‘दानं भोगं नाशः …’ – पञ्चतन्त्र के नीतिवचन: धन की गति तीन प्रकार की
10 अक्टू 2011 2s टिप्पणियाँ
in नीति, लोकव्यवहार, संस्कृत-साहित्य, पञ्चतन्त्र, Morals, Sanskrit Literature, Panchtantra Tags: दानं भोगं नाशः, धनसंपदा की नियति, नीति वचन, पञ्चतन्त्र, विष्णुशर्मा, fate of wealth, moral lesson, Panchatantra, Vishnusharma
समाज में धन की महत्ता सर्वत्र प्रायः सबके द्वारा स्वीकारी जाती है, और धनसंचय के माध्यम से स्वयं को सुरक्षित रखने का प्रयत्न कमोबेश सभी लोग करते हुए देखे जाते हैं । कदाचित् विरले लोग ही इस प्रश्न पर तार्किक चिंतन के साथ विचार करते होंगे कि धन की कितनी आवश्यकता किसी को सामान्यतः हो सकती है । यदि किसी मनुष्य को असीमित मात्रा में धन प्राप्त होने जा रहा हो तो क्या उसने उस पूरे धन को स्वीकार कर लेना चाहिए, या उसने इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि किस प्रयोजन से एवं किस सीमा तक उस धन के प्रति लालायित होना चाहिए । यह प्रश्न मेरे मन में वर्षों से घर किया हुए है । नीतिग्रंथों में प्राचीन भारतीय चिंतकों के एतद्संबंधित विचार पढ़ने को मिल जाते हैं । ऐसा ही एक शिक्षाप्रद एवं चर्चित ग्रंथ पंचतंत्र है । मुझे उसमें धन के बारे में गंभीर सोच देखने को मिलती है । मैं उस ग्रंथ से चुनकर दो श्लोकों को यहां पर उद्धृत कर रहा हूं:
(स्रोत: विष्णुशर्मारचित पञ्चतन्त्र, भाग 1 – मित्रसंप्राप्ति, श्लोक १५३ एवं १५४, क्रमशः)
दातव्यं भोक्तव्यं धनविषये सञ्चयो न कर्तव्यः ।
पश्येह मधुकरिणां सञ्चितमर्थं हरन्त्यन्ये ॥
(दातव्यम्, भोक्तव्यम्, धन-विषये सञ्चयः न कर्तव्यः, पश्य इह मधुकरिणाम् सञ्चितम् अर्थम् हरन्ति अन्ये ।)
अर्थः (धन का दो प्रकार से उपयोग होना चाहिए ।) धन दूसरों को दिया जाना चाहिए, अथवा उसका स्वयं भोग करना चाहिए । किंतु उसका संचय नहीं करना चाहिए । ध्यान से देखो कि मधुमक्खियों के द्वारा संचित धन अर्थात् शहद दूसरे हर ले जाते हैं ।
पंचतंत्र के रचनाकार का मत है कि मनुष्य को धन का उपभोग कर लेना चाहिए अथवा उसे जरूरतमंदों को दान में दे देना चाहिए । अवश्य ही उक्त नीतिकार इस बात को समझता होगा कि धन कमाने के तुरंत बाद ही उसका उपभोग संभव नहीं है । उसका संचय तो आवश्यक है ही, ताकि कालांतर में उसे उपयोग में लिया जा सके । उसका कहने का तात्पर्य यही होगा कि उपभोग या दान की योजना व्यक्ति के विचार में स्पष्ट होनी चाहिए । धनोपार्जन एवं तत्पश्चात् उसका संचय बिना विचार के निरर्थक है । बिना योजना के संचित वह धन न तो व्यक्ति के भोग में खर्च होगा और न ही दान में । नीतिकार ने मधुमक्खियों का उदाहरण देकर यह कहना चाहा है कि संचित धन देर-सबेर दूसरों के पास चला जाना है । मधुमक्खियों का दृष्टांत कुछ हद तक अतिशयोक्तिपूर्ण है । वे बेचारी तो शहद का संचय भविष्य में अंडों से निकले लारवाओं के लिए जमा करती हैं, जिनके विकसित होने में वह शहद भोज्य पदार्थ का कार्य करता है । यह प्रकृति द्वारा निर्धारित सुनियोजित प्रक्रिया है । किंतु उस शहद को मनुष्य अथवा अन्य जीवधारी लूट ले जाते हैं । मनुष्य के संचित धन को भले ही कोई खुल्लमखुल्ला न लूटे, फिर भी वह दूसरों के हाथ जाना ही जाना है, यदि उसे भोग या दान में न खर्चा जाए । कैसे, यह आगे स्पष्ट किया जा रहा है ।
दानं भोगं नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य ।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतिया गतिर्भवति ॥
(दानम्, भोगम्, नाशः, तिस्रः गतयः भवन्ति वित्तस्य, यः न ददाति, न भुङ्क्ते, तस्य तृतिया गतिः भवति ।)
अर्थः धन की संभव नियति तीन प्रकार की होती है । पहली है उसका दान, दूसरी उसका भोग, और तीसरी है उसका नाश । जो व्यक्ति उसे न किसी को देता है और न ही उसका स्वयं भोग करता है, उसके धन की तीसरी गति होती है, अर्थात् उसका नाश होना है ।
इस स्थल पर धन के ‘नाश’ शब्द की व्याख्या आवश्यक है । मेरा मानना है कि धन किसी प्रयोजन के लिए ही अर्जित किया जाना चाहिए । अगर कोई प्रयोजन ही न हो तो वह धन बेकार है । जीवन भर ऐसे धन का उपार्जन करके, उसका संचय करके और अंत तक उसकी रक्षा करते हुए व्यक्ति जब दिवंगत हो जाए तब वह धन नष्ट कहा जाना चाहिए । वह किसके काम आ रहा है, किसी के सार्थक काम में आ रहा है कि नहीं, ये बातें यह उस दिवंगत व्यक्ति के लिए कोई माने नहीं रखती हैं ।
अवश्य ही कुछ जन यह तर्क पेश करेंगे कि वह धन दिवंगत व्यक्ति के उत्तराधिकारियों के काम आएगा । तब मोटे तौर पर मैं दो स्थितियों की कल्पना करता हूं । पहली तो यह कि वे उत्तराधिकारी स्वयं धनोपार्जन में समर्थ और पर्याप्त से अधिक स्व्यमेव अर्जित संपदा का भरपूर भोग एवं दान नहीं कर पा रहे हों । तब भला वे पितरों की छोड़ी संपदा का ही क्या सदुपयोग कर पायेंगे ? उनके लिए भी वह संपदा अर्थहीन सिद्ध हो जाएगी । दूसरी स्थिति यह हो सकती है कि वे उत्तराधिकारी स्वयं अयोग्य सिद्ध हो जाए और पुरखों की छोड़ी संपदा पर निर्भर करते हुए उसी के सहारे जीवन निर्वाह करें । उनमें कदाचित् यह सोच पैदा हो कि जब पुरखों ने हमारे लिए धन-संपदा छोड़ी ही है तो हम क्यों चिंता करें । सच पूछें तो इस प्रकार की कोई भी स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण एवं कष्टप्रद होगी । कोई नहीं चाहेगा कि ऐसी नौबत पैदा हो । तब अकर्मण्य वारिसों के हाथ में पहुंची संपदा नष्ट ही हो रही है यही कहा जाएगा । एक उक्ति है: “पूत सपूत का धन संचय, पूत कपूत का धन संचय ।” जिसका भावार्थ यही है कि सुपुत्र (तात्पर्य योग्य संतान से है) के लिए धन संचय अनावश्यक है, और कुपुत्र (अयोग्य संतान) के लिए भी ऐसा धन छोड़ जाना अंततः व्यर्थ सिद्ध होना है ।
कुल मिलाकर पंचतंत्र के रचयिता के मतानुसार धन का भोग और दान करने के बजाय महज उसका संचय करते रहना उसके नाश के तुल्य ही है । – योगेन्द्र जोशी
भर्तृहरि-नीतिशतकम् के वचन – असंभव है मूर्ख जन को संतुष्ट कर पाना
11 सित 2011 5s टिप्पणियाँ
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भर्तृहरि राजा द्वारा विरचित शतकत्रयम् संस्कृत साहित्य की छोटी किंतु गंभीर अर्थ रखने वाली चर्चित रचना है । कहा जाता है कि उन्हें प्रौढ़ावस्था पार करते-करते वैराग्य हो गया था और तदनुसार उन्होंने राजकार्य से संन्यास ग्रहण कर लिया था । उनके बारे में संक्षेप में मैंने किसी अन्य ब्लॉग-प्रविष्टि में दो-चार शब्द लिखे हैं । अपनी उक्त रचना के प्रथम खंड, ‘नीतिशतकम्’, के आरंभ में उन्होंने यह कहा है कि मूर्ख व्यक्ति को समझाना असंभव-सा कार्य है । इस संदर्भ में उनके तीन छंद मुझे रोचक लगे, जिनका उल्लेख मैं आगे कर रहा हूं ।
अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः ।
ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि तं नरं न रञ्जयति ॥
(भर्तृहरि विरचित नीतिशतकम्, श्लोक 3)
अज्ञः सुखम् आराध्यः, सुखतरम् आराध्यते विशेषज्ञः, ज्ञान-लव-दुः-विदग्धं ब्रह्मा अपि तं नरं न रञ्जयति ।
अर्थः गैरजानकार मनुष्य को समझाना सामान्यतः सरल होता है । उससे भी आसान होता है जानकार या विशेषज्ञ अर्थात् चर्चा में निहित विषय को जानने वाले को समझाना । किंतु जो व्यक्ति अल्पज्ञ होता है, जिसकी जानकारी आधी-अधूरी होती है, उसे समझाना तो स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के भी वश से बाहर होता है ।
“अधजल गगरी छलकत जात” की उक्ति अल्पज्ञ जनों के लिए ही प्रयोग में ली जाती है । ऐसे लोगों को अक्सर अपने ज्ञान के बारे में भ्रम रहता है । गैरजानकार या अज्ञ व्यक्ति मुझे नहीं मालूम कहने में नहीं हिचकता है और जानकार की बात स्वीकारने में नहीं हिचकता है । विशेषज्ञ भी आपने ज्ञान की सीमाओं को समझता है, अतः उनके साथ तार्किक विमर्ष संभव हो पाता है, परंतु अल्पज्ञ अपनी जिद पर अड़ा रहता है ।
अगले छंद में कवि भर्तृहरि मूर्ख को समझाने के प्रयास की तुलना कठिनाई से साध्य कार्यों से करते हैं, और इस प्रयास को सर्वाधिक दुरूह कार्य बताते हैं ।
प्रसह्य मणिमुद्धरेन्मकरदंष्ट्रान्तरात्
समुद्रमपि सन्तरेत् प्रचलदुर्मिमालाकुलाम् ।
भुजङ्गमपि कोपितं शिरसि पुष्पवद्धारयेत्
न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ॥
(पूर्वोक्त, श्लोक 4)
प्रसह्य मणिम् उद्धरेत् मकर-दंष्ट्र-अन्तरात्, समुद्रम् अपि सन्तरेत् प्रचलत्-उर्मि-माला-आकुलाम्, भुजङ्गम् अपि कोपितं शिरसि पुष्पवत् धारयेत्, न तु प्रति-निविष्ट-मूर्ख-जन-चित्तम् आराधयेत् ।
अर्थः मनुष्य कठिन प्रयास करते हुए मगरमच्छ की दंतपंक्ति के बीच से मणि बाहर ला सकता है, वह उठती-गिरती लहरों से व्याप्त समुद्र को तैरकर पार कर सकता है, क्रुद्ध सर्प को फूलों की भांति सिर पर धारण कर सकता है, किंतु दुराग्रह से ग्रस्त मूर्ख व्यक्ति को अपनी बातों से संतुष्ट नहीं कर सकता है ।
जिन कार्यों की बात की गयी है उन्हें सामान्यतः कोई नहीं कर सकता है; कोई भी उन्हें करने का दुस्साहस नहीं करना चाहेगा । फिर भी उन्हें करने में सफलता की आशा की जा सकती है, परंतु तुलनया देखें तो मूर्ख का पक्ष जीतना उनसे भी कठिनतर होता है ।
इसके आगे राजा भर्तृहरि यह कहने में भी नहीं चूकते हैं कि असंभव माना जाने वाला कार्य कदाचित् संभव हो जाए, लेकिन मूर्ख को संतुष्ट कर पाना फिर भी संभव नहीं है ।
लभेत् सिकतासु तैलमपि यत्नतः पीडयन्
पिबेच्च मृगतृष्णिकासु सलिलं पिपासार्दितः ।
कदाचिदपि पर्यटञ्छशविषाणमासादयेत्
न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ॥
(पूर्वोक्त, श्लोक 5)
लभेत् सिकतासु तैलम् अपि यत्नतः पीडयन्, पिबेत् च मृग-तृष्णिकासु सलिलं पिपासा-आर्दितः, कदाचित् अपि पर्यटन् शश-विषाणम् आसादयेत्, न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ॥
अर्थः कठिन प्रयास करने से संभव है कि कोई बालू से भी तेल निकाल सके, पूर्णतः जलहीन मरुस्थलीय क्षेत्र में दृश्यमान मृगमरीचिका में भी उसके लिए जल पाकर प्यास बुझाना मुमकिन हो जावे, और घूमते-खोजने अंततः उसे खरगोश के सिर पर सींग भी मिल जावे, परंतु दुराग्रह-ग्रस्त मूर्ख को संतुष्ट कर पाना उसके लिए संभव नहीं ।
उक्त छंद में अतिरंजना का अंलकार प्रयुक्त है । यह सभी जानते हैं कि बालू से तेल लिकालना, जल का भ्रम पैदा करने वाली मृगतृष्णा में वास्तविक जल पाकर प्यास बुझाना, और खरगोश के सिर पर सींग खोज लेना जैसी बातें वस्तुतः असंभव हैं । कवि का मत है कि मूर्ख को सहमत कर पाना इन सभी असंभव कार्यों से भी अधिक कठिन है ।
एक प्रश्न है जिसका उत्तर देना मुझे कठिन लगता है । मूर्ख किसे कहा जाए इसका निर्धारण कौन करे, किसे निर्णय लेने का अधिकार मिले ? स्वयं को मूर्ख कौन कहेगा ? मेरे मत में वह व्यक्ति जो अपने विचारों एवं कर्मों को संभव विकल्पों के सापेक्ष तौलने को तैयार नहीं होता, खुले दिमाग से अन्य संभावनाओं पर ध्यान नहीं देता, आवश्यकतानुसार अपने विचार नहीं बदलता, अपने आचरण का मूल्यांकन करते हुए उसे नहीं सुधारता और सर्वज्ञ होने या दूसरों से अधिक जानकार होने के भ्रम में जीता है वही मूर्ख है । आप इस पर विचार करें । – योगेन्द्र जोशी
‘दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति …’ – महाभारत, शांतिपर्व, में शासकीय दण्ड की नीति
23 जुला 2011 1 टिप्पणी
in धर्म, महाभारत, राजनीति, शासन, Government, Politics, religion Tags: दंड, दण्डात्मक कार्यवाही, नीतिवचन, न्यायिक व्यवस्था, महाभारत, शासक के कर्तव्य, शासन, सजा, Duties of Ruler, Government, judicial system, Mahabharata, moral teaching, punishment, punitive action
महाभारत महाकाव्य के आरंभिक पर्व – आदिपर्व – में अपराधी को देय दण्ड की महत्ता का उल्लेख है । उसका जिक्र मैंने पहले की एक पोस्ट में किया था । मुझे महाभारत युद्ध के बाद की स्थिति से संबंधित पर्व – शान्तिपर्व – में भी दण्ड की बातें पढ़ने को मिली हैं । मैं कुछ चुने हुए श्लोकों का उल्लेख आगे कर रहा हूं । (संदर्भः महाभारत, शान्तिपर्व, अध्याय 15)
दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति ।
दण्डः सुप्तेषु जागर्र्ति दण्डं धर्म विदुर्बुधाः ॥2॥
(दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वाः दण्ड एव अभिरक्षति दण्डः सुप्तेषु जागर्र्ति दण्डं धर्मः विदुः बुधाः ।)
भावार्थः (अपराधियों को नियंत्रण में रखने के लिए दण्ड की व्यवस्था हर प्रभावी एवं सफल शासकीय तंत्र का आवश्यक अंग होती है ।) यही दण्ड है जो प्रजा को शासित-अनुशासित रखता है और यही उन सबकी रक्षा करता है । यही दण्ड रात्रिकाल में जगा रहता है और इसी को विद्वज्जन धर्म के तौर पर देखते हैं ।
शासन का कर्तव्य है कि वह हर क्षण अपराधों को रोकने के लिए सजग रहे। रात हो या दिन, उसके राजकर्मी घटित हो रहे अपराधों पर नजर रखें और अपराधी को दंडित करें । यदि ऐसा न हो तो लोग सुरक्षित नहीं रहेंगे । दण्ड ही शासकीय तंत्र का प्रमुख धर्म है ।
दण्डश्चेन्न भवेल्लोके विनश्येयुरिमाः प्रजाः ।
जले मत्स्यानिवाभक्षन् दुर्बलान् बलवत्तराः ॥30॥
(दण्डः चेत् न भवेत् लोके विनश्येयुः इमाः प्रजाः जले मत्स्यान् इव अभक्षन् दुर्बलान् बलवत्-तराः ।)
भावार्थः यदि दण्ड न रहे, अर्थात् दण्ड की प्रभावी व्यवस्था न हो, तो प्रजा का विनाश निश्चित है । जिस प्रकार पानी में पलने वाली छोटी मछली का भक्षण बड़ी मछली कर डालती है उसी प्रकार अपेक्षया अधिक बलवान् व्यक्ति दुर्बलों का ‘भक्षण’ कर डालेंगे ।
प्रभावी दण्ड के अभाव का अर्थ है अराजकता । अधिकांश जन दण्ड के भय से अपराधों से बचे रहते हैं । अगर दण्ड न रहे तो लूटपाट-छीनाझपटी आम बात हो जाएंगी । ताकतवर लोग अपनी दबंगई के बल पर कमजोरों को नचाना आरंभ कर देंगे, उन्हें भांति-भांति प्रकार से प्रताड़ित करने लगेंगे । मनुस्मृति में भी यह बात कही गयी है, जिसकी चर्चा मैंने अन्यत्र कही है । वहां दिये गये श्लोक के शब्द थोड़े भिन्न हैं:
यदि न प्रणयेद्राजा दण्डं दण्ड्येष्वतन्द्रितः । शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन्दुर्बलान्बलवत्तराः ॥
सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्जनः ।
दण्डस्य हि भयात् भीतो भोगायैव प्रवर्तते ॥34॥
(सर्वः दण्डजितः लोकः दुर्लभः हि शुचिः जनः दण्डस्य हि भयात् भीतः भोगाय एव प्रवर्तते ।)
भावार्थः यह संसार दण्ड से ही जीता जा सकता है, अर्थात् यहां पर लोग दण्ड के प्रयोग से ही नियंत्रित रहते हैं । अन्यथा स्वभाव से सच्चरित्र लोग यहां विरले ही होते हैं । यह दण्ड का ही भय है कि लोग भोगादि की मर्यायाओं का उल्लंघन नहीं करते हैं ।
मनुस्मृति में यह श्लोक दो-चार शब्दों के अंतर के साथ यों दिया गया हैः
सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्नरः । दण्डस्य हि भयात्सर्वं जगद्भोगाय कल्पते ॥
दण्डे स्थिताः प्रजाः सर्वा भयं दण्डे विदुर्बुधाः ।
दण्डे स्वर्गो मनुष्याणां लोको९यं सुप्रतिष्ठितः ॥43॥
(दण्डे स्थिताः प्रजाः सर्वाः भयं दण्डे विदुः बुधाः दण्डे स्वर्गः मनुष्याणां लोकः अयं सुप्रतिष्ठितः ।)
भावार्थः संपूर्ण प्रजा दण्ड में स्थित रहती है । अर्थात् दण्ड की व्यवस्था के अंतर्गत लोग अनुशासित रहते हैं और अपने कर्तव्यों की अवहेलना नहीं करते हैं । मनुष्य के परलोक एवं इहलोक, दोनों ही, दण्ड पर टिके हैं ।
दण्ड का भय उसे पापकर्मों से बचाता है, अतः उसके कृत्य उसके अपने लिए एवं समाज के लिए अहितकर नहीं होते हैं । उस स्थिति में परलोक भी – यदि इसके अस्तित्व में आस्था रखी जाए तो – दुःखमुक्त होगा ऐसी अपेक्षा की जाती है ।
न तत्र कूटं पापं वा वञ्चना वापि दृष्यते ।
यत्र दण्डः सुविहितश्चरत्यरिविनाशनः ॥44॥
(न तत्र कूटं पापं वा वञ्चना वा अपि दृष्यते यत्र दण्डः सुविहितः चरति अरि-विनाशनः ।)
भावार्थः जहां शत्रुनाशक दण्ड का संचालन सुचारु तौर पर चल रहा हो वहां छल-कपट, पाप या ठगी जैसी बातें देखने को नहीं मिलती हैं ।
शत्रु से मतलब है वह जो अपने भ्रष्ट आचरण से समाज का अहित करने पर तुला हो । दण्ड उनको नियंत्रण में रखता है, अतः उसे शत्रुनाशक कहा गया है । उसी के समुचित प्रयोग किए जाने पर समाज में लोगों का व्यवहार असामाजिक नहीं हो पाता है । मैंने मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, एवं महाभारत आदि जैसे प्राचीन ग्रंथों में दण्ड की बात पढ़ी है । न्याय की बात उनमें कम ही की गयी है । उनमें अपराधियों को दण्डित करने की बातों पर बल दिया गया है । मुझे लगता है कि तत्कालीन नीतिकार भली भांति समझते थे कि अपराधी को दण्डित तो कर सकते हैं, किंतु भुक्तभोगी को न्याय दे सकें यह शायद नहीं हो सकता है । जो हो चुका उसको उलटा ही नहीं जा सकता है । जो मर चुका उसे वापस नहीं ला सकते । दूसरे के कुकृत्य का दंश झेलने वाले की पीड़ा समाप्त नहीं हो सकती । जिसका मूल्यवान् समय छीना जा चुका हो उसे वापस नहीं पाया जा सकता है । इसलिए न्याय की अवधारणा भ्रामक है । केवल दण्ड की ही बात सार्थक है और उसके कार्यान्वयन में न्याय भी निहित हो यह मानना मूर्खता है ।
यह अपने देश का दुर्भाग्य है कि यहां दण्ड व्यवस्था निष्प्रभावी-सी हो चुकी है, खासकर रसूखदार लोगों के मामले में । - योगेन्द्र जोशी
‘अराजके जनपदे दोषा जायन्ते …’ – महाभारत में शासकीय दण्ड की आवश्यकता का उल्लेख
06 जून 2011 3s टिप्पणियाँ
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किसी भी शासकीय व्यवस्था में दण्ड की व्यवस्था आवश्यक है । मनुस्मृति में तत्संबंधित कुछएक श्लोकों का उल्लेख मैंने इसी ब्लाग के 14 मई की पोस्ट में किया था ।
उसी आशय के नीतिवचन मुझे महाभारत के आदिपर्व के ‘आस्तीक’ प्रकरण में पढ़ने को मिले हैं । उक्त प्रकरण अर्जुन के प्रपौत्र, अभिमन्यु के पौत्र, एवं परीक्षित् के पुत्र राजा जनमेजय के सर्पयज्ञ को ऋषि आस्तीक द्वारा निष्प्रभावी किये जाने से संबद्ध है । मैं संबंधित कथा का उल्लेख नहीं कर रहा हूं । केवल इतना बता दूं कि एक बार जंगल में वन्य जन्तुओं का शिकार करते हुए थके-हारे राजा परीक्षित् ने मौनव्रत के साथ तप में तल्लीन ऋषि शमीक के कंधों पर उनसे प्रत्युत्तर न पा सकने से क्रुद्ध होकर मृत सर्प डाल दिया था । घटना से क्षुब्ध ऋषिपुत्र शृंगी ने राजा परीक्षित् को शाप दे डाला था कि तक्षक नाग के डसने से उसकी मृत्यु होवे । बाद में ऋषि शमीक ने पुत्र शृंगी को समझाते हुए परीक्षित् की बतौर राजा के प्रशंसा की और शासन के लिए राजा के होने और उसके दण्ड के अधिकार से सज्जित रहने की महत्ता की बात की । उसी संदर्भ में कहे गए वचनों में से मैंने अधोलिखित तीन श्लोक चुने हैं (महाभारत, आदिपर्व, अध्याय 41):
अराजके जनपदे दोषा जायन्ते वै सदा ।
उद्वृत्तं सततं लोकं राजा दण्डेन शास्ति वै ॥२७॥
(अराजके जनपदे सदा वै दोषाः जायन्ते, राजा सततम् उद्वृत्तम् लोकम् दण्डेन वै शास्ति ।)
जिस प्रदेश में समुचित राजकीय व्यवस्था का अभाव हो वहां प्रजा में दोष या अपराध की प्रवृत्ति घर कर जाती है । उच्छृंखल या उद्धत जनसमूह को राजा ही दण्ड के प्रयोग द्वारा निरंतर अनुशासित रखता है ।
आज के युग में राजा की जगह चुने गये शासकों ने ले ली है । किंतु अपराध रोकने और अपराधियों को दण्डित करने का उनका कर्तव्य यथावत् है । दुर्भाग्य से आज हमारे देश में अपराधी को सजा देने का कार्य त्वरित एवं निर्णायक तरीके से नहीं हो रहा है ।
दण्डात् प्रतिभयं भूयः शान्तिरुत्पद्यते तदा ।
नोद्विग्नश्चरते धर्मं नोद्विग्नश्चरते क्रियाम् ॥२८॥
(दण्डात् भूयः प्रतिभयम्, तदा शान्तिः उत्पद्यते, उद्विग्नः धर्मम् न चरते, उद्विग्नः क्रियाम् न चरते ।)
दण्ड यानी सजा की व्यवस्था अधिकांशतः भय पैदा करता है और तब शान्ति स्थापित होती है । उद्विग्न या बेचैन व्यक्ति धर्माचरण नहीं करता है, और न ही ऐसा व्यक्ति अपने कर्तव्य का निर्वाह कर पाता है ।
जब दण्डित होने का भय समाज में रहता है तब लोगों में अपराध करने का साहस सामान्यतः नहीं होता है । समाज में सुरक्षा और निश्चिंतता की भावना व्याप्त रहती है । लोग उचित-अनुचित के विवेक के साथ अपने कर्तव्य का निर्वाह कर पाते हैं ।
राज्ञा प्रतिष्ठितो धर्मो धर्मात् स्वर्गः प्रतिष्ठितः ।
राज्ञो यज्ञक्रियाः सर्वा यज्ञात् देवाः प्रतिष्ठिताः ॥२९॥
(राज्ञा धर्मः प्रतिष्ठितः, धर्मात् स्वर्गः प्रतिष्ठितः, राज्ञः सर्वाः यज्ञक्रियाः, यज्ञात् देवाः प्रतिष्ठिताः ।)
राजा के द्वारा धर्म प्रतिष्ठित होता हैं और धर्म के माध्यम से स्वर्ग की प्राप्ति होती है । राजा के द्वारा ही सभी यज्ञकर्म संपन्न होते हैं और यज्ञों से ही देवतागण प्रतिष्ठित होते हैं ।
प्रथम दो श्लोकों की बातें इसी भौतिक संसार के संदर्भ में महत्त्व रखती हैं । तीसरे श्लोक में दण्ड के समुचित प्रयोग की महत्ता परलोक एवं दैवी शक्तियों के संदर्भ में कही गयी है । भारतीय दर्शन के अनुसार स्वर्ग एवं नरक जैसे परलोकों का अस्तित्व है और मनुष्य के ऐहिक कर्म ही उसके परलोक का निर्धारण करते हैं । अमूर्त दैवी शक्तियों के अस्तित्व का भी भारतीय दर्शन में स्थान है । मनुष्य के कर्म उनके प्रसाद या रोष का आधार होते हैं । चूंकि राजा लोगों को दण्ड के माध्यम से सत्कर्म में लगाए रहता है, अतः स्वर्गलोक के लिए वही परोक्षतः सहायक बनता है । सामान्यतः यज्ञ का अर्थ देवताओं को प्रसन्न करने के लिए प्रज्वलित अग्नि में डाली जाने वाली घृतादि की आहुति के कर्मकाण्ड से लिया जाता है । किंतु यज्ञ का अर्थ अधिक व्यापक भी माना जाता है । विविध प्रयोजनों के लिए किए जाने वाले कर्मों को भी यज्ञ में ही शामिल किया जाता है ।
उक्त बातों का तात्पर्य यह है कि समाज पर शासन करने का दायित्व जिन पर हो उनका कर्तव्य है कि वे अनुचित कार्यों में लिप्त लोगों को दण्डित करें और ऐसा करके आम जन को सुरक्षा का भरोसा दें । – योगेन्द्र जोशी
‘सर्वो दण्डजितो लोको …’ – मनुस्मृति में वर्णित शासकीय दण्ड की महत्ता
14 मई 2011 1 टिप्पणी
in धर्म, नीति, प्राचीन भारत, मनुस्मृति, राजनीति, शासन, Government, Manusmriti, Morals, religion Tags: त्रिवर्ग, दण्डात्मक कार्यवाही, न्यायिक व्यवस्था, मनुस्मृति, शासन, सजा का कार्यान्वयन, Government, implementment of punichment, judicial system, Manusmriti, punitive action, Trivarga
मनुस्मृति हिंदू समाज का एक प्राचीन ग्रंथ है, जिसमें मनुष्य के कर्तव्यों का विवरण प्रस्तुत किया गया है । बहुत-से लोगों की दृष्टि में यह एक विवादास्पद ग्रंथ है, क्योंकि यह वर्ण-व्यवस्था का पक्षधर है और स्त्री को पुरुष के एकदम बराबर का दर्जा नहीं देता है, यद्यपि स्त्री को सम्मान का हकदार बताता है । समाज के प्रति मनुष्य के कर्तव्यों, शासकीय प्रबंधन और न्यायिक व्यवस्था के बाबत इस ग्रंथ में जो बातें लिखी गयी हैं वे तर्कसंगत एवं शाश्वत रूप से प्रासंगिक हैं । उक्त स्मृति की कुछ बातें भले ही लोगों के गले न उतरें, किंतु अधिकांश बातों का विरोध नहीं किया जा सकता है । उन्हें न स्वीकारना मेरे मत में दुराग्रह माना जाना चाहिए । अस्तु, अपराध को नियंत्रण में रखने के समुचित दण्ड का प्रयोग अत्यावश्यक है इस बात पर इस ग्रंथ में जोर दिया गया है । न्याय संबंधी बहुत सी बातें ग्रंथ के अध्याय 7 में पढ़ने को मिलती हैं । दण्ड की महत्ता को प्रतिपादित करने वाले चुने हुए 5 श्लोकों का मैं इस स्थल पर उल्लेख कर रहा हूं:
(सभी श्लोक मनुस्मृति, अध्याय ७ से उद्धृत)
यदि न प्रणयेद्राजा दण्डं दण्ड्येष्वतन्द्रितः ।
शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन्दुर्बलान्बलवत्तराः ॥२०॥
(यदि न प्रणयेत् राजा दण्डम् दण्ड्येषु अतन्द्रितः शूले मत्स्यान् इव अपक्ष्यन् दुर्बलान् बलवत्तराः ।)
भावार्थः यदि राजा दण्डित किए जाने योग्य दुर्जनों के ऊपर दण्ड का प्रयोग नहीं करता है, तो बलशाली व्यक्ति दुर्बल लोगों को वैसे ही पकाऐंगे जैसे शूल अथवा सींक की मदद से मछली पकाई जाती है ।
कहने का तात्पर्य है कि समुचित सजा का कार्यान्वयन न होने पर बलहीन लोगों पर बलशाली जन अत्याचार करेंगे । ध्यान रहे कि अत्याचार करने वाले शक्तिशाली होते हैं; वे धनबल, बाहुबल, शासकीय पहुंच आदि के सहारे अपनी मर्जी से चलने वाले होते हैं, और निर्बलों को कच्चा चबा जाने की नीयत रखते हैं । आज के सामाजिक माहौल में ऐसा सब हो रहा है यह हम सभी देख रहे हैं । दण्डित होने का भय दुर्जनों को रोकता है । नीति कहती है कि राजा का कर्तव्य है कि अपराधी को दण्ड देने में उसे रियायत तथा विलंब नहीं करना चाहिए । दुर्भाग्य से अपने देश में दण्ड देने की प्रक्रिया कमोबेश निष्प्रभावी है, कम के कम रसूखदार लोग तो दण्डित हो ही नहीं रहे है, और उनका मनोबल चरम पर है ।
आज के लोकतांत्रिक युग में पारंपरिक अर्थ में राजा नहीं रहे । उनका स्थान शासकवर्ग न ले लिया है । एक से अधिक व्यक्तियों का समूह राजा का स्थान ले चुका है । सिद्धांततः राजा के अधिकार उन्हें मिल चुके हैं, और राजा के कर्तव्यों का निर्वाह भी उन्हीं के जिम्मे है । अधिकारों के मामले में तो वे काफी आगे हैं, किंतु दायित्वों के क्षेत्र में उनका कार्य चिंताजनक है । उन्होंने दण्ड की प्रक्रिया को पेचीदा, समयासाध्य, अपराधी के प्रति नरमी वाला बना डाला है, इसलिए दिन प्रतिदिन अपराध बढ़ रहे हैं ।
सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्नरः ।
दण्डस्य हि भयात्सर्वं जगद्भोगाय कल्पते ॥२२॥
(सर्वः दण्डजितः लोकः दुर्लभः हि शुचिः नरः दण्डस्य हि भयात् सर्वम् जगद् भोगाय कल्पते ।)
भावार्थः यह संसार दण्ड के द्वारा ही जीते जाने योग्य है, अर्थात् दण्ड के द्वारा ही इसे नियंत्रण में रखा जा सकता है । ऐसा व्यक्ति दुर्लभ है जो स्वभाव से ही साफ-सुथरा एवं सच्चरित्र हो, न कि दण्ड के भय से । दण्ड के भय से ही वह व्यवस्था बन पाती है जिसमें लोग अपनी संपदा का भोग कर पाते हैं ।
मतलब यह है कि अधिकतर लोग दण्डित होने के भय से ही अपराध या अनुचित कार्यों से विरत रहते हैं । अगर दण्डित होने का भय समाज में न हो तो चारों ओर दुर्व्यवस्था फैल जाए, लूटपाट मचने लगेगी, और अपनी ही संपदा का भोग लोग नहीं कर पायेंगे; दूसरे उस पर कब्जा कर लेंगे ।
यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्डश्चरति पापहा ।
प्रजास्तत्र न मुह्यन्ति नेता चेत्साधु पश्यति ॥२५॥
(यत्र श्यामः लोहिताक्षः दण्डः चरति पापहा प्रजाः तत्र न मुह्यन्ति नेता चेत् साधु पश्यति ।)
भावार्थः जहां श्याम वर्ण एवं लाल नेत्रों वाला और पापों (पापियों?) का नाश करने वाला ‘दण्ड’ विचरण करता है, और जहां शासन का निर्वाह करने वाला उचितानुचित का विचार कर दण्ड देता है वहां प्रजा उद्विग्न या व्याकुल नहीं होती ।
दण्ड कोई मूर्तिमन्त वस्तु नहीं है, यह तो एक भाव है, अमूर्त अवधारणा है । किंतु शास्त्रों में उसका वर्णन काले (डरावने) और लाल-लाल आंखों वाली भौतिक जीवंत सत्ता के तौर पर किया गया है । यह दण्ड के भयकारक स्वरूप को प्रस्तुत करने का तरीका है, जिसे शब्दशः ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं है । कहने का प्रयोजन मात्र यह है कि दण्ड वैसा ही भयजनक है जैसे कोई मतिमान् डरावना पशु आपके समक्ष खड़ा हो जाए । यानी दण्ड का विचार व्यक्ति को भयभीत कर सके, इसलिए ऐसा वर्णन प्रस्तुत है । जहां नेता अपराधी को ऐसे दण्ड का भय दिखाए वहां शेष प्रजा निडर रह सकती है ।
तस्याहुः सम्प्रणेतारं राजानं सत्यवादिनम् ।
समीक्ष्यकारिणं प्राज्ञं धर्मकामार्थकोविदम् ॥२६॥
(तस्य आहुः सम्प्रणेतारम् राजानम् सत्य-वादिनम् समीक्ष्य-कारिणम् प्राज्ञम् धर्म-काम-अर्थ-कोविदम् ।)
भावार्थः दुर्जनों पर ऐसे दण्ड का प्रयोग करने वाले राजा को सत्यवादी, सोच-विचारकर कार्य करने वाला, बुद्धिमान्, और धर्म, काम एवं अर्थ की समझ रखने वाला कहा गया है ।
धर्म, काम एवं अर्थ को शास्त्रों में ‘त्रिवर्ग’ की संज्ञा दी गयी है । सांसारिक जीवन इन तीनों के चारों ओर केंद्रित रहता है । ‘अर्थ’ से तात्पर्य है धनसंपदा जिसके बल पर ‘काम’ अर्थात् भौतिक कामनाओं एवं सुखसुविधाओं का भोग व्यक्ति द्वारा किया जाता है, और जिससे दान, पुण्य, जनसेवा आदि जैसे ‘धर्म’ के कार्य संपन्न किए जाते है । इन तीनों में संतुलन बनाए रखकर जीवन यापन करना सामान्य व्यक्ति का कर्तव्य माना गया है । उक्त श्लोक के अनुसार न्यायप्रिय राजा त्रिवर्ग को ठीक-से समझने वाला कहा जाएगा ।
तं राजा प्रणयन्सम्यक् त्रिवर्गेणाभिवर्धते ।
कामात्मा विषमः क्षुद्रो दण्डेनैव निहन्यते ॥२७॥
(तम् राजा प्रणयन् सम्यक् त्रिवर्गेण अभिवर्धते काम-आत्मा विषमः क्षुद्रः दण्डेन एव निहन्यते ।)
भावार्थः उस दण्ड का समुचित प्रयोग करने वाला राजा त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ एवं काम) की दृष्टि से समृद्ध होता है । अर्थात् न्याय के मार्ग पर चलने वाले राजा को आर्थिक संपन्नता के साथ सुखभोग और धर्म-संपादन में सफलता मिलती है । इसके विपरीत जो राजा भोगविलास या सत्तासुख में डूबा रहता है, जो लोगों के प्रति असमान या गैरबराबरी (अन्यायपूर्ण) का बरताव करता हो, और जो नीच स्वभाव का हो, वह उसी दण्ड के द्वारा मारा जाता है ।
कहने का तात्पर्य यह है कि जो राजा दण्ड के योग्य व्यक्तियों को दण्डित नहीं करता है वह कालांतर में उन्हीं दुर्जनों के कारण सत्ताच्युति का भागीदार बनता है । वर्तमान परिप्रेक्ष में राजा के माने हैं शासकीय व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे लोग जो राजकाज चलाते हैं । उनका आचरण ही न्याय की दिशा निर्धारित करता है ।
यह अपने देश का दुर्भाग्य है कि इसकी न्यायिक व्यवस्था प्रायः विफल हो चुकी है । लोगों के मन से दण्डित होन का भय समाप्त होता जा रहा है । वे आश्वस्त होते जा रहे हैं कि अपराध करने के बावजूद वे दण्ड से बचे रहेंगे । – योगेन्द्र जोशी
‘भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम …’ – ऋग्वेद में स्वस्थ इंद्रियों के साथ शतायु जीवन की प्रार्थना
16 अप्रै 2011 1 टिप्पणी
in अध्यात्म, दर्शन, धर्म, वेद, संस्कृत-साहित्य, philosophy, religion, Sanskrit Literature, Ved Tags: ऋग्वेद मंत्र, ऋचा, दीर्घायु की प्रार्थना, देव प्रार्थना, भद्रम् कर्णेभिः शृणुयाम, शतमिन्नु शरदो, सायणभाष्य, Prayer for Longevity, Prayer to Gods, Richa, Rigved Mantra, Saayana Bhashya
कई वेदमंत्रों में सूर्य, अग्नि, इंद्र, वरुण इत्यादि देवों के प्रति प्रार्थना का उल्लेख देखने को मिलता है । कुछ मंत्रों में देव शब्द के प्रयोग द्वारा उनकी सामूहिक स्तुति भी व्यक्त की गई । ये देव वस्तुतः क्या हैं मैं कभी समझ नहीं पाया । ऐसा प्रतीत होता है कि वैदिक चिंतकों का प्रकृति को नियंत्रित करने वाली अमूर्त दैवी शक्तियों में अटूट विश्वास था । उनकी मान्यता रही होगी कि ये शक्तियां चेतन हैं और उनकी स्तुति से स्वस्थ तथा सफल जीवन की प्राप्ति संभव है । रोगमुक्त शतायु जीवन की कामना के साथ इनकी प्रार्थना संबंधी मंत्र अथर्ववेद एवं यजुर्वेद में मैं पढ़ चुका हूं । दोनों ही वेदों में तत्संबंधी मंत्र ‘पश्येम शरदः शतम्’ से आरंभ होते हैं । इनका जिक्र मैं पहले कभी कर चुका हूं । (देखें क्रमशः 2 मार्च 2010 एवं 19 जून 2010 की ब्लाग-प्रविष्टियां ।)
ऋग्वेद में भी उपर्युक्त आाशय वाली दो ऋचाओं से मेरा साक्षात्कार हाल में हुआ । इस स्थल पर मैं उन्हीं का उल्लेख कर रहा हूं । पहली ऋचा है
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
(ऋग्वेद मंडल 1, सूक्त 89, मंत्र 8)
(भद्रम् कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रम् पश्येम अक्षभिः यजत्राः स्थिरैः अङ्गैः तुष्टुवांसः तनूभिः वि-अशेम देव-हितम् यत् आयुः ।)
भावार्थ: हे देववृंद, हम अपने कानों से कल्याणमय वचन सुनें । जो याज्ञिक अनुष्ठानों के योग्य हैं (यजत्राः) ऐसे हे देवो, हम अपनी आंखों से मंगलमय घटित होते देखें । नीरोग इंद्रियों एवं स्वस्थ देह के माध्यम से आपकी स्तुति करते हुए (तुष्टुवांसः) हम प्रजापति ब्रह्मा द्वारा हमारे हितार्थ (देवहितं) सौ वर्ष अथवा उससे भी अधिक जो आयु नियत कर रखी है उसे प्राप्त करें (व्यशेम) । तात्पर्य है कि हमारे शरीर के सभी अंग और इंद्रियां स्वस्थ एवं क्रियाशील बने रहें और हम सौ या उससे अधिक लंबी आयु पावें ।
और अनुक्रम में दूसरी ऋचा है
शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्र नश्चक्र जरसं तनूनाम् ।
पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ॥
(यथा उपर्युल्लिखित, मंत्र 9)
(शतम् इत् नु शरदः अन्ति देवाः यत्र नः चक्र जरसम् तनूनाम् पुत्रासः यत्र पितरः भवन्ति मा नः मध्या रीरिषत आयुः गन्तोः ।)
भावार्थ: हे देवो, मनुष्य की आयु की सम्यक् समाप्ति सौ वर्ष (शरदः) की नियत की गयी है, जिसमें वृद्धावस्था (जरसं) की व्यवस्था की है (चक्र) और जिसमें हमारे पुत्र (पुत्रासः) स्वयं पिता बन सकें, अर्थात् हम पौत्रवान् बन जावें । ऐसे उस पूर्ण आयु की अंतकाल (अन्ति) से पहले बीच के काल में ही हमारी हिंसा न करें, यानी हमें क्षति न पहुंचाएं (रीरिषत), हमें क्षीणकाय न बनावें ।
उपर्युक्त भावार्थ मैंने ऋग्वेद के सायणभाष्य के आधार पर प्रस्तुत किया है, जैसा मैं उसे समझ पाया, ग्रहण कर सका । शब्दों का चयन और भावाभिव्यक्ति कदाचित् स्तरीय न हो, किंतु उसे सामान्य भाषा में लिखने का मैंने प्रयास किया है । दूसरी ऋचा के ‘पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति’ का अर्थ विकल्पतः ऐसा भी दिया गया हैः ‘जिस अवस्था में हमारे पुत्र पितर बन जावें’ । पितर (संस्कृत में पिता = पितृ का बहुवचन) का अर्थ होता है पालन करने वाला । चूंकि संतान का पालन सामान्यतः जन्मदाता ही करता है, अतः रुढ़ि अर्थ में उसी को पिता कहा है । प्रचलित सामाजिक व्यवस्था में पुत्र ही वृद्ध जन्मदाताओं का पालन करते हैं, अतः उस अर्थ में वे अपने पिताओं के पितर हो जाते हैं । – योगेन्द्र जोशी
संस्कृत छंदों के उल्लेख करने में त्रुटियां – एक दृष्टांत: “मंगलम् भगवान …”
07 मार्च 2011 1 टिप्पणी
in कर्मकांड, धर्म, लोकव्यवहार, संस्कृत-साहित्य, religion, rituals, Sanskrit Literature Tags: त्रुटिपूर्ण श्लोक, मंगलम् भगवान विष्णुः, विष्णु वंदना, समास शब्द, हिन्दू पुरोहित, compund word, erroneous couplet, Hindu priest, Vishnu salutation
हिंदू परिवारों के धार्मिक कर्मकांडों के निमंत्रणपत्रों पर अक्सर देव-वंदना के छंद मुद्रित देखने को मिलते हैं । कम से कम उत्तर भारतीयों में तो यह परंपरा प्रचलित है ही । चूंकि शुभकार्यों का आरंभ गणेश-पूजन से होता है, अतः गणेश-वंदना के छंदों का प्रयोग सर्वाधिक मिलता है । कतिपय छंदों के उल्लेख के साथ इस विषय की चर्चा मैंने अपने हाल के ब्लाग-प्रविष्टियों (क्लिक करें) में की है । मुझे मिलने वाले निमंत्रणपत्रों पर यदाकदा विष्णु-वंदना के श्लोक भी पढ़ने को मिलते हैं । एक श्लोक, जिसका उल्लेख संभवतः सर्वाधिक किया जाता है, को इस लेख के आंरभ में चित्र में दिया गया है, जिसे मैंने किसी निमंत्रणपत्र से ही स्कैन किया है । मैं इसको दुबारा सामान्य पाठ के रूप में यथावत् (प्रस्तुत चित्र में जैसा है) आगे लिख रहा हूं:
मंगलम् भगवान विष्णुः, मंगलम् गरूणध्वजः ।
मंगलम् पुण्डरी काक्षः, मंगलाय तनो हरिः ॥
इस स्थल पर मेरा मुख्य उद्येश्य इस छंद की व्याख्या करना अथवा इसकी उपयोगिता/अर्थवत्ता स्पष्ट करना नहीं है । मैं यह बताना चाहता हूं कि कई बार लोग संस्कृत मंत्रों/छंदों का दोषपूर्ण पाठ लिखते हैं और वैसा ही दोषपूर्ण उच्चारण करते हैं । आगे कुछ कहूं इसके पहले इस श्लोक को लिखने में कौन-कौन-सी त्रुटियां मेरी दृष्टि में आई हैं उन्हें बता दूं । एक त्रुटि तो यह है कि गरुण शब्द के बदले गरुड होना चाहिए । इसे मैं टाइप करने में गलती मान लेता हूं । इसके अतिरिक्त मैं दो प्रकार की त्रुटियां देखता हूं: पहले वे जो गंभीर हैं और अर्थ का अनर्थ कर सकती हैं, या श्लोक को निरर्थक बना देती हैं । दूसरे वे जो संस्कृत के छंदों को लिपिबद्ध करने के नियमों अथवा परंपराओं के अनुसार नहीं हैं ।
पहले प्रकार के दोष स्पष्ट कर दूं । उक्त श्लोक के तीसरे चरण में ‘पुण्डरी काक्षः’ लिख गया है । ऐसा लगता है कि मानो ‘पुण्डरी’ एवं ‘काक्षः’ दो शब्द हैं । क्या अर्थ हैं इन शब्दों के ? सही शब्द (वस्तुतः पदबंध) ‘पुण्डरीकाक्षः’ है, जो दरअसल दो शब्दों के संयोग और संधि (दीर्घसंधि) से बना है:
पुण्डरीकाक्षः = पुण्डरीक+अक्षः
‘पुण्डरीक’ का अर्थ है ‘श्वेत कमल’ और अक्ष का अर्थ है इंद्रिय; यह बहुधा नेत्र के अर्थ में प्रयुक्त होता है । बहुब्रीहि समास के अंतर्गत रचे गये इस संयुक्त शब्द का अर्थ है ‘श्वेत कमल के समान नेत्र वाला’ । संस्कृत साहित्य में उपमा देने के अपने तरीके हैं । कमलनयन या कमलनेत्र जैसे शब्दों का प्रयोग सौंदर्य-वर्णन में आम रहा है । वही यहां पर किया गया है । लेकिन अगर आप ‘पुण्डरी काक्षः’ लिखते हैं, तो ये शब्द अर्थहीन हो जाते हैं ।
दूसरा दोष है ‘मंगलाय तनो’ में । यह शब्द भी वस्तुतः एक सामासिक संयुक्त पदबंध है । वस्तुतः यह ‘मंगलायतनः’ है जिसका ‘नः’ संधि के नियमों के तहत श्लोक में आगे ‘हरिः’ शब्द की मौजूदगी के कारण ‘नो’ लिखा जाता है । अतः ‘नो’ लिखा जाना तो सही है, किंतु इसे दो हिस्सों में तोड़ कर नहीं लिखा जा सकता है । कहने का अर्थ यह है कि ‘मंगलायतनो’ के स्थान पर ‘मंगलाय’ + ‘तनो’ लिखने पर उसका वांछित अर्थ समाप्त हो जाता है । अगर इसे टुकड़ों में लिखा ही जाना हो (जिसकी श्लोक-लेखन में अनुमति नहीं) तब इसे ‘मंगल आयतनो’ लिखा जा सकता था । वास्तव में
मंगलायतनः = मंगल+आयतनः
मंगल का अर्थ है शुभ फल और आयतन का अर्थ है आश्रय, शरणस्थली अथवा रहने का स्थान, आदि । अतः ‘मंगलायतनः’ का तात्पर्य है शुभ फलों का घर, भंडार या प्राप्तिस्थल ।
अब मैं उक्त श्लोक में विद्यमान उन त्रुटियों की ओर इशारा करता हूं जो श्लोक के अर्थ को प्रभावित तो नहीं करते, परंतु संस्कृत छंदों के लेखन में प्रचलित नियमों के अनुरूप नहीं हैं । संस्कृत के ज्ञाता इस प्रकार की त्रुटियों से बचने का प्रयास अवश्य करते होंगे । मेरी नजर में आई त्रुटियां ये हैं:
1. श्लोक में सर्वत्र ‘मंगल’ के स्थान पर ‘मङ्गल’ लिखा जाना चाहिए । संस्कृत में किसी शब्द के अंतर्गत वर्णमाला के कवर्ग से पवर्ग तक के वर्णों (अर्थात् ‘क’ से ‘म’ तक के वर्ण) के पूर्व अनुस्वार नहीं लिखा जाता है, बल्कि उसके स्थान पर संबंधित वर्ग का पांचवां वर्ण लिखा जाता है, जैसे कङ्कण (कड़ा या चूड़ी), कञ्चन (स्वर्ण), कण्टक (कांटा), कन्दर (गुफा), कम्पन (कांपना), आदि । शब्दों के अंतर्गत अनुस्वार का प्रयोग य से ह तक के वर्णों के पूर्व किया जाता है, यथा कंस, दंश, संयम, आदि ।
2. यद्यपि ‘मङ्गलम्’ स्वयं में सही है और गद्य में इसे लिखा भी जाता है, किंतु संस्कृत व्याकरण के संधि के नियमों के अनुसार उक्त श्लोक में इसे ‘मङ्गलं’ लिखा जाना चाहिए । नियम यह है कि यदि छंदों के किसी पद के अंत में ‘म्’ हो और उसके पश्चात् व्यंजन से आरंभ होने वाला पद हो तो ‘म्’ को अनुस्वार लिख जाना चाहिए । और यदि इसके पश्चात् स्वर वर्ण हो तो ‘म्’ ही लिखा जाना चाहिए । ध्यान दें कि उक्त श्लोक में ‘म्’ के आगे तीनों स्थलों पर क्रमशः ‘भ’, ‘ग’, एवं ‘पु’ (व्यंजन) विद्यमान हैं ।
3. संस्कृत में ‘भगवान्’ (हलंत ‘न’) शब्द है न कि ‘भगवान’ । यह संज्ञाशब्द ‘भगवत्’ का प्रथमा विभक्ति (कर्ता कारक, nominative case) का एकबचन में विभक्ति रूप है । अतः श्लोक में यही लिखा होना चाहिए ।
4. अंत में यह भी बताना भी आवश्यक है कि संस्कृत में विरामचिह्न कॉमा के प्रयोग की परंपरा नहीं है । अब कुछ लोग उसका प्रयोग करने लगे हैं । स्पष्टता के लिए गद्य-लेखन में इसका प्रयोग अब होने लगा है । लेकिन प्राचीन रचनाओं की मौलिकता को यथासंभव बनाए रखा जाना चाहिए । तदनुसार उक्त श्लोक में इसका प्रयोग न करना समीचीन होगा ।
ये चार त्रुटियां गंभीर नहीं हैं, किंतु छंद की शुद्धता के लिए इनसे बचा जाना चाहिए । किंतु पहले जिन त्रुटियों की बात की है, वे निःसंदेह गंभीर एवं अक्षम्य हैं । इन बातों को ध्यान में रखते हुए श्लोक यों लिखा जाना चाहिए:
मङ्गलं भगवान् विष्णुः मङ्गलं गरूडध्वजः ।
मङ्गलं पुण्डरीकाक्षः मंगलायतनो हरिः ॥
(भगवान् विष्णु मंगल हैं, गरुड वाहन वाले मंगल हैं, कमल के समान नेत्र वाले मंगल हैं, हरि मंगल के भंडार हैं । मंगल अर्थात् जो मंगलमय हैं, शुभ हैं, कल्याणप्रद हैं, जैसे समझ लें ।)
अपनी बात समाप्त करने से पहले एक टिप्पणी करनी है । लोगों का संस्कृत-ज्ञान आम तौर पर शून्य या कम रहता है । ज्ञान न होना कोई अनुचित बात नहीं है । किंतु जब किसी अवसर पर संस्कृत का प्रयोग किया जा रहा हो तो इतना जानने की उत्कंठा तो होनी ही चाहिए कि लिखित पाठ का अर्थ क्या है और वह शुद्ध लिखा जा रहा है कि नहीं । मुझे लगता है कि लोग इस मामले में लापरवाह होते हैं । अधिक चिंताजनक पक्ष यह है कि पुरोहितगण भी इन बातों पर गौर नहीं करते है । मुझे तो इस बात की शंका रहती है कि उन लोगों को संस्कृत का समुचित ज्ञान होता भी है कि नहीं । बहुत संभव है कि उनमें से अधिकतर रट-रटाकर और स्थापित पुरोहितों की नकल करके इस कार्य में जुटते हैं । अवश्य ही सही सीखने में मेहनत तथा वक्त लगते हैं, कोई सीखा-सिखासा पैदा नहीं होता है । फिर भी उस दिशा में आगे बढ़ने का विचार तो मन में उठना ही चाहिए । – योगेन्द्र जोशी
गणेश वंदना (भाग 3) – ‘गजाननं भूतगणाधिसेवितम् …’ तथा अन्य छंद
19 फ़र 2011 1 टिप्पणी
in कर्मकांड, दर्शन, धर्म, लोकव्यवहार, philosophy, religion, rituals Tags: auspicious moment, गणेश वंदना, शुभ मुहूर्त, श्री गणेश, हिंदू परंपरा, Hindu tradition, Lord Ganesh, Prayer to Ganesh श्री गणेश
पिछली दो पोस्टों, दिनांकित 8-2-2011 एवं 13-2-2011, क्रमशः, में मैंने इस बात का उल्लेख किया था कि अनेक हिंदू परिवार कार्यों के शुभारंभ के समय गणेश अर्चना करते हैं । प्रार्थना के तत्संबंधित छंद प्रायः वैवाहिक निमंत्रण-पत्रों तथा अन्य स्थलों पर अंकित देखने को मिलते हैं । मैंने कुछएक छंदों को उक्त पोस्टों में उद्धृत था । उसी प्रसंग में चार अतिरिक्त छंदों का उल्लेख मैं अधोलिखित पाठ में कर रहा हूं:
अभिप्रेतार्थसिद्ध्यर्थं पूजितो यः सुरासुरैः ।
सर्वविघ्नच्छिदे तस्मै गणाधिपतये नमः ॥
(अभिप्रेत-अर्थ-सिद्धि-अर्थम् पूजितः यः सुर-असुरैः सर्व-विघ्न-च्छिदे तस्मै गण-अधिपतये नमः ।)
मन से विचारित (मनोवांछित) कार्य की सफलता के निमित्त जिन गणेशजी का पूजन सुरों (देवताओं) एवं असुरों (राक्षसों) के द्वारा किया जाता है, सभी विघ्नों के छेदन करने वाले उन विघ्न-विनाशक गणाधिपति (गणेश) देव के प्रति मैं नमन करता हूं । गणेश (= गण+ईश) को भगवान् शिव के गणों (अनुचरों) का अधिपति या स्वामी कहा जाता है ।
स जयति सिन्धुरवदनो देवो यत्पादपङ्कजस्मरणम् ।
वासरमणिरिव तमसां राशीन्नाशयति विघ्नानाम् ॥
(सः जयति सिन्धुर-वदनः देवः यत्-पाद-पङ्कज-स्मरणम् वासर-मणिः-इव तमसाम् राशीन् नाशयति विघ्नानाम् ।)
जिस प्रकार सूर्य अंधकार को दूर भगाता है वैसे ही जिसके चरण-कमलों का स्मरण विघ्नों के समूह का नाश करता है, हाथी के मुख वाले ऐसे देव (गणेश) की जय हो । वासरमणि का अर्थ वस्तुतः क्या है यह मुझे नहीं मालूम, किंतु मैंने इसका अर्थ दिन की मणि अथवा सूर्य माना है । सिंधुर = हाथी, वदन = मुख ।
गजाननं भूतगणाधिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम् ।
उमासुतं शोकविनाशकारकम् नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम् ॥
(गज-आननम् भूत-गण-अधिसेवितम् कपित्थ-जम्बू-फल-चारु-भक्षणम् उमा-सुतम् शोक-विनाश-कारकम् नमामि विघ्नेश्वर-पाद-पङ्कजम् ।)
हाथी के मुख वाले, भूत-गणों के द्वारा सेवित, कैथ एवं जामुन का चाव से भक्षण करने वाले, शोक (दुःख या कष्ट) के नाशकर्ता, उमा-पुत्र का मैं नमन करता हूं, विघ्नों के नियंता श्री गणेश के चरण-कमलों के प्रति मेरा प्रणमन । भूतगण = भगवान् शिव के अनुचर । गणेश को मोदकप्रिय (लड्डुओं के शौकीन) तो कहा ही जाता है, इस श्लोक से प्रतीत होता है कि उन्हें कैथ तथा जामुन के फल भी प्रिय हैं ।
यतो बुद्धिरज्ञाननाशो मुमुक्षोः यतः सम्पदो भक्तसन्तोषिकाः स्युः ।
यतो विघ्ननाशो यतः कार्यसिद्धिः सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥
(यतः बुद्धिः-अज्ञान-नाशः मुमुक्षोः यतः सम्पदः भक्त-सन्तोषिकाः स्युः यतः विघ्न-नाशः यतः कार्य-सिद्धिः सदा तम् गणेशम् नमामः भजामः ।)
जिनकी कृपा से मोक्ष की इच्छा रखने वालों की अज्ञानमय बुद्धि का नाश होता है, जिनसे भक्तों को संतोष पहुंचाने वाली संपदाएं प्राप्त होती हैं, जिनसे विघ्न-बाधाएं दूर हो जाती हैं और कार्य में सफलता मिलती है, ऐसे गणेश जी का हम सदैव नमन करते हैं, उनका भजन करते हैं ।
गणेश-स्तुति के अनेकों छंद धार्मिक पुस्तकों में उपलब्ध हैं, किंतु मैंने उनमें से आठ-दस का चयन कर इस तथा इसके पूर्ववर्ती दो आलेखों में प्रस्तुत किये हैं । ये मुझे समझने में अपेक्षया सुबोध लगे । ये छंद कदाचित् अधिक प्रचलित भी हैं । – योगेन्द्र जोशी
गणेश वंदना (भाग 2) – ‘एकदन्तं महाकायं …’ एवं अन्य छंद
13 फ़र 2011 Leave a Comment
in कर्मकांड, धर्म, लोकव्यवहार, religion, rituals Tags: auspicious moment, गणेश वंदना, शुभ मुहूर्त, श्री गणेश, हिंदू परंपरा, Hindu tradition, Lord Ganesh, Prayer to Ganesh श्री गणेश
पिछली पोस्ट में मैंने इस बात का जिक्र किया था कि अधिकांश हिंदू परिवारों में गणेश वंदना का बड़ा महत्त्व है । प्रत्येक शुभकार्य के आरंभ में प्रायः गणेश देवता की पूजा संपन्न की जाती है । गणेशजी को विघ्नहर्ता माना जाता है, अतः उनकी प्रार्थना की जाती है, ताकि वांछित कार्य बिना वाधाओं के संपन्न होवे । वैवाहिक निमंत्रण-पत्रों पर तो गणेश-स्तुति संबंधी श्लोकों का उल्लेख आम प्रचलन में है । ऐसी परिपाटी मुझे अन्य शुभावसरों पर देखने को शायद ही कभी मिली है । यों जन्मदिन मनाने अथवा गृहप्रवेश करने जैसे अवसरों पर भी गणेश-अर्चना के छंद निमंत्रण-पत्रों पर अंकित किए जा सकते हैं । किंतु लगता है कि यह अभी आम प्रचलन में नहीं आया है । अस्तु, इस स्थल पर मैं गणेश-वंदना के कुछएक और छंदों को उद्धृत कर रहा हूं, जिनका उपयोग ऐसे अवसरों पर किया जा सकता है:
एकदन्तं महाकायं लम्बोदरगजाननम् ।
विघ्ननाशकरं देवं हेरम्बं प्रणाम्यहम् ॥
(एक-दन्तम् महा-कायम् लम्ब-उदर-गज-आननम् विघ्न-नाश-करम् देवम् हेरम्बम् प्रणामि अहम् ।)
एक दांत वाले, स्थूलकाय, दीर्घाकार पेट एवं हाथी के समान मुख वाले और विघ्नों का नाश करने वाले हेरम्ब (गणेश जी) को मैं प्रणाम करता हूं । (मान्यता है कि गणेश जी का सिर हाथी के सिर के सदृश है जिसका एक दांत खण्डित है ।)
शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
(शुक्ल-अम्बर-धरम् देवम् शशि-वर्णम् चतुः-भुजम् प्रसन्न-वदनम् ध्यायेत सर्व-विघ्न-उपशान्तये ।)
सभी विघ्नों को शान्त करने या रोकने हेतु श्वेत वस्त्र धारण करने वाले, चंद्रमा-तुल्य कायिक वर्ण वाले, चार भुजाओं वाले, श्री गणेश देव का ध्यान करे, उनकी उपासना करे ।
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यम् आयुःकामार्थसिद्धये ॥
(प्रणम्य शिरसा देवम् गौरी-पुत्रम् विनायकम् भक्त-आवासम् स्मरेन् नित्यम् आयुः-काम-अर्थ-सिद्धये ।)
दीर्घायुष्य-प्राप्ति, इच्छा-पूर्ति एवं धनोपार्जन में साफल्य पाने हेतु भक्तजनों के शरणस्थल, पार्वती-पुत्र, विनायक (विघ्न हरने वाले) देव, श्री गणेश, का नित्यप्रति सिर नवाते हुए स्मरण करे ।
आलम्बे जगदालम्बे हेरम्बचरणाम्बुजे ।
शुष्यन्ति यद्ररजःस्पर्शात्सद्यः प्रत्यूहवार्धयः ॥
(आलम्बे जगत्-आलम्बे हेरम्ब-चरण-अम्बुजे शुष्यन्ति यत्-रजः-स्पर्शात् सद्यः प्रत्यूह-वार्धयः ।)
इस संसार के आलंबन (आधार) स्वरूप श्री हेरम्ब (गणेश) के चरण-कमल का मैं आश्रय लेता हूं (अर्थात् उनकी शरण में जाता हूं), जिस चरण के धूलि के स्पर्श से विघ्नबाधाओं के समुद्र तुरंत सूख जाते हैं ।
तीन-चार छंद अभी और हैं, जिनका मुझे उल्लेख करना है अगली पोस्ट में । – योगेन्द्र जोशी





