा लगने वाले कर्म को चुनता है ।

कठोपनिषद् में (जैसा अन्य सभी उपनिषदों में है) दर्शन (फिलॉसफी) तथा अध्यात्म (स्पिरिच्युअलिज्म्) से संबंधित बातों की चर्चा की गयी है । वैदिक चिंतन के अनुसार मानव जीवन का अंतिम उद्येश्य आध्यात्मिक उन्नति है, परमात्म-तत्व का साक्षात्कार करना है, जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होना है । आत्मिक उत्थान हेतु किये गये प्रयास को ही श्रेयस्कर कर्म की संज्ञा दी गयी है । इसके विपरीत सांसारिक सुखभोग, शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्यलाभ, संपदा-संपन्नता का अर्जन इत्यादि (योगक्षेम) को प्रेयस् या प्रिय लगने वाला कर्म कहा गया है । उक्त मंत्रों का आशय यह है कि मनुष्य द्वितीय प्रकार के ऐहिक प्रयोजनों हेतु किये जाने वाले कर्मों में लिप्त रहता है, क्योंकि उसे तात्कालिक अथवा अल्पकालिक लाभ का आकर्षण बांधे रहता है । लेकिन उसे अपने आध्यात्मिक श्रेयस् में स्वयं को लगाना चाहिए ।

अध्यात्म की कोई सार्थकता आज के युग में है भी ? इस बात पर मुझे शंका है । मेरे अनुभव और अनुमान से अब अध्यात्म की बात एक औपचारिकता की बात भर रह गयी है । इस भौतिक जीवन के परे भी कुछ है यह शंकास्पद है, और उस दिशा में अपना समय लगाना निष्प्रयोजन समझा जाता है । वस्तुतः मनुष्य धर्मकर्म जैसी बातें भी ऐहिक सुखप्राप्ति के लिए ही करता है ऐसा मुझे प्रतीत होता है । कितने जन होंगे जो कभी कुछ पल का समय निकालकर अपने कृत्यों का आकलन आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में करते हों । मुझे लगता है कि इन मंत्रों की उपरिचर्चित व्याख्या अब शायद ही स्वीकार्य हो । ऐसे में इनकी पुनर्व्याख्या की जा सकती है ।

यदि हम आज की स्थिति, जिसमें सब कुछ सांसारिक है और उसके परे कुछ है भी कि नहीं इस बात पर चिंतन शायद ही कहीं होता हो, के अनुरूप इन मंत्रों की प्रासंगिकता की बात करें, तो भी इन मंत्रों के कुछ अर्थ ढूढ़े जा सकते हैं । सांसारिक संदर्भ में भी कल्याणकारी एवं लुभावने कर्मों में भेद किया जाता है । अपने दीर्घकालिक तथा स्थाई हितों और क्षणिक या तात्कालिक आनंदप्रद कार्यों में किसे चुनें यह प्रश्न हमारे समक्ष सदा से ही रहता आया है । व्यक्ति आनंदभोग में लिप्त रहे और अपना बहुत कुछ बर्बाद होने दे यह सदा ही कटु आलोचना का विषय रहा है, और विद्वज्जन सदा ही ऐसे कार्यों से बचने की राय देते हैं । दूसरी तरफ हम अपने जीवन के उच्च उद्येश्य निर्धारित करते हैं, जो भौतिक सुखप्राप्ति से एक कदम आगे मानव-समाज तथा संसार के व्यापक हितों के अनुरूप होते हैं । ऐसे कर्म हमारे कृत्यों के अंग बनें इस विचार को आदर्श के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है । कदाचित् यही इन मंत्रों में छिपा संदेश है कि विवेकी मनुष्य अपने कर्मों के परिणामों का सावधानी से आकलन करते हुए उनमें से प्रेयस् के स्थान पर श्रेयस् को चुने । – योगेन्द्र जोशी

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् और राजधर्म – प्रजासुखे सुखं राज्ञः …

आचार्य चाणक्य के नाम से प्रायः हर भारतवासी परिचित होगा । उन्हें अवसर के अनुरूप हर प्रकार की नीति अपना सकने वाले एक अतिसफल राजनीतिज्ञ के तौर पर जाना जाता है । उनका काल चौथी सदी ईसवी पूर्व बताया जाता है । वे तत्कालीन यूनानी शासक, सिकंदर महान, के समकालीन थे, जो उनकी सूझबूझ के कारण भारत पर अपने आक्रमण में सफल नहीं हो सका था । चाणक्य ने मगध के तत्कालीन राज्यासीन नंदवंश का उन्मूलन करके मौर्य सामाज्य की संस्थापना की थी और चंद्रगुप्त मौर्य का राज्याभिषेक किया था ।

मैंने दो-चार दिन पूर्व ही कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (संपादक: वाचस्पति गैरोला, प्रकाशक: चौखंबा विद्याभवन, वाराणसी, २००६) का अध्ययन आंरभ किया है । उसमें प्रस्तुत ग्रंथ-परिचय में मुझे आचार्य चाणक्य के संदर्भ में विष्णुपुराण-आधारित अधोलिखित एक रोचक प्रकरण पढ़ने को मिला हैः
“महाभदन्तः तत्पुत्रास्चैकं वर्षशतमवनीपतयो भविष्यन्ति । नवैव । तान्नन्दान् कौटिल्यो ब्राह्मणः समुद्धधरिष्यति । तेषामभावे मौर्याश्च पृथ्वीं भोक्ष्यन्ति । कौटिल्य एव चन्द्रगुप्तं राज्ये९भिषेक्ष्यति । तस्यापि पुत्रो बिन्दुसारो भविष्यति । तस्याप्यशोकवर्धनः ।” ( “महाभदन्त और उसके नौ पुत्र एक सौ वर्ष तक धरती पर राज करेंगे । उन नन्दवंशीयों को कौटिल्य नामक ब्राह्मण विनाश करेगा । उनके अभाव में मौर्यवंशीय पृथ्वी का भोग करेंगे । कौटिल्य ही चन्द्रगुप्त को राज्याभिषेक करेगा । उस चंद्रगुप्त का पुत्र बिन्दुसार होगा और उसका पुत्र अशोकवर्धन ।) विष्णुपुराण अपेक्षतया प्राचीन माना जाता है, तदनुसार इस प्रकरण को भविष्य की घटना की पूर्वघोषणा के रूप में देखा जा सकता है ।

चाणक्य का असली नाम (परिवार द्वारा परंपरानुसार प्रदत्त) विष्णुगुप्त बताया जाता है । उनको चाणक्य नाम अपने पिता चणक के कारण मिला था । प्राचीन काल में व्यक्ति को माता-पिता या परिवार पर आधारित नाम से भी पुकारने की परंपरा रही है, यथा सुमित्रा-पुत्र सौमित्र (लक्ष्मण), वसुदेव-पुत्र वासुदेव (कृष्ण), पृथा-पुत्र पार्थ (अर्जुन), आदि । एक कुटिल राजनीतिज्ञ के नाते उन्हें कौटिल्य नाम से भी जाना जाता है । ‘ कौटिलीय अर्थशास्त्रम्’ अथवा कौटिल्य अर्थशास्त्र उनकी ही एक रचना है, जिसमें उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक विषयों से संबद्ध विचारों का संकलन किया है । ग्रंथ के आरंभ में उन्होंने कहा हैः
“पृथिव्या लाभे पालने च यावन्त्यर्थशास्त्राणि पूर्वाचार्यैः प्रस्थापितानि प्रायशस्तानि संहृत्यैकमिदमर्थशास्त्रं कृतम् ।” (पृथवीगत संपदा को पाने तथा उसकी रक्षा करने से संबंधित जितने भी शास्त्र पूर्व के आचार्यों ने रचे हैं प्रायः उनके सारसंकलन के रूप में यह अर्थशास्त्र लिखा गया है ।)

यह कौटिलीय अर्थशास्त्र अधिकांशतः गद्य रूप में निबद्ध है, किंतु उसमें कहीं-कहीं श्लोक भी लिखित हैं । इसी ग्रंथ में एक स्थल पर राजा के कर्तव्यों की व्यापक चर्चा की गयी है । उसी संदर्भ में निम्नलिखित तीन श्लोक (कौटिलीय अर्थशास्त्र, प्रथम अधिकरण (विनयाधिकारिक), प्रकरण १५) मुझे प्रासंगिक लगते हैंः

(१)
प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम् ।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम् ।।

{राज्ञः सुखं प्रजासुखे, प्रजानां च हिते (तस्य) हितम्, आत्मप्रियं राज्ञः हितं न, (अपि) तु प्रजानां प्रियं हितम् ।}

प्रजा के सुख में राजा का सुख निहित है; अर्थात् जब प्रजा सुखी अनुभव करे तभी राजा को संतोष करना चाहिए । प्रजा का हित ही राजा का वास्तविक हित है । वैयक्तिक स्तर पर राजा को जो अच्छा लगे उसमें उसे अपना हित न देखना चाहिए, बल्कि प्रजा को जो ठीक लगे, यानी जिसके हितकर होने का प्रजा अनुमोदन करे, उसे ही राजा अपना हित समझे ।
(२)
तस्मान्नित्योत्थितो राजा कुर्यादर्थानुशासनम् ।
अर्थस्य मूलमुत्थानमनर्थस्य विपर्ययः ।।

{तस्मात् नित्य-उत्थितः राजा अर्थ-अनुशासनम् कुर्यात्, उत्थानम् अर्थस्य मूलम्, विपर्ययः (च) अनर्थस्य (कारणम्) ।}

अतः उक्त बातों के मद्देनजर राजा को चाहिए कि वह प्रतिदिन उन्नतिशील-उद्यमशील होकर शासन-प्रशासन एवं व्यवहार के दैनिक कार्यव्यापार संपन्न करे । अर्थ यानी संपदा-संपन्नता के मूल में उद्योग में संलग्नता ही है, इसके विपरीत लापरवाही, आलस्य, श्रम का अभाव आदि अनर्थ (संपन्नता के अभाव या हानि) के कारण बनते हैं ।
(३)
अनुत्थाने ध्रुवो नाशः प्राप्तस्यानागतस्य च ।
प्राप्यते फलमुत्थानाल्लभते चार्थसम्पदम् ।।

{अनुत्थाने प्राप्तस्य अनागतस्य च नाशः ध्रुवः, उत्थानात् फलम् प्राप्यते, अर्थ-सम्पदम् च लभते ।}

यदि राजा उद्योगरत तथा विकास-कार्यों के प्रति सचेत न हो तब जो धनसंपदा-पूंजी उसके पास पहले से मौजूद हो और जो कुछ भविष्य के गर्त में मिल सकने वाला हो (अनागत), उन दोनों, का नाश अवश्यंभावी है । सतत प्रयास, श्रम, उद्यम में संलग्न रहने पर ही सुखद फल और वांछित संपदा-संपन्नता प्राप्त होते हैं ।

हम लोकतांत्रिक शासकीय व्यवस्था वाले देश के नागरिक हैं । अब पारंपरिक अर्थ में राजा नहीं हैं । आज राजा से क्या अर्थ लिए जाएं ? उच्च स्तर पर जो इस शासकीय व्यवस्था को चला रहे हैं वे ही राजा के तुल्य माने जाने चाहिए । अतः राजा से जो अपेक्षाएं ऊपर बताई गयी हैं वे इन आधुनिक ‘राजाओं’/शासकों पर लागू होती हैं । उन्हें ही प्रजा अर्थात् जनता के सामूहिक हितों का ध्यान रखना चाहिए और उन्हीं को अपनी वैयक्तिक रुचियों को जानकांक्षाओं से सामने त्याग देना चाहिए । राजा उद्यमशील रहे कहा जाता है तो उसके निहितार्थ अपने कर्तव्यों के अनुरूप सचेष्ट रहना समझा जाना चाहिए । वह अपने अधीनस्थों को समुचित कार्य में संलग्न रखे यह तात्पर्य है । दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो रहा है । हमारे शासक मौजूदा व्यवस्था को अपने हितों को साधनेे के अवसर के रूप में देखते हैं । उनकी सोच में अंतर आवे यही कामना की जा सकती है । - योगेन्द्र

‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’ इत्यादि – मनुस्मृति के वचन

‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते …’ कहते हुए समाज में स्त्रियों को सम्मान मिलना चाहिए की बात अक्सर सुनने को मिलती हैं । सम्मान तो हर व्यक्ति को मिलना चाहिए, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, बालक हो या वृद्ध, धनी हो या निर्धन, आदि । किंतु देखने को यही मिलता है कि व्यक्ति शरीर से कितना सबल है, वह कितना धनी है, बौद्धिक रूप से कितना समर्थ है, किस कुल में जन्मा है, आदि बातें समाज में मनुष्य को प्राप्त होने वाले सम्मान का निर्धारण करते हैं । सम्मान-अपमान की बातें समाज में हर समय घटित होती रहती हैं, किंतु स्त्रियों के साथ किये जाने वाले भेदभाव की बात को विशेष तौर पर अक्सर उठाया जाता है । फलतः उक्त वचन लोगों के मुख से प्रायः सुनने को मिल जाता है ।

उक्त वचन मनुस्मृति के हैं जो एक विवादास्पद ग्रंथ माना जाता है, फिर भी जिस पर हिंदू समाज के नियम-कानून कुछ हद तक आधारित हैं । मैंने सुना है कि समाज में व्याप्त कुछएक विकृतियों की जड़ में यह ग्रंथ भी है । मेरा विचार है कि यथाशीघ्र इस ग्रंथ का अध्ययन करूं और देखूं कि उसमें कितना कुछ आपत्तिजनक है । फिलहाल मेरी दृष्टि में उक्त कथन और उससे संबद्ध पांच श्लोकों पर गयी तो सोचा कि उनका उल्लेख इस स्थल पर करूं । ये श्लोक आगे दिये जा रहे हैं (मनुस्मृति अध्याय ३, श्लोक ५६-६०):

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।।५६।।

[यत्र तु नार्यः पूज्यन्ते तत्र देवताः रमन्ते, यत्र तु एताः न पूज्यन्ते तत्र सर्वाः क्रियाः अफलाः (भवन्ति) ।]

जहां स्त्रीजाति का आदर-सम्मान होता है, उनकी आवश्यकताओं-अपेक्षाओं की पूर्ति होती है, उस स्थान, समाज, तथा परिवार पर देवतागण प्रसन्न रहते हैं । जहां ऐसा नहीं होता और उनके प्रति तिरस्कारमय व्यवहार किया जाता है, वहां देवकृपा नहीं रहती है और वहां संपन्न किये गये कार्य सफल नहीं होते हैं ।

शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् ।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ।।५७।।

[यत्र जामयः शोचन्ति तत् कुलम् आशु विनश्यति, यत्र तु एताः न शोचन्ति तत् हि सर्वदा वर्धते ।]

जिस कुल में पारिवारिक स्त्रियां दुर्व्यवहार के कारण शोक-संतप्त रहती हैं उस कुल का शीघ्र ही विनाश हो जाता है, उसकी अवनति होने लगती है । इसके विपरीत जहां ऐसा नहीं होता है और स्त्रियां प्रसन्नचित्त रहती हैं, वह कुल प्रगति करता है । (परिवार की पुत्रियों, बधुओं, नवविवाहिताओं आदि जैसे निकट संबंधिनियों को ‘जामि’ कहा गया है ।)

जामयो यानि गेहानि शपन्त्यप्रतिपूजिताः ।
तानि कृत्याहतानीव विनश्यन्ति समन्ततः ।।५८।।

[अप्रतिपूजिताः जामयः यानि गेहानि शपन्ति, तानि कृत्या आहतानि इव समन्ततः विनश्यन्ति ।]

जिन घरों में पारिवारिक स्त्रियां निरादर-तिरस्कार के कारण असंतुष्ट रहते हुए शाप देती हैं, यानी परिवार की अवनति के भाव उनके मन में उपजते हैं, वे घर कृत्याओं के द्वारा सभी प्रकार से बरबाद किये गये-से हो जाते हैं । (कृत्या उस अदृश्य शक्ति की द्योतक है जो जादू-टोने जैसी क्रियाओं के किये जाने पर लक्षित व्यक्ति या परिवार को हानि पहुंचाती है ।)

तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छादनाशनैः ।
भूतिकामैर्नरैर्नित्यं सत्कारेषूत्सवेषु च ।।५९।।

[तस्मात् भूतिकामैः नरैः एताः (जामयः) नित्यं सत्कारेषु उत्सवेषु च भूषणात् आच्छादन-अशनैः सदा पूज्याः ।]

अतः ऐश्वर्य एवं उन्नति चाहने वाले व्यक्तियों को चाहिए कि वे पारिवारिक संस्कार-कार्यों एवं विभिन्न उत्सवों के अवसरों पर पारिवार की स्त्रियों को आभूषण, वस्त्र तथा सुस्वादु भोजन आदि प्रदान करके आदर-सम्मान व्यक्त करें ।

सन्तुष्टो भार्यया भर्ता भर्त्रा भार्या तथैव च ।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ।।६०।।

[यस्मिन् एव कुले नित्यं भार्यया भर्ता सन्तुष्टः, तथा एव च भर्त्रा भार्या, तत्र वै कल्याणं ध्रुवम् ।]

जिस कुल में प्रतिदिन ही पत्नी द्वारा पति संतुष्ट रखा जाता है और उसी प्रकार पति भी पत्नी को संतुष्ट रखता है, उस कुल का भला सुनिश्चित है । ऐसे परिवार की प्रगति अवश्यंभावी है । – योगेन्द्र

‘सत्यं वद, धर्मं चर, …’ – तैत्तिरीय उपनिषद् के उपदेशात्मक मंत्र

अपने आरंभिक छात्रजीवन के समय संस्कृत पाठ्यपुस्तकों में मैंने “सत्यं वद । धर्मं चर ।… मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । …” के शिक्षाप्रद वचन पढ़े थे । अपरिपक्व सोच के उस काल में इन वचनों की अर्थवत्ता इम्तहान पास करने में अधिक थी और उनके निहितार्थ समझने में कम । हो सकता है उनका कुछ प्रभाव अपने आचरण पर पड़ा हो । कह नहीं सकता ।

इन वचनों के स्रोत के बारे में जिज्ञासा होने पर मैंने उननिषदों के पन्ने पलटना आरंभ किए तो पाया कि ये तैत्तिरीय उपनिषद् में समाहित हैं । इस उपनिषद् के तीन खंड हैं जिन्हें वल्ली कहा गया हैः शिक्षावल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली तथा भृगुवल्ली । प्रत्येक वल्ली स्वयं में अनुवाकों (अध्यायों) में विभक्त है । शिक्षावल्ली के ग्यारहवें अनुवाक में इस बात का वर्णन है कि कैसे वेदाध्यापन के बाद गुरु द्वारा अपने शिष्यों को सम्यग् आचरण की शिक्षा दी जाती है । उसी अनुवाक के आंरभ के दो मंत्र ये हैं:

वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति । सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजानन्तुं मा व्यवच्छेसीः । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् ।।
(तैत्तिरीय उपनिषद्, शिक्षावल्ली, अनुवाक ११, मंत्र १)

अर्थ:- वेद के शिक्षण के पश्चात् आचार्य आश्रमस्थ शिष्यों को अनुशासन सिखाता है । सत्य बोलो । धर्मसम्मत कर्म करो । स्वाध्याय के प्रति प्रमाद मत करो । आचार्य को जो अभीष्ट हो वह धन (भिक्षा से) लाओ और संतान-परंपरा का छेदन न करो (यानी गृहस्थ बनकर संतानोत्पत्ति कर पितृऋण से मुक्त होओ) । सत्य के प्रति प्रमाद (भूल) न होवे, अर्थात् सत्य से मुख न मोड़ो । धर्म से विमुख नहीं होना चाहिए । अपनी कुशल बनी रहे ऐसे कार्यों की अवहेलना न की जाए । ऐश्वर्य प्रदान करने वाले मंगल कर्मों से विरत नहीं होना चाहिए । स्वाध्याय तथा प्रवचन कार्य की अवहेलना न होवे ।

देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् । मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव । यान्यनवद्यानि कर्माणि । तानि सेवितव्यानि । नो इतराणि । यान्यस्माकं सुचरितानि । तानि त्वयोपास्यानि ।।
(तैत्तिरीय उपनिषद्, शिक्षावल्ली, अनुवाक ११, मंत्र २)

अर्थ:- देवकार्य तथा पितृकार्य से प्रमाद नहीं किया जाना चाहिए । (कदाचित् इस कथन का आशय देवों की उपासना और माता-पिता आदि के प्रति श्रद्धा तथा कर्तव्य से है ।) माता को देव तुल्य मानने वाला बनो (मातृदेव = माता है देवता तुल्य जिसके लिए) । पिता को देव तुल्य मानने वाला बनो । आचार्य को देव तुल्य मानने वाला बनो । अतिथि को देव तुल्य मानने वाला बनो । अर्थात् इन सभी के प्रति देवता के समान श्रद्धा, सम्मान और सेवाभाव का आचरण करे । जो अनिन्द्य कर्म हैं उन्हीं का सेवन किया जाना चाहिए, अन्य का नहीं । हमारे जो-जो कर्म अच्छे आचरण के द्योतक हों केवल उन्हीं की उपासना की जानी चाहिए; उन्हीं को संपन्न किया जाना चाहिए । (अवद्य = जिसका कथन न किया जा सके, जो गर्हित हो, प्रशंसा योग्य न हो ।)संकेत है कि गुरुजनों का आचरण सदैव अनुकरणीय हो ऐसा नहीं है । अपने विवेक के द्वारा व्यक्ति क्या करणीय है और क्या नहीं इसका निर्णय करे और तदनुसार व्यवहार करे ।

एक शंका का समाधान मुझे कहीं नहीं मिला है । वैदिक साहित्य में सर्वत्र पुरुषों को केंद्र में रखते हुए ही बातें कही गयी हैं । ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए उन्हें आश्रम में रहने की बातें कही जाती हैं । यज्ञादि भी उन्हीं के द्वारा संपन्न होते रहे हैं । गार्हस्थ जीवन में भी उन्हीं के प्रवेश की बात की जाती रही है, जिसमें स्त्री एक सहायिका की भूमिका निभाती हो, इत्यादि । ऐसा क्यों रहा होगा ? स्त्रियों के बारे में इतनी विस्तृत बातें पुरातन साहित्य में पढ़ने को नहीं मिलती हैं । कदाचित् यह स्थिति विश्व के अन्य उन्नत समाजों में भी व्याप्त है । – योगेन्द्र जोशी

बुद्धवचनामृत, अश्वघोषविरचित बुद्धचरितम् से – ऐहिक संबंधों का अस्थायित्व

प्राचीन संस्कृत साहित्य में ‘बुद्धचरितम्’ नामक एक काव्य उपलब्ध है । मेरे पास इसकी एक प्रति है, श्री सूर्यनारायण चौधरी द्वारा संपादित-अनुवादित एवं मोतीलाल बनारसीदास द्वारा प्रकाशित । ग्रंथ-परिचय में बताया गया है कि काव्य की पूरी मूल प्रति उपलब्ध नहीं है । उसका अप्राप्य अधिकांश भाग तिब्बती एवं चीनी भाषाओं में प्राचीन काल में लिखित अनुवाद-ग्रंथों पर आधारित है । काव्य के रचनाकार कवि अश्वघोष बताये जाते हैं, जिनका कार्यकाल कदाचित् आज से दो हजार वर्ष पूर्व था । विद्वानों का मत है कि ब्राह्मण कुल में जन्मे अश्वघोष भगवान् बुद्ध के जीवन-चरित्र तथा बौद्ध धर्म के सिद्धांतों से इतने प्रभावित थे उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में अपना जीवन अर्पित कर दिया ।

उक्त ग्रंथ में एक प्रसंग है । राजकुमार सिद्धार्थ गौतम (बुद्धत्व प्राप्ति के पूर्व) राजमहल छोड़कर चुपचाप निकल पड़ते हैं । जब इसकी जानकारी राजा शुद्धोदन को मिलती है तो वे राजपुरोहित और राजमंत्री को उन्हें खोजने तथा वापस बुलाने का दायित्व सोंपते हैं । राजकुमार उन्हें मिल जाते हैं । पुरोहित तथा मंत्री राजा के पुत्रवियोगजनित दुःख का हवाला देते हुए राजकुमार को समझाते हैं । तब राजकुमार राजा के प्रति अपना संदेश भिजवाते हैं कि संयोग के पश्चात् वियोग अवश्यंभावी है । हर मनुष्य अपने बांधवों-संबंधियों को कभी न कभी छोड़कर परलोक चला जाता है । संयोग-वियोग का चक्र अपरिहार्य है । राजा को चाहिए कि इस तथ्य को सहज तौर पर स्वीकारें और मेरे लिए दुःख न करें । मैं जन्म-मृत्यु के दुःखजनक चक्र से मुक्त होने का मार्ग ही तो खोजने चला हूं ।

मैं इस प्रकरण से संबद्ध तीन प्रासंगिक श्लोकों को आगे उद्धृत कर रहा हूं, जिनमें राजकुमार के उद्गारों को कवि अपनी शैली में प्रस्तुत करता है (बुद्धचरितम्, सर्ग 9, श्लोक संख्या क्रमशः ३४, ३५, तथा ३६):

एवं च ते निश्चयमेतु बुद्धिर्दृष्ट्वा विचित्रं जगतः प्रचारम् ।
सन्तापहेतुर्न सुतो न बन्धुरज्ञाननैमित्तिक एष तापः ।।

(एवं च जगतः विचित्रं प्रचारम् दृष्ट्वा ते बुद्धिः निश्चयम् एतु, न सुतः न बन्धुः सन्ताप-हेतुः, अज्ञान-नैमित्तिकः एषः तापः ।)

अर्थः- इस संसार की विचित्र गति को देखकर आपकी बुद्धि यह निश्चित समझे कि मनुष्य के मानसिक कष्ट या संताप के लिए उसका पुत्र अथवा बंधु कारण नहीं है, बल्कि दुःख का असली निमित्त तो अज्ञान है ।

यथाध्वगानामिह सङ्गतानां काले वियोगो नियतः प्रजानाम् ।
प्राज्ञो जनः को नु भजेत शोकं बन्धुप्रतिज्ञातजनैर्विहीनः ।।

(यथा इह सङ्गतानां अध्वगानाम् प्रजानाम् वियोगः काले नियतः, बन्धु-प्रतिज्ञात-जनैः विहीनः कः प्राज्ञः जनः नु शोकं भजेत ।)

अर्थः- जिस प्रकार मार्ग में मिले और साथ-साथ चले पथिकों का समय आने पर बिछुड़ना निश्चित है, उसी प्रकार बंधु-बांधवों का भी वियोग होना ही है । जब यही सत्य है तो बंधुओं-स्वजातियों द्वारा छोड़े जाने पर कौन समझदार व्यक्ति शोक में डूबेगा ? (अर्थात् सत्य को स्वीकारते हुए स्वजनों के वियोग में शोक न करें ।)

इहैति हित्वा स्वजनं परत्र प्रलभ्य चेहापि पुनः प्रयाति ।
गत्वापि तत्राप्यपरत्र गच्छत्येवं जने त्यागिनि को९नुरोधः ।।

(परत्र स्वजनं हित्वा इह एति, प्रलभ्य च इह अपि पुनः प्रयाति, अपि तत्र गत्वा अपरत्र अपि गच्छति, एवं त्यागिनि जने कः अनुरोधः ।)

अर्थः- जीव पूर्व जन्म के स्वजन को छोड़ इस लोक में जन्म लेता है; यहां बांधवों को प्रलोभित करके यानी अपनत्व का लोभ देते हुए फिर प्रस्थान कर जाता है । उस नये लोक में जाकर फिर कहीं अन्यत्र चला जाता है । ऐसे छोड़ते चले जाने वाले के लिए क्या आसक्ति रखी जाये ।

प्राचीन भारतीय वैदिक दर्शन में अमूर्त आत्मा, भौतिक देह तथा जन्म-मरण की अवधारणा देखने को मिलती है । जन्म-मृत्यु का चक्र कब तक और किस रूप में चलता रहेगा यह जीव द्वारा संपन्न कर्मों पर निर्भर करता है । वैदिक चिंतकों के अनुसार जब आत्मा अपने असली स्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर लेती है और बारंबार देहग्रहण की उसकी आसक्ति समाप्त हो जाती है, तो उसका सच्चिदानंद परमात्मा में विलय हो जाता है (मोक्ष) । भगवान् बुद्ध के उक्त कथनों में भी जन्म-मृत्यु के चक्र में उनक विश्वास की झलक दृष्टिगत होती है । किंतु उनके द्वारा प्रतिपादित अध्यात्म दर्शन में इस चक्र से मुक्त होने के अर्थ वैदिक विचारधारा से भिन्न दिखाई देती है । वे कर्म-शरीर में विश्वास करते थे और कर्मजनित जन्म-मृत्यु की बात करते थे । उनके मत में जब संचित कर्मों का क्षय हो जाता है तो जीवधारी शून्य में विलीन हो जाता है (स्कन्ध निर्वाण) । उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है । वैदिक तथा बौद्ध चिंतन में पर्याप्त अंतर है । – योगेन्द्र

Saarnath - Bhttichitra

महाकाव्य महाभारत में सूर्यग्रहण का उल्लेख और ‘राहु’ की व्याख्या

आज प्रातः सूर्यग्रहण की घटना घटी थी । सूर्य तथा चंद्र ग्रहण तो घटित होते ही रहते हैं, प्रत्येक संख्या में दो से पांच तक हर वर्ष । परंतु इस बार का ग्रहण कुछ खास था । उत्तर एवं उत्तर-पूर्व भारत के कुछ क्षेत्रों में यह पूर्णग्रहण या खग्रास के रूप में दिखाई दिया होगा । पावस ऋतु का समय होने के कारण आसमान साफ रहा हो ऐसी संभावना कम ही थी, भले ही पानी बरसने के आसार कम ही रहे हों । अतः कुछ ही भाग्यशाली लोग इसे देख पाये होंगे । हलके बादलों के चलायमान चादर के पीछे दृश्यमान इस ग्रहण को सौभाग्य से मैं देखने में सफल रहा । पूर्ण सूर्यग्रहण की घटना दशकों में एक बार घटा करती है और वह भी हर बार पृथ्वी के अलग-अलग स्थानों से देखने योग्य । अतः जो नहीं देख पाये वे अब शायद ही कभी देख पाएं ।

ग्रहण की चर्चा होने पर मुझे ध्यान आया कि महाकाव्य महाभारत में एक स्थल पर सूर्यग्रहण का उल्लेख है । संबंधित प्रसंग में आदिपुरुष मनु द्वारा देवगुरु वृहस्पति को अध्यात्म तथा दर्शन के उपदेश की चर्चा की गई है । ग्रहण के दृष्टांत के द्वारा आत्मा और देह के आपसी संबंध की व्याख्या करने के प्रयास के तौर पर उस प्रसंग में अमुक उल्लेख है । संयोग से ऐसा करते समय ग्रहण कैसे घटित होता है और ‘राहु’ ग्रह क्या है इन प्रश्नों का उत्तर उस व्याख्या में प्रतिबिंबित होता है । ऐसा ही मुझे लगा । तत्संबंधित प्रासंगिक दो श्लोकों को मैं आगे उद्धृत कर रहा हूं (महाभारत, शान्तिपर्व, अध्याय २०३):

यथा चन्द्रार्कसंयुक्तं तमस्तदुपलभ्यते ।
तद्वच्छरीरसंयुक्तः शरीरीत्युपलभ्यते ।।२१।।

(यथा चन्द्र-अर्क-संयुक्तं तमः तत् उपलभ्यते, तत्-वत् शरीर-संयुक्तः शरीरी इति उपलभ्यते ।)

यथा चन्द्रार्कनिर्मुक्तः स राहुर्नोपलभ्यते ।
तद्वच्छरीरनिर्मुक्तः शरीरी नोपलभ्यते ।।२२।।

(यथा चन्द्र-अर्क-निर्मुक्तः सः राहुः न उपलभ्यते, तत्-वत् शरीर-निर्मुक्तः शरीरी न उपलभ्यते ।)

शरीर और आत्मा के संबंध की चर्चा करते हुए कहा जा रहा है कि जिस प्रकार चंद्रमा तथा सूर्य के संयोग होने पर ही चंद्रमा से संबद्ध ‘अंधकार’ के अस्तित्व की प्रतीति हो पाती है, उसी प्रकार भौतिक शरीर से संयुक्त होने पर ही ‘आत्मा है’ यह पता चलता है (प्रथम श्लोक) । और चंद्र-सूर्य के परस्पर विच्छेद हो जाने पर जिस तरह वह अंधकार रूपी राहु अदृश्य हो जाता है, उसी तरह शरीर छोड़ने पर आत्मा ‘अदृश्य’ हो जाती है । अर्थात् ‘वह है’ इसे कहने का आधार ही लुप्त हो जाता है (द्वितीय श्लोक) ।

उक्त बातें कही तो आध्यात्मिक दर्शन के संदर्भ में है, किंतु मुझे इन श्लोकों में ग्रहण की घटना को महाभारत-काल में कैसे देखा जाता होगा इसका संकेत दिखाई देता है । मेरे मतानुसार इनमें यह कहा जा रहा है कि जब चंद्रमा का सूर्य से संयोग होता है (सामान्यतः वह सूर्य से अलग रहता है, भले ही अमावास्या के दिन बहुत निकट हो) तब उसके साथ संबद्ध अंधकार अर्थात् उसके द्वारा प्रस्तुत अंधकारमय आच्छादन ही ग्रहण के रूप में हमें दिखता है । यही वस्तुतः ‘राहु’ है । जब चंद्रमा-जनित काला धब्बा सूर्य के ऊपर आ जाता है तो कहा जाता है कि राहु द्वारा सूर्य ग्रस लिया गया है । जब सूर्य चंद्रमा के संयोग से मुक्त हो जाता है तो चंद्रमा द्वारा उत्पन्न आच्छादन या काला धब्बा भी गायब हो जाता है । राहु के नाम से पुकारे जाने वाले इस धब्बे का अस्तित्व एक प्रकार से समाप्त हो जाता है । यह वह छाया है जो चंद्रमा के साथ बनी रहती है और जिसके प्रभाव क्षेत्र में आने पर पृथ्वीवासियों को सूर्य अंशतः/पूर्णतः ग्रस्त दिखाई देता है ।

गौर करें कि ज्योतिष् शास्त्र में राहु (और चंद्रमा को ‘ग्रसने’ वाले केतु) को छायाग्रह कहा जाता है । वास्तव में इनका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है । दरअसल चंद्रमा का पृथ्वी के चारों ओर की कक्षा यानी चक्रमण-पथ (दीर्घवृत्त या इलिप्स) पृथ्वी के सूर्य के परितः कक्षा (दीर्घवृत्ताकार) के समतल से करीब पांच अंश का झुकाव रखता है । यह चंद्र-पथ पृथ्वी की कक्षा के तल को दो स्थानों पर काटता है । अर्थात् उस पथ के तल के साथ दो परिच्छेद बिंदु (पॉइंट्स अव् इंटरसेक्शन) उपलब्ध होते हैं, पहला (क) सूर्य की ओर तथा दूसरा (ख) उसके ठीक विपरीत । अपने मासिक चक्रमण के दौरान चंद्रमा इन दो बिंदुओं से गुजरता है, क्रमशः अमावास्या के दिन ‘क’ से और पौर्णमासी को ‘ख’ से । संयोग से जब ‘क’ सूर्य और पृथ्वी के सीध में होता है तो सूर्यग्रहण और जब ‘ख’ उसी सीध में होता है चंद्रग्रहण की स्थिति प्राप्त होती है । वस्तुतः यही दो बिंदु राहु तथा केतु हैं । ज्योतिष् के अनुसार बारह राशियों में केतु का स्थान राहु के स्थान से सदैव सातवां होता है । (जैसे राहु तुला में हो तो केतु मेष में होगा ।)

Eclipsesकहना मुश्किल है कि महाभारत-कालीन लोगों को सूर्य, चंद्र और उनके ग्रहणों के विषय में वही वस्तुनिष्ठ ज्ञान था या नहीं, जो आज के वैज्ञानिक युग में अधिकांश जनों को है । – योगेन्द्र